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हरिवंशपुराण — भाग ७२ - भविष्यपर्व — वेदों की उत्पत्ति

 हरिवंशपुराण — भाग ७२ - भविष्यपर्व — वेदों की उत्पत्ति : ज्ञान, श्रुति और सृष्टि का विधान भारतीय परंपरा में वेदों को ज्ञान का प्राचीनतम और सर्वोच्च स्रोत माना गया है। वेद केवल धार्मिक अनुष्ठानों के निर्देश नहीं हैं; उनमें प्रकृति, देवताओं, यज्ञ, समाज और अस्तित्व के विषय में प्राचीन चिंतन भी सुरक्षित है। पुराणों में वेदों की उत्पत्ति का वर्णन सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ता है, क्योंकि जिस प्रकार संसार को व्यवस्थित करने के लिए सृष्टिकर्ता की कल्पना की गई है, उसी प्रकार उस संसार के संचालन और उसके ज्ञान के लिए वेदों को महत्त्व दिया गया है। भविष्यपर्व के सृष्टि-वर्णन की पृष्ठभूमि में यह प्रश्न उठता है कि संसार के विभिन्न तत्त्वों और लोकों की व्यवस्था के साथ ज्ञान की व्यवस्था कैसे स्थापित होती है। भारतीय धार्मिक दृष्टि में सृष्टि केवल पदार्थों का समूह नहीं है; उसमें नियम, क्रम और कर्तव्य का भी स्थान है। वेद इसी व्यवस्था के ज्ञान और उसके अनुष्ठानिक विधान से सम्बद्ध माने जाते हैं। वेद और ब्रह्मा की परंपरा पुराणों में ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा गया है। अनेक पौराणिक आख्यानों में वेदों का ...

हरिवंशपुराण — भाग ७१ - भविष्यपर्व — पर्वतों और नदियों की उत्पत्ति

 हरिवंशपुराण — भाग ७१ - भविष्यपर्व — पर्वतों और नदियों की उत्पत्ति : पृथ्वी पर जीवन का विस्तार पृथ्वी के उद्धार के बाद सृष्टि की व्यवस्था का अगला पक्ष सामने आता है—उस भूमि का स्वरूप, जिस पर जीवों का जीवन विकसित होता है। पर्वत, नदियाँ, वन और जलस्रोत पृथ्वी को केवल भौगोलिक संरचना नहीं देते, बल्कि जीवन के विस्तार के आधार भी बनते हैं। भारतीय पुराण-परंपरा में इन प्राकृतिक तत्त्वों की उत्पत्ति को प्रायः देवशक्तियों, ऋषियों और सृष्टि-नियामक तत्त्वों से जोड़कर समझाया गया है। भविष्यपर्व के पिछले प्रसंग में विष्णु के वराह-रूप द्वारा पृथ्वी को जल से ऊपर उठाने और उसे स्थिर करने का वर्णन आया। इस कथा का स्वाभाविक विस्तार पृथ्वी पर स्थित विभिन्न तत्त्वों और लोक-व्यवस्था की चर्चा में दिखाई देता है। पर्वतों और नदियों के आख्यान इसी व्यापक सृष्टि-वर्णन का हिस्सा हैं। पर्वतों का महत्त्व भारतीय धार्मिक साहित्य में पर्वत केवल ऊँची भूमि नहीं हैं। वे तपस्या, ज्ञान, देवताओं के निवास और प्राकृतिक शक्ति के प्रतीक भी हैं। हिमालय को देवात्मा पर्वत कहा गया है। मेरु को ब्रह्माण्ड की धुरी के रूप में कल्पित किया ग...

हरिवंशपुराण — भाग ७०- भविष्यपर्व — सृष्टि-रचना और पृथ्वी का उद्धार

  हरिवंशपुराण — भाग ७०- भविष्यपर्व — सृष्टि-रचना और पृथ्वी का उद्धार हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व में सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन केवल यह बताने के लिए नहीं है कि संसार कैसे बना। इस आख्यान में यह प्रश्न भी उपस्थित होता है कि पृथ्वी, जल, आकाश, पर्वत और जीवों से युक्त संसार किस प्रकार एक व्यवस्थित रूप प्राप्त करता है। पिछले भाग में विष्णु के वराह-अवतार का प्रसंग आया था। इस भाग में उसी आख्यान का अगला पक्ष सामने आता है—सृष्टि की रचना, पृथ्वी पर पर्वतों का भार और भगवान द्वारा पृथ्वी को रसातल से ऊपर उठाना। ब्रह्माण्ड की रचना वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि वैदिक श्रुति में आरम्भिक ब्रह्माण्ड का वर्णन स्वर्णमय अण्ड के रूप में मिलता है। सृष्टि के आरम्भ में यह अण्ड समस्त जगत् की संभावनाओं को अपने भीतर समेटे हुए था। सृष्टि-कर्ता ने उसे विभाजित किया और उसके विभिन्न भागों से अलग-अलग लोकों तथा तत्त्वों की व्यवस्था बनी। इस वर्णन में ब्रह्माण्ड का अण्ड अनेक भागों में विभक्त होता है। उसका ऊपरी भाग ब्रह्मलोक से और निचला भाग रसातल से सम्बद्ध किया गया है। अण्ड के भीतर स्थित विभिन्न तत्त्वों और रिक्त स्थ...

हरिवंशपुराण — भाग ६९- भविष्यपर्व — विष्णु का वराह-अवतार

 हरिवंशपुराण — भाग ६९- भविष्यपर्व — विष्णु का वराह-अवतार : पृथ्वी के उद्धार का आख्यान सृष्टि की पौराणिक कल्पना में पृथ्वी केवल एक निर्जीव भूखंड नहीं है। वह समस्त प्राणियों के जीवन का आधार है। जब पृथ्वी पर संकट आता है, तब उसका प्रभाव केवल मनुष्यों पर नहीं, बल्कि समूची सृष्टि की व्यवस्था पर पड़ता है। विष्णु के वराह-अवतार का आख्यान इसी विचार को एक विराट कथा के रूप में प्रस्तुत करता है। वराह अर्थात् वन्य शूकर का रूप सामान्य दृष्टि से एक पशु का रूप है, किंतु पुराणों में यही रूप दैवी शक्ति और सृष्टि-संरक्षण का माध्यम बन जाता है। विष्णु का यह अवतार उस समय प्रकट होता है, जब पृथ्वी को जल में डूब जाने अथवा अपने आधार से विचलित हो जाने के संकट से बचाने की आवश्यकता होती है। भगवान वराह पृथ्वी को अपने दाँतों पर धारण करके जल से ऊपर उठाते हैं और उसे पुनः उचित स्थान पर स्थापित करते हैं। इस कथा के विभिन्न पुराणों में घटनाओं का विस्तार अलग-अलग मिलता है। कहीं पृथ्वी को रसातल में ले जाने वाले असुर हिरण्याक्ष के साथ युद्ध का वर्णन है, तो कहीं वराह के विराट स्वरूप, उनकी गर्जना और जल में प्रवेश का विशेष चि...

हरिवंशपुराण — भाग ६६ - भविष्यपर्व — पृथु का आख्यान और समुद्र-मन्थन

  हरिवंशपुराण — भाग ६९ - भविष्यपर्व — विष्णु का वराह-अवतार : पृथ्वी के उद्धार का आख्यान सृष्टि की पौराणिक कल्पना में पृथ्वी केवल एक निर्जीव भूखंड नहीं है। वह समस्त प्राणियों के जीवन का आधार है। जब पृथ्वी पर संकट आता है, तब उसका प्रभाव केवल मनुष्यों पर नहीं, बल्कि समूची सृष्टि की व्यवस्था पर पड़ता है। विष्णु के वराह-अवतार का आख्यान इसी विचार को एक विराट कथा के रूप में प्रस्तुत करता है। वराह अर्थात् वन्य शूकर का रूप सामान्य दृष्टि से एक पशु का रूप है, किंतु पुराणों में यही रूप दैवी शक्ति और सृष्टि-संरक्षण का माध्यम बन जाता है। विष्णु का यह अवतार उस समय प्रकट होता है, जब पृथ्वी को जल में डूब जाने अथवा अपने आधार से विचलित हो जाने के संकट से बचाने की आवश्यकता होती है। भगवान वराह पृथ्वी को अपने दाँतों पर धारण करके जल से ऊपर उठाते हैं और उसे पुनः उचित स्थान पर स्थापित करते हैं। इस कथा के विभिन्न पुराणों में घटनाओं का विस्तार अलग-अलग मिलता है। कहीं पृथ्वी को रसातल में ले जाने वाले असुर हिरण्याक्ष के साथ युद्ध का वर्णन है, तो कहीं वराह के विराट स्वरूप, उनकी गर्जना और जल में प्रवेश का विशेष ...

हरिवंशपुराण — भाग ६८ - भविष्यपर्व — दक्ष-यज्ञ में शिव का विघ्न और हरि के साथ संघर्ष

 हरिवंशपुराण — भाग ६८ - भविष्यपर्व — दक्ष-यज्ञ में शिव का विघ्न और हरि के साथ संघर्ष दक्ष-यज्ञ का आख्यान भारतीय पुराण-परंपरा में यज्ञ, अहंकार, देवाधिकार और शिव-विष्णु संबंध जैसे प्रश्नों से जुड़ा हुआ है। इस प्रसंग के विभिन्न पुराणों में अलग-अलग पाठ और विवरण मिलते हैं, इसलिए हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व में इसके विशिष्ट कथाक्रम की पुष्टि मूल पाठ से करना आवश्यक है। दक्ष प्रजापति सृष्टि-विस्तार और वैदिक कर्मकाण्ड से जुड़े प्रमुख पात्रों में गिने जाते हैं। यज्ञ उनके लिए केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और दैवी व्यवस्था का भी प्रतीक है। शिव का व्यक्तित्व इसके विपरीत उन सीमाओं से परे दिखाई देता है जिन्हें सामान्य सामाजिक और वैदिक मर्यादाओं के आधार पर निर्धारित किया जाता है। इसी कारण दक्ष और शिव के बीच का विरोध अनेक पुराणों में अहंकार तथा वैराग्य, बाह्य प्रतिष्ठा तथा आंतरिक स्वतंत्रता के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत होता है। दक्ष-यज्ञ से संबंधित प्रसिद्ध पौराणिक परंपरा में दक्ष शिव का अपमान करते हैं और उन्हें यज्ञ में उचित सम्मान नहीं देते। सती इस अपमान से व्यथित होती हैं। आ...

हरिवंशपुराण — भाग ६७ - भविष्यपर्व — बलि का पराभव

  हरिवंशपुराण — भाग ६७ - भविष्यपर्व — बलि का पराभव : शक्ति, अधिकार और धर्म का प्रश्न दैत्यराज बलि का आख्यान भारतीय पुराण-साहित्य में सत्ता, दान, प्रतिज्ञा और धर्म के परस्पर संबंध को समझने का महत्त्वपूर्ण अवसर देता है। बलि केवल एक पराक्रमी असुरराज नहीं है; वह ऐसा शासक भी है जिसकी शक्ति और उदारता दोनों का उल्लेख मिलता है। उसके चरित्र में एक ओर विजय की आकांक्षा है, दूसरी ओर दानशीलता और वचनपालन का गुण। यही विशेषताएँ उसके आख्यान को साधारण देवासुर-संघर्ष से आगे ले जाती हैं। बलि का संबंध प्रह्लाद की वंश-परंपरा से बताया जाता है। प्रह्लाद विष्णुभक्त थे, जबकि उनके वंशज बलि ने अपने पराक्रम और तप के बल पर विशाल सामर्थ्य प्राप्त किया। उसकी शक्ति इतनी बढ़ी कि देवताओं के अधिकार और स्वर्ग की व्यवस्था संकट में पड़ गए। देवताओं और दैत्यों के बीच संघर्ष का मूल प्रश्न केवल भूमि या संपत्ति का नहीं था; वह इस बात से भी जुड़ा था कि तीनों लोकों पर शासन करने का अधिकार किसके पास हो। पुराणों में बलि के उत्कर्ष का वर्णन उसके यज्ञों, दान और विजय के संदर्भ में मिलता है। वह अपनी सामर्थ्य के कारण देवताओं को चुनौती ...

हरिवंशपुराण — भाग ६६ - भविष्यपर्व — पृथु का आख्यान और समुद्र-मन्थन

  हरिवंशपुराण — भाग ६६ -  भविष्यपर्व — पृथु का आख्यान और समुद्र-मन्थन हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व में सृष्टि, देवताओं, असुरों और राजवंशों से जुड़े अनेक आख्यान आते हैं। इन कथाओं में केवल घटनाओं का वर्णन नहीं है, बल्कि राजा के दायित्व, प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध और सृष्टि में संतुलन बनाए रखने जैसे प्रश्न भी सामने आते हैं। राजा पृथु का आख्यान भारतीय पुराण-परंपरा में आदर्श शासन और पृथ्वी के पोषण से जुड़ा हुआ है। पृथु को ऐसा राजा माना गया है जिसने प्रजा के जीवन और उसकी आवश्यकताओं को शासन का केंद्र बनाया। इस कथा में पृथ्वी केवल मनुष्यों के रहने का स्थान नहीं, बल्कि जीवन को बनाए रखने वाले संसाधनों का आधार है। पृथु से संबंधित प्रसिद्ध पौराणिक आख्यान के अनुसार, उनके शासन से पहले पृथ्वी पर अन्न और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता का संकट उत्पन्न हुआ। प्रजा के सामने जीवन-निर्वाह की समस्या खड़ी हो गई। पृथु ने इस स्थिति को देखकर पृथ्वी से प्रजा के पोषण के साधन उपलब्ध कराने का आग्रह किया। कथा में पृथ्वी गाय का रूप धारण करती है और पृथु उसके पीछे जाते हैं। अंततः पृथ्वी से विभिन्न प्रकार के अन्न, ...

हरिवंशपुराण — भाग ६५ - भविष्यपर्व — मधु का वध और पृथ्वी का मेदिनी नाम

 हरिवंशपुराण — भाग ६५ - भविष्यपर्व — मधु का वध और पृथ्वी का मेदिनी नाम मधु और विष्णु का संघर्ष केवल दो शक्तिशाली योद्धाओं के बीच का युद्ध नहीं था। इस आख्यान में एक ओर मधु का अहंकार, सत्ता की आकांक्षा और विवेक का क्षय दिखाई देता है, तो दूसरी ओर विष्णु की वह शक्ति सामने आती है जो अव्यवस्था का अंत करके सृष्टि के संतुलन की रक्षा करती है। मधु ने इन्द्र को बंधन में डालकर स्वयं को देवताओं से श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया था। वह इन्द्र का पद प्राप्त करना चाहता था और इसी इच्छा ने उसे देवताओं के विरुद्ध युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। उसके साथ दैत्य-सेना थी। गन्धर्व और किन्नर अपने संगीत तथा नृत्य से युद्ध के वातावरण को प्रभावित कर रहे थे। इस बीच विष्णु ने मधु के चित्त को विषयों में उलझाकर उसके विवेक को विचलित किया और स्वयं मन्दर पर्वत पर अंतर्धान हो गए। इस प्रसंग में युद्ध केवल बाहरी शक्ति का नहीं, बल्कि मन और विवेक का भी संघर्ष बन जाता है। मधु ने क्रोध में आकर विष्णु पर प्रहार किया, किंतु विष्णु विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपनी उँगली के अग्रभाग से मधु की छाती पर प्रहार किया। उस आघात से मध...

हरिवंशपुराण — भाग ६४ - भविष्यपर्व — मधु और विष्णु का युद्ध

 हरिवंशपुराण — भाग ६४ - भविष्यपर्व — मधु और विष्णु का युद्ध देवताओं और दैत्यों के संघर्ष की पृष्ठभूमि के बाद कथा मधु और विष्णु के युद्ध की ओर बढ़ती है। इस प्रसंग में संघर्ष अब सामान्य चर्चा नहीं रहता, बल्कि विशिष्ट पात्रों के बीच प्रत्यक्ष टकराव का रूप ग्रहण करता है। विष्णु भारतीय पुराणपरंपरा में सृष्टि के पालन और व्यवस्था के संरक्षण से संबंधित प्रमुख देवता हैं। उनके अनेक आख्यानों में संकट के समय हस्तक्षेप, विरोधी शक्तियों का सामना और व्यवस्था की पुनर्स्थापना प्रमुख विषय बनते हैं। मधु के साथ उनका संघर्ष भी इसी संदर्भ में विचारणीय है, यद्यपि इस विशेष प्रसंग का पूरा अर्थ निर्धारित करने के लिए भविष्यपर्व के संबंधित मूल अध्याय का पाठ आवश्यक है। मधु का नाम भारतीय पौराणिक साहित्य में एक से अधिक कथा-संदर्भों में मिलता है। विशेष रूप से मधु-कैटभ की प्रसिद्ध कथा विष्णु और ब्रह्मा से संबंधित आख्यानों में आती है। लेकिन हरिवंशपुराण के इस प्रसंग में मधु की भूमिका, युद्ध का कारण और घटनाओं का क्रम मूल पाठ से ही निर्धारित किया जाना चाहिए। केवल नाम की समानता के आधार पर किसी दूसरे ग्रंथ की पूरी कथा य...