“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक
▼
Friday, 1 March 2013
ये सुर्ख गुलाब
ये सुर्ख गुलाब जो मेरे गुलशन में मुस्कुराया है ये ज़ख्मे जिगर है जिसे फूलों की तरह उगाया है हमने तो हर रिश्ता उम्रभर निभाया है नफरत के तीरों का जवाब भी उल्फत से दिलाया है
No comments:
Post a Comment