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मीमांसा की व्याख्या-पद्धति : तात्पर्य-निर्णय के सात लक्षण

मीमांसा की व्याख्या-पद्धति : तात्पर्य-निर्णय के सात लक्षण भारतीय मीमांसा दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने किसी भी ग्रन्थ, वाक्य अथवा शास्त्रीय कथन का वास्तविक अभिप्राय (तात्पर्य) ज्ञात करने के लिए अत्यन्त सूक्ष्म और वैज्ञानिक पद्धति विकसित की। यह पद्धति केवल वैदिक वाङ्मय तक सीमित नहीं है, बल्कि किसी भी गम्भीर ग्रन्थ—चाहे वह धार्मिक हो, दार्शनिक, साहित्यिक, विधिक अथवा वैज्ञानिक—की व्याख्या में समान रूप से उपयोगी सिद्ध हो सकती है। मीमांसकों का मत है कि किसी भी ग्रन्थ का अर्थ केवल एक वाक्य पढ़ लेने से निर्धारित नहीं किया जा सकता। उसके उद्देश्य, प्रसंग, पुनरावृत्ति, परिणाम तथा तर्क-संगति का समग्र अध्ययन आवश्यक है। इसी कारण उन्होंने तात्पर्य-निर्णय के सात प्रमुख लक्षण बताए हैं— उपक्रमोपसंहारोऽभ्यासोऽपूर्वता फलम्। अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये॥ अर्थात् उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति —ये सात किसी भी ग्रन्थ के वास्तविक तात्पर्य को समझने के प्रमुख साधन हैं। १. उपक्रम (प्रारम्भ) परिभाषा ग्रन्थ अथवा किसी प्रकरण के आरम्भ में जिस विषय का प्रतिपादन किया ...

चिंतन -क्या त्याग वस्तुओं का नहीं, 'मैं' का होता है?

  चिंतन - क्या त्याग वस्तुओं का नहीं, 'मैं' का होता है? त्याग शब्द सुनते ही मन में एक संन्यासी की छवि उभरती है—हाथ में कमंडल, शरीर पर गेरुए वस्त्र और संसार से दूर किसी वन की निस्तब्धता। हमें लगता है कि त्याग का अर्थ है घर छोड़ देना, धन छोड़ देना, संबंध छोड़ देना। परंतु क्या त्याग इतना ही है? तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या त्याग वस्तुओं का नहीं, 'मैं' का होता है? वस्तुएँ छोड़ देना सरल है। उनका स्मरण छोड़ देना कठिन है। घर छोड़ देना संभव है। पर घर का अहंकार छोड़ देना दुर्लभ है। धन का त्याग किया जा सकता है। पर "मैं त्यागी हूँ"—इस भाव का त्याग करना कहीं अधिक कठिन है। यहीं से त्याग का वास्तविक दर्शन आरंभ होता है। मुझे लगता है कि वस्तुएँ मनुष्य को उतना नहीं बाँधतीं, जितना उनसे जुड़ा हुआ 'मेरा' बाँधता है। घर समस्या नहीं है। "मेरा घर" —यह आग्रह समस्या बन जाता है। ज्ञान बाधा नहीं है। "मेरा ज्ञान" —यह अहंकार बाधा बन जाता है। धर्म भी बंधन नहीं है। "केवल मेरा धर्म ही सत्य है" —यह आग्रह बंधन बन जाता है। वस्तुएँ बाहर रहती है...

चिंतन - क्या साक्षी होना जीवन की सबसे कठिन साधना है?

  चिंतन -  क्या साक्षी होना जीवन की सबसे कठिन साधना है? मनुष्य जीवन भर कुछ-न-कुछ बनना चाहता है। कभी सफल। कभी प्रसिद्ध। कभी विजेता। कभी ज्ञानी। पर भारतीय दर्शन एक ऐसा मार्ग भी दिखाता है, जहाँ मनुष्य को कुछ बनने की नहीं, केवल देखने की साधना करनी होती है। तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या साक्षी होना जीवन की सबसे कठिन साधना है? देखना बहुत सरल लगता है। पर वास्तव में देखना अत्यंत कठिन है। हम वस्तुओं को नहीं देखते। हम उनके बारे में अपनी धारणाओं को देखते हैं। हम मनुष्यों को नहीं देखते। हम उनसे जुड़ी अपनी अपेक्षाओं को देखते हैं। हम घटनाओं को नहीं देखते। हम अपने लाभ और हानि के चश्मे से उन्हें देखते हैं। यही कारण है कि हमारी दृष्टि प्रायः साक्षी नहीं बन पाती। वह पक्ष बन जाती है। साक्षी का अर्थ उदासीन होना नहीं है। उदासीन व्यक्ति दूर चला जाता है। साक्षी उपस्थित रहता है। वह सब देखता है। सब समझता है। पर भीतर से बँधता नहीं। कमल जल में रहता है, पर जल उसे भिगो नहीं पाता। आकाश बादलों को स्थान देता है, पर किसी बादल का रंग अपना नहीं बनाता। सूर्य हर दिशा में समान प्रकाश देता है, पर किसी...

चिंतन - क्या कर्म, कर्ता और भोक्ता तीन नहीं, एक ही यात्रा के तीन पड़ाव हैं?

  चिंतन -  क्या कर्म, कर्ता और भोक्ता तीन नहीं, एक ही यात्रा के तीन पड़ाव हैं? मनुष्य जब जीवन को देखता है, तो उसे लगता है कि वह कर्म कर रहा है। जब वह स्वयं को देखता है, तो उसे कर्ता होने का अनुभव होता है। और जब कर्म का फल सामने आता है, तब वह स्वयं को भोक्ता मानने लगता है। यहीं से दर्शन का एक प्राचीन प्रश्न जन्म लेता है— क्या कर्म, कर्ता और भोक्ता वास्तव में तीन अलग-अलग सत्य हैं, या एक ही चेतना की तीन अवस्थाएँ? कर्म वह नहीं जो केवल हाथ करते हैं। विचार भी कर्म हैं। वाणी भी कर्म है। मौन भी कर्म है। यहाँ तक कि किसी अवसर पर कुछ न करना भी एक प्रकार का कर्म है। मनुष्य एक क्षण भी कर्म से बाहर नहीं रह सकता। जैसे अग्नि का स्वभाव जलाना है, वैसे ही जीवन का स्वभाव कर्म करना है। पर कर्म अपने आप नहीं होता। उसके पीछे एक भाव होता है। वही भाव कर्ता को जन्म देता है। जब मनुष्य कहता है— "मैंने किया।" तभी कर्ता प्रकट होता है। और जब वह कहता है— "मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?" तभी भोक्ता जन्म लेता है। मुझे लगता है कि कर्म संसार में घटित होता है, पर कर्ता और भोक्ता मनुष्य की चेतना में जन्म लेते ह...

हम, तुम और लौटना

  हम, तुम और लौटना कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे बीच सबसे ख़ूबसूरत बात मिलना नहीं है। लौटना है। तुम हर बार किसी न किसी बहाने मेरे पास लौट आते हो। कभी किसी पुराने गीत में, कभी चाय की पहली भाप में, कभी शाम की उस ख़ामोशी में जिसका कोई कारण नहीं होता। मैंने एक दिन अपने दिल से पूछा— तुम उसे इतनी आसानी से जाने क्यों देते हो? दिल ने कहा— जो अपना हो, उसे रोका नहीं जाता। उसे बस लौटने की जगह दी जाती है। तब मुझे समझ आया, प्रेम किसी को बाँधने की कला नहीं, उसके लिए अपने भीतर एक दरवाज़ा खुला छोड़ देने का नाम है। हो सकता है तुम कभी वापस न आओ। लेकिन मैं उस दरवाज़े को बंद नहीं करूँगा। क्योंकि कुछ लोग घर में नहीं रहते, घर होने का एहसास बनकर रहते हैं। और ऐसे लोग लौटें या न लौटें, उनके लिए भीतर हमेशा एक दीपक जलता रहता है। मुकेश

हम, तुम और प्रतीक्षा

  हम, तुम और प्रतीक्षा कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे बीच सबसे जीवित चीज़ मुलाक़ातें नहीं हैं। वह प्रतीक्षा है। तुम्हारा इंतज़ार करते-करते मैंने जाना, इंतज़ार किसी के आने का नाम नहीं, किसी के लिए अपने भीतर जगह बचाए रखने का नाम है। अजीब है... तुम्हारे आने से ज़्यादा तुम्हारे आने की उम्मीद ने मुझे बदल दिया। पहले मैं वक़्त देखता था। अब मैं एहसास देखता हूँ। घड़ी की सुइयाँ अपनी चाल चलती रहती हैं, लेकिन प्रेम... वह किसी एक लम्हे पर घंटों बैठा रह सकता है। तुम्हें शायद कभी पता भी न चला हो, कि कितनी बार मैंने दरवाज़ा नहीं, अपने दिल को खोला था। कितनी बार कदमों की आहट तुम्हारी नहीं थी, फिर भी मैं मुस्कुरा दिया। क्योंकि प्रेम पहचान से पहले विश्वास करता है। लोग कहते हैं, इंतज़ार थका देता है। मुझे नहीं लगता। थकान उस दिन होती है, जिस दिन उम्मीद चली जाती है। जब तक किसी के आने की हल्की-सी भी रौशनी बची रहती है, दिल अपने दरवाज़े बंद नहीं करता। अगर कभी तुम सचमुच आ गए, तो शायद मैं सबसे पहले तुम्हें नहीं देखूँगा। मैं देखूँगा उस प्रतीक्षा को, जो इतने बरसों से चुपचाप मेरे भीतर बैठी थी। और उससे कहूँगा— अब त...

चिंतन - क्या मनुष्य को समझने के लिए शब्द नहीं, विराम पढ़ने पड़ते हैं?

  चिंतन -  क्या मनुष्य को समझने के लिए शब्द नहीं, विराम पढ़ने पड़ते हैं? हम यह मानते हैं कि मनुष्य वही है, जो वह कहता है। पर क्या सचमुच ऐसा है? यदि ऐसा होता, तो संसार में कोई गलतफ़हमी जन्म ही न लेती। शब्द सब कुछ कह देते। और मौन की कोई आवश्यकता न रहती। तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या मनुष्य को समझने के लिए शब्द नहीं, विराम पढ़ने पड़ते हैं? शब्द केवल भाषा का भाग हैं। मनुष्य केवल भाषा नहीं है। उसकी आँखों में एक अलग कथा चलती है। उसकी मुस्कान का अपना व्याकरण होता है। उसकी चुप्पी का अपना अर्थ होता है। और उसके विरामों में वे वाक्य छिपे होते हैं, जिन्हें वह कह नहीं पाता। कई बार कोई व्यक्ति कहता है— "मैं ठीक हूँ।" पर उसकी आँखें उस वाक्य का खंडन कर देती हैं। कई बार कोई बहुत बोलता है, केवल इसलिए कि वह अपने भीतर के मौन से बचना चाहता है। और कई बार कोई बिल्कुल नहीं बोलता, क्योंकि उसके पास शब्दों से बड़े दुःख होते हैं। मुझे लगता है कि मनुष्य का वास्तविक परिचय उसके शब्दों में नहीं, उनके बीच के मौन में मिलता है। विराम केवल बोलने का ठहराव नहीं है। वह मन की खिड़की है। वहीं से भीतर का...