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हरिवंशपुराण - भाग ७८ — नरसिंह-रूप देखकर असुरों का विस्मय

हरिवंशपुराण - भाग ७८ — नरसिंह-रूप देखकर असुरों का विस्मय भविष्यपर्व के इस प्रसंग में भगवान विष्णु के नरसिंह-स्वरूप की अद्भुत शक्ति और उसके प्रभाव का वर्णन आता है। सिंह और मनुष्य के संयुक्त स्वरूप को देखकर असुरों के मन में उत्पन्न विस्मय इस कथा को भय, सामर्थ्य और दैवी हस्तक्षेप के प्रश्नों से जोड़ता है। इस प्रसंग का अध्ययन करते समय आख्यान के मूल स्वरूप और उसके दार्शनिक अर्थ के बीच भेद बनाए रखना आवश्यक है। मूल आख्यान भगवान विष्णु के अवतारों की परम्परा में नरसिंह-स्वरूप का विशिष्ट स्थान है। यह स्वरूप सामान्य मानवीय या पशु रूप से भिन्न है। इसमें सिंह की प्रचण्डता और मनुष्य की आकृति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। इसी असाधारण रूप के कारण नरसिंह का प्राकट्य देखने वालों के लिए विस्मयकारी बन जाता है। पुराणीय आख्यानों में असुरों को प्रायः बल, पराक्रम और अपने सामर्थ्य पर गर्व करने वाले पात्रों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। वे अनेक बार यह मान लेते हैं कि उनकी शक्ति के सामने कोई विरोधी टिक नहीं सकता। किन्तु जब उनके सामने ऐसी शक्ति प्रकट होती है, जिसकी उन्होंने कल्पना नहीं की होती, तब उनका आत्म...

हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग ७७ — इन्द्र द्वारा पर्वतों के पंख काटना और मैनाक की रक्षा

हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग ७७ — इन्द्र द्वारा पर्वतों के पंख काटना और मैनाक की रक्षा वराहावतार के प्रसंग में पृथ्वी की स्थिरता और प्राकृतिक व्यवस्था का वर्णन एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसी क्रम में पर्वतों के पंख काटे जाने और मैनाक पर्वत को सुरक्षित रखे जाने की कथा आती है। यह आख्यान पर्वतों की प्राचीन पौराणिक कल्पना, इन्द्र की शक्ति और प्रकृति की व्यवस्था के बीच सम्बन्ध को सामने लाता है। मूल आख्यान भगवान वराह द्वारा पृथ्वी को संकट से मुक्त करने और उसकी व्यवस्था स्थापित करने के बाद देवताओं को उनके निर्धारित अधिकार प्राप्त हुए। इन्द्र पुनः देवताओं के अधिपति के रूप में प्रतिष्ठित हुए। पृथ्वी भी दानवों के बन्धन से मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ गई। इसके बाद पर्वतों से सम्बन्धित एक विचित्र प्रसंग सामने आता है। पुराणीय आख्यान के अनुसार, प्राचीन काल में पर्वतों के पंख हुआ करते थे। वे पक्षियों की तरह आकाश में विचरण कर सकते थे। अपनी विशालता और गति के कारण वे जहाँ-तहाँ उड़ते और विभिन्न स्थानों पर उतरते थे। पर्वतों की इस स्वच्छन्द गति से पृथ्वी पर स्थिरता का अभाव उत्पन्न होता था। उनक...

हरिवंशपुराण - भाग ७६ — भगवान हरि द्वारा देवताओं की मुक्ति और इन्द्र को राजधर्म का उपदेश

  हरिवंशपुराण - भाग ७६ — भगवान हरि द्वारा देवताओं की मुक्ति और इन्द्र को राजधर्म का उपदेश भविष्यपर्व के इस प्रसंग में असुरों पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान हरि देवताओं को बन्धन से मुक्त करते हैं। देवता उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं, लेकिन भगवान केवल उनकी स्तुति स्वीकार करके उन्हें विदा नहीं करते। वे इन्द्र सहित देवताओं को उनके कर्तव्यों, निष्पक्षता और धर्मपालन का स्मरण कराते हैं। इस प्रकार कथा विजय के साथ उत्तरदायित्व का सम्बन्ध स्थापित करती है। मूल आख्यान वैशम्पायन जनमेजय से कहते हैं कि युद्ध में असुरों को पराजित करने के बाद भगवान हरि ने इन्द्र अर्थात् पुरन्दर और अन्य देवताओं को मुक्त कर दिया। संकट से मुक्त होकर देवताओं ने अपनी स्वाभाविक स्थिति प्राप्त की और इन्द्र को आगे करके भगवान नारायण के पास पहुँचे। देवताओं ने भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी कृपा से वे मृत्यु के मुख से बाहर आए हैं। उन्होंने स्वयं को भगवान की सेवा के लिए प्रस्तुत किया और उनके चरणों में अपनी निष्ठा प्रकट की। देवताओं की बात सुनकर कमलनयन भगवान प्रसन्न हुए। उन्होंने देवताओं को उनके निर्...

हरिवंशपुराण - भाग ७५ — वराहदेव द्वारा पृथ्वी का विभाजन और पर्वतों तथा नदियों की रचना

हरिवंशपुराण  -  भाग ७५ — वराहदेव द्वारा पृथ्वी का विभाजन और पर्वतों तथा नदियों की रचना भविष्यपर्व के इस प्रसंग में पृथ्वी की संरचना, पर्वतों की स्थापना और नदियों के प्रवाह का वर्णन सृष्टि की व्यवस्था के एक महत्त्वपूर्ण पक्ष को सामने लाता है। भगवान वराह द्वारा पृथ्वी को व्यवस्थित करने की कथा के माध्यम से प्रकृति की विविधता और उसके परस्पर सम्बन्धों को समझने का प्रयास किया गया है। मूल आख्यान वैशम्पायन जनमेजय को सृष्टि की प्राचीन कथाएँ सुनाते हैं। इन कथाओं में पृथ्वी की उत्पत्ति, उसके संरक्षण और उसके विभिन्न भूभागों की व्यवस्था का विशेष महत्त्व है। वराहदेव का आख्यान इसी परम्परा से जुड़ा है, जिसमें पृथ्वी को जलराशि से निकालकर उसके अस्तित्व को सुरक्षित करने की कथा मिलती है। पृथ्वी के संरक्षण के बाद उसके विभिन्न अंगों और प्राकृतिक संरचनाओं की व्यवस्था का प्रश्न सामने आता है। पर्वत, नदियाँ, वन और समुद्र पृथ्वी के स्वरूप को विविधता प्रदान करते हैं। पर्वत ऊँचे और विशाल भूभागों के रूप में दिखाई देते हैं, जबकि नदियाँ जल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाती हैं। वनस्पतियाँ इन प्राकृतिक प...

हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग ७४ — पर्वतों द्वारा देवों और असुरों में संघर्ष

  हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग ७४ — पर्वतों द्वारा देवों और असुरों में संघर्ष भविष्यपर्व की कथा-परम्परा में पर्वत केवल पृथ्वी की भौगोलिक संरचनाएँ नहीं हैं; वे प्राकृतिक शक्ति, स्थिरता और सृष्टि की विविध शक्तियों के प्रतीक भी हैं। देवों और असुरों के बीच संघर्ष के प्रसंग में इनका उल्लेख सृष्टि की शक्तियों के पारस्परिक सम्बन्ध को समझने का अवसर देता है। मूल आख्यान सृष्टि के विस्तार के साथ विभिन्न लोकों, प्राणियों और शक्तियों के बीच अनेक प्रकार के सम्बन्ध विकसित हुए। देव और असुर इस पुराण-परम्परा में परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों तथा सत्ता-संघर्ष के प्रमुख पात्रों के रूप में सामने आते हैं। उनके बीच का संघर्ष केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सृष्टि की व्यवस्था और उसके अधिकार को लेकर भी चलता है। पर्वत इस व्यवस्था में विशिष्ट स्थान रखते हैं। वे पृथ्वी को स्थिरता प्रदान करते हैं, नदियों के प्रवाह का आधार बनते हैं और अनेक प्रकार के जीवों तथा वनस्पतियों को आश्रय देते हैं। पुराणों में पर्वतों को कभी देवशक्तियों के निवास, कभी तपस्या के स्थल और कभी असाधारण सामर्थ्य से युक्त पात्रों के रूप में...

हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग ७३ — ब्रह्मा द्वारा विभिन्न राजाओं की नियुक्ति

 हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग ७३ — ब्रह्मा द्वारा विभिन्न राजाओं की नियुक्ति भविष्यपर्व के इस प्रसंग में सृष्टि की व्यवस्था को स्थिर रखने के लिए ब्रह्मा द्वारा विभिन्न राजाओं को दायित्व सौंपने की परम्परा का विवेचन किया गया है। यहाँ राजसत्ता का प्रश्न केवल शासन करने का नहीं, बल्कि लोकव्यवस्था, धर्मपालन और उत्तरदायित्व के निर्वाह का भी है। मूल आख्यान सृष्टि की रचना के पश्चात् ब्रह्मा के सामने एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न था। प्राणियों, वनस्पतियों, पर्वतों, नदियों और विभिन्न लोकों से युक्त संसार की उत्पत्ति हो जाने पर भी उसकी व्यवस्था अपने आप स्थिर नहीं हो सकती थी। सृष्टि का निर्माण एक कार्य था, परन्तु उस सृष्टि में संतुलन बनाए रखना उससे भिन्न कार्य था। प्रत्येक प्राणी की प्रकृति अलग थी। सबकी आवश्यकताएँ समान नहीं थीं और न ही सबके आचरण एक जैसे थे। कहीं बल की प्रधानता थी, कहीं ज्ञान की, कहीं धन की और कहीं तपस्या की। इन विविध प्रवृत्तियों के बीच व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसे नियामक तत्त्वों की आवश्यकता थी, जो अपने-अपने क्षेत्र में मर्यादा का पालन करा सकें। ब्रह्मा ने इस आवश्यकता को ध्यान में रख...

हरिवंशपुराण — भाग ७२ - भविष्यपर्व — वेदों की उत्पत्ति

 हरिवंशपुराण — भाग ७२ - भविष्यपर्व — वेदों की उत्पत्ति : ज्ञान, श्रुति और सृष्टि का विधान भारतीय परंपरा में वेदों को ज्ञान का प्राचीनतम और सर्वोच्च स्रोत माना गया है। वेद केवल धार्मिक अनुष्ठानों के निर्देश नहीं हैं; उनमें प्रकृति, देवताओं, यज्ञ, समाज और अस्तित्व के विषय में प्राचीन चिंतन भी सुरक्षित है। पुराणों में वेदों की उत्पत्ति का वर्णन सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ता है, क्योंकि जिस प्रकार संसार को व्यवस्थित करने के लिए सृष्टिकर्ता की कल्पना की गई है, उसी प्रकार उस संसार के संचालन और उसके ज्ञान के लिए वेदों को महत्त्व दिया गया है। भविष्यपर्व के सृष्टि-वर्णन की पृष्ठभूमि में यह प्रश्न उठता है कि संसार के विभिन्न तत्त्वों और लोकों की व्यवस्था के साथ ज्ञान की व्यवस्था कैसे स्थापित होती है। भारतीय धार्मिक दृष्टि में सृष्टि केवल पदार्थों का समूह नहीं है; उसमें नियम, क्रम और कर्तव्य का भी स्थान है। वेद इसी व्यवस्था के ज्ञान और उसके अनुष्ठानिक विधान से सम्बद्ध माने जाते हैं। वेद और ब्रह्मा की परंपरा पुराणों में ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा गया है। अनेक पौराणिक आख्यानों में वेदों का ...

हरिवंशपुराण — भाग ७१ - भविष्यपर्व — पर्वतों और नदियों की उत्पत्ति

 हरिवंशपुराण — भाग ७१ - भविष्यपर्व — पर्वतों और नदियों की उत्पत्ति : पृथ्वी पर जीवन का विस्तार पृथ्वी के उद्धार के बाद सृष्टि की व्यवस्था का अगला पक्ष सामने आता है—उस भूमि का स्वरूप, जिस पर जीवों का जीवन विकसित होता है। पर्वत, नदियाँ, वन और जलस्रोत पृथ्वी को केवल भौगोलिक संरचना नहीं देते, बल्कि जीवन के विस्तार के आधार भी बनते हैं। भारतीय पुराण-परंपरा में इन प्राकृतिक तत्त्वों की उत्पत्ति को प्रायः देवशक्तियों, ऋषियों और सृष्टि-नियामक तत्त्वों से जोड़कर समझाया गया है। भविष्यपर्व के पिछले प्रसंग में विष्णु के वराह-रूप द्वारा पृथ्वी को जल से ऊपर उठाने और उसे स्थिर करने का वर्णन आया। इस कथा का स्वाभाविक विस्तार पृथ्वी पर स्थित विभिन्न तत्त्वों और लोक-व्यवस्था की चर्चा में दिखाई देता है। पर्वतों और नदियों के आख्यान इसी व्यापक सृष्टि-वर्णन का हिस्सा हैं। पर्वतों का महत्त्व भारतीय धार्मिक साहित्य में पर्वत केवल ऊँची भूमि नहीं हैं। वे तपस्या, ज्ञान, देवताओं के निवास और प्राकृतिक शक्ति के प्रतीक भी हैं। हिमालय को देवात्मा पर्वत कहा गया है। मेरु को ब्रह्माण्ड की धुरी के रूप में कल्पित किया ग...

हरिवंशपुराण — भाग ७०- भविष्यपर्व — सृष्टि-रचना और पृथ्वी का उद्धार

  हरिवंशपुराण — भाग ७०- भविष्यपर्व — सृष्टि-रचना और पृथ्वी का उद्धार हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व में सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन केवल यह बताने के लिए नहीं है कि संसार कैसे बना। इस आख्यान में यह प्रश्न भी उपस्थित होता है कि पृथ्वी, जल, आकाश, पर्वत और जीवों से युक्त संसार किस प्रकार एक व्यवस्थित रूप प्राप्त करता है। पिछले भाग में विष्णु के वराह-अवतार का प्रसंग आया था। इस भाग में उसी आख्यान का अगला पक्ष सामने आता है—सृष्टि की रचना, पृथ्वी पर पर्वतों का भार और भगवान द्वारा पृथ्वी को रसातल से ऊपर उठाना। ब्रह्माण्ड की रचना वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि वैदिक श्रुति में आरम्भिक ब्रह्माण्ड का वर्णन स्वर्णमय अण्ड के रूप में मिलता है। सृष्टि के आरम्भ में यह अण्ड समस्त जगत् की संभावनाओं को अपने भीतर समेटे हुए था। सृष्टि-कर्ता ने उसे विभाजित किया और उसके विभिन्न भागों से अलग-अलग लोकों तथा तत्त्वों की व्यवस्था बनी। इस वर्णन में ब्रह्माण्ड का अण्ड अनेक भागों में विभक्त होता है। उसका ऊपरी भाग ब्रह्मलोक से और निचला भाग रसातल से सम्बद्ध किया गया है। अण्ड के भीतर स्थित विभिन्न तत्त्वों और रिक्त स्थ...

हरिवंशपुराण — भाग ६९- भविष्यपर्व — विष्णु का वराह-अवतार

 हरिवंशपुराण — भाग ६९- भविष्यपर्व — विष्णु का वराह-अवतार : पृथ्वी के उद्धार का आख्यान सृष्टि की पौराणिक कल्पना में पृथ्वी केवल एक निर्जीव भूखंड नहीं है। वह समस्त प्राणियों के जीवन का आधार है। जब पृथ्वी पर संकट आता है, तब उसका प्रभाव केवल मनुष्यों पर नहीं, बल्कि समूची सृष्टि की व्यवस्था पर पड़ता है। विष्णु के वराह-अवतार का आख्यान इसी विचार को एक विराट कथा के रूप में प्रस्तुत करता है। वराह अर्थात् वन्य शूकर का रूप सामान्य दृष्टि से एक पशु का रूप है, किंतु पुराणों में यही रूप दैवी शक्ति और सृष्टि-संरक्षण का माध्यम बन जाता है। विष्णु का यह अवतार उस समय प्रकट होता है, जब पृथ्वी को जल में डूब जाने अथवा अपने आधार से विचलित हो जाने के संकट से बचाने की आवश्यकता होती है। भगवान वराह पृथ्वी को अपने दाँतों पर धारण करके जल से ऊपर उठाते हैं और उसे पुनः उचित स्थान पर स्थापित करते हैं। इस कथा के विभिन्न पुराणों में घटनाओं का विस्तार अलग-अलग मिलता है। कहीं पृथ्वी को रसातल में ले जाने वाले असुर हिरण्याक्ष के साथ युद्ध का वर्णन है, तो कहीं वराह के विराट स्वरूप, उनकी गर्जना और जल में प्रवेश का विशेष चि...