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Showing posts from May, 2012

सुबह का आँचल मैला देखा

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बैठे ठाले की तरंग -------------- सुबह का आँचल मैला देखा दिन भी कितना धुंधला देखा रातों को जब घर से निकले चाँद को  हमने  तन्हा  देखा गुलशन में भी घूम के आये हिज्र का मौसम फैला  देखा शजर का हर पत्ता जला हुआ   सूरज  आग  का  गोला  देखा आखों मे हरदम बहता दरिया दिल   के  अन्दर  शोला  देखा मुकेश इलाहाबादी ------------

आखों में कुछ शोले -दिल में तूफां डाल दो

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बैठे ठाले की तरंग ---------------------- आखों में कुछ शोले -दिल में तूफां डाल दो लहू  बन  गया  आब थोडा तेज़ाब डाल दो! मुकेश इलाहाबादी ----------------------

काली है रात तो क्या ?

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बैठे ठाले की तरंग --------------- (किसी काली - बरसती - पहाडी रात की ख़ूबसूरती से अभिभूत हो के ये पंक्तियाँ खुद ब खुद उतरी हैं - हो सकता है आप लोगों को पसंद आये -) काली है रात तो क्या ? गीत गाओ - सुमधुर अबोली है रात सांवली कुछ तो बतियाओ - सुमधुर पर्वतों से है उतरती काली उर्वशी देह चन्दन मन कुसुम है रात श्यामला उर्वशी ------ काली है रात तो क्या ? गीत गाओ सुमधुर प्रेम पाप पुण्य की वर्जनाओं में कब बंधा ? - सुमधुर फुसफुसाहटें बन जाएँ होंठ ये रात काली - सुमधुर उर्वशी के उच्छ्वास से बन जाए गीत सुमधुर नीद में पक्षी हैं - युगन्बद्ध गीत गाओ - सुमधुर रात श्यामली - उत्तुंग उरोज प्यासे हैं होंठ बरसो रे मेघ - सुमधुर काली हैं रात तो क्या ? गीत गाओ - सुमधुर   -   मुकेश इलाहाबादी ----------------

एक दिन कच्ची धुप का छोटा चकत्ता

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बैठे ठाले की तरंग ------------------- एक दिन कच्ची धुप का छोटा चकत्ता खिल आया मेरे आँगन मे तेरे आँगन मे तुम मुस्कुराईं अपने आँगन मे मै हंसा  अपने आँगन मे, दुसरे दिन कुछ बड़ा होकर फिर खिला धुप का वो छोटा चकत्ता मेरे आँगन मे तेरे आँगन मे धीरे धीरे बन गयी आदत - उस चकत्ते की खिलने की खिलखिलाने की कभी मेरे आँगन मे कभी तेरे आँगन मे एक दिन तुमने टांकना चाह उसे अपने आँचल मे तब छिटक कर वह चकत्ता दूर जा लगा दीवार से और तुम ताकती रह गयी अपने रीते आँगन को जब मैंने चाहा भरना बाहों मे उस छोटे चकत्ते को इठला कर दूर जा लगा क्षितिज से और मै देखता रह गया अपने सूने आँगन को और ----- आज भी - हसरत भरी निगाहों से देखता हूँ मै अपने सूने आँगन को तुम अपने रीते आँगन को जब कभी कोई धुप का छोटा चकत्ता खिलता है मेरे आँगन मे तेरे आँगन मे या किसी और के आँगन मे मुकेश इलाहाबादी ------------------

ठस और बेजान दिनों के बीच

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बैठे ठाले की तरंग ------- ठस और बेजान दिनों के बीच हम गुज़र रहे हैं निष्पंद किसी पत्थर सा या कि खौलते उबलते दिनों के बीच पड़े हैं बिना गले बिना पके और फिर ठन्डे हो जायेंगे पत्थर की तरह इन्ही ठस और बेजान दिनों के बीच उबलते और खौलते दिनों के बीच मुकेश इलाहाबादी -----------------

परिंदों के शहर में करूं मै उड़ान की बातें

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बैठे ठाले की तरंग ----------------- परिंदों   के   शहर   में   करूं   मै   उड़ान   की   बातें दोस्तों की महफ़िल में दुनिया ज़हान की बातें यायावरी   में काट दी , अपनी सारी ज़िन्दगी अब क्यूँ   न   करूं   अपने घर   और   मकान   की   बातें बहुत   उदास   उदास है   अपने   शहर   का   मौसम आ   कुछ   देर   छेड़ें   हंसी   और   मुस्कान की बातें यूँ   तो   लड़ने   झगड़ने   की अपनी   फितरत नहीं गर बात आ पड़े तो करूं मै तीरों कमान की बातें इंसान की शिराओं में बह रहा   है बाज़ार चार सूं ग़ज़ल छोड़ क्यूँ न करूं मै नफ़ा नुक्सान की बातें मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

संबंधों के कैक्टस

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बैठे ठाले की तरंग ------------ उग आये हैं दिल के गमले में संबंधों के कैक्टस पानी नहीं रेत उलीचता हूँ फूल नही कांटे उगाता हूँ फूल सा उग के क्या होगा  ? कांटो सा उग के देर तक रहूँगा मुकेश इलाहाबादी -------------

अपनी भी इक दिन कहानी लिखूंगा

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बैठे ठाले की तरंग -------------------- अपनी भी इक दिन कहानी लिखूंगा टीस  है  कितनी  पुरानी - लिखूंगा तफसील से तुम्हारी अदाएं  याद  हैं ली तुमने कब कब अंगड़ाई - लिखूंगा  साए में तुम्हारे गुज़ारे हैं तमाम दिन ज़ुल्फ़ हैं तुम्हारी - अमराई लिखूंगा तपते दिनों में ठंडा ठंडा सा एहसास है  रूह  तुम्हारी रूहानी - लिखूंगा छेड़ छेड़ डालती रही मुहब्बत के रंग है आँचल तुम्हारा - फगुनाई लिखूगा तुलसी का बिरवा, मुहब्बत की बेल स्वर्ग सा तुम्हारा - अंगनाई लिखूंगा मुकेश इलाहाबादी ------------------------

शोर की ज़द में पूरा शहर था

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बैठे ठाले की तरंग -------------- शोर  की  ज़द में  पूरा  शहर था  नींद  मे  वह  सोया  बेखबर  था लोग समझे कि अलाव बुझ चूका अन्दर इक जलता हुआ शरर था नगीनो,सफीनो,नदियों को छुपाकर वह अन्दर अन्दर बहता समंदर था मै मौत के करीब  जा कर बच गया दुआओं  मे  उसके  इतना असर था कभी  तूफां तो कभी धूल के बवंडर ज़िन्दगी का सफ़र, अजब सफ़र था मुकेश इलाहाबादी --------------------

आदतन मै बेवफा नहीं

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बैठे ठाले की तर----------------- आदतन मै बेवफा नहीं             कोइ क्यूँ समझता नहीं वक़्त के साथ बह गया कभी  कुछ  समेटा नहीं वो  मुट्ठी  भर एहसास  भी रिस गए संजोया नहीं इक अंजुरी भर मुस्कान क्यूँ आजतक भूला नहीं मुकेश इलाहाबादी -----------

आज भी रात बहती रही

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बैठे ठाले की तरंग --------- आज भी रात बहती रही रोज़ सी अंधेरी - ठंडी - बेजान जुगनुओं की चमक अंधेरों की साँय साँय और -------------- भयानक सन्नाटे के बीच तैरता रहा ----- निष्पंद बगैर किसी प्रतिरोध बगैर किसी आकांक्षा बगैर किसी आवेश यंहा तक कि , बिना किसी चमकदार सुबह के इंतज़ार में मुकेश इलाहाबादी ------------

दिखी थी खिली धुप की तरह

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बैठे ठाले की तरंग --------- दिखी थी खिली धुप की तरह हंसी थी चटक चांदनी की तरह चली थी उन्मुक्त नदी  की तरह पर, देखा है उसे आज खड़े हुए चुपचाप होठो पे अपनी उंगलियाँ दबाये हुए न जाने किन ख्यालों में गुम सोचता हूँ ये उनकी अदा है या खोए हैं कीन्ही ख्यालों में मुकेश इलाहाबादी ----------------------

जब तुम,

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बैठे ठाले की तरंग --------                                                       जब तुम, झटकती हो - गेसू बिखरती है, सुगंध और बहती है बयार जब तुम, लगाती हो - भाल बिंदु चमकता है, सूरज  और निखरती है रोशनी जब तुम, पहनती हो - पायल बिछलती है, रागनियाँ और बजती है सरगम जब तुम, करती हो- श्रंगार    बन जाती हो धरती और झुकना चाहता है, आकाश तुम्हारे इर्द-गिर्द मुकेश इलाहाबादी ---------------

हम नहीं आते, अब उलाहने न दीजियेगा

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बैठे ठाले की तरंग ------------------------ हम नहीं आते, अब उलाहने न दीजियेगा एक बार शिद्दत से याद कर के देखियागा गर हम न आयें, फिर शिकायत करिएगा मुकेश इलाहाबादी -------------------------

आपकी खामोश आखों में जो ठहरा हुआ समंदर है

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गुस्ताखी माफ़ ---------------- आपकी खामोश आखों में जो ठहरा हुआ समंदर है उसमे एहसासों के न जाने कितने कितने मंज़र हैं डूब जाने दो इक बार इन  नीली गहरी खामोशी में ढूंढ ही लूँगा मुहब्बत के कुंछ अनमोल मोतियों को  मुकेश इलाहाबादी -----------------------

पत्थर पे वसंत

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बैठे ठाले की तरंग ------------ देखना, एक दिन आएगा पत्थर पे वसंत और फूलेगी हथेलियों पे सरसों उग आयेंगे, आकाश में टेसू और गुल्मोहरा के फूल और झरेंगे तुम्हारी आखों से महुआ के फूल जिन्हें सूंघ कर मै,गाऊंगा ताल - बेताल मुकेश इलाहाबादी ---------------

पैगाम ऐ मुहब्बत लाई है हवा

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बैठे ठाले की तरंग ------------- पैगाम  ऐ  मुहब्बत लाई है हवा उसका बदन छू के आयी है हवा   मुकेश इलाहाबादी ------------- -

नज़रें बदल गयी, या नज़ारे बदल गए ?

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बैठे ठाले की तरंग ------------------------ नज़रें बदल गयी, या नज़ारे बदल गए ? चाँद तो वही है, क्या सितारे बदल गए ? गुम  हुआ  घर  अपना ढूंढता  हूँ  यंहा, शहर तो वही है, या फिर रास्ते बदल गए ?  मुकेश इलाहाबादी --------------------------

मुहब्बत बेशर्त होती है

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सुमी,  मुहब्बत बेशर्त होती है. मुहब्बत जब होती है तो बस होती है. जैसे धुप खिली हो, सूरज चमक रहा हो और अचानक बदरिया तन जाए, और सूरज ढक  जाए।  बस ! ऐसे ही मुहब्बत होती है बदरिया सी,,,, बदरिया जब बरसती है, तो खूब बरसती है. बदरिया कभी नहीं देखती कब बरसना है ? कंहा बरसना है ? कितना बरसना है ? कोइ पैरामीटर लेकर नहीं बरसती, बस बरसती है और बरस कर खाली जाती है।  बस !  और फिजां ताज़ा - ताज़ा हो जाती है - धुली -धुली।  बस ऐसी ही मुहब्बत कब हो जाए ? कंहा हो जाए ? किस्से हो जाए पता नहीं।  सच मुहब्बत को कुछ पता नहीं होता।  वह तो बस होती है, और हो जाती है,  बिना शर्त बिना बात।  और सूना है -- जब मुहब्बत होती, रोंवा - रोंवा पुलक से भर जाता है।  मन हुलस - हुलस जाता है।  कदम बहक - बहक जाते हैं।  आखें नशे में डूबी - डूबी रहती हैं।  मुहब्बत को इससे कोइ लेना - देना नहीं रहता वह जिसपे बरस रही है वह गोरा है, काला है, बड़ा है. छोटा है, उंच है, नीच है बस उसे तो होना होता है और अपने महबूब पे प्रेम उडेलना है. उसे दुलराना है, लडियाना है, ब...

मौसम ने अपना मिजाज़ बदला

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बैठे ठाले की तरंग ---------- मौसम ने अपना मिजाज़ बदला इंसानों ने अपना लिबास बदला बादलों की ओट से झांकता है चाँद महताब ने अपना हिजाब बदला मुहब्बत तो मर मिटने का नाम है तुमसे मिलके अपना ख्याल बदला लो आज से फिर बढ़ गयी महंगाई, फिर मेरे घर का सारा हिसाब बदला मुकेश इलाहाबादी --------------------

मुरीद का मतलब जानती हो

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  मेरी मैना,   मुरीद का मतलब जानती हो ? मुरीद का मतलब होता है -- जो मरने के लिये तैयार हो। और मै तुम्हारा मुरीद हूं। जो मरने के लिये तैयार ही नही है बल्कि मर ही गया है। अब तो शरीर के नाम पे ये खोखल बचा है। अगर इसे तुम जिंदगी कहती हो तो बेषक मै जी रहा हूं। पर ये जान लो इस तरह सांस लेते रहने और चलते फिरते रहने भर का नाम जिंदगी नही है। जिंदगी का मतलब है। हंसना खिलखिलाना और बहते रहना किसी पवित्र नदी सा या झरने सा। कलकल करते रहना खुद बहना और दूसरों को जीवन देते रहना। या फिर चमकना किसी चॉद तारे जैसा और बिखर बिखर जाना चॉदनी की तरह चम्पा चमेली की चटाई की तरह। या फिर तितली सा पंख फडफडाते उडते रहना कभी इस गुलषन तो कभी उस गुलषन। या कि किसी पेड या पौधे की डाली पे फूल सा खिलना महकना और मुस्कुराना। या फिर किसी बियाबान जंगल मे या कि किसी बाग मे फिरते रंग बिरंगे मोर सा अपने रंग बिरंगे डैनो को फैलाके मस्त बहारों के संग नाचना नाचना और इस कदर नाचना कि सिर्फ तुम ही नही नाचो तुम्हारे साथ जमाना भी नाचने लग जाये। जहां  नाचने लग जाये और संग संग ये चॉद सितारे भी नाचने लग जायें सारी...

समन्दर का पानी खारा क्यूं होता है ?

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  फिजां, तुम जानती हो ? समन्दर का पानी खारा क्यूं होता है ? तो सुनो -- यह बात आज नही - कल नही-  युगों युगों पुरानी है। जब समाज न था। गांव और शहर न थे। बस्तियां न थी। बस --- पहाड और जंगल की गुफांओं मे आदम और हव्वा रहते थे। उनमे आदम को मुझे और हव्वा को अपने आपको समझो। दोनो उन्ही गुफाओं मे जंगलों मे अपने आदमपन मे खुश  थे आबाद थे। लेकिन एक दिन जब ईष्वर के आदेश  की अवहेलना करके मुहब्ब्त को शेव खा लिया, तब उन्हे यही पेड पहाड और झरने पराये लगने लगे और वे बाहों मे बाहें डाले एक दूजे मे खोये खोये चलने लगे चलने लगे और चलते चलते एक दिन दृ समन्दर के किनारे आ लगे .... हव्वा ने जब एक साथ इतनी अथाह जल राषि देखी तो वह खुषी से किलक उठी -- और वह आदम के साथ उस अथाह जल राषि मे केलिक्रीडा करने लगी। और तब समन्दर का मीठा पानी भी मदहोष हो गया। और उसने धीरे धीरे तुम्हारी खूबसूरती का नमक अपने मे घोल लिया और अपना मीठा पन तुम्हारे मे मिलाता गया। और जानती हो ... सागर तो अपना मीठापन छोड कर खारा हो गया पर तुम्हारी बाते जरुर मीठी हो गयी। और तब से अब तक तु...

अक्शर -----------------------------

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  अक्शर -----------------------------   अक्शर जब कभी मन उदास होता है किन्कर्तव्यविमूढ़   होता है या कि, उहापोह में फंसा होता है या कि, कुछ करने न करने को जी चाहता है या कि उठने और फिर बैठने को जी चाहता है   हथेलिय कोहनी से मुड चेहरे को ढक लेती है उंगलियाँ आखों को, और उड़ने लगता हूँ देश से परदेश तक पूरब से पश्चिम तक इस जंहा से उस जंहा तक यंहा से वंहा तक  कंहा से कंहा तक न जाने कंहा तक तब याद आते हैं  बीते दिन  बीते पल  बिछड़े दोस्त  शहर की सड़के  मोहल्ले की गलियाँ  कालेज  की बेलौस छोरियां गुजरा बचपन माँ की ममता पिता की डांट खाली खटिया गिल्ली डंडा कटी पतंग और इनके साथ याद आता है बहुत कुछ जो गुजर गया है न लौटने के लिए   मुकेश इलाहाबादी ----------------            

मुक्त केश संदल त्वचा

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बैठे ठाले की तरंग ---------------------------- मुक्त केश संदल त्वचा, नेत्र कँवल समान गोरी गजगामिनी चलत, बरसे फूल गुलाब प्रिय के मुख चुम्बन से गाल भयो गुलाल सखी कैसे होली खेलूँ? आवत मुझको लाज मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

पहाड़ और स्नो व्हाइट

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पहाड़ और स्नो व्हाइट 2 1.12.2003 आफिस। मेज-पूरब की तरफ़। खिड़की- पूरब की तरफ़। खिड़की के पार पहाड़ - पूरब की तरफ़। आज भी - खिड़की खुली है। दिवाकर अपने सातों रंग समेट मेज पे पसरा है। पहाड़ खिला है। हरे , भूरे , मटमैले रंगों में अपनी पूरी भव्यता के साथ। रोज़ सा। मानो सातों रंग छिटक दिये गये हों एक एक कर। इंद्रधनुष आसमान से उतर पहाड़ पे पसर गया हो। पहाड़ चुप तो आज भी है। पर है मन ही मन खिला-खिला। आज मौन मैंने ही तोड़ा ’ दोस्त - हर रोज़। शुरू होती है , अन्तहीन यात्रा। सुबह देखे , सपनों के साथ। उम्मीदों के साथ , सपने सच होने के। किन्तु पल-पल वक़्त गुज़रता है। रोशनी बढ़ती जाती है। छिन-छिन सपने धुँधलाते जाते हैं। अँधेरा बढ़ता जाता है। सूरज सिर पे आता है। अँधेरा पूरी तरह फैल जाता है। सपने शून्य में खो जाते हैं। आँखों में सपने नहीं अँधेरा होता है। वक़्त अपनी रफ़तार से बढ़ता जाता है। अंदर का अँधेरा बाहर आने लगता है। सूरज अपनी माँद में छिपता जाता है। अँधेरा अंदर व बाहर दोनों जगह घिरता जाता है। दिन में टूटे सपने फिर जुड़ने लगते हैं...

पहाड़ मेरा दोस्त

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2 3.11.2003 आफिस। मेज के ठीक सामने खिड़की। खिड़की के सामने पहाड़। पहाड़ चुप। मैं चुप। पहाड़ मुझे देखता है। मैं पहाड़ को। पहाड़ अपने आप में गुम। मैं अपने आप में। पहाड़ कुछ कहना चाहता है। नहीं कह पाता। मैं कुछ सुनना चाहता हूँ। नहीं सुन पा रहा। उसकी ज़बान कुछ कहती है। मेरे कान नहीं सुन पाते। पहाड़ की आँखें ख़ामोशी से कुछ गाने लगती हैं। मेरी आँखें सुनने लगती हैं। पहाड़ का ख़ामोश संगीत बरसने लगता है। बारिश खिड़की के अंदर आ चुकी है। मैं पूरी तरह से भीग चुका हूँ। फिर भी ख़ामोश हूँ। ख़ामोशी गीत सुन रही है। पहाड़ गा रहा है। मैं भीग रहा हूँ। भीगते-भीगते गलने लगता हूँ। बूँदे बन गया हूँ। बूँदे पहाड़ पे बरसने लगीं। टप टप टप। झम झम झम। पहाड़ खुश होने लगा। मुस्कुराने लगा। बूँदे सुर्मई रंग में हँसने लगी। मैं मुस्कुराने लगा। पहाड़ ने पहली बार ज़बान खोली। “ देास्त वर्षों से यह ख़ामोश खिड़की देखता हूँ। देखता हूँ खिड़की के पार की मेज। मेज के उस पार की एक जोड़ी आँखें। आँखों के उस पार पहाड़। निचाट नंगी चटटानों का पहाड़। जिसमें कभी कोई झरना नहीं बहता। कोई नदी नाला...