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Wednesday, 4 March 2026

फिर वह मौन हो गया

 फिर वह मौन हो गया


वह स्त्री

चिड़े के एकतरफ़ा प्रेम में

अंत तक

वैसी ही रही


उसने

उड़ने की चाह नहीं छोड़ी

बस

उड़ान का भरोसा

धीरे-धीरे

छूटता चला गया


बरगद

चिड़िया से बात करता था

हर विषय पर


कभी

झूम-झूम कर

अपनी डालों से

हवा को छेड़ता


कभी

मंद-मंद

पत्तों को हिलाते हुए

दिन की थकन

कह देता


बरगद बोलता था

बहुत बोलता था

इतना

कि चिड़िया

उसकी आवाज़ पहचानने लगी थी


फिर

एक दिन

अचानक


बरगद

मौन हो गया


न उसने

हवा से कुछ कहा

न पत्तों ने

ताल दी


चिड़िया

उसी डाल पर बैठी रही

शाम तक

सुबह तक


उसने नहीं पूछा—

“तुम क्यों मौन हो गए?”


शायद

कुछ प्रश्न

उत्तर से डरते हैं


बरगद

मौन में

और गहरा उतर गया


वह मौन

थका हुआ नहीं था

बस

समझ चुका था


कि हर बात

कह दी जाए

यह ज़रूरी नहीं


और वह स्त्री

बरगद की ओर देखकर

उदास रहती


उसकी उदासी

शिकायत नहीं थी

बस

एक स्वीकार


कि कुछ पेड़

साथ देने के बाद

खुद से

विदा ले लेते हैं


इलाहाबाद की गलियों ने देखा—

बरगद अब भी खड़ा है

छाया देता है

पर


अब

किसी से

बात नहीं करता


और चिड़िया

आज भी

कभी-कभी

उसी डाल पर बैठती है


बिना सवाल

बिना गीत


क्योंकि कुछ मौन

पूछे जाने के बाद

टूट जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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