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अचेतन मन को वश में कैसे करें -अध्याय ३ — अचेतन मन का स्वरूप : जो काम करता है, पर दिखाई नहीं देता

  शोधग्रन्थ — अचेतन मन को वश में कैसे करें - प्रथम खण्ड — अचेतन मन का स्वरूप - अध्याय ३ — अचेतन मन का स्वरूप : जो काम करता है, पर दिखाई नहीं देता मनुष्य का मानसिक जीवन केवल उन विचारों और भावनाओं तक सीमित नहीं है जिन्हें वह प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करता है। उसके भीतर अनेक ऐसी प्रक्रियाएँ चलती रहती हैं जिनकी जानकारी उसे तत्काल नहीं होती, लेकिन उनका प्रभाव उसके व्यवहार, निर्णय, इच्छाओं और प्रतिक्रियाओं पर पड़ता है। हम जानते हैं कि क्रोध करना उचित नहीं है, फिर भी क्रोध करते हैं। हम किसी पुरानी घटना को भूलना चाहते हैं, फिर भी उसकी स्मृति बार-बार लौट आती है। हम किसी आदत को छोड़ने का संकल्प लेते हैं, लेकिन कुछ समय बाद स्वयं को फिर उसी आदत में फँसा हुआ पाते हैं। ऐसा क्यों होता है? इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि मनुष्य का मानसिक जीवन केवल उसकी सचेत इच्छाओं से संचालित नहीं होता। पुराने अनुभव, सीखी हुई प्रतिक्रियाएँ, स्मृतियाँ, भावनात्मक सम्बन्ध और स्वचालित मानसिक प्रक्रियाएँ भी उसके वर्तमान व्यवहार को प्रभावित करती हैं। इसी व्यापक क्षेत्र को समझने के लिए अचेतन मन का अध्ययन किया जाता है। अच...

अचेतन मन को वश में कैसे करें - प्रथम खण्ड — अचेतन मन का स्वरूप अध्याय २ — चेतना क्या है?

 शोधग्रन्थ — अचेतन मन को वश में कैसे करें - प्रथम खण्ड — अचेतन मन का स्वरूप अध्याय २ — चेतना क्या है? अनुभव करने, जानने और स्वयं को पहचानने की क्षमता मनुष्य जागता है, देखता है, सुनता है, सोचता है और अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओं का अनुभव करता है। लेकिन इन सबके पीछे एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न है—मनुष्य को अपने अनुभवों का ज्ञान कैसे होता है? हम केवल वस्तुओं को देखते ही नहीं, बल्कि यह भी जानते हैं कि हम उन्हें देख रहे हैं। हम केवल दुःख अनुभव नहीं करते, बल्कि कभी-कभी यह भी पहचान लेते हैं कि हमारे भीतर दुःख उत्पन्न हो रहा है। हम विचार करते हैं और फिर अपने विचारों का परीक्षण भी कर सकते हैं। यही प्रश्न चेतना के अध्ययन का आधार है। अचेतन मन को समझने के लिए चेतना को समझना आवश्यक है, क्योंकि अचेतन और अवचेतन की चर्चा तभी सार्थक होगी जब हम यह जान सकें कि मानसिक जीवन का कौन-सा भाग हमारी जागरूकता में उपस्थित है और कौन-सा हमारी जानकारी के बिना कार्य करता है। चेतना का सामान्य अर्थ सामान्य भाषा में चेतना का अर्थ है—जागरूक होना, अनुभव करना और अपने आसपास या अपने भीतर घटित होने वाली घटनाओं का ज्...

अध्याय १ — मन क्या है? मन की प्रकृति, संरचना और कार्य

 शोधग्रन्थ — अचेतन मन को वश में कैसे करें - प्रथम खण्ड — अचेतन मन का स्वरूप अध्याय १ — मन क्या है? मन की प्रकृति, संरचना और कार्य मनुष्य अपने जीवन में अनेक प्रकार के अनुभव करता है। वह सोचता है, अनुभव करता है, इच्छाएँ करता है, निर्णय लेता है, कल्पनाएँ करता है और कभी-कभी ऐसे व्यवहार भी करता है जिन्हें वह स्वयं पूरी तरह समझ नहीं पाता। इन सभी अनुभवों के बीच एक सामान्य सूत्र दिखाई देता है—मन। लेकिन मन वास्तव में क्या है? क्या मन मस्तिष्क का ही दूसरा नाम है? क्या मन विचारों का समूह है? क्या इच्छाएँ और भावनाएँ ही मन हैं? अथवा इन सबके पीछे कोई ऐसी व्यवस्था काम करती है जो अनुभवों को ग्रहण करती है, उनका अर्थ निर्धारित करती है और हमारे व्यवहार को दिशा देती है? अचेतन मन को समझने के लिए इन प्रश्नों का उत्तर आवश्यक है। यदि हम मन की प्रकृति को ही नहीं समझेंगे, तो उसके उन कार्यों को नियंत्रित करने का प्रयास कैसे करेंगे जो हमारी जानकारी के बिना होते रहते हैं? मन की सामान्य धारणा दैनिक जीवन में हम मन शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में करते हैं। हम कहते हैं कि आज हमारा मन प्रसन्न है, किसी काम में मन नहीं...

अपने ही मन को जानने की यात्रा

भूमिका — अपने ही मन को जानने की यात्रा मनुष्य इस संसार में बहुत कुछ जानता है। वह प्रकृति को समझने का प्रयास करता है, आकाश की दूरियों को मापता है, समुद्र की गहराइयों में उतरता है और पदार्थ के सूक्ष्मतम कणों का रहस्य खोजता है। उसने अपने सुख-सुविधा के लिए असंख्य साधन बनाए हैं। लेकिन एक प्रश्न आज भी उसके सामने उतनी ही गम्भीरता से खड़ा है—क्या मनुष्य स्वयं अपने मन को जानता है? हम प्रायः मान लेते हैं कि हम जो सोचते हैं, वही हमारा मन है; हम जो चाहते हैं, वही हमारी इच्छा है; और हम जो निर्णय लेते हैं, वे सभी हमारे अपने विवेक के परिणाम हैं। किन्तु जीवन का अनुभव कुछ और ही कहानी कहता है। कभी हम जानते हुए भी वही गलती दोहराते हैं, जिससे हमें पहले हानि हो चुकी होती है। कभी किसी व्यक्ति के प्रति बिना पर्याप्त कारण के आकर्षण या विरोध अनुभव करते हैं। कभी किसी छोटी-सी घटना से भीतर ऐसी प्रतिक्रिया उत्पन्न हो जाती है, जिसकी तीव्रता वर्तमान परिस्थिति से कहीं अधिक होती है। कभी हम स्वयं से वादा करते हैं कि अब क्रोध नहीं करेंगे, भयभीत नहीं होंगे, किसी पुरानी आदत को नहीं दोहराएँगे; फिर भी अनुकूल अवसर आते ही पुर...

दशोपनिषद् : स्वरूप, दार्शनिक प्रतिपादन एवं परस्पर तुलनात्मक अध्ययन

 दशोपनिषद् : स्वरूप, दार्शनिक प्रतिपादन एवं परस्पर तुलनात्मक अध्ययन उपनिषद्-साहित्य भारतीय दर्शन की उस परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें मनुष्य ने पहली बार अपने अस्तित्व, चेतना, जगत्, मृत्यु और परम सत्य के सम्बन्ध में अत्यन्त गम्भीर प्रश्न उठाए। वैदिक साहित्य के कर्मकाण्डीय पक्ष से आगे बढ़कर उपनिषदों में ज्ञान, आत्मानुभूति और तत्त्वचिन्तन को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ। इसी कारण इन्हें वेदान्त का आधार माना जाता है। उपनिषदों की विस्तृत परम्परा में दस उपनिषद् विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं, जिन्हें सामान्यतः दशोपनिषद् कहा जाता है। ईशावास्योपनिषद्, केनोपनिषद्, कठोपनिषद्, प्रश्नोपनिषद्, मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक्योपनिषद्, तैत्तिरीयोपनिषद्, ऐतरेयोपनिषद्, छान्दोग्योपनिषद् तथा बृहदारण्यकोपनिषद् इस समूह में सम्मिलित हैं। इन दस उपनिषदों का महत्त्व केवल उनकी प्राचीनता अथवा धार्मिक प्रतिष्ठा में नहीं है। इनमें सत्य की खोज के अनेक मार्ग दिखाई देते हैं। कहीं गुरु और शिष्य का संवाद है, कहीं मृत्यु के सम्मुख खड़े मनुष्य का प्रश्न है, कहीं चेतना की अवस्थाओं का विश्लेषण है, कहीं सृष्टि की उत्पत्ति का अन...

हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - समाहार-निबन्ध

  हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - समाहार-निबन्ध — हरिवंशपुराण का स्वरूप, हमारी शोध-यात्रा, उपलब्धियाँ और भावी अध्ययन की दिशा हरिवंशपुराण को समझने का अर्थ केवल श्रीकृष्ण की कथा पढ़ लेना नहीं है। इसका अर्थ है—महाभारत की परम्परा से जुड़े उस विस्तृत आख्यान-संसार में प्रवेश करना, जहाँ सृष्टि, वंशावली, देव-असुर संघर्ष, राजधर्म, अवतारवाद, भक्ति, दान, तपस्या और मनुष्य के नैतिक निर्णय एक-दूसरे से जुड़ते हैं। इस शोध-यात्रा का उद्देश्य कथा को दोहराना भर नहीं, बल्कि उसके मूल पाठ, परम्परागत अर्थ, पाठभेद, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आधुनिक प्रश्नों को एक साथ समझने की दिशा बनाना है। प्रस्तावना : हमने हरिवंशपुराण का अध्ययन क्यों आरम्भ किया? किसी प्राचीन ग्रन्थ का अध्ययन करने के पीछे कई उद्देश्य हो सकते हैं। कोई व्यक्ति उसमें श्रद्धा के कारण प्रवेश करता है, कोई साहित्यिक सौन्दर्य के कारण, कोई इतिहास और संस्कृति की खोज में, तो कोई दर्शन और जीवन-मूल्यों को समझने के लिए। हरिवंशपुराण के अध्ययन में ये सभी उद्देश्य एक-दूसरे से जुड़ते हैं। हमारा उद्देश्य इस ग्रन्थ की कथा को सरल भाषा में पाठकों के सामने रखना, उसके प्रसं...