बारिश में तेरा स्याह बदन
तेरा ये बदन, बारिश से तरबतर,
संगमरमर पर फिसलती बूंदों सा चमकता,
उफ़्फ़! तेरी काली ज़ुल्फ़ें, सियाह बादल सी,
ख़ुद उतर आई हों कंधों से लिपटने को।
पानी से लबालब वो जल-कण,
हौले-हौले तेरे गालों पर सरकते,
जैसे गंगा उतर आई हो स्फटिक शिलाओं पर,
तेरी अधखुली आँखें, काग़ज़ी होंठ शहद से मीठे,
भीगे-भीगे, मदहोश करने वाले।
तेरी गर्दन, कंधे—पहाड़ी झरने की तरह बहते,
शरमाती बाहें, भीगी और नख़रे वाली,
कमर की लचक, नाभि का गहरा गड्ढा,
कमर के नीचे वो सघन जांघें दो, जुड़ी हुईं,
पारदर्शी कपड़ों से नशीलापन उंडेलतीं।
तेरे चौड़े नितंबों को निहारता हूँ तो
आँखें अनावृत हो जातीं, बेशर्म,
मेरी गुस्ताख़ हथेलियाँ सरकतीं उन पर,
होंठ तेरे उन्नत, कठोर कुच-अग्रों से खेलें,
एक नई रूहानी दुनिया रचते हुए।
तू मचल रही है, मैं लिपट रहा हूँ तुझमें,
बारिश पूरी रफ़्तार से बरस रही,
हवाएँ महकतीं तेरी ज़ुल्फ़ों को उड़ा रही,
मैं कभी उनसे, कभी तेरे कठोर स्तनों से खेलूँ,
बाहें तेरे नितंबों को सहला रहीं।
मैं खो जाना चाहता इन चिकनी जांघों के बीच,
कठोर जंघाओं की गर्मी में डूबकर,
और तू इज़ाज़त दे रही है, नज़रों से ललचाती,
अब बारिश तूफ़ान बन बरसने को तैयार,
हम दोनों, आग और पानी में जलते-बहते।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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