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Tuesday, 17 February 2026

भीतर बरसती हुई बारिश

 भीतर बरसती हुई बारिश

आज फिर
कोई बादल आसमान पर नहीं,
मगर दिल की फ़िज़ा में
घने अब्र ठहरे हुए हैं।
नज़र उठाऊँ तो धूप है,
नज़र झुकाऊँ तो नमी,
ये कैसी बारिश है
जो सिर्फ़ रूह की ज़मीन पर बरसती है।
कोई बिजली नहीं चमकती,
कोई गरज सुनाई नहीं देती,
बस ख़ामोशी की तहों में
आहिस्ता-आहिस्ता
कुछ टूटता रहता है।
भीतर की ये बारिश
अक्सर बेआवाज़ होती है,
आँखों तक आए बिना
पलकों के पीछे भीग जाती है।
लब मुस्कुराते रहते हैं,
मगर सीने में
अश्क़ों का समंदर मचलता है।
कभी ये रहमत लगती है,
कभी अज़ाब,
कभी लगता है
कि रब की कोई नर्म दस्तक है,
जो ग़ुरूर की गर्द धोना चाहती है।
इस बारिश में
कुछ पुराने ख़त घुल जाते हैं,
कुछ अधूरी दुआएँ बह निकलती हैं,
और कुछ नाम,
जिन्हें हम भूलना चाहते थे,
और गहरे उतर जाते हैं।
अजीब है ये बरसात
न छाता काम आता है,
न दीवारें बचाती हैं।
यहाँ बस एक सज्दा
या एक सच्ची आह
थोड़ी राहत देती है।
जब भीतर बहुत देर तक बरसता है,
तो मिट्टी नरम हो जाती है—
और उसी नरमी में
नई हरियाली की उम्मीद जन्म लेती है।
शायद ये बारिश
मिटाने नहीं आती,
तैयार करने आती है
कि रूह फिर से
किसी उजाले के क़ाबिल हो सके।
देखो,
बाहर चाहे मौसम साफ़ हो,
अगर भीतर बरस रही हो बारिश
तो समझो
कोई बदलाव
चुपचाप उतर रहा है।
मुकेश ,,,,,,,,

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