होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Monday, 23 February 2026

लफ़्ज़ों के बिना रिश्ता

 लफ़्ज़ों के बिना रिश्ता 


हम बैठे थे, बिना कुछ कहे,

सिर्फ़ आँखों ने सब कुछ बताया।

हँसी भी छुपी हुई थी,

और चुप्पी में भी प्यार गूँजता था।


तुम्हारे हाथ की हल्की सी छू,

मेरा दिल समझ गया,

कभी शब्दों की जरूरत नहीं होती,

जब रूहें एक-दूसरे को जानती हैं।


सन्नाटा भी हमारा दोस्त बन गया,

हर धड़कन में हम एक हो गए,

और वो पल, वो मौन,

हमेशा के लिए यादों में बस गया।


लफ़्ज़ों के बिना रिश्ता बना,

जो ना टूटे, ना बिखरे,

सिर्फ़ एहसासों की नदी में

हमने अपना अस्तित्व पाया।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

अधखुली पलकों का शहर

 अधखुली पलकों का शहर 


अधखुली पलकों का शहर बसता है मेरी रूह में,

जहाँ हर ख्वाब धीरे-धीरे अपने पंख फैलाता है।

रात की चादर तले

चुपचाप सायों की महफ़िल सजती है,

और चाँद की रौशनी हर कोने में गीत गुनगुनाती है।


सड़कें शांत, मगर यादें गहन,

हर कोने में एक नाम, एक मुस्कान,

जो हवा में घुलकर

दिल की दीवारों तक उतर आती है।

मैं चलता हूँ उस शहर में,

अधखुली आँखों के साथ,

हर पल उसकी धड़कन सुनता हूँ

और हर साँस में उसकी खुशबू पाता हूँ।


यहाँ समय नहीं, केवल लम्हे हैं,

जो थक कर बैठ जाते हैं,

जैसे रूह की अलमारी में

कभी खोए, कभी ढूँढे हुए ख़्वाब।

हर मोड़ पर यादें मिलती हैं,

हर कोने में अधूरी बातें पलती हैं,

और मैं उनके साथ चलता हूँ,

जैसे कोई मुसाफिर अपने मंज़िल की तलाश में।


शहर की गलियों में कभी हल्की हँसी सुनाई देती है,

कभी पुरानी शायरी की सरगोशी।

और मैं बैठ कर देखता हूँ,

कैसे अधखुली पलकों के पीछे

अँधेरे और रौशनी खेलते हैं,

कैसे हर साया अपनी कहानी कहता है।


यहाँ हर साँस में सूफ़ियाना रहस्य है,

हर धड़कन में इक गीत बसा है।

और जब मैं पलकें बंद करता हूँ,

तो लगता है कि यह शहर मेरी रूह में

हमेशा के लिए ठहर गया।


अधखुली पलकों का शहर…

जहाँ हर याद, हर ख्वाब,

और हर एहसास

रूहानी मोड़ पर मिलकर

मेरे भीतर का आकाश बना देते हैं


मुकेश ,,,,,,,,,,,

अधूरी बात का सिरा

 अधूरी बात का सिरा 


अधूरी बात का सिरा हाथ में रह गया,

जैसे कोई धागा आधा रह गया।


कहीं बीच में रुक गई हँसी,

कहीं अधूरा रह गया कोई फुसफुसा सा किस्सा।


मैंने पूछा, “क्यों छोड़ा?”

पर हवा ने भी जवाब नहीं दिया।


हर याद में उसकी परछाई मिली,

हर लम्हे में अधूरापन समाया।


वो चली गई,

और मेरे सवाल

सिर्फ़ खामोशी में गूँजते रहे।


अधूरी बात का सिरा हाथ में रह गया,

और मैं उसे पकड़ कर

हर दिन वही पूरा करने की कोशिश करता रहा।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

मैं उसे याद करता रहा,

 मैं उसे याद करता रहा,

हर साँस में उसका नाम लिया,

हर खामोशी में उसकी हँसी खोजता रहा,

हर धड़कन में उसका कदम महसूस किया।


और वो…

चुपचाप मुझे भूलने की कोशिश करती रही,

जैसे कोई नदी अपनी लहरें पीछे छोड़ दे,

जैसे कोई मौसम धीरे-धीरे अपनी खुशबू बदल दे।


रात के सन्नाटे में,

मैंने उसका साया अपने सामने देखा,

पर जब मैं हाथ बढ़ाता,

वो धुंध की तरह फिसल जाती।


दिन का उजाला भी मुझे ढूँढ नहीं पाया,

सूरज की पहली किरण भी मेरे दिल को नहीं छू पाई।

मैंने हर जगह उसे तलाशा —

भीड़ में, हवा में, बारिश में,

पर उसकी मुस्कान केवल मेरी यादों में थी।


मेरी तन्हाई ने मुझसे पूछा,

“क्या वो कभी लौटेगी?”

मैंने सिर झुकाया और चुप रह गया,

क्योंकि जवाब में केवल उसका नाम था,

जो मेरी रूह में गहराई तक गूँजता रहा।


और इसी याद में मैंने अपनी रातें बिताईं,

जैसे कोई पुराना ग़म अपनी खामोशी में बसा हो,

और मैं, हर पल उसकी परछाई के पीछे,

धीरे-धीरे खोता गया,

लेकिन उसे भूलने की उसकी कोशिश

कभी मेरे दिल से दूर नहीं हो सकी।


मुकेश ,,,,,,,,

रात के अँधेरे में बिछ गई कुछ हल्की-सी रौशनी,

 रात के अँधेरे में बिछ गई कुछ हल्की-सी रौशनी,

परछाइयाँ आईं, बैठीं जैसे कोई ख़ामोश महफ़िल।


दीवारों पे नाचते, खिड़कियों में छुपते,

कुछ हँसी लिए, कुछ बातें लिए।


मैंने देखा उन्हें चुपचाप गुनगुनाते,

बीती यादों का संगीत सुनाते।


हर परछाई में एक नाम, हर साया में इक लम्हा,

महफ़िल रही मेरी, मेरी रूह की, मेरी यादों का।


मुकेश ,,,,,,,,,,

ठहरी हुई शाम आई, धीरे-धीरे कदम रख कर,

 ठहरी हुई शाम आई, धीरे-धीरे कदम रख कर,

सन्नाटे ने कानों में फुसफुसाई इक रहस्य भरी बात कर।


पेड़ों की पत्तियाँ हिलीं, मगर हवा भी सुनसान थी,

जैसे कोई पुराना ख़्वाब अब आँखों में उतर आया।


छत पर खड़ा मैं, खामोशी से बातें कर रहा,

दिल की दीवारों में भी तेरी परछाई उतर आई।


शहर की हलचल पीछे रह गई, समय भी थम सा गया,

ठहरी हुई शाम ने मेरी रूह को अपने आँचल में समेट लिया।


हर लम्हा ठहर गया, हर साँस में इक गीत बज उठा,

और मैं समझ गया — कुछ पल बस हमारी अपनी याद में रहते हैं।


नीला आसमान, सुनहरी डोर, ये शाम भी कुछ कह रही थी,

“जो ठहरता है दिल में, वही असली प्यार की पहचान होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

नींद से पहले का ख़्याल

 नींद से पहले का ख़्याल


रात यूँ दिल पे उतरती है कि जैसे कोई आह,

और ख़ामोशी में जल उठती है यादों की निगाह।


दिन का कोलाहल थमा तो लगा, कुछ कमी सी है,

कोई लम्हा है जो सीने में अभी तक थमी सी है।


तकिये पर सर रखूँ तो तेरी सदा आती है,

जैसे वीरान गली में कोई रौशनी जाती है।


नींद की ओट में भी दिल को करार आता नहीं,

तेरा ख़्याल है कि जाता है, मगर जाता नहीं।


सुबह की धूप भी पूछे कि ये कैसी तन्हाई थी,

रात भर किससे मिरी रूह की रुसवाई थी।


नींद से पहले का वो पल, वो नर्म सा इक एहसास 

ज़िन्दगी से भी ज़्यादा था, और फिर भी था उदास


मुकेश ,,,,,,,,,,,,