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Friday, 27 March 2026

मैं, तुम और सुबह का तारा

 मैं, तुम और सुबह का तारा


मैं,

एक ठहरी हुई रात का आख़िरी ख़्वाब,

जिसकी पलकों पर

अब भी नींद की नमी बाक़ी है।


तुम—

एक नरम सी रोशनी,

जो अँधेरे से लड़ती नहीं,

बस उसे ख़ुद में घोल देती है।


और वो—

सुबह का तारा,

शुक्र…

जो आसमान के माथे पर

मोहब्बत की आख़िरी निशानी बनकर चमकता है।


हम तीनों

कभी एक ही लम्हे में मिले थे—

जब रात

धीरे-धीरे उतर रही थी,

और सुबह

चुपचाप जन्म ले रही थी।


मैंने तुम्हें देखा—

जैसे कोई इबादत

अचानक क़ुबूल हो जाए,

बिना माँगे,

बिना आवाज़ के।


तुमने मुस्कुराकर

आसमान की तरफ़ इशारा किया—

“देखो…

वो तारा अब भी वहीं है।”


मैंने पूछा—

“क्या ये हर सुबह आता है?”


तुमने कहा—

“हाँ…

मगर हर किसी को नज़र नहीं आता।”


उस दिन समझ आया—

मोहब्बत भी

उसी तारे की तरह होती है,

हर दिल के आसमान पर उगती है,

मगर हर कोई

उसे पहचान नहीं पाता।


मैं रात था—

तुम सुबह,

और वो तारा

हम दोनों के दरमियान

एक ख़ामोश पुल।


जब तुम चली गईं,

तो सुबह भी साथ ले गईं,

बस वो तारा रह गया—

मेरे और तुम्हारे दरमियान

एक अधूरी रौशनी बनकर।


अब जब भी

फ़ज्र की हवा चलती है,

मैं आसमान को देखता हूँ—

शायद तुम फिर

किसी किरण के साथ लौट आओ।


और वो तारा—

अब भी वहीं होता है,

मगर अब

वो सिर्फ़ रौशनी नहीं,

एक याद है।


एक ऐसी याद

जो हर सुबह कहती है—


“मोहब्बत कभी जाती नहीं,

बस अपनी शक्ल बदल लेती है।”


मैं—

अब भी रात का हिस्सा हूँ,

तुम—

शायद किसी और सुबह में हो,


मगर वो तारा…

हम दोनों का है,

जो हर रोज़ उगकर भी

कभी पूरी तरह ढलता नहीं।


मुकेश ,,,,

एक सितारे की तन्हाई

 एक सितारे की तन्हाई


वो एक सितारा थी

न सबसे रौशन,

न कोई जिसे नाम मिला हो,

बस एक ख़ामोश चमक

जो बे-किनारा आसमान में खोई हुई थी।


वो आग से पैदा हुई थी

एक शोर भरे विस्फोट में,

मगर उसकी ज़िन्दगी

दूर से हमेशा

सुकून जैसी दिखती रही।


बरसों तक

वो ख़ामोशी में जलती रही

अपनी रौशनी देती हुई

उन दुनिया वालों को

जिन्हें वो कभी छू नहीं सकती थी,

रास्ते दिखाती हुई

जिन पर वो खुद कभी चल नहीं सकती थी।


कुछ सैय्यारे

दूसरों के इर्द-गिर्द घूमते रहे,

कहीं आकाशगंगाएँ

अपनों में सिमटी रहीं

मगर वो…

वो ठहरी रही,

एक ऐसी जगह पर

जिसे उसने कभी चुना ही नहीं।


कभी-कभी

वो गुज़रते हुए शहाबों को देखती

आज़ाद, बेक़रार, लम्हाती

और सोचती

कि चलना कैसा होता होगा।


तारीकी अक्सर उससे कहती

“तू काफ़ी है,

तू इस ख़ला को रौशन करती है।”


मगर वो जानती थी—

ख़ला को रौशन करना

उसे भर देना नहीं होता।


एक दिन

उसे एक खिंचाव महसूस हुआ

एक ख़ामोश सी कशिश

किसी दूर के सितारे से,

जो उस सन्नाटे के पार था।


पहली बार

वो अपनी तन्हाई में

अकेली नहीं थी।


उस फ़ासले के दरमियान

उनकी बातें होने लगीं

लफ़्ज़ों में नहीं,

बल्कि रौशनी की हल्की सी थरथराहट में,

जिसे सिर्फ़ वो दोनों महसूस कर सकते थे।


एक रिश्ता बना

नाज़ुक, दूर,

मगर हर क़ुर्बत से गहरा।


वो और तेज़ जलने लगी

दिखने के लिए नहीं,

बल्कि महसूस होने के लिए

उस एक वजूद के पास

जो बे-इंतिहा फ़ासलों में था।


मगर कायनात

ऐसी दास्तानों पर

मेहरबान नहीं होती।


वक़्त फैलता गया

फ़ासले बढ़ते गए

और जो कभी क़रीब लगता था

धीरे-धीरे

याद बनता गया।


उसकी रौशनी अब भी सफ़र करती है,

वहीं पहुँचती है

जहाँ कभी उसका दिल था,

मगर जब तक वो पहुँचती है

वो खुद

वो नहीं रहती जो कभी थी।


अब भी

वो वैसे ही चमकती है

ठहरी हुई, दूर, ख़ामोश


मगर उसकी रौशनी में कहीं

एक दास्तान छुपी है

जिसे कोई दूरबीन नहीं पढ़ सकती।


और अगर तुम ग़ौर से देखो

तो शायद महसूस कर सको


उसकी चमक में

वो हल्की सी थरथराहट,

जैसे वो अब भी कह रही हो


“कभी-कभी,

बेनिहायत फ़ासलों के बावजूद,

हम मिलते तो हैं…

मगर सिर्फ़ ये समझने के लिए

कि जुदाई कितनी वसीअ होती है।”


मुकेश ,,,,

The Loneliness of a Star

The Loneliness of a Star

She was a star
not the brightest,
not the one they named,
just a quiet shimmer
lost in an endless sky.

She was born in fire,
in a violent bloom of light,
yet her existence
was destined to look peaceful
from a distance.

For ages,
she burned in silence
giving light
to worlds she would never touch,
guiding paths
she would never walk.

Planets circled others,
galaxies embraced their own,
but she
she remained still,
anchored in a place
she never chose.

Sometimes,
she watched the comets pass
wild, free, fleeting
and wondered
what it meant
to move.

The darkness often told her
“You are enough,
you light the void.”

But she knew
lighting the void
is not the same
as filling it.

One day,
she felt a pull
a quiet gravity
from another star,
far across the silence.

For the first time,
she was not alone
in her longing.

Across the vastness,
they spoke
not in words,
but in flickers,
in the trembling of light
that only they could feel.

A bond formed
delicate, distant,
yet deeper
than any closeness.

She burned brighter,
not to be seen,
but to be felt
by that one presence
in the infinite.

But the universe
is not kind
to such stories.

Time stretched
distances widened
and what once felt near
began to fade
into memory.

Her light still traveled,
reaching where it once belonged,
but by the time it arrived,
she was no longer
who she had been.

Now,
she shines as she always did
steady, distant, quiet

but somewhere in her glow
is a story
that no telescope can read.

And if you look closely,
you might feel it

that faint trembling
in her light,
as if she’s still whispering

“Sometimes,
even across infinity,
we meet…
only to learn
how vast separation truly is.”


Mukesh,,,,,,,,

The Silence of the Flame

 

The Silence of the Flame

She was a flame—
born not of forests or storms,
but of a quiet spark
hidden in the dark corners of existence.

At first, she trembled,
small and unsure,
learning the language of burning
by touching the edges of air.

Every wind that met her
taught her something—
some tried to extinguish her,
some made her dance wildly,
and some simply passed by
as if she were never there.

Yet she kept rising—
as if pulled upward
by a longing she could not name.

She lit many paths—
held warmth for those
who came close enough,
yet no one ever stayed
long enough to understand
what it meant to be her.

The night often whispered—
“Rest now, fade into stillness,
there is peace in becoming ash.”

But she knew—
peace was not in ending,
it lived in the act of burning.

One day,
she found herself drawn
toward a vast fire—
endless, consuming,
magnificent beyond measure.

“This is it,” she thought,
“the union I was meant for.”

And when she merged—
she did not vanish,
yet she was no longer herself.

In that infinite blaze,
her individuality dissolved,
her dance lost in a thousand others,
her voice swallowed
by the roar of the whole.

The flame,
who had spent her life
yearning to belong,
now longed
to be singular again.

Within the fire,
she became a quiet heat—
present, yet unseen,
alive, yet unnamed.

Sometimes,
a spark would leap out
from that vast burning,
touching the cold air again—

and in that brief moment,
she would remember
what it felt like
to be a flame of her own.

And she would whisper—

“Sometimes,
to become everything
is to lose the meaning
of being one.”

Even in the grains of sand, a dream breathes

 Even in the grains of sand, a dream breathes —

of the blue ocean.
The echo of every wave is lost there,
yet the memory remains.
The desert knows
that it is lonely,
yet in its heart resides the soul of the sea.
Every grain of sand
waits to become water —
just as man
awaits union with his soul.
Mukesh Ilahabadee ,,,

मैं रास्ता था और तुम सफ़र बन गए

 मैं रास्ता था और तुम सफ़र बन गए


मैं रास्ता था

सीधा, सादा,

किसी मंज़िल की ओर बढ़ता हुआ,

जिसे बस चलना आता था,

रुकना नहीं।


और तुम

एक अनजानी सी आहट बनकर आए,

जैसे किसी मोड़ पर

अचानक

ज़िंदगी खड़ी मिल जाए।


मैं रास्ता था

जिस पर लोग गुज़रते थे,

अपने-अपने क़दमों की धूल छोड़कर,

और आगे बढ़ जाते थे

बिना पीछे देखे।


मगर तुम

तुम ठहरे,

तुमने मेरी ख़ामोशी को सुना,

मेरी ख़ालीपन को पढ़ा,

और फिर…


तुम सफ़र बन गए।


अब हर क़दम

सिर्फ़ चलना नहीं रहा,

एक एहसास बन गया

जिसमें तुम्हारी आहट,

तुम्हारी मुस्कान,

तुम्हारी ख़ामोशी भी शामिल थी।


मैं रास्ता था

जिसे अपनी दिशा का इल्म था,

मगर तुमने आकर

हर मोड़ को सवाल बना दिया।


अब हर दिशा

तुम्हारी तरफ़ जाती थी,

और हर मंज़िल

तुम्हारे नाम से शुरू होती थी।


तुम सफ़र बन गए

और मैं

खुद को भूलने लगा,


क्योंकि अब

चलना सिर्फ़ चलना नहीं था,

तुम्हारे साथ होना था।


वक़्त भी बदल गया

पहले वो बस गुजरता था,

अब वो ठहर-ठहर कर

हमारे लम्हों को

महसूस करने लगा।


मैं रास्ता था

जो कभी थकता नहीं था,

मगर अब

हर थकान में

तुम्हारी तलाश होने लगी।


तुम सफ़र बन गए

तो हर दूरी

क़रीब लगने लगी,

हर तन्हाई

आधी रह गई।


मगर सफ़र…

हमेशा साथ नहीं चलता,

कभी-कभी

वो किसी मोड़ पर

खामोशी से उतर जाता है।


और वही हुआ


एक दिन

तुम चुपचाप

किसी और दिशा में मुड़ गए,

बिना कुछ कहे,

बिना कोई निशान छोड़े।


और मैं

फिर वही रास्ता बन गया,


मगर अब

पहले जैसा नहीं था।


अब हर क़दम में

तुम्हारी याद की हलचल थी,

हर मोड़ पर

तुम्हारी कमी का सन्नाटा।


मैं रास्ता था

और तुम सफ़र बन गए,


फिर तुम

कहीं गुम हो गए,


मगर अजीब बात ये है


कि अब भी

जब कोई मुझ पर चलता है,

तो उसे

मेरे भीतर

तुम्हारा एहसास मिलता है।


जैसे तुम

कभी गए ही नहीं,

बस

मेरी रूह में उतर गए हो।


मैं रास्ता था

और तुम सफ़र बन गए…


और अब

मैं सिर्फ़ रास्ता नहीं रहा,


मैं एक कहानी हूँ

जिसे हर मुसाफ़िर

चलते-चलते महसूस करता है,


मगर समझ

बहुत कम लोग पाते हैं।


मुकेश ,,,,,,

तुम थे या बस एहसास की कोई चाल थी

 तुम थे या बस एहसास की कोई चाल थी


तुम थे

या बस एहसास की कोई चाल थी,

जो दिल ने खुद ही चली

और फिर

खुद ही उसमें उलझता रहा?


कभी लगता है

तुम सच में थे

किसी सुबह की नर्म धूप की तरह,

जो बिना आवाज़ के

आँगन में उतर आती है,


और कभी…

यक़ीन नहीं होता

कि तुम कभी थे भी।


तुम्हारी याद

कोई साफ़ तस्वीर नहीं,

एक धुंधला सा अहसास है—

जैसे आईने पर जमी भाप

जिसमें चेहरा दिखता तो है,

मगर पहचान में नहीं आता।


तुम थे

या बस मेरी तन्हाई

ने तुम्हारा ख़्याल गढ़ लिया था,

जैसे कोई बच्चा

अँधेरे में

अपने ही साए से खेलता है।


मैंने तुम्हें

हर उस लम्हे में ढूँढा

जहाँ दिल थोड़ा ज़्यादा धड़कता था,

हर उस खामोशी में

जहाँ आवाज़ होने की गुंजाइश थी।


मगर तुम

हर बार

थोड़ा और धुँधले हो जाते,

थोड़ा और दूर।


तुम्हारी हँसी…

क्या सच में सुनी थी मैंने,

या वो भी

मेरे ख़्याल की कोई गूँज थी?


तुम्हारी आँखें…

क्या सच में मिली थीं मेरी आँखों से,

या वो भी

एक ख़्वाब की परत थी

जो जागते ही उतर गई?


तुम थे—

या बस एहसास की कोई चाल थी,

जो दिल ने

अपने ही ख़िलाफ़ चली?


कभी-कभी

मैं खुद से पूछता हूँ

अगर तुम सच में थे,

तो अब क्यों नहीं हो?


और अगर तुम कभी थे ही नहीं—

तो फिर

ये दर्द कहाँ से आया?


ये जो सीने में

एक खाली जगह है,

जो हर साँस के साथ

भरती भी है,

और खाली भी रहती है


ये किसकी निशानी है?


तुम थे

या बस एक लम्हा,

जो गुज़रते हुए

अपने होने का यक़ीन दिला गया,

और जाते हुए

सब कुछ साथ ले गया।


शायद तुम

कोई शख़्स नहीं थे,

बस एक एहसास थे—

जो मेरे अंदर ही पैदा हुआ,

और मेरे अंदर ही खो गया।


या शायद…

तुम सच में थे,

मगर वक़्त ने

तुम्हें इतनी सफ़ाई से मिटाया

कि अब

बस तुम्हारा एहसास रह गया है।


तुम थे

या बस एहसास की कोई चाल थी…


इस सवाल का जवाब

शायद कभी नहीं मिलेगा,

क्योंकि कुछ सच

पूरे नहीं होते


और कुछ झूठ

इतने ख़ूबसूरत होते हैं

कि दिल उन्हें

सच मान लेना चाहता है।


और मैं…

अब भी वहीं खड़ा हूँ,

उसी सवाल के साथ—


तुम थे…

या बस

मेरी रूह की

एक ख़ामोश चाल थी?


मुकेश ,,,,