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दर्शन — विशिष्टाद्वैत- भाग–3 : ब्रह्म (नारायण) का स्वरूप

  रामानुज का विशिष्टाद्वैत — इतिहास , दर्शन , भक्ति और आधुनिक चिन्तन के आलोक में समग्र अध्ययन दर्शन — भाग –3 : ब्रह्म ( नारायण ) का स्वरूप भारतीय दर्शन के इतिहास में " ब्रह्म " की अवधारणा सबसे अधिक गहन और बहुआयामी रही है। उपनिषदों ने उसे समस्त अस्तित्व का मूल , अनन्त और अविनाशी तत्त्व कहा है , जबकि विभिन्न वेदान्ताचार्यों ने उसी ब्रह्म की भिन्न - भिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं। शंकराचार्य के यहाँ ब्रह्म का सर्वोच्च स्वरूप निर्गुण , निराकार और निर्विशेष है ; वहीं रामानुजाचार्य ब्रह्म को अनन्त कल्याणगुणों से सम्पन्न , सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान और करुणामय परम पुरुष के रूप में स्थापित करते हैं। उनके लिए ब्रह्म कोई अमूर्त दार्शनिक सत्ता नहीं , बल्कि श्रीमन नारायण हैं — जो जगत के कारण , जीवों के अन्तर्यामी , धर्म के आधार और मोक्ष के दाता हैं। विशिष्टाद्वैत का सम्पूर्ण दर्शन इसी ब्रह्म - स्वरूप पर आधारित है। यदि ब्रह्म की सही समझ न हो , तो जीव , जगत , भक्ति और मोक्...

दर्शन — भाग–2 : विशिष्टाद्वैत क्या है? — दर्शन का मूल स्वरूप

  रामानुज का विशिष्टाद्वैत — इतिहास , दर्शन , भक्ति और आधुनिक चिन्तन के आलोक में समग्र अध्ययन दर्शन — भाग –2 : विशिष्टाद्वैत क्या है ? — दर्शन का मूल स्वरूप भारतीय दर्शन में वेदान्त की अनेक धाराएँ विकसित हुईं , परन्तु उनमें एक प्रश्न सदैव केन्द्रीय बना रहा — परम सत्य क्या है , और उसका जीव तथा जगत से क्या सम्बन्ध है ? इसी प्रश्न के उत्तर में अद्वैत , विशिष्टाद्वैत और द्वैत जैसी विभिन्न दार्शनिक प्रणालियाँ सामने आईं। इनमें रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत वेदान्त एक ऐसा अद्वितीय दर्शन है जो न तो पूर्ण अभेद को स्वीकार करता है और न ही पूर्ण भेद को। वह दोनों के बीच ऐसा समन्वय प्रस्तुत करता है जो भारतीय दार्शनिक परम्परा में मौलिक और प्रभावशाली माना जाता है। विशिष्टाद्वैत का मूल प्रतिपादन यह है कि ब्रह्म एक ही है , परन्तु वह चित् ( जीव ) और अचित् ( जगत ) से विशिष्ट है। अतः न तो जीव और जगत ब्रह्म से पूर्णतः पृथक हैं , और न ही वे मिथ्या हैं। वे ब्रह्म ...