“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Wednesday, 28 March 2012
तूफां में सारा जन्हा बह गया
बैठे ठाले की तरंग -----------
तूफां में सारा जन्हा बह गया
मकीं बह गया, मकाँ बह गया
फ़क़त उजड़ी यादो के सिवा
जो भी था सारा सामाँ बह गया
रेत पे छोड़ तड़पती मछलियाँ
समंदर फिर जाने कंहा बह गया मुकेश इलाहाबादी-----------------
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