पानी बहुत है, मगर प्यास बाक़ी है
चारों तरफ़ पानी ही पानी है
समुंदर की नीली वुसअत,
लहरों की बेक़रार आवाज़,
और हवा में घुला
नमक का हल्का-सा स्वाद।
दूर तक फैलती हुई लहरें
किनारे को छूकर लौट जाती हैं,
जैसे किसी दहलीज़ पर आकर
कदम अचानक रुक गए हों।
रेत पर जमा
सफ़ेद, फेनिल झाग
थकी हुई साँसों की तरह
धीरे-धीरे बिखर जाता है।
मैंने समुंदर से पूछा
“तुम्हारे पास इतना पानी है,
फिर भी तुम्हारी लहरों में
इतनी बेचैनी क्यों है?”
समुंदर कुछ देर
ख़ामोश रहा,
फिर एक लहर
मेरे पैरों को छूकर लौट गई।
उस नमकीन स्पर्श में
जैसे एक जवाब छुपा था
कि हर वुसअत
हर कमी को नहीं भर पाती।
कभी-कभी
बहुत कुछ होते हुए भी
दिल के किसी कोने में
एक खाली जगह रह जाती है।
वही जगह
जहाँ कोई एक नाम
धीरे-धीरे गूँजता रहता है।
और तब समझ में आता है
कि समुंदर क्यों बेचैन है,
लहरें क्यों बार-बार
किनारे तक भागती हैं।
क्योंकि
चारों तरफ़ पानी हो सकता है,
गहराइयाँ भी बेहिसाब हो सकती हैं
मगर अगर
कोई एक शख़्स
दिल के समुंदर में न हो,
तो सच यही है
पानी बहुत है,
मगर प्यास बाक़ी है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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