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Tuesday, 17 February 2026

रूह के दस्तावेज़

 रूह के दस्तावेज़

न कोई तिजोरी,
न कोई रजिस्टर,
फिर भी संभाले हुए हैं भीतर
रूह के दस्तावेज़
जिन पर समय की नहीं,
अनुभव की मोहर है।
पहला पन्ना
एक रोशनी से खुलता है
जन्म की पहली साँस,
माँ की आँखों में ठहरा विश्वास,
और उस क्षण का मौन
जिसने हमें पृथ्वी से बाँध दिया।
दूसरे पन्ने पर
कुछ धुँधली इबारतें हैं
अधूरे प्रेम,
बिखरे हुए वादे,
और वे रातें
जिन्होंने हमें अपने ही भीतर
अजनबी बना दिया।
कहीं-कहीं
स्याही फैली हुई है
आँसुओं की नमी से।
मगर वही फैलाव
सबसे सच्चा हस्ताक्षर है,
क्योंकि दर्द ने
झूठ की रेखाएँ मिटा दीं।
जब कोई अनजाना चेहरा
अचानक अपना लगता है,
तो समझो
किसी पुराने दस्तावेज़ का
परिशिष्ट खुल गया है।
जब बिना कारण क्षमा हो जाती है,
तो जानो
रूह ने स्वयं
नई टिप्पणी जोड़ दी है।
इन दस्तावेज़ों में
सज़ाएँ नहीं,
सिर्फ़ सीख है।
यहाँ हानि नहीं,
विस्तार है।
हर वियोग
एक नया अध्याय,
हर मिलन
एक संशोधन।
ध्यान की गहराई में
कभी-कभी
इनकी स्याही चमक उठती है
और तब पता चलता है,
कि जो कुछ भी हुआ
अकारण नहीं था।
अंत में
जब सारे पन्ने पलट जाते हैं,
रूह खुद लिखती है
“मैं कथा नहीं,
चेतना हूँ।
मैं दस्तावेज़ नहीं,
प्रकाश हूँ।”
और उसी प्रकाश में
सारे लेख
धीरे-धीरे विलीन हो जाते हैं
जैसे शब्द
अपने मूल मौन में लौट आए हों।
मुकेश्,,,

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