बारिश की बूँदों को
हथेली पर सहेजे
तुम छत पर भाग रही हो
जैसे बादलों ने
अपनी सबसे हल्की धुन
तुम्हें दे दी हो।
तुम्हारी हँसी
भीगकर और पारदर्शी हो गई है,
उसमें कोई चालाकी नहीं,
सिर्फ़ पानी की सच्चाई है।
नरगिसी बालों से
रजत कण झरते हैं—
धीरे,
जैसे रात की नींद
सुबह में खुल रही हो।
हर बूँद
तुम्हारी देह से फिसलकर
हवा में एक क्षण ठहरती है,
और मैं
उसे अपनी रूह पर
उतरता हुआ महसूस करना चाहता हूँ—
बूँद-बूँद,
बिना छुए भी
भीग जाना चाहता हूँ।
तुम दौड़ती रहो,
और बारिश
तुम्हारे चारों ओर
एक पारदर्शी चादर बुनती रहे
मैं उसी में
अपना नाम
धीरे से घुला देना चाहता हूँ।
उफ्फ—
ऐसा भीगना
जिसमें देह कम,
और आत्मा ज़्यादा
भीगती हो।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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