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Friday, 15 May 2026

अकेली महिला यात्री

 अकेली महिला यात्री


वह अकेली यात्रा कर रही थी।


प्लेटफ़ॉर्म की भीड़ में

उसने अपने बैग का पट्टा

थोड़ा और कसकर पकड़ लिया था,

जैसे इस शहर में

सावधानी भी

एक अतिरिक्त सामान हो।


वह बार-बार

डिजिटल बोर्ड देखती,

फिर आसपास के चेहरों को

हर अनजान नज़र

उसे थोड़ी देर तक पीछा करती महसूस होती।


उसके पास

एक छोटा-सा सूटकेस था,

एक पानी की बोतल,

और आँखों में

थोड़ी थकान,

थोड़ी दृढ़ता।


रात की ट्रेन थी।


टी स्टॉल वाला

उसे “बहनजी” कहकर चाय देता है,

एक बूढ़ी औरत

बेंच पर थोड़ी जगह सरका देती है,

लेकिन फिर भी

पूरा प्लेटफ़ॉर्म

उसके लिए

पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाता।


वह मोबाइल पर

धीरे-धीरे किसी से कहती है

“हाँ, ट्रेन आ जाए

तो बता दूँगी।”


उस एक वाक्य में

कितनी सदियों का डर छुपा था।


ट्रेन आने तक

वह लगातार सजग रही,

जैसे यात्रा नहीं,

एक परीक्षा दे रही हो।


मैंने देखा

पुरुषों के लिए

सफ़र अक्सर

सिर्फ़ दूरी तय करना होता है,

लेकिन एक अकेली स्त्री के लिए

कई बार

अपनी उपस्थिति बचाए रखना भी।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

सर्द रात का वेटिंग रूम

 सर्द रात का वेटिंग रूम


सर्द रात में

वेटिंग रूम की बेंचें

और ठंडी हो जाती हैं।


लोग कंबलों में नहीं,

एक-दूसरे की मौजूदगी में

थोड़ी गरमी ढूँढ़ते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,

कोहरे वाला प्लेटफ़ॉर्म

 कोहरे वाला प्लेटफ़ॉर्म


कोहरे में

आज प्लेटफ़ॉर्म

अपना ही चेहरा भूल गया है।


ट्रेन की सीटी

बहुत दूर से आती है,

जैसे कोई स्मृति

धुँध के भीतर रास्ता खोज रही हो।


मुकेश ,,,,,,,,

मालगाड़ी गुज़र गई

 “मालगाड़ी गुज़र गई

और बहुत देर तक

पटरियाँ काँपती रहीं।”


मुकेश ,,,,,,

फ़ास्ट ट्रेन गुज़री

 फ़ास्ट ट्रेन गुज़री

और प्लेटफ़ॉर्म पर

कुछ देर तक

धूल खड़ी रही।”


मुकेश ,,,,,,,

सुबह होने तक

 “सुबह होने तक

पूरी ट्रेन

किसी दूसरी दिशा में लग चुकी थी।”

मुकेश ,,

कई बार

 



ज़िंदगी भी

कई बार

हमारी नींद के दौरान

चुपचाप

अपनी पटरियाँ बदल देती है।”


मुकेश ,,