“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Wednesday, 16 May 2012
पत्थर पे वसंत
बैठे ठाले की तरंग ------------
देखना,
एक दिन आएगा
पत्थर पे वसंत
और फूलेगी
हथेलियों पे सरसों
उग आयेंगे,
आकाश में
टेसू और गुल्मोहरा के फूल
और झरेंगे
तुम्हारी आखों से
महुआ के फूल
जिन्हें सूंघ कर
मै,गाऊंगा
ताल - बेताल
मुकेश इलाहाबादी ---------------
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