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महाभारत - सभापर्व - द्यूत आख्यान — भाग 3

 द्यूत आख्यान — भाग 3 धृतराष्ट्र के वरदान और अनुद्यूत : बचा हुआ सब कुछ फिर क्यों खोया गया? द्यूतसभा में अचानक भय का वातावरण द्रौपदी का अपमान चरम पर पहुँच चुका था। सभा के भीतर धर्म, सत्ता और पारिवारिक मर्यादा—तीनों जैसे एक साथ टूट चुके थे। यहीं महाभारत एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण मोड़ देता है। धृतराष्ट्र को भय होता है। पर यह भय केवल द्रौपदी के अपमान का नहीं है। सभा में उत्पन्न अशुभ संकेत और वातावरण उसे यह अनुभव कराते हैं कि बात अब केवल पाण्डवों की हार तक सीमित नहीं रही। कुरुवंश स्वयं संकट में पड़ गया है। गांधारी भी धृतराष्ट्र को चेताती हैं कि दुर्योधन की करतूतों को अब रोका जाना चाहिए। यही वह क्षण है जब धृतराष्ट्र, जो इतने समय तक पुत्र-मोह के कारण निष्क्रिय रहा था, अचानक सक्रिय होता है। और वह द्रौपदी को सम्बोधित करता है। धृतराष्ट्र द्रौपदी से वर माँगने को कहते हैं यह दृश्य बहुत महत्वपूर्ण है। जिस स्त्री को कुछ ही क्षण पहले सभा में वस्तु की तरह दाँव पर लगाया गया था, वही अब राजा के सामने खड़ी है और राजा उससे कहता है—  “तुम वर माँगो।” यहाँ महाभारत द्रौपदी को केवल पीड़िता के रूप में नहीं...

महाभारत में राजाओं के चार व्यसन

 यदि महाभारत के केवल द्यूत-पर्व को अलग करके न देखा जाए, बल्कि उसके आख्यानों और उपाख्यानों में बार-बार आने वाले प्रसंगों को साथ रखकर देखा जाए, तो एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है—  महाभारत में “व्यसन” केवल व्यक्तिगत चरित्र-दोष नहीं है; वह राजसत्ता के विवेक को नष्ट करने वाली मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक शक्ति है। और द्यूत इन चार व्यसनों में सबसे विशिष्ट दिखाई देता है, क्योंकि शिकार, मद्य और कामासक्ति मुख्यतः व्यक्ति को गिराते हैं, जबकि द्यूत व्यक्ति के साथ-साथ परिवार, राज्य, संबंध और अंततः समाज को भी जुए में लगा देता है। महाभारत स्वयं चार व्यसनों को स्पष्ट रूप से गिनाता है— चत्वार्याहुर्नरश्रेष्ठा व्यसनानि महीक्षिताम्। मृगयां पानमक्षांश्च ग्राम्ये चैवातिसक्तताम्॥ अर्थात् राजाओं के चार व्यसन हैं— मृगया, पान, अक्ष/द्यूत और ग्राम्य-विषयों में अतिशय आसक्ति।   आइए इन्हें महाभारत के आख्यानों और उपाख्यानों के भीतर खोजें। महाभारत में राजाओं के चार व्यसन — आख्यान और उपाख्यानों के भीतर एक तुलनात्मक विवेचन १. मृगया — शिकार से आरम्भ होकर हिंसा तक महाभारत में शिकार अपने-आप में निषिद्...

महाभारत - सभापर्व -द्यूत आख्यान — भाग २

अब हम द्यूत आख्यान के उस भाग में प्रवेश करते हैं जहाँ महाभारत का पूरा नैतिक और नाटकीय तनाव एक स्त्री के एक प्रश्न में संकेंद्रित हो जाता है। द्यूत आख्यान — भाग २ द्रौपदी को सभा में बुलाया जाना और धर्म का प्रश्न पिछले भाग में हमने देखा कि द्यूत धीरे-धीरे धन से मनुष्य तक पहुँचा और अंततः युधिष्ठिर ने स्वयं को हारने के बाद द्रौपदी को दाँव पर लगाया। अब कथा वहीं से आगे बढ़ती है। दुर्योधन का आदेश शकुनि ने घोषणा कर दी—  द्रौपदी जीत ली गयी। अब दुर्योधन के सामने प्रश्न था—उस विजय को कैसे सिद्ध किया जाए? वह अपने सेवक प्रतिकामिन् को आदेश देता है—  “द्रौपदी को यहाँ ले आओ।” दुर्योधन उसे अब पाण्डवों की महारानी के रूप में नहीं, बल्कि जीती हुई दासी के रूप में देखना चाहता है। यहीं कथा का स्वर बदल जाता है। अब तक खेल चल रहा था। अब मानव गरिमा का प्रश्न सामने आ गया है। प्रतिकामिन् द्रौपदी के पास जाता है प्रतिकामिन् द्रौपदी के पास पहुँचता है। वह उसे बताता है कि युधिष्ठिर द्यूत में हार चुके हैं और दुर्योधन ने उसे सभा में बुलाया है। द्रौपदी इस सूचना को सुनकर चकित होती है। उसका पहला प्रश्न बहुत महत्...

सभापर्व — आख्यान : द्यूत की ओर बढ़ती सभा

 सभापर्व — आख्यान : द्यूत की ओर बढ़ती सभा द्यूत अचानक नहीं आया राजसूय समाप्त हो चुका है। शिशुपाल मारा जा चुका है। दूर-दूर के राजा युधिष्ठिर की सार्वभौम प्रतिष्ठा स्वीकार करके लौट चुके हैं। पाण्डवों की समृद्धि अपने चरम पर है। लेकिन इसी समय एक दूसरा दृश्य जन्म लेता है। दुर्योधन उस अद्भुत सभा में ठहरता है। वही मायासभा , जिसे मय दानव ने बनाया था—जहाँ जल भूमि दिखाई देता है और भूमि जल जैसी प्रतीत हो सकती है; जहाँ वास्तु स्वयं दृष्टि को भ्रमित करता है। दुर्योधन इस वैभव को देखता है। और उसके भीतर एक भावना जन्म लेती है—  ईर्ष्या। वह केवल यह नहीं देख रहा कि पाण्डव समृद्ध हैं। वह यह देख रहा है कि—  जिस राजकीय वैभव को वह अपने पिता के राज्य और कुरुवंश का स्वाभाविक अधिकार समझता था, वह अब पाण्डवों के पास है। महाभारत के वर्णन में दुर्योधन की पीड़ा इतनी तीव्र है कि वह अपनी मानसिक स्थिति धृतराष्ट्र के सामने जाकर बताता है। वह युधिष्ठिर की संपत्ति, राजाओं की उपस्थिति और सभा की भव्यता का वर्णन करता है।  यहीं से द्यूत की भूमिका तैयार होती है। दुर्योधन और शकुनि का संवाद दुर्योधन अपने मामा श...

महाभारत - महाभारत - सभापर्व -दिग्विजय के बाद राजसूय क्यों?

  अब हम सभापर्व के अगले निर्णायक चरण — राजसूय से शिशुपालवध तक आते हैं। यहाँ कथा का स्वर अचानक और महत्वपूर्ण ढंग से बदलता है : दिग्विजय से प्राप्त राजनीतिक शक्ति अब वैदिक - राजकीय वैधता में बदलती है , और उसी चरम पर कृष्ण के पक्ष में लिया गया निर्णय शिशुपाल - वध का कारण बनता है। १ . दिग्विजय के बाद राजसूय क्यों ? दिग्विजय के बाद पाण्डवों ने चारों दिशाओं से — राजकीय स्वीकृति , कर / भेंट , धन , सैन्य प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली। अब युधिष्ठिर के सामने प्रश्न है — क्या इस शक्ति को " सम्राट " की वैधता में बदला जा सकता है ? यहीं राजसूय आता है। इसे केवल धार्मिक यज्ञ कहना अधूरा होगा। सभापर्व की कथा में राजसूय के तीन आयाम दिखाई देते हैं : धार्मिक संस्कार + राजनीतिक सार्वभौमिकता + सामाजिक प्रतिष्ठा। इसलिए हमारा शोध - सूत्र होना चाहिए — दिग्विजय ने युधिष्ठिर को शक्ति दी ; राजसूय उस शक्ति को वैधता देता है। २ . राजसूय की कथा में कृष्ण ...