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Monday, 30 March 2026

जिस्म से रूह तक जाती हुई एक गर्म लहर

 जिस्म से रूह तक जाती हुई एक गर्म लहर


जिस्म से रूह तक

जाती हुई एक गर्म लहर

जैसे किसी ने

बिना छुए ही

मुझे पूरा छू लिया हो।


ये एहसास

सिर्फ़ त्वचा पर नहीं ठहरता,

ये भीतर उतरता है

जहाँ ख़ामोशी

अपनी ही आवाज़ सुनती है।


तुम्हारी क़ुर्बत में

कुछ ऐसा है

जो लफ़्ज़ों से परे है,

एक हरारत

जो सवाल नहीं करती,

बस महसूस होती है।


ये लहर

धीरे-धीरे उठती है,

ना तूफ़ान बनती है,

ना सुकून में खोती

बस एक पुल-सी बन जाती है

जिस पर चलकर

मैं “मैं” से “तुम” तक पहुँचता हूँ।


क्या ये मोहब्बत है?

या वो रास्ता

जहाँ जिस्म

सिर्फ़ दरवाज़ा रह जाता है

और रूह

अपनी मंज़िल पहचान लेती है?


तुम्हारे होने की ये गर्मी

मुझे जलाती नहीं,

मुझे गढ़ती है—

जैसे कोई अनदेखा हाथ

मेरे वजूद को

नई शक्ल दे रहा हो।


और फिर—

ना दूरी रह जाती है,

ना क़रीबी का एहसास,

बस एक लहर होती है

जो चलती नहीं,

ठहरकर भी

मुझे बहाए लिए जाती है।


मुकेश ,,,,,,,

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