दर्शन -सांख्य दर्शन — प्रकृति से पुरुष और विवेक से कैवल्य तक भाग–६ : अहंकार — ‘मैं’ की उत्पत्ति और तत्त्व-विस्तार का आरम्भ
सांख्य दर्शन — प्रकृति से पुरुष और विवेक से कैवल्य तक भाग – ६ : अहंकार — ‘ मैं ’ की उत्पत्ति और तत्त्व - विस्तार का आरम्भ मुकेश श्रीवास्तव आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र पिछले भाग में हमने महत् को प्रकृति का प्रथम व्यक्त विकास माना था। महत् में निश्चय की शक्ति है ; वहीं से अनुभव - जगत् को एक ऐसी संरचना मिलती है जिसमें पहचान , निर्णय और विवेक सम्भव होते हैं। लेकिन अभी एक बात शेष है। “ यह है ” जान लेना एक बात है , और — “ मैं इसे जानता हूँ ” यह दूसरी। यहीं सांख्य का अगला तत्त्व सामने आता है — अहंकार। यहाँ ‘ अहंकार ’ का अर्थ केवल घमण्ड नहीं है। सांख्य में इसका अर्थ कहीं अधिक मूलभूत है — ‘ अहं ’ — अर्थात् ‘ मैं ’ की प्रत्ययात्मक संरचना। अहंकार का स्थान सांख्य की विकास - श्रृंखला को अब तक हम इस रूप में देख चुके हैं — प्रकृति → महत् → अहंकार प्रकृति कारण है। महत् प्रथम व्यक्त विकास। और महत् से — अहंकार। इस क्रम का अर्थ केवल ब्रह्म...