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“यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं...” — पृथ्वी सूक्त के सप्तम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

  “यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं...” — पृथ्वी सूक्त के सप्तम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या पृथ्वी सूक्त का यह मंत्र पृथ्वी को केवल भौतिक ग्रह के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवनदायिनी व्यवस्था के रूप में देखता है जिसकी रक्षा निरन्तर होती रहती है। इस मंत्र में ऋषि ने पृथ्वी की सुरक्षा, उसकी उदारता तथा उसके द्वारा प्रदान किए जाने वाले पोषण और तेजस्विता का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत किया है। यदि आधुनिक विज्ञान की भाषा में कहें तो यह मंत्र पृथ्वी की स्व-नियामक प्रणाली (Self-regulating System) , पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) तथा जीवन-समर्थन तंत्र (Life-support System) की ओर संकेत करता है। मंत्र-पाठ यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं,देवा भूमिं पृथिवीमप्रमादम्। सा नो मधु प्रियं दुहामथो,उक्षतु वर्चसा॥ ७॥ पदान्वय एवं भावार्थ जिस पृथ्वी की जागरूक, कभी न सोने वाली तथा प्रमादरहित देवशक्तियाँ रक्षा करती हैं, जो समस्त प्राणियों को देने वाली है, वह पृथ्वी हमारे लिए मधुर एवं प्रिय पदार्थों का दुग्ध प्रदान करे और हमें तेज, शक्ति तथा वैभव से अभिषिक्त करे। “अस्वप्नाः”...

यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे...” — पृथ्वी सूक्त के पंचम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

“यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे...” — पृथ्वी सूक्त के पंचम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या पृथ्वी सूक्त का पंचम मंत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ पृथ्वी को केवल भौतिक तत्वों, नदियों, पर्वतों अथवा वनस्पतियों की धारक के रूप में नहीं, बल्कि मानव इतिहास, संस्कृति, संघर्ष, विकास और सभ्यता की साक्षी के रूप में देखा गया है। यह मंत्र पृथ्वी के ऐतिहासिक (Historical) , मानवशास्त्रीय (Anthropological) तथा सांस्कृतिक (Cultural) आयामों को उद्घाटित करता है। यदि पूर्ववर्ती मंत्रों में पृथ्वी के प्राकृतिक स्वरूप का वर्णन था, तो यहाँ ऋषि मानव सभ्यता की ओर दृष्टि डालते हैं। पृथ्वी वह मंच है जिस पर पूर्वजों ने जीवन जिया, समाज बनाए, संस्कृतियाँ विकसित कीं और धर्म तथा अधर्म, प्रकाश और अन्धकार, व्यवस्था और अव्यवस्था के संघर्ष घटित हुए। मंत्र-पाठ यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे ,यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्। गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा, भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु॥ ५॥ जिस पृथ्वी पर हमारे पूर्वजों ने कर्म किए और सभ्यताओं का निर्माण किया, जिस पर देवों ने असुरों पर विजय प्राप्त क...

यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्याः...— पृथ्वी सूक्त के चतुर्थ मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्याः...— पृथ्वी सूक्त के चतुर्थ मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या पृथ्वी सूक्त का चतुर्थ मंत्र पृथ्वी की दिक्-व्यवस्था (Spatial Order) , अन्नोत्पादन , तथा जीवन-धारण की क्षमता का अत्यंत सुंदर और गहन वर्णन प्रस्तुत करता है। यदि तृतीय मंत्र में ऋषि ने पृथ्वी को समुद्रों, नदियों और कृषि की आधारभूमि के रूप में देखा था, तो इस मंत्र में वे पृथ्वी के वैश्विक विस्तार तथा उसकी जीवनदायिनी शक्ति की ओर संकेत करते हैं। विशेष बात यह है कि इस मंत्र में पृथ्वी को किसी सीमित भूभाग के रूप में नहीं, बल्कि चारों दिशाओं में विस्तृत एक सार्वभौमिक सत्ता के रूप में देखा गया है। यह दृष्टि वैदिक ऋषियों की व्यापक भौगोलिक चेतना और विश्वबोध को प्रकट करती है। मंत्र-पाठ यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः। या बिभर्ति बहुधा प्राणदेजत् सा नो भूमिर्गोष्वप्यन्ने दधातु॥ ४॥ जिस पृथ्वी की चारों दिशाएँ विस्तृत हैं, जिस पर मनुष्यों के लिए अन्न उत्पन्न होता है, जो विविध प्रकार से समस्त प्राणियों का पालन-पोषण करती है, वह पृथ्वी हमें गौ-संपदा तथा अन्न की ...

यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो… — पृथ्वी सूक्त के तृतीय मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

  यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो… — पृथ्वी सूक्त के तृतीय मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या पृथ्वी सूक्त का तृतीय मंत्र पृथ्वी के उस स्वरूप का चित्रण करता है जिसमें जल, अन्न और प्राणियों का जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है। यदि प्रथम मंत्र पृथ्वी के नैतिक आधारों की चर्चा करता है और द्वितीय मंत्र उसकी भौगोलिक एवं औषधीय विविधता का वर्णन करता है, तो यह तृतीय मंत्र पृथ्वी के जलमण्डल (Hydrosphere) , अन्नचक्र (Food Cycle) और जीवन-तंत्र (Life System) की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है। वैदिक ऋषि के लिए पृथ्वी केवल मिट्टी का गोला नहीं है; वह जल, अन्न, वनस्पति, पशु और मनुष्य के परस्पर सम्बद्ध जीवन-जाल की धारणकर्ता है। आधुनिक पर्यावरण विज्ञान जिस "इकोसिस्टम" (Ecosystem) की बात करता है, उसका बीजारोपण इस मंत्र में स्पष्ट दिखाई देता है। मंत्र-पाठ यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः। यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेयत् सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु॥ (अथर्ववेद 12.1.3) पदान्वय एवं भावार्थ जिस पृथ्वी पर समुद्र हैं, नदियाँ और विविध जलराशियाँ विद्यमान हैं; जिस...

असंबाधं बध्यतो मानवानां…” — पृथ्वी सूक्त के द्वितीय मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

असंबाधं बध्यतो मानवानां…” — पृथ्वी सूक्त के द्वितीय मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या पृथ्वी सूक्त का द्वितीय मंत्र पृथ्वी के भौगोलिक विस्तार, उसकी जैव-विविधता तथा मानव जीवन के लिए उसके अनिवार्य योगदान का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है। प्रथम मंत्र में ऋषि ने पृथ्वी को धारण करने वाले नैतिक और आध्यात्मिक तत्त्वों की चर्चा की थी, जबकि इस मंत्र में वे पृथ्वी के प्रत्यक्ष स्वरूप—उसकी विशालता, भौगोलिक विविधता और औषधीय संपदा—का वर्णन करते हैं। यह मंत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि इसमें पृथ्वी को केवल भूमि के रूप में नहीं, बल्कि मानव सभ्यता और समस्त जैविक जीवन के पोषणकर्ता के रूप में देखा गया है। आधुनिक भूगोल, पारिस्थितिकी (Ecology), वनस्पति विज्ञान (Botany) और पर्यावरण विज्ञान के अनेक सिद्धान्त इस मंत्र में निहित प्रतीत होते हैं। मंत्र-पाठ असंबाधं बध्यतो मानवानां यस्या उद्वतः प्रवतः समं बहु। नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः॥ (अथर्ववेद, पृथ्वी सूक्त 12.1.2) भावार्थ यह पृथ्वी मनुष्यों के निवास और कर्म के लिए पर्याप्त स्थान प्रदान करती है। इस...

सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति” — एक शोधात्मक एवं वैज्ञानिक व्याख्या

  सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति” — एक शोधात्मक एवं वैज्ञानिक व्याख्या मंत्र-पाठ सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्नी उरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥ — अथर्ववेद, पृथ्वी सूक्त (12.1.1) यह पृथ्वी सूक्त का प्रथम मंत्र है और सम्पूर्ण सूक्त का आधारभूत दार्शनिक उद्घोष माना जाता है। ऋषि यहाँ यह नहीं कहते कि पृथ्वी केवल गुरुत्वाकर्षण या किसी भौतिक शक्ति से धारण की हुई है, बल्कि वे उन आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक तत्त्वों का उल्लेख करते हैं जो पृथ्वी पर जीवन और सभ्यता को स्थिर रखते हैं। पदच्छेद एवं शब्दार्थ सत्यम् — सत्य, यथार्थता बृहत् — विशालता, उदारता, व्यापक दृष्टि ऋतम् उग्रम् — कठोर एवं अटल सार्वभौमिक नियम दीक्षा — अनुशासन, संकल्प, आत्मनियमन तपः — परिश्रम, आत्मसंयम, साधना ब्रह्म — ज्ञान, चेतना, विद्या यज्ञः — परस्पर सहयोग, समर्पण, लोककल्याण पृथिवीं धारयन्ति — पृथ्वी को धारण करते हैं सा नः — वह पृथ्वी हमें भूतस्य भव्यस्य पत्नी — भूत और भविष्य की संरक्षिका उरुं लोकम् — विस्तृत जीव...

शब्दयात्री : रेतघड़ी

शब्दयात्री : रेतघड़ी मेरे भीतर एक रेतघड़ी भी है। धूपघड़ी की तरह उसे सूर्य की आवश्यकता नहीं। वह अपने भीतर ही समय को बहाती रहती है। मैं उसे देखता हूँ तो लगता है, जीवन भी कुछ ऐसा ही है। ऊपर का पात्र भविष्य है, नीचे का पात्र स्मृति। और वर्तमान वह सँकरा-सा मार्ग है, जहाँ से होकर हर कण गुज़रता है। जब वह मेरे साथ थी, तब मैंने रेत को गिरते हुए नहीं देखा। सुख में समय का प्रवाह दिखाई नहीं देता। लेकिन उसके जाने के बाद पहली बार मुझे हर गिरता हुआ कण सुनाई देने लगा। एक दिन। एक मौसम। एक वर्ष। फिर दूसरा। फिर तीसरा। धीरे-धीरे ऊपर का पात्र खाली होता गया। लेकिन आश्चर्य यह है कि नीचे का पात्र भरता गया। वहाँ स्मृतियाँ जमा होती रहीं। उसकी हँसी। उसकी चुप्पी। एक अधूरा वाक्य। एक अनकही विदाई। रेतघड़ी ने मुझे सिखाया कि समय कभी नष्ट नहीं होता। वह केवल अपना स्थान बदलता है। जो भविष्य था, वह वर्तमान बनता है। जो वर्तमान था, वह स्मृति। और अन्ततः हम सब अपने ही भीतर भरी हुई उस रेत को देखते रह जाते हैं, जो कभी हमारे हाथों से फिसलती चली गई थी। मैं आज भी उस रेतघड़ी को उलटता नहीं। उसे बहने देता हूँ। क्योंकि कुछ यात्राएँ रोक...