जाने क्या क्या सपने बुनने लगता है मन

जाने क्या क्या सपने बुनने लगता है मन
तुमसे बतियाऊं तो महकने लगता है मन
बुझा हुआ अलाव था मेरा मन तुमसे मिल
जाने क्यूँ हौले- हौले दहकने लगता है मन
मुकेश इलाहाबादी --------------------------

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