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Monday, 4 May 2026

जो लफ़्ज़ों में ढलना था, ढल न पाया,

 जो लफ़्ज़ों में ढलना था, ढल न पाया,

वो एहसास दिल में ठहर-सा गया है।

मेरे ख़्वाब का हर रंग फीका पड़ा है,

मेरे सामने सब बिखर-सा गया है।


तेरी याद की धूप में जलते-जलते,

मेरा साया मुझसे सिहर-सा गया है।

कभी जो था दिल में उजालों का मौसम,

वही आज भीतर उभर-सा गया है।

मैं ख़ामोश रहकर भी कहता रहा हूँ,

मगर हर इशारा ही गुज़र-सा गया है।

ये दुनिया, ये रिश्ते, ये चेहरे सभी कुछ,

मेरी आँख में बस निखर-सा गया है।

'मुकेश' अपने दिल की कहानी अजब है,

कहते-कहते भी बिखर-सा गया है।

मुकेश ,,,,,,,

Sunday, 3 May 2026

तन्हा सा दिल अब थकन से भरा है,

 तन्हा सा दिल अब थकन से भरा है,

राह को देखता हूँ तो अँधेरा घना है।


मेरे हर ख़्वाब पर धूल-सी जम गई है,

कोई अरमान भीतर ही भीतर मरा है।


तेरी यादों का मौसम ठहर-सा गया है,

जैसे वीरान जंगल में सन्नाटा धरा है।


मैंने हर मोड़ पर तुझको ढूँढा बहुत है,

पर हर इक रास्ता मुझसे जैसे खफ़ा है।


मेरे लफ़्ज़ों में दर्द की बूंदें हैं शामिल,

जैसे हर शेर आँखों से गिरता हुआ है।


ये जो चुप हूँ तो मतलब ये हरगिज़ नहीं है,

मेरे अंदर कोई शोर टूटा पड़ा है।


'मुकेश' इस दिल-ए-तन्हा का आलम न पूछो,

ये हँसता हुआ चेहरा अंदर से जला है।


मुकेश ,,,,,

दिल में जो शोर है, वो सुनता नहीं है,

 दिल में जो शोर है, वो सुनता नहीं है,

ये कैसा सन्नाटा है, मिटता नहीं है।


तेरी याद का सिलसिला चल रहा है,

कोई वक़्त इसको भी रोकता नहीं है।


मेरी आँख में एक दरिया छुपा है,

मगर ये किसी से भी बहता नहीं है।


तेरी बेरुख़ी ने ये हाल कर दिया है,

कोई ज़ख़्म अब दिल में पलता नहीं है।


मैं लफ़्ज़ों में ढालूँ भी तो क्या लिखूँ मैं,

जो सच है वही मुझसे लिखता नहीं है।


ये तन्हा सा दिल अब थकन से भरा है,

मगर ख़ुद से मिलने को रुकता नहीं है।


'मुकेश' हाल-ए-दिल अब किसे मैं सुनाऊँ,

कोई अपना इस दर्द को समझता नहीं है


मुकेश ,,,,,,,,,

जो टूटा है अंदर, वो दिखता नहीं है,

 जो टूटा है अंदर, वो दिखता नहीं है,

ये दिल का समंदर है, रुकता नहीं है।


लबों पर हँसी है, निगाहों में धुंधल,

मगर दर्द का सिलसिला थमता नहीं है।


कभी ख़्वाब आँखों में रौशन थे ऐसे,

अब उनका कोई भी निशाँ बचता नहीं है।


तेरी याद दिल में धड़कती रही है,

मगर कोई साया भी मिलता नहीं है।


मैं लफ़्ज़ों में कैसे बयाँ कर सकूँ वो,

जो ख़ामोशियों में भी लिखा नहीं है।


ये तन्हा सफ़र है, ये वीरान रस्ता,

जहाँ साथ अपना भी चलता नहीं है।


मुकेश' हाल-ए-दिल मैं किससे कहूँ,

जो टूटा है अंदर, वो दिखता नहीं है।


मुकेश ,,,,,,

जहाँ साया भी समाप्त हो जाता है

 जहाँ साया भी समाप्त हो जाता है

इतनी दूर चल आया हूँ
कि अब
रोशनी भी थकने लगी है।

साये
जो कभी साथ चलते थे,
जो दीवारों पर ठहरते थे,
जो भीतर उतर आते थे
एक-एक करके
छूटते जा रहे हैं।

अब
न आगे कोई अक्स है,
न पीछे कोई परछाईं
सिर्फ़ एक खुला विस्तार,
जहाँ मैं हूँ
पर किसी रूप में नहीं।

पहले डर लगा
जैसे सब कुछ खत्म हो रहा है,
जैसे पहचान
धीरे-धीरे मिट रही हो।

पर फिर
एक अजीब शांति आई
जैसे किसी ने
मेरे भीतर की सारी प्रतिध्वनियाँ
धीरे से बंद कर दी हों।

अब
न कोई पीछा है,
न कोई ठहराव,
न कोई द्वंद्व
क्योंकि साया
द्वैत से जन्म लेता है,
और यहाँ
द्वैत बचा ही नहीं।

मैंने खुद को देखा
बिना आकार,
बिना विस्तार,
बिना किसी और के संदर्भ के।

और पहली बार
ऐसा लगा
कि मैं
सच में हूँ।

साया
हमेशा एक संबंध था
रोशनी और अंधेरे का,
अतीत और वर्तमान का,
मैं और मेरे बीच का।

पर यहाँ
जहाँ सब कुछ
अपने मूल में लौट आया है,
साया भी
अनावश्यक हो गया है।

अब
न उसे ढूँढने की ज़रूरत है,
न उससे बचने की।

क्योंकि
जहाँ साया समाप्त होता है,
वहीं से
अस्तित्व शुरू होता है।

मुकेश --------


साया जो खो गया

 “साया जो खो गया”

एक दिन
मेरा साया
मेरे साथ नहीं था।

धूप वैसी ही थी,
ज़मीन भी,
रास्ते भी
पर कुछ कमी थी
जो दिखाई नहीं देती थी।

मैंने पाँवों के पास देखा
खालीपन था,
जैसे कोई साथ
चुपचाप छूट गया हो।

पहले तो
हल्कापन लगा
न कोई पीछा,
न कोई ठहराव,
न कोई वह परिचित आकार
जो हर कदम पर
मुझे परिभाषित करता था।

पर धीरे-धीरे
एक अजीब बेचैनी उठी
जैसे मैं अधूरा हूँ,
जैसे मेरी कोई गवाही
मुझसे छिन गई हो।

मैंने दीवारों पर खोजा,
पानी में,
आँखों की परतों में
पर साया कहीं नहीं था।

तब पहली बार
मैंने खुद को देखा
बिना किसी प्रतिरूप के,
बिना किसी विस्तार के,
सिर्फ़ एक सीधा अस्तित्व।

अजीब डर था
क्योंकि साया
सिर्फ़ अंधेरा नहीं होता,
वह हमारे होने का
सबूत भी होता है।

शाम होते-होते
वह लौट आया
धीरे से,
मेरे पाँवों के पास
फिर से जुड़ गया।

मैंने राहत की साँस ली
पर इस बार
मैंने उसे अलग नज़र से देखा।

अब वह सिर्फ़
मेरे साथ चलने वाला अक्स नहीं था
वह वह खाली जगह भी था
जो उसके बिना
मेरे भीतर खुल गई थी।

और तब समझ में आया
कभी-कभी
साया खो जाना ज़रूरी होता है,
ताकि हम जान सकें
कि हम
उसके बिना भी
मौजूद हैं।


मुकेश --------

दो सायों के बीच

 दो सायों के बीच

दो सायों के बीच
मैं खड़ा हूँ
एक आगे, एक पीछे,
और मैं
किसी का भी पूरा नहीं।

आगे वाला साया
मुझसे तेज़ चलता है,
जैसे वह मेरा भविष्य हो
लंबा, अनिश्चित,
हर कदम के साथ बदलता हुआ।

पीछे वाला साया
धीमे-धीमे घिसटता है,
जैसे अतीत
थका हुआ,
पर हटने को तैयार नहीं।

मैं बीच में हूँ
जहाँ रोशनी सबसे तीखी है,
जहाँ कोई साया टिक नहीं पाता,
फिर भी
दोनों मुझे खींचते रहते हैं।

कभी मैं आगे झुकता हूँ,
तो भविष्य का साया
मुझमें समा जाता है,
कभी पीछे मुड़ता हूँ,
तो अतीत
मेरे कंधों पर बैठ जाता है।

अजीब संतुलन है
दोनों साये
मुझे पूरा करना चाहते हैं,
और मैं
टुकड़ों में बँटता जाता हूँ।

मैंने सोचा—
किसी एक को चुन लूँ,
पर साये चुने नहीं जाते,
वे बस
रोशनी के साथ तय होते हैं।

तब मैंने
चलना शुरू किया
न आगे की जल्दी,
न पीछे का बोझ
बस वर्तमान की उस रेखा पर
जहाँ दोनों साये
मेरे साथ-साथ बहते हैं।

और धीरे-धीरे
समझ में आया
मैं दो सायों के बीच नहीं,
दो समयों के बीच खड़ा हूँ।

और शायद
यही बीच का क्षण
सबसे सच्चा है
जहाँ साया भी
कुछ पल के लिए
मुझसे अलग नहीं रहता।


मुकेश --------