अकेलापन कोई खालीपन नहीं होता,
वो एक पूरा आकाश होता है
जिसमें तुम
खुद ही बादल बनकर
खुद ही बरसते हो।
तुम भागते हो आवाज़ों की तरफ़,
चेहरों की भीड़ में
अपना कोई सहारा ढूँढते हो,
पर हर रास्ता
फिर तुम्हीं पर लौट आता है।
धीरे-धीरे
तुम समझने लगते हो
कि जो तुमसे दूर है,
वो बाहर नहीं,
भीतर की कोई पुरानी परछाईं है।
एक शाम
जब कुछ भी नहीं कहता,
तब वही चुप्पी
तुम्हारा नाम लेकर
तुम्हें छू लेती है।
न कोई शिकायत,
न कोई प्रश्न
बस एक ठहरा हुआ स्पर्श,
जैसे समय ने
थककर तुम्हें अपना लिया हो।
और तुम चौंकते नहीं,
बस रुक जाते हो…
क्योंकि अब समझ आ चुका होता है
कि जिसे तुम अकेलापन कहते थे,
वो दरअसल
तुम्हारा ही लौटता हुआ आलिंगन था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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