समय से परे एक लम्हा
वो लम्हा
जिसने घड़ी की कलाई पकड़कर
उसे रोक दिया—
हमारे दरम्यान
कुछ ऐसा ठहर गया
जो उम्र नहीं गिनता था।
तुम्हारी आँखों में
उस दिन वक़्त
किसी शर्मीले बच्चे की तरह
कोने में जा छुपा था,
और मैं
तुम्हारे ख़ामोश मुस्कुराने में
अपनी सारी सदियाँ भूल बैठा।
हवा भी
साज़िश में शामिल थी—
वह तुम्हारे दुपट्टे से उलझकर
मेरी साँसों तक आती रही,
जैसे हर बार
मुझे याद दिला रही हो
कि इश्क़
छूने से नहीं,
महसूस होने से पूरा होता है।
उस एक पल में
तुम्हारा नाम
मेरे होंठों तक आया,
मगर आवाज़ नहीं बना—
सीधे दिल में उतर गया,
और वहाँ
हमेशा के लिए
ठहर गया।
हम कुछ नहीं बोले,
फिर भी
सब कुछ कह दिया—
तुम्हारा देखना
मेरी इबादत बन गया,
और मेरा ठहरना
तुम्हारी तसल्ली।
वो लम्हा
न बीता, न गुज़रा,
वह बस
हमारे बीच
एक नर्म-सी लकीर बन गया
जिसे पार करने की
हिम्मत भी इश्क़ थी,
और न करने की भी।
अब जब भी
ज़िंदगी तेज़ चलने लगती है,
मैं आँखें बंद करता हूँ
और उसी लम्हे में
वापस उतर जाता हूँ
जहाँ तुम
अब भी
मेरे सामने हो,
और वक़्त
अब भी
हमसे हार रहा है।
क्योंकि
कुछ मुलाक़ातें
घड़ियों में नहीं,
रूह में घटती हैं
और कुछ लम्हे
समय से परे जाकर
सिर्फ़
इश्क़ हो जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,