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Saturday, 23 May 2026

आठ आने

 आठ आने

अब सोचता हूँ तो लगता है कि बचपन के अधिकांश मित्र वास्तव में मित्र नहीं, समय के छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं, जो किसी पुराने कमरे की दीवारों की तरह भीतर बने रहते हैं। हम उन्हें वर्षों तक याद नहीं करते, लेकिन एक दिन अचानक कोई गंध, कोई आवाज़, या किसी खेल का दृश्य उन्हें फिर जीवित कर देता है।

वह लड़का भी अब इसी तरह लौटता है।

कभी पान की गंध के साथ।

कभी किसी खाली मैदान में खेलते बच्चों को देखकर।

कभी किसी पुरानी शाम की धूल में।

हम साथ पढ़ते थे। प्राथमिक विद्यालय के वे वर्ष, जिनमें जीवन अभी बहुत छोटा और दुनिया बहुत बड़ी लगती थी। स्कूल तक जाने वाली सड़क कच्ची थी। बरसात में कीचड़ भर जाता और गर्मियों में धूल उड़ती रहती। हम लोग बस्ते पीठ पर नहीं, अक्सर हाथ में लटकाकर चलते थे। रास्ते में इमली का एक पेड़ पड़ता था जिसके नीचे लड़के अक्सर गिल्ली-डंडा खेलते मिल जाते।


उन्हीं लड़कों में वह सबसे अलग दिखाई देता था।

दुबला-पतला।

घुटनों से ऊपर चढ़ी हुई फीकी निकर।

हमेशा धूल से सने पैर।

लेकिन गिल्ली-डंडा उसके हाथ में पहुँचते ही खेल अचानक खेल नहीं रहता था। उसमें एक अजीब-सी तन्मयता आ जाती। वह पहले जमीन पर झुककर गिल्ली को ठीक करता, फिर डंडे को हथेली पर दो-तीन बार घुमाता और उसके बाद जिस सफाई से गिल्ली को उछालकर मारता, वह हम सबको चकित कर देता। गिल्ली इतनी दूर जाती कि कई बार छोटे लड़के उसे खोजते-खोजते थक जाते।


उस समय उसके चेहरे पर एक आत्मविश्वास आ जाता था जो स्कूल में कभी दिखाई नहीं देता था।


पढ़ाई में वह बहुत कमजोर था।

इतना कि अध्यापक कई बार उसे उदाहरण बनाकर डाँटते। उसकी कॉपियाँ हमेशा अधूरी रहतीं। गणित के सवाल गलत। वर्तनी टूटी हुई। उसे पाठ याद नहीं होते थे। लेकिन मुझे हमेशा लगता था कि वह पढ़ाई से डरता नहीं था; बस किताबों की दुनिया उसके लिए बनी ही नहीं थी।

उसके पिता मोहल्ले के मोड़ पर पान की छोटी-सी गुमटी चलाते थे। शाम के समय वहाँ हमेशा कुछ लोग खड़े रहते। बीड़ी का धुआँ, कत्थे की गंध और पीली बल्ब की रोशनी — वही उसकी दुनिया थी।

एक वर्ष वह फिर फेल हो गया।

उसके बाद अचानक उसने स्कूल आना बंद कर दिया।

बाद में पता चला कि उसके पिता ने कह दिया था — “अब बहुत पढ़ लिया। दुकान पर बैठो।”

उस समय यह बात मुझे पूरी तरह समझ नहीं आई थी। बचपन में हमें लगता है कि जो लोग रोज दिखाई देते हैं, वे हमेशा वैसे ही बने रहेंगे। लेकिन कुछ बच्चों का बचपन बहुत जल्दी खत्म हो जाता है।

शाम को जब हम खेलने जाते, वह गुमटी पर बैठा दिखाई देता। सामने रखे डिब्बों में सुपारी भरता, पान पर चूना लगाता, पैसे गिनता। उसके हाथों में अब हमेशा कत्थे का हल्का लालपन लगा रहता।

फिर भी, जब कभी ग्राहक कम होते, वह दुकान से निकलकर थोड़ी देर हमारे साथ गिल्ली-डंडा खेलने आ जाता। और उन कुछ मिनटों में उसका चेहरा फिर वही पुराना लड़के वाला चेहरा हो जाता।

मुझे वह दिन बहुत साफ़ याद है जब हम लोगों ने मोहल्ले की क्रिकेट टीम बनाने की ठानी थी। क्रिकेट तब हमारे लिए किसी बड़े सपने जैसा खेल था। नई गेंद खरीदने के लिए चंदा इकट्ठा किया जा रहा था। दो आने, चार आने, जो जिसके घर से मिल सके।

मेरे पास पैसे नहीं थे।

मैं कई लड़कों के साथ खड़ा था लेकिन भीतर एक अजीब-सी शर्म थी। उस उम्र में गरीबी का दुख उतना नहीं होता जितना दूसरों के सामने उसके दिखाई देने का।

वह उस समय गुमटी पर बैठा था।

उसने शायद मेरी झिझक देख ली थी।

कुछ देर बाद उसने जेब में हाथ डाला और आठ आने निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिए।

आठ आने उस समय मेरे लिए बहुत बड़ी रकम थी।

मैंने तुरंत कहा — “बाद में लौटा दूँगा।”

उसने बिना मेरी तरफ़ देखे कहा — “ठीक है।”

लेकिन उस “ठीक है” में भी मुझे मालूम हो गया था कि वह पैसे वापस नहीं लेगा।

और सचमुच उसने कभी नहीं लिए।

मैंने दो-तीन बार कोशिश की। हर बार वह बात टाल देता। जैसे वह रकम उसके लिए अब महत्वपूर्ण ही न हो।

धीरे-धीरे हम अलग होते गए। मैं आगे की पढ़ाई के लिए शहर से बाहर चला आया। नए लोग, नई जगहें, नौकरी, परिवार — जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। बचपन पीछे छूट गया, जैसे बरसात के बाद मिट जाने वाले पैरों के निशान।

फिर कई वर्षों बाद मैं उस पुराने शहर गया।

बहुत कुछ बदल चुका था।

जहाँ कच्ची सड़क थी वहाँ अब पक्की दुकानें थीं। पान की वह गुमटी भी नहीं थी। उसकी जगह मोबाइल और रिचार्ज की दुकान खुल गई थी।

मैंने आसपास पूछताछ की।

किसी बूढ़े आदमी ने उसे याद किया।

फिर बहुत साधारण ढंग से कहा — “अरे, उसका तो कई साल पहले देहांत हो गया।”

उन्होंने यह बात ऐसे कही जैसे मौसम की कोई सामान्य सूचना दे रहे हों।

लेकिन मेरे भीतर उस क्षण कुछ बहुत धीरे से बैठ गया।

मुझे अचानक उसका चेहरा याद आया। धूल भरे पैर। गिल्ली मारते समय चमकती आँखें। और गुमटी की पीली रोशनी में मेरी तरफ़ बढ़ाए गए आठ आने।

अब सोचता हूँ तो लगता है कि मनुष्य की उदारता का संबंध उसकी हैसियत से नहीं होता। कई बार जिनके पास सबसे कम होता है, वही सबसे सहज ढंग से दे पाते हैं।

वह लड़का शायद अपने जीवन में बहुत दूर नहीं जा सका।

उसका नाम भी अब धीरे-धीरे स्मृति से धुँधला होने लगा है।

लेकिन कुछ दृश्य भीतर स्थायी हो जाते हैं।

आज भी जब किसी मैदान में गिल्ली हवा में उछलती दिखाई देती है, मुझे लगता है कि वह कहीं आसपास ही है — पतला-सा लड़का, धूल में खड़ा, जैसे अभी डंडा घुमाकर फिर से गिल्ली बहुत दूर मार देगा।

मुकेश ,,,,,,,,,

वह लड़की जिसके दाँत चूहे जैसे सफ़ेद थे

वह लड़की जिसके दाँत चूहे जैसे सफ़ेद थे

अब जब उन दिनों की तरफ़ लौटकर देखता हूँ, तो सबसे अधिक अजीब यह लगता है कि बचपन में हम मनुष्यों को उनके गुणों से नहीं, उनकी छोटी-छोटी विचित्रताओं से पहचानते थे।

किसी के कान बड़े होते थे।

कोई चलते समय एक पैर घसीटता था।

कोई हमेशा नाक पोंछता रहता था।

और वह लड़की — जिसके बारे में मैं इतने वर्षों बाद भी सोचता हूँ — अपने अस्वाभाविक रूप से सफ़ेद दाँतों के कारण याद रह गई।

वे सचमुच चूहे जैसे सफ़ेद थे।

छोटे।

एकदम चमकीले।

जब वह हँसती थी तो लगता था जैसे उसके साँवले नहीं, बल्कि बहुत पतली, लगभग पारदर्शी गोरी त्वचा वाले चेहरे पर अचानक कोई सफ़ेद चमक कौंध गई हो।

हम प्राथमिक विद्यालय में साथ पढ़ते थे।

वही पुराना सरकारी स्कूल।

दीवारों पर उखड़ा हुआ चूना।

बरामदों में धूल।

लोहे की घंटी।

और गर्मियों में पसीने और स्लेट की मिली-जुली गंध।

वह हमेशा दूसरी या तीसरी बेंच पर बैठती थी।

लेकिन उसका ध्यान पढ़ाई में कम और इधर-उधर की चीज़ों में अधिक रहता था।

उसकी आँखों में एक अजीब-सी घुन्नी चमक थी।

जैसे वह हर समय कोई छोटा-सा रहस्य अपने भीतर छिपाए रहती हो।

धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि वह झूठ बहुत बोलती थी।

इतनी सहजता से कि कई बार शिक्षक भी सच मान लेते।

अगर किसी की पेंसिल गायब हो जाए, रबर खो जाए, या टिफ़िन से अमरूद का टुकड़ा कम निकल आए, तो संदेह अक्सर उसी पर जाता।

लेकिन वह तुरंत मासूम चेहरा बना लेती।

अपनी बड़ी-बड़ी आँखें फैलाकर कहती—

“मैंने नहीं लिया।”

और सच कहूँ तो उस समय उसका चेहरा इतना भोला लगने लगता कि मुझे स्वयं अपने संदेह पर शर्म आने लगती।

एक बार मेरी नई नीली पेंसिल गायब हो गई थी।

वही जिसमें ऊपर लाल रबर लगी थी।

मैंने पूरी कक्षा में ढूँढा।

फिर अगले दिन वही पेंसिल उसके पास दिखी।

मैं पहचान गया था।

लेकिन उसने बड़ी सहजता से कहा

“ये मेरी है। मामा लाए थे।”

मैं चुप हो गया।

क्योंकि मैं हमेशा से दब्बू था।

उन लड़कों में से जो शिकायत नहीं कर पाते।

जो अपनी चीज़ें खो जाने पर भी धीरे-धीरे मान लेते हैं कि शायद गलती उन्हीं की रही होगी।

लेकिन उसी लड़की की एक दूसरी आदत भी थी।

वह अपनी खाने की चीज़ें हमेशा बाँटती थी।

उसके टिफ़िन में अक्सर गुड़ लगी रोटी, आम का अचार, या बेसन के छोटे लड्डू होते।

वह बिना पूछे आधा मेरी तरफ़ बढ़ा देती।

कई बार तो ऐसा लगता था जैसे चोरी करना और बाँटना — दोनों उसके स्वभाव में साथ-साथ रहते हों।

जैसे उसके भीतर दो अलग बच्चे रहते थे।

एक छोटा चोर।

और एक बहुत उदार लड़की।

मुझे आज भी एक दोपहर साफ़ याद है।

मध्यांतर के समय कुछ बड़े लड़कों ने मेरा मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया था।

शायद मेरी पतली आवाज़ को लेकर।

या इस बात पर कि मैं खेलता कम था।

मैं चुप खड़ा रहा।

हमेशा की तरह।

लेकिन वह अचानक वहाँ आ गई।

उस दिन उसके बाल दो ढीली चोटियों में बँधे थे।

उसने उन लड़कों से कहा

“काहे परेशान करते हो उसे?”

वे हँसने लगे।

तब वह सचमुच लड़ने को तैयार हो गई थी।

उसकी बहुत पतली गोरी गर्दन गुस्से में लाल पड़ गई थी।

मुझे आज भी आश्चर्य होता है कि इतनी झूठ बोलने वाली लड़की किसी दूसरे के लिए इतनी सच्चाई से कैसे लड़ सकती थी।

शायद मनुष्य कभी एक चीज़ नहीं होता।

बचपन में तो बिल्कुल नहीं।

उसके बारे में स्कूल में तरह-तरह की बातें कही जाती थीं।

कोई उसे “चोट्टी” कहता।

कोई “झूठी”।

एक अध्यापक ने एक बार पूरी कक्षा के सामने कहा था

“इस लड़की की आदतें ठीक नहीं हैं।”

वह सिर झुकाकर खड़ी रही।

लेकिन थोड़ी देर बाद मैंने देखा, वह खिड़की के बाहर देख रही थी और बहुत धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थी।

जैसे उसे किसी की बात से वास्तव में कोई फर्क नहीं पड़ता।

फिर एक साल के बाद वह अचानक स्कूल आना बंद हो गई।

न किसी ने ठीक से बताया कि कहाँ गई।

न मैंने पूछने की हिम्मत की।

उस उम्र में लोग अचानक गायब हो जाते थे।

और हम इसे जीवन का सामान्य हिस्सा मान लेते थे।

धीरे-धीरे उसका नाम भी स्मृति से मिट गया।

आज सचमुच याद नहीं कि उसे क्या कहते थे।

लेकिन कुछ चीज़ें अब भी बची हुई हैं।

उसके सफ़ेद दाँत।

उसकी पतली त्वचा के नीचे दिखती नीली नसें।

झूठ बोलते समय उसकी आँखों की मासूमियत।

और वह अजीब न्याय-बोध जिसके कारण वह दूसरों के लिए लड़ पड़ती थी।

अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है, दुनिया ने शायद उसे “छोटी चोर” या “झूठी लड़की” की तरह याद किया होगा।

लेकिन मेरी स्मृति में वह वैसी नहीं है।

मुझे तो वह हमेशा दिल की सच्ची लगी।

क्योंकि बचपन में मनुष्य अपने दोषों को छिपाना नहीं जानता।

जो जैसा होता है, लगभग वैसा ही दिखाई देता है।

और शायद इसी कारण बचपन की स्मृतियाँ इतनी तकलीफ़देह और इतनी सुंदर होती हैं।

वे हमें यह याद दिलाती रहती हैं कि मनुष्य अच्छाई और बुराई में नहीं बना होता।

बल्कि उन दोनों के बीच की किसी धुँधली, काँपती हुई जगह में बना होता है — जहाँ एक लड़की किसी की पेंसिल चुरा सकती है, और उसी दोपहर उसके लिए पूरी दुनिया से लड़ भी सकती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

दिन धीरे-धीरे समाप्त नहीं होता

 ऑक्टावियो पाज़ की कविता से प्रेरित

दिन धीरे-धीरे समाप्त नहीं होता
वह भीतर कहीं गिरता है
जैसे पानी किसी अंधे कुएँ में गिरता रहता है
और उसकी आवाज़
बहुत देर बाद सुनाई देती है

मैंने एक चेहरा याद करना चाहा
पर स्मृति ने केवल उसकी अनुपस्थिति लौटाई
मानो भूल जाना ही
याद रखने का सबसे गहरा रूप हो

प्रेम शायद वही क्षण है
जब दो लोग
एक-दूसरे को समझने से पहले
अचानक चुप हो जाते हैं

सड़कें कहीं नहीं जातीं
वे केवल मनुष्य के भीतर घूमती रहती हैं
और हर मोड़ पर
एक पुराना भय बैठा मिलता है

मैंने रात से पूछा—
“क्या समय सचमुच बीत जाता है?”
रात हँसी
और मेरे बालों में थोड़ी सफेदी छोड़ गई

एक खिड़की खुली थी
पर बाहर कोई दृश्य नहीं था
सिर्फ हवा थी
जो किसी अनकहे वाक्य की तरह
बार-बार लौट रही थी

यह शरीर भी अजीब है
धीरे-धीरे स्मृतियों का घर बन जाता है
और एक दिन
स्वयं ही अपने भीतर अजनबी हो जाता है

अंत में
हम सब शायद वही बन जाते हैं
जिससे जीवन भर बचना चाहते थे
एक शांत
लगभग अदृश्य
अकेलापन

मुकेश ,,,,,,,,,,

Friday, 22 May 2026

सामने वाले मकान की खिड़की

 सामने वाले मकान की खिड़की

अब जबकि उन दिनों को बीते इतना समय हो चुका है कि उस शहर की सड़कों के नाम भी मेरी स्मृति में धीरे-धीरे घुलने लगे हैं, मुझे कई बार यह लगता है कि बचपन वास्तव में घटनाओं से नहीं बना होता; वह कुछ दृश्यों से बना होता है जो बिना किसी स्पष्ट कारण के भीतर अटक जाते हैं और फिर वर्षों तक हमारे भीतर वैसे ही मौजूद रहते हैं, जैसे पुराने घरों में बंद कमरों की हल्की-सी सीलन, जिसे कोई देख नहीं सकता लेकिन जो हर चीज़ में धीरे-धीरे उतरती रहती है।

हमारे घर के सामने एक छोटा-सा किराये का मकान था।

वहाँ लोग आते-जाते रहते थे। छोटे शहरों में किराये के मकानों का जीवन अस्थायी होता है। दरवाज़ों पर नाम बदलते रहते हैं, पर खिड़कियाँ वही रहती हैं।

एक गर्मियों की दोपहर वे लोग वहाँ रहने आए।

एक ट्रक आया। कुछ लोहे के बक्से। एक सिलाई मशीन। बाँस की कुर्सियाँ। और उनके बीच वह औरत, जो पहली बार मुझे तब दिखाई दी जब वह सिर पर आँचल टिकाए बरामदे में खड़ी किसी मज़दूर को बता रही थी कि अलमारी कहाँ रखनी है।

उस समय मैं चौदह वर्ष का था।

उस उम्र में आदमी अभी दुनिया को समझता नहीं, केवल उसे देखने लगता है।

वह मुझसे बहुत बड़ी थी। यह बात मैं तुरंत समझ गया था। कितनी बड़ी — यह नहीं। बाद में अनुमान लगाया कि शायद पंद्रह वर्ष। शायद अधिक।

लेकिन उम्र कई बार चेहरों से नहीं, थकान से समझ में आती है।

उसके चेहरे पर वही थकान थी।

वह सुंदर थी या नहीं — यह मैं उस समय तय नहीं कर पाता। क्योंकि किशोरावस्था में आकर्षण और सुंदरता अलग-अलग नहीं होते। जो हमें भीतर से विचलित कर दे, वही सुंदर लगने लगता है।

मुझे उसकी चाल याद है।

धीमी नहीं, लेकिन जैसे वह हमेशा किसी अदृश्य बोझ के साथ चलती हो।

और उसकी खिड़की।

उनके मकान की सामने वाली खिड़की ठीक हमारे बरामदे के सामने पड़ती थी। दोपहर में वह खिड़की खुली रहती। भीतर टेबल फैन घूमता दिखाई देता। सफ़ेद परदे हिलते रहते। और कई बार वह वहाँ बैठी दिखाई देती — कभी कपड़े तह करते हुए, कभी बाल सुखाते हुए, कभी बिना कुछ किए केवल बाहर देखते हुए।

अब सोचता हूँ, शायद उसी समय मैंने पहली बार किसी स्त्री के अकेलेपन को देखा था, हालाँकि उस समय मैं उसे केवल “चुप रहना” समझता था।

उसका पति सुबह जल्दी चला जाता। शाम को लौटता। उसका चेहरा मुझे याद नहीं। केवल उसकी अनुपस्थिति याद है।

गर्मियों की दोपहरें बहुत लंबी होती थीं उन दिनों। बिजली चली जाती। पूरा मोहल्ला सुस्त पड़ जाता। मैं किताब लेकर बरामदे में बैठ जाता, हालाँकि पढ़ता बहुत कम था।

कई बार मुझे लगता वह जानती है कि मैं उसे देखता हूँ।

लेकिन उसने कभी इस बात को असहज नहीं होने दिया।

एक दिन उसने अचानक पूछा

“इतनी देर तक पढ़ लेते हो?”

मैं चौंक गया।

किताब तुरंत बंद कर दी।

“हाँ… मतलब…”

मैं आगे कुछ नहीं कह पाया।

वह कुछ क्षण मुझे देखती रही। फिर बहुत हल्के से मुस्कराई। उस मुस्कान में मज़ाक नहीं था। बल्कि एक ऐसी कोमलता थी जो बड़े लोग बच्चों को देखते समय महसूस करते हैं।

“अभी पढ़ लो,” उसने कहा, “बाद में समय बहुत जल्दी भागता है।”

उस समय यह वाक्य मुझे सामान्य लगा था। अब लगता है कि बड़े लोग अपने जीवन का सारा दुःख इसी तरह साधारण वाक्यों में छिपाकर बोलते हैं।

उसके बाद कभी-कभी छोटी-छोटी बातें होने लगीं।

“कॉलेज कहाँ जाओगे?”

“तुम बहुत चुप रहते हो।”

“तुम्हारी माँ की आवाज़ बहुत अच्छी है।”

लेकिन मुझे हमारी बातें नहीं याद। मुझे उन बातों के बीच की चुप्पियाँ याद हैं।

शाम को वह खिड़की के पास खड़ी रहती और सड़क देखती। बिना किसी विशेष रुचि के। जैसे बाहर कुछ खोज नहीं रही, केवल भीतर से बचने के लिए बाहर देख रही हो।

एक बार बारिश हुई। तेज़ हवा। कपड़े उड़ने लगे। उसकी एक साड़ी नीचे आ गिरी। मैं दौड़कर उठा लाया।

जब मैंने साड़ी उसकी ओर बढ़ाई, हमारी उँगलियाँ क्षणभर छुईं।

आज सोचता हूँ — मनुष्य के भावनात्मक जीवन में कुछ क्षण इतने छोटे होते हैं कि उन्हें उस समय पहचानना संभव नहीं होता, लेकिन बाद में वही पूरे वर्षों पर छाया की तरह फैल जाते हैं।

उसने कहा— “धन्यवाद।”

बस इतना।

लेकिन उस रात मैं बहुत देर तक जागता रहा। बाहर बारिश होती रही। और पहली बार मुझे लगा कि मेरे भीतर कुछ ऐसा शुरू हो चुका है जिसका नाम मुझे नहीं मालूम।

कुछ सप्ताह बाद मैंने महसूस किया कि वह पहले से अधिक चुप रहने लगी है। कई बार खिड़की खुली रहती लेकिन वह दिखाई नहीं देती। कभी दिखाई देती तो थकी हुई। एक बार उसकी आँखें लाल थीं, जैसे रोई हो या सोई न हो।

मैंने कुछ पूछने की कभी हिम्मत नहीं की।

बचपन कई बार संवेदनशील होता है, पर साहसी नहीं।

फिर अचानक एक दिन ट्रक आया।

सामान वापस चढ़ाया जाने लगा।

मैं बरामदे में खड़ा रहा। बहुत देर तक। बिना किसी स्पष्ट अधिकार के दुखी।

वह आख़िरी बार खिड़की बंद करने आई।

हमारी आँखें मिलीं।

उसने वही हल्की मुस्कान दी।

और कहा—

“अच्छे से पढ़ना।”

बस इतना।

फिर खिड़की बंद हो गई।

आज इतने वर्षों बाद भी, जब किसी पुराने मोहल्ले में किराये के मकानों की कतार दिखाई देती है, या जब गर्मियों की दोपहर में कोई खिड़की आधी खुली रह जाती है और भीतर पंखे की आवाज़ आती रहती है, तब मुझे अचानक वह औरत याद आ जाती है।

और तब मैं सोचता हूँ — शायद मनुष्य के भीतर प्रेम की पहली हलचल किसी महान सौंदर्य से नहीं, बल्कि किसी दूसरे मनुष्य के साधारण अकेलेपन को पहली बार महसूस करने से जन्म लेती है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,

रात किसी दर्शन की तरह नहीं उतरती

ऑक्टावियो पाज़ की कविता से प्रेरित

रात किसी दर्शन की तरह नहीं उतरती
वह एक दरार है
जिसमें से समय रिसता रहता है

मैंने दरवाज़ा खोला
तो बाहर कुछ भी नहीं था
सिर्फ भीतर का थोड़ा-सा हिस्सा
जो बाहर खड़ा था

प्रेम कोई मुलाक़ात नहीं
वह दो अनुपस्थितियों के बीच
टिकी हुई एक अस्थिर रोशनी है

शहरों में लोग नहीं रहते
वहाँ केवल उनके छोड़े हुए अर्थ रहते हैं
जो हर सुबह
थोड़ा और बदल जाते हैं

मैंने अपने हाथों को देखा
तो वे किसी और के विचार लग रहे थे
और मेरे विचार
किसी अजनबी की नींद में चल रहे थे

एक स्त्री गुज़री
तो हवा थोड़ी देर के लिए अर्थवान हो गई
फिर तुरंत फिर से खाली हो गई

यह जीवन कोई कहानी नहीं
यह तो एक अधूरी वाक्य-रचना है
जिसमें क्रिया हर बार बदल जाती है
पर अर्थ कभी पूरा नहीं होता

और मैं
अपने ही भीतर बिखरा हुआ
एक ऐसा मौन हूँ
जो खुद को सुनने की कोशिश में
और अधिक खो जाता है

मुकेश ,,,,,,,,,,

रात किसी टूटे हुए वाद्य-यंत्र की तरह बजती है

 ऑक्टावियो पाज़ की कविता से प्रेरित

रात किसी टूटे हुए वाद्य-यंत्र की तरह बजती है

जिसमें स्वर नहीं बचते, सिर्फ कंपन रह जाते हैं
और हवा
उन कंपन को याद करती हुई
धीरे-धीरे थक जाती है

मैंने अपने भीतर झाँका
तो वहाँ कोई स्थिर चेहरा नहीं था
बस बदलते हुए प्रतिबिंब थे
जो एक-दूसरे को पहचानने से इंकार करते थे

प्रेम एक घटना नहीं
एक धीमी प्रक्रिया है
जैसे पानी का पत्थर बनना
और पत्थर का फिर पानी हो जाना

कभी-कभी लगता है
हम लोग स्मृतियों के शहर में रहते हैं
जहाँ घर असल में घर नहीं
बल्कि अधूरी कहानियों के ठिकाने हैं

मैंने एक स्पर्श को याद करने की कोशिश की
तो मेरी उँगलियों ने जवाब दिया
“हम किसी और समय में छूट गए थे”

यह जीवन कोई यात्रा नहीं
यह तो रुक-रुक कर चलने वाली एक अनिश्चित साँस है
जो हर बार शुरू होने से पहले
थोड़ा और पुरानी हो जाती है

और मैं
अपने ही भीतर के गलियारों में खोया हुआ
एक ऐसा मौन हूँ
जिसे शब्दों ने अभी छूना सीखना बाकी है

मुकेश ,,,,,,,,,,

रात किसी बंद आँख की तरह नहीं आती

ऑक्टावियो पाज़ की कविता से प्रेरित

रात किसी बंद आँख की तरह नहीं आती
वह खुली हुई स्मृति है
जिसमें समय अपने ही पदचिह्न मिटाता चलता है

मैंने अपने नाम को छुआ
तो वह किसी और की हथेली में लिखा मिला
और वह हथेली भी
किसी तीसरे सपने की देह में खो गई थी

प्रेम कोई घटना नहीं
न आरंभ, न अंत
वह तो दो मौन के बीच
टिकती हुई एक अनिश्चित कंपन है

दीवारें बोलती नहीं
पर वे हर शब्द को लौटाकर बदल देती हैं
जैसे भाषा भी
अपने अर्थ से थक चुकी हो

मैंने देखा—
एक स्त्री अपने भीतर चल रही थी
और उसका प्रतिबिंब
किसी अनदेखे जल में धीरे-धीरे टूट रहा था

शहर नहीं बसते पत्थरों से
वे बसते हैं उन चीज़ों से
जो कभी कही नहीं गईं
पर हमेशा सुनी जाती रहीं

यह जीवन कोई सीधा मार्ग नहीं
यह एक दर्पण है
जो देखने वाले को भी देखता है
और धीरे-धीरे
उसे उसकी ही परछाईं से अलग कर देता है

अंत में
मैं वहाँ पहुँचता हूँ जहाँ प्रश्न भी मौन हो जाते हैं
और उत्तर
अपने ही अर्थ से बाहर खड़ा रहता है

मुकेश ,,,,,,,,,,