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Sunday, 26 April 2026

रौशनी की बात छोड़, पहले प्यास तो बुझा,

 रौशनी की बात छोड़, पहले प्यास तो बुझा,

ज़िंदा रहने के लिए, ये अहसास तो बचा।


दिल के सूखे कुएँ में, उतर के देख तू,

शायद कुछ भीग जाए, ये विश्वास तो बचा।


वक़्त की धूप ने, जला दी हरियाली,

छाँव की याद ही सही, कोई आस तो बचा।


भीड़ में खो गया हूँ, अपने ही शहर में,

नाम पुकार ले मेरा, ये एहसास तो बचा।


सच की राह पे चल, चाहे काँटे ही मिलें,

झूठ के साये से दूर, ये उजास तो बचा।


रिश्ते बिखर गए हैं, धूल की तरह यहाँ,

एक सच्चा सा लम्हा, कहीं पास तो बचा।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

अदृश्य ग्रहों का संविधान

 अदृश्य ग्रहों का संविधान


कहते हैं

हर देश का एक संविधान होता है

लिखा हुआ, छपा हुआ,

धूल और बहसों के बीच सुरक्षित।

पर मुझे अक्सर लगता है,

हमारे ऊपर

एक और संविधान लागू है

अदृश्य ग्रहों का,

जिसे किसी ने पढ़ा नहीं,

पर सब मानते हैं।


सुबह जब निर्णय लिए जाते हैं,

तो वे तर्क से कम,

किसी अनकही दिशा से ज़्यादा आते हैं

जैसे किसी ग्रह ने

धीरे से सिर हिला दिया हो।


नेताओं की आँखों में

कभी-कभी

मुझे नक्षत्रों की थकान दिखती है

वे बोलते हैं,

पर शब्द

उनके अपने नहीं लगते।


न्यायालयों में

फैसले सुनाए जाते हैं,

पर न्याय

किसी अदृश्य तुला पर

झूलता रहता है

जहाँ संतुलन

हमेशा थोड़ा-सा डगमगाता है।


मैंने किताबों में पढ़ा था

संविधान बराबरी देता है,

स्वतंत्रता देता है,

आवाज़ देता है।

पर सड़कों पर चलते हुए

अक्सर लगता है

यह सब

किसी दूसरे लोक के वादे हैं।


यहाँ

हर व्यक्ति

किसी न किसी अदृश्य नियम से बँधा है

कोई अपने नाम से,

कोई अपने धर्म से,

कोई अपने डर से।


और इन सबके ऊपर

एक मौन अनुच्छेद है—

जिसे कोई नहीं पढ़ता,

पर वही सबसे प्रभावशाली है।


रात को

जब शहर सो जाता है,

मैं आकाश की तरफ देखता हूँ

तारे स्थिर लगते हैं,

पर भीतर ही भीतर

वे भी किसी नियम में बँधे हैं।


तब समझ में आता है

संविधान केवल कागज़ पर नहीं,

हमारे भीतर भी लिखा जाता है।


और शायद

सबसे कठिन काम यह नहीं

कि हम उसे बदलें,

बल्कि यह है

कि हम पहचानें

कौन-सा नियम

वास्तव में हमारा है,

और कौन-सा

सिर्फ डर और परंपरा का

अदृश्य ग्रह।


क्योंकि जिस दिन

हम यह भेद समझ लेंगे,

शायद उसी दिन

हमारा देश

पहली बार

सचमुच स्वतंत्र होगा।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

मंगल दोष और दंगे

 मंगल दोष और दंगे

कहते हैं

मंगल जब बिगड़ता है,

तो सिर्फ कुंडली नहीं,

खून का रंग भी बदल जाता है।


शहर इन दिनों

कुछ ज़्यादा ही लाल है

दीवारों पर,

नारों में,

और लोगों की आँखों में भी

एक तीखी-सी आग जल रही है।


सुबह की शुरुआत

अब अख़बार से नहीं,

खबरों की चीख से होती है

कहीं आग लगी,

कहीं पत्थर चले,

कहीं नाम पूछकर

इंसान को बाँट दिया गया।


मैं सोचता हूँ,

क्या यह सचमुच

मंगल का दोष है?

या हमने ही

अपने भीतर के युद्ध को

किसी ग्रह के माथे मढ़ दिया है?


गली के मोड़ पर

दो लड़के खड़े हैं

एक के हाथ में पत्थर,

दूसरे की मुट्ठी में

किसी पुरानी नफ़रत की चिंगारी।

दोनों की उम्र

लगभग बराबर है,

पर उनके बीच

सदियों की दूरी खड़ी है।


घर के अंदर

माएँ दरवाज़े बंद कर रही हैं,

और बच्चों को

धीरे से समझा रही हैं

“आज बाहर मत जाना…”

उनकी आवाज़ में

डर कम,

थकान ज़्यादा है।


शाम होते-होते

धुआँ शहर पर

एक परत-सा बिछा देता है

जैसे किसी ने

आकाश को भी

गवाह बनने से रोक दिया हो।


कभी-कभी लगता है,

यह दंगे

अचानक नहीं होते

ये धीरे-धीरे पकते हैं,

ठीक वैसे ही

जैसे किसी कुंडली में

दोष सालों तक

अपना समय इंतज़ार करता है।


रात को

जब सब कुछ शांत दिखता है,

तब भी

अंदर कहीं

आग बुझी नहीं होती

वो राख के नीचे

धीरे-धीरे साँस लेती रहती है।


और मैं

इन सबके बीच खड़ा,

यह समझने की कोशिश करता हूँ

कि क्या सच में

ग्रहों की चाल

इतनी हिंसक हो सकती है,

या हम ही

अपने क्रोध को

आकाश की तरफ़ उछालकर

खुद को निर्दोष साबित करना चाहते हैं?


क्योंकि अगर

मंगल दोष है भी,

तो शायद

सबसे पहले

उसे हमारी आँखों में,

हमारी भाषा में,

और हमारे इरादों में

ठीक होना चाहिए।


तभी

किसी दिन

यह शहर

लाल नहीं,

फिर से

सिर्फ एक साधारण रंग में

साँस ले पाएगा।


मुकेश ,,,,,,,,,,

चंद्रमा की बेचैनी में लोग

 चंद्रमा की बेचैनी में लोग


रात जैसे ही उतरती है,

शहर की साँस बदल जाती है

दिन की ठोस आवाज़ें

धीरे-धीरे पिघलकर

एक तरल खामोशी में बहने लगती हैं।


मैं छत पर खड़ा होकर

आकाश को देखता हूँ,

चाँद आज पूरा नहीं है

थोड़ा कटा हुआ,

थोड़ा हिचकता हुआ,

जैसे अपनी ही रोशनी से

पूरी तरह आश्वस्त न हो।


नीचे लोग

अपने-अपने कमरों में बंद,

पर नींद

किसी के पास पूरी नहीं है

किसी की आँखों में

पुरानी यादें जागती हैं,

किसी के भीतर

अधूरे वाक्य घूमते रहते हैं।


एक आदमी

खिड़की के पास बैठा है,

बार-बार फोन उठाता है,

फिर रख देता है

जैसे शब्द

उसके गले में अटक गए हों।


एक औरत

रसोई में बिना वजह

कुछ ढूँढ़ रही है,

उसे खुद नहीं पता

क्या खो गया है

पर उसकी उँगलियाँ

किसी खालीपन को टटोल रही हैं।


बच्चे भी

आज जल्दी नहीं सोते,

उनकी आँखों में

एक अजीब-सी चमक है

जैसे सपनों ने

अभी तक उन्हें

अपना रास्ता नहीं दिखाया।


मैं सोचता हूँ,

क्या चंद्रमा सचमुच

हमारे भीतर उतर आता है?

या हम ही

अपनी बेचैनियों को

उसके चेहरे पर पढ़ लेते हैं?


क्योंकि आज

हर दिल में

एक हल्की-सी लहर है

बिना कारण उठती हुई,

बिना किनारे टकराए

वापस लौटती हुई।


रात गहराती है,

और चाँद

थोड़ा और फीका पड़ जाता है

जैसे उसने

हमारी सारी बेचैनियाँ

अपने भीतर खींच ली हों।


और हम

लोग,

जो दिन में इतने निश्चित दिखते हैं,

रात में

उतने ही अस्थिर हो जाते हैं


चंद्रमा की इस अधूरी रोशनी में

अपने ही भीतर

एक अनकहा सवाल बनकर रह जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

शनि की साढ़ेसाती में शहर

 शनि की साढ़ेसाती में शहर


शहर इन दिनों

कुछ ज़्यादा ही चुप है

जैसे किसी ने उसकी आवाज़

धीरे से गिरवी रख दी हो।


सुबह होती है,

पर उजाला

सीधा सड़कों तक नहीं पहुँचता,

बीच में कहीं

धुँधला-सा ठहर जाता है

जैसे शनि की दृष्टि

रोशनी को भी परख रही हो।


लोग निकलते हैं घरों से,

पर उनके कदमों में

एक अनकही थकान है,

जैसे हर रास्ता

थोड़ा लंबा हो गया हो,

हर मंज़िल

थोड़ी दूर खिसक गई हो।


दफ्तरों की खिड़कियाँ

अब भी खुलती हैं,

पर हवा में

एक अदृश्य बोझ है

जैसे फैसले लेने से पहले

समय खुद

किसी परीक्षा से गुजर रहा हो।


मैं चौराहे पर खड़ा होकर

भीड़ को देखता हूँ

हर चेहरा

अपने ही हिसाब-किताब में उलझा,

जैसे कोई अदृश्य लेखा-जोखा

सबके भीतर चल रहा हो।


शाम ढलती है

तो शहर और भी सिमट जाता है

बत्तियाँ जलती हैं,

पर उजाला

किसी कर्ज़ की तरह लगता है,

जिसे देर-सबेर

चुकाना ही होगा।


कभी-कभी लगता है,

यह साढ़ेसाती

सिर्फ आसमान में नहीं,

हमारे भीतर भी चल रही है

जहाँ हर इच्छा

किसी कसौटी पर रखी हुई है,

और हर सपना

धीरे-धीरे परखा जा रहा है।


रात गहराती है,

तो शहर

अपने ही साये में बैठ जाता है

चुप, स्थिर,

जैसे किसी कठोर शिक्षक के सामने

खड़ा एक विद्यार्थी।


और मैं सोचता हूँ

क्या यह समय

सज़ा है,

या एक लंबी शिक्षा?


क्योंकि शनि

केवल छीनता नहीं,

वह सिखाता भी है

धीरे-धीरे,

बिना शोर के,

अंदर तक उतरकर।


शहर शायद अभी

उसी सीख में डूबा है

जहाँ हर खोई हुई चीज़

एक नए अर्थ में लौटेगी,

और हर भारी साँस के बाद

एक गहरी समझ

जन्म लेगी।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

राशिफल में फँसा हुआ देश

 राशिफल में फँसा हुआ देश


सुबह जब अख़बार खुलता है,

तो पहले पन्ने पर नहीं,

किनारे छपे छोटे-से कॉलम में

देश की धड़कन दिखाई देती है

“आज का दिन आपके लिए मिश्रित फल देगा।”


मैं सोचता हूँ,

क्या सचमुच इतना ही है हमारा भाग्य?

कुछ “शुभ”, कुछ “अशुभ”,

और बाकी सब

एक सामान्य-सी चेतावनी?


सड़कों पर चलते हुए

लोग मुझे अक्षरों जैसे लगते हैं—

किसी का “क” अधूरा,

किसी का “ष” टूटा हुआ,

और पूरा वाक्य

कहीं अर्थहीन-सा बिखरा पड़ा है।

जैसे भाषा भी

किसी ग्रह की चाल से प्रभावित हो।


चौराहों पर खड़े पुलिसवाले

मुझे राहु जैसे लगते हैं

रास्तों को निगलते हुए,

और ट्रैफिक की भीड़

किसी अंतहीन ग्रहण में फँसी हुई।


घर लौटकर

मैं अपनी हथेलियों को देखता हूँ,

रेखाएँ अब भी वही हैं—

लेकिन उनका अर्थ बदल गया है।

अब वे केवल मेरा भविष्य नहीं,

बल्कि एक पूरे देश का

अनकहा इतिहास ढो रही हैं।


टीवी पर बहस चल रही है,

कोई कहता है—

“समय बदल रहा है।”

कोई कहता है—

“यह तो पहले से लिखा था।”

और मैं चुपचाप

दोनों के बीच की खाई में

अपनी आवाज़ ढूँढ़ता हूँ।


कभी-कभी लगता है,

हम सब

एक ही पन्ने पर छपे राशिफल हैं

जहाँ हर व्यक्ति को

अलग-अलग उम्मीदें दी गई हैं,

पर डर

सबका एक-सा है।


रात को जब नींद नहीं आती,

मैं आकाश को देखता हूँ—

तारों की जगह

मुझे टूटे हुए वादे दिखते हैं,

और चाँद

एक अधूरी घोषणा-सा लगता है।


और फिर अचानक,

एक सवाल उठता है

क्या हम सच में

राशिफल में फँसे हुए हैं,

या हमने ही

अपनी स्वतंत्रता को

किसी भविष्यवाणी के हवाले कर दिया है?


मैं जवाब नहीं जानता,

पर हर सुबह

अख़बार खोलते हुए

एक उम्मीद बची रहती है

कि शायद किसी दिन

राशिफल का वह छोटा-सा कॉलम

खाली होगा,

और देश

अपने भाग्य को

खुद लिखना शुरू करेगा।


मुकेश ,,,,,,,

ग्रहों का खेल

 ग्रहों का खेल 

कई दिनों से मैं यह सोच रहा हूँ,

कि क्या सचमुच

देश भी एक कुंडली होता है?


जहाँ सीमाएँ

केवल नक्शे की रेखाएँ नहीं,

बल्कि जन्म-लग्न की तरह

किसी अदृश्य समय पर टिके हुए बिंदु हैं।


मैं जब सड़कों पर निकलता हूँ,

तो भीड़ मुझे

ग्रहों की चाल जैसी लगती है

कोई तेजी से भागता हुआ मंगल,

कोई ठहरा हुआ शनि,

कोई भ्रम में डूबा चंद्रमा।


और बीच में खड़ा मैं,

अपने ही पसीने और धूल में लिपटा,

जैसे कोई अशुभ योग।


घर में अब भी

पुरानी बातें जिंदा हैं

माँ की आँखों में

किसी अनकहे डर की परछाईं,

और पिता की उँगलियाँ

अब भी अदृश्य रेखाओं को छूती हुई।


कभी लगता है,

उन्होंने मुझे नहीं,

समय को पढ़ना चाहा था

पर समय

हमेशा उनकी पकड़ से फिसलता रहा।


मौसा की कहानी

अब भी एक धुंधली गूंज है

प्रेम, धर्म, और पहचान के बीच

फँसी हुई एक अधूरी दास्तान,

जैसे राहु ने

किसी के नाम को निगल लिया हो।


रात में

जब नींद नहीं आती,

मैं खिड़की से बाहर देखता हूँ

शहर की बत्तियाँ

मुझे टूटते हुए नक्षत्र लगती हैं।


और कहीं दूर,

कोई अदृश्य शक्ति

इन सबको खींचती, मोड़ती,

जैसे कोई थका हुआ ज्योतिषी

बार-बार एक ही कुंडली सुधार रहा हो।


अब तो यह हाल है

कि मैं चेहरों में भविष्य ढूँढ़ता हूँ,

और भविष्य में

किसी पुराने डर का चेहरा।


कभी-कभी सचमुच लगता है

यह देश

किसी ग्रहण में फँसा हुआ है,

जहाँ प्रकाश भी

अपने होने का प्रमाण माँगता है।


और मैं

भीगता हुआ, काँपता हुआ,

हर रोज़ उसी आकाश के नीचे

एक नया अर्थ खोजता हूँ,


कि शायद

कुंडली से बाहर भी

कोई जीवन होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,