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शब्दयात्री : अधूरे ख़तों का संदूक

 शब्दयात्री : अधूरे ख़तों का संदूक मेरे पास उसका कोई ख़त नहीं है। न कोई तस्वीर। न कोई निशानी। न कोई ऐसी चीज़ जिसे हाथ में लेकर मैं कह सकूँ—यह उसके होने का सबूत है। फिर भी अजीब बात है कि मेरे भीतर एक पूरा संदूक रखा है, जो उसी की चीज़ों से भरा हुआ है। जब मैं उसे खोलता हूँ तो उसमें काग़ज़ नहीं मिलते। उसमें अधूरे ख़त मिलते हैं। वे ख़त जो कभी लिखे ही नहीं गए। वे सवाल जो कभी पूछे नहीं गए। वे जवाब जो कभी मिले नहीं। वे विदाइयाँ जो कभी बोली नहीं गईं। और वे मुलाक़ातें जो शायद हो सकती थीं, लेकिन हुई नहीं। जीवन का बड़ा हिस्सा जो घटता है, वह नहीं होता जो हमारे साथ घट चुका है। वह होता है जो घट सकता था और नहीं घटा। वही सबसे लम्बे समय तक हमारे भीतर रहता है। मैं कभी-कभी उस संदूक के सामने बैठ जाता हूँ। उसका ढक्कन खोलता हूँ। और एक-एक करके वे अधूरे ख़त पढ़ने लगता हूँ। एक ख़त में मैंने उससे पूछा था कि वह अचानक क्यों चली गई। उस ख़त का जवाब कभी नहीं आया। दूसरे ख़त में मैंने उसे बताया था कि उसके जाने के बाद मेरे दिनों का रंग बदल गया है। वह ख़त भी कभी भेजा नहीं गया। एक और ख़त था जिसम...

शब्दयात्री : दीपस्तम्भ

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 शब्दयात्री : दीपस्तम्भ कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं समन्दर में नहीं, धुँध में सफ़र कर रहा हूँ। चारों ओर सफ़ेद ख़ामोशी फैली रहती है। इतनी घनी कि लहरों की आवाज़ भी जैसे अपने ही भीतर लौट आती है। ऐसे में दिशा का कोई अर्थ नहीं रह जाता। उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम—सब एक ही धुँधले रंग में घुल जाते हैं। जीवन में भी कुछ बरस ऐसे ही होते हैं। हम चलते रहते हैं, पर यह नहीं जानते कि कहाँ जा रहे हैं। हम जागते रहते हैं, पर यह नहीं समझ पाते कि किस उम्मीद के सहारे। हम साँस लेते रहते हैं, पर भीतर कहीं कोई हिस्सा धीरे-धीरे नींद में डूबता जाता है। उसके जाने के बाद मेरे जीवन में भी एक लम्बी धुँध उतरी थी। मैंने बहुत दिनों तक उसे तन्हाई समझा। फिर एक दिन मालूम हुआ कि वह तन्हाई नहीं, दिशाहीनता थी। आदमी अकेले रह सकता है। लेकिन बिना दिशा के नहीं। उस वक़्त मुझे उसकी याद किसी चेहरे की तरह नहीं आती थी। न उसकी आँखें याद आती थीं, न उसकी आवाज़, न उसके शब्द। अजीब बात यह है कि स्मृति का सबसे टिकाऊ हिस्सा चेहरा नहीं होता। वह एक उजाला होता है। एक बहुत महीन उजाला। दूर कहीं खड़ा हुआ। जैसे किसी वीरान समुद्...

मैंने अपने आँसुओं को

 मैंने अपने आँसुओं को बहने नहीं दिया। उन्हें जमा करता रहा पुराने सिक्कों की तरह। वर्षों बाद जब उन्हें गिनने बैठा, तो पाया हर सिक्के पर किसी चेहरे की धुँधली छाप है। कुछ प्रेम थे, कुछ बिछोह, कुछ वे लोग जिन्होंने मुझे कभी पहचाना ही नहीं। अब मेरी तिजोरी में धन नहीं, कुछ अधूरी पहचानें रखी हैं। मुकेश ,,,,,,,

अथर्ववेद के कालसूक्त (मन्त्र 42–44) का दार्शनिक एवं वैदिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन

अथर्ववेद के कालसूक्त (मन्त्र 42–44) का दार्शनिक एवं वैदिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन काल : सृष्टि, वेद और लोकव्यवस्था का परम आधार वैदिक साहित्य में "काल" (समय) केवल घटनाओं के क्रम का सूचक नहीं है, बल्कि वह सृष्टि की संरचना, संचालन और नियमन का मूल सिद्धान्त भी है। विशेषतः अथर्ववेद के कालसूक्त में काल को ऐसी सार्वभौमिक सत्ता के रूप में चित्रित किया गया है जिसके आश्रय में समस्त चराचर जगत्, देवता, वेद, यज्ञ और लोकव्यवस्था प्रतिष्ठित हैं। यहाँ काल केवल गणनात्मक समय (Chronological Time) नहीं, बल्कि ब्रह्म की एक कार्यकारी अभिव्यक्ति है जो सृष्टि को जन्म देती है, उसका पालन करती है और अन्ततः उसे अपने में समाहित कर लेती है। अथर्ववेद के उन्नीसवें काण्ड में स्थित कालसूक्त वैदिक चिन्तन का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दार्शनिक दस्तावेज है। इसमें ऋषि भृगु ने काल को परमाधार, विश्वनियन्ता और सृष्टि के मूल कारण के रूप में प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत मन्त्र (42–44) विशेष रूप से काल की उस महिमा का वर्णन करते हैं जिसके अन्तर्गत प्रकृति, वेद, यज्ञ, देवता तथा समस्त लोक व्यवस्थित हैं। काल : प्रकृति और वि...

शब्दयात्री : बन्द घर की खिड़की

 शब्दयात्री : बन्द घर की खिड़की मेरे भीतर एक घर है। वह आबाद नहीं है। उसमें कोई रहता भी नहीं। फिर भी मैं उसे छोड़ नहीं पाया। कई बरस पहले उसके दरवाज़े बन्द हो गए थे। दीवारों पर वक़्त की धूल जम गई, छतों पर ख़ामोशी उग आई, कमरों में सन्नाटे ने अपना बिस्तर बिछा लिया। मगर उस घर की एक खिड़की अब भी खुली है। मैं अक्सर उसी खिड़की के पास जाकर बैठता हूँ। यह अजीब बात है कि जिन लोगों को हम खो देते हैं, वे कभी-कभी पूरे घर से नहीं जाते। वे किसी एक खिड़की में, किसी एक कमरे में, किसी एक गन्ध में रह जाते हैं। और फिर पूरी उम्र हम उसी जगह लौट-लौटकर जाते रहते हैं। उस खिड़की से बाहर कोई ख़ास मंज़र नहीं दिखाई देता। न कोई पहाड़। न कोई दरिया। न कोई बाग़। बस एक पुराना आसमान है। दिन में फीका। शाम को धुँधला। और रात में तारों से भरा हुआ। मैं वहाँ बैठकर अक्सर कुछ नहीं करता। सिर्फ़ देखता हूँ। कभी बादलों को। कभी उड़ते हुए परिन्दों को। कभी उस ख़ाली रास्ते को जो कहीं से आता है और कहीं चला जाता है। पहले मुझे लगता था कि मैं किसी का इन्तज़ार कर रहा हूँ। फिर समझ में आया कि इन्तज़ार भी एक उम्र के बाद...

Bindu : एक चित्र का गहन कलात्मक विश्लेषण

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  Bindu : एक चित्र का गहन कलात्मक विश्लेषण यदि आधुनिक भारतीय अमूर्त चित्रकला की केवल एक ही कृति चुननी हो, जिसे भारतीय दर्शन, उपनिषद, तंत्र, ध्यान और आधुनिक कला—सभी के संगम के रूप में देखा जा सके, तो वह है Bindu । चित्र को पहली बार देखते समय,  एक सामान्य दर्शक कह सकता है—  " इसमें तो केवल एक काला गोला है!" यहीं से कला-दृष्टि और सामान्य दृष्टि का अन्तर प्रारम्भ होता है। महान चित्रकला का प्रश्न यह नहीं होता कि उसमें कितना बनाया गया है। प्रश्न यह होता है कि उसमें कितना अनुभव समाहित है। 1. बिन्दु क्या है? भारतीय परम्परा में बिन्दु केवल एक ज्यामितीय चिन्ह नहीं। वह है— सृष्टि का बीज ध्यान का केन्द्र ऊर्जा का स्रोत शून्य और पूर्ण का संगम तांत्रिक परम्पराओं में सम्पूर्ण मंडल बिन्दु से उत्पन्न होता है। रज़ा ने इसी बिन्दु को अपनी कला का केन्द्र बनाया। चित्र की संरचना ध्यान से देखें। चित्र में केवल बिन्दु नहीं है। उसके चारों ओर— रंगों के क्षेत्र, ज्यामितीय विभाजन, ऊर्जा के केन्द्र, संतुलित संरचना मौजूद हैं। चित्र बाहर से भीतर की ओर ले जाता है। आपकी दृष्टि स्वतः केन्द्र की ओर खिंचती ...

शब्दयात्री : उजड़े हुए बाग़ का माली

 शब्दयात्री : उजड़े हुए बाग़ का माली मेरे भीतर एक बाग़ है। कभी वह बहुत हरा-भरा रहा होगा। यह बात मुझे फूलों से नहीं, सूखी टहनियों से पता चलती है। क्योंकि जो चीज़ कभी जीवित नहीं रही, वह सूखती भी नहीं। उस बाग़ में अब कोई रंग नहीं खिलता। मौसम आते हैं, गुज़र जाते हैं, हवाएँ अपने क़दमों के निशान छोड़ती हुई चली जाती हैं। पर मैं आज भी वहाँ जाता हूँ। एक बूढ़े माली की तरह। अजीब बात है कि मैं अब भी पौधों को पानी देता हूँ। हालाँकि मुझे मालूम है कि उनमें से ज़्यादातर बहुत पहले मर चुके हैं। लेकिन मोहब्बत का रिश्ता अक्सर नतीजों से नहीं, आदतों से बना होता है। मैं पानी देता हूँ। मिट्टी को उलटता-पलटता हूँ। सूखे पत्ते समेटता हूँ। और फिर किसी पुराने पेड़ के नीचे बैठ जाता हूँ। वह पेड़ उसी का लगाया हुआ है। नहीं, उसने सचमुच कोई पेड़ नहीं लगाया था। मगर कुछ लोग हमारी ज़िन्दगी में ऐसे दाख़िल होते हैं कि उनके जाने के बाद भी उनके लगाए हुए मौसम बचे रहते हैं। वह भी अपने पीछे एक मौसम छोड़ गई थी। शुरू-शुरू में मुझे लगता था कि एक दिन वह लौटेगी और यह बाग़ फिर से आबाद हो जाएगा। फिर बरस बीत गए। इन्...