“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Tuesday, 7 August 2012
चाँद फिसलकर
अँधेरे मे
चाँद
फिसलकर
उग आया
मेरी दोनो हथेलियों
के बीच
अंजुरी मे
मै रेशा रेशा
पी पाता चांदनी
कि,
हथेलियों के उत्ताप से
चाँद बह गया
अंजुरी के रंध्रों से
न जाने रेत के
किस महासमुंद मे
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