धूप में सूखती भीगी हुई कमीज़
धूप में टंगी
भीगी हुई कमीज़
धीरे-धीरे
हल्की होने लगती है।
हर बूँद
चुपचाप उड़ जाती है
जैसे कोई दुख
बिना आवाज़ के
छूट रहा हो।
कपड़ा वही है,
पर वज़न बदल गया है—
शायद
भीगना ही
उसे सूखना सिखाता है।
मनोविज्ञान कहता है
जो भीतर भीगता है,
वो एक दिन
धूप ढूँढ़ ही लेता है।
और फिर
हम
उसी कमीज़ को पहनकर
फिर से
ज़िंदगी में निकल पड़ते हैं…।