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चिंतन - क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है?

  चिंतन -  क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है? हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ गति को सफलता समझ लिया गया है। सब कुछ शीघ्र चाहिए—ज्ञान भी, धन भी, प्रेम भी, प्रतिष्ठा भी। प्रतीक्षा अब गुण नहीं, बाधा मानी जाने लगी है। अधैर्य हमारे समय का सबसे बड़ा संस्कार बनता जा रहा है। तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है? धैर्य का अर्थ रुक जाना नहीं है। धैर्य का अर्थ है—चलते रहना, बिना घबराए। नदी को समुद्र तक पहुँचने की जल्दी नहीं होती। वह हर मोड़ को स्वीकार करती है, हर पत्थर को छूती है, हर घाट को प्रणाम करती हुई आगे बढ़ती है। यदि वह अधीर हो जाए, तो बाढ़ बन जाएगी; यदि धैर्य रखे, तो जीवन बन जाएगी। मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है। जब वह समय से लड़ता है, तो भीतर बाढ़ आ जाती है। जब वह समय के साथ चलना सीखता है, तो जीवन में लय उतर आती है। धैर्य की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि वह देर तक प्रतीक्षा कर सकता है। उसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि प्रतीक्षा के दौरान भी उसका विश्वास नहीं टूटता। यही धैर्य को साधारण सहनशीलता से अलग करता है। सहन करना कभी-कभी विवशत...

चिंतन - क्या क्षमा आत्मा की सबसे कठिन विजय है?

  चिंतन -   क्या क्षमा आत्मा की सबसे कठिन विजय है? मनुष्य ने पर्वत जीते, समुद्र पार किए, आकाश में उड़ना सीख लिया। उसने प्रकृति की अनेक शक्तियों को अपने ज्ञान से बाँध लिया। पर एक युद्ध ऐसा है, जिसमें सबसे अधिक पराजय मनुष्य को स्वयं से ही मिलती है। वह युद्ध है— क्षमा का। तभी मेरे भीतर यह प्रश्न उठता है— क्या क्षमा आत्मा की सबसे कठिन विजय है? क्षमा को हम प्रायः दुर्बलता समझ लेते हैं। हमें लगता है कि जिसने प्रतिकार नहीं किया, वह हार गया। जिसने बदला नहीं लिया, वह कमज़ोर पड़ गया। किन्तु जीवन बार-बार सिखाता है कि प्रतिशोध के लिए जितनी शक्ति चाहिए, उससे कहीं अधिक शक्ति क्षमा के लिए चाहिए। क्रोध सहज है। प्रतिशोध स्वाभाविक है। पर क्षमा—साधना है। क्रोध बाहर की घटना से जन्म लेता है; क्षमा भीतर की परिपक्वता से। यही कारण है कि क्षमा किसी दूसरे पर किया गया उपकार नहीं, स्वयं पर किया गया अनुग्रह है। जिसे हम क्षमा नहीं करते, वह व्यक्ति हमारे भीतर जीवित रहता है। वह हमारी स्मृतियों में बार-बार लौटता है। उसके कारण हमारा मन अशांत होता है। हम समझते हैं कि हम उसे दंड दे रहे हैं, जबकि वास्तव में ...

चिंतन - क्या मैत्री आत्मा का सबसे विस्तृत घर है?

  चिंतन -  क्या मैत्री आत्मा का सबसे विस्तृत घर है? मनुष्य ने घर बनाए—ईंटों के, पत्थरों के, लकड़ियों के। फिर उसने परिवार बनाए, समाज बनाए, राष्ट्र बनाए। पर इन सबके बीच वह एक ऐसे घर की तलाश करता रहा, जहाँ प्रवेश के लिए न कोई परिचय-पत्र चाहिए, न कोई रक्त-संबंध, न कोई अधिकार। शायद उस घर का नाम मैत्री है। तभी मेरे भीतर यह प्रश्न उठता है— क्या मैत्री आत्मा का सबसे विस्तृत घर है? मैत्री का अर्थ केवल मित्र होना नहीं है। मित्रता दो व्यक्तियों के बीच हो सकती है, पर मैत्री चेतना की अवस्था है। वह किसी एक मनुष्य तक सीमित नहीं रहती। उसका स्वभाव फैलना है। जिस प्रकार दीपक यह नहीं चुनता कि किस दिशा में प्रकाश देना है, उसी प्रकार मैत्री यह नहीं चुनती कि किसे अपनापन देना है। वह विभाजन नहीं करती। वह उपस्थिति बन जाती है। हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि लोग परिचित बहुत हैं, पर मित्र बहुत कम। और उससे भी बड़ी विडंबना यह है कि मित्र तो मिल जाते हैं, पर मैत्री दुर्लभ होती जा रही है। क्योंकि मित्रता कभी-कभी स्वार्थ से भी बन जाती है। मैत्री कभी नहीं। मित्रता परिस्थितियों से जन्म ले सकती है। मैत्...

चिंतन - क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है?

  चिंतन -  क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है? ज्ञान मनुष्य को बहुत कुछ दे सकता है—तर्क, प्रमाण, विवेक, उपलब्धियाँ और प्रतिष्ठा। परंतु एक प्रश्न मेरे भीतर अक्सर देर तक ठहरा रहता है—यदि ज्ञान मनुष्य को अधिक विनम्र, अधिक सहृदय और अधिक मानवीय न बना सके, तो क्या वह वास्तव में ज्ञान है? यहीं से एक विचार जन्म लेता है— क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है? ज्ञान का पहला चरण जानना है। दूसरा समझना। और अंतिम—अनुभव करना। पर करुणा इन तीनों से भी आगे की अवस्था है। वहाँ हम केवल किसी का दुःख नहीं जानते, उसे समझते भी नहीं; हम उसे अपने भीतर महसूस करने लगते हैं। यही वह क्षण है जहाँ ज्ञान हृदय का रूप ले लेता है। सूखी धरती पर वर्षा का कोई सिद्धांत काम नहीं आता; वहाँ पानी चाहिए। उसी प्रकार जीवन में ऐसे अनेक क्षण आते हैं, जहाँ तर्क हार जाते हैं और करुणा जीत जाती है। किसी रोते हुए बच्चे को दर्शन नहीं चाहिए, माँ की गोद चाहिए। किसी शोकाकुल व्यक्ति को शास्त्रों के उद्धरण नहीं चाहिए, किसी का मौन स्पर्श चाहिए। किसी अकेले मनुष्य को सलाह नहीं चाहिए, साथ चाहिए। शायद इसी का नाम करुणा है। करुणा दया नह...

जेब

  जेब उसने पूछा तुम्हारी कमीज़ की जेब हमेशा खाली क्यों रहती है? मैंने कहा ज़रूरत पड़े तो भर लूँगा। वो बोली क्या? मैंने कहा जो मिल जाए। वो मुस्कुराकर बोली— नहीं... तुम्हारी जेब इसलिए खाली रहती है, क्योंकि तुम चीज़ें नहीं, लोग रखते हो। और लोग... जेब में नहीं, कमी छोड़ जाते हैं। — मुकेश

तकिया

  तकिया उसने पूछा तुम्हारा तकिया इतना दबा हुआ क्यों है? मैंने कहा सिर रखता हूँ उस पर। वो हँसी— सब रखते हैं। इतना तो किसी का नहीं दबता। मैंने कहा नींद से ज़्यादा ख़याल रखता हूँ। कुछ देर चुप रही। फिर बोली— अच्छा... इसलिए तुम्हारे ख़याल सुबह उठ जाते हैं, और तुम देर तक सोते रहते हो। — मुकेश

चिंतन - क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है?

  चिंतन -  क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है? मनुष्य का इतिहास यदि ध्यान से पढ़ा जाए, तो वह उत्तरों का इतिहास कम और प्रश्नों का इतिहास अधिक प्रतीत होता है। प्रत्येक युग ने अपने उत्तर गढ़े, और प्रत्येक अगला युग उन्हीं उत्तरों पर नए प्रश्न लेकर खड़ा हो गया। मानो सत्य कोई स्थिर शिला नहीं, बल्कि एक ऐसा क्षितिज है जो हर कदम पर थोड़ा और दूर चला जाता है। तब मन में एक विचार उठता है— क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है? उत्तर प्रायः समय के होते हैं, प्रश्न चेतना के। उत्तर परिस्थितियों के साथ बदल जाते हैं; प्रश्न युगों को पार कर जाते हैं। आज भी वही प्रश्न हमारे भीतर जीवित हैं जो हजारों वर्ष पहले किसी ऋषि, किसी दार्शनिक, किसी कवि या किसी साधारण मनुष्य के भीतर उठे होंगे— मैं कौन हूँ? सत्य क्या है? प्रेम क्यों है? दुःख का अर्थ क्या है? और सबसे बड़ा प्रश्न— मैं यहाँ क्यों हूँ? इन प्रश्नों का कोई अंतिम उत्तर आज तक नहीं मिला। फिर भी मनुष्य उन्हें छोड़ता नहीं। शायद इसलिए कि कुछ प्रश्न हल करने के लिए नहीं, मनुष्य को विकसित करने के लिए जन...