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Wednesday, 18 February 2026

काश मेरे घर की खिड़की तुम्हारे घर के सामने होती

 काश मेरे घर की खिड़की

तुम्हारे घर के सामने होती,

तो सुबह की पहली धूप

हम दोनों के दरम्यान

एक ही रंग में उतरती।


मैं परदा हल्का-सा सरकाता,

और देखता—

तुम चाय की भाप में

अपनी उनींदी आँखें छुपाए खड़ी हो।


हम कुछ कहते नहीं,

सिर्फ़ खिड़कियाँ खुलतीं,

और हवा

दो घरों के बीच

रिश्ता बनकर बहती रहती।


शाम को जब थकान

दीवारों से टिककर बैठती,

तो तुम्हारी परछाईं

मेरे कमरे की दीवार पर

धीमे से उतर आती।


कभी तुम मुस्कुरातीं,

और मुझे लगता

जैसे मेरी खिड़की के बाहर

अचानक कोई सितारा जल उठा हो।


बारिश की रातों में

बूंदें दोनों शीशों पर

एक ही ताल में गिरतीं,

जैसे आसमान

हमारी ख़ामोश बातों का

साथ दे रहा हो।


काश मेरे घर की खिड़की

तुम्हारे घर के सामने होती,

तो दूरी

सिर्फ़ सड़क भर की होती,

और मोहब्बत

आवाज़ दिए बिना

आ-जा सकती।


फिर शायद

चिट्ठियों की ज़रूरत न पड़ती,

फ़ोन की घंटियाँ भी नहीं,

बस एक नज़र,

एक हल्की-सी मुस्कान,

और दिन मुकम्मल।


काश…

पर शायद यही दूरी

इस ख़्वाब को

इतना ख़ूबसूरत बनाए रखती है


मुकेश ,,,,,,,,,,,

कभी ख़ुद से भी फ़ोन कर लिया करो

 कभी ख़ुद से भी फ़ोन कर लिया करो,

यह दुनिया बहुत व्यस्त है,

यहाँ हर आवाज़

किसी और के लिए उठती है।


एक दिन

अपने ही नंबर पर

घंटी बजाकर देखो,

शायद उधर से

तुम्हारी थकी हुई रूह

“हेलो” कहे।


पूछो उससे,

कैसी हो?

कब से चुप हो?

किस बात पर

अब भी मुस्कुराने की कोशिश करती हो?


कभी आईने के सामने बैठकर

अपने हालात सुनाया करो,

बिना दिखावे,

बिना तर्क,

बिना किसी सफ़ाई के।


तुम दूसरों की ख़बर रखते हो,

पर अपनी धड़कनों की

आवाज़ कब सुनी थी आख़िरी बार?


कभी ख़ुद से भी फ़ोन कर लिया करो,

कहो कि

सब ठीक न भी हो

तो भी तुम साथ हो।


कहो कि

थक जाना गुनाह नहीं,

रो लेना हार नहीं,

रुक जाना कमज़ोरी नहीं।


और अगर उधर से

सिर्फ़ ख़ामोशी आए,

तो समझ लेना

उसे बस

तुम्हारी मौजूदगी चाहिए थी।


कभी ख़ुद से भी फ़ोन कर लिया करो,

क्योंकि

इस भीड़ में

सबसे ज़्यादा इंतज़ार

तुम्हें

तुम्हारा ही रहता है।


मुकेश ,,,,,,,

तुम्हारी हँसी और अमलतास की बारिश

 तुम्हारी हँसी

जब खुलती है

तो लगता है

आसमान ने पीला उजाला

झरना शुरू कर दिया हो।


अमलतास की लंबी-लंबी लड़ियाँ

धूप से भरकर

झूम उठती हैं,

और हवा

उनमें छुपा संगीत

धीरे-धीरे बिखेरती है।


तुम हँसती हो

तो कोई ऋतु बदल जाती है

सूनी सड़क पर

अचानक रंग उतर आते हैं,

और पेड़ों की थकी शाखों में

नई धड़कन भर जाती है।


अमलतास की बारिश

तेज़ नहीं होती,

वह चुपचाप गिरती है

जैसे तुम्हारी मुस्कान

बिना शोर के

दिल पर उतरती है।


हर पीली पंखुड़ी

एक उजला लम्हा है,

जो गिरकर भी

मुरझाता नहीं—

बस ज़मीन को

थोड़ा और रोशन कर देता है।


मैंने देखा है,

जब तुम खिलखिलाती हो,

तो धूप का रंग

और गाढ़ा हो जाता है

जैसे किसी ने

दिन के माथे पर

सोने की बिंदी सजा दी हो।


अमलतास की यह बारिश

भीगाती नहीं,

बस भर देती है

आँखों में हल्की चमक,

हथेलियों में नरम गर्मी,

और भीतर

एक अनकही मिठास।


तुम्हारी हँसी

शायद कोई आवाज़ नहीं,

एक उजाला है

जो गिरता है,

बिखरता है,

और फिर भी

हर बार

नई तरह से खिल उठता है।


और मैं

उस पीली बारिश के नीचे खड़ा

बस इतना जानता हूँ,

कि कुछ लोग

मौसम नहीं होते,

वे अमलतास होते हैं

जिनकी हँसी से

पूरा आकाश

एक साथ झरने लगता है।


मुकेश ,,,,

वो तुम्हारा खिलखिलाना और अनारदानों का बिखरना

 वो तुम्हारा खिलखिलाना

अचानक, बेइख़्तियार,

जैसे सूनी दोपहर में

किसी ने धूप की मुट्ठी उछाल दी हो।


हँसी तुम्हारे होंठों से निकलती

और हवा में फैल जाती

हल्की, चमकीली,

जैसे किसी अनार को चीरकर

लाल दाने आकाश में बिखेर दिए हों।


मैंने कई बार सोचा है,

हँसी भी क्या फल होती है?

जिसे ज़रा-सा छुओ

तो भीतर छुपी मिठास

दिखने लगती है।


तुम्हारे खिलखिलाने में

कोई बनावट नहीं थी

बस एक खुलापन,

जैसे हथेलियाँ

बिना डर के फैल गई हों।


अनारदानों का बिखरना

मुझे हमेशा तुम्हारी याद दिलाता है—

छोटे-छोटे लाल चमकते कण,

जो ज़मीन पर गिरकर भी

अपना रंग नहीं छोड़ते।


तुम हँसती थीं

तो लगता था

दुनिया की सख़्ती थोड़ी कम हो गई;

जैसे किसी सर्द मौसम में

अचानक गरम चाय की भाप उठे।


अब जब तुम पास नहीं,

तब भी कभी-कभी

वही खिलखिलाहट

याद की तरह लौट आती है

धीमे से,

बिना दस्तक दिए।


और मैं सोचता हूँ,

अनार के दाने भले बिखर जाएँ,

उनकी मिठास

हथेली पर रह ही जाती है।


वो तुम्हारा हँसना

शायद एक पल था,

पर उसका रंग

आज तक नहीं फीका पड़ा

जैसे किसी ने

दिल की ज़मीन पर

अनारदानों-सा लाल उजाला

हमेशा के लिए छिड़क दिया हो।


मुकेश ,,,,

गुलमोहर का पेड़ और वो साँवली-सी लड़की

गुलमोहर का पेड़

हर साल की तरह इस बार भी दहका है

लाल फूलों में जैसे

किसी चुप प्रेम का उजाला ठहरा हो।


और उसके नीचे

वो साँवली-सी लड़की

धूप और छाँव के दरमियान खड़ी,

जैसे शाम का पहला रंग

धरती पर उतर आया हो।


उसके चेहरे पर

कोई बनावट नहीं थी,

बस एक सादगी

जो गुलमोहर की पत्तियों से छनती

रोशनी में और गहरी लगती थी।


जब हवा चलती,

फूल उसके बालों में उलझ जाते,

और वह मुस्कुरा कर

उन्हें हटाती नहीं

जैसे उसे पता हो

कि कुछ रंग

सजावट नहीं, पहचान होते हैं।


गुलमोहर की छाँव

पूरा साया नहीं देती,

बस हल्की-सी ठंडक;

ठीक वैसे ही

उसकी मौजूदगी,

न पूरी दूरी,

न पूरी नज़दीकी।


वो ज़्यादा बोलती नहीं थी,

पर उसकी आँखों में

कई मौसम ठहरे रहते,

बरसात की भीनी गंध,

सर्दियों की शांत धूप,

और किसी अनकहे सवाल की तपिश।


पेड़ हर झोंके पर

थोड़ा-सा झुकता,

जैसे उसे पहचानता हो;

और हर झरे फूल के साथ

ज़मीन पर

एक लाल दास्तान लिखी जाती।


मैं दूर खड़ा देखता रहा,

वो लड़की,

गुलमोहर की आग-सी छाँव में,

ख़ुद एक मौसम लगती थी—

साँवली, मगर उजली;

ख़ामोश, मगर गहरी।


शाम ढलते-ढलते

उसकी परछाईं लंबी हो गई,

और पेड़ के फूल

और भी दहक उठे,

जैसे दोनों के बीच

कोई बिन-बोला समझौता हो।


वो चली गई,

धीरे-धीरे,

धूप की आख़िरी लकीर की तरह;

पर गुलमोहर अब भी खड़ा है,

हर साल उसी तरह खिलता हुआ,

मानो इंतज़ार में हो

कि वो साँवली-सी लड़की

फिर से उसकी छाँव में आ खड़ी हो।


और मैं

हर बार उस पेड़ के पास से गुजरते हुए

सोचता हूँ,

कुछ लोग

पेड़ों की तरह नहीं जाते,

वे ऋतु बन जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,

गुलमोहर का पेड़ और खाली बेंच

 गुलमोहर का पेड़

आज भी उतना ही दहकता है,

लाल फूलों में जैसे

किसी अनकहे इकरार की आँच भरी हो।


उसके नीचे

वही खाली बेंच रखी है,

लकड़ी की सतह पर

समय की महीन दरारें,

और दरारों में

रुकी हुई दोपहरें।


कभी यहाँ

दो साए बैठते थे,

धूप आधी-आधी बाँटते हुए,

हवा में धीमे-धीमे

किसी आने वाले कल का ज़िक्र करते हुए।


अब बेंच अकेली है,

पर तन्हा नहीं,

उस पर झरे हुए फूल

किसी पुरानी बातचीत की

लाल विराम-चिह्न जैसे पड़े हैं।


गुलमोहर की छाँव

पूरा सुकून नहीं देती,

बस एक हल्की-सी ठहरन,

जैसे याद

जो चुभती भी है

और सहलाती भी।


जब हवा चलती है,

फूल बेंच पर गिरते हैं,

एक-एक कर,

बिना आवाज़ के;

और मैं सोचता हूँ,

क्या यादें भी ऐसे ही उतरती हैं

दिल की खाली सतह पर?


शाम ढलती है,

पेड़ के रंग और गहरे हो जाते हैं,

बेंच की परछाईं लंबी,

जैसे इंतज़ार

अपना क़द बढ़ा रहा हो।


मैं पास जाकर बैठता हूँ,

उस खाली जगह पर

जहाँ कभी कोई और बैठा था;

लकड़ी की ठंडक में

अब भी हल्की-सी गर्माहट है,

शायद धूप की,

शायद किसी स्पर्श की।


गुलमोहर का पेड़

हर साल फिर खिल उठता है,

पर बेंच

उसी जगह ठहरी रहती है

जैसे उसे मालूम हो

कि कुछ लोग लौटकर नहीं आते,

सिर्फ़ उनकी आहट लौटती है।


और उस आहट में

पेड़ की पत्तियाँ हिलती हैं,

फूल झरते हैं,

और खाली बेंच

थोड़ी देर के लिए

कम खाली लगने लगती है।


मुकेश ,,,,

गुलमोहर का पेड़ और तुम

 गुलमोहर का पेड़

आज फिर दहक रहा है,

लाल फूलों में जैसे

दोपहर ने अपना दिल टाँग दिया हो।


उसकी शाखों पर

धूप पिघलती है,

और पत्तों के बीच से

हवा कोई पुराना क़िस्सा सुनाती है।


मैं उस पेड़ के नीचे खड़ा

तुम्हें याद करता हूँ,

तुम भी कुछ ऐसे ही थीं,

अचानक खिल उठने वाली,

बिना वजह रोशनी बिखेर देने वाली।


जब गुलमोहर झरता है

तो ज़मीन पर

लाल चादर बिछ जाती है,

जैसे बिछोह भी

किसी मिलन की तैयारी हो।


तुम्हारी हँसी

उसी झरते फूलों-सी थी,

हल्की, मगर देर तक

दिल की सतह पर रंग छोड़ जाती।


गुलमोहर की छाँव

पूरी ठंडक नहीं देती,

पर पूरी धूप भी नहीं रहने देती—

ठीक वैसे ही

तुम्हारी मौजूदगी थी,

न पूरी दूरी,

न पूरी नज़दीकी।


शाम होते ही

उसके फूल और गहरे हो जाते हैं,

जैसे प्रेम

दिन भर की थकान के बाद

और सच्चा लगने लगे।


मैंने देखा है,

आँधियाँ आती हैं,

कुछ फूल बिखर जाते हैं,

कुछ शाखें झुक जाती हैं;

मगर अगली ऋतु में

वह फिर खिल उठता है।


शायद प्रेम भी

गुलमोहर जैसा होता है,

हर बार पूरा नहीं रहता,

पर हर बार

पूरी तरह लौट आता है।


आज जब हवा चलती है

और एक फूल मेरी हथेली पर गिरता है,

तो लगता है,

गुलमोहर का पेड़

अब भी तुम्हारा नाम जानता है।


और मैं,

उस नाम को

धूप और छाँव के बीच

धीरे से रख देता हूँ,

कि कहीं वह

फूल की तरह

फिर से दहक न उठे।


मुकेश ,,,,,,