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आत्माओं के बीच का मौन

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  आत्माओं के बीच का मौन अध्याय–१ : पहली शाम हर प्रेम की शुरुआत "मैं तुमसे प्रेम करता हूँ" से नहीं होती। कुछ प्रेम एक अनजानी-सी शांति से शुरू होते हैं। वह उस शाम भीड़ में नहीं थी, फिर भी सबसे अलग दिखाई दे रही थी। उसके आसपास कोई विशेष आभा नहीं थी, कोई बनावटी आकर्षण नहीं। वह बस अपने होने में पूरी थी। जैसे किसी पुराने वृक्ष की छाया—जो किसी को बुलाती नहीं, फिर भी थका हुआ यात्री उसी के नीचे आकर बैठ जाता है। मैंने उसे पहली बार देखा, तो ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी नए व्यक्ति से मिल रहा हूँ। बल्कि ऐसा लगा जैसे बहुत समय पहले बिछड़ा हुआ कोई मौसम लौट आया हो। स्मृति ने उसे नहीं पहचाना, लेकिन हृदय ने बिना किसी परिचय के उसका स्वागत कर लिया। हमारी नज़रें मिलीं। एक क्षण... फिर दोनों ने अपनी-अपनी आँखें दूसरी ओर फेर लीं। लेकिन उस एक क्षण में कुछ ऐसा घट चुका था, जिसे शब्दों में बाँधना संभव नहीं था। शायद आत्माएँ एक-दूसरे को पहचानने के लिए नाम नहीं पूछतीं। उस शाम हम एक ही बरामदे में बैठे रहे। सामने आकाश में ढलता हुआ सूरज था। हवा में रातरानी की हल्की-सी सुगंध घुल रही थी। दूर किसी मंदिर से आती घंटियों ...

चिंतन - जो यह सब जानता है, क्या मैं उसे जानता हूँ?

  चिंतन -  जो यह सब जानता है, क्या मैं उसे जानता हूँ? मनुष्य संसार को जानने में अपना पूरा जीवन लगा देता है। वह भाषाएँ सीखता है। शास्त्र पढ़ता है। विज्ञान का अध्ययन करता है। इतिहास, दर्शन, कला, मनोविज्ञान— ज्ञान की कोई सीमा नहीं। पर एक क्षण ऐसा भी आता है, जब समस्त ज्ञान के बीच एक अद्भुत प्रश्न उठ खड़ा होता है— "जो यह सब जानता है, क्या मैं उसे जानता हूँ?" यही वह क्षण है, जहाँ दर्शन समाप्त नहीं होता— वह जन्म लेता है। मैं जानता हूँ कि यह वृक्ष है। यह नदी है। यह आकाश है। यह शरीर है। यह विचार है। यह स्मृति है। यह सुख है। यह दुःख है। पर जो इन सबको जान रहा है, वह कौन है? क्या मैंने कभी उसे देखने का प्रयास किया है? या मैं केवल उसके द्वारा देखी गई वस्तुओं में ही उलझा रहा? मुझे लगता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी विस्मृति यही है। वह दर्पण में दिखाई देने वाले चेहरे को जानता है, पर दर्पण में देखने वाले को नहीं। वह अपने विचारों से परिचित है, पर विचारों के साक्षी से नहीं। वह अपनी भावनाओं को पहचानता है, पर उन भावनाओं को आते-जाते देखने वाली चेतना से नहीं। भारतीय उपनिषदों की समूची यात्रा इसी प्रश्न...

जहाँ प्रेम बोलता नहीं

जहाँ प्रेम बोलता नहीं उससे पहली मुलाक़ात किसी फ़िल्म की तरह नहीं हुई थी। न कोई तेज़ हवा चली, न कोई बारिश हुई, न समय अचानक ठहर गया। बस एक साधारण-सी दोपहर थी... और उसी साधारण दोपहर में, वह मेरी ज़िंदगी की सबसे असाधारण घटना बन गई। वह खिड़की के पास बैठी थी। धूप उसके चेहरे पर नहीं, उसकी चुप्पी पर उतर रही थी। मैंने उसे पहली बार देखा, तो लगा जैसे किसी ने बहुत पुराने गीत का वह अंतरा सुना दिया हो, जिसे मैं बरसों से भूल चुका था। हमारे बीच परिचय हुआ। नाम पता चले। कुछ औपचारिक बातें हुईं। फिर अचानक बातचीत समाप्त हो गई... लेकिन अजीब बात यह थी कि बातचीत समाप्त होने के बाद भी हमारे बीच कुछ चलता रहा। शायद मौन... या शायद वही, जिसे लोग प्रेम कहते हैं। उसके साथ बैठना किसी नदी के किनारे बैठने जैसा था। वह कम बोलती थी, लेकिन उसकी आँखों में अनगिनत मौसम रहते थे। कभी सावन, कभी पतझर, कभी धूप की सुनहरी थकान। मैं अक्सर उसे देखता नहीं था। मैं उसे महसूस करता था। जब वह मुस्कुराती, तो लगता कमरे में रखी हर निर्जीव वस्तु भी थोड़ी-सी जीवित हो गई है। एक दिन उसने पूछा— "तुम इतने चुप क्यों रहते हो?" मैं हँसा। कहा—...

चिंतन - क्या विनम्रता ज्ञान का आभूषण नहीं, उसकी अंतिम परीक्षा है?

  चिंतन -  क्या विनम्रता ज्ञान का आभूषण नहीं, उसकी अंतिम परीक्षा है? ज्ञान प्राप्त करना कठिन है। पर ज्ञान को धारण करना उससे भी अधिक कठिन। मनुष्य जैसे-जैसे जानने लगता है, उसके भीतर यह भ्रम भी जन्म लेने लगता है कि अब वह दूसरों से अधिक जानता है। यहीं ज्ञान का प्रकाश धीरे-धीरे अहंकार की छाया में बदलने लगता है। तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या विनम्रता ज्ञान का आभूषण नहीं, उसकी अंतिम परीक्षा है? अधूरा ज्ञान प्रायः ऊँची आवाज़ में बोलता है। पूर्ण ज्ञान धीरे बोलता है। और प्रज्ञा... वह कई बार मौन ही रहती है। जिसे अपने ज्ञान पर अत्यधिक गर्व है, शायद उसने अभी ज्ञान का विस्तार देखा है, उसकी गहराई नहीं। क्योंकि गहराई में उतरते ही मनुष्य को अपनी सीमाएँ दिखाई देने लगती हैं। मुझे लगता है कि ज्ञान का पहला फल सूचना नहीं, विनम्रता है। जो जितना अधिक जानता है, उसे उतना ही अधिक अनुभव होता है कि अभी कितना कुछ जानना शेष है। इसीलिए समुद्र सबसे विशाल होकर भी नीचे रहता है। ऊँचाई पर्वत की हो सकती है, गहराई समुद्र की होती है। और गहराई का स्वभाव विनम्र होता है। प्रकृति का प्रत्येक महान दृश्य हमे...

चिंतन - क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं?

  चिंतन -  क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं? मनुष्य ने अपने हाथों की शक्ति बढ़ाने के लिए औज़ार बनाए। फिर उसने अपनी गति बढ़ाने के लिए वाहन बनाए। उसके बाद उसने अपनी स्मृति, गणना और विश्लेषण की क्षमता बढ़ाने के लिए यंत्रों का निर्माण किया। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऐसे कार्य कर रही है, जिनकी कभी कल्पना भी कठिन थी। पर तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं? बुद्धि जानती है। चेतना जागती है। बुद्धि तुलना करती है। चेतना साक्षी होती है। बुद्धि उत्तर खोजती है। चेतना प्रश्न के पीछे छिपे हुए स्वयं को खोजती है। यहीं से दोनों के बीच का अंतर स्पष्ट होने लगता है। यंत्र गणना कर सकते हैं। वे स्मृतियों का विशाल भंडार बन सकते हैं। वे भाषा रच सकते हैं। चित्र बना सकते हैं। संगीत की रचना भी कर सकते हैं। पर क्या वे किसी शिशु की मुस्कान देखकर भीतर उठने वाली करुणा का अनुभव कर सकते हैं? क्या वे किसी प्रियजन के वियोग में मौन हो जाने का अर्थ जी सकते हैं? क्या वे मृत्यु के सामने खड़े होकर अपने अस्तित्व पर प्रश्न कर सकते हैं? ...

तुम्हारा इंतज़ार

  तुम्हारा इंतज़ार इंतज़ार का भी अपना एक सौन्दर्य होता है। यह बात मुझे तुमसे मिलने के बाद समझ में आई। पहले लगता था कि प्रतीक्षा केवल समय को लंबा कर देती है। अब लगता है, प्रतीक्षा ही समय को अर्थ देती है। जब तुम आने वाली होती हो, तो मैं घड़ी नहीं देखता। मैं धूप का रंग देखता हूँ, हवा की चाल देखता हूँ, पेड़ों की पत्तियों को देखता हूँ। जाने क्यों, तुम्हारे आने से पहले पूरी दुनिया में एक हल्की-सी तैयारी शुरू हो जाती है। जैसे मौसम भी जानता हो कि कोई ऐसा आने वाला है, जिसके आने से साधारण क्षण भी याद बन जाते हैं। तुम्हारे आने का कोई निश्चित समय नहीं होता, लेकिन तुम्हारी आहट का एक अपना समय होता है। वह दिल को सबसे पहले सुनाई देती है। फिर आँखें दरवाज़े की ओर उठती हैं, और उसके बाद होंठों पर अनायास एक मुस्कान चली आती है। शायद यही प्रेम का सबसे सरल परिचय है—किसी के आने से पहले ही उसका असर महसूस होने लगे। और जब तुम सामने होती हो, तब समझ में आता है कि प्रतीक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती। वह हमारे भीतर मिलने की क्षमता पैदा करती है। जो सहज मिल जाता है, उसका सुख क्षणिक होता है; लेकिन जिसका इंतज़ार किया गया ...

तुम... और तुम्हारी शरारतें

  तुम... और तुम्हारी शरारतें तुम्हारी सबसे ख़ूबसूरत बात तुम्हारी मुस्कुराहट नहीं है। तुम्हारी सबसे ख़ूबसूरत बात है—तुम्हारी शरारतें। वो शरारतें जिनका कोई शोर नहीं होता, कोई ऐलान नहीं होता। बस आँखों के किसी कोने में चुपके से जन्म लेती हैं और बिना इजाज़त दिल में उतर जाती हैं। कभी तुम बात करते-करते अचानक रुक जाती हो, जैसे कोई राज़ अपने ही होंठों के पीछे छिपा लिया हो। कभी मेरी ओर देखकर यूँ मुस्कुरा देती हो, मानो तुम्हें पहले से मालूम हो कि मैं अगले ही पल अपनी नज़रें झुका लूँगा। और फिर तुम धीरे से हँस देती हो—उस हँसी में जीत का कोई अहंकार नहीं होता, बस अपनापन होता है। तुम्हारी शरारतें अजीब हैं। वे किसी बच्चे की तरह मासूम भी हैं और किसी ग़ज़ल के मतले की तरह दिलकश भी। वे कभी किसी तितली की तरह मेरे आसपास मंडराती हैं, तो कभी किसी ख़ुशबू की तरह मेरे भीतर उतर जाती हैं। उन्हें पकड़ना मुमकिन नहीं, बस महसूस किया जा सकता है। कई बार सोचता हूँ, अगर तुम इतनी शरारती न होतीं, तो शायद मेरी ज़िंदगी इतनी ख़ामोश होती कि उसमें हँसी की आवाज़ गुम हो जाती। तुम्हारी वही छोटी-छोटी अदाएँ, बेवजह की छेड़छाड़, और आ...