दर्शन — प्रत्यभिज्ञा दर्शन — भाग–2 सोमानन्द और शिवदृष्टि — प्रत्यभिज्ञा का दार्शनिक बीज
दर्शन — प्रत्यभिज्ञा दर्शन — भाग –2 सोमानन्द और शिवदृष्टि — प्रत्यभिज्ञा का दार्शनिक बीज प्रत्यभिज्ञा दर्शन के उदय को समझने के बाद अब उसके प्रथम व्यवस्थित दार्शनिक आधार की ओर बढ़ना आवश्यक है। प्रथम भाग में हमने देखा कि कश्मीर शैव परम्परा के भीतर ऐसी दार्शनिक पद्धति की आवश्यकता क्यों अनुभव हुई जो आगमिक शिवतत्त्व को तर्क , चेतना और आत्म - पहचान के स्तर पर स्थापित कर सके। इस दिशा में सोमानन्द का स्थान निर्णायक है। उनकी शिवदृष्टि को उस बौद्धिक यात्रा का महत्वपूर्ण आरम्भिक चरण माना जा सकता है , जो आगे चलकर उत्पलदेव की ईश्वरप्रत्यभिज्ञा में अधिक व्यवस्थित प्रत्यभिज्ञा - दर्शन का रूप ग्रहण करती है। यहाँ एक सावधानी फिर आवश्यक है। सोमानन्द को सीधे उसी विकसित प्रत्यभिज्ञा - तन्त्र का पूर्ण प्रतिपादक मानना उचित नहीं होगा , जो बाद में उत्पलदेव और अभिनवगुप्त के यहाँ मिलता है। अधिक सटीक बात यह है कि सोमानन्द ने उस दार्शनिक भूमि को तैयार किया जिस पर प्...