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हरिवंशपुराण — प्रथम खंड भाग 2 : महाभारत के बाद हरिवंश की आवश्यकता क्यों?

  हरिवंशपुराण — प्रथम खंड  भाग 2 : महाभारत के बाद हरिवंश की आवश्यकता क्यों? महाभारत भारतीय सभ्यता के उन महान ग्रंथों में है जिसमें मनुष्य, समाज, राज्य, धर्म और सत्ता के जटिल प्रश्न एक साथ उपस्थित होते हैं। कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो राजवंशों का संघर्ष नहीं है; उसके भीतर परिवार के विघटन, राज्य की आकांक्षा, प्रतिज्ञा, न्याय, कर्तव्य, मोह और धर्म-संकट की अनेक परतें दिखाई देती हैं। इस विराट आख्यान में कृष्ण का व्यक्तित्व धीरे-धीरे कथा के केंद्र में आ जाता है। फिर भी महाभारत का उद्देश्य कृष्ण का जीवनचरित प्रस्तुत करना नहीं है। महाभारत हमें उस कृष्ण से परिचित कराता है जो पांडवों के मित्र हैं, अर्जुन के सारथी हैं, राजनयिक हैं, युद्ध की दिशा को प्रभावित करने वाले रणनीतिकार हैं और भगवद्गीता के माध्यम से धर्म, कर्म और आत्मज्ञान का गहन दर्शन प्रस्तुत करते हैं। लेकिन स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न सामने आता है— यह कृष्ण कौन हैं? वे किस वंश से आते हैं? उनका जन्म किन परिस्थितियों में हुआ? उनके माता-पिता कौन थे? यादव कौन थे? मथुरा और कंस का कृष्ण से क्या संबंध था? वे द्वारका तक कैसे पहुँचे? और...

हरिवंशपुराण — प्रथम खंड - भाग 1 : हरिवंश क्या है?

हरिवंशपुराण — प्रथम खंड -  भाग 1 : हरिवंश क्या है? हरिवंशपुराण के अध्ययन की शुरुआत उसके नाम और स्वरूप को समझने से होनी चाहिए। किसी प्राचीन ग्रंथ को समझने के लिए केवल उसकी कथाओं को जान लेना पर्याप्त नहीं होता; यह जानना भी आवश्यक है कि वह ग्रंथ किस परंपरा से आया, उसका मूल प्रयोजन क्या था, वह किसी बड़े ग्रंथ से किस प्रकार जुड़ा और कालांतर में उसकी पहचान किस प्रकार विकसित हुई। ‘हरिवंश’ इसी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह एक ओर महाभारत के साथ संबद्ध है, दूसरी ओर इसमें ऐसी विषय-वस्तु मिलती है जो इसे विकसित होती हुई पुराण-परंपरा से जोड़ती है। इसके केंद्र में कृष्ण हैं, परंतु कृष्ण तक पहुँचने के लिए ग्रंथ पहले सृष्टि, देव-परंपरा, वंश और राजवंशों की एक विस्तृत पृष्ठभूमि निर्मित करता है। इसलिए हरिवंश को केवल कृष्ण की कथा कहना उसके वास्तविक स्वरूप को छोटा कर देना होगा। ‘हरिवंश’ नाम का अर्थ ‘हरिवंश’ दो शब्दों से बना है— हरि + वंश । ‘हरि’ भारतीय वैदिक और पौराणिक परंपरा में विष्णु, नारायण और कृष्ण से संबंधित एक अत्यंत व्यापक नाम है। ‘वंश’ का अर्थ है—कुल, परंपरा, वंशक्रम अथवा पीढ़ियों ...

महाभारत — अठारह पर्वों की सम्पूर्ण यात्रा

महाभारत — अठारह पर्वों की सम्पूर्ण यात्रा समग्र उपसंहार : अठारह पर्वों से मनुष्य की अंतर्यात्रा तक महाभारत का आरम्भ एक राजवंश की कथा से होता है, पर उसका अंत किसी राजवंश की विजय पर नहीं होता। हस्तिनापुर की राजसभा से आरम्भ हुई यह कथा वन, अज्ञातवास, युद्ध, शोक, तप, त्याग और अंततः स्वर्गारोहण तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य के भीतर की उस यात्रा में बदल जाती है, जहाँ प्रश्न राज्य का नहीं, धर्म का हो जाता है और प्रश्न विजय का नहीं, विजय के बाद बचे हुए मनुष्य का हो जाता है। अठारह पर्वों की संक्षिप्त यात्रा आदिपर्व महाभारत की आधारभूमि है। इसमें कुरुवंश की वंशपरंपरा, शांतनु-गंगा, भीष्म की प्रतिज्ञा, धृतराष्ट्र-पांडु-विदुर का जन्म, पांडवों और कौरवों का बाल्यकाल, द्रोणाचार्य से शिक्षा, द्रौपदी स्वयंवर और इन्द्रप्रस्थ की स्थापना जैसे प्रसंग आते हैं। यहीं भविष्य के संघर्ष के अधिकांश बीज पड़ते हैं। सभापर्व में इन्द्रप्रस्थ की मयसभा, राजसूय यज्ञ और द्यूतसभा के माध्यम से सत्ता, ईर्ष्या और अपमान का संकट सामने आता है। द्रौपदी का सभा में किया गया प्रश्न महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण नैतिक प्रसंगों में से एक बनत...

महाभारत — स्वर्गारोहणिकपर्व - भाग २ : युधिष्ठिर का अंतिम आरोहण

महाभारत — स्वर्गारोहणिकपर्व - भाग २ : युधिष्ठिर का अंतिम आरोहण युधिष्ठिर ने जब अपने भाइयों, द्रौपदी, कृष्ण और अन्य परिचितों को दिव्य लोक में देखा, तब उनके जीवन की पृथ्वी-यात्रा जैसे एक पूर्ण चक्र बन गई। लेकिन स्वर्गारोहणिकपर्व का अंतिम अर्थ केवल स्वर्ग में प्रियजनों से मिलना नहीं है। महाभारत युधिष्ठिर को धीरे-धीरे उस स्थिति तक ले जाता है जहाँ सांसारिक पहचानें पीछे छूट जाती हैं। उन्होंने अपने जीवन में धर्म का पालन किया था, लेकिन धर्म उनके लिए केवल नियम नहीं था। अनेक अवसरों पर उन्हें ऐसे निर्णय लेने पड़े जहाँ कोई सरल उत्तर उपलब्ध नहीं था। द्यूतसभा से लेकर वनवास, कुरुक्षेत्र और महाप्रस्थान तक उनका जीवन इसी परीक्षा से गुजरता रहा। अब पृथ्वी का कोई दायित्व शेष नहीं था। उन्होंने राज्य छोड़ा। परिवार छोड़ा। शरीर छोड़ा। और अंततः वह अवस्था आई जहाँ केवल चेतना और सत्य का प्रश्न रह गया। महाभारत के अनुसार युधिष्ठिर को दिव्य लोक में वह स्थिति प्राप्त हुई जहाँ उनके सांसारिक कर्मों का अंतिम फल सामने आया। वहाँ पांडव और उनके प्रियजन दिव्य स्वरूप में स्थित थे। कृष्ण भी वहाँ थे। यादवों के वे पुरुष भी वहाँ थ...

महाभारत — स्वर्गारोहणिकपर्व - भाग १ : स्वर्ग का द्वार और अंतिम परीक्षा

महाभारत — स्वर्गारोहणिकपर्व - भाग १ : स्वर्ग का द्वार और अंतिम परीक्षा महाप्रस्थान की यात्रा समाप्त हो चुकी थी। युधिष्ठिर के पीछे पृथ्वी का सम्पूर्ण जीवन छूट चुका था। हस्तिनापुर का राज्य, राजसी वैभव, भाई, द्रौपदी, युद्ध की स्मृतियाँ और जीवन के सभी संबंध अब पीछे थे। इन्द्र के दिव्य रथ में बैठकर युधिष्ठिर स्वर्ग की ओर बढ़े।  लेकिन महाभारत में स्वर्ग केवल पुरस्कार का स्थान नहीं है। वहाँ भी युधिष्ठिर के सामने एक अंतिम परीक्षा रखी गई। स्वर्ग में प्रवेश करते ही उन्होंने दुर्योधन को देखा। दुर्योधन दिव्य वैभव से युक्त दिखाई दे रहे थे। देवताओं के बीच उनका सम्मान हो रहा था। युधिष्ठिर यह देखकर चकित हुए। उनके मन में कुरुक्षेत्र का पूरा इतिहास एक क्षण में जीवित हो उठा—द्यूतसभा, वनवास, विराट, युद्ध, अभिमन्यु का वध, द्रौपदी का अपमान और अंततः कुरुक्षेत्र का विनाश। उन्होंने पूछा— “मेरे भाई कहाँ हैं?” देवताओं ने उन्हें बताया कि वे जहाँ हैं, वहाँ जाकर उन्हें खोजने की आवश्यकता नहीं। युधिष्ठिर ने आग्रह किया कि वे अपने भाइयों और द्रौपदी को देखना चाहते हैं। उन्हें एक दूसरे मार्ग से ले जाया गया। वहाँ स्वर...

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग ३ : युधिष्ठिर और स्वर्ग का रथ

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग ३ : युधिष्ठिर और स्वर्ग का रथ हिमालय की कठिन यात्रा अब अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी थी। द्रौपदी और चारों भाई पीछे छूट चुके थे। युधिष्ठिर अकेले आगे बढ़ रहे थे। उनके साथ केवल वह कुत्ता था, जो हस्तिनापुर से निकलने के समय से ही उनके पीछे चलता आया था। यह दृश्य महाभारत के पूर्ववर्ती समूचे इतिहास से बिल्कुल भिन्न था। कभी युधिष्ठिर के साथ राजसत्ता थी, भाई थे, द्रौपदी थीं, सेना थी और कृष्ण का मार्गदर्शन था। अब उनके पास इनमें से कुछ भी नहीं था। फिर भी वे चलते रहे। उनके सामने हिमालय की ऊँचाइयाँ थीं। पीछे उनका सम्पूर्ण जीवन पड़ा था। तभी आकाश में एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया। इन्द्र का रथ उनके सामने आकर रुका। इन्द्र ने युधिष्ठिर को स्वर्ग चलने के लिए आमंत्रित किया। युधिष्ठिर ने रथ की ओर देखा। लेकिन उन्होंने तुरंत उस पर चढ़ने से इनकार नहीं किया और न ही उत्साह में अपने पीछे छूटे भाइयों और द्रौपदी को भूल गए। उन्होंने पूछा कि उनके भाई और द्रौपदी कहाँ हैं। इन्द्र ने बताया कि वे अपने-अपने कर्मों के कारण मार्ग में गिर चुके हैं। उनका शरीर अब उनके साथ नहीं है, लेकिन उन्हें उ...

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग २ : गांडीव का त्याग और अंतिम यात्रा

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग २ : गांडीव का त्याग और अंतिम यात्रा हस्तिनापुर में पांडवों के महाप्रस्थान का निर्णय हो चुका था, लेकिन उससे पहले राज्य और वंश की व्यवस्था पूरी करना आवश्यक था। युधिष्ठिर ने परीक्षित को हस्तिनापुर के सिंहासन पर स्थापित किया। वे अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र थे—कुरुवंश की उस अगली पीढ़ी के प्रतिनिधि, जिसके जन्म ने युद्ध के बाद वंश की निरंतरता बनाए रखी थी। यादववंश की ओर से भी व्यवस्था की गई। वज्र को इन्द्रप्रस्थ का राजा बनाया गया। इस प्रकार पांडवों ने दोनों राजवंशों के भविष्य को अपने व्यक्तिगत जीवन से अलग कर दिया। राज्य अब उनका नहीं था। उन्होंने अपने धन, राजसी वस्त्र और आभूषण त्याग दिए। द्रौपदी उनके साथ थीं। धौम्य भी उनके साथ चले। पांडवों ने अग्नि को आगे रखते हुए अपनी अंतिम यात्रा आरम्भ की। इसी समय एक महत्वपूर्ण घटना घटी। अर्जुन के पास अब भी गांडीव धनुष और अक्षय तूणीर थे। यही वे दिव्य साधन थे जिनके साथ उन्होंने जीवन के असंख्य युद्ध लड़े थे। कुरुक्षेत्र की स्मृति अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। तभी अग्निदेव का संबंध इस प्रसंग से जुड़ता है। महाभारत की कथा के अ...

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग १ : राज्य से महाप्रस्थान तक

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग १ : राज्य से महाप्रस्थान तक मौसलपर्व में एक युग का अंत हो चुका था। कृष्ण पृथ्वी से विदा हो चुके थे। बलराम का भी प्रस्थान हो चुका था। यादवों का विनाश हो चुका था और समुद्र ने द्वारका को अपने भीतर समेट लिया था। अर्जुन हस्तिनापुर लौटकर व्यास से प्राप्त ज्ञान युधिष्ठिर को सुना चुके थे। अब पांडवों के सामने कोई बाहरी संकट नहीं था। लेकिन उनके भीतर एक निर्णय जन्म ले चुका था। कुरुक्षेत्र के युद्ध को अनेक वर्ष बीत चुके थे। हस्तिनापुर में राज्य व्यवस्थित था। परीक्षित के लिए भविष्य सुरक्षित किया जा सकता था। पांडवों ने अपने जीवन का वह कार्य पूरा कर लिया था जिसके लिए उन्होंने वनवास सहा, अज्ञातवास बिताया और अंततः महायुद्ध लड़ा था। अब प्रश्न राज्य प्राप्त करने का नहीं था। प्रश्न था— प्राप्त राज्य से कब और कैसे निवृत्त हुआ जाए। युधिष्ठिर ने अर्जुन से द्वारका और यादवों के अंत की पूरी कथा सुनी। कृष्ण के प्रस्थान ने उनके भीतर उस सत्य को और स्पष्ट कर दिया जिसे वे पहले से अनुभव कर रहे थे—समय किसी व्यक्ति, वंश या साम्राज्य के लिए स्थिर नहीं रहता। जिस संसार में कृष्ण जैसे महाप...

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ९ : अर्जुन, व्यास और काल का विधान

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ९ : अर्जुन, व्यास और काल का विधान मौसलपर्व का अंतिम चरण द्वारका के डूबने पर समाप्त नहीं होता। कृष्ण, बलराम और यादवों के प्रस्थान के बाद भी अर्जुन की यात्रा शेष थी। उसे कृष्ण के परिवार के बचे हुए लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाना था और फिर अपने भीतर उठे उस प्रश्न का उत्तर खोजना था, जिसे वह स्वयं समझ नहीं पा रहा था— कृष्ण के रहते जो सामर्थ्य उसके भीतर थी, वह कृष्ण के जाने के बाद कहाँ चली गई? अर्जुन सातवें दिन द्वारका से प्रस्थान करता है। उसके साथ यादव-वंश के बचे हुए स्त्री, बालक और वृद्ध थे। वह मृत यादव नायकों के अंतिम संस्कार और श्राद्ध का विधान पूरा कर चुका था। कृष्ण और बलराम के शरीरों का भी संस्कार कराया गया। वसुदेव का योग द्वारा देहत्याग और उनके अंतिम संस्कार का वर्णन भी इसी प्रसंग में आता है। द्वारका से यह अंतिम यात्रा आरम्भ हुई। तभी समुद्र ने उस नगर को अपने भीतर लेना शुरू किया। महाभारत के वर्णन में यह क्रम महत्वपूर्ण है। अर्जुन और बचे हुए लोग नगर से निकल चुके थे; उसके बाद समुद्र ने द्वारका को घेर लिया। उसकी प्राचीरें, भवन, उद्यान और राजमार्ग जल में समा गए...

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ८ : द्वारका से हस्तिनापुर तक

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ८ : द्वारका से हस्तिनापुर तक द्वारका पीछे छूट चुकी थी। समुद्र अपने भीतर उस नगर को समेट रहा था, जिसने कभी यादव शक्ति, कृष्ण की राजनीति और समुद्रपारीय समृद्धि का केंद्र बनकर इतिहास और आख्यान—दोनों में अपना स्थान बनाया था। अर्जुन के सामने अब कोई युद्ध नहीं था। उसके सामने केवल लौटने की यात्रा थी। लेकिन यह वापसी साधारण नहीं थी। उसके साथ वे स्त्रियाँ, बच्चे और वृद्ध थे जो यादव-विनाश के बाद जीवित बचे थे। उनके लिए द्वारका केवल एक नगर नहीं, उनका घर था; अर्जुन के लिए वह कृष्ण की स्मृति थी। मार्ग में जिन आक्रमणकारियों ने उनके समूह को घेरा था, उनसे संघर्ष के बाद अर्जुन ने पहली बार अपनी शक्ति की उस सीमा को स्वीकार किया जिसे वह स्वयं भी समझ नहीं पा रहा था। गांडीव उसके हाथ में था, पर वह पुराना अर्जुन उसके भीतर उसी रूप में उपस्थित नहीं था। महाभारत इस घटना को अत्यंत संक्षेप में रखता है, लेकिन उसका प्रभाव व्यापक है। कुरुक्षेत्र के बाद अर्जुन के पास विजय की स्मृति थी। अब उसके पास संरक्षण का दायित्व था। युद्ध में शत्रु को परास्त करना और असहाय लोगों को सुरक्षित रखना एक ही प्रकार की...