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Thursday, 4 February 2016

कोई मसले और फूल सा बिखर जाऊँ

कोई मसले और फूल सा बिखर जाऊँ
मै लोहा भी नही,कि साँचे में ढल जाऊँ
ये और बात गुलशन की शिफत अपनी
प्यार मिलते ही मै ,फूल सा खिल जाऊँ
मै सूरज हूँ धूप सा बिखरा हूँ हर सिम्त
ज़रा खिड़खी तो खोल,तो मै नज़र आऊँ

मुकेश इलाहाबादी -----------------------

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