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ईश्वर की अनुपस्थिति

 ईश्वर की अनुपस्थिति कई दिनों से ईश्वर कार्यालय नहीं आए। प्रार्थनाएँ जमा होती रहीं। घंटियाँ बजती रहीं। अगरबत्तियाँ जलती रहीं। पर कोई उत्तर नहीं मिला। तब एक दिन एक बच्चे ने अपने हिस्से की रोटी एक भूखे कुत्ते को दे दी। उसी शाम कार्यालय के बाहर एक नोटिस चिपका मिला "मैं यहीं था। तुम लोग गलत कमरे में खोज रहे थे।" मुकेश ,,,,

आधुनिक चित्रकला की बारीकियाँ : विशेषतः अमूर्त कला (Abstract Art) का सौन्दर्यशास्त्र

आधुनिक चित्रकला की बारीकियाँ : विशेषतः अमूर्त कला (Abstract Art) का सौन्दर्यशास्त्र जब कोई व्यक्ति पहली बार किसी अमूर्त (Abstract) चित्र के सामने खड़ा होता है, तो उसके मन में प्रायः एक प्रश्न उठता है—  "इसमें बना क्या है?" यही प्रश्न आधुनिक अमूर्त कला और पारम्परिक चित्रकला के बीच का सबसे बड़ा अन्तर भी है। पारम्परिक चित्रकला में दर्शक किसी वस्तु, व्यक्ति, दृश्य या घटना को पहचानने का प्रयास करता है। वह देखना चाहता है कि चित्रकार ने क्या चित्रित किया है। किन्तु अमूर्त कला में प्रश्न बदल जाता है। वहाँ कलाकार यह नहीं पूछता कि "तुम क्या देख रहे हो?", बल्कि यह पूछता है— "तुम क्या अनुभव कर रहे हो?" यहीं से आधुनिक चित्रकला का नया अध्याय आरम्भ होता है। आधुनिक चित्रकला का जन्म उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक पश्चिमी चित्रकला का मुख्य उद्देश्य यथार्थ का दृश्य पुनर्निर्माण था। फिर फोटोग्राफी का आविष्कार हुआ। अब यथार्थ को हू-ब-हू दिखाने का कार्य कैमरा अधिक कुशलता से करने लगा। चित्रकारों के सामने प्रश्न था— अब कला क्या करेगी? उत्तर था— कला दृश्य संसार की नकल नहीं...

तुमने अपना दुःख

 तुमने अपना दुःख खिड़की पर रख दिया। सोचा, थोड़ी हवा लगेगी तो हल्का हो जाएगा। पर दुःख वहीं पड़ा रहा। उसका रंग भी नहीं बदला। उसकी गंध भी नहीं। रात भर चाँद उसे देखता रहा जैसे किसी पुरानी भाषा का अनपढ़ विद्यार्थी। सुबह मैंने उस दुःख को छुआ। और वह धीरे-धीरे कहानी में बदलने लगा। दुःख को मुक्ति समय नहीं देता, कोई श्रोता देता है। मुकेश ,,,,

तुमने अपना दुःख

 तुमने अपना दुःख खिड़की पर रख दिया। सोचा, थोड़ी हवा लगेगी तो हल्का हो जाएगा। पर दुःख वहीं पड़ा रहा। उसका रंग भी नहीं बदला। उसकी गंध भी नहीं। रात भर चाँद उसे देखता रहा जैसे किसी पुरानी भाषा का अनपढ़ विद्यार्थी। सुबह मैंने उस दुःख को छुआ। और वह धीरे-धीरे कहानी में बदलने लगा। दुःख को मुक्ति समय नहीं देता, कोई श्रोता देता है। मुकेश ,,,,

तुमने एक बीज बोया।

तुमने एक बीज बोया। मिट्टी तैयार थी। ऋतु अनुकूल थी। जल भी पर्याप्त था। फिर भी अंकुर बाहर नहीं आया। धरती ने उसे रोके रखा कई दिनों तक। शायद वह प्रतीक्षा कर रही थी उस आवाज़ की जो बीजों को विश्वास दिलाती है कि अंधकार के बाहर वास्तव में एक संसार है। प्रेम अक्सर उसी आवाज़ का दूसरा नाम है। मुकेश ,,,,

तुमने हँसना चाहा।

 तुमने हँसना चाहा। होठ खुले। दाँतों पर धूप उतरी। गालों में दो छोटे-से उजाले बने। पर हँसी अपने पूरे आकार में नहीं आई। बीच रास्ते से लौट गई। जैसे किसी यात्री को अचानक याद आ गया हो कि उसका घर पीछे छूट गया है। मैंने दूर से तुम्हें याद किया और तुम्हारी हँसी ने अपना शेष सफ़र पूरा किया। मुकेश ,,,,

तुमने एक प्रश्न पूछा।

 तुमने एक प्रश्न पूछा। बहुत साधारण-सा। जैसे कोई बच्चा नदी से उसका पता पूछ ले। पर उत्तर देने के बजाय हवा दिशा बदल गई। पेड़ों ने पत्तियाँ समेट लीं। आकाश ने अपना नीला वस्त्र उतारकर धूसर चादर ओढ़ ली। कुछ प्रश्न शब्दों से नहीं, उपस्थितियों से उत्तर माँगते हैं। और मेरी उपस्थिति उन दिनों तुम्हारे पास नहीं थी। मुकेश ,,,,