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Wednesday, 25 February 2026

इंतज़ार करती औरत

 इंतज़ार करती औरत

शाम के झुटपुटे में

वह दरवाज़े की चौखट के पास

कुछ देर यूँ ही खड़ी रहती है

जैसे हवा से पूछ रही हो

कदमों की आहट का हाल।


चाय दो बार गरम हो चुकी है,

रोटी तवे से उतर कर

ढक दी गई है,

और दीवार पर लगी घड़ी

उसे हर मिनट

थोड़ा और समझदार बना रही है।


वह जानती है

इंतज़ार सिर्फ़ किसी के आने का नहीं होता,

कभी-कभी

अपने हिस्से की क़दर का भी होता है।


मोबाइल मेज़ पर रखा है,

स्क्रीन बार-बार नहीं देखती,

पर हर हल्की-सी आवाज़ पर

दिल ज़रूर चौंक जाता है।


वह बाहर से शांत है,

भीतर से हल्की-सी हलचल।

आँखों में शिकायत कम,

आदत ज़्यादा है।


दरवाज़ा अब भी बंद है।

रात थोड़ी और गहरी।


वह धीरे से कुंडी लगा देती है

जैसे उम्मीद को

आज के लिए

आराम दे रही हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,

झाड़ू बुहारती औरत

 झाड़ू बुहारती औरत


सुबह की हल्की ठंड में

वो आँगन में झाड़ू लगाती है।

धूल की महीन परत

रात भर चुपचाप जमी थी

जैसे कुछ अनकही बातें

दिल पर उतर आती हैं।


उसके हाथ

आदत से चलते हैं।

झाड़ू की सरसराहट

एक सीधी, थकी हुई लय

जिसमें न शिकायत है

न उतावलापन।


वो कोनों में जमी गंदगी

बड़ी सफ़ाई से खींच लाती है,

दरवाज़े के पास ढेर बना देती है

जैसे हर बिखराव को

काबू में करना

उसकी फितरत हो।


उसे मालूम है

धूल रोज़ लौटेगी।

फिर भी

वो हर सुबह

उसी समर्पण से

उसे बाहर कर आती है।


मगर एक चीज़ है

जो हर रोज़ लौटती है

और ढेर बनाकर

दरवाज़े से बाहर नहीं जाती।


वो है

उसके भीतर की थकान,

अनसुनी आवाज़ें,

अधूरे सपनों की किरचें।


उन्हें वो

झाड़ू से नहीं समेट पाती।


झुकते-झुकते

उसकी कमर में

सिर्फ़ उम्र नहीं,

कुछ चुप रह जाने की आदत भी भर गई है।


कभी वो सोचती है

क्या दुःख भी धूल होते

तो कितना आसान होता—

एक किनारे इकट्ठा करती,

कूड़ेदान में डाल आती,

और आँगन की तरह

दिल भी चमक उठता।


पर दुःख

कोनों में नहीं जमते

वो साँसों में बसते हैं।


आँगन साफ़ हो जाता है।

फर्श पर पानी का छिड़काव,

हल्की-सी ठंडक,

संतोष की एक रेखा।


वो सीधी होकर

चारों ओर देखती है

सब कुछ व्यवस्थित।


बस एक जगह

अब भी धूल बाकी है

उसके भीतर।


और वहाँ

वो हर सुबह

झाड़ू नहीं लगा पाती।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

एक तनहा स्त्री और मोबाइल सर्फिंग

 एक तनहा स्त्री और मोबाइल सर्फिंग


रात के साढ़े ग्यारह बजे

जब पड़ोस की आख़िरी बत्ती बुझती है

और रसोई में रखा बर्तन भी

ठंडा हो चुका होता है,

वो अपने बिस्तर के सहारे

मोबाइल खोलती है।


दिन भर की सधी हुई आवाज़,

नपे-तुले जवाब,

घर–दफ़्तर के बीच झूलती समझदारी

सब उतार कर

वो उँगलियों को

स्क्रीन पर रख देती है।


सबसे पहले

ख़बरों पर नज़र

दुनिया में क्या टूटा,

कहाँ क्या महँगा हुआ,

किसने किसे क्या कहा।

जैसे उसकी अपनी बेचैनी

वैश्विक हो।


फिर रील्स शुरू होती हैं

तीस सेकंड की हँसी,

किसी का ट्रेंडिंग डांस,

किसी की “मॉर्निंग रूटीन”

जिसमें सब कुछ चमकता हुआ।


वो मुस्कुरा कर

स्क्रॉल कर देती है।


फिर कुछ मोटिवेशनल वीडियो

“खुद से प्यार करो”,

“किसी के इंतज़ार में मत रहो”,

“स्ट्रॉन्ग वुमन बनो”—

वो आधा सुनती है,

आधा महसूस करती है,

और आधा अपने अंदर

रख लेती है।


कभी कुकिंग रील्स—

नई रेसिपी,

सजावटी थाली,

मीठी आवाज़ में समझाती कोई औरत—

वो सोचती है,

“मैं भी बना सकती हूँ…”

फिर याद आता है

खाने वाले कितने हैं।


कभी शायरी वाली रील—

धीमी आवाज़ में

“तन्हाई”, “इंतज़ार”, “आदत” जैसे शब्द

वो एक पल को ठहरती है,

जैसे किसी ने

उसका हाल चुरा लिया हो।


फेसबुक पर

वो पुरानी सहेलियों की पोस्ट पढ़ती है

बच्चों की तस्वीरें,

परिवार की छुट्टियाँ,

सजावट से भरी सालगिरहें।

वो दिल का इमोजी भेज देती है,

और अपने दिल को

समझा देती है।


कभी वो

महिला समूहों की पोस्ट पढ़ती है—

रिश्तों की उलझनें,

पति की बेरुख़ी,

स्वाभिमान की बातें

वो चुपचाप पढ़ती है,

जैसे कोई आईना हो

जिसमें अपना चेहरा दिखता हो।


कभी पुरानी चैट तक जाती है

जहाँ बातें लंबी थीं

और रात छोटी।

अब जवाब छोटे हैं

और रात लंबी।


उसकी उँगलियाँ

एक नाम पर रुकती हैं,

फिर आगे बढ़ जाती हैं

जैसे आत्मसम्मान

इच्छा से थोड़ा भारी हो।


मोबाइल की बैटरी

धीरे-धीरे कम होती है,

रील्स बदलती रहती हैं,

चेहरे बदलते रहते हैं

पर उसकी तनहाई

वही रहती है।


आख़िर में

वो स्क्रीन बंद करती है।

कमरा अँधेरा हो जाता है।

नीली रोशनी बुझ जाती है

मगर भीतर की

हल्की-सी चमक

अब भी जागती रहती है।


वो करवट बदलती है

खाली जगह की तरफ़।


और सोचती है

कल शायद

मैं कम स्क्रॉल करूँगी,

और ज़रा-सा

खुद को ज़्यादा पढ़ूँगी।


मुकेश ,,,,,,,,

मुझे मालूम है…

 मुझे मालूम है…


मुझे मालूम है

तुम मोबाइल में क्या–क्या देखती हो

और क्या स्क्रॉल करके

आगे बढ़ जाती हो।


तुम हर तस्वीर पर नहीं ठहरती—

बस उन चेहरों पर

जहाँ कभी तुम्हारा नाम

हल्के से चमका था।


तुम हर शेर को नहीं पढ़ती—

सिर्फ़ वो अल्फ़ाज़

जो तुम्हारी रातों की तरह

थोड़े अधूरे,

थोड़े बेचैन होते हैं।


मुझे मालूम है

तुम किस पोस्ट पर मुस्कुरा देती हो

और किसे बिना प्रतिक्रिया

चुपचाप गुज़र जाने देती हो—

जैसे कुछ लोग ज़िन्दगी में

आए भी थे

और तुमने जताया भी नहीं।


तुम “online” सबको देखती हो

पर खुद को “available” नहीं करती,

तुम्हारी उँगलियाँ

कई बार किसी नाम तक जाती हैं

फिर लौट आती हैं—

जैसे दरवाज़े तक पहुँच कर

इज़्ज़त से वापस मुड़ जाना।


तुम स्टेटस पढ़ती हो—

खुशियों के, यात्राओं के,

नई मोहब्बतों के—

और तुम्हारे भीतर

एक पुरानी शाम

हल्का-सा करवट लेती है।


तुम जानती हो

हर चमकती तस्वीर

रोशनी नहीं होती,

कुछ बस फ़िल्टर होते हैं—

और तुम फ़िल्टरों से

सच पहचानना सीख चुकी हो।


मुझे ये भी मालूम है

तुम देर रात

पुरानी चैट ऊपर तक स्क्रॉल करती हो—

जहाँ “ख़याल रखना”

अब भी पड़ा है

बिना किसी जवाब के।


फिर तुम स्क्रीन लॉक कर देती हो,

जैसे दिल पर ताला लगा हो—

आवाज़ें आती रहें,

पर अंदर कोई हलचल न हो।


मगर सुनो,

तुम सिर्फ़ देखने वाली नहीं हो—

तुम्हारे भीतर भी

एक पूरी कहानी है

जिसे तुम अभी

पोस्ट नहीं करती।


और एक दिन

जब तुम स्क्रॉल करना छोड़ कर

अपने हिस्से की रोशनी चुनोगी,

तो मोबाइल की स्क्रीन नहीं,

तुम्हारी आँखें चमकेंगी—

बिना किसी नोटिफ़िकेशन के।


मुकेश ,,,,,,,,,,

तुम, तनहाई, तुम्हारा बिस्तर और मोबाइल

 तुम, तनहाई, तुम्हारा बिस्तर और मोबाइल

रात के आख़िरी पहर में

जब दीवारों पर टंगी घड़ी

अपनी ही धड़कन सुनती है,

तुम अपने बिस्तर के कोने पर सिमटी होती हो

जैसे कोई सवाल

अपने ही जवाब से डर रहा हो।


तकिये की सिलवटों में

दिन भर की थकान पड़ी रहती है,

और चादर पर

तुम्हारी उंगलियों के हल्के-हल्के निशान

जैसे किसी ने ख़ामोशी से

किसी का नाम लिखा हो

और फिर खुद ही मिटा दिया हो।


मोबाइल की नीली रौशनी

तुम्हारे चेहरे पर गिरती है,

एक ठंडी चाँदनी की तरह—

बिना मौसम, बिना आसमान।

वो रौशनी

तुम्हारी आँखों में उतर कर

पुराने चैट, अधूरी बातें,

और “last seen” का सूखा सा सच

फिर से जगा देती है।


तुम उँगलियों से

स्क्रीन पर रिश्तों को स्क्रॉल करती हो—

कुछ हँसते हुए इमोजी,

कुछ आधे-अधूरे वादे,

कुछ तस्वीरें

जिनमें मुस्कुराहटें पूरी थीं

मगर इरादे आधे।


तनहाई

कोई शोर नहीं करती—

वो बस तुम्हारे पास बैठ जाती है,

तुम्हारे बालों में हाथ फेरती है

और कहती है—

“देखो, सब यहीं है,

बस वो नहीं है

जिसके लिए तुम जाग रही हो।”


बिस्तर तुम्हारा हमराज़ है,

वो जानता है

किस करवट पर आह निकलती है,

किस करवट पर आँख भर आती है।

मोबाइल तुम्हारा आईना है

वो दिखाता है

कि कितने लोग “online” हैं

और कितनी दूरियाँ “active”।


तुम एक मैसेज लिखती हो—

“कैसे हो?”

फिर उसे मिटा देती हो।

जैसे दिल ने दरवाज़ा खोला हो

और अक़्ल ने चुपके से

कुंडी चढ़ा दी हो।


रात बढ़ती जाती है,

बैटरी गिरती जाती है,

और तुम्हारी उम्मीद

चार्जर ढूँढती रहती है।


आख़िरकार

तुम मोबाइल को सीने पर रख

आँखें बंद कर लेती हो

जैसे किसी का हाथ हो

जो अब सिर्फ़

वज़न भर रह गया है।


और तनहाई

वो मुस्कुरा कर

तुम्हारे पास लेट जाती है,

बिलकुल बराबर में,

जहाँ कभी

कोई और हुआ करता था।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

रात, रजनीगंधा और तुम

 रात, रजनीगंधा और तुम


रात ने धीरे से

अपने काले आँचल को खोला,

और आँगन में

रजनीगंधा की गंध उतर आई।


हवा में कुछ था

मंद, मीठा, अनकहा;

जैसे तुम्हारा नाम

किसी ने बहुत धीरे से पुकारा हो।


रजनीगंधा की कलियाँ

अँधेरे में ही खिलती हैं,

ठीक वैसे ही

जैसे तुम्हारी मुस्कान

मेरी खामोशियों में।


मैंने उस सुगंध को छुआ

वह स्पर्श नहीं थी,

पर स्मृति थी;

तुम्हारे कंधे पर टिके

एक पुराने पल की तरह।


रात लंबी थी,

पर बोझिल नहीं

उसमें तुम्हारी आहट थी,

और फूलों की उजली साँसें।


चाँद दूर खड़ा

सब देखता रहा,

पर उसने भी स्वीकारा

कि इस समय

रात से अधिक उजली

रजनीगंधा थी,

और रजनीगंधा से अधिक

तुम।


सुबह होगी तो

गंध हल्की पड़ जाएगी,

पर यह रात

मेरी हथेली में

सुगंध बनकर ठहर जाएगी

रात, रजनीगंधा

और तुम।


मुकेश ,,,,,,,,,,

दीवार से लगी सिसकियाँ

दीवार से लगी सिसकियाँ

आज फिर देर तक जागती रहीं,

जैसे ईंटों के भीतर

किसी ने अपना दिल चुनवा दिया हो।


चूने की परतों के पीछे

कुछ नम शब्द हैं,

जो हर रात भीगते हैं

और सुबह सूखने का अभिनय करते हैं।


मैंने कान लगाकर सुना

कोई नाम बार-बार टकराता था,

फिर टूटकर

सफ़ेद धूल में बदल जाता था।


यह घर पुराना नहीं,

बस यादें ज़्यादा हैं इसमें;

हर कोना एक अधूरी बात

धीरे-धीरे दोहराता है।


दीवारें बोलती नहीं,

पर उनके सहारे

कितने कंधे रो चुके हैं

किसी की जुदाई,

किसी का अपमान,

किसी का अनकहा प्रेम।


सिसकियाँ पूछती हैं

क्या दर्द भी विरासत होता है?

जो एक पीढ़ी से

दूसरी की हथेली तक

चुपचाप चला आता है।


रात गहराती है,

पर दीवार से लगी सिसकियाँ

थकती नहीं

वे जानती हैं

कि आँसू सूख भी जाएँ,

नमी देर तक रहती है।


और शायद

उसी नमी में

कोई नया सपना

चुपचाप अंकुरित होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

छिन्नमस्ता : रक्त की धारा में छिपा प्रकाश

 छिन्नमस्ता : रक्त की धारा में छिपा प्रकाश

वह खड़ी है श्मशान-संध्या में

वज्र-सी नग्न,

पर भय नहीं,

एक प्रखर शून्य की दीप्ति।


स्वयं का ही शीश

स्वयं के करों में—

यह आत्म-विनाश नहीं,

अहं-विच्छेद का महामंत्र है।


कंठ से फूटती तीन रक्त-धाराएँ

एक स्वयं के मुख में,

दो शिष्या-शक्ति के अधरों पर

प्राण का परिपूर्ण परिभ्रमण।


यहाँ मृत्यु पोषण है,

वियोग ही संयोग का मूल।

रक्त—काम नहीं केवल,

चेतना का अग्नि-तत्व है।


वह रति और काम के युग्म पर आरूढ़

संदेश स्पष्ट

ऊर्जा को दबाओ मत,

उसे रूपांतरित करो।


छिन्नमस्ता कहती है—

सृष्टि की जड़ काम है,

पर मोक्ष का द्वार

उसी ऊर्जा का रूपांतरण।


शीश-विच्छेद का रहस्य—

मस्तिष्क की सीमाओं से परे जाना,

तर्क के पार,

सीधे अनुभव की बिजली में प्रवेश।


तंत्र की भाषा में—

कुण्डलिनी का आकस्मिक उत्कर्ष,

सहस्रार में रक्त-रश्मि का विस्फोट।


वह भयानक नहीं,

अत्यंत करुणामयी है

जो स्वयं को अर्पित कर

जगत को पोषित करती है।


उसकी मुस्कान में

संहार नहीं,

एक शोध-दीप जलता है

कि जीवन और मृत्यु

दो नहीं हैं।


छिन्नमस्ता—

जहाँ भय ज्ञान में गलता है,

और रक्त की प्रत्येक बूँद

बोध का अक्षर बन जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

भीष्म - प्रतिज्ञा और परिणाम

 भीष्म - प्रतिज्ञा और परिणाम

प्रथम सर्ग : गंगासुत का उदय ;-

गंगा की गोद में जन्मा तेजोमय बालक ।

नेत्रों में नील गगन, वाणी में दृढ़ता गहरी ।

शस्त्रों की रेखाओं में खेली उसकी तरुणाई ।

देवव्रत नाम, कुलदीपक उज्ज्वल ज्योतिर्मय ॥


पिता के चरणों पर अर्पित जीवन सारा ।

स्वार्थों से दूर खड़ा, संकल्पों का धारी ।

हस्तिनपुर-भवनों में चलता हुआ भवितव्य ।

छाया-सा साथ लिए अनकहा व्रत भीषण ॥


द्वितीय सर्ग : भीषण प्रतिज्ञा :-


सभा हुई स्तब्ध, दिशाएँ हुईं निःशब्द ।

राजा के नेत्रों में दग्ध अभिलाषा जागी ।

सत्यवती-शर्तें उठीं सिंहासन से ऊँची ।

क्षण भर को थमा हुआ समय स्वयं ठहरा ॥


“राज्य त्यजूँगा मैं”—वज्र-स्वर गूँजा ।

“ब्रह्मचर्य-व्रत भी जीवन भर धारण करूँगा ।

न होगी मेरी संतान सिंहासन-अधिकारिणी”

काँपी धरा, गगन से उच्चरित—“भीष्म” ॥


उस दिन हुआ अमर वह त्याग-व्रत-धारी ।

पर अंतर्मन में कुछ मौन हुआ, बुझ-सा ।

प्रतिज्ञा ने दी ऊँचाई आकाश-सी असीम ।

पर बीज परिणामों का चुपचाप बोया ॥


तृतीय सर्ग : व्रत का विस्तार :-


राजा बदले, बदली राजसभा की ध्वनियाँ ।

पर अचल खड़े थे वे वंश-ध्वज समान ।

द्यूत-सभा में जब धर्म हुआ अपमानित ।

मौन रहे भीष्म, व्रत-बंधन में बँधे ॥


देखा अन्याय, हृदय हुआ शूल-विद्ध ।

राजधर्म, कुलधर्म, प्रतिज्ञा—त्रिशूल बने ।

दीपक-सी काँपी भीतर की करुणा ।

पर लौह-व्रत ने रोका निर्णायक हस्त ॥


उस दिन समझा मन—धर्म सरल न होता ।

प्रतिज्ञा कभी बन जाती स्वयं कारागार ।

ऊँचाई का मूल्य गहराई में मिलता ।

मौन का बोझ हुआ प्राणों पर भारी ॥


चतुर्थ सर्ग : रण और विवशता :-

शंखनिनादों से काँपा कुरुक्षेत्र ।

ध्वजा उठाए खड़े वज्र-सम वृद्ध ।

सामने शिष्य, अर्जुन धन्वा ताने ।

स्मृतियों से भीगा कठोर हृदय ॥


दस दिवसों तक अजेय रहे रण में ।

धनुष-प्रहारों में अग्नि-सी ज्वाला ।

शिखंडी आया—अतीत खड़ा था ।

शस्त्र झुका, स्वीकृत हुई विधि ॥


बाणों की वर्षा से देह विदीर्ण ।

पर मुख पर धैर्य, दृष्टि अचल ।

गिरे नहीं भूमि पर—शरशय्या पर ठहरे ।

वीरता संग विवशता भी उजागर ॥


पंचम सर्ग : शरशय्या और बोध :-

बाणों की शय्या तपोभूमि बन गई ।

सूर्य-दक्षिणायन में मृत्यु प्रतीक्षारत ।

धर्म-प्रश्नों का उत्तर देते हुए शांत ।

स्वर हुआ निर्मल, जैसे गंगाजल ॥


“धर्म प्रवाही है, शिला नहीं स्थिर ।

व्रत महान, पर फल जटिल गूढ़ ।

ऊँचाई मिलती संकल्प से मानव को ।

पर परिणाम देते गहराई सच्ची ।”


उत्तरायण में जब सूर्य उदित हुआ ।

मुक्त श्वास लेकर त्यागा तन ।

इतिहास ने देखा—केवल योद्धा नहीं ।

एक जटिल, जाग्रत मनुष्य गया ॥


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

Tuesday, 24 February 2026

भोग से बोध तक

 भोग से बोध तक

भोग में डूबा तो लगा

सब पा लिया,

हाथों में दुनिया थी

और दिल में शोर।


रस था, रंग था,

सांसों की सरहद तक फैला हुआ अहसास,

पर हर लज़्ज़त के बाद

एक खालीपन चुपचाप बैठ जाता।


फिर एक दिन

थक गए चाहत के क़दम,

इच्छाओं ने स्वयं ही

मौन ओढ़ लिया।


उसी ख़ामोशी में

बोध ने दस्तक दी—

न कोई शोर,

न कोई दावा।


समझ आया

जो खोज बाहर थी

वो भीतर ही ठहरी थी,

और जो भोग में बिखरा

वही बोध में सिमट गया।


अब न पाने की हड़बड़ी है,

न खोने का डर—

बस एक सादा-सी रोशनी है

जो स्वयं में

पूर्ण है।


मुकेश ,,,,,,,,,

वो अधूरी रात

 वो अधूरी रात


वो रात पूरी तो थी,

पर महसूस अधूरी होती रही।


खिड़की से झाँकता चाँद

जैसे कुछ कहना चाहता हो,

और कमरे की ख़ामोशी

हर शब्द से पहले थम जाती हो।


चाय ठंडी हो गई थी,

घड़ी चल रही थी,

पर समय कहीं रुक-सा गया था।

मोबाइल की स्क्रीन पर

उसका नाम नहीं चमका,

बस एक खाली इंतज़ार टिमटिमाता रहा।


उसने खिड़की बंद की,

दीया बुझाया,

और तकिये के नीचे

अपने सवाल रख दिए।


सुबह हुई—

रात बीत गई,

पर जो कहना था

वो कहा नहीं गया।


इसलिए

वो रात पूरी होकर भी

हमेशा

अधूरी रह गई।


मुकेश ,,,,

मैं, धड़कन और रात का संगीत

 मैं, धड़कन और रात का संगीत


मैं बैठा हूँ चुपचाप,

रात की खामोशी में डूबा हुआ।

मेरी धड़कनें मेरे भीतर संगीत बजाती हैं,

और हर धड़कन में तेरे नाम की गूँज है।


रात की हवा धीरे-धीरे छूती है मेरी त्वचा को,

जैसे तुम्हारी हल्की छुअन हो।

सन्नाटा भी अब एक सुर बन गया है,

तेरी यादों से गूंजते हुए,

हर पल मेरे दिल में एक राग रचता है।


मैंने अपनी आँखों में तेरे ख्वाब सजाए हैं,

हर मुस्कान, हर आहट, हर चुप्पी

मेरे दिल की लय में धड़कती है।

रात का संगीत, मेरी धड़कन और मैं—

तीनों मिलकर

तेरे बिना भी तेरी मौजूदगी का एहसास देते हैं।


मैं सुनता हूँ बारिश की बूँदों की सिम्फनी,

पत्तों की सरसराहट की मिठास,

और अपने भीतर के संगीत को महसूस करता हूँ,

जो सिर्फ तुम्हारे होने से जीवित है।


मैं, धड़कन और रात का संगीत

तीनों मिलकर मेरे अकेलेपन को सजाते हैं,

और मुझे यह सिखाते हैं कि

प्यार सिर्फ बोलने का नहीं,

महसूस करने और जीने का नाम है।


मुकेश ,,,,,,,,,

मैं, एहसास और पुरानी गलियाँ

 मैं, एहसास और पुरानी गलियाँ


मैं चलता हूँ उन गलियों में,

जहाँ हमारी हँसी अभी भी हवा में गूँजती है।

पुरानी ईंटें, टूटी दीवारें,

हर मोड़ एक याद बनकर खड़ी है।

और मैं… मैं अपने एहसासों के साथ

उन स्मृतियों को सहलाता हूँ।


हर मोड़ पर तेरी परछाई मिलती है,

हर खिड़की में तेरी मुस्कान झलकती है।

मैं अपने कदमों की खामोशी सुनता हूँ,

और महसूस करता हूँ —

तुम हमेशा मेरे साथ थी,

और अब भी हो,

सिर्फ एहसासों के रूप में।


पुरानी गलियाँ मुझे हमारी कहानियाँ सुनाती हैं,

अनकहे शब्दों, अधूरी बातों और चुप्पियों के गीत।

मैं उन गीतों को अपने दिल में सजाता हूँ,

और हर साँस में तुम्हें महसूस करता हूँ।


मैं, एहसास और पुरानी गलियाँ 

तीनों मिलकर एक रूहानी संगीत बनाते हैं,

जहाँ सिर्फ यादें नहीं,

प्यार का हर एहसास जीवित है।


और जब रात आती है,

मैं उन गलियों में खड़ा रह जाता हूँ,

चाँदनी में तेरी मुस्कान तलाशते हुए,

यह जानते हुए कि

पुरानी गलियाँ भी हमें फिर से जोड़ सकती हैं,

सिर्फ एहसासों के जरिये।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

मैं, दिल के कागज़ और कलम

 मैं, दिल के कागज़ और कलम


मैं बैठा हूँ,

दिल के कागज़ को खोले हुए,

और कलम मेरे हाथ में

जैसे कोई साथी,

जो मेरी हर धड़कन को शब्दों में बदल दे।


हर शब्द तेरे नाम का गीत है,

हर लकीर तेरी याद की परछाई।

मैं लिखता हूँ अधूरी बातें,

जिन्हें हमने कभी कह नहीं पाया,

और हर शब्द में तेरी मुस्कान झलकती है।


कभी ये कागज़ मेरे आँसुओं से भीग जाता है,

कभी कलम रुक जाती है,

लेकिन मैं थकता नहीं।

क्योंकि हर चोट, हर ख्वाब, हर खामोशी

मुझे तेरे करीब लाती है,

और मेरे शब्दों को रूहानी बना देती है।


मैं, दिल के कागज़ और कलम 

तीनों मिलकर मेरी तन्हाई में

एक संगीत रचते हैं,

जहाँ अधूरी बातें भी

एक खूबसूरत, रूहानी कविता बन जाती हैं।


और जब मैं थककर पलटता हूँ,

देखता हूँ कागज़ पर

तेरे और मेरे ख्वाबों की कहानी,

तो मुस्कुराता हूँ 

क्योंकि हर शब्द, हर पन्ना, हर लकीर

मुझे यह सिखाती है:

प्यार सिर्फ महसूस करने का नहीं,

लिखने और जीने का भी नाम है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

मैं, उम्मीद और सुबह की रौशनी

 मैं, उम्मीद और सुबह की रौशनी


मैं बैठा हूँ उस खिड़की के पास,

जहाँ पहली किरणें धीरे-धीरे छूती हैं ज़मीन को।

उम्मीद मेरे दिल में जागती है,

जैसे सुबह अपने हाथों में प्यार की रौशनी लिए आती हो।


हर नई सुबह एक नई कहानी कहती है,

हर किरण एक नर्म एहसास जगाती है।

मैं अपनी आँखों में तेरी झलक खोजता हूँ,

और पाता हूँ कि तुम वहाँ नहीं हो,

लेकिन तुम्हारा असर हर रोशनी में है।


उम्मीद मेरे भीतर फूलों की तरह खिलती है,

और मैं मुस्कुराता हूँ

क्योंकि जानता हूँ,

हर अंधेरी रात के बाद

रौशनी हमें जोड़ती है,

और अधूरी ख्वाहिशें भी पूरा होने लगती हैं।


मैं, उम्मीद और सुबह की रौशनी 

तीनों मिलकर एक रूहानी संगीत बनाते हैं,

जहाँ सिर्फ प्यार, विश्वास और नए सपनों की सरगम होती है।

और मैं खड़ा हूँ,

तैयार हर नए सूरज का स्वागत करने को,

ताकि तेरी यादों की रौशनी

मेरे हर दिन को रोशन कर सके।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

मैं, तेरी परछाई और मौसम

मैं, तेरी परछाई और मौसम

मैं खड़ा हूँ उस किनारे पर,

जहाँ मौसम अपने रंग बदल रहा है।

तेरी परछाई मेरे कदमों के साथ चलती है,

हर हवा में तेरे होने का अहसास लाती है।


बारिश की बूंदें मेरे चेहरे पर गिरती हैं,

पर मैं भीगता नहीं,

क्योंकि तेरी परछाई

मुझे अपने अंदर की गर्मी देती है।

हर पतझड़ की पत्तियों में

तेरी मुस्कान की झलक है,

और हर ठंडी हवा

तेरे खामोश फुसफुसाहट की गूँज है।


मैं और मौसम

तेरी यादों को सजाते हैं,

जैसे कोई चित्रकार अपने रंगों से

अदृश्य चित्र बनाता है।

और मैं,

तेरी परछाई के साथ

हर मौसम की कहानी सुनता हूँ,

हर बदलाव में तेरे एहसास को पाता हूँ।


तुम दूर हो,

लेकिन तुम्हारी परछाई मुझे बता देती है

कि दूरियाँ भी कभी प्यार के गीत गा सकती हैं।

मैं, तेरी परछाई और मौसम 

तीनों मिलकर एक रूहानी नज़्म बनाते हैं,

जहाँ सिर्फ यादें, एहसास और प्रेम का संगीत होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

मैं, तन्हाई और तारे

 मैं, तन्हाई और तारे


मैं बैठा हूँ रात की खामोशी में,

जहाँ तन्हाई मेरे चारों ओर बिखरी है।

तारों की रोशनी छुपती है बादलों में,

और मैं उनके बीच तेरी याद खोजता हूँ।


तन्हाई मेरी सहेली बन गई है,

हर साँस में तेरे बिना की दूरी का अहसास लाती है।

मैं अपने हाथ फैलाता हूँ,

जैसे तारों को छू सकूँ,

और उन्हें अपने दिल के करीब ला सकूँ।


हर तारा एक ख्वाब है,

जो मैंने तेरे लिए सजाया था।

अब वे ख्वाब अकेले चमकते हैं,

और मैं,

उन्हें देखकर मुस्कुराता हूँ और रोता हूँ

एक ही समय में,

तेरे बिना भी, तेरे साथ भी।


तन्हाई और तारे मेरे गीत गाते हैं,

सन्नाटे में उनका संगीत बसा है।

मैं सुनता हूँ,

और खुद को पाता हूँ उस जगह पर,

जहाँ सिर्फ हमारी यादें रहती हैं,

और सिर्फ हमारा प्यार फुसफुसाता है।


मैं, तन्हाई और तारे 

तीनों एक ही रूहानी दुनिया में मिल जाते हैं,

जहाँ रात भी हमारी हँसी सुनती है,

और चाँद हमारी खामोशी को प्यार करता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

मैं, ख्वाब और टूटे पन्ने

 मैं, ख्वाब और टूटे पन्ने


मैं बैठा हूँ पुराने अलमारी के पास,

जहाँ तेरे और मेरे ख्वाब

टूटे पन्नों में दबे हुए हैं।

हर पन्ना एक कहानी कहता है,

हर दरार एक अधूरी हँसी याद दिलाती है।


ख्वाब मेरे हाथों से फिसलते हैं,

जैसे बारिश की बूंदें

किसी सूखी मिट्टी में खो जाती हैं।

मैंने उन्हें सजाया था,

तेरे और मेरे कल के रंगों से,

लेकिन वक्त ने उन्हें तोड़ दिया,

और सिर्फ यादें रह गईं,

गम और मुस्कान के बीच उलझी हुई।


मैं, अपने अकेलेपन में बैठा,

उन टूटे पन्नों से बातें करता हूँ।

हर शब्द, हर चित्र,

मुझे तेरे पास ले जाता है,

लेकिन तुम वहाँ नहीं हो।

सिर्फ ख्वाब हैं,

और मैं,

जो उन्हें हर बार जिंदा करने की कोशिश करता हूँ।


लेकिन फिर भी,

मैं मुस्कुराता हूँ 

क्योंकि टूटे पन्ने भी कहते हैं,

“हमने साथ बिताए पल संजोए हैं।”

और ख्वाब, चाहे अधूरे हों,

मुझे यह सिखाते हैं कि

प्यार सिर्फ हकीकत में नहीं,

यादों और उम्मीदों में भी जीता है।


मैं, ख्वाब और टूटे पन्ने 

तीनों मिलकर मेरी तन्हाई में

एक रूहानी संगीत बना देते हैं,

जहाँ सिर्फ एहसास और प्यार बचे रहते हैं।


मुकेश ,,,,,

मैं, ख्वाब और टूटे पन्ने

 मैं, ख्वाब और टूटे पन्ने


मैं बैठा हूँ पुराने अलमारी के पास,

जहाँ तेरे और मेरे ख्वाब

टूटे पन्नों में दबे हुए हैं।

हर पन्ना एक कहानी कहता है,

हर दरार एक अधूरी हँसी याद दिलाती है।


ख्वाब मेरे हाथों से फिसलते हैं,

जैसे बारिश की बूंदें

किसी सूखी मिट्टी में खो जाती हैं।

मैंने उन्हें सजाया था,

तेरे और मेरे कल के रंगों से,

लेकिन वक्त ने उन्हें तोड़ दिया,

और सिर्फ यादें रह गईं,

गम और मुस्कान के बीच उलझी हुई।


मैं, अपने अकेलेपन में बैठा,

उन टूटे पन्नों से बातें करता हूँ।

हर शब्द, हर चित्र,

मुझे तेरे पास ले जाता है,

लेकिन तुम वहाँ नहीं हो।

सिर्फ ख्वाब हैं,

और मैं,

जो उन्हें हर बार जिंदा करने की कोशिश करता हूँ।


लेकिन फिर भी,

मैं मुस्कुराता हूँ 

क्योंकि टूटे पन्ने भी कहते हैं,

“हमने साथ बिताए पल संजोए हैं।”

और ख्वाब, चाहे अधूरे हों,

मुझे यह सिखाते हैं कि

प्यार सिर्फ हकीकत में नहीं,

यादों और उम्मीदों में भी जीता है।


मैं, ख्वाब और टूटे पन्ने 

तीनों मिलकर मेरी तन्हाई में

एक रूहानी संगीत बना देते हैं,

जहाँ सिर्फ एहसास और प्यार बचे रहते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

मैं, जुदाई और सन्नाटा

 मैं, जुदाई और सन्नाटा

मैं बैठा हूँ उस कमरे में,

जहाँ हर कोना तेरी कमी की गवाही देता है।

सन्नाटा मेरे चारों ओर बिखरा है,

जैसे कोई पुराने गीत को भूल गया हो।


जुदाई की हवा हर खिड़की से टकराती है,

और मेरे दिल की खामोशी में

तेरे नाम की गूँज उठती है।

हर धड़कन पूछती है 

क्यों हम अलग हुए,

और क्यों हमारी कहानी अधूरी रह गई।


मैंने तेरे चेहरे को अपनी यादों में उतारा है,

हर मुस्कान, हर आहट, हर ख्वाब।

लेकिन अब वो सब

सिर्फ सन्नाटे के बीच बोलते हैं,

और मैं सुनता हूँ,

बस सुनता हूँ,

बिना शब्दों के, बिना जवाब के।


जुदाई ने मेरी तन्हाई को सजाया है,

सन्नाटा मेरे गीतों में घुल गया है।

मैं अपने आँसुओं को रोकता हूँ,

पर हर छींटा तेरी याद की बारिश बन जाता है,

और मुझे भीगने को मजबूर कर देता है।


फिर भी, मैं बैठा हूँ,

इस सन्नाटे और जुदाई के संग,

क्योंकि मैं जानता हूँ 

हर दर्द, हर खाली पल

मुझे तेरे करीब लाता है,

रूह की उस गहराई में,

जहाँ सिर्फ हम हैं,

और सिर्फ हमारी अधूरी बातें।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

मैं, तेरा नाम और चाँदनी

 मैं, तेरा नाम और चाँदनी

मैं बैठा हूँ चुपचाप

उस बेंच पर, जहाँ चाँदनी जमीन को छू रही है।

हवा में तेरे नाम की खुशबू है,

और हर झोंके में तेरी हँसी गूँजती है।


चाँदनी जैसे किसी जादूगर की रौशनी,

तेरे चेहरे को मेरे ख्वाबों में सजाती है।

मैं अपने दिल की हर धड़कन में

तेरा नाम लिखता हूँ,

और हर बार उसे फुसफुसाता हूँ

जैसे कोई सागर अपनी लहरों से तट को पुकारे।


तेरे बिना ये रात अधूरी है,

लेकिन तेरे नाम से जगमगाती है।

चाँदनी मेरी खामोशी को सुनती है,

और मेरे अकेलेपन को सजाती है

सपनों के मोती से।


मैंने तेरा नाम पंखों पर लिखा है,

हवा उसे कहीं दूर तक ले जा रही है।

हर सितारा मेरे ख्यालों में झिलमिलाता है,

और मैं मुस्कुराता हूँ 

क्योंकि तेरी यादें

चाँदनी से भी ज्यादा नर्म और उजली हैं।


और जब चाँदनी धीरे-धीरे खत्म होती है,

मैं अपने आप को

तेरे नाम में खो देता हूँ।

मैं, तेरा नाम और चाँदनी 

तीनों एक ही रूहानी संगीत में मिल जाते हैं,

जहाँ बस प्यार और शांति का बसेरा होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

मैं, खामोशी और बरसात

मैं, खामोशी और बरसात


मैं खड़ा हूँ उस सड़क पर,

जहाँ बारिश की बूंदें मेरे चेहरे से बातें करती हैं।

खामोशी मेरे साथ चलती है,

जैसे कोई पुराना दोस्त,

जो बिना शब्दों के सब समझ ले।


बारिश की हर बूँद में

तेरी याद की खुशबू है,

हर गीली मिट्टी में

तेरे कदमों का असर है।

मैं सुनता हूँ उसका संगीत,

और खुद को खो देता हूँ

उस पानी में,

जहाँ सिर्फ हम और हमारी यादें हैं।


खामोशी बोलती है

वो बातें, जो हम कभी नहीं कह सके।

हर बूँद उसके शब्द बन जाती है,

और मेरे दिल में

एक पुराना गीत बज उठता है,

जिसे मैं हमेशा से ढूँढ रहा था।


मैं भीगता हूँ,

पर दर्द नहीं,

सिर्फ एक मधुर एहसास है,

जो मुझे तेरे पास ले जाता है।

बारिश और खामोशी

मेरे अंदर एक पुल बना देती हैं,

जो हमारी अधूरी कहानियों को जोड़ता है,

और मुझे तेरे करीब लाता है।


और जब ये बारिश थम जाती है,

मैं खड़ा रह जाता हूँ,

गीला, पर ताजगी से भरा।

खामोशी अब भी मेरे साथ है,

लेकिन अब मैं जानता हूँ 

बारिश ने मुझे सिखाया है

तेरे बिना भी जीना,

पर तेरी यादों के साथ।


मुकेश ,,,,,,,,,

मैं, यादें और अधूरी बातें

 मैं, यादें और अधूरी बातें


मैं बैठा हूँ खामोशियों के उस शहर में,

जहाँ तेरी हँसी अभी भी गूंजती है,

पर हवा में तेरे शब्द नहीं,

सिर्फ यादें हैं, बिखरी हुई,

जैसे रात की चाँदनी किसी टूटे हुए शीशे में चमकती हो।


मैंने तेरे नाम की ख्वाबों में सांस ली,

हर लम्हा, हर सिहरन, हर जज़्बात

तेरे बिना अधूरे रहे।

कभी कोई जमीं नहीं थी,

कभी कोई आसमान नहीं था,

सिर्फ वो गली थी,

जहाँ हम मिलते थे… और कभी लौटकर नहीं जाते।


यादें, वे धीरे-धीरे फूल बनकर खिलती हैं,

और कांटों में घुलकर दर्द दे जाती हैं।

मैंने उन्हें संभाला,

जैसे कोई साधक अपने तपस्वी ध्वनि को पकड़ता है,

लेकिन वे फिसलती रेत की तरह

हाथ से छूट जाती हैं।


और मैं…

मैं अब भी उन अधूरी बातों का पुल बना रहा हूँ,

जो हम कभी कह न सके।

हर साँस में तेरी कमी,

हर ख्वाब में तेरी झलक,

और हर सुबह में वही पुरानी तन्हाई।


लेकिन फिर भी,

मैं मुस्कुराता हूँ,

क्योंकि मैं जानता हूँ 

तेरी यादें मुझे जीने की वजह देती हैं,

और अधूरी बातें मुझे तेरे करीब रखती हैं,

रूह के उस कोने में,

जहाँ सिर्फ हम हैं,

और सिर्फ हमारे खामोश लम्हे हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

सन्नाटे की पगडंडी

 सन्नाटे की पगडंडी


सन्नाटे की पगडंडी पर

मैं अकेला चलता हूँ —

पाँव मिट्टी में धंसते हैं

जैसे बीते हुए कल की यादें

हर कदम के साथ गहरी होती जाएँ।


आसमान सुना है

और सितारे भी चुप हैं,

कोई तारा नहीं जल रहा

जो मुझे दिशा दिखाए,

सिर्फ़ मेरी साँसें

हवा में बिखरी हुई चीख़ हैं।


बीते हुए रिश्तों की खिड़कियाँ

अंदर की रोशनी बुझा चुकी हैं,

किसी ने दीवारों पर नोट्स छोड़े हैं

“हमेशा याद रखना” —

और मैं हर नोट पढ़कर

ख़ामोशी में मुस्कुराता हूँ।


समंदर की लहरें भी

अब मेरे कदमों से डरती हैं,

क्योंकि मैं उन पर नहीं चलता

मगर वे मुझे छूकर

अपने भीतर की तन्हाई दिखाती हैं।


कुछ लोग आते हैं,

कुछ आवाज़ों में घुल जाते हैं,

मगर मैं उनकी यादों में भी

अपना चेहरा खोजता हूँ।

क्योंकि अकेलेपन का असली स्वाद

सिर्फ़ उसी में है

जो खुद से भी डरता है।


रातें लंबी हैं

और चाँद मेरी आँखों में उतर आता है,

मैं उसके साथ नहीं,

उसके बिना जीता हूँ।

हर सांस में वही दर्द है

जो शब्दों में नहीं आता।


और मैं चलता रहता हूँ

सन्नाटे की पगडंडी पर,

जहाँ हर पत्थर

मेरी उम्मीद को रगड़ता है

और हर काँटा

मेरी यादों को झकझोरता है।


मगर मैं नहीं रुकता,

क्योंकि कभी-कभी

तन्हाई की गहराई में

मैं खुद को ढूँढ लेता हूँ

और यही मेरा घर है,

यही मेरा आसमान है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

मैं, मोहब्बत और एक तन्हा रात

 मैं, मोहब्बत और एक तन्हा रात


मैं हरी फसल नहीं था,

बस उस ज़मीन की तरह था

जिस पर किसी ने वक़्त ही नहीं दिया

बस उम्मीदें बोईं और छोड़ दिया...


मैं ख्वाब नहीं देखता था,

ख्वाब खुद मेरी आंखों में उतर आते थे

और तुम...

हर ख्वाब में वही थी

जैसे रौशनी में लिपटी एक छलावा 

साया भी तेरा, धोखा भी।


जब सड़कें पार करता था

तू ज़िंदगी की मीठी बातें करती थी

मैं तुझे सुनता था

तेरी आँखों में कोई घर ढूंढता था

तू आगे देखती थी

मैं सिर्फ़ तुझे देखता रहा।


उम्र के इस तीसरे पड़ाव में आकर

ना कोई दरवाज़ा खुला मिलता है

ना कोई आवाज़ पुकारती है नाम लेकर,

अब सब कुछ शोर सा लगता है 

भीतर का, बाहर का,

एक बेहिसाब तन्हाई का कोलाहल।


तू मुझे चादर ओढ़ा कर

किसी और ख्वाब में चली गई

और मैं?

मैं उसी चादर को आँखों तक खींचे

तेरी गैरमौजूदगी की ठंड से काँपता रहा।


अब मुझे अंधेरे से डर नहीं लगता

अब तो रौशनी से डर लगता है

कहीं फिर तू ना दिख जाए

एक और मुस्कान के पीछे छुपी बेवफाई बनकर।


अब मोहब्बत नहीं करता

किसी से भी नहीं

क्योंकि अब भरोसा नहीं

किसी आवाज़ पर, किसी हाथ पर

किसी कसम पर...


मैं अब मिट्टी भी नहीं

मैं अब राख हूँ

जिसमें कोई फूल नहीं उगता

बस कुछ जले हुए लफ़्ज़

जो हर रात तेरे नाम से जलते हैं...


मुकेश ,,,,,,,,,,

बिट्टो की डायरी

 “बिट्टो की डायरी ”

(इस हिस्से में दर्द गहरा है, और बिट्टो की आँखें कुछ ज़्यादा सच देखती हैं।)

1 - आज फिर वही नज़रें

आज एक घर में

काम करते वक़्त

मुँह ज़रा ऊपर किया

तो वो आदमी

ऐसे देख रहा था

जैसे मैं इंसान नहीं,

कोई चीज़ हूँ।

मैंने झट से नजरें झुका लीं—

पर दिल देर तक काँपता रहा।


2 -. चुनिया का नया ड्रेस

चुनिया आज

नए सलवार में आई थी।

पूरी चमक रही थी।

मैंने कहा—

“अम्मा ने खरीदा क्या?”

वो बोली—

“नहीं… किस्मत ने दिलाया है।”

उसकी मुस्कुराहट में

ज़िंदगी से ज़्यादा

कुछ और चमक रहा था।


३-. पप्पू का पीछा

आज पप्पू

बस्ती तक पीछे-पीछे आया।

कुछ बोला नहीं,

बस आँखों से बातें करता रहा।

मेरे कदम तेज़ हो गए

पर मन में

एक अजीब खिंचाव भी था।

ये खिंचाव

खुशी का है

या खतरे का—

समझ नहीं आता।


४-. अम्मा का घाव

अम्मा के हाथ में

आज फिर छाला पड़ा।

वो बोली

“दर्द की आदत हो गई है।”

मैंने सोचा—

दर्द की आदत होना

सबसे बड़ा

दर्द होता है।


5-. पापा का सच

आज पापा ने

धीरे से कहा

“बिट्टो, मैं अच्छा बाप नहीं हूँ।”

मैं कुछ बोली नहीं।

बीच में बस

दो आँसू गिरे—

उनके गाल पर या मेरे,

पता नहीं।


6-. छुटके की भूख

आज छुटके ने पूछा

“दीदी, गुड़ है?”

मेरे पास नहीं था।

उसकी आँखों में

निराशा नहीं,

आदत दिखी।

मुझे लगा

सबसे खतरनाक चीज़

गरीबी से भी ज़्यादा

गरीबी की आदत है।


7 -. मेरी चुप्पी

आज अम्मा ने पूछा

“क्यों चुप है?”

मैं क्या बताती?

कि मन में सौ बातें हैं,

पर ज़ुबान पर

एक भी नहीं आती।

कभी-कभी

चुप्पी ही

सबसे भारी बोझ होती है।


8-. मेरी उम्र

लोग कहते हैं

मैं चौदह की हूँ।

पर लगता है

मैं चालीस की हो चुकी हूँ

क्योंकि

मेरे बचपन ने

बहुत जल्दी

काम पर जाना शुरू कर दिया था।


9-. आसमान

आज छत पर जाकर

आसमान देखा

एक तारा टूटा।

मैंने मन ही मन

एक दुआ माँगी

“किसी दिन

मेरा भी दिल

कुछ अच्छे में टूटे,

किसी बुरे में नहीं।”


10 -. बिट्टो का वादा

आज डायरी में

एक लाइन लिखी—

मैं यहाँ रहूँगी,

पर यूँ नहीं रहूँगी।

ये वादा

किससे है?

शायद ख़ुद से।

शायद उस बिट्टो से

जो कहीं भीतर

अब भी सपने सँभालती है।

मुकेश - (बिट्टो की डायरी से )

मैं बिट्टो हूँ… और मेरी दुनिया ऐसी ही है

 मैं बिट्टो हूँ… और मेरी दुनिया ऐसी ही है


मैं बिट्टो,

आज भोर में ही उठ गई थी।

अम्मा कह रही थीं

आज घर के आगे की नाली साफ़ करनी है,

क्योंकि मोहल्ले वाले

हमेशा हमें ही बुलाते हैं—

ना जाने क्यों

सफाई भी जात पूछकर होती है।


अम्मा बोली

"जल्दी कर बिट्टो,

लोग आते ही होंगे काम देने।”

मुझे अच्छा नहीं लगता,

पर क्या करूँ

अम्मा के साथ जाना ही पड़ता है।


कभी-कभी सोचती हूँ

काश मैं भी

चुनिया की तरह

स्कूल की कॉपी में फूल बनाती,

या गुड्डू की तरह

मेले में चढ़–उतार वाली झूला झूलती।

पर मेरे हिस्से में

झाड़ू, नाली और बासन ही आए हैं।


छुटका आज फिर रो रहा है

कह रहा है भूख लगी है।

मैंने उसे चुप कराया,

अपने हिस्से की रोटी

उसके आगे सरका दी।

अम्मा बोली

"तू खा ले बिट्टो,

दिन भर काम करना है…"

पर मुझे पता है—

छुटका भूखा हो

तो अम्मा का दिल टूटता है।


पप्पू आज फिर रास्ते में मिला था।

धीरे से बोला,

"बिट्टो, तू हँस दिया कर…

अच्छी लगती है।”

और उसी आवाज़ में

कुछ ऐसा था

जिससे दिल काँप जाता है।

मैं जल्दी-जल्दी आगे बढ़ गई

कि कहीं मोहल्ले की औरतें

कुछ देख न लें।


शाम को जब सब सो जाते हैं

तो मैं अपनी टूटी दीवारों में

एक सपना टांग देती हूँ

कि एक दिन मैं भी पढ़ूँगी,

किताबें खोलूँगी,

कुछ लिखूँगी,

कुछ बनूँगी…

पर फिर याद आता है

अम्मा और छुटका

मेरे बिना कैसे चलेंगे?


चलो, अब जाना पड़ेगा

नाली का पानी

तेज़ धूप में बदबू मारने लगता है।

अम्मा पुकार रही हैं…

और बिट्टो

फिर से बिट्टो लौट आती है।


मुकेश ,,,,,,

सांसों के बीच की खाली जगह”

 सांसों के बीच की खाली जगह”

सांसों के बीच
एक खाली-सी जगह होती है
न आवाज़,
न हलचल,
बस एक अनकहा विराम।

उसी विराम में
दिल अपनी थकान छोड़ देता है,
और रूह
अपनी सच्चाई पा लेती है।

यही वह जगह है
जहाँ हम न दुनिया में होते हैं,
न खुद से दूर
बस एक क्षण के लिए
पूरी तरह उपस्थित।

सांसों के बीच की
यही छोटी-सी खामोशी
कभी-कभी
पूरे जीवन का अर्थ बता जाती है।

मुकेश ,,,,,



समय के तलवे पर लिखा नाम

 समय के तलवे पर लिखा नाम

समय के तलवे पर

किसका नाम लिखा था

पता ही नहीं चला,

पर उसकी आहट

हर पल की रेखाओं में सुनाई देती रही।


कभी वो धूप की तरह चमका,

कभी रेत की तरह फिसल गया,

पर मिटा नहीं

जैसे किसी रूह की पुकार

किसी अनजाने सफ़र से लौटती हो।


समय चलता रहा,

पर नाम वही रहा

एक मौन स्मरण की तरह,

एक अधूरी दुआ की तरह,

या शायद एक ऐसी कहानी की तरह

जिसे सिर्फ़ रूहें पढ़ना जानती हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

प्रेम की पीठ पर लिखी उदासी

प्रेम की पीठ पर लिखी उदासी


प्रेम की पीठ पर

किसी पुरानी सुबह की तरह

उदासी लिखी हुई थी—

हल्की, धुँधली, पर गहरी।


वो उदासी,

जिसे न तुमने कहा,

न मैंने समझा…

बस दोनों के बीच

एक अनकही छाया-सी चलती रही।


इश्क़ का चेहरा

हमेशा सामने से चमकता है,

पर पीछे मुड़कर देखने पर

उसमें कुछ टूटी हुई उम्मीदें,

कुछ थकी हुई रातें

और कुछ अनसुने आहटें

हमेशा मिल जाती हैं।


हम दोनों ने

प्रेम को संभालने की कोशिश तो की,

पर शायद

अपनी-अपनी चुप्पियों का बोझ

उसकी पीठ पर रख दिया।


अब जब पीछे देखता हूँ,

तो पता चलता है

उदासी लिखी नहीं गई थी,

बस प्रेम की पीठ पर

हमारी थकान का निशान था।


और प्रेम…

वो आज भी बिना शिकायत

वही खड़ा है

अपनी पीठ पर

हमारी कहानी उठाए हुए।


मुकेश ,,,,,,,,,

गोलगप्पे खाती लड़कियां

 गोलगप्पे खाती लड़कियां


गोलगप्पे खाती लड़कियां,

हँसी उनके होंठों पर,

तीखी चटनी उनके जज़्बात में,

और हर बूँद पानी में

छुपा एक छोटा सा जादू।


“थोड़ा और डालो!”

कहकर वो छेड़ती हैं,

हम देखते हैं, मुस्कुराते हैं,

और खुद को रोक नहीं पाते।


मुंह में पानी, आँखों में चमक,

हर गोलगप्पा जैसे

एक नई कहानी कहता है।


उनकी नज़रें नटखट,

उनकी बातें चुटीली,

और हर चबाने के साथ

दिल की धड़कन भी तेज़ हो जाती है।


गोलगप्पे खाती लड़कियां,

एक पल में खुशियाँ बाँट देती हैं,

मसालेदार, मीठी, और पूरी तरह ज़िन्दा।


और जब वो आगे बढ़ती हैं,

तो लगता है

दुनिया थोड़ी हल्की,

थोड़ी रंगीन,

और बिल्कुल प्यारी हो गई।


मुकेश ,,,,,,,

अग्नि की सात जिह्वाएँ — विस्तारपूर्वक तात्त्विक विवेचन

 अग्नि की सात जिह्वाएँ — विस्तारपूर्वक तात्त्विक विवेचन

ऋग्वेद में अग्नि को केवल भौतिक अग्नि नहीं, बल्कि दैवी चेतना का प्रथम प्रकाश कहा गया है। ब्रह्म के अव्यक्त से जो प्रथम ज्योति उत्पन्न हुई, वही अग्नि कहलाती है। यही अग्नि आगे चलकर देवता, यज्ञ, जीवनशक्ति और ज्ञान — चारों रूपों में व्याप्त होती है।

शास्त्रों में अग्नि की सात जिह्वाएँ (Tongues of Fire) कही गई हैं — जो उसकी सात क्रियाओं, सात चेतन तरंगों और सात रंगों का प्रतीक हैं।

1. काली (Kālī)

अर्थ: यह अग्नि की प्रथम जिह्वा है — तीव्र, प्रचंड और संहारक।

तात्त्विक अर्थ: यह अज्ञान और अशुद्धता को जलाकर नष्ट करती है। यह अहंकार-दहन की ज्वाला है।

आध्यात्मिक अर्थ: साधक के भीतर जो तपस्या की ज्वाला है, वही काली जिह्वा है — जो उसे भीतर से शुद्ध करती है।

नज़्म:

काली ज्वाला, तू जलती क्यों है इतनी भीतर?

क्या मैं अभी अधूरा हूँ, या तू मुझे पूर्ण बना रही है?

हर बार जब मैं टूटता हूँ, तू मुझे नया आकार देती है—

जैसे राख में से जन्म लेता है जीवन का अर्थ।


2. कराली (Karālī)

अर्थ: भयानक रूप वाली, संहार और रूपांतरण की शक्ति।

तात्त्विक अर्थ: यह परिवर्तन की अग्नि है। पुराना नष्ट करती है ताकि नया जन्म ले सके।

आध्यात्मिक अर्थ: यह मृत्यु की प्रतीक नहीं, नवजीवन की प्रसूति है।

नज़्म:

कराली, तेरी आँखों में बिजली चमकती है,

हर गिरा हुआ स्वप्न, तेरे पाँव तले अंकुर बनता है।

तू डर नहीं, तू परिवर्तन है—

तू हर अंत में आरंभ का गीत गाती है।


3. मनो-जवा (Manojavā)

अर्थ: मन के समान तीव्र गति वाली।

तात्त्विक अर्थ: यह चेतना की गति है — विचार से भी तेज।

आध्यात्मिक अर्थ: यह साधक की प्रार्थना को तुरंत ब्रह्म तक पहुँचाती है।

नज़्म:

मनो-जवा, तू उड़ जाती है मेरे मन से पहले,

वह शब्द जो मैं कह न पाया, तू उसे अग्नि में कह देती है।

तेरी लपटों में मेरी कामना नहीं, बस एक वाक्य है—

"मैं अस्तित्व का हिस्सा हूँ।"


4. सुलोहिता (Sulohitā)

अर्थ: लालिमा लिए हुई, सृष्टि की उष्मा से भरी।

तात्त्विक अर्थ: यह सृजन की अग्नि है — जीवन, प्रेम, और करुणा की लहर।

आध्यात्मिक अर्थ: यह ब्रह्म की “इच्छा शक्ति” (इच्छाशक्ति) का प्रतीक है।

नज़्म:

सुलोहिता, तेरे आँचल में संसार पलता है,

तेरे लाल उजास में बीज फूटते हैं,

प्रेम तेरी ही छाया है,

और करुणा तेरे ही उष्म हृदय की धड़कन।


5. सुधूम्रवर्णा (Sudhūmra-varṇā)

अर्थ: धुएँ के समान वर्ण वाली, ढकी हुई चेतना।

तात्त्विक अर्थ: यह माया और रहस्य की ज्वाला है — जो सत्य को ढँक भी लेती है और प्रकट भी करती है।

आध्यात्मिक अर्थ: साधक जब भ्रम में होता है, तो यह अग्नि उसकी अंतर-दृष्टि की परीक्षा लेती है।

नज़्म:

सुधूम्रवर्णा, तू क्यों छिपा लेती है मुझे मुझसे?

तेरे धुएँ में कभी मैं खुद को खो देता हूँ,

कभी पा भी लेता हूँ—

जैसे सत्य धुँध में मुस्कुराता हो।


6. स्फुलिंगिनी (Sphuliṅginī)

अर्थ: चिंगारियाँ उड़ाने वाली।

तात्त्विक अर्थ: यह प्रेरणा की अग्नि है — ज्ञान के बीज जगाती है।

आध्यात्मिक अर्थ: यह तप के फलस्वरूप उत्पन्न अंतर्ज्योति है।

नज़्म:

स्फुलिंगिनी, तेरे छोटे-छोटे चिंगारियों में संसार छिपा है,

एक विचार, एक लय, एक नया श्वास।

जब मैं थक जाता हूँ, तू भीतर से कहती है

"उठो, अभी प्रकाश अधूरा है।"


7. विश्वरूपी (Viśvarūpī)

अर्थ: समस्त रूपों वाली, सर्वव्यापी अग्नि।

तात्त्विक अर्थ: यह परब्रह्म की ज्वाला है — जो सृष्टि के हर कण में विद्यमान है।

आध्यात्मिक अर्थ: यहाँ साधक और अग्नि में भेद नहीं रहता। साधक अग्नि बन जाता है।

नज़्म:

विश्वरूपी, तू हर रूप में है—

मेरी साँस, मेरा शब्द, मेरा मौन।

अब मैं नहीं बोलता, तू बोलती है मुझसे,

अग्नि अब बाहर नहीं, मैं स्वयं अग्नि हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,

स्वप्न की नदी

 “स्वप्न की नदी”


— मुकेश इलाहाबादी


सुनो,

कल्पना करो ,,


एक गोधूलि की धरती है,

जहाँ आसमान में धूप का बचा हुआ सुनहरा टुकड़ा

धीरे-धीरे पिघल रहा है।

नदी अपने किनारे से कुछ कहती है,

और पेड़ अपनी शाख़ों से जवाब देते हैं।


उस नदी के पार

एक छोटा-सा पुल है,

जिसके नीचे से जल नहीं,

बल्कि समय बहता है।


वहीं मैं खड़ा हूँ 

और तुम,

सफ़ेद रेशमी ओढ़नी में

धीरे-धीरे मेरी ओर आती हो।


तुम्हारे बालों से हवा खेल रही है,

जैसे कोई अनजानी धुन की तान बजा रही हो।

तुम्हारे होंठों पर मुस्कान नहीं,

बस हल्की-सी उलझन है 

कि ये सपना है या सच।


मैं कहता हूँ 

“सपनों में मिलने वाले लोग

कभी ग़ायब नहीं होते,

वे बस नदी की तरह रूप बदल लेते हैं।”


तुम मुस्कुरा देती हो,

जैसे किसी बच्चे ने

पहली बार इंद्रधनुष छू लिया हो।


हम चलते हैं,

घास की कोमल ज़मीन पर —

जहाँ हर पत्ती तुम्हारे क़दमों से

एक कविता बन जाती है।


तुम ठहरती हो,

हवा में हाथ फैलाकर

कहती हो 

“देखो, मैं हवा को पकड़ सकती हूँ!”


मैं देखता हूँ,

कि सच में हवा

तुम्हारे चारों ओर ठहर जाती है।


फिर तुम झुककर

पानी में अपने चेहरे को देखती हो,

और धीरे से पूछती हो 

“क्या समय भी बूढ़ा होता है?”


मैं कहता हूँ 

“नहीं,

बस यादें सफ़ेद हो जाती हैं।”


तुम हँस देती हो,

और तुम्हारी हँसी की लहर

नदी पर गिरती है 

जैसे चाँदनी टूटकर बिखर गई हो।


रात अब उतर आई है,

हवा में बेला की महक है।

हम दोनों उस पुल के बीच खड़े हैं,

जहाँ से नीचे समय बहता है,

और ऊपर तारे देख रहे हैं।


तुम मेरा हाथ पकड़ती हो,

और कहती हो —

“अगर ये सपना है,

तो मैं इसमें हमेशा रहना चाहती हूँ।”


मैं कहता हूँ 

“सपनों को छोड़ दो,

वो लौट आते हैं

जब याद उन्हें पुकारती है।”


तुम मेरे कंधे पर सिर रख देती हो 

और कहती हो,

“तो फिर तुम मत लौटना।”


मैं कुछ नहीं कहता,

बस तुम्हारे बालों में

रात का एक तारा फँसा देता हूँ।


धीरे-धीरे सब कुछ मौन हो जाता है 

नदी, हवा, आकाश,

यहाँ तक कि हम भी।


फिर अचानक 

तुम्हारी हथेली की गर्मी

ठंडी होने लगती है।

तुम धुंध की तरह

मुझसे अलग होने लगती हो।


मैं कहता हूँ 

“रुको...”

पर तुम हवा में घुल जाती हो।


नदी बहना नहीं रोकती,

बस उसका स्वर बदल जाता है 

जैसे किसी ने प्रेम का

अंतिम सुर छेड़ दिया हो।


अब मैं अकेला हूँ 

उस पुल पर,

जहाँ से समय गुजरता है,

जहाँ कभी तुम थी,

और अब बस

तुम्हारी खुशबू बची है।


मैं आसमान की ओर देखता हूँ,

जहाँ वही तारा चमक रहा है 

जो मैंने तुम्हारे बालों में लगाया था।


शायद वह अब तुम्हारा नाम जानता है।


और मैं...

बस हर रात

उस नदी के किनारे जाकर

वही तारा ढूँढता हूँ 

जो अब भी

मेरे सपनों में चमकता है।

शून्य - सूफ़ी और दार्शनिक अंदाज़ में

 "शून्य"

(सूफ़ी और दार्शनिक अंदाज़ में)
मुकेश इलाहाबादी

शून्य —
जिसे सब डरते हैं,
पर वही तो सबका जन्मस्थल है।

तुम कहते हो — “कुछ नहीं।”
और मैं कहता हूँ —
“यही तो सब कुछ है।”

क्योंकि जो नहीं है,
वही तो मुक्त है —
रूप से, नाम से, देह से,
यहाँ तक कि खुद “होने” से भी।

शून्य में कोई आकृति नहीं,
पर उसी की गोद से आकृतियाँ जन्म लेती हैं।
जैसे मौन — जिससे संगीत निकले,
जैसे निःशब्दता — जहाँ से शब्द उगें।

शून्य वह आईना है
जिसमें ईश्वर खुद को देखता है —
और मुस्कुरा देता है।

मैंने जब खुद को मिटाया,
तो पाया —
मैं कभी था ही नहीं,
बस वही था — जो सबमें है।

कभी-कभी लगता है,
शून्य कोई स्थान नहीं,
बल्कि एक स्वभाव है —
जहाँ “मैं” और “तू” का अंतर
पिघल जाता है।

वहीं तो मिलन है —
जहाँ खोज खत्म नहीं होती,
बस खोजने वाला ही खो जाता है।

कबीर ने कहा था —
“ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया,”
और रूमी ने फुसफुसाया —
“Lose yourself completely,
so the Beloved may find you.”

शून्य वही दरवाज़ा है —
जहाँ भीतर जाने के लिए
पहले बाहर को छोड़ना पड़ता है।

और जब तुम भीतर पहुँचते हो,
तो कोई नहीं मिलता —
सिवाय तुम्हारे न-होने के।

वहीं —
एक गहरी, पारदर्शी रौशनी में
प्रेम खुद को पहचानता है,
और समय सिर झुका लेता है।

शून्य,
तू कुछ नहीं —
पर सब कुछ तेरे बिना अधूरा है।

शून्य

शून्य
मुकेश इलाहाबादी

शून्य — कोई खालीपन नहीं,
बल्कि सबका आरंभ है।

जहाँ कुछ नहीं दिखता,
वहीं से सब कुछ जन्म लेता है।

मौन की गोद में शब्द पनपते हैं,
न-होने में ही अस्तित्व खिलता है।

शून्य — ईश्वर का गुप्त नाम है,
जिसे उच्चारते ही “मैं” पिघल जाता है।

जो खुद को मिटा दे, वही उसे पा लेता है —
क्योंकि न-होने में ही होने का सत्य छिपा है।

शून्य न अंत है, न आरंभ —
बस प्रेम का अंतिम मौन है।

तुनुक मिज़ाज़ प्रेमिका

 तुनुक मिज़ाज़ प्रेमिका


अक्सर प्रेमिकाएँ

तुनुक मिज़ाज़ होती हैं—

जैसे हवा में खेलती धूप

हल्की, नर्म, और चुलबुली।


कल तक गुस्सा, आज हँसी,

आँखों में चमक और थोड़ी सी नासमझी।

कुछ कहती हैं, कुछ छुपाती हैं,

हर पल में जादू बिखराती हैं।


जब वे हँसती हैं,

सारे शहर की रौनक बढ़ जाती है।

और जब चुप हो जाती हैं,

तो दिल की हर धड़कन उनके नाम गाती है।


उनका मूड बदलता है,

जैसे बदलते हैं मौसम के रंग।

लेकिन हर बदलाव में

प्यार की मीठी मुस्कान छिपी रहती है।


तुनुक -मिज़ाज़ प्रेमिका—

एक तितली जैसी,

जो उड़ी, ठहरी, फिर लौट आई

और दिल को हर पल चुराती रही।


और जो इसे समझ सके,

जो इसे महसूस कर सके,

वही जान पाए

कि इस चुलबुलापन के पीछे

सच्चा प्यार छुपा है।


मुकेश ,,,,,,,,

रूह का कोई दिशा-सूचक यंत्र नहीं होता।

 ज़िन्दगी के समंदर में

रूह का कोई दिशा-सूचक यंत्र नहीं होता।

लहरें आती हैं, ज्वार उठते हैं,

धुंध छा जाती है,

और हम केवल महसूस करते हैं।


नाव हो, जूता हो, ग्रंथ हो—

सब रास्ते दिखाने वाले साधन हैं,

लेकिन वास्तविक यात्रा

मन और आत्मा की अंतराल गहराई में होती है।


जहाँ तूफ़ान भी सिखाता है,

जहाँ मौन भी ज्ञान देता है,

और जहाँ हर अनुभव

हमें बिना नक्शे के

हमारे भीतर की दिशा खोजने को मजबूर करता है।


रूह अकेली चलती है,

कदम केवल साथी हैं,

और समंदर की गहराई

एक रहस्य बनकर हमारे भीतर उतरती है।


मुकेश ,,,,,,,,

खोज की भाषा, सत्ता की व्याकरण

खोज की भाषा, सत्ता की व्याकरण


खोज की भाषा सरल होती है

“यह वहाँ है।”

“यह हमें मिला।”

“यह नया है।”


लेकिन सत्ता की व्याकरण

जटिल होती है

नाम बदलना,

सीमाएँ खींचना,

ध्वज गाड़ना,

और शोरगुल में इतिहास लिखना।


पहले कोई जमीन थी

तट, नदियाँ, जंगल।

फिर कोई नाव आई

और उसने कहा

“यह अब हमारी है।”


खोज की भाषा

निर्दोष, उत्सुक, उत्सवपूर्ण होती है।

पर सत्ता की व्याकरण

शर्तों और दावों से भरी होती है।


मसालों की गंध,

समुद्र की लहरें,

आकाश के तारे

वे सुनते रहे,

पर न बोले।

क्योंकि भाषा

वो थी जो मनुष्य समझ सके,

सत्ता

वो थी जो मनुष्य को डराए।


नक्शे बने,

समझौते हुए,

अनगिनत शब्दों में बयान हुए।

पर खोज के पल

सिर्फ़ क्षण भर के थे,

जैसे समुद्र का उठना और लौटना।


सत्य यह है

खोज कभी किसी का नहीं,

सिर्फ़ देखने वालों की होती है।

और सत्ता

देखने वालों को ही पकड़कर रखती है,

नामों और सीमाओं में बाँधकर।


आज भी

यदि ध्यान से सुनो,

तो हवाएँ फुसफुसाती हैं

खोज की भाषा है,

और धूप के झुरमुट में

सत्ता की व्याकरण।


वह कहती है

“जो तुमने पाया, वह तुम्हारा नहीं।

पर जो तुमने समझा, वह हमेशा तुम्हारा रहेगा।”


क्योंकि खोज

मनुष्य को दृष्टि देती है,

और सत्ता

मनुष्य को कहानी।


दोनों साथ चलते हैं

एक कहता है “देखो,”

दूसरा कहता है “यह मेरा।”


पर अंत में

धरती चुप रहती है

और केवल अपने नियमों में

सही और गलत को मापती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

जब किसी ने कहा — “यह मेरा है”

 जब किसी ने कहा — “यह मेरा है”


जब किसी ने कहा 

“यह मेरा है,”

धरती ने कुछ नहीं कहा।


वह बस उतनी ही शांत रही

जितनी बीज बोते समय रहती है।


आकाश ने भी विरोध नहीं किया,

वह उसी तरह फैला रहा

बिना सीमाओं के,

बिना दीवारों के।


पर उस एक वाक्य ने

हवा की दिशा बदल दी।


रेत,

जो हर पाँव को समान रूप से थामती थी,

अचानक सवालों में बदल गई।

नदी,

जो दोनों किनारों को बराबर छूती थी,

रेखाओं में बाँट दी गई।


“यह मेरा है”

कहते ही

पेड़ों की छाँव छोटी हो गई,

क्षितिज संकुचित हो गया,

और पृथ्वी का गोलापन

मानो किसी मुट्ठी में सिमटने लगा।


किसी ने दावा किया

समुद्र पर,

जंगल पर,

पहाड़ पर।

पर क्या लहरें

किसी नाम से बंधती हैं?

क्या पर्वत

किसी दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करते हैं?


जब किसी ने कहा 

“यह मेरा है,”

तो एक और आवाज़

धीमे से उठी—

“तुम भी तो मेरे हो।”


धरती का धैर्य

घोषणाओं से बड़ा है।

वह जानती है

जो आज कह रहा है “मेरा,”

कल उसी में समा जाएगा।


मालिकाना एक क्षण है;

मिट्टी शाश्वत।


और शायद

सबसे गहरी सच्चाई यही है

कि जिसे हम अपना कहते हैं,

वह हमें पहले ही

अपना बना चुका होता है।


जब किसी ने कहा 

“यह मेरा है,”

तो समय मुस्कुराया

क्योंकि वह जानता है

कि अंततः

सब कुछ

किसी एक का नहीं,

सिर्फ़ होने का है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

समुद्र की स्मृति बनाम इतिहास की स्याही

 समुद्र की स्मृति बनाम इतिहास की स्याही


इतिहास की स्याही

सूख जाती है

पन्नों पर ठहरकर

एक निर्णय की तरह।


समुद्र की स्मृति

सूखती नहीं।

वह नम रहती है

नमक की तरह,

घाव की तरह,

अश्रु की तरह।


इतिहास लिखता है

कौन आया,

किसने झंडा गाड़ा,

किसने किसे जीता।


समुद्र याद रखता है

किसकी नाव डूबी,

किस माँ ने क्षितिज पर

आख़िरी बार हाथ हिलाया,

किस नाविक ने

लौटने की क़सम खाई

और लौट न सका।


स्याही

सीधी रेखाओं में चलती है

वाक्य दर वाक्य।

समुद्र

वृत्तों में सोचता है

ज्वार से भाटा,

भाटा से ज्वार।


इतिहास की किताबें

तारीख़ें चुनती हैं।

समुद्र

क्षण नहीं चुनता

वह सब समेट लेता है,

यहाँ तक कि

वे चीखें भी

जो दर्ज नहीं हुईं।


स्याही का रंग काला है,

समुद्र का रंग बदलता है

कभी नीला,

कभी हरा,

कभी लाल सांझ में।

उसकी बदलती सतह के नीचे

एक स्थिर स्मृति है

गहरी, अंधेरी,

पर सजीव।


इतिहास कहता है

“यह विजय थी।”

समुद्र पूछता है

“किसके लिए?”


इतिहास नाम देता है

खोज, अभियान, साम्राज्य।

समुद्र नाम नहीं देता—

वह केवल लहर भेजता है,

जो हर तट से टकराकर

एक ही स्वर में लौटती है।


स्याही पन्नों में कैद है;

समुद्र सीमाओं से परे।


कभी-कभी

जब रात गहरी होती है

और हवा में नमक की गंध तैरती है,

तब लगता है

इतिहास ने जो छुपाया,

समुद्र अब भी फुसफुसा रहा है।


क्योंकि स्याही

सत्ता की होती है,

पर स्मृति

प्रकृति की।


और अंत में

जब किताबें पीली पड़ जाएँगी,

स्याही धुंधली हो जाएगी

समुद्र तब भी

अपनी अनंत लय में

सब कुछ दोहराता रहेगा।


समुद्र की स्मृति

कभी समाप्त नहीं होती;

इतिहास की स्याही

सिर्फ़ अंतिम बिंदु तक जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

जहाज़ों से पहले भी तट थे

 

जहाज़ों से पहले भी तट थे

जहाज़ों से पहले भी तट थे—
रेत पर बच्चों के पाँवों के निशान,
सीपियों में बंद समुद्र की फुसफुसाहट,
और सुबह की पहली लहर का नमस्कार।

किसी पाल के खुलने से पहले
मछुआरों ने जाल फेंके थे,
किसी ध्वज के गाड़े जाने से पहले
नारियल के पेड़ों ने हवा को पहचाना था।

तट इंतज़ार में नहीं थे।
वे जीवन में थे।

उनकी रेत पर
कहानियाँ चलती थीं—
पैरों से,
न कि नक्शों से।

जहाज़ आए
तो उन्होंने क्षितिज को
एक घोषणा बना दिया।
उन्होंने कहा—
“हम पहुँचे।”

पर तट ने धीमे से उत्तर दिया—
“हम पहले से थे।”

जहाज़ों से पहले भी
लहरें आती-जाती थीं,
ज्वार अपने समय पर उठता था,
और चाँद
समुद्र को खींचता था
बिना किसी इतिहास-लेखन के।

किसी ने उस समय
खोज का शब्द नहीं बोला,
क्योंकि होना
खोजे जाने पर निर्भर नहीं था।

जहाज़ों ने
रेत पर नए पदचिह्न बनाए,
कुछ स्थायी,
कुछ क्षणिक।
पर लहरें हर शाम
उन्हें बराबर कर देतीं—
जैसे कह रही हों,
“यह तट किसी एक का नहीं।”

जहाज़ों से पहले भी तट थे—
और शायद
जहाज़ों के बाद भी रहेंगे।

वे जानते हैं
कि आगमन और प्रस्थान
समय की लय है।
कोई आता है,
कोई जाता है,
पर तट—
अपनी नमी, अपनी धड़कन,
अपनी मौन स्मृति में—
स्थिर रहते हैं।

इतिहास जहाज़ों को याद रखता है;
समुद्र तटों को।

और तट
आज भी
हर नए क्षितिज को देखते हुए
चुपचाप कहते हैं—
“तुम पहले नहीं,
सिर्फ़ अगले हो।”

धरती गोल थी, दृष्टि नहीं

 धरती गोल थी, दृष्टि नहीं


धरती सदियों से गोल थी

अपने अक्ष पर घूमती,

सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती,

समुद्रों को बाँहों में थामे।


पर दृष्टि

सीधी रेखाओं में सोचती रही।


उसने क्षितिज को अंत समझा,

और जहाँ पानी मिला

वहाँ डर।

जहाँ नया तट दिखा

वहाँ दावा।


धरती ने कभी नहीं कहा

“यह मेरा है।”

पर दृष्टि ने कहा

“यह अब मेरा होगा।”


गोलाई में कोई कोना नहीं होता,

पर नज़र ने कोने बना लिए

पूर्व, पश्चिम,

हम, वे।


धरती जोड़ती रही

महाद्वीप कभी एक थे,

नदियाँ सीमाओं से बेख़बर रहीं,

हवा ने कभी पासपोर्ट नहीं माँगा।


पर दृष्टि ने नक्शे बनाए

सीधी रेखाएँ,

कठोर सीमाएँ,

रंगों से बाँटे हुए हिस्से।


धरती घूमती रही

उसी धैर्य से,

उसी संतुलन से।

पर दृष्टि

अपनी धुरी पर अटकी रही।


उसे लगा

कि खोज लेना ही जान लेना है,

कि नाम दे देना ही अधिकार है।


धरती गोल थी

इसलिए हर यात्रा

किसी न किसी मोड़ पर

लौट सकती थी।


पर दृष्टि

लौटना नहीं जानती थी।

वह आगे बढ़ना जानती थी

भले ही आगे

किसी और का घर हो।


आज भी

जब हम आकाश से

धरती की तस्वीर देखते हैं,

वह एक नीला गोला लगती है

निर्विवाद, अविभाजित।


तब समझ आता है

समस्या भूगोल की नहीं थी,

दृष्टि की थी।


धरती गोल थी,

इसलिए उसमें मिलन की संभावना थी।

दृष्टि सीधी थी,

इसलिए उसमें टकराव की।


शायद अगली खोज

किसी नए तट की नहीं,

एक नई दृष्टि की हो

जो गोलाई को समझे,

और स्वीकार करे

कि इस ग्रह पर

केंद्र कोई एक नहीं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

कम्पास, साम्राज्य और मसालों की गंध

 कम्पास, साम्राज्य और मसालों की गंध


एक छोटी-सी सुई

काँच के भीतर काँपती थी—

उसे दिशा कहते थे।


उस सुई के पीछे

कितने स्वप्न बँधे थे—

सोना,

नए बाज़ार,

दूर देशों की कथाएँ।


कम्पास ने उत्तर दिखाया,

पर आँखों ने लाभ देखा।


समुद्र के उस पार

काली मिर्च की तीखी गंध थी,

दालचीनी की गरमाहट,

इलायची की मीठी साँस।

मसाले सिर्फ़ स्वाद नहीं थे—

वे साम्राज्यों की भूख थे।


पाल खुली,

नक्शे फैले,

और एक सुई

धीरे-धीरे

व्यापार से अधिकार तक पहुँच गई।


कम्पास निष्पक्ष था—

उसे न मसालों से प्रेम,

न भूमि से।

पर मनुष्य की आकांक्षा

उसकी दिशा में अर्थ भरती रही।


जहाज़ों की लकड़ी में

नमक जमा था,

और महत्वाकांक्षा भी।

हर बंदरगाह

एक अवसर था—

या एक अधिग्रहण।


मसालों की गंध

रसोई से निकलकर

दरबारों तक पहुँची।

स्वाद ने राजनीति को छुआ,

और राजनीति ने भूगोल को।


एक सुई काँपी—

और नक्शे बदल गए।


कम्पास ने कभी नहीं कहा—

“विजय करो।”

उसने बस दिशा दी।

पर दिशा जब लालच से मिलती है,

तो वह मार्ग नहीं,

मार्गक्रमण बन जाती है।


आज भी

किसी बाज़ार में

जब काली मिर्च की खुशबू आती है,

तो उसमें हल्की-सी

समुद्री हवा घुली होती है।


याद दिलाती है—

कि इतिहास

सिर्फ़ युद्धों से नहीं,

स्वादों से भी बदलता है।


कम्पास अब भी उत्तर दिखाता है,

पर साम्राज्य टूट चुके हैं।

मसालों की गंध

अब भी वही है—

तीखी, जीवित, स्वतंत्र।


और शायद

सुई ने अंततः यही सीखा—

दिशा देना सरल है,

पर दिशा का नैतिक अर्थ

मनुष्य तय करता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

पहुँचना और होना — दो अलग कथाएँ

 पहुँचना और होना — दो अलग कथाएँ


पहुँचना

एक क्रिया है।

होना

एक अवस्था।


पहुँचना

समय में दर्ज होता है

तारीख़, वर्ष,

एक ध्वज,

एक घोषणा।


होना

मिट्टी में दर्ज होता है

बीज की तरह,

धीरे-धीरे,

बिना शोर के।


किसी ने कहा

“हम यहाँ पहुँचे।”

पर क्या पहुँचना

हो जाने के बराबर है?


तट पर कदम रख देना

उस रेत का हिस्सा हो जाना नहीं होता।


पहुँचना अक्सर

बाहर से आता है

नावों पर,

हवाई जहाज़ों में,

दस्तावेज़ों के साथ।


होना भीतर से उगता है

भाषा में,

रोटी की गंध में,

रिश्तों की जड़ों में।


पहुँचना

दूरी तय करता है।

होना

गहराई।


किसी देश में पहुँच जाना

उसके दुख-सुख में होना नहीं है।

किसी शहर में बस जाना

उसकी धड़कन में बस जाना नहीं है।


इतिहास

पहुँचने को दर्ज करता है;

स्मृति

होने को।


पहुँचना एक क्षण है—

होना एक निरंतरता।


कई लोग पहुँचे

उन्होंने नक्शे बनाए,

नाम बदले,

घोषणाएँ कीं।

पर जो पहले से थे,

वे बस थे

बिना उद्घोष के,

बिना प्रमाण के।


और शायद

सबसे कठिन यात्रा

किसी स्थान तक नहीं,

किसी स्थान में होना है।


पहुँचना कहता है

“मैं आ गया।”

होना कहता है—

“मैं यहीं से हूँ।”


दोनों कथाएँ अलग हैं

एक बाहर की,

एक भीतर की।


और दुनिया की सबसे गहरी सच्चाई

शायद यही है

कि पहुँचना आसान है,

होना कठिन।


मुकेश ,,,,,,,,,,

लहरों की गवाही में इतिहास

 लहरों की गवाही में इतिहास


इतिहास अक्सर

स्याही से लिखा जाता है

राजाओं के नाम,

युद्धों की तिथियाँ,

खोजों की घोषणाएँ।


पर समुद्र

काग़ज़ पर हस्ताक्षर नहीं करता।

वह लहरों में बोलता है।


जब पहली नाव

किसी अनजान तट पर लगी,

तो इतिहास ने कहा

“यह आरंभ है।”

पर लहरें हँसीं

“आरंभ?

हम तो सदियों से

इन रेतों को छूती आ रही हैं।”


लहरों की गवाही में

कोई विजेता नहीं होता,

सिर्फ़ आगमन और प्रस्थान होते हैं।


वे जानती हैं

कितनी नावें आईं,

कितने ध्वज गड़े,

कितने नाम बदले।

पर हर ज्वार के साथ

वे रेखाएँ धुल जाती हैं।


इतिहास कहता है

“यह भूमि खोजी गई।”

लहरें कहती हैं

“यह भूमि हमेशा थी।”


उनकी स्मृति में

न कोई सीमाएँ हैं,

न कोई साम्राज्य।

सिर्फ़ नमक है

जो हर आँसू और हर पसीने में

समान स्वाद रखता है।


रात के सन्नाटे में

अगर तट पर बैठो,

तो सुनोगे

लहरें सिर्फ़ पानी नहीं लातीं,

वे कथाएँ लाती हैं।


उन कथाओं में

मछुआरों की थकी हुई साँस है,

यात्रियों की बेचैन दृष्टि,

और उन लोगों की खामोश पीड़ा

जिनके नाम

इतिहास की किताबों में नहीं हैं।


लहरों की गवाही में

इतिहास स्थिर नहीं;

वह गतिमान है

जैसे समुद्र का हृदय।


वे हर बार लौटती हैं,

पर हर बार नई होती हैं।

और शायद

यही सच्ची गवाही है

कि कोई कथा अंतिम नहीं,

कोई दावा शाश्वत नहीं।


जब स्याही मिट जाएगी,

और पन्ने पीले पड़ जाएँगे,

तब भी समुद्र रहेगा

अपनी अनवरत आवाज़ में

कहता हुआ


“मैंने सब देखा है,

पर मैं किसी का नहीं।

मैं सिर्फ़ समय का साक्षी हूँ।”


मुकेश ,,,,,,,,,,,

जिसे उन्होंने खोज कहा

 जिसे उन्होंने खोज कहा


जिसे उन्होंने खोज कहा,

वह किसी और की सुबह थी।


जब उनकी नावों ने

क्षितिज को चीरते हुए

तट को छुआ,

उन्होंने अपने शब्दकोश खोले

और लिखा—

“नया।”


पर उस सुबह

चूल्हे पहले से जल रहे थे,

मछलियाँ जाल में थीं,

बच्चे रेत पर अपने नाम लिख रहे थे।


जिसे उन्होंने खोज कहा,

वह किसी और की स्मृति थी

पेड़ों की छाल में दर्ज,

नदियों की धुन में बसी,

पगडंडियों की धूल में चमकती।


खोज

उनके लिए घटना थी,

यहाँ के लिए जीवन।


उन्होंने नक्शे फैलाए,

रेखाएँ खींचीं,

नाम बदले।

पर क्या नाम बदलने से

पहचान बदल जाती है?


जिसे उन्होंने खाली जगह समझा,

वह गीतों से भरा था।

जिसे उन्होंने अवसर कहा,

वह किसी की विरासत थी।


समुद्र ने उन्हें रास्ता दिया,

उन्होंने उसे विजय कहा।

धरती ने उन्हें ठहरने दिया,

उन्होंने उसे अधिकार कहा।


इतिहास ने उनकी आवाज़ को

मुख्य कथा बना दिया;

पर हवा अब भी

दूसरी भाषा में फुसफुसाती है।


जिसे उन्होंने खोज कहा,

वह दरअसल

एक मुलाक़ात थी

दो संसारों की।

पर मुलाक़ात को

अधिकार में बदल देना

खोज नहीं होता।


आज भी

अगर किसी पुराने जंगल में जाओ,

या किसी तट पर चुपचाप बैठो,

तो महसूस होगा—

यह भूमि कभी खोई नहीं थी।


खोया था

सिर्फ़ देखने का तरीका।


और शायद

सबसे बड़ी खोज वही है

जब हम स्वीकार करें

कि जिसे हमने खोज कहा,

वह पहले से

पूर्ण, जीवित, और स्वयं में पर्याप्त था।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

नक्शों के बाहर का भूगोल

 नक्शों के बाहर का भूगोल


नक्शों में सब कुछ सटीक होता है

रेखाएँ सीधी,

सीमाएँ स्पष्ट,

रंग अलग-अलग।


पर जो सचमुच जीया जाता है,

वह अक्सर

नक्शों के बाहर होता है।


वहाँ न कोई देश मोटे अक्षरों में लिखा होता है,

न समुद्र पर नीली स्थिरता;

वहाँ पसीने की गंध है,

रोटी की भाप है,

मातृभाषा की काँपती हुई लय है।


नक्शे कहते हैं

“यहाँ से यहाँ तक।”

पर रिश्ते

सीमाएँ नहीं मानते।


एक नदी

दो देशों से होकर गुजरती है,

पर उसका जल

किसी एक झंडे का नहीं होता।


नक्शों के बाहर का भूगोल

यादों में बसता है

जहाँ बचपन की गली

किसी राजधानी से बड़ी होती है,

और माँ की रसोई

किसी साम्राज्य से अधिक गर्म।


वहाँ दिशाएँ

कम्पास से नहीं,

धड़कनों से तय होती हैं।


प्रवासी के लिए

घर एक बिंदु नहीं,

एक फैलती हुई वृत्त-रेखा है

जहाँ भी उसकी भाषा उसे पहचान ले,

वहीं उसका देश है।


नक्शे युद्धों के बाद बदलते हैं,

पर लोकगीत नहीं बदलते।

सीमाएँ खिंचती और मिटती रहती हैं,

पर स्मृतियों का भूगोल

अटल रहता है।


नक्शों के बाहर

एक और संसार है

जहाँ मनुष्य

पहले मनुष्य है,

फिर नागरिक।


जहाँ रास्ते

काग़ज़ पर नहीं,

पाँवों की धूल में बनते हैं।


और शायद

सबसे सच्चा भूगोल वही है

जो किसी एटलस में दर्ज नहीं,

पर हर हृदय में

अपनी आकृति लिए

धड़कता रहता है।


मुकेश ,,,,,,,,

खोजे जाने से पहले का देश

 खोजे जाने से पहले का देश


खोजे जाने से पहले

देश कैसा होता है?


क्या वह इंतज़ार करता है

किसी जहाज़ की आहट का?

क्या वह क्षितिज पर नज़रें गड़ाए

सोचता है—

“कब कोई मुझे ढूँढेगा?”


नहीं।


वह तब भी सांस लेता है

नदियाँ अपनी धुन में बहती हैं,

पहाड़ अपने मौन में अडिग रहते हैं,

जंगल अपनी भाषा में गाते हैं।


खोजे जाने से पहले का देश

किसी मानचित्र का रिक्त स्थान नहीं होता;

वह स्मृतियों से भरा हुआ होता है

लोकगीतों में,

अग्नि के चारों ओर बैठी कथाओं में,

धान की गंध में,

बारिश की पहली बूँद में।


किसी नाव के आने से पहले भी

तट थे।

किसी ध्वज के गाड़े जाने से पहले भी

धरती अपनी थी

उन लोगों की

जो उसे माँ कहते थे,

न कि संपत्ति।


खोज एक घोषणा है,

अस्तित्व नहीं।


जिस दिन किसी ने कहा

“यहाँ एक नया देश मिला,”

उस दिन भी

सूरज उसी तरह उगा था,

और बच्चों ने उसी मिट्टी में

अपने पाँव गाड़े थे।


खोजे जाने से पहले का देश

अज्ञात नहीं था;

बस किसी और की दृष्टि में

अनाम था।


नाम बदलते हैं,

पर नदियाँ अपना रास्ता नहीं भूलतीं।

सीमाएँ खिंचती हैं,

पर हवा पासपोर्ट नहीं माँगती।


खोजे जाने से पहले का देश

अपनी धड़कन में पूर्ण था

न किसी प्रमाण की ज़रूरत,

न किसी मुहर की।


और शायद

सबसे सच्चा देश वही होता है

जो किसी खोज का परिणाम नहीं,

बल्कि अपने होने की

स्वतंत्र घोषणा हो।


क्योंकि

जिसे खोजा गया कहा जाता है,

वह अक्सर पहले से

जीता-जागता, संपूर्ण,

और स्वयं में पर्याप्त होता है।


मुकेश ,,,,,,

जब समुद्र ने नक्शा लिखा

 जब समुद्र ने नक्शा लिखा


नक्शे काग़ज़ पर नहीं जन्मे थे,

वे पहले लहरों की पीठ पर बने थे।


जब मनुष्य ने रेखाएँ खींचना सीखा भी नहीं था,

समुद्र पहले ही

तटों को छू-छूकर

अपना भूगोल लिख रहा था।


न कोई स्याही,

न कोई पैमाना—

बस ज्वार का उठना,

भाटे का लौटना,

और लहरों की उँगलियों से

रेत पर खिंचती अस्थायी सीमाएँ।


किसी नाव ने जब पहली बार

क्षितिज को पार किया,

तो उसे लगा

वह खोज रहा है।

पर समुद्र मुस्कुराया

“मैं तो सदियों से

इन राहों को जानता हूँ।”


हवाएँ दिशाओं की दुभाषिया थीं,

तारे रात के कम्पास।

मछुआरों की आँखों में

पहला मानचित्र चमका था

जहाँ डर भी था,

और भरोसा भी।


समुद्र ने नक्शा लिखा

तो उसमें कोई सरहद नहीं थी;

सिर्फ़ प्रवाह था।


रेखाएँ मनुष्य ने जोड़ीं

नाम दिए,

दावे किए,

ध्वज गाड़े।

पर लहरें हर सुबह

उन रेखाओं को धो देतीं।


समुद्र का नक्शा

स्थिर नहीं होता

वह बदलता है,

जैसे स्मृति,

जैसे समय।


कभी एक तट डूब जाता है,

कभी कोई नया द्वीप उभर आता है।

मानचित्रों के अहंकार से परे

समुद्र कहता है—

“धरती किसी की निजी नहीं,

बस क्षणिक ठहराव है।”


जब समुद्र ने नक्शा लिखा,

तो उसने मनुष्य को भी अंकित किया

एक छोटी-सी नाव की तरह,

जो खुद को केंद्र समझ बैठी।


पर असल केंद्र

लहरों का चक्र था

आना, जाना, लौटना।


आज भी

अगर ध्यान से सुनो,

तो ज्वार की आवाज़ में

एक पुराना भूगोल गूँजता है

जहाँ सीमाएँ नहीं,

सिर्फ़ संबंध हैं।


और तब समझ आता है

नक्शा कभी काग़ज़ पर नहीं था;

वह हमेशा

समुद्र की साँस में लिखा गया था।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

अगर कोलंबस ने दिशा न बदली होती…

 अगर कोलंबस ने दिशा न बदली होती…


अगर क्रिस्टोफर कोलंबस 

ने दिशा न बदली होती,

अगर उसकी आँखों में

सोने का स्वप्न न चमका होता,

तो क्या महाद्वीप

अपने नाम बदलते?


समुद्र तब भी उतना ही नीला था,

आकाश उतना ही अनंत।

लहरें किसी ध्वज की भाषा नहीं जानतीं,

वे सिर्फ़ तट पहचानती हैं।


अगर वह पश्चिम की ओर न मुड़ा होता,

तो क्या पूर्व स्थिर रहता?

या हवाएँ किसी और पाल को

उसी रहस्य तक ले जातीं?


इतिहास कहता है—

“उसने खोज लिया।”

पर जंगलों, नदियों, जनजातियों ने

कभी खुद को खोया हुआ नहीं माना।


खोज

अक्सर आने वाले की घोषणा होती है,

न कि वहाँ पहले से मौजूद जीवन की।


अगर दिशा न बदली जाती,

तो शायद

मानचित्रों की रेखाएँ देर से खिंचतीं,

पर धरती की धड़कन

वैसी ही रहती।


नदियाँ अपनी धारा में,

जनजातियाँ अपनी आग के चारों ओर,

आकाश अपने तारों सहित।


किसी नाव का न पहुँचना

किसी भूमि का न होना नहीं होता।


और अगर वह न मुड़ता,

तो क्या हम कम जटिल होते?

कम विभाजित?

कम विजित?


या इतिहास

बस किसी और नाम से

वही कहानी दोहराता?


दिशा बदलना

सिर्फ़ समुद्री निर्णय नहीं था

वह समय की धुरी पर

एक मोड़ था।


पर कभी-कभी सोचता हूँ

धरती गोल थी,

वह खुद ही सबको

एक-दूसरे तक ले आती।


शायद देर से,

शायद कम शोर में,

शायद बिना “खोज” के शोरगुल के।


अगर कोलंबस ने दिशा न बदली होती,

तो भी महाद्वीप होते,

समुद्र होते,

मनुष्य होते


बस इतिहास

थोड़ा कम अहंकारी होता।


मुकेश ,,,,,,,,,,

अगर वास्को डी गामा न होता…

 अगर वास्को डी गामा न होता…

इतिहास की किताब

एक नाम पर उँगली रखती है

और कहती है,

“यहीं से शुरू हुआ रास्ता।”


पर समुद्र

किसी एक नाव का मोहताज नहीं था।


अगर Vasco da Gama

अपनी पालें न खोलता,

तो क्या लहरें रुक जातीं?

क्या हिंद महासागर

अपनी नमकीन स्मृति भूल जाता?


भारत

कोई खोया हुआ द्वीप नहीं था

वह मसालों की ख़ुशबू में,

सदियों पुराने व्यापार में,

काफ़िलों की धूल में

पहले से दर्ज था।


खोज

अक्सर खोजी की नहीं होती,

नज़र की होती है।


किसी ने समुद्र के पार से देखा

और कहा— “मिल गया।”

किसी ने तट पर खड़े होकर सोचा—

“हम तो यहीं थे।”


अगर वह न होता,

कोई और होता

क्योंकि हवाएँ

दिशाओं की साज़िश रचती रहती हैं।


पर सवाल यह नहीं

कि कौन पहुँचा;

सवाल यह है

किसने किसे खोजा?


समुद्र ने यूरोप को बदला,

या भारत ने समुद्र को?


इतिहास एक लेंस है

जिस ओर मोड़ दो,

वहीं से शुरुआत दिखती है।


पर सच शायद यह है

धरती गोल है,

और रास्ते अनंत।

कोई न कोई

किसी न किसी दिन

इन तटों तक आता ही।


भारत

किसी कम्पास की सुई नहीं था

जो किसी एक हाथ से तय होता;

वह तो सदियों से

खुद एक दिशा था।


तो अगर वास्को डी गामा न होता

तो भी

लहरें चलतीं,

पालें खुलतीं,

और कोई और नाव

कहती

“हमने खोज लिया।”


जबकि

धरती चुपचाप मुस्कुराती—

“मैं तो पहले से यहाँ थी।”


मुकेश ,,,,,,,,,

धुएँ के पार की मुलाक़ात

 धुएँ के पार की मुलाक़ात

(यमघण्ट : एक प्रेमी का आर्तनाद )


चिता की अंतिम लपट

जब आकाश में एक रेखा बनकर बुझी,

धुआँ देर तक ठहरा रहा

जैसे किसी अधूरी बात का

आख़िरी वाक्य।


लोग लौट गए,

रात अपनी स्याही बिछाकर बैठ गई,

पर धुएँ के पार

एक सूक्ष्म प्रदेश खुला

जहाँ न आँसू थे, न शब्द।


मैंने आँखें बंद कीं,

तो लगा

कि दृश्य स्पष्ट हो गया है।


वह वहीं थी

न देह में, न छाया में,

पर एक उजले कंपन की तरह।

धुएँ की परतें

अब दीवार नहीं रहीं,

वे तो एक परदा थीं

जिसे हटाना भर था।


कहते हैं,

मृत्यु अंतिम मिलन को रोक देती है;

पर उस रात समझ आया—

वह मिलन को गहरा करती है।


धुएँ के पार

न कोई औपचारिकता थी,

न कोई विदाई।

बस दो चेतनाएँ

एक-दूसरे की पहचान में स्थिर।


वह बोली नहीं,

पर अर्थ उतरता गया

“मैं रूप बदल रही हूँ,

तुम शोक मत बदलो।”


उसके शब्द

ध्वनि नहीं थे,

प्रकाश थे।


मैंने पूछा—

“क्या फिर मिलोगी?”

और उत्तर आया

“जब भी धुआँ उठेगा,

तुम्हें परदा समझना,

अंत नहीं।”


पीपल की पत्तियाँ

उस क्षण एक साथ काँपीं,

जैसे किसी अदृश्य स्पर्श ने

उन्हें छुआ हो।

दीप की लौ

सीधी हो गई—

मानो दिशा मिल गई हो।


धुएँ के पार की मुलाक़ात

क्षणिक नहीं थी;

वह चेतना का विस्तार थी।

जहाँ देह की सीमाएँ

घुल जाती हैं,

और स्मृति एक उजली राह बन जाती है।


अब जब भी कहीं

राख से धुआँ उठता देखता हूँ,

मैं उसे अंत नहीं मानता।

मैं जानता हूँ

उस पार

कोई प्रतीक्षा कर रहा है,

कोई मुस्कुरा रहा है,

कोई कह रहा है


“मिलन कभी रुकता नहीं,

बस रूप बदलता है।”


और तब

धुआँ

मुझे भय नहीं देता—

वह एक आमंत्रण लगता है,

उस प्रदेश का

जहाँ हर विदाई

एक अगली मुलाक़ात की भूमिका होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

राख के बाद की रोशनी

 राख के बाद की रोशनी

(यमघण्ट एक प्रेमी का आर्तनाद )

जब अग्नि अपने अंतिम अक्षर तक जल चुकी,

और लकड़ियों की देह

धीरे-धीरे धूसर में बदल गई,

तब लगा—

सब कुछ समाप्त हो गया।


पर राख के भीतर

एक महीन-सी तपिश बची रही,

जैसे स्मृति का अंतिम स्पर्श

अभी भी पृथ्वी से चिपका हो।


पीपल की छाया लंबी थी उस शाम,

और हवा में धुएँ का स्वाद।

लोग लौट गए—

शोक को अपने-अपने घरों में बाँटते हुए।

पर श्मशान की निस्तब्धता में

कुछ शेष रह गया।


वह रोशनी थी

जो अग्नि से अलग हो चुकी थी,

पर अग्नि की नहीं रही।


दीप की लौ में

उसका सूक्ष्म अंश काँप रहा था।

जल की मटिया के पास

एक चमक उतर आई थी—

जैसे कोई अदृश्य उपस्थिति

अपने नए रूप में ठहर गई हो।


राख का स्वभाव है

धरती में मिल जाना;

रोशनी का स्वभाव है

आकाश की ओर उठना।

और मृत्यु—

इन दोनों के बीच का सेतु है।


मैंने देखा,

राख को उँगलियों से छूते ही

एक उजास भीतर उतर आया

न आँखों से दिखने वाला,

न शब्दों में बाँधने योग्य।


शायद यही आत्मा की चाल है

वह जलकर भी बुझती नहीं,

वह बिखरकर भी खोती नहीं।

वह रूप बदलती है,

जैसे संध्या रात में,

और रात किसी भोर में।


राख के बाद की रोशनी

किसी दीप में नहीं बसती,

वह स्मृति में घर करती है।

वह हर उस क्षण में चमकती है

जब कोई नाम अचानक

हृदय में उजाला कर दे।


लोग कहते हैं

“सब भस्म हो गया।”

पर मैं जानता हूँ—

भस्म होना अंत नहीं,

एक परिष्कार है।


राख में दबी हुई

वह अंतिम चिनगारी

समय पाकर

किसी नई आँख की चमक बनेगी,

किसी अनजान मुस्कान की रेखा,

या किसी और जीवन की पहली साँस।


और तब समझ आएगा

अग्नि ने जो लिया,

उससे अधिक लौटा दिया।


क्योंकि राख के बाद

जो रोशनी जन्म लेती है,

वह केवल प्रकाश नहीं—

वह प्रमाण है

कि परिवर्तन ही शाश्वत है,

और प्रेम—

अग्नि से भी अधिक दीर्घजीवी।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

यमघंट : समय के कंठ पर टँगी ध्वनि

 यमघंट : समय के कंठ पर टँगी ध्वनि

(एक शोधात्मक रहस्य-नज़्म)


शमशान की देहरी पर

जहाँ धुआँ आकाश से संवाद करता है,

वहीं कहीं अदृश्य-सा

एक यमघंट टँगा है—

न लोहे का, न पीतल का,

बल्कि समय के कंठ से ढला हुआ।


लोकमान्यता कहती है

जब किसी देह की अंतिम अग्नि शांत होती है,

एक सूक्ष्म ध्वनि उठती है,

जो कानों से नहीं,

कर्मों से सुनी जाती है।


उसी को शायद यमघंट कहते हैं।


यह घंटा किसी मंदिर में नहीं बजता,

न किसी हाथ से झूलता है;

यह तो जीवन के प्रत्येक क्षण में

धीरे-धीरे आकार लेता है

हर निर्णय एक परत,

हर इच्छा एक कंपन।


गरुड़ की छाया-सा

काल इसके ऊपर मँडराता है,

और जब नियति पूर्ण होती है,

तो एक अनसुना नाद

अंतरिक्ष में फैल जाता है।


शोध कहता है

ध्वनि कभी नष्ट नहीं होती;

वह तरंग बनकर

ब्रह्मांड में सुरक्षित रहती है।

तो क्या यह संभव है

कि यमघंट का नाद भी

किसी अदृश्य आकाश-गर्भ में

संचित रहता हो?


पीपल की पत्तियों में

जब बिना हवा के कंपन होता है,

या दीप की लौ

अचानक लंबी होकर काँप उठती है—

क्या वह उसी नाद का प्रतिध्वनन है?


यमघंट भय का प्रतीक नहीं;

वह स्मरण का संकेत है

कि हर श्वास

एक गिनती में जुड़ रही है।


उसकी ध्वनि

न्याय भी है,

मुक्ति भी।


कभी वह कठोर लगती है

जैसे समय का आदेश;

कभी करुण—

जैसे थकी हुई आत्मा को विश्राम का निमंत्रण।


मैं सोचता हूँ—

क्या वह घंटा बाहर बजता है,

या भीतर?


जब हृदय अचानक

किसी अकारण पीड़ा से भर उठता है,

जब रात के तीसरे पहर

एक अज्ञात बेचैनी जगती है

क्या वह उसी यमघंट की

पूर्व-ध्वनि है?


लोक-विश्वास इसे यम का आह्वान मानता है;

पर शोध कहता है—

यह तो चेतना का रूपांतरण है,

जहाँ देह का अध्याय पूर्ण होता है

और रूह का नया पृष्ठ खुलता है।


यमघंट की ध्वनि

विनाश का उद्घोष नहीं,

संक्रमण का मंत्र है।


वह कहती है

“जो जन्मा है, वह बदलेगा;

जो बदलेगा, वह फिर जन्म लेगा।”


और इस प्रकार

हर मृत्यु

एक ध्वनि बनकर

अनंत में घुल जाती है

यमघंट के नाद की तरह—


धीमी,

पर शाश्वत।


मुकेश ,,,,,,,,

मटिया में जल, स्मृति में अग्नि

 मटिया में जल, स्मृति में अग्नि

(पीपल पे बंधे यमघण्ट - एक प्रेमी का आर्तनाद )


पीपल के तने से बँधी दो मटियाएँ—

एक में जल,

दूसरी में काँपती हुई लौ।

धरती और आकाश के बीच

टँगा हुआ यह छोटा-सा ब्रह्मांड

शोक की भाषा में बोलता है।


जल स्थिर दिखता है,

पर उसकी गहराई में

चेहरों की परछाइयाँ उतरती-उतराती रहती हैं।

कभी लगता है

जैसे कोई अदृश्य होंठ

उसकी सतह को छूकर गुज़रे हों।


और उस दूसरी मटिया में

अग्नि—

धीमी, पर अडिग।

वह राख की स्मृति से जन्मी है,

और राख में ही

अपना अर्थ खोजती है।


कहते हैं,

जल तृष्णा के लिए है,

अग्नि प्रकाश के लिए।

पर मैं जानता हूँ—

जल देह की प्यास बुझाता है,

अग्नि स्मृति की।


जब हवा चलती है,

दीप काँपता है—

जैसे कोई नाम भीतर से पुकारा गया हो।

और जल में उठती है एक लहर,

मानो उत्तर में कोई स्वीकृति दी गई हो।


यह केवल लोक-रीति नहीं,

यह जीवन और मृत्यु का संवाद है।

एक मटिया कहती है—

“जो गया, वह लौटे तो तृप्त हो।”

दूसरी कहती है—

“जो शेष हैं, वे अंधेरे में न खो जाएँ।”


रात के तीसरे पहर

जब सब ध्वनियाँ थम जाती हैं,

मैं देखता हूँ—

अग्नि लंबी होकर

जैसे अतीत को छूना चाहती हो,

और जल की सतह पर

किसी स्मृति की परत चमकती है।


मटिया में जल है—

पर स्मृति में अग्नि।

वह अग्नि जो बुझती नहीं,

केवल रूप बदलती है।


वही अग्नि

कभी प्रेम बनकर धधकती है,

कभी विरह बनकर सुलगती है,

और कभी प्रार्थना बनकर

आँखों में आ जाती है।


पीपल की जड़ों में

राख मिली हुई है,

शाख़ों में हवा गाती है—

और इन दोनों के बीच

जल और अग्नि

एक संतुलन साधे खड़े हैं।


शायद यही जीवन का रहस्य है—

तृष्णा और तप,

शीतलता और दाह,

विरह और आलोक।


जब तक मटिया में जल है

और स्मृति में अग्नि,

तब तक मृत्यु

अंत नहीं,

एक रूपांतरण है—

जहाँ प्यास भी पवित्र है

और दाह भी दीप बन जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

पत्तों की फुसफुसाहट में लौटती आवाज़

 पत्तों की फुसफुसाहट में लौटती आवाज़

(पीपल पे बंधे यमघण्ट - एक प्रेमी का आर्तनाद )


रात की देह पर

जब चाँद अपनी धुँधली रेखा खींचता है,

पीपल की शाख़ें

एक गुप्त लिपि में काँपने लगती हैं।


कोई हवा नहीं चलती,

फिर भी पत्ते बोलते हैं—

धीरे, बहुत धीरे—

जैसे किसी गर्भित रहस्य की साँस।


मैं सुनता हूँ।

और सुनते हुए

अपने भीतर उतरता जाता हूँ।


वह आवाज़

जो कभी इस देह के पास बैठती थी,

आज वृक्ष की ऊँचाइयों से उतरती है—

टूटी हुई नहीं,

पर बदली हुई।


कहते हैं,

रूहें विलीन नहीं होतीं,

वे रूप बदलती हैं—

जैसे जल

बादल बनकर लौटे,

और बादल

वर्षा होकर फिर धरती को छुए।


शायद वही चक्र

इन पत्तों में धड़कता है।


हर फुसफुसाहट

एक बीज है—

जिसमें कोई पुरानी स्मृति

नए शरीर की तलाश में है।


कभी लगता है

यह सिर्फ़ विरह की प्रतिध्वनि है;

पर कभी—

एक अनजाना शिशु

कहीं दूर जन्म लेता होगा

उसी क्षण

जब पत्ते एक साथ काँप उठते हैं।


दीप की लौ अचानक लंबी हो जाती है,

जैसे किसी अदृश्य श्वास ने

उसे छुआ हो।

जल की मटिया में

सूक्ष्म-सी लहर उठती है—

और मैं समझ जाता हूँ

कि यह सिर्फ़ स्मरण नहीं,

संकेत है।


पुनर्जन्म

किसी शोर में नहीं आता—

वह इसी तरह लौटता है,

एक हल्की ध्वनि बनकर,

जो पहले वृक्ष में बसती है,

फिर वायु में,

फिर किसी शिशु की पहली रोने की धुन में।


क्या पता—

जो आवाज़ आज पत्तों में है,

वह कल किसी आँख की चमक हो,

किसी अनजान मुस्कान की रेखा,

या किसी अपरिचित स्वर का कंपन।


मैं तने से पीठ टिकाकर

आकाश को देखता हूँ।

तारे स्थिर हैं,

पर भीतर एक चक्र घूमता है—

जन्म, मृत्यु, और फिर जन्म।


पत्तों की फुसफुसाहट

अब भय नहीं जगाती;

वह आश्वस्त करती है—

कि जो गया,

वह शून्य नहीं हुआ।


वह लौटेगा—

किसी नए नाम में,

किसी नए स्पर्श में,

पर पहचान वही होगी—

जो आज इन पत्तों की रहस्यमयी भाषा में

मुझसे बात कर रही है।


और मैं प्रतीक्षा करूँगा—

उस क्षण की

जब यह आवाज़

फिर से देह धारण करेगी,

और मैं कह सकूँगा—

“मैंने तुम्हें पहले भी सुना है…

पीपल की फुसफुसाहट में।”


मुकेश ,,,,,,,,,

जब मुझे भी पीपल पर टाँग दिया जाएगा

 जब मुझे भी पीपल पर टाँग दिया जाएगा


जब मैं भी

दाह की राख से हल्का होकर

नाम की आख़िरी ध्वनि छोड़ दूँगा,

और शुद्धि तक

पीपल के तने पर

घण्टे की तरह टाँग दिया जाऊँगा


एक मटिया में जल होगा,

दूसरी में काँपता दीप,

और लोग कहेंगे—

“आत्मा आती है यहाँ,

प्यास बुझाने,

अँधेरे से राह पूछने।”


तब भी

क्या तुम आओगी?


हवा जब पत्तों को हिलाएगी,

और घण्टे-सा मेरा स्मरण

धीमे-धीमे बज उठेगा,

क्या तुम पहचानोगी

उस नाद में अपना नाम?


मैं जल की सतह पर

एक हल्की-सी लहर बनूँगा,

दीप की लौ में

एक क्षणिक ऊष्मा

बस इतना संकेत

कि प्रेम देह से नहीं बँधता।


लोग लौट जाएँगे,

विधि पूरी होगी,

मटियाएँ उतार ली जाएँगी—

पर मैं?


मैं उस पीपल की जड़ों में

तुम्हारे पदचिह्न खोजूँगा,

उसकी छाया में

तुम्हारी साँस का अक्स।


अगर सच है

कि आत्मा शुद्धि तक भटकती है,

तो मेरी भटकन

सिर्फ़ तुम्हारी ओर होगी।


और यदि कुछ भी सच नहीं

न आत्मा, न आना-जाना—

तो भी प्रेम का नाद

किसी घण्टे की तरह

तुम्हारे भीतर बजेगा।


जब मुझे

पीपल के तने पर

घण्टे-सा टाँग दिया जाएगा,

तब भी

मैं तुम्हें ही पुकारूँगा


जल में,

दीप में,

हवा की हर कंपन में।


क्योंकि मृत्यु

सिर्फ़ देह को उतारती है,

प्रेम को नहीं।


और यदि कभी

संध्या के धुँधलके में

तुम्हें लगे

कि बिना छुए

किसी ने तुम्हारा नाम लिया है

समझ लेना,


मैं अभी भी

पीपल के नीचे

तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ।


मुकेश ,,,,

रात का रहस्य

 रात का रहस्य


काली रात की तहों में

एक अनदेखा रास्ता खुलता है

न धरती का,

न आकाश का,

बस दिल की किसी भीतरी दरार का।


चाँद आज पूरा नहीं,

पर उसकी अधूरी रोशनी

जैसे किसी गुप्त संकेत की तरह

पानी पर काँप रही है।


मैं चलता हूँ

रेत पर नहीं,

अपनी ही परछाइयों पर।

हर कदम के साथ

पीछे छूटती है

एक पुरानी पहचान।


दूर कोई दीप नहीं जलता,

फिर भी दिशा साफ़ है;

जैसे किसी ने

बिना दिखे

मुझे पुकारा हो।


हवा में नमक नहीं,

एक अजीब-सी ख़ुशबू है

याद और प्रतीक्षा के बीच की।


मैं दरवाज़े तक नहीं पहुँचता,

दरवाज़ा मेरे भीतर खुलता है।

कोई दस्तक नहीं देता,

फिर भी

किसी की आहट

रगों में उतर आती है।


और अचानक

वक़्त ठहर जाता है।

न रात आगे बढ़ती है,

न साँस पीछे लौटती है।


उस अँधेरे में

कोई चेहरा साफ़ नहीं दिखता,

सिर्फ़ आँखों की दो हल्की लौ

जैसे ब्रह्मांड की पहली चिंगारी।


वो कुछ कहती नहीं,

पर सन्नाटा बदल जाता है;

दीवारें गहरी हो जाती हैं,

और दूरी

अपने अर्थ खो देती है।


मैं समझता हूँ

यह मिलन बाहर का नहीं,

रूह के किसी बंद कक्ष का है,

जहाँ नाम, शरीर, पहचान

सब उतर जाते हैं।


और जब सुबह की पहली रेखा

क्षितिज पर उगती है,

तो मैं वहीं खड़ा होता हूँ

पर वैसा नहीं रहता।


क्योंकि कुछ रातें

सिर्फ़ बीतती नहीं,

आदमी को बदल देती हैं।


और कुछ मुलाक़ातें

इतनी रहस्यमय होती हैं

कि उन्हें बयान करना

उनका अपमान है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

निगाह-ए-ख़ामोश का सर्र-ए-इश्क़

 निगाह-ए-ख़ामोश का सर्र-ए-इश्क़ 

(मौन दृष्टि का प्रेम-रहस्य)


जब वो ख़ामोश निगाहों से देखती है,

तो फ़लक अपनी रौशनी समेट कर

उसकी आँखों में उतर आता है।

न कोई सदा, न कोई सरगोशी

बस एक सुकूत,

जिसमें क़ायनात की धड़कन सुनाई देती है।


उसकी नज़र,

जैसे किसी दरवेश की दुआ,

बे-आवाज़ मेरे वजूद पर उतरती है

और मैं

अपने ही अंदर

एक और आलम की दहलीज़ पा लेता हूँ।


वो कुछ कहती नहीं,

मगर उसकी पलकों की हर जुंबिश

आयत-ए-मोहब्बत बन जाती है;

उसकी ख़ामोशी में

रब का कोई सर्र छुपा होता है

जो सिर्फ़ दिल की ज़बान समझती है।


जब उसकी निगाह ठहरती है,

तो वक़्त सज्दा करता है;

लम्हे तस्बीह की मानिंद

एक-एक कर गिरते हैं,

और रूह

अपने जिस्म की क़ैद भूल जाती है।


मैंने देखा है

उसकी आँखों में

शब-ए-तारीक भी नूर बन जाती है;

और दिल का हर ज़ख़्म

ज़िक्र में बदल जाता है।


वो देखती है

तो ऐसा लगता है

जैसे मैं नहीं रहा,

बस एक एहसास है

जो उसके और मेरे दरमियान

बे-नाम सफ़र करता है।


उसकी निगाह

इश्क़ नहीं, इबादत है;

रूह का वो मुक़ाम

जहाँ अल्फ़ाज़ गुम हो जाते हैं

और सिर्फ़ यक़ीन बाक़ी रहता है।


अगर कभी

तुमने किसी को

ख़ामोशी में दुआ देते देखा हो

तो समझ लेना,

वो उसकी आँखों का असर था।


क्योंकि कुछ नज़रें

दीदार नहीं करतीं

फ़ना कर देती हैं।


और जो एक बार

उस फ़ना में उतर जाए,

वो फिर

अपने होने का दावा नहीं करता

बस इश्क़ का राज़

सीने में लिए

ख़ामोश मुस्कुराता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

उसके नाम के बिना

 उसके नाम के बिना


बहुत बरस नहीं हुए,

बस एक मौसम पहले की बात है

जब मेरी दुनिया में

एक नीली-सी रोशनी उतरी थी।


मैं उसका नाम

काग़ज़ पर नहीं लिख पाऊँगा,

स्याही काँप जाएगी,

लफ़्ज़ ठिठक जाएँगे

पर वह समझ जाएगी

कि यह उसी के लिए है।


वह ऐसे आती थी

जैसे शाम की पहली ठंडी हवा

थके हुए दिन को छू ले;

जैसे किसी पुराने राग में

अचानक एक सच्चा सुर लग जाए।


हमने कभी कहा नहीं

“हम एक-दूसरे के हैं।”

पर हमारी चुप्पियाँ

एक-दूसरे की भाषा जानती थीं।

भीड़ में भी

हमारी नज़रें

एक ही रास्ता चुन लेती थीं।


लोग कहते हैं

समय सब बहा ले जाता है।

पर समय क्या जाने

उन पलों का वज़न

जो दिल की तहों में

पत्थर की लकीर बन जाते हैं।


एक दिन

हवा ने रुख बदल लिया,

और हालात की ठंड

हमारे दरमियान आ बसी।

वह चली गई—

जैसे लहर किनारे से लौट जाती है,

पर अपने निशान

रेत में छोड़ जाती है।


अब भी जब चाँद

कुछ ज़्यादा सफ़ेद लगता है,

जब रात थोड़ी ज़्यादा गहरी हो जाती है,

तो मुझे लगता है

वह यहीं कहीं है।


मैं उसका नाम

ज़ोर से नहीं पुकारता,

पर हर धड़कन में

एक अनसुना संबोधन है।


न ऊपर का आसमान,

न नीचे की ज़मीन,

न दूरियाँ, न चुप्पियाँ

कुछ भी अलग नहीं कर पाया

उस एहसास को

जो बिना नाम के भी

पूरा है।


कभी-कभी

मैं अपने भीतर के समुद्र किनारे जाता हूँ,

जहाँ लहरें

कोई अक्षर नहीं लिखतीं

सिर्फ़ एक आहट छोड़ जाती हैं।


और वह,

अगर यह पढ़ेगी

तो मुस्कुराकर कहेगी,

“नाम नहीं लिखा,

फिर भी सब कह दिया।”


क्योंकि कुछ प्रेम

काग़ज़ पर नहीं,

पहचान में लिखे जाते हैं।


और उसे

अपनी पहचान

मुझसे पूछने की ज़रूरत नहीं।


मुकेश ,,,,,,,,,,

तुम्हारी गली से गुज़रना

 तुम्हारी गली से गुज़रना


तुम्हारी गली से गुज़रना भी

मेरे लिए

सुकून लिए होता है।


जैसे किसी भीड़-भरी दुनिया में

अचानक

एक परिचित ख़ामोशी मिल जाए।


मैं जानता हूँ

तुम खिड़की पर नहीं होगी हर बार,

पर हवा में तुम्हारी आहट रहती है।

दीवारों पर धूप का रंग

कुछ और नरम हो जाता है।


उस मोड़ पर आते ही

कदम अपने-आप धीमे पड़ जाते हैं

मानो सड़क भी चाहती हो

कि मैं थोड़ा और ठहरूँ।


तुम्हारे दरवाज़े के पास से गुज़रते हुए

दिल की धड़कन

बिना वजह सलीके से चलने लगती है,

जैसे उसे मालूम हो

कि यह इलाक़ा तुम्हारा है।


कोई नाम पुकारे न पुकारे,

कोई पर्दा हिले न हिले,

फिर भी

एक अनकहा-सा सलाम

हम दोनों के बीच

आ-जा चुका होता है।


तुम्हारी गली से गुज़रना

मिलना नहीं है,

पर बिछड़ना भी नहीं।


यह बस इतना-सा एहसास है

कि इस शहर में

एक जगह ऐसी है

जहाँ से होकर निकलूँ

तो दिल

थोड़ा हल्का हो जाता है


मुकेश ,,,,,,,,,,,