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चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–8 : बौद्ध और जैन कारणता-दृष्टि

  चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–8 : बौद्ध और जैन कारणता-दृष्टि भारतीय दर्शन में कारणता का प्रश्न जब कारण और कार्य के सम्बन्ध से आगे बढ़ा, तब एक और गम्भीर सम्भावना सामने आई। क्या किसी घटना का कोई एक कारण होता है? या— क्या प्रत्येक घटना अनेक परिस्थितियों, अवस्थाओं और सम्बन्धों के परस्पर जुड़ने से उत्पन्न होती है? यह प्रश्न बौद्ध और जैन दर्शन में अलग-अलग, किन्तु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रूपों में सामने आता है। बौद्ध दर्शन में कारणता को समझने के लिए प्रतित्यसमुत्पाद (Pratītyasamutpāda) की धारणा केन्द्रीय है। इसका सामान्य अर्थ है— परस्पर निर्भर होकर उत्पन्न होना। किन्तु इसे केवल “एक कारण से एक परिणाम” के सरल सूत्र में समझना उचित नहीं होगा। बौद्ध दृष्टि में कोई घटना अपने आप, पूर्णतः स्वतंत्र रूप से उत्पन्न नहीं होती। वह अनेक परिस्थितियों और पूर्ववर्ती अवस्थाओं पर निर्भर होती है। एक घटना दूसरी से जुड़ती है। दूसरी किसी तीसरी परिस्थिति पर निर्भर हो सकती है। इस प्रकार उत्पत्ति का सम्बन्ध किसी एक स्थायी कारण से नहीं, बल्कि परस्पर निर्भर प्रक्रियाओं की संरचना से बनत...

चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–7 : सत्कार्यवाद, असत्कार्यवाद और विवर्तवाद

  चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–7 : सत्कार्यवाद, असत्कार्यवाद और विवर्तवाद भारतीय दर्शनों में कारणता का प्रश्न धीरे-धीरे एक अत्यन्त सूक्ष्म दार्शनिक समस्या में बदल गया। अब प्रश्न केवल यह नहीं था कि— “यह किस कारण से उत्पन्न हुआ?” प्रश्न यह बन गया— “उत्पन्न होने का अर्थ ही क्या है?” यदि किसी कारण से कोई कार्य उत्पन्न होता है, तो क्या वह कार्य कारण में पहले से उपस्थित था? यदि वह पहले से उपस्थित था, तो वास्तव में नया क्या उत्पन्न हुआ? और यदि वह पहले से उपस्थित नहीं था, तो वह अस्तित्व में आया कैसे? यहीं से भारतीय दर्शन में कारणता के तीन महत्त्वपूर्ण विचार सामने आते हैं— सत्कार्यवाद। असत्कार्यवाद। और— विवर्तवाद। इन तीनों को समझे बिना भारतीय कारणता-विचार की गहराई को समझना कठिन है। सत्कार्यवाद (Satkāryavāda) का मूल विचार है— कार्य अपने कारण में पूर्वस्थित होता है। अर्थात् जो कार्य बाद में दिखाई देता है, वह पूर्णतः शून्य से उत्पन्न नहीं होता। सांख्य दर्शन इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। यदि बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है, तो सत्कार्यवाद पूछता है— क्या वृक्ष...

चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–7 : सत्कार्यवाद, असत्कार्यवाद और विवर्तवाद

  चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–7 : सत्कार्यवाद, असत्कार्यवाद और विवर्तवाद भारतीय दर्शनों में कारणता का प्रश्न धीरे-धीरे एक अत्यन्त सूक्ष्म दार्शनिक समस्या में बदल गया। अब प्रश्न केवल यह नहीं था कि— “यह किस कारण से उत्पन्न हुआ?” प्रश्न यह बन गया— “उत्पन्न होने का अर्थ ही क्या है?” यदि किसी कारण से कोई कार्य उत्पन्न होता है, तो क्या वह कार्य कारण में पहले से उपस्थित था? यदि वह पहले से उपस्थित था, तो वास्तव में नया क्या उत्पन्न हुआ? और यदि वह पहले से उपस्थित नहीं था, तो वह अस्तित्व में आया कैसे? यहीं से भारतीय दर्शन में कारणता के तीन महत्त्वपूर्ण विचार सामने आते हैं— सत्कार्यवाद। असत्कार्यवाद। और— विवर्तवाद। इन तीनों को समझे बिना भारतीय कारणता-विचार की गहराई को समझना कठिन है। सत्कार्यवाद (Satkāryavāda) का मूल विचार है— कार्य अपने कारण में पूर्वस्थित होता है। अर्थात् जो कार्य बाद में दिखाई देता है, वह पूर्णतः शून्य से उत्पन्न नहीं होता। सांख्य दर्शन इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। यदि बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है, तो सत्कार्यवाद पूछता है— क्या वृक्ष...

चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–6 : भारतीय दर्शनों में कारणता

  चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–6 : भारतीय दर्शनों में कारणता वैदिक और उपनिषदिक चिन्तन ने कारणता के प्रश्न को सृष्टि और अस्तित्व के मूल तक पहुँचाया था। अब भारतीय दर्शन के सामने एक अधिक विशिष्ट प्रश्न था— कारण और कार्य का वास्तविक सम्बन्ध क्या है? यदि कोई वस्तु किसी कारण से उत्पन्न होती है, तो उस उत्पत्ति का अर्थ क्या है? क्या कार्य कारण में पहले से उपस्थित था? क्या कार्य बिल्कुल नया उत्पन्न होता है? क्या कारण और कार्य दो अलग-अलग वास्तविकताएँ हैं? या कारण ही किसी दूसरे रूप में कार्य के रूप में दिखाई देता है? भारतीय दर्शनों ने इन प्रश्नों का एक ही उत्तर नहीं दिया। यही भारतीय दार्शनिक परम्परा की विशेषता है। कारणता के प्रश्न पर विभिन्न दर्शनों ने अपने-अपने मूल तत्त्वज्ञान के आधार पर अलग-अलग दृष्टियाँ विकसित कीं। इसलिए भारतीय दर्शन में कारणता का अध्ययन किसी एक सिद्धान्त को “भारतीय उत्तर” मान लेने का विषय नहीं है। यह विभिन्न दार्शनिक दृष्टियों के बीच एक गम्भीर संवाद है। सांख्य दर्शन कारणता को समझने के लिए सत्कार्यवाद (Satkāryavāda) का समर्थन करता है। इसके अनु...

चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–6 : भारतीय दर्शनों में कारणता

  चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–6 : भारतीय दर्शनों में कारणता वैदिक और उपनिषदिक चिन्तन ने कारणता के प्रश्न को सृष्टि और अस्तित्व के मूल तक पहुँचाया था। अब भारतीय दर्शन के सामने एक अधिक विशिष्ट प्रश्न था— कारण और कार्य का वास्तविक सम्बन्ध क्या है? यदि कोई वस्तु किसी कारण से उत्पन्न होती है, तो उस उत्पत्ति का अर्थ क्या है? क्या कार्य कारण में पहले से उपस्थित था? क्या कार्य बिल्कुल नया उत्पन्न होता है? क्या कारण और कार्य दो अलग-अलग वास्तविकताएँ हैं? या कारण ही किसी दूसरे रूप में कार्य के रूप में दिखाई देता है? भारतीय दर्शनों ने इन प्रश्नों का एक ही उत्तर नहीं दिया। यही भारतीय दार्शनिक परम्परा की विशेषता है। कारणता के प्रश्न पर विभिन्न दर्शनों ने अपने-अपने मूल तत्त्वज्ञान के आधार पर अलग-अलग दृष्टियाँ विकसित कीं। इसलिए भारतीय दर्शन में कारणता का अध्ययन किसी एक सिद्धान्त को “भारतीय उत्तर” मान लेने का विषय नहीं है। यह विभिन्न दार्शनिक दृष्टियों के बीच एक गम्भीर संवाद है। सांख्य दर्शन कारणता को समझने के लिए सत्कार्यवाद (Satkāryavāda) का समर्थन करता है। इसके अनु...

चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–5 : वैदिक और उपनिषदिक कारणचिन्तन

  चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–5 : वैदिक और उपनिषदिक कारणचिन्तन मनुष्य ने जब यह पूछना आरम्भ किया कि घटनाएँ क्यों घटती हैं, तब यह प्रश्न केवल उसके दैनिक जीवन तक सीमित नहीं रहा। धीरे-धीरे उसकी दृष्टि अपने चारों ओर की छोटी घटनाओं से उठकर सम्पूर्ण अस्तित्व की ओर चली गई। वर्षा क्यों होती है? ऋतुएँ क्यों बदलती हैं? जीवन कैसे उत्पन्न होता है? मृत्यु क्यों आती है? और अन्ततः— यह सम्पूर्ण जगत् है ही क्यों? यहीं से कारणता का प्रश्न अपने सबसे व्यापक रूप में सामने आता है। वैदिक चिन्तन में सृष्टि और उत्पत्ति का प्रश्न किसी एक निश्चित उत्तर से आरम्भ नहीं होता। उसके भीतर एक जिज्ञासा है, एक आश्चर्य है और कई स्थानों पर एक गहरा दार्शनिक संकोच भी। यह बात अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि वैदिक चिन्तन को यदि केवल “सृष्टि का कारण यह है” जैसे निश्चित उत्तरों के संग्रह के रूप में देखा जाए, तो उसके भीतर उपस्थित प्रश्नशीलता को समझा ही नहीं जा सकता। वैदिक मनुष्य ने आकाश को देखा। उसने अग्नि को देखा। उसने वायु, जल और पृथ्वी को अनुभव किया। उसने जीवन की उत्पत्ति और मृत्यु का क्रम दे...

चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–4 : काल और कारणता — “पहले” क्या “कारण” है?

  चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–4 : काल और कारणता — “पहले” क्या “कारण” है? कारणता के प्रश्न पर आते ही मनुष्य का ध्यान स्वाभाविक रूप से काल की ओर जाता है। क्योंकि जब हम कहते हैं—“यह इसके कारण हुआ”—तो हमारे वाक्य में प्रायः एक क्रम छिपा होता है। पहले कारण। फिर परिणाम। पहले आग। फिर जल का गर्म होना। पहले पत्थर का फेंका जाना। फिर शीशे का टूटना। पहले बीज। फिर अंकुर। यहीं से मनुष्य के भीतर एक सरल धारणा बनती है— जो पहले घटित हुआ, वही बाद में घटित होने वाली घटना का कारण होगा। किन्तु क्या “पहले” होना ही “कारण” होना है? यही वह बिन्दु है जहाँ काल और कारणता को अलग-अलग समझना आवश्यक हो जाता है। काल (Time) घटनाओं के क्रम का प्रश्न है। कारणता (Causality) घटनाओं के सम्बन्ध का प्रश्न है। काल पूछता है— “यह कब हुआ?” कारणता पूछती है— “यह क्यों हुआ?” दोनों प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं, किन्तु दोनों एक ही प्रश्न नहीं हैं। यदि घटना A, घटना B से पहले घटित हुई, तो हम केवल इतना जानते हैं कि A कालिक रूप से पहले थी। इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि A ने B को उत्पन्न किया। मान लीजिए कोई व्यक्...