धूप जब पुरानी दीवारों पर उतरती है,
तो वह कोई नया रंग नहीं बनाती—
वह बस उन परतों को उजागर कर देती है
जिन्हें समय ने चुपचाप ढक दिया था।
यादें भी कुछ ऐसी ही होती हैं—
वे लौटकर
किसी कहानी की शुरुआत नहीं करतीं,
बस उस ख़ामोशी को जगाती हैं
जिसे हमने
जीवन की भागदौड़ में
धीरे-धीरे भूल दिया था।
रिश्ते भी
अचानक समाप्त नहीं होते,
वे बस
अपनी आकृति बदल लेते हैं—
जैसे नदी
एक मोड़ के बाद
दूसरे नाम से बहने लगे।
और फिर
एक दिन ऐसा आता है
जब कोई साथ नहीं चलता,
कोई हाथ नहीं पकड़ता,
कोई आवाज़ नहीं पुकारती।
पर उसी सन्नाटे में
आदमी को पहली बार
अपनी ही आहट सुनाई देती है
और तब समझ में आता है
कि हर बिछड़ना
दरअसल एक रास्ता है
जहाँ से होकर
मनुष्य
फिर से
अपने ही पास लौटता है।
मुकेश ,,,,
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