“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Saturday, 8 June 2013
दिल गीली लकड़ी जलाते रहे
दिल गीली लकड़ी जलाते रहे लपक उट्ठी नहीं धुंआते रहे मुहब्बत की तो दिल से की, बोझ गमे बेवफाई उठाते रहे उनकी आखों की हया ऐसी नज़र मिलाई तो शर्माते रहे चाहा तो कई बार कि कह दूं हर बार हम ही घबराते रहे मुकेश इलाहाबादी ------------
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