अध्याय–21 : कल्पना, मानसिक चित्र और आन्तरिक दृश्य
खण्ड–तृतीय : मानसिक अनुशासन और एकाग्रता - अध्याय–21 : कल्पना, मानसिक चित्र और आन्तरिक दृश्य — मनुष्य अपने मन में एक दूसरी दुनिया कैसे निर्मित करता है? मनुष्य केवल वही नहीं देखता जो उसके सामने उपस्थित होता है। वह उन वस्तुओं, स्थानों और परिस्थितियों की भी कल्पना कर सकता है जिन्हें उसने कभी देखा ही नहीं। वह अतीत की किसी घटना को मन में दोबारा अनुभव कर सकता है, भविष्य की किसी सम्भावना का चित्र बना सकता है और ऐसी परिस्थितियों की कल्पना कर सकता है जो वास्तविक जीवन में अभी घटित ही नहीं हुई हैं। कभी हम किसी पुराने घर को याद करते हैं, तो उसकी दीवारें, कमरे, खिड़कियाँ और वहाँ बिताए हुए क्षण मन में उभरने लगते हैं। कभी किसी आने वाली यात्रा की कल्पना करते हैं, तो उस स्थान का दृश्य पहले ही मन में बनने लगता है। कभी किसी अनहोनी की आशंका में ऐसी घटनाओं के चित्र बनने लगते हैं, जो वास्तव में हुई ही नहीं हैं। यह सब मनुष्य की कल्पनाशक्ति का परिणाम है। यही क्षमता कला, साहित्य, विज्ञान और आविष्कारों को जन्म देती है। लेकिन यही कल्पना कभी भय, भ्रम और अनावश्यक चिन्ता का कारण भी बन सकती है। इसलिए अचेतन मन को...