लम्हों के दरमियान सुलगता हुआ सुकून
लम्हों के दरमियान
सुलगता हुआ सुकून
जैसे वक़्त की उँगलियों में
कोई धीमी आग
बिना धुएँ के जल रही हो।
ना कोई शोर,
ना कोई हलचल,
फिर भी भीतर
कुछ लगातार घटता है
एक नरम-सी तपिश,
जो ख़ामोशी को भी
महसूस होने लगती है।
तुम्हारे पास बैठकर
अक्सर यूँ लगता है
कि बातों की ज़रूरत ही नहीं
हमारे दरमियान
जो कुछ है,
वो लफ़्ज़ों से पहले का है,
और शायद
लफ़्ज़ों के बाद का भी।
ये सुकून
ठंडा नहीं है,
इसमें एक हल्की-सी आग है—
जो जलाती नहीं,
बस याद दिलाती है
कि हम ज़िंदा हैं,
और किसी के होने से
और भी ज़्यादा।
कभी सोचता हूँ
क्या ये ठहराव ही असली हरकत है?
जहाँ सब कुछ रुका हुआ लगता है,
वहीं सबसे गहरा
बहाव छुपा होता है।
तुम्हारी मौजूदगी में
ये सुलगता हुआ सुकून
मुझे बदलता नहीं,
बस मुझे
मुझसे मिलवा देता है।
और फिर—
ना वक़्त का एहसास रहता है,
ना लम्हों का फ़ासला,
बस एक ठहराव होता है
जो धीरे-धीरे
अनंत में बदलता चला जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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