अध्याय–13 | भाग–3 कर्मफल — परिणाम, प्रारब्ध और भाग्य का दार्शनिक अध्ययन
अध्याय –13 | भाग –3 कर्मफल — परिणाम , प्रारब्ध और भाग्य का दार्शनिक अध्ययन कर्मफल शब्द की व्युत्पत्ति , भाषिक विकास एवं शास्त्रीय परिभाषाएँ मुख्य प्रश्न (Central Question) " कर्मफल " शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है ? क्या यह केवल " कर्म का फल " है , या भारतीय दर्शन में इसका कोई विशिष्ट दार्शनिक आशय है ? संस्कृत में कर्म , फल , विपाक , परिणाम , प्रतिफल , प्रारब्ध , संचित और भाग्य जैसे शब्दों का परस्पर क्या संबंध है ? क्या ये सभी समानार्थी हैं , अथवा प्रत्येक एक अलग दार्शनिक अवधारणा का प्रतिनिधित्व करता है ? मुख्य विश्लेषण (Main Analysis) किसी भी दार्शनिक विमर्श की दृढ़ता उसकी भाषा की स्पष्टता पर निर्भर करती है। यदि शब्दों के अर्थ अस्पष्ट हों , तो तर्क भी भ्रमित हो जाते हैं। भारतीय दर्शन में यह सिद्धान्त अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है। इसी कारण प्राचीन आचार्यों ने किसी विषय की चर्चा प्रारम्भ करने से पहले उसके प्रमुख शब्दों की व्युत्पत्ति ...