पातञ्जल योगदर्शन — शोध-ग्रन्थ भाग–११ | योगदर्शन की ज्ञानमीमांसा-
पातञ्जल योगदर्शन — शोध - ग्रन्थ भाग – ११ | योगदर्शन की ज्ञानमीमांसा- प्रमाण , प्रत्यक्ष , अनुमान , आगम , विपर्यय , स्मृति और प्रज्ञा योग में ज्ञान का प्रश्न पातञ्जल योगदर्शन को केवल साधना - ग्रन्थ मानने पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न छूट जाता है — योगी कैसे जानता है कि जो वह जान रहा है , वह वास्तव में ज्ञान है ? ध्यान में कोई प्रकाश दिखाई दे सकता है। समाधि में कोई असाधारण अनुभव हो सकता है। अन्तर्दृष्टि अत्यंत प्रबल हो सकती है। किसी सूक्ष्म विषय का बोध होने का अनुभव हो सकता है। लेकिन — अनुभव होना और सत्य का ज्ञान होना एक ही बात नहीं। यही वह बिन्दु है जहाँ योगदर्शन की ज्ञानमीमांसा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। पतञ्जलि के लिए चित्त में उत्पन्न प्रत्येक प्रत्यय प्रमाण नहीं है। कुछ ज्ञान यथार्थ हैं। कुछ विपरीत ज्ञान हैं। कुछ केवल शब्द या कल्पना से निर्मित हैं। कुछ निद्रा से संबंधित हैं। और कुछ स्मृति हैं। इसलिए योगसूत्र का आरम्भ ही एक प्रकार क...