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महाभारत - आदिपर्व — गांधारी और कौरवों का जन्म

एक तटस्थ विचार महाभारत में मनुष्य और अलौकिक सत्ता के बीच कोई कठोर दीवार नहीं है। गंगा, वसु, देवता, नाग, गंधर्व आदि कथा-जगत में सक्रिय हैं; दूसरी ओर सत्यवती, शांतनु, धृतराष्ट्र, पाण्डु, विदुर आदि स्पष्टतः मानवीय सामाजिक-राजनीतिक संसार से आते हैं। विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि वंश की निरंतरता बार-बार असामान्य जन्म-कथाओं से जुड़ती है । भीष्म का जन्म वसुओं और गंगा से जुड़ा है; धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर की उत्पत्ति नियोग की असाधारण सामाजिक व्यवस्था से होती है; पाण्डवों का जन्म देवताओं के आह्वान से बताया जाता है; और कौरवों का जन्म तो और भी असामान्य रूप में प्रस्तुत किया गया है। इससे एक सम्भावित व्याख्या निकलती है—  महाभारत अपने पात्रों को केवल जैविक मनुष्य के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य, प्रकृति, देवत्व, कर्म और व्यापक चेतना के परस्पर-संबंधित संसार के भीतर रखता है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। इससे यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं होता कि महाभारत के लेखक किसी आधुनिक अर्थ में “ब्रह्माण्डीय चेतना” का सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे थे। यह हमारी ओर से किया गया दार्शनिक पाठ होग...

महाभारत - आदिपर्व — धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर तीन व्यक्तित्व, एक राजवंश और उत्तराधिकार की जटिलता

आदिपर्व — धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर तीन व्यक्तित्व, एक राजवंश और उत्तराधिकार की जटिलता अब कथा उस पीढ़ी में प्रवेश करती है जहाँ कुरुवंश की आगे की पूरी दिशा निर्धारित होने वाली है। यहाँ हमारा उद्देश्य तीनों की पूरी जीवनी सुनाना नहीं है। हमें केवल यह समझना है कि महाभारत ने इन तीनों को किस प्रकार की अलग-अलग स्थिति देकर आगे के संघर्ष की भूमि तैयार की। तीन जन्म, तीन स्थितियाँ व्यास से अम्बिका, अम्बालिका और उनकी दासी के माध्यम से तीन पुत्र उत्पन्न हुए— धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर। तीनों एक ही राजवंश से जुड़े हैं, लेकिन उनकी सामाजिक और शारीरिक स्थितियाँ अलग हैं। यही भिन्नता आगे जाकर अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। पात्र प्रमुख स्थिति आगे की समस्या धृतराष्ट्र ज्येष्ठ, परंतु जन्मांध क्या अंधत्व राजसत्ता में बाधक है? पाण्डु राज्य का अधिकारी क्या उसका राज्य स्थायी रहेगा? विदुर अत्यंत ज्ञानी, पर दासीपुत्र क्या योग्यता जन्म से बड़ी हो सकती है? महाभारत मानो एक ही प्रश्न को तीन अलग-अलग रूपों में हमारे सामने रख देता है—  राजा होने का वास्तविक आधार क्या है? धृतराष्ट्र : अधिकार और अक्षमता का तनाव धृत...

महाभारत - आदिपर्व — चित्रांगद, विचित्रवीर्य और कुरुवंश का उत्तराधिकार-संकट

 आदिपर्व — चित्रांगद, विचित्रवीर्य और कुरुवंश का उत्तराधिकार-संकट जब वंश बचाना ही धर्म बन जाए भीष्म-प्रतिज्ञा के बाद कथा का अगला महत्वपूर्ण मोड़ सत्यवती के पुत्रों और कुरुवंश के उत्तराधिकार में आता है। यहाँ हम भीष्म की प्रतिज्ञा को दोहराएँगे नहीं; अब देखेंगे कि उस प्रतिज्ञा के बाद बनी राजनीतिक परिस्थिति ने कौन-सी नई समस्या पैदा की। कथा : चित्रांगद और विचित्रवीर्य सत्यवती से शांतनु के दो पुत्र हुए—  चित्रांगद और विचित्रवीर्य । पिता शांतनु की मृत्यु के बाद चित्रांगद राजा बने। चित्रांगद वीर योद्धा थे। उनका एक गंधर्व चित्रांगद से युद्ध हुआ और उसमें राजा की मृत्यु हो गई। इसके बाद विचित्रवीर्य राजा बने। लेकिन वे अभी युवा थे। भीष्म ने उनके विवाह के लिए काशी की तीन राजकुमारियों— अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका —का स्वयंवर से हरण किया। यहीं से कथा एक नए संकट में प्रवेश करती है। अम्बा पहले से किसी अन्य पुरुष को मन से स्वीकार कर चुकी थीं। इसलिए भीष्म ने उन्हें जाने दिया। लेकिन अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से हुआ। विचित्रवीर्य कुछ समय बाद संतान उत्पन्न किए बिना ही मृत्यु को प्...

महाभारत - आदिपर्व — शांतनु और सत्यवती

 आदिपर्व — शांतनु और सत्यवती भीष्म-प्रतिज्ञा : व्यक्तिगत धर्म और वंश के भविष्य का संघर्ष शांतनु और गंगा की कथा ने हमें देवव्रत के जन्म तक पहुँचाया। अब वही देवव्रत आगे चलकर भीष्म बनेंगे। यहाँ कथा का स्वर बदल जाता है। अब प्रश्न देवताओं, वसुओं या अलौकिक जन्म का नहीं है। प्रश्न है— एक मनुष्य अपने पिता की इच्छा, राजवंश की व्यवस्था और अपने व्यक्तिगत जीवन के बीच कितना त्याग कर सकता है? और उससे भी कठिन प्रश्न—  क्या तत्काल धर्मपूर्ण दिखाई देने वाला निर्णय भविष्य में अधर्म या संकट की भूमि तैयार कर सकता है? कथा : शांतनु और सत्यवती शांतनु को एक दिन सत्यवती से प्रेम हो जाता है। सत्यवती मत्स्यजीवी समुदाय के प्रमुख की पुत्री थीं। शांतनु उनसे विवाह करना चाहते थे। लेकिन सत्यवती के पिता ने शर्त रखी कि— सत्यवती से उत्पन्न पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा। समस्या यह थी कि शांतनु का ज्येष्ठ पुत्र देवव्रत पहले से ही युवराज बनने योग्य था। शांतनु पिता की इच्छा तो रखते थे, लेकिन देवव्रत के अधिकार को छीनना नहीं चाहते थे। वे भीतर से दुखी रहने लगे। देवव्रत को जब इसका पता चला तो उन्होंने स्वयं सत्यवती...

महाभारत - आदिपर्व — शांतनु और गंगा नदी, देवत्व और भीष्म के जन्म की कथा

 आदिपर्व — शांतनु और गंगा नदी, देवत्व और भीष्म के जन्म की कथा अब कथा उस बिंदु पर पहुँचती है जहाँ भरत–कुरु की वंशपरंपरा एक ऐसे पात्र को जन्म देती है जिसकी उपस्थिति आगे आने वाली पूरी महाभारत-कथा को प्रभावित करेगी—देवव्रत, अर्थात् भीष्म। लेकिन भीष्म को समझने के लिए पहले उनके जन्म की कथा को समझना आवश्यक है। कथा : शांतनु और गंगा का मिलन कुरुवंश में राजा शांतनु हुए। एक दिन उन्होंने गंगा के तट पर एक अत्यंत सुंदर स्त्री को देखा। वह स्वयं गंगा देवी थीं। शांतनु उनसे विवाह करना चाहते थे। गंगा ने विवाह की अनुमति देते हुए एक शर्त रखी— राजा उनके किसी भी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और उनसे कोई प्रश्न नहीं पूछेंगे। शांतनु ने यह शर्त स्वीकार कर ली। विवाह के बाद उनके पुत्र होने लगे। लेकिन प्रत्येक पुत्र के जन्म के बाद गंगा उसे नदी में ले जाकर जल में प्रवाहित कर देतीं। शांतनु सब देखते रहे। वे भीतर से पीड़ित थे, लेकिन अपनी प्रतिज्ञा के कारण मौन रहे। सात पुत्रों के साथ यही हुआ। जब आठवें पुत्र को भी गंगा नदी में ले जाने लगीं, तब शांतनु स्वयं को रोक नहीं सके। उन्होंने गंगा को रोक दिया और पूछा— ...

महाभारत - आदिपर्व — भरत से कुरुवंश तक

अब अगला भाग भरत से कुरुवंश तक की वंश-परंपरा पर होना चाहिए। यहाँ हम प्रत्येक पात्र की पूरी जीवनी नहीं खोलेंगे; केवल उतना ही लेंगे जितना आगे की महाभारत-कथा को समझने के लिए आवश्यक है। आदिपर्व — भरत से कुरुवंश तक एक वंश कैसे इतिहास-कथा का केंद्र बनता है? दुष्यन्त और शकुन्तला से जन्मे भरत के बाद कथा फिर अनेक पीढ़ियों से होकर आगे बढ़ती है। इस वंश-परंपरा का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि महाभारत अपने नायकों का वंश बताना चाहता है। इसका बड़ा उद्देश्य यह स्थापित करना है कि कुरुक्षेत्र का संघर्ष किसी अचानक उत्पन्न हुए परिवार-विवाद का परिणाम नहीं है। उसके पीछे पीढ़ियों की स्मृति, विवाह-संबंध, राजसत्ता, उत्तराधिकार और पूर्वकर्मों का एक लंबा इतिहास है। भरत के बाद कथा कहाँ जाती है? भरत के बाद उनकी वंश-परंपरा अनेक पीढ़ियों तक चलती है। इसी परंपरा में आगे चलकर हस्ति का नाम आता है, जिससे हस्तिनापुर की परंपरा जुड़ती है। फिर इस वंश में कुरु आते हैं। कुरु के नाम से कुरुवंश की पहचान स्थापित होती है। और आगे इसी वंश में—  शांतनु → भीष्म → विचित्रवीर्य → धृतराष्ट्र/पांडु → कौरव-पांडव की कथा विकसित होती ...

महाभारत - आदिपर्व — दुष्यन्त और शकुन्तला

 आदिपर्व — दुष्यन्त और शकुन्तला प्रेमकथा से “भारत” तक : इस आख्यान का स्थान क्यों? अब हम कथा को दोहराने के बजाय उसके कथात्मक प्रयोजन पर ध्यान देंगे। दुष्यन्त–शकुन्तला का प्रसंग आदिपर्व में इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके माध्यम से महाभारत की विशाल ब्रह्मांडीय भूमिका धीरे-धीरे मानव-वंश और राज्य-परंपरा में प्रवेश करती है। कथा का वास्तविक केंद्र शकुन्तला नहीं, भरत है दुष्यन्त और शकुन्तला की प्रेमकथा अपने आप में सुंदर है, लेकिन महाभारत की संरचना में उसका सबसे बड़ा महत्व उनके पुत्र भरत के कारण है। कथा हमें क्रमशः ले जाती है— कश्यप → विभिन्न प्राणी-वर्ग → नाग और गरुड़ → देव-मानव संबंध → पुरुवंश → दुष्यन्त → शकुन्तला → भरत। अर्थात् अब तक जो व्यापक सृष्टि-वृत्त था, वह धीरे-धीरे भरतवंश पर केंद्रित होने लगता है। इसलिए यह आख्यान आदिपर्व में एक प्रकार का संक्रमण-बिंदु है। “भारत” नाम की समस्या यहाँ हमें एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी रखनी होगी। आज हम “भारत” शब्द को राष्ट्र के नाम के रूप में जानते हैं। लेकिन महाभारत के संदर्भ में भरत पहले एक वंशीय/पौराणिक पुरुष हैं और “भारत” उस वंश तथा उ...

महाभारत - आदिपर्व का अगला आख्यान — उर्वशी–पुरूरवा की ओर जाने से पहले

 आदिपर्व का अगला आख्यान — उर्वशी–पुरूरवा की ओर जाने से पहले अब हम कद्रू–विनता–गरुड़ के बाद आने वाले आख्यानों को उसी नई पद्धति से क्रमशः लेंगे— कथा पहले, फिर उसका विवेचन । और एक बात विशेष रूप से ध्यान में रखेंगे: जो बात नागयज्ञ और कद्रू–विनता में कह चुके हैं, उसे नए आख्यान में फिर से नहीं दोहराएँगे। अगले प्रसंग में हमारा ध्यान शुनःशेप/च्यवन आदि की कथा-परंपरा पर जाने के बजाय आदिपर्व की उस संरचना पर होना चाहिए जहाँ से भरतवंश की मानवीय वंश-कथा अधिक स्पष्ट रूप से सामने आती है। इसलिए अगला महत्वपूर्ण पड़ाव होगा: आदिपर्व : भरतवंश की ओर प्रवेश दुष्यन्त और शकुन्तला — कथा का संक्षिप्त रूप राजा दुष्यन्त वन में शिकार करते हुए कण्व ऋषि के आश्रम में पहुँचते हैं। वहाँ उनकी भेंट शकुन्तला से होती है। शकुन्तला कण्व की पालिता हैं और विश्वामित्र तथा मेनका की पुत्री बताई जाती हैं। दुष्यन्त और शकुन्तला के बीच प्रेम उत्पन्न होता है और दोनों गान्धर्व विवाह करते हैं। दुष्यन्त अपने राज्य लौट जाते हैं। शकुन्तला बाद में पुत्र को जन्म देती हैं— भरत । यहीं से कथा का महत्व अचानक बढ़ जाता है। यह भरत आगे चलकर ...

महाभारत - आदिपर्व के आरम्भ में अलौकिक आख्यान रखने का औचित्य

आदिपर्व के आरम्भ में अलौकिक आख्यान रखने का औचित्य  महाभारत सीधे कुरुक्षेत्र से शुरू नहीं होता यह सबसे पहली बात है जिस पर ध्यान देना चाहिए। यदि महाभारत केवल कुरुवंश का युद्ध-इतिहास होता, तो कथा का आरम्भ हो सकता था— शांतनु → भीष्म → पांडु → धृतराष्ट्र → पांडव-कौरव → युद्ध। लेकिन ऐसा नहीं है। महाभारत अपने आरम्भ में हमें एक बहुत व्यापक संसार में ले जाता है— ऋषि → यज्ञ → जनमेजय → नाग → कद्रू → विनता → गरुड़ → देवता → अमृत → फिर भरतवंश। यह आकस्मिक विस्तार नहीं लगता। इससे एक बात स्पष्ट होती है:  महाभारत अपने को केवल मनुष्यों की राजनीतिक कथा के रूप में स्थापित नहीं करता। वह आरम्भ से ही अपने संसार की सीमा मनुष्य से आगे तक बढ़ा देता है। पाठक को पहले “महाभारत का ब्रह्मांड” दिया जाता है यह शायद सबसे महत्वपूर्ण कारण है। यदि पाठक को सीधे हस्तिनापुर में पहुँचा दिया जाता, तो वह महाभारत को मुख्यतः—  राजनीति + परिवार + युद्ध  के रूप में पढ़ सकता था। लेकिन आदिपर्व पहले ही बता देता है कि इस ग्रंथ का संसार इससे बहुत बड़ा है। इस संसार में— मनुष्य हैं, ऋषि हैं,  देव हैं, नाग हैं, गंधर...

महाभारत - आदिपर्व : कद्रू–विनता और गरुड़ का आख्यान

 आदिपर्व : कद्रू–विनता और गरुड़ का आख्यान नाग और गरुड़ : संघर्ष के पीछे कौन-सी स्मृति? नागयज्ञ के प्रसंग के बाद महाभारत नागों की उत्पत्ति और उनके वंश की कथा की ओर जाता है। यहाँ कथा हमें कश्यप, उनकी पत्नियों कद्रू और विनता, नागों तथा गरुड़ तक ले जाती है। यह प्रसंग पहली दृष्टि में एक अद्भुत पौराणिक कथा है। लेकिन ध्यान से देखें तो इसमें वंश, ईर्ष्या, दासत्व, स्वतंत्रता, सर्प और पक्षी, अमृत और शक्ति —सब एक साथ उपस्थित हैं। कथा : कद्रू और विनता कश्यप की अनेक पत्नियों में कद्रू और विनता प्रमुख हैं। कद्रू नागों की माता बनती हैं, जबकि विनता गरुड़ और अरुण की माता हैं। कथा के अनुसार कद्रू एक बड़ी संख्या में नाग-पुत्रों को जन्म देती हैं। विनता की संतति कम है, लेकिन उनमें असाधारण शक्ति है। एक दिन कद्रू और विनता के बीच एक घोड़े के रंग को लेकर विवाद होता है। घोड़ा है उच्चैःश्रवा , जो समुद्रमंथन से उत्पन्न हुआ था। विनता उसे श्वेत मानती हैं। कद्रू उसके बारे में ऐसी बात कहती हैं जिससे दोनों के बीच शर्त लग जाती है। कद्रू अपने नाग-पुत्रों से घोड़े की पूँछ से लिपट जाने को कहती हैं ताकि वह दूर से काली...