तुम रहो मै रहूं

तुम रहो
मै रहूं
और हो
बारिसों का मौसम
तुम रहो
मै रहूँ
तन्हा छत पे
लेटी हो जाड़े क़ी नर्म धुप
अपने दरमियान
तुम रहो
मैं रहूँ
ऊंघती दोपहर के
सूई पटक सन्नाटे में
बतिया रही हो
सिर्फ कुछ फुसफुसाहटे
कि काश ऐसा हो????

मुकेश इलाहाबादी ,,,,,,,,,,

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