जब दिल ने सजदा करना सीखा
एक दिन
जब दुनिया की सारी दौड़
मेरे कदमों में थककर बैठ गई,
और ख्वाहिशों का शोर
धीरे-धीरे ख़ामोश हो गया
तब
दिल ने पहली बार
सजदा करना सीखा।
वो सजदा
जिसमें ज़मीन से ज़्यादा
आसमान झुकता है,
और इंसान
अपने ही वजूद के सामने
नर्म हो जाता है।
मैंने बहुत पहले
मस्जिदों में सजदे देखे थे,
मगर उस दिन
दिल की वीरान चौखट पर
जो सजदा हुआ—
वो इबादत बन गया।
उस पल
न कोई लफ़्ज़ था
न कोई दुआ,
बस एक गहरी ख़ामोशी थी
जिसमें रूह
किसी अनजानी रौशनी से
भर रही थी।
तब समझ में आया
कि सजदा
सिर्फ़ माथे का झुकना नहीं होता,
सजदा तो वो पल है
जब अहंकार टूटता है
और दिल
अपने असली मालिक को
पहचान लेता है।
जब दिल ने सजदा करना सीखा
तो दुनिया छोटी लगने लगी,
और रूह
किसी असीम आसमान की तरह
फैलने लगी।
शायद
इबादत का असली रास्ता
यहीं से शुरू होता है
जहाँ इंसान
अपने ही अंदर
ख़ुदा की आहट सुन लेता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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