होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 12 August 2012

अक्शर चीखती हुई खामोशी के साथ

अक्शर
चीखती हुई
खामोशी के साथ
बतियाता है
मेरा मौन
तब ---
होता हूँ 'मै'
एक गहरे कूप में
जंहा होता है
अनंत विस्तार
अपनी निस्तरंगता के साथ
जंहा घुल जाती है
मेरी चीख
मेरा मौन
मेरा व्यक्तित्व
उस समिष्ट मे
निस्तरंगता मे
गहरे कूप मे,
और तब ---
बच रहती है
एक अनंतता
अपरिभाषेय -----

मुकेश इलाहाबादी -------

No comments:

Post a Comment