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Thursday, 5 March 2026

सावन की पारदर्शी देह

 सावन की पारदर्शी देह


सावन की पारदर्शी देह

आज फिर उतर आई है

आकाश से तुम्हारी देहरी तक

धीरे,

जैसे कोई संकोची स्पर्श।


हवा में घुली है

भीगी मिट्टी की महक,

और तुम्हारे चारों ओर

एक नम उजाला

झिलमिला रहा है।


तुम खड़ी हो बारिश में,

आँखें आधी मूँदी हुई—

जैसे हर बूँद

तुम्हारे भीतर

किसी अनकहे गीत को जगाती हो।


तुम्हारे कंधों से फिसलती जलरेखाएँ

कोई भाषा नहीं बोलतीं,

पर मैं सुन लेता हूँ

उनका धीमा कंपन।


सावन तुम्हें छूता है

और तुम

पानी की तरह

हल्की हो जाती हो

इतनी हल्की

कि लगता है

यदि नाम लेकर पुकारूँ

तो तुम

बादल बनकर

मेरे सीने में ठहर जाओ।


उफ्फ

यह कैसी बरसात है

जिसमें भीगती देह नहीं,

भीतर का आकाश

पारदर्शी हो जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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