अपने रुखसार की

अपने
रुखसार की
एक चुटकी सुर्खी
मल दो मेरे चेहरे पे
ताकि मै भी हो जाऊं
लाल गुलाल

अपने गीले गेसुओं को
झटक दो मेरे चेहरे पे
ताकि चांदी सी महमाती हुई
इन चांदी सी बूंदों से
महमा उट्ठे मेरा भी वज़ूद

अपने
सूने उपवन के
पट खोल दिए हैं मैंने
ताकि तुम आकर
डाल सको
एक फागुनी नज़र
और हरिया जाए
मेरा भी तन मन

मुकेश इलाहाबादी -----

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