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Wednesday, 4 March 2026

बारिश की बूंदे और तुम

 बारिश की बूँदों को

हथेली पर सहेजे

तुम छत पर भाग रही हो

जैसे बादलों ने

अपनी सबसे हल्की धुन

तुम्हें दे दी हो।


तुम्हारी हँसी

भीगकर और पारदर्शी हो गई है,

उसमें कोई चालाकी नहीं,

सिर्फ़ पानी की सच्चाई है।


नरगिसी बालों से

रजत कण झरते हैं—

धीरे,

जैसे रात की नींद

सुबह में खुल रही हो।


हर बूँद

तुम्हारी देह से फिसलकर

हवा में एक क्षण ठहरती है,

और मैं

उसे अपनी रूह पर

उतरता हुआ महसूस करना चाहता हूँ—

बूँद-बूँद,

बिना छुए भी

भीग जाना चाहता हूँ।


तुम दौड़ती रहो,

और बारिश

तुम्हारे चारों ओर

एक पारदर्शी चादर बुनती रहे

मैं उसी में

अपना नाम

धीरे से घुला देना चाहता हूँ।


उफ्फ—

ऐसा भीगना

जिसमें देह कम,

और आत्मा ज़्यादा

भीगती हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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