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Monday, 9 March 2026

बरामदे की कुर्सी पर बैठा बूढ़ा आदमी

 बरामदे  की कुर्सी पर बैठा बूढ़ा आदमी

बरामदे की कुर्सी पर

बैठा एक बूढ़ा आदमी

दिन को

धीरे-धीरे बीतते हुए देख रहा है।


धूप

आकर उसके पैरों के पास

थोड़ी देर बैठती है,

फिर

चुपचाप सरक जाती है

दीवार की तरफ।


उसके हाथ

कुर्सी की बाँहों पर टिके हैं,

जैसे वर्षों की थकान

अब यहीं ठहर गई हो।


आँखें

कभी सड़क पर जाती हैं,

कभी उस आकाश पर

जहाँ से

कभी उसके सपने

उड़कर आया करते थे।


कभी-कभी

वो हल्का-सा मुस्कुरा देता है—

शायद

किसी पुराने नाम को

अचानक याद कर लेने पर।


बरामदे के सामने

पेड़ की छाया

धीरे-धीरे लंबी होती जा रही है,

और समय

एक अदृश्य नदी की तरह

उसके पास से

बहता चला जा रहा है।


वो बूढ़ा आदमी

कुछ नहीं कहता,

बस बैठा रहता है—


जैसे जीवन की

लंबी कहानी का

आख़िरी पन्ना

अब

खामोशी में पढ़ा जा रहा हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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