एक रात
मैंने सपना देखा
कि पूरी पृथ्वी
लंबे अँधेरे में डूबी हुई है।
सभ्यताएँ
अपने ही शोर से थककर
खंडहरों में बदल चुकी थीं,
और मनुष्य
अपनी आत्मा का रास्ता भूल चुका था।
समुद्रों पर धुआँ था,
आकाश पर
टूटे हुए उपग्रहों की राख तैर रही थी,
और शहरों में
मंदिर, मस्जिद, संसद, बाज़ार —
सब एक जैसे सुनसान थे।
तभी
बहुत दूर पूर्व दिशा में
एक हल्की-सी आभा दिखाई दी।
पहले लगा
जैसे कोई पुराना दीपक हो,
मगर धीरे-धीरे
वह प्रकाश
एक विराट सूरज में बदलने लगा।
वह सूरज
भारत से उग रहा था।
उसकी रोशनी में
कोई विजय का गर्व नहीं था,
कोई साम्राज्य नहीं,
कोई युद्धघोष नहीं।
बस
ऋषियों की शांत आँखें थीं,
उपनिषदों की धीमी गूँज,
बुद्ध की करुणा,
कबीर की उलझी हुई साखियाँ,
और किसी अनाम संत का मौन।
दुनिया के थके हुए लोग
धीरे-धीरे
उस रोशनी की तरफ़ चलने लगे।
क्योंकि सदियों बाद
उन्हें पहली बार
ऐसा प्रकाश दिखाई दिया था
जो आँखों को नहीं,
भीतर के अँधेरे को उजाला दे रहा था।
मैंने उस उगते हुए सूरज से पूछा
“क्या तुम दुनिया बदल दोगे?”
उसने कोई उत्तर नहीं दिया।
बस उसकी रोशनी में
मनुष्यों के चेहरे
धीरे-धीरे शांत होने लगे।
और बहुत समय बाद
पृथ्वी पर
पहली बार
शोर कम हुआ।
— मुकेश