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Monday, 27 April 2026

तुम्हारी याददाश्त—रंगों की अलमारी

 तुम्हारी याददाश्त—रंगों की अलमारी


मैं

तुम्हारी याददाश्त का कायल हूँ…

तुम्हें आज भी याद है—

बरसों पहले

किस फंक्शन में मैंने

कौन-सी शर्ट पहनी थी,

किस शादी में

कौन-सा सूट।

और मुझे

मुझे तो ये भी याद नहीं रहता

कि कल क्या पहना था।

मुझे बस इतना याद है

जेब में वही गन्दा रुमाल था,

और तुम

बड़बड़ाते हुए

अलमारी से नया रुमाल ले आई थीं,

जैसे मेरी आदतों पर

तुम्हारा एक छोटा-सा अधिकार हो।

तुम्हें ये भी याद रहता है

मैंने कब, कहाँ

तुम्हारी किस सहेली से

दो बातें ज़्यादा कर ली थीं,

और तुम

बनावटी गुस्से में

थोड़ी-सी सचमुच की चुप्पी

ओढ़ लेती थीं…

ये सब

बहुत पहले की बातें हैं

पर तुम्हारे लिए

समय रुकता नहीं,

बस तह लगाकर

रख दिया जाता है कहीं।

तुम्हें

सिर्फ मेरी नहीं

अपनी सहेलियों की भी

हर ड्रेस याद रहती है

किसने कौन-सी साड़ी पहनी थी,

कौन-सा सलवार सूट,

कौन उसमें खिल रही थी,

और कौन

बस “अच्छा दिखने” की कोशिश में

थोड़ी-सी खो गई थी।

तुम

लोगों को

उनके कपड़ों में नहीं,

उनके चुनावों में पढ़ती हो

रंगों के पीछे छुपे

मन के छोटे-छोटे संकेत।

और मैं

मैं तुम्हें पढ़ता हूँ,

तुम्हारी इस याददाश्त में…

जहाँ हर रंग,

हर कपड़ा,

हर छोटी-सी बात

अब भी सुरक्षित है

जैसे

तुमने

हमारे बीच के समय को

कभी बीतने ही नहीं दिया…


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

तुम—साड़ियों के रंगों में

 तुम—साड़ियों के रंगों में


हो सकता है

महँगी साड़ियों में

तुम और निखर जाती हो—

रेशम की चमक

तुम्हारे चेहरे तक आ जाती हो,

और हर तह में

एक उत्सव-सा खुलता है…


पर मुझे—

तुम हर साड़ी में अच्छी लगती हो,

क्योंकि साड़ी नहीं,

तुम उसे अर्थ देती हो।


वो बनारसी लाल,

जब तुम किसी उत्सव-सी लगती हो—

जैसे पूरा घर

तुम्हारे इर्द-गिर्द रोशन हो गया हो।


वो कांजीवरम सोना,

जब तुम्हारे चलने में

एक गरिमा उतर आती है—

धीमी, ठहरी हुई।


वो चंदेरी हल्का हरा,

जब तुम बस यूँ ही

दिन को पहन लेती हो—

सादा, सहज, खुला हुआ।


वो तसर का मटमैला रंग,

जब तुम अपने में सिमटी रहती हो,

जैसे कोई पुरानी किताब

खुद को धीरे-धीरे खोल रही हो।


वो नीली कॉटन साड़ी,

जिसमें तुम

सबसे ज़्यादा अपनी लगती हो—

बिना किसी दिखावे के,

बस एक सच्ची-सी उपस्थिति।


और फिर—

कभी-कभी

तुम बिना किसी खास साड़ी के,

बस साधारण कपड़ों में भी होती हो,

जहाँ कोई ब्रांड नहीं,

कोई नाम नहीं—


बस तुम हो,

अपने सबसे असली रूप में।


सच कहूँ—

साड़ियाँ तुम्हें नहीं सजातीं,

तुम साड़ियों को जीवन देती हो।


और मेरे लिए—

इतने रंगों, इतने नामों के बावजूद,

एक ही रंग ठहरता है—


तुम्हारा होना।


मुकेश ,,,,,,,,,,

तुम—शेड्स के नामों में

 तुम—शेड्स के नामों में

तुम्हारे मेकअप बॉक्स में
सिर्फ लिपस्टिक नहीं रखी,
जैसे छोटे-छोटे मौसम रखे हों
नामों में बँधे हुए।
रोज़ पिंक,
जब तुम बिना वजह हल्की-सी हँसती हो
जैसे सुबह ने अभी-अभी आँखें खोली हों।
कोरल क्रश,
जब तुम्हारी बातों में
थोड़ी-सी शरारत घुल जाती है।
न्यूड बेज,
उन दिनों के लिए
जब तुम बस खुद रहना चाहती हो
बिना किसी शोर के।
मॉव मिस्ट,
जब शाम तुम्हारी आँखों में उतर आती है,
और शब्द कहीं पीछे छूट जाते हैं।
क्रिमसन रेड,
तुम्हारी खामोशी का वो रंग
जिसमें बहुत कुछ जलता है,
पर दिखता नहीं।
बेरी ब्लश,
जब तुम अचानक से
कुछ याद करके मुस्कुरा देती हो।
पीच पॉप,
हल्की धूप-सा
तुम्हारा वो सहज उजास।
ब्रिक ब्राउन,
जब तुम खुद को
थोड़ा-सा समेट लेती हो,
दुनिया से एक कदम पीछे।
वाइन प्लम,
रात के उन पलों में
जब तुम्हारी आँखें
कुछ ज़्यादा गहरी हो जाती हैं।
और फिर
तुम्हारा वो
मूंगिया शेड,
जिसका कोई ब्रांड नाम नहीं,
कोई नंबर नहीं
बस तुम हो उसमें,
पूरा की पूरा।
तुम हर दिन
इन नामों में से एक चुनती हो,
और मैं
हर दिन
एक नया अर्थ पढ़ता हूँ।
पर सच कहूँ
इतने सारे शेड्स के बावजूद,
मेरी दुनिया
एक ही नाम पर आकर रुक जाती है—
तुम।
मुकेश ,,,,,,,,,,,

तुम—शेड्स और मैं

 तुम—शेड्स और मैं


तुम

ड्रेस, माहौल और मौके के हिसाब से

लिपस्टिक के शेड चुनती हो

जैसे हर दिन

एक नया अर्थ पहनती हो।


कभी हल्का,

कभी गहरा,

कभी बस एक आभा भर…

तुम्हारे पास रंगों की

एक पूरी दुनिया है।


और मैं

मेरी ज़िंदगी में

इतने शेड कहाँ…


मेरे हिस्से तो

बस एक ही रंग आया है

तुम्हारा।


वही गेहुँआ-सा उजास,

जिसमें धूप भी है

और मिट्टी की सोंधी गंध भी

वही मूंगिया आभा,

जो होंठों से निकलकर

चेहरे, आवाज़, और खामोशी तक फैल जाती है।


तुम्हारी बाँहों का रंग,

जैसे कोई थका हुआ दिन

आकर ठहर जाए—

तुम्हारे गालों की हल्की गरमाहट,

जैसे कोई बात

कहते-कहते रह गई हो…


और फिर

वो “और…”

जो शब्दों में नहीं आता,

पर हर बार

थोड़ा-थोड़ा बढ़ जाता है।


तुम्हारे पास

चुनने के लिए कई शेड हैं

और मेरे पास

बस तुम हो…


और अजीब बात ये है

कि इस एक रंग में ही

मेरी पूरी दुनिया बसती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

तुम जब होंठों को हल्का-सा गोल करती हो,

 तुम—आईने के सामने

तुम जब

होंठों को हल्का-सा गोल करती हो,

और एक ध्यान से

लिपस्टिक के शेड को बराबर करती हो

जैसे कोई रेखा

अपने अर्थ को ठीक कर रही हो।

आईना तुम्हें देखता है,

और तुम

आईने में खुद को

दोनों के बीच

एक छोटी-सी, निजी-सी बातचीत चलती है।

तुम्हारी उँगलियों की ठहरन,

होंठों की वो एकाग्रता,

और आँखों में

खुद को परखने की वो आदत

सब कुछ मिलकर

एक बहुत सादा, बहुत अपना-सा दृश्य बनाते हैं।

और सच

उस पल में

तुम्हारी कोई बनावट नहीं रहती,

बस एक सहजता होती है,

एक हल्की-सी मासूमियत,

जो बिना कोशिश के ही दिख जाती है।

तुम शायद बस

एक शेड ठीक कर रही होती हो,

पर उस एक छोटे-से काम में

तुम पूरी की पूरी

अपने आप में सिमट आती हो

और वही तुम्हें

खूबसूरत बना देता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

तुम्हें अपने मूंगिया होंठों के लिए

 सुनो

मुझे मालूम है,

तुम्हें अपने मूंगिया होंठों के लिए

मूंगिया शेड की ही लिपस्टिक पसंद है…


जैसे तुम

खुद को छुपाती नहीं,

बस थोड़ा-सा उभारती हो

जितना तुम्हारा स्वभाव है,

उतना ही रंग रखती हो।


तुम्हारे होंठों पर

वो मूंगिया आभा

किसी बनावट की तरह नहीं,

किसी स्वीकृति की तरह लगती है

जैसे तुमने अपने ही रंग को

थोड़ा और गहरा कर लिया हो।


मैंने देखा है

तुम जब उसे लगाती हो,

तो आईने में खुद को नहीं,

किसी भीतर की शांति को देखती हो,

जैसे कोई नदी

अपने ही पानी को पहचान रही हो।


और सच कहूँ

तुम पर वो रंग

अलग से नहीं ठहरता,

तुम्हारे साथ बहता है

तुम्हारी बातों में,

तुम्हारी खामोशियों में,

तुम्हारी आधी मुस्कानों में…


तुम्हें शायद अंदाज़ा नहीं,

पर वो मूंगिया शेड

तुम्हारे होंठों पर नहीं,

तुम्हारी पूरी मौजूदगी पर होता है


एक हल्की-सी गर्माहट,

एक सधी हुई चमक,

जो दूर से नहीं,

पास आकर ही समझ आती है।


सुनो

तुम्हें सजने की ज़रूरत नहीं,

तुम तो बस

अपने ही रंग को दोहराती हो…


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

तुम और तुम्हारी लिपस्टिक — कई-कई शेड्स वाली

 तुम और तुम्हारी लिपस्टिक — कई-कई शेड्स वाली


तुम्हारे होंठों पर

जो रंग उतरता है,

वो सिर्फ रंग नहीं होता

एक पूरा दिन होता है,

कभी धूप सा खुला,

कभी सांझ सा सिमटा हुआ।


तुम्हारी लिपस्टिक के शेड्स

सिर्फ मेकअप नहीं हैं,

वे तुम्हारे मन के

छुपे हुए मौसम हैं


वो हल्का गुलाबी,

जब तुम बिना वजह मुस्कुराती हो,

जैसे किसी पुराने ख़त की याद

अचानक उँगलियों से छू जाए।


वो गहरा लाल,

जब तुम चुप रहती हो

और चुप्पी में

एक पूरी कहानी जलती रहती है।


वो भूरा-सा मैट शेड,

जैसे तुमने खुद को

थोड़ा सा समेट लिया हो,

दुनिया के सामने

बस उतना ही रखा हो

जितना ज़रूरी है।


और कभी-कभी

तुम बिना किसी रंग के आती हो,

सिर्फ अपने होंठों के साथ,

जहाँ कोई बनावट नहीं,

कोई परत नहीं,

बस तुम हो

सबसे सच्ची,

सबसे अनछुई।


मैंने देखा है

तुम्हारी लिपस्टिक

तुम्हारे शब्दों से पहले बोलती है,

तुम्हारे मन की हलचल

रंगों में उतर आती है।


तुम हर दिन

एक नया शेड चुनती हो,

और मैं हर दिन

तुम्हें नए सिरे से पढ़ता हूँ

जैसे कोई किताब

जो कभी पूरी नहीं होती।


तुम

और तुम्हारी ये कई-कई शेड्स वाली लिपस्टिक,

दरअसल एक ही बात कहती हैं—

कि एक स्त्री

कभी एक रंग में नहीं होती…


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,