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Wednesday, 13 May 2026

कुर्वन्नेवेह कर्माणि” — ईशावास्योपनिषद् के द्वितीय मन्त्र का कर्म, ज्ञान और जीवन-दर्शन

 

कुर्वन्नेवेह कर्माणि” — ईशावास्योपनिषद् के द्वितीय मन्त्र का कर्म, ज्ञान और जीवन-दर्शन

शाङ्करभाष्य, वेदान्त, कर्मनिष्ठा एवं तुलनात्मक दार्शनिक अध्ययन


ईशावास्योपनिषद्द्वितीय मन्त्र (मूल संस्कृत)

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति कर्म लिप्यते नरे॥ २॥

 

मन्त्र का हिन्दी अर्थ

इस संसार में कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए।
इस प्रकार कर्म करते हुए जीने में ही तेरे लिए मार्ग है; इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है, जिससे कर्म मनुष्य को बाँध सके।

 

शङ्करभाष्य (संस्कृतयथावत्)

अथैतस्यामात्मविदः पुत्रैषणात्रयसंन्यासेनात्मज्ञाननिष्ठतयात्मा रक्षितव्य इत्येष वेदार्थः।
अथेतरस्याऽनात्मज्ञतयात्मग्रहणायाशक्तस्येदमुपदिशति मन्त्रः — “कुर्वन्नेवेति
कुर्वन्नेव इह निर्वर्तयन्नेव कर्माण्यग्निहोत्रादीनि।
जिजीविषेत् जीवितुमिच्छेच्छतं शतसंख्याकाः समाः संवत्सरान्।
तावद्धि पुरुषस्य परमायुर्निरूपितम्।
तथाच प्राप्तानुवादेनशतं समाःइत्युक्त्वातत्कुर्वन्नेव कर्माणिइत्येतद्विधीयते।
एवमेवंप्रकारेण त्वयि जिजीविषति नरे, नान्यथेतोऽस्ति प्रकारान्तरं येन प्रकारेणाशुभं कर्म लिप्यते।
कर्मणा लिप्यत इत्यर्थः।
अतः शास्त्रविहितानि कर्माण्यग्निहोत्रादीनि कुर्वन्नेव जिजीविषेत्।
कथं पुनरिदमवगम्यते? पूर्वेण मन्त्रेण संन्यासिनो ज्ञाननिष्ठोक्ता, द्वितीयेन तदशक्तस्य कर्मनिष्ठेति।
उच्यतेज्ञानकर्मणोर्विरोधः पर्वतवदकम्प्यः।
यथोक्तं — “ईशावास्यमिदं सर्वम्”, “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्इति च।
जीविते मरणे वा गृधिं कुर्यात्, अरण्यमीयात्इति च।
ततः पुनरियात्इति संन्यासशासनात्।
उभयोः फलभेदं वक्ष्यति।
इमौ द्वावेव पन्थानौप्रवृत्तिलक्षणो धर्मः, निवृत्तिलक्षणश्च।
तयोः संन्यासपथ एवातिरेचयति।
न्यास एवात्यरेचयत्इति तैत्तिरीयके।
द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताःप्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तिश्च विभावितःइत्यादि।॥२॥

 

शङ्करभाष्य का हिन्दी अनुवाद

प्रथम मन्त्र में यह वेदार्थ बताया गया कि आत्मज्ञानी पुरुष को पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणाइन तीनों एषणाओं का संन्यास करके आत्मज्ञान में स्थित रहकर आत्मा की रक्षा करनी चाहिए।

अब जो आत्मज्ञानी नहीं है और आत्मतत्त्व को ग्रहण करने में असमर्थ है, उसके लिए यह मन्त्र उपदेश करता है — “कुर्वन्नेव

अर्थात् इस संसार में अग्निहोत्र आदि कर्मों का अनुष्ठान करते हुए ही जीना चाहिए।

मनुष्य को सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिए, क्योंकि इतना ही मनुष्य का परम आयु-मान माना गया है।

यहाँशतं समाःकेवल आयु का उल्लेख है; मुख्य विधि यह है कि कर्म करते हुए ही जीवन बिताना चाहिए।

इस प्रकार कर्म करते हुए जीने वाले मनुष्य के लिए कर्मबन्धन से बचने का अन्य कोई उपाय नहीं है।

अर्थात् कर्म मनुष्य को बाँधता नहीं।

इसलिए शास्त्रविहित अग्निहोत्र आदि कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करनी चाहिए।

यह कैसे समझा जाए कि पहले मन्त्र में ज्ञाननिष्ठा और यहाँ कर्मनिष्ठा कही गई है?

उत्तर हैज्ञान और कर्म का परस्पर विरोध पर्वत के समान अचल है।

पहले मन्त्र में कहा गया

ईशावास्यमिदं सर्वम्
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा
मा गृधः

अर्थात् त्याग और आत्मैक्य का उपदेश दिया गया। और अन्य श्रुतियों में कहा गया

जीविते मरणे वा गृधिं कुर्यात्, अरण्यमीयात्अर्थात् जीवन और मृत्यु में आसक्ति रखकर वन को चला जाए।

इसलिए संन्यास का विधान स्पष्ट है।

दो मार्ग हैं

  1. प्रवृत्तिमार्ग (कर्म)
  2. निवृत्तिमार्ग (संन्यास)

इनमें संन्यासमार्ग श्रेष्ठ कहा गया है। तैत्तिरीय श्रुति में भी कहा गया— “न्यास एवात्यरेचयत्अर्थात् संन्यास ही श्रेष्ठ है।

 

द्वितीय मन्त्र का दार्शनिक स्थान

ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मन्त्र जहाँ आत्मज्ञान और संन्यास का प्रतिपादक है, वहीं द्वितीय मन्त्र कर्म और प्रवृत्ति का विधान करता है।

यहाँ उपनिषद् मानवता के दो स्तर स्वीकार करता है

  • आत्मज्ञानीजिसके लिए संन्यास
  • अनात्मज्ञजिसके लिए कर्मयोग

यह अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विभाजन है।

 

कुर्वन्नेव” — कर्म की अनिवार्यता

कुर्वन्नेवशब्द मेंएवका विशेष महत्त्व है, अर्थात्

  • कर्म करते हुए ही
  • निष्क्रियता नहीं
  • पलायन नहीं

शङ्कराचार्य के अनुसार अज्ञानावस्था में कर्म अनिवार्य है, क्योंकि मनुष्य देहाभिमान से युक्त है।

 

जिजीविषेत् शतं समाः” — जीवन की वैदिक अवधारणा

यहाँ उपनिषद् जीवन-विरोधी नहीं है।

यह कहता हैजीओ, किन्तु धर्मपूर्वक। कर्म करो, किन्तु आसक्ति से नहीं।

यह वैदिक जीवनदृष्टि है जहाँ संसार त्याज्य नहीं, साधना-क्षेत्र है।

 

कर्म और ज्ञान का विरोध

शङ्कराचार्य का अत्यन्त प्रसिद्ध सिद्धान्त यहाँ प्रकट होता है— “ज्ञानकर्मणोर्विरोधः पर्वतवदकम्प्यः।अर्थात् ज्ञान और कर्म का विरोध पर्वत के समान अचल है।

क्यों?

कर्म का आधार -  कर्ता /कर्म /करण /फल

ज्ञान का आधार – अद्वैत/अकर्ता आत्मा / अभेद

अतः जहाँ अद्वैत का अनुभव है, वहाँ कर्म की प्रेरणा नहीं रहती।

 प्रवृत्ति और निवृत्ति

उपनिषद् दो मार्ग स्वीकार करता है

() प्रवृत्तिमार्ग - गृहस्थ , यज्ञ ,अग्निहोत्र ,समाजधर्म ,कर्मयोग

() निवृत्तिमार्ग -  संन्यास ,आत्मज्ञान ,वैराग्य ,ब्रह्मनिष्ठा

शङ्कराचार्य निवृत्ति को श्रेष्ठ मानते हैं।

कर्म लिप्यते” — निष्काम कर्म का सिद्धान्त

यहाँ कर्म का त्याग नहीं, कर्मफलासक्ति का त्याग अपेक्षित है।

यदि कर्मअहंकार से रहित हो, फलासक्ति से रहित हो, ईश्वरार्पणबुद्धि से हो,

तो कर्म बन्धन नहीं बनता।

यही सिद्धान्त आगे Bhagavad Gita में कर्मयोग के रूप में विकसित होता है।

 

 वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक व्याख्या

आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार निष्क्रियता मानसिक विक्षेप उत्पन्न करती है।

मानव-मस्तिष्क स्वभावतः कर्मशील है।
अतः कर्म का दमन नहीं, बल्कि परिष्कार आवश्यक है।

आधुनिक दृष्टि सेनिष्काम कर्म

  • तनाव कम करता है
  • अहंकार घटाता है
  • उद्देश्यबोध देता है
  • मानसिक संतुलन बढ़ाता है

भारतीय दर्शनों से तुलनात्मक अध्ययन

() अद्वैत वेदान्त

Adi Shankaracharya के अनुसार

  • कर्म अज्ञानावस्था के लिए है।
  • ज्ञान होने पर कर्म का परित्याग होता है।

() विशिष्टाद्वैत

Ramanujacharya कर्म और भक्ति दोनों को स्वीकार करते हैं।

उनके अनुसार कर्म ईश्वर-सेवा है, त्याज्य नहीं।

() द्वैत

Madhvacharya के अनुसार जीव सदा ईश्वर से भिन्न है; अतः ईश्वरभक्ति और कर्म दोनों शाश्वत हैं।

() कर्ममीमांसा

Jaimini कर्म को ही प्रधान मानते हैं।

उनके लिए वेद का उद्देश्य यज्ञकर्म है, कि ब्रह्मज्ञान।

शङ्कराचार्य इसी मत का खण्डन करते हैं।

() सांख्य एवं योग

Patanjali का योगकर्मशुद्धिऔरचित्तवृत्ति निरोधकी ओर ले जाता है।

यह निष्काम कर्म के सिद्धान्त से साम्य रखता है।

 

 

पाश्चात्य दर्शन से तुलना

() Immanuel Kant

कान्त का “Duty for Duty’s sake” निष्काम कर्म के निकट है।

कर्म फल के लिए नहीं, कर्तव्यबोध से होना चाहिए।

() Soren Kierkegaard

किर्केगार्द ने आन्तरिक आस्था और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व पर बल दिया।

उनकी “Leap of Faith” कर्म और आत्मनिष्ठा के बीच सम्बन्ध स्थापित करती है।

() Albert Camus

कामू का “Absurd Hero” निरर्थकता के बीच कर्म करता रहता है।

किन्तु उपनिषद् कर्म को आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करता है।

() Friedrich Nietzsche

नीत्शे का “Will to Power” कर्मप्रधानता का दर्शन है, किन्तु उसमें त्याग और निष्कामता का अभाव है।

 

मुख्य पदों की दार्शनिक व्याख्या

कर्माणि

केवल लौकिक कार्य नहीं, बल्कि वैदिक यज्ञकर्म।

जिजीविषेत्

जीवन के प्रति सकारात्मक वैदिक दृष्टिकोण।

लिप्यते

कर्मफल-बन्धन में फँसना।

एव

कर्म की अनिवार्यता का बोधक।

नान्यथेतोऽस्ति

अज्ञानावस्था में कर्म से बचने का अन्य मार्ग नहीं।

 

निष्कर्ष

ईशावास्योपनिषद् का द्वितीय मन्त्र मानव जीवन की द्विस्तरीय साधना को प्रकट करता है।

  • आत्मज्ञानी के लिएसंन्यास
  • साधक के लिएनिष्काम कर्म

शङ्कराचार्य ने स्पष्ट किया कि ज्ञान और कर्म का अन्तिम समन्वय नहीं, बल्कि क्रम है

कर्मचित्तशुद्धिज्ञानमोक्ष

यह मन्त्र जीवन से पलायन नहीं सिखाता, बल्कि कर्म को साधना बना देता है।

इस प्रकार ईशावास्योपनिषद् भारतीय दर्शन में कर्म और ज्ञान के मध्य सूक्ष्म संतुलन की अद्वितीय स्थापना करता है।

 मुकेश ,,,,,,,

परछाइयों के भी अपने मुकाम बदल गए हैं

 शहरों में

लोग नहीं चलते
परछाइयाँ चलती हैं

और अब
परछाइयों के भी अपने
मुकाम बदल गए हैं

वे
भीड़ में नहीं खोतीं
बल्कि भीड़ ही बन जाती हैं

स्टेशन पर खड़े लोग
ट्रेन का इंतज़ार नहीं करते
बस अपने-अपने
अगले पल का
अनुमान लगाते रहते हैं

यहाँ सड़कें
याद नहीं रखतीं
कि किसने किसे छोड़ा था
वे बस
नई मंज़िलों को
जन्म देती रहती हैं

कभी-कभी
किसी खिड़की से
एक अधूरा गीत
बाहर गिर जाता है
और हवा उसे
आगे कहीं नहीं ले जाती
बस वहीं
रुककर सुनती रहती है

किताबें अब भी हैं
लेकिन पन्ने कम
और स्क्रॉल ज़्यादा हैं
अर्थ बदलता नहीं
बस रूप
जल्दी-जल्दी बदल जाता है

और सबसे अजीब बात
यहाँ लोग
अपने ही साए से
पहचान पूछने लगे हैं

शहर चुप है
पर उसकी चुप्पी में
अब पहले जैसा खालीपन नहीं
बल्कि एक
लगातार चलता हुआ शोर है
जो सिर्फ़ भीतर सुनाई देता है


मुकेश ,,,,,,,,,

परछाइयाँ भी थोड़ी बदली-बदली हैं

 शहरों में

लोग नहीं चलते

परछाइयाँ चलती हैं


लेकिन आज

परछाइयाँ भी थोड़ी बदली-बदली हैं


अब वे

दीवारों से नहीं

स्क्रीन से निकलती हैं


उँगलियों के इशारों पर

रास्ते तय करती हैं

और रिश्तों के नाम पर

कुछ एल्गोरिद्म

साँस लेते हैं


यहाँ धूप भी

सीधी नहीं पड़ती

वो पहले

काँच से गुज़रती है

फिर किसी चेहरे पर

अनजान-सा रंग छोड़ जाती है


चाय की दुकानों पर

अब बहसें नहीं होतीं

बस नोटिफिकेशन की

हल्की-सी झंकार होती है


और लोग

एक-दूसरे के पास होकर भी

इतने दूर होते हैं

कि दूरी भी

शर्मिंदा हो जाए


रातें अब

नींद नहीं लातीं

बस थकान को

अपडेट करती रहती हैं


और शहर

धीरे-धीरे सीख रहा है

कि यहाँ जीने से ज़्यादा

दिखना ज़रूरी हो गया है

और परछाइयाँ

अब इंसानों से पहले

ऑनलाइन हो जाती हैं


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

परछाइयाँ भी अब थकने लगी हैं

 शहरों में

लोग नहीं चलते

परछाइयाँ चलती हैं


और ये परछाइयाँ भी

अब थकने लगी हैं


काँच की इमारतों के बीच

सूरज नहीं टूटता

बस रोशनी

बहीखातों में दर्ज हो जाती है


यहाँ हर मुस्कान

एक अनुबंध है

और हर मुलाक़ात

एक तयशुदा समय का

छोटा-सा सौदा


लिफ़्टों में

ऊपर जाते हुए लोग

अंदर ही अंदर

नीचे उतरते रहते हैं


किसी पार्क में

एक बूढ़ा पेड़

अब भी याद करता है

कि कभी यहाँ

सिर्फ़ हवा चलती थी

और लोग रुक जाते थे


अब हवा भी

वाइफ़ाई जैसी हो गई है

दिखती नहीं

पर हर चीज़ को जोड़ती भी नहीं


और शहर

धीरे-धीरे यह सीख गया है

कि यहाँ चलना ज़रूरी नहीं

बस चलते रहने का

दिखावा करना पड़ता है


मुकेश ,,,,,

हर परछाई के साथ एक अधूरी कहानी

 शहरों में

लोग नहीं चलते
परछाइयाँ चलती हैं

और हर परछाई के साथ
एक अधूरी कहानी
चुपचाप लिपटी रहती है

सड़कों पर
जूतों की आवाज़ नहीं होती
बस थकी हुई साँसें
कंक्रीट पर गिरती रहती हैं
बिना किसी अर्थ के

कैफ़े की खिड़कियों में
चाय ठंडी हो जाती है
और बातचीत
मोबाइल स्क्रीन में
दफ़्न हो जाती है

यहाँ रिश्ते
हाथों से नहीं
नेटवर्क से बनते हैं
और टूटते भी हैं
बिना शोर के

मेट्रो की सीढ़ियों पर
चेहरे ऊपर-नीचे होते हैं
पर नज़रें कहीं नहीं रुकतीं
हर कोई
किसी अनदेखे स्टेशन की
तरफ़ भाग रहा है

और अंत में
जब रात शहर को ढक लेती है
तो पता चलता है—
यहाँ लोग नहीं रहते
सिर्फ़ उनकी परछाइयाँ
ओवरटाइम करती हैं

शहरों में लोग नहीं चलते परछाइयाँ चलती हैं

 शहरों में

लोग नहीं चलते

परछाइयाँ चलती हैं


दीवारों के सीने पर

कुछ थके हुए साए

रोज़ अपनी-अपनी

गुमशुदा सी चाल में

आगे बढ़ जाते हैं


यहाँ कदम नहीं बजते

यहाँ आवाज़ें नहीं गिरतीं

सिर्फ़ लैंपपोस्ट की पीली रोशनी में

कुछ अधूरी हसरतें

रास्तों का रूप धर लेती हैं


खिड़कियों के पीछे

चेहरे नहीं रहते

सिर्फ़ यादों की धुंध में

कुछ नाम

बार-बार बदलते रहते हैं


शहर में

लोग नहीं मिलते

सिर्फ़ वक़्त

एक-दूसरे से टकराकर

बिखर जाता है


और रात

जब सबसे गहरी होती है

तो समझ आता है—

यहाँ जीना नहीं चलता

सिर्फ़ परछाइयाँ चलती हैं


मुकेश ,,,,,,,,,

ईशावास्योपनिषद् के प्रथम मन्त्र एवं शाङ्करभाष्य का दार्शनिक, तुलनात्मक और शोधपूर्ण अध्ययन

 

 

ईशावास्यमिदं सर्वम्” — अद्वैत, त्याग और आत्मैक्य का उपनिषद्-दर्शन

ईशावास्योपनिषद् के प्रथम मन्त्र एवं शाङ्करभाष्य का दार्शनिक, तुलनात्मक और शोधपूर्ण अध्ययन


ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मन्त्र (मूल संस्कृत)

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ १॥

 

मन्त्र का यथावत् हिन्दी अनुवाद

यह सम्पूर्ण जगतजो कुछ भी इस चलायमान संसार में हैसब ईश्वर से आवृत है।
अतः त्यागपूर्वक उसका उपभोग करो; किसी के धन की इच्छा मत करो, क्योंकि यह धन वास्तव में किसका है?

 

शङ्करभाष्य का हिन्दी अनुवाद (यथारूप)

ईशाशब्दईशधातु से बना है, जिसका अर्थ हैशासन करने वाला।
अर्थात् यहाँईशसे अभिप्राय परमेश्वर, परमात्मा है, जो सबका नियन्ता है।

वह सब प्राणियों के भीतर अन्तर्यामी आत्मा के रूप में स्थित होकर सबका संचालन करता है।
अतः अपने वास्तविक आत्मस्वरूप परमात्मा से इस सम्पूर्ण जगत को आच्छादित करना चाहिए।

क्या आच्छादित करना चाहिए?
यह सम्पूर्ण जगतजो कुछ भी इस पृथ्वी पर चलायमान हैसबको इस भाव से देखना चाहिए किमैं ही यह सम्पूर्ण जगत हूँ”; अर्थात् परमार्थ सत्यस्वरूप आत्मा से इस मिथ्या चराचर जगत को आवृत करना चाहिए।

जैसे चन्दन में जल आदि के संसर्ग से उत्पन्न दुर्गन्ध, उसके वास्तविक सुगन्धस्वरूप के प्रकट होने पर ढँक जाती है; उसी प्रकार आत्मा पर आरोपित कर्तृत्व, भोक्तृत्व तथा द्वैतमय जगत का अज्ञानजनित स्वरूप आत्मभावना से नष्ट हो जाता है।

यह सम्पूर्ण नाम, रूप और कर्ममय विकार-समूह आत्मा के परमार्थ सत्यस्वरूप के ज्ञान से तिरोहित हो जाता है।

इस प्रकार जो पुरुष ईश्वरात्मभावना से युक्त हो जाता है, उसके लिए पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणाइन तीनों एषणाओं का संन्यास ही उचित है; कर्मों में उसका अधिकार नहीं रहता।

तेन त्यक्तेन” — अर्थात् त्याग द्वारा।

क्योंकि त्यक्त पुत्र या सेवक आत्मसम्बन्ध के अभाव से आत्मा की रक्षा नहीं करता; अतः यहाँ त्याग ही वेद का अभिप्राय है।

भुञ्जीथाःका अर्थ हैअपने आत्मस्वरूप की रक्षा करो।

इस प्रकार एषणात्रय से रहित होकर धन की इच्छा मत करो।
किसी दूसरे के धन की आकांक्षा मत करो।

कस्य स्वित् धनम्” — वास्तव में किसी का धन है ही नहीं; क्योंकि आत्मा ही यह सब है।
जब सब आत्मस्वरूप ही है, तब मिथ्या विषयों में लोभ क्यों किया जाए?

ईशावास्योपनिषद् का दार्शनिक महत्त्व

ईशावास्योपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद के वाजसनेयी संहिता के चालीसवें अध्याय में स्थित अत्यन्त संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त गम्भीर उपनिषद् है। इसमें केवल अठारह मन्त्र हैं, परन्तु सम्पूर्ण वेदान्त का सार इनमें समाहित है।

प्रथम मन्त्र ही सम्पूर्ण उपनिषद् का बीज है।
इसमें तीन मूल तत्त्व निहित हैं

  1. ईश्वरव्याप्ति — “ईशावास्यमिदं सर्वम्
  2. त्याग — “तेन त्यक्तेन
  3. अलोभ एवं अनासक्ति — “मा गृधः

शङ्कराचार्य इस मन्त्र को अद्वैत वेदान्त का प्रतिपादक मानते हैं। उनके अनुसार जगत् का वास्तविक स्वरूप आत्मा ही है; नाम-रूपात्मक भेद केवल अविद्याजन्य अध्यास हैं।

 

ईशावास्यमिदं सर्वम्” : अद्वैत का महावाक्य

शङ्कराचार्य के अनुसार यहाँवास्यम्का अर्थ केवलईश्वर से ढका हुआनहीं है, बल्किईश्वरस्वरूप से आच्छादित जाननाहै।

अर्थात् जगत को पृथक् सत्ता मानना अज्ञान है।
ज्ञान यह है

अहमेवेदं सर्वम्
मैं ही यह सम्पूर्ण जगत हूँ।

यहाँ उपनिषद् बाह्य ईश्वरवाद से आगे जाकर आत्मा और ब्रह्म की एकता की घोषणा करता है।

 

अध्यास और जगत् की मिथ्यात्व-व्याख्या

शङ्कराचार्य का समस्त दर्शनअध्यासपर आधारित है।

आत्मा स्वयं शुद्ध, निरुपाधिक, असंग और चैतन्यमात्र है; किन्तु अज्ञान से उसमें  कर्तृत्व ,भोक्तृत्व,सुख-दुःख, देहाभिमान, जगत्-भेद ,का आरोप हो जाता है।

चन्दन-दृष्टान्त अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
जैसे चन्दन पर आई दुर्गन्ध उसकी वास्तविक सुगन्ध नहीं है, वैसे ही संसारात्मक द्वैत आत्मा का वास्तविक स्वरूप नहीं है।

ज्ञान होने पर मिथ्यात्व नष्ट हो जाता है।

 

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा” : त्याग का वास्तविक अर्थ

सामान्य अर्थ में त्याग का अर्थ वस्तुओं को छोड़ देना समझा जाता है, किन्तु शङ्कराचार्य के अनुसार यहाँ त्याग का अर्थ है

  • अहंता का त्याग
  • ममता का त्याग
  • विषयासक्ति का त्याग
  • एषणात्रय का संन्यास

एषणात्रय

  1. पुत्रेषणा
  2. वित्तेषणा
  3. लोकेषणा

जब आत्मा ही सर्वस्व है, तब बाह्य वस्तुओं में आसक्ति अज्ञानमात्र है।

 

 मा गृधः” : उपनिषद् का नैतिक आयाम

यह मन्त्र केवल आध्यात्मिक सिद्धान्त नहीं देता, बल्कि नैतिक जीवन का आधार भी प्रस्तुत करता है।

यदि सबमें वही आत्मा है, तो

  • हिंसा का औचित्य नहीं,
  • शोषण का औचित्य नहीं,
  • लोभ का औचित्य नहीं।

यहाँ वेदान्त सामाजिक नैतिकता का भी आधार बनता है।

 

भारतीय दर्शनों से तुलनात्मक अध्ययन

() अद्वैत वेदान्त

शङ्कर के अनुसार

  • ब्रह्म सत्य है
  • जगत मिथ्या है
  • जीव और ब्रह्म अभिन्न हैं

यह मन्त्र अद्वैत का प्रत्यक्ष प्रतिपादक माना गया है।

 

 

() विशिष्टाद्वैत वेदान्त

Ramanujacharya के अनुसार जगत मिथ्या नहीं है।
जगत और जीव ब्रह्म के शरीर हैं।

अतःईशावास्यमिदं सर्वम्का अर्थ होगा

सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है क्योंकि वह उसका शरीर है।

यहाँ भेदाभेद स्वीकार है, पूर्ण अभेद नहीं।

 

() द्वैत वेदान्त

Madhvacharya के अनुसार

  • जीव और ईश्वर सदा भिन्न हैं।
  • जगत वास्तविक है।
  • ईश्वर सर्वव्यापक है, परन्तु जीव उससे भिन्न सत्ता है।

अतः वे इस मन्त्र को ईश्वर की सर्वाधिकारिता के रूप में ग्रहण करते हैं, आत्मैक्य के रूप में नहीं।

 

() त्रैतवाद

Swami Dayananda Saraswati के त्रैतवाद में

  1. ईश्वर
  2. जीव
  3. प्रकृति

तीनों अनादि और भिन्न माने जाते हैं।

इस दृष्टि सेईशावास्यम्का अर्थ है
ईश्वर का शासन सम्पूर्ण जगत पर है; किन्तु जगत और जीव ईश्वर नहीं हैं।

 

() सांख्य दर्शन

Kapila का सांख्य पुरुष और प्रकृति को भिन्न मानता है।
यहाँ अद्वैत की तरह पूर्ण अभेद नहीं है।

किन्तु वैराग्य और आसक्ति-त्याग की शिक्षा सांख्य से मिलती-जुलती है।

 

 

 

() बौद्ध दर्शन

विशेषतः माध्यमिक बौद्धमत में जगत की शून्यता का विचार अद्वैत के मिथ्यात्व से कुछ साम्य रखता है।

किन्तु अन्तर यह है

  • अद्वैत में आत्मा परम सत्य है,
  • बौद्ध में अनात्मवाद प्रधान है।

 

१०. पश्चिमी दार्शनिकों से तुलनात्मक अध्ययन

() Baruch Spinoza

स्पिनोज़ा ने कहा

“God or Nature”

उनके अनुसार सम्पूर्ण अस्तित्व एक ही अनन्त सत्ता का विस्तार है।
यह विचारईशावास्यमिदं सर्वम्से अत्यन्त निकट प्रतीत होता है।

किन्तु शङ्कर का ब्रह्म चैतन्यमय है, जबकि स्पिनोज़ा का substance दार्शनिक सत्ता है।

 

() Georg Wilhelm Friedrich Hegel

हेगेल का “Absolute Spirit” सम्पूर्ण विश्व-प्रक्रिया में स्वयं को प्रकट करता है।

यह अद्वैत के ब्रह्म-विचार से कुछ साम्य रखता है, किन्तु हेगेल में इतिहास और विकास वास्तविक हैं; शङ्कर में जगत मिथ्या है।

 

() Arthur Schopenhauer

शोपेनहावर उपनिषदों से अत्यधिक प्रभावित थे।
उन्होंने उपनिषदों को मानवता का महानतम ज्ञान कहा।

उनकी “Will” की संकल्पना दुःखमय संसार की व्याख्या करती है, और वैराग्य का मार्ग प्रस्तुत करती हैजोतेन त्यक्तेनके निकट है।

 

() Edmund Husserl और Phenomenology

हुस्सेरल ने “Pure Consciousness” अथवा “Transcendental Ego” की चर्चा की।

उनकी “Phenomenological Reduction” बाह्य जगत के स्थूल अनुभवों को निलम्बित कर शुद्ध चेतना तक पहुँचने का प्रयास है।

यह अद्वैत कीदृग्दृष्टिऔरसाक्षीचैतन्यकी अवधारणा से तुलनीय है।

 

() Martin Heidegger

हाइडेगर का “Being” का प्रश्न भी अस्तित्व की मूल सत्ता की खोज है।

किन्तु वेदान्त जहाँ ब्रह्म को चैतन्य कहता है, वहीं हाइडेगर Being को अनिर्वचनीय अस्तित्व-प्रक्रिया के रूप में देखते हैं।

 

ईशावास्योपनिषद् का सामाजिक और आध्यात्मिक सन्देश

यह मन्त्र केवल संन्यासियों के लिए नहीं है।

यह सिखाता है

  • उपभोग करो, परन्तु आसक्ति से नहीं।
  • धन रखो, परन्तु लोभ से नहीं।
  • संसार में रहो, परन्तु आत्मा को विस्मृत मत करो।

यहत्यागपूर्ण भोगका दर्शन है।

 

 निष्कर्ष

ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मन्त्र सम्पूर्ण वेदान्त का हृदय है।
शङ्कराचार्य ने इसे अद्वैत के परम घोषवाक्य के रूप में प्रस्तुत किया है।

ईशावास्यमिदं सर्वम्केवल दार्शनिक सिद्धान्त नहीं, बल्कि चेतना की क्रान्ति है।
जब साधक यह अनुभव करता है कि

आत्मैवेदं सर्वम्

तब

  • लोभ समाप्त हो जाता है,
  • भय समाप्त हो जाता है,
  • द्वेष समाप्त हो जाता है,
  • और मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।

इस प्रकार यह मन्त्र मानवता को एक ऐसे दर्शन की ओर ले जाता है जहाँ आध्यात्मिकता, नैतिकता, त्याग और सार्वभौमिक एकता एक ही सत्य के विविध आयाम बन जाते हैं।

 

 मुकेश ,,,,,,,,,