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चिंतन — अध्याय–25 : साक्षी क्या है? — भाग–6 : बौद्ध, जैन और कश्मीर शैव दर्शन में साक्षी

  चिंतन — अध्याय –25 : साक्षी क्या है ? — भाग –6 : बौद्ध , जैन और कश्मीर शैव दर्शन में साक्षी अब तक हमने वैदिक , उपनिषदिक तथा आस्तिक दर्शनों की दृष्टि से साक्षी का अध्ययन किया। इन अधिकांश परम्पराओं में किसी न किसी रूप में आत्मा , पुरुष या चेतन ज्ञाता को स्वीकार किया गया है। परन्तु भारतीय दर्शन की समृद्धि इसी में है कि यहाँ ऐसे दर्शन भी हैं जो आत्मा की पारम्परिक अवधारणा को स्वीकार नहीं करते , फिर भी चेतना , अनुभव और निरीक्षण की अत्यन्त सूक्ष्म व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। विशेष रूप से — बौद्ध दर्शन स्थायी आत्मा का निषेध करता है। जैन दर्शन अनन्त जीवात्माओं को स्वीकार करता है। कश्मीर शैव दर्शन सम्पूर्ण जगत को शिव - चेतना की अभिव्यक्ति मानता है। तीनों दर्शनों के निष्कर्ष भिन्न हैं , किन्तु तीनों एक ही मूल प्रश्न का उत्तर खोजते हैं — क्या अनुभव के पीछे कोई स्थायी साक्षी है ? बौद्ध दर्शन में साक्षी का प्रश्न यदि किसी भारतीय दर्शन ने " साक...

चिंतन — अध्याय–25 : साक्षी क्या है? — भाग–5 : सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक और मीमांसा की दृष्टि से साक्षी

  चिंतन — अध्याय –25 : साक्षी क्या है ? — भाग –5 : सांख्य , योग , न्याय , वैशेषिक और मीमांसा की दृष्टि से साक्षी अब तक हमने वेद , उपनिषद तथा वेदान्त की विभिन्न परम्पराओं में साक्षी की अवधारणा का अध्ययन किया। किन्तु भारतीय दर्शन का क्षेत्र इससे कहीं अधिक व्यापक है। सांख्य , योग , न्याय , वैशेषिक और पूर्वमीमांसा — इन पाँच दर्शनों ने भी आत्मा , चेतना , ज्ञान और अनुभव पर अत्यन्त सूक्ष्म चिन्तन किया है। इन दर्शनों में अधिकांश स्थानों पर " साक्षी " शब्द उतनी प्रमुखता से प्रयुक्त नहीं होता जितना अद्वैत वेदान्त में , किन्तु द्रष्टा , पुरुष , आत्मा , ज्ञाता और चेतन सत्ता जैसे विचार उसी मूल प्रश्न के विभिन्न उत्तर प्रस्तुत करते हैं — जो जानता है , वह कौन है ? इन दर्शनों की विशेषता यह है कि ये अनुभव , तर्क , साधना और ज्ञान के भिन्न - भिन्न मार्गों से इस प्रश्न का समाधान खोजते हैं। सांख्य दर्शन में साक्षी — पुरुष ही द्रष्टा है सांख्य दर्शन के प्रवर्तक महर्षि क...