“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक
▼
Tuesday, 15 January 2019
रात दिया जलाने को रह गया
रात दिया जलाने को रह गया
तुम्हे कुछ बताने को रह गया
बीज मेरी मुट्ठी में ही दबा रहा
फूल इक खिलाने को रह गया
अभी तो सिर्फ ग़ज़लें सुनाई थी
लतीफे तो सुनाने को रह गया
मुकेश इलाहाबादी ------
No comments:
Post a Comment