ईशावास्योपनिषद्
का त्रयोदश मंत्र : सम्भूति–असम्भूति फलभेद एवं शंकरभाष्य का दार्शनिक विवेचन
मूल
मंत्र (यथावत)
अन्यदेवाहुः
सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्
।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥
१३ ॥
मंत्र
का हिंदी अनुवाद
कुछ
लोग कहते हैं कि
सम्भूति (कार्य ब्रह्म की उपासना) से
प्राप्त फल भिन्न है,
और कुछ लोग कहते
हैं कि असम्भूति (अव्यक्त/अविद्या उपासना) से प्राप्त फल
भिन्न है। इस प्रकार
हमने धीर और बुद्धिमान
आचार्यों से यह परम्परा
सुनी है, जिन्होंने हमें
इसका स्पष्ट विवेचन किया।
शंकरभाष्य
(संशोधित एवं यथावत संस्कृत रूप)
अधुना
उभयोरुपासनयोः समुच्चयकारणम् अवयवफलभेदम् आह — अन्यदेव इति।
अन्यदेव आहुः फलं सम्भवात्
सम्भूतेः कार्यब्रह्मोपासनात् अणिमाद्यैश्वर्यलक्षणम् इत्यर्थः। तथा च अन्यदाहुः
असम्भवात् असम्भूतेः अव्याकृतात् अव्याकृतोपासनात् यदुक्तम् “अन्धं तमः प्रविशन्ति” इति
प्रकृतिलय इति च पौराणिकैः
उच्यते इति एवं शुश्रुम
धीराणां वचनम् ये नः तत्
विचचक्षिरे व्याकृताव्याकृतोपासनफलम् व्याख्यातवन्तः इत्यर्थः ॥ १३ ॥
शंकरभाष्य
का हिंदी अनुवाद (यथारूप)
अब दोनों उपासनाओं के समुच्चय के
कारण के रूप में
उनके भिन्न-भिन्न फलों का वर्णन
किया गया है।
“अन्यदेव
आहुः सम्भवात्” —
कुछ लोग कहते हैं
कि सम्भूति (कार्य ब्रह्म) की उपासना से
प्राप्त फल अलग है,
जो अणिमा आदि ऐश्वर्य रूप
है।
तथा
“अन्यदाहुः असम्भवात्” —
असम्भूति (अव्यक्त प्रकृति/अविद्या) की उपासना से
भी भिन्न फल बताया जाता
है, जैसा कि “अन्धं
तमः प्रविशन्ति” आदि श्रुतियों तथा
पुराणों में “प्रकृतिलय” कहा
गया है।
इस प्रकार हमने धीर बुद्धिमान
आचार्यों से यह वचन
सुना है, जिन्होंने हमें
व्याकृत और अव्याकृत उपासना
के फलों का स्पष्ट
विवेचन किया।
शोधपूर्ण
निबंध
“ईशावास्योपनिषद्
के त्रयोदश मंत्र में सम्भूति-असम्भूति उपासना के फलभेद एवं शंकराचार्य की समन्वय दृष्टि”
ईशावास्योपनिषद्
का यह त्रयोदश मंत्र
उपनिषद् दर्शन में उपासना-मार्ग
के फलभेद को स्पष्ट करने
वाला एक महत्वपूर्ण दार्शनिक
सूत्र है। इसमें यह
बताया गया है कि
सम्भूति और असम्भूति की
उपासनाओं के परिणाम भिन्न-भिन्न होते हैं, और
यही भेद उनके समुच्चय
(combined understanding) का
आधार बनता है।
आदि
शंकराचार्य इस मंत्र की
व्याख्या में यह स्पष्ट
करते हैं कि उपनिषद्
किसी एक उपासना को
निरर्थक नहीं कहता, बल्कि
प्रत्येक साधना के अलग-अलग
स्तर और फल को
दर्शाता है।
सम्भूति
और असम्भूति का स्वरूप
शंकराचार्य
के अनुसार —
- सम्भूति = कार्य ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) की उपासना
- असम्भूति = अव्याकृत प्रकृति / अविद्या
ये दोनों ब्रह्म के सापेक्ष रूप
हैं, न कि अंतिम
सत्य।
फलभेद
का सिद्धान्त
इस मंत्र का मुख्य दार्शनिक
बिंदु यह है कि
—
|
उपासना |
फल |
|
सम्भूति
(कार्य ब्रह्म) |
ऐश्वर्य,
अणिमा आदि सिद्धियाँ |
|
असम्भूति
(अव्यक्त) |
प्रकृतिलय
/ सीमित लय अवस्था |
इस प्रकार उपासना के स्तर के
अनुसार फल भी भिन्न
होते हैं।
“अन्यदेव”
का दार्शनिक अर्थ
“अन्यदेव”
का अर्थ केवल भिन्नता
नहीं, बल्कि यह संकेत है
कि —
- प्रत्येक साधना का क्षेत्र अलग है
- प्रत्येक का परिणाम सीमित है
- कोई भी अंतिम मोक्ष नहीं है
शंकराचार्य
की समन्वय दृष्टि
शंकराचार्य
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात
स्पष्ट करते हैं —
उपनिषद्
का उद्देश्य उपासनाओं का विरोध नहीं,
बल्कि उनके सीमित स्वरूप
का बोध कराना है।
अर्थात्
—
- उपासना = साधन
- ब्रह्मज्ञान = अंतिम लक्ष्य
धीर
आचार्यों की परम्परा
मंत्र
में “धीराणां वचनम्” का उल्लेख यह
दर्शाता है कि यह
ज्ञान —
- व्यक्तिगत मत नहीं
- बल्कि आचार्य-परम्परा (गुरु-शिष्य परम्परा) का परिणाम है
अद्वैत
दृष्टि में स्थान
अद्वैत
वेदान्त के अनुसार —
- सम्भूति और असम्भूति दोनों व्यावहारिक स्तर पर सत्य हैं
- परन्तु अंतिम सत्य इनसे परे है
इसलिए
यह मंत्र साधक को क्रमिक
समझ की ओर ले
जाता है।
ईशावास्योपनिषद्
का यह त्रयोदश मंत्र
उपासना के विविध स्तरों
और उनके फलभेद को
स्पष्ट करता है।
आदि
शंकराचार्य की व्याख्या यह
स्थापित करती है कि
उपनिषद् साधक को क्रमशः
उच्चतर चेतना की ओर ले
जाने वाला मार्ग दिखाता
है, जहाँ सभी सीमित
फल अन्ततः आत्मज्ञान की ओर संकेत
करते हैं।
इस प्रकार यह मंत्र साधना
की विविधता को स्वीकार करते
हुए भी एक गहन
अद्वैत सत्य की ओर
संकेत करता है।