रूह की तह में रखे लफ़्ज़
कुछ शब्द बोले नहीं जाते,
वे बस रख दिए जाते हैं
रूह की तह में,
किसी पुराने ख़त की तरह,
जिसे पढ़ने की जल्दी नहीं होती।
वे लफ़्ज़
ना होंठों तक आते हैं,
ना काग़ज़ पर उतरते हैं;
बस धड़कनों के बीच
धीरे-धीरे सांस लेते रहते हैं।
कभी किसी की याद
उन्हें हल्का-सा छू लेती है,
तो भीतर
एक मुलायम-सी रोशनी फैलती है
जैसे बंद संदूक में
अचानक चाँद उतर आया हो।
ये वही शब्द हैं
जो कहे जाते तो
शायद कम हो जाते,
पर अनकहे रहकर
अर्थ बन गए।
किसी ने उन्हें
मोहब्बत समझा,
किसी ने इबादत,
और किसी ने—
सिर्फ़ एक खामोश इंतज़ार।
रूह की तह में रखे लफ़्ज़
समय से नहीं डरते;
वे मौसमों की तरह बदलते नहीं,
बस गहराते जाते हैं
जैसे कुएँ का पानी
जितना नीचे उतरो,
उतना मीठा मिलता है।
कभी रात के तीसरे पहर
जब दुनिया थककर सो जाती है,
वे चुपके से जागते हैं
और आत्मा की हथेली पर
अपना सिर रख देते हैं।
तुम उन्हें सुन नहीं पाओगे,
पर महसूस करोगे
एक कंपन,
एक हल्की-सी सिहरन,
जैसे किसी ने
भीतर से तुम्हारा नाम लिया हो।
रूह की तह में रखे लफ़्ज़
कभी खोते नहीं
वे बस
तुम्हारे होने का
सबूत बनकर
गहराई में चमकते रहते हैं।
मुकेश्,,,
No comments:
Post a Comment