प्रतीक्षारत

आज भी
दरवाज़े से सटे
मेरे कान प्रतीक्षारत हैं
तुम्हारे आने की
पदचाप सुनने को
कि, आज भी
खुली हैं मेरी आँखे
तुम्हे देख लेने को जी भर के
बस एक बार
कि,
बस एक बार
तुम्हारे लौट आने की
प्रतीक्षा में
प्रतीक्षारत है मेरा रोम - रोम

सुमी - मेरी प्यारी सुमी

मुकेश इलाहाबादी ---

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है