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दर्शन, -जैन धर्म -भाग–8 : अहिंसा, अपरिग्रह और जैन नैतिक दर्शन

  जैन धर्म — इतिहास , दर्शन , साधना और आधुनिक विज्ञान के आलोक में समग्र अध्ययन भाग –8 : अहिंसा , अपरिग्रह और जैन नैतिक दर्शन जैन धर्म का यदि एक वाक्य में परिचय देना हो , तो निःसन्देह कहा जा सकता है कि यह अहिंसा का दर्शन है। यद्यपि अहिंसा का विचार भारतीय संस्कृति की अनेक धाराओं में मिलता है , किन्तु जैन धर्म ने इसे जितनी गहराई , व्यापकता और व्यवहारिकता प्रदान की , वह अद्वितीय है। जैन नैतिक दर्शन का सम्पूर्ण आधार अहिंसा , अपरिग्रह , सत्य , अस्तेय और ब्रह्मचर्य पर निर्मित है , जिनमें अहिंसा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। जैन आचार्यों का प्रसिद्ध सूत्र है — " अहिंसा परमो धर्मः। " यह केवल एक धार्मिक उद्घोष नहीं , बल्कि सम्पूर्ण जीवन - दृष्टि का आधार है। जैन दर्शन के अनुसार हिंसा केवल किसी प्राणी की हत्या करना नहीं है। किसी भी जीव को मन , वचन या कर्म से पीड़ा पहुँचाना हिंसा है। इसलिए क्रोध , कटु वाणी , छल , अपमान , घृणा और शोषण भी हिंसा के ही रूप ...

दर्शन - जैन धर्म - भाग–7 : रत्नत्रय — सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र

  जैन धर्म — इतिहास , दर्शन , साधना और आधुनिक विज्ञान के आलोक में समग्र अध्ययन भाग –7 : रत्नत्रय — सम्यग्दर्शन , सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र जैन दर्शन का सम्पूर्ण साधना - पथ तीन मूल आधारों पर निर्मित है , जिन्हें रत्नत्रय अथवा त्रिरत्न कहा जाता है। ये हैं — सम्यग्दर्शन , सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र। जैन परम्परा का स्पष्ट मत है कि इन तीनों के बिना मोक्ष की प्राप्ति सम्भव नहीं है। यदि कर्म - सिद्धान्त जैन दर्शन की वैज्ञानिक व्याख्या है , तो रत्नत्रय उसका व्यावहारिक मार्ग है। जैन आचार्य उमास्वाति ने तत्त्वार्थसूत्र के आरम्भ में ही लिखा है — " सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः। " अर्थात् सम्यक् दर्शन , सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र — ये तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं। यह सूत्र जैन दर्शन का हृदय कहा जा सकता है। सम्यग्दर्शन : सत्य के प्रति जागरण रत्नत्रय का पहला चरण सम्यग्दर्शन है। इसका अर्थ केवल किसी मत या सम्प्रदाय पर विश्वास करना नहीं है। सम्य...