“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Tuesday, 8 December 2015
तुम्हारी निर्मल हँसी
जी तो चाहता है तुम्हारी निर्मल हँसी की दूधिया धार को अंजुरी में समेट आचमन कर मै भी हूँ जाऊँ पावन पवित्रतम तुम्हारे निश्छल प्रेम सा और महमहाऊं तुम्हारे आस पास पूजा की धूप सा
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