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चिंतन — अध्याय–26 : सत्य क्या है? — भाग–6 : बौद्ध, जैन तथा कश्मीर शैव दर्शन में सत्य

  चिंतन — अध्याय –26 : सत्य क्या है ? — भाग –6 : बौद्ध , जैन तथा कश्मीर शैव दर्शन में सत्य भारतीय दर्शन का सबसे बड़ा सौन्दर्य यह है कि यहाँ सत्य को किसी एक मत , एक पुस्तक या एक परम्परा तक सीमित नहीं किया गया। यदि वेदान्त ने सत्य को ब्रह्म की दृष्टि से समझाया , तो बौद्ध दर्शन ने उसी प्रश्न को दुःख , अनित्यता और शून्यता के परिप्रेक्ष्य में देखा। जैन दर्शन ने कहा कि किसी भी वस्तु का सम्पूर्ण सत्य एक ही दृष्टिकोण से नहीं जाना जा सकता , जबकि कश्मीर शैव दर्शन ने सम्पूर्ण जगत् को शिव - चेतना की अभिव्यक्ति मानकर सत्य की एक अद्वितीय व्याख्या प्रस्तुत की। इन तीनों परम्पराओं में मतभेद अवश्य हैं , परन्तु एक गहरी समानता भी है — सत्य केवल मान लेने की वस्तु नहीं है ; उसे समझना , अनुभव करना और उसके अनुसार जीना आवश्यक है।   बौद्ध दर्शन : सत्य का प्रारम्भ दुःख की स्वीकृति से भगवान बुद्ध ने अपने उपदेशों का आरम्भ किसी ईश्वर , आत्मा या ब्रह्म की चर्चा ...

चिंतन — अध्याय–26 : सत्य क्या है? — भाग–5 : न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य और योग की दृष्टि से सत्य

  चिंतन — अध्याय–26 : सत्य क्या है? — भाग–5 : न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य और योग की दृष्टि से सत्य अब तक हमने देखा कि वेद और उपनिषद सत्य को अस्तित्व (Being) तथा वेदान्त उसे परम वास्तविकता (Ultimate Reality) के रूप में देखता है। परन्तु भारतीय दर्शन की सभी परम्पराएँ सत्य की खोज एक ही मार्ग से नहीं करतीं। एक अत्यन्त व्यावहारिक प्रश्न सामने आता है— यदि सत्य है, तो मनुष्य उसे जाने कैसे? क्या केवल श्रद्धा पर्याप्त है? क्या केवल तर्क पर्याप्त है? क्या अनुभव ही अंतिम प्रमाण है? या सत्य तक पहुँचने के लिए ज्ञान, तर्क, अनुभव और साधना—सभी की आवश्यकता है? इन्हीं प्रश्नों का उत्तर भारतीय दर्शन के पाँच महत्त्वपूर्ण दर्शन— न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य और योग —अपने-अपने ढंग से देते हैं। इन दर्शनों का विशेष योगदान यह है कि इन्होंने सत्य की खोज की विधि (Methodology) विकसित की। यदि वेदान्त सत्य का लक्ष्य बताता है, तो ये दर्शन सत्य तक पहुँचने का मार्ग स्पष्ट करते हैं। न्याय दर्शन : सत्य का आधार प्रमाण और तर्क महर्षि गौतम द्वारा प्रतिपादित न्याय दर्शन का मूल उद्देश्य है— यथार्थ ज्ञान के द्वारा ...