इश्क़ का दूसरा आसमान
इश्क़
सिर्फ़ ज़मीन पर चलने वाला
कोई रिश्ता नहीं
वो तो रूह का
एक दूसरा आसमान है।
जहाँ
लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं पड़ती,
और ख़ामोशियाँ भी
मायने रखने लगती हैं।
वहाँ
दिल किसी को
अपना कहकर बाँधता नहीं—
बस
उसकी मौजूदगी में
एक उजली-सी रौशनी महसूस करता है।
कुछ रूहें
इस आसमान तक पहुँचती हैं,
मगर लौटकर
उसी पुरानी दुनिया में
खो जाती हैं।
और कुछ
उसकी ऊँचाइयों में
इतनी दूर निकल जाती हैं
कि फिर
धरती की छोटी-छोटी बंदिशें
उन्हें छू भी नहीं पातीं।
इश्क़ का यह दूसरा आसमान
हर किसी को नसीब नहीं होता
क्योंकि वहाँ पहुँचने के लिए
दिल को
ख़ुद से भी थोड़ा
आज़ाद होना पड़ता है।
और जब कोई रूह
सचमुच वहाँ पहुँच जाए—
तो उसे समझ आता है
कि मोहब्बत
सिर्फ़ एक एहसास नहीं,
बल्कि
रूह की परवाज़ का
दूसरा आसमान है
मुकेश ,,,,,,