बारिश में सड़क किनारे भुट्टा बेचती बूढ़ी औरत
बारिश गिर रही है
धीमी, लगातार,
जैसे आसमान
पुरानी यादों को धो रहा हो।
सड़क के किनारे
एक छोटी-सी अंगीठी के पास
बैठी है
भुट्टा बेचती एक बूढ़ी औरत।
उसकी उँगलियाँ
धुएँ और बारिश के बीच
मक्के को धीरे-धीरे घुमा रही हैं,
जैसे आग और पानी के बीच
कोई पुराना समझौता हो।
उसकी साड़ी
भीगकर भारी हो गई है,
पर उसके चेहरे पर
एक अजीब-सी स्थिरता है
जैसे जीवन की मार
अब उसे चौंकाती नहीं।
आसपास
गुज़रती गाड़ियों की रोशनी
पानी में टूटती है,
और हर रोशनी के साथ
एक पल को
उसका चेहरा भी चमक उठता है।
वो हर भुट्टे पर
नींबू और नमक रगड़ते हुए
जाने किस सोच में डूबी रहती है
शायद
उसके मन में भी
किसी पुराने घर का आँगन
अब भी बसा हो।
बारिश
उसकी पीठ पर गिरती रहती है,
और अंगीठी की आग
अब भी जलती रहती है
जैसे
इस दुनिया की सारी कठिनाइयों के बीच
जीवन
अपनी छोटी-सी गरमी
बचाए रखने की कोशिश कर रहा हो।
वो बूढ़ी औरत
सड़क किनारे बैठी
बस भुट्टा नहीं बेच रही
वो
इस भीगी हुई शाम में
धुएँ, आग और बारिश के बीच
ज़िंदगी को
थोड़ा-थोड़ा
भूनकर
लोगों के हाथों में रख रही है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment