अकेलेपन का लौटता हुआ आलिंगन
कभी-कभी
अकेलापन भी
कोई खाली जगह नहीं होता
वो एक पूरा संसार होता है,
जो तुम्हारे चारों ओर नहीं,
तुम्हारे भीतर बस जाता है।
तुम चलते हो
भीड़ के बीच भी,
पर एक अदृश्य दूरी
हर चेहरा तुमसे जोड़कर भी
तुम्हें अलग रख देती है।
और फिर अचानक
एक रात,
या कोई अनजाना पल,
वो दूरी बोल उठती है।
कोई आवाज़ नहीं होती,
फिर भी
कुछ तुम्हें पुकारता है।
तुम रुकते हो,
और पाते हो
जिसे तुम छोड़ आए थे,
या जिससे तुम छूट गए थे,
वो अब बाहर नहीं…
तुम्हें घेरे हुए है।
अकेलापन पास आता है
धीरे, बिना शोर के,
और तुम्हें छू लेता है
जैसे कोई पुरानी स्मृति
वापस अपना हक़ माँग रही हो।
उस स्पर्श में
कोई दर्द नहीं होता,
सिर्फ़ एक पहचान होती है
कि तुम कभी उससे दूर थे ही नहीं।
तुमने जिसे खालीपन समझा,
वो दरअसल
तुम्हारा ही दूसरा नाम था।
और जब तुम उसे स्वीकार कर लेते हो
तो अजीब सा सुकून उतरता है,
जैसे कोई बिछड़ा हुआ
फिर बिना बोले
तुम्हें गले लगा ले।
यही है
अकेलेपन का लौटता हुआ आलिंगन।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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