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Wednesday, 4 March 2026

तुम्हारी पलकों पर ठहर जाए

 तुम्हारी पलकों पर ठहर जाए

भोर की पहली नींद,

और आँखों के कोरों में

जागती रहे किसी अधूरे स्पर्श की रोशनी।


तुम जब हवा को छुओ

तो उँगलियों में भर आए

अनकही बातों की गरमाहट,

जैसे कोई नाम

धीरे से त्वचा पर लिखा गया हो।


तुम धूप में खड़ी रहो

तो तुम्हारी देह के चारों ओर

चमकने लगे एक पारदर्शी आलिंगन,

जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सके,

कहा न जा सके।


तुम मुझे पुकारो

और मैं

तुम्हारी आवाज़ की दरारों में

पानी की तरह उतर जाऊँ—

बेआवाज़,

पर हर ओर फैलता हुआ।


तुम नदी के किनारे बैठो

और तुम्हारी साँसों में उठे

ज्वार का नमक,

जैसे प्रेम अपने ही भीतर

समंदर रचता हो।


तुम प्रेम में डूबो

तो समय का पत्थर पिघलने लगे,

और मिट्टी की साधारण देह

किसी अनदेखी आभा में

सोना हो जाए।


उफ्फ

ऐसा प्रेम

जो छूने से पहले ही

सारी सृष्टि को

एक लंबी, उजली धड़कन बना दे।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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