समझ के बाद का मौन — मैं, बरगद
अब
मैं मौन हूँ
क्योंकि
अब मुझे
सब समझ आ गया है
वह चिड़िया
कभी मेरे प्रेम में थी ही नहीं
वह
सिर्फ़
मेरी डाल पर
थक कर बैठती थी
मैंने
उसके ठहरने को
साथ समझ लिया
उसके गीतों को
संकेत
यह मेरी भूल थी
उसकी नहीं
मैं
उसके उड़ने की चाह का
अवरोध नहीं था
बस
एक विश्राम
जब यह
मुझे स्पष्ट हुआ
तो शब्द
अपने आप
छूट गए
क्योंकि
जहाँ भ्रम नहीं रहता
वहाँ
शिकायत भी नहीं रहती
अब
मैं हवा से नहीं कहता
कि पत्ते हिलाए
किसी को लुभाने के लिए
अब
मैं झूमता नहीं
किसी संकेत में
मेरा मौन
दुख नहीं है
यह
स्वीकृति है
कि हर ठहराव
प्रेम नहीं होता
और हर आसरा
साथ नहीं माँगता
अगर वह चिड़िया
आज भी आती है
तो
मैं
उसे उड़ने देता हूँ
न रोकता हूँ
न पुकारता हूँ
मैं बरगद हूँ
और
समझ के बाद
मौन
मेरी अंतिम
करुणा है
इसलिए
मैं चुप हूँ
क्योंकि
अब
कुछ भी
माँगना
बाक़ी नहीं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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