ख़ामोशी में छुपी हुई बातचीत
कभी-कभी
सबसे लंबी बातचीत
शब्दों से नहीं होती।
वह होती है
दो खामोशियों के बीच
जहाँ होंठ बंद रहते हैं
और दिल
धीरे-धीरे बोलने लगता है।
तुम सामने बैठे होते हो
पर कोई वाक्य नहीं बनता,
सिर्फ़ आँखों में
कुछ अनकहे अर्थ
हल्के-हल्के तैरते रहते हैं।
जैसे हवा
पेड़ों से कुछ कहती हो
पर पत्ते
उसका अनुवाद न करते हों।
ख़ामोशी भी
एक भाषा है
जिसे समझने के लिए
कानों की नहीं,
भीतर की शांति की ज़रूरत होती है।
और जो लोग
इस भाषा को सुन लेते हैं,
वे जानते हैं
कि रिश्ते
शब्दों से नहीं बनते,
वे बनते हैं
उन क्षणों से
जहाँ दो आत्माएँ
बिना बोले
एक-दूसरे को समझ लेती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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