वजूद के पार की रौशनी
वजूद
बस एक परदा है
मिट्टी का,
नाम का,
और उन कहानियों का
जो दुनिया हमें दे देती है।
मगर उस परदे के पीछे
कहीं बहुत गहराई में
एक रौशनी रहती है—
जो न उम्र से बंधी है
न वक़्त से।
मैंने बहुत देर तक
अपने ही साये का पीछा किया,
अपने नाम को
अपनी पहचान समझता रहा।
मगर एक दिन
जब तन्हाई ने
मेरे दिल का दरवाज़ा खोला
तो मैंने देखा
कि मेरा वजूद
सिर्फ़ एक धुंध है।
उस धुंध के पार
एक उजली दुनिया थी
जहाँ रूह
बिना डर के साँस लेती है।
वहाँ
न कोई सीमा है
न कोई दीवार,
बस एक अनंत सुकून है
जो हर सवाल को
ख़ामोशी में बदल देता है।
तब समझ में आया
कि असली सफ़र
वजूद को पकड़ने का नहीं,
उसे पार करने का है।
और जब इंसान
उस परदे से आगे बढ़ जाता है
तो उसे दिखाई देती है
वही रौशनी
जो हमेशा से
उसकी रूह में जल रही थी।
मुकेश ,,,,,,,
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