सामने घास का शांत मैदान है,
ओस से भीगी हरियाली पर
तुम्हारे पाँव की आहट
धीरे-धीरे लिखती है
तुम्हारा होना।
तुम अपने हिस्से की ज़मीन लिए नहीं,
अपनी हल्की-सी हँसी लिए
दौड़ती हो उसमें।
और जब तुम दूर से पुकारती हो,
तो लगता है
उस आवाज़ में कोई आग्रह नहीं
सिर्फ़ एक नरम-सी जगह है
जहाँ पूरा जीवन
बिना शोर के
सिमट सकता है।
तब मन करता है
दौड़ूँ नहीं—
बस हवा की तरह पहुँच जाऊँ
तुम तक,
इतना हल्का
कि तुम्हारी पलकों पर ठहर सकूँ।
मुकेश ,,,,,,,
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