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Tuesday, 24 February 2026

स्वप्न की नदी

 “स्वप्न की नदी”


— मुकेश इलाहाबादी


सुनो,

कल्पना करो ,,


एक गोधूलि की धरती है,

जहाँ आसमान में धूप का बचा हुआ सुनहरा टुकड़ा

धीरे-धीरे पिघल रहा है।

नदी अपने किनारे से कुछ कहती है,

और पेड़ अपनी शाख़ों से जवाब देते हैं।


उस नदी के पार

एक छोटा-सा पुल है,

जिसके नीचे से जल नहीं,

बल्कि समय बहता है।


वहीं मैं खड़ा हूँ 

और तुम,

सफ़ेद रेशमी ओढ़नी में

धीरे-धीरे मेरी ओर आती हो।


तुम्हारे बालों से हवा खेल रही है,

जैसे कोई अनजानी धुन की तान बजा रही हो।

तुम्हारे होंठों पर मुस्कान नहीं,

बस हल्की-सी उलझन है 

कि ये सपना है या सच।


मैं कहता हूँ 

“सपनों में मिलने वाले लोग

कभी ग़ायब नहीं होते,

वे बस नदी की तरह रूप बदल लेते हैं।”


तुम मुस्कुरा देती हो,

जैसे किसी बच्चे ने

पहली बार इंद्रधनुष छू लिया हो।


हम चलते हैं,

घास की कोमल ज़मीन पर —

जहाँ हर पत्ती तुम्हारे क़दमों से

एक कविता बन जाती है।


तुम ठहरती हो,

हवा में हाथ फैलाकर

कहती हो 

“देखो, मैं हवा को पकड़ सकती हूँ!”


मैं देखता हूँ,

कि सच में हवा

तुम्हारे चारों ओर ठहर जाती है।


फिर तुम झुककर

पानी में अपने चेहरे को देखती हो,

और धीरे से पूछती हो 

“क्या समय भी बूढ़ा होता है?”


मैं कहता हूँ 

“नहीं,

बस यादें सफ़ेद हो जाती हैं।”


तुम हँस देती हो,

और तुम्हारी हँसी की लहर

नदी पर गिरती है 

जैसे चाँदनी टूटकर बिखर गई हो।


रात अब उतर आई है,

हवा में बेला की महक है।

हम दोनों उस पुल के बीच खड़े हैं,

जहाँ से नीचे समय बहता है,

और ऊपर तारे देख रहे हैं।


तुम मेरा हाथ पकड़ती हो,

और कहती हो —

“अगर ये सपना है,

तो मैं इसमें हमेशा रहना चाहती हूँ।”


मैं कहता हूँ 

“सपनों को छोड़ दो,

वो लौट आते हैं

जब याद उन्हें पुकारती है।”


तुम मेरे कंधे पर सिर रख देती हो 

और कहती हो,

“तो फिर तुम मत लौटना।”


मैं कुछ नहीं कहता,

बस तुम्हारे बालों में

रात का एक तारा फँसा देता हूँ।


धीरे-धीरे सब कुछ मौन हो जाता है 

नदी, हवा, आकाश,

यहाँ तक कि हम भी।


फिर अचानक 

तुम्हारी हथेली की गर्मी

ठंडी होने लगती है।

तुम धुंध की तरह

मुझसे अलग होने लगती हो।


मैं कहता हूँ 

“रुको...”

पर तुम हवा में घुल जाती हो।


नदी बहना नहीं रोकती,

बस उसका स्वर बदल जाता है 

जैसे किसी ने प्रेम का

अंतिम सुर छेड़ दिया हो।


अब मैं अकेला हूँ 

उस पुल पर,

जहाँ से समय गुजरता है,

जहाँ कभी तुम थी,

और अब बस

तुम्हारी खुशबू बची है।


मैं आसमान की ओर देखता हूँ,

जहाँ वही तारा चमक रहा है 

जो मैंने तुम्हारे बालों में लगाया था।


शायद वह अब तुम्हारा नाम जानता है।


और मैं...

बस हर रात

उस नदी के किनारे जाकर

वही तारा ढूँढता हूँ 

जो अब भी

मेरे सपनों में चमकता है।

शून्य - सूफ़ी और दार्शनिक अंदाज़ में

 "शून्य"

(सूफ़ी और दार्शनिक अंदाज़ में)
मुकेश इलाहाबादी

शून्य —
जिसे सब डरते हैं,
पर वही तो सबका जन्मस्थल है।

तुम कहते हो — “कुछ नहीं।”
और मैं कहता हूँ —
“यही तो सब कुछ है।”

क्योंकि जो नहीं है,
वही तो मुक्त है —
रूप से, नाम से, देह से,
यहाँ तक कि खुद “होने” से भी।

शून्य में कोई आकृति नहीं,
पर उसी की गोद से आकृतियाँ जन्म लेती हैं।
जैसे मौन — जिससे संगीत निकले,
जैसे निःशब्दता — जहाँ से शब्द उगें।

शून्य वह आईना है
जिसमें ईश्वर खुद को देखता है —
और मुस्कुरा देता है।

मैंने जब खुद को मिटाया,
तो पाया —
मैं कभी था ही नहीं,
बस वही था — जो सबमें है।

कभी-कभी लगता है,
शून्य कोई स्थान नहीं,
बल्कि एक स्वभाव है —
जहाँ “मैं” और “तू” का अंतर
पिघल जाता है।

वहीं तो मिलन है —
जहाँ खोज खत्म नहीं होती,
बस खोजने वाला ही खो जाता है।

कबीर ने कहा था —
“ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया,”
और रूमी ने फुसफुसाया —
“Lose yourself completely,
so the Beloved may find you.”

शून्य वही दरवाज़ा है —
जहाँ भीतर जाने के लिए
पहले बाहर को छोड़ना पड़ता है।

और जब तुम भीतर पहुँचते हो,
तो कोई नहीं मिलता —
सिवाय तुम्हारे न-होने के।

वहीं —
एक गहरी, पारदर्शी रौशनी में
प्रेम खुद को पहचानता है,
और समय सिर झुका लेता है।

शून्य,
तू कुछ नहीं —
पर सब कुछ तेरे बिना अधूरा है।

शून्य

शून्य
मुकेश इलाहाबादी

शून्य — कोई खालीपन नहीं,
बल्कि सबका आरंभ है।

जहाँ कुछ नहीं दिखता,
वहीं से सब कुछ जन्म लेता है।

मौन की गोद में शब्द पनपते हैं,
न-होने में ही अस्तित्व खिलता है।

शून्य — ईश्वर का गुप्त नाम है,
जिसे उच्चारते ही “मैं” पिघल जाता है।

जो खुद को मिटा दे, वही उसे पा लेता है —
क्योंकि न-होने में ही होने का सत्य छिपा है।

शून्य न अंत है, न आरंभ —
बस प्रेम का अंतिम मौन है।

तुनुक मिज़ाज़ प्रेमिका

 तुनुक मिज़ाज़ प्रेमिका


अक्सर प्रेमिकाएँ

तुनुक मिज़ाज़ होती हैं—

जैसे हवा में खेलती धूप

हल्की, नर्म, और चुलबुली।


कल तक गुस्सा, आज हँसी,

आँखों में चमक और थोड़ी सी नासमझी।

कुछ कहती हैं, कुछ छुपाती हैं,

हर पल में जादू बिखराती हैं।


जब वे हँसती हैं,

सारे शहर की रौनक बढ़ जाती है।

और जब चुप हो जाती हैं,

तो दिल की हर धड़कन उनके नाम गाती है।


उनका मूड बदलता है,

जैसे बदलते हैं मौसम के रंग।

लेकिन हर बदलाव में

प्यार की मीठी मुस्कान छिपी रहती है।


तुनुक -मिज़ाज़ प्रेमिका—

एक तितली जैसी,

जो उड़ी, ठहरी, फिर लौट आई

और दिल को हर पल चुराती रही।


और जो इसे समझ सके,

जो इसे महसूस कर सके,

वही जान पाए

कि इस चुलबुलापन के पीछे

सच्चा प्यार छुपा है।


मुकेश ,,,,,,,,

रूह का कोई दिशा-सूचक यंत्र नहीं होता।

 ज़िन्दगी के समंदर में

रूह का कोई दिशा-सूचक यंत्र नहीं होता।

लहरें आती हैं, ज्वार उठते हैं,

धुंध छा जाती है,

और हम केवल महसूस करते हैं।


नाव हो, जूता हो, ग्रंथ हो—

सब रास्ते दिखाने वाले साधन हैं,

लेकिन वास्तविक यात्रा

मन और आत्मा की अंतराल गहराई में होती है।


जहाँ तूफ़ान भी सिखाता है,

जहाँ मौन भी ज्ञान देता है,

और जहाँ हर अनुभव

हमें बिना नक्शे के

हमारे भीतर की दिशा खोजने को मजबूर करता है।


रूह अकेली चलती है,

कदम केवल साथी हैं,

और समंदर की गहराई

एक रहस्य बनकर हमारे भीतर उतरती है।


मुकेश ,,,,,,,,

खोज की भाषा, सत्ता की व्याकरण

खोज की भाषा, सत्ता की व्याकरण


खोज की भाषा सरल होती है

“यह वहाँ है।”

“यह हमें मिला।”

“यह नया है।”


लेकिन सत्ता की व्याकरण

जटिल होती है

नाम बदलना,

सीमाएँ खींचना,

ध्वज गाड़ना,

और शोरगुल में इतिहास लिखना।


पहले कोई जमीन थी

तट, नदियाँ, जंगल।

फिर कोई नाव आई

और उसने कहा

“यह अब हमारी है।”


खोज की भाषा

निर्दोष, उत्सुक, उत्सवपूर्ण होती है।

पर सत्ता की व्याकरण

शर्तों और दावों से भरी होती है।


मसालों की गंध,

समुद्र की लहरें,

आकाश के तारे

वे सुनते रहे,

पर न बोले।

क्योंकि भाषा

वो थी जो मनुष्य समझ सके,

सत्ता

वो थी जो मनुष्य को डराए।


नक्शे बने,

समझौते हुए,

अनगिनत शब्दों में बयान हुए।

पर खोज के पल

सिर्फ़ क्षण भर के थे,

जैसे समुद्र का उठना और लौटना।


सत्य यह है

खोज कभी किसी का नहीं,

सिर्फ़ देखने वालों की होती है।

और सत्ता

देखने वालों को ही पकड़कर रखती है,

नामों और सीमाओं में बाँधकर।


आज भी

यदि ध्यान से सुनो,

तो हवाएँ फुसफुसाती हैं

खोज की भाषा है,

और धूप के झुरमुट में

सत्ता की व्याकरण।


वह कहती है

“जो तुमने पाया, वह तुम्हारा नहीं।

पर जो तुमने समझा, वह हमेशा तुम्हारा रहेगा।”


क्योंकि खोज

मनुष्य को दृष्टि देती है,

और सत्ता

मनुष्य को कहानी।


दोनों साथ चलते हैं

एक कहता है “देखो,”

दूसरा कहता है “यह मेरा।”


पर अंत में

धरती चुप रहती है

और केवल अपने नियमों में

सही और गलत को मापती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

जब किसी ने कहा — “यह मेरा है”

 जब किसी ने कहा — “यह मेरा है”


जब किसी ने कहा 

“यह मेरा है,”

धरती ने कुछ नहीं कहा।


वह बस उतनी ही शांत रही

जितनी बीज बोते समय रहती है।


आकाश ने भी विरोध नहीं किया,

वह उसी तरह फैला रहा

बिना सीमाओं के,

बिना दीवारों के।


पर उस एक वाक्य ने

हवा की दिशा बदल दी।


रेत,

जो हर पाँव को समान रूप से थामती थी,

अचानक सवालों में बदल गई।

नदी,

जो दोनों किनारों को बराबर छूती थी,

रेखाओं में बाँट दी गई।


“यह मेरा है”

कहते ही

पेड़ों की छाँव छोटी हो गई,

क्षितिज संकुचित हो गया,

और पृथ्वी का गोलापन

मानो किसी मुट्ठी में सिमटने लगा।


किसी ने दावा किया

समुद्र पर,

जंगल पर,

पहाड़ पर।

पर क्या लहरें

किसी नाम से बंधती हैं?

क्या पर्वत

किसी दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करते हैं?


जब किसी ने कहा 

“यह मेरा है,”

तो एक और आवाज़

धीमे से उठी—

“तुम भी तो मेरे हो।”


धरती का धैर्य

घोषणाओं से बड़ा है।

वह जानती है

जो आज कह रहा है “मेरा,”

कल उसी में समा जाएगा।


मालिकाना एक क्षण है;

मिट्टी शाश्वत।


और शायद

सबसे गहरी सच्चाई यही है

कि जिसे हम अपना कहते हैं,

वह हमें पहले ही

अपना बना चुका होता है।


जब किसी ने कहा 

“यह मेरा है,”

तो समय मुस्कुराया

क्योंकि वह जानता है

कि अंततः

सब कुछ

किसी एक का नहीं,

सिर्फ़ होने का है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,