अपने चेहरे पे हम शिकन नहीं रखते
अपने चेहरे पे हम शिकन नहीं रखते
दर्द कितना है कभी ज़िक्र नहीं करते
मौका ढूंढ के लौटा दिया करते है हम
जेब में किसी का एहसान नहीं रखते
मिट जाए भले हस्ती हमारी मंज़ूर है
धौंस किसी की किसी हाल नहीं सहते
घाटा तो बहोत है मगर कोइ ग़म नहीं
ईश्क़ के सिवा कोइ व्यापार नहीं करते
हमको भी मालूम है दौरे दस्तूर मगर
फायदे के लिए सच को झूठ नहीं कहते
मुकेश इलाहाबादी -------------------
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