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महाभारत — स्वर्गारोहणिकपर्व - भाग १ : स्वर्ग का द्वार और अंतिम परीक्षा

महाभारत — स्वर्गारोहणिकपर्व - भाग १ : स्वर्ग का द्वार और अंतिम परीक्षा महाप्रस्थान की यात्रा समाप्त हो चुकी थी। युधिष्ठिर के पीछे पृथ्वी का सम्पूर्ण जीवन छूट चुका था। हस्तिनापुर का राज्य, राजसी वैभव, भाई, द्रौपदी, युद्ध की स्मृतियाँ और जीवन के सभी संबंध अब पीछे थे। इन्द्र के दिव्य रथ में बैठकर युधिष्ठिर स्वर्ग की ओर बढ़े।  लेकिन महाभारत में स्वर्ग केवल पुरस्कार का स्थान नहीं है। वहाँ भी युधिष्ठिर के सामने एक अंतिम परीक्षा रखी गई। स्वर्ग में प्रवेश करते ही उन्होंने दुर्योधन को देखा। दुर्योधन दिव्य वैभव से युक्त दिखाई दे रहे थे। देवताओं के बीच उनका सम्मान हो रहा था। युधिष्ठिर यह देखकर चकित हुए। उनके मन में कुरुक्षेत्र का पूरा इतिहास एक क्षण में जीवित हो उठा—द्यूतसभा, वनवास, विराट, युद्ध, अभिमन्यु का वध, द्रौपदी का अपमान और अंततः कुरुक्षेत्र का विनाश। उन्होंने पूछा— “मेरे भाई कहाँ हैं?” देवताओं ने उन्हें बताया कि वे जहाँ हैं, वहाँ जाकर उन्हें खोजने की आवश्यकता नहीं। युधिष्ठिर ने आग्रह किया कि वे अपने भाइयों और द्रौपदी को देखना चाहते हैं। उन्हें एक दूसरे मार्ग से ले जाया गया। वहाँ स्वर...

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग ३ : युधिष्ठिर और स्वर्ग का रथ

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग ३ : युधिष्ठिर और स्वर्ग का रथ हिमालय की कठिन यात्रा अब अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी थी। द्रौपदी और चारों भाई पीछे छूट चुके थे। युधिष्ठिर अकेले आगे बढ़ रहे थे। उनके साथ केवल वह कुत्ता था, जो हस्तिनापुर से निकलने के समय से ही उनके पीछे चलता आया था। यह दृश्य महाभारत के पूर्ववर्ती समूचे इतिहास से बिल्कुल भिन्न था। कभी युधिष्ठिर के साथ राजसत्ता थी, भाई थे, द्रौपदी थीं, सेना थी और कृष्ण का मार्गदर्शन था। अब उनके पास इनमें से कुछ भी नहीं था। फिर भी वे चलते रहे। उनके सामने हिमालय की ऊँचाइयाँ थीं। पीछे उनका सम्पूर्ण जीवन पड़ा था। तभी आकाश में एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया। इन्द्र का रथ उनके सामने आकर रुका। इन्द्र ने युधिष्ठिर को स्वर्ग चलने के लिए आमंत्रित किया। युधिष्ठिर ने रथ की ओर देखा। लेकिन उन्होंने तुरंत उस पर चढ़ने से इनकार नहीं किया और न ही उत्साह में अपने पीछे छूटे भाइयों और द्रौपदी को भूल गए। उन्होंने पूछा कि उनके भाई और द्रौपदी कहाँ हैं। इन्द्र ने बताया कि वे अपने-अपने कर्मों के कारण मार्ग में गिर चुके हैं। उनका शरीर अब उनके साथ नहीं है, लेकिन उन्हें उ...

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग २ : गांडीव का त्याग और अंतिम यात्रा

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग २ : गांडीव का त्याग और अंतिम यात्रा हस्तिनापुर में पांडवों के महाप्रस्थान का निर्णय हो चुका था, लेकिन उससे पहले राज्य और वंश की व्यवस्था पूरी करना आवश्यक था। युधिष्ठिर ने परीक्षित को हस्तिनापुर के सिंहासन पर स्थापित किया। वे अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र थे—कुरुवंश की उस अगली पीढ़ी के प्रतिनिधि, जिसके जन्म ने युद्ध के बाद वंश की निरंतरता बनाए रखी थी। यादववंश की ओर से भी व्यवस्था की गई। वज्र को इन्द्रप्रस्थ का राजा बनाया गया। इस प्रकार पांडवों ने दोनों राजवंशों के भविष्य को अपने व्यक्तिगत जीवन से अलग कर दिया। राज्य अब उनका नहीं था। उन्होंने अपने धन, राजसी वस्त्र और आभूषण त्याग दिए। द्रौपदी उनके साथ थीं। धौम्य भी उनके साथ चले। पांडवों ने अग्नि को आगे रखते हुए अपनी अंतिम यात्रा आरम्भ की। इसी समय एक महत्वपूर्ण घटना घटी। अर्जुन के पास अब भी गांडीव धनुष और अक्षय तूणीर थे। यही वे दिव्य साधन थे जिनके साथ उन्होंने जीवन के असंख्य युद्ध लड़े थे। कुरुक्षेत्र की स्मृति अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। तभी अग्निदेव का संबंध इस प्रसंग से जुड़ता है। महाभारत की कथा के अ...

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग १ : राज्य से महाप्रस्थान तक

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग १ : राज्य से महाप्रस्थान तक मौसलपर्व में एक युग का अंत हो चुका था। कृष्ण पृथ्वी से विदा हो चुके थे। बलराम का भी प्रस्थान हो चुका था। यादवों का विनाश हो चुका था और समुद्र ने द्वारका को अपने भीतर समेट लिया था। अर्जुन हस्तिनापुर लौटकर व्यास से प्राप्त ज्ञान युधिष्ठिर को सुना चुके थे। अब पांडवों के सामने कोई बाहरी संकट नहीं था। लेकिन उनके भीतर एक निर्णय जन्म ले चुका था। कुरुक्षेत्र के युद्ध को अनेक वर्ष बीत चुके थे। हस्तिनापुर में राज्य व्यवस्थित था। परीक्षित के लिए भविष्य सुरक्षित किया जा सकता था। पांडवों ने अपने जीवन का वह कार्य पूरा कर लिया था जिसके लिए उन्होंने वनवास सहा, अज्ञातवास बिताया और अंततः महायुद्ध लड़ा था। अब प्रश्न राज्य प्राप्त करने का नहीं था। प्रश्न था— प्राप्त राज्य से कब और कैसे निवृत्त हुआ जाए। युधिष्ठिर ने अर्जुन से द्वारका और यादवों के अंत की पूरी कथा सुनी। कृष्ण के प्रस्थान ने उनके भीतर उस सत्य को और स्पष्ट कर दिया जिसे वे पहले से अनुभव कर रहे थे—समय किसी व्यक्ति, वंश या साम्राज्य के लिए स्थिर नहीं रहता। जिस संसार में कृष्ण जैसे महाप...

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ९ : अर्जुन, व्यास और काल का विधान

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ९ : अर्जुन, व्यास और काल का विधान मौसलपर्व का अंतिम चरण द्वारका के डूबने पर समाप्त नहीं होता। कृष्ण, बलराम और यादवों के प्रस्थान के बाद भी अर्जुन की यात्रा शेष थी। उसे कृष्ण के परिवार के बचे हुए लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाना था और फिर अपने भीतर उठे उस प्रश्न का उत्तर खोजना था, जिसे वह स्वयं समझ नहीं पा रहा था— कृष्ण के रहते जो सामर्थ्य उसके भीतर थी, वह कृष्ण के जाने के बाद कहाँ चली गई? अर्जुन सातवें दिन द्वारका से प्रस्थान करता है। उसके साथ यादव-वंश के बचे हुए स्त्री, बालक और वृद्ध थे। वह मृत यादव नायकों के अंतिम संस्कार और श्राद्ध का विधान पूरा कर चुका था। कृष्ण और बलराम के शरीरों का भी संस्कार कराया गया। वसुदेव का योग द्वारा देहत्याग और उनके अंतिम संस्कार का वर्णन भी इसी प्रसंग में आता है। द्वारका से यह अंतिम यात्रा आरम्भ हुई। तभी समुद्र ने उस नगर को अपने भीतर लेना शुरू किया। महाभारत के वर्णन में यह क्रम महत्वपूर्ण है। अर्जुन और बचे हुए लोग नगर से निकल चुके थे; उसके बाद समुद्र ने द्वारका को घेर लिया। उसकी प्राचीरें, भवन, उद्यान और राजमार्ग जल में समा गए...

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ८ : द्वारका से हस्तिनापुर तक

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ८ : द्वारका से हस्तिनापुर तक द्वारका पीछे छूट चुकी थी। समुद्र अपने भीतर उस नगर को समेट रहा था, जिसने कभी यादव शक्ति, कृष्ण की राजनीति और समुद्रपारीय समृद्धि का केंद्र बनकर इतिहास और आख्यान—दोनों में अपना स्थान बनाया था। अर्जुन के सामने अब कोई युद्ध नहीं था। उसके सामने केवल लौटने की यात्रा थी। लेकिन यह वापसी साधारण नहीं थी। उसके साथ वे स्त्रियाँ, बच्चे और वृद्ध थे जो यादव-विनाश के बाद जीवित बचे थे। उनके लिए द्वारका केवल एक नगर नहीं, उनका घर था; अर्जुन के लिए वह कृष्ण की स्मृति थी। मार्ग में जिन आक्रमणकारियों ने उनके समूह को घेरा था, उनसे संघर्ष के बाद अर्जुन ने पहली बार अपनी शक्ति की उस सीमा को स्वीकार किया जिसे वह स्वयं भी समझ नहीं पा रहा था। गांडीव उसके हाथ में था, पर वह पुराना अर्जुन उसके भीतर उसी रूप में उपस्थित नहीं था। महाभारत इस घटना को अत्यंत संक्षेप में रखता है, लेकिन उसका प्रभाव व्यापक है। कुरुक्षेत्र के बाद अर्जुन के पास विजय की स्मृति थी। अब उसके पास संरक्षण का दायित्व था। युद्ध में शत्रु को परास्त करना और असहाय लोगों को सुरक्षित रखना एक ही प्रकार की...

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ७ : अर्जुन का आगमन और द्वारका का अंत

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ७ : अर्जुन का आगमन और द्वारका का अंत कृष्ण के प्रस्थान के बाद द्वारका में अब कोई निर्णय लेने वाला नहीं था। दारुक हस्तिनापुर पहुँच चुका था और उसने अर्जुन को यादवों के विनाश, बलराम के प्रस्थान और कृष्ण की अंतिम अवस्था का समाचार दिया। यह समाचार अर्जुन के लिए केवल किसी प्रिय मित्र के खोने का समाचार नहीं था। उसके सामने कुरुक्षेत्र का वह समूचा संसार अचानक बदल गया था जिसमें कृष्ण उसके सारथी, मार्गदर्शक और मित्र के रूप में उपस्थित थे। अर्जुन तुरंत द्वारका की ओर चला। जिस कृष्ण के साथ उसने जीवन के सबसे निर्णायक क्षण बाँटे थे, अब उसी कृष्ण से उसका अंतिम मिलन भी नहीं हो सकता था। द्वारका पहुँचने पर अर्जुन ने जो देखा, वह किसी विजयी नगर का दृश्य नहीं था। यादवों का महान वंश अपने ही संघर्ष में समाप्त हो चुका था। राजमहल, समुद्र और नगर की गलियाँ थीं, लेकिन उनके भीतर वह जीवन नहीं था जो कभी द्वारका की पहचान था। अर्जुन ने कृष्ण के अंतिम संस्कार का कार्य पूरा किया। बलराम और यादवों के मृत शरीरों का भी संस्कार कराया गया। अब उसके सामने अगला दायित्व था—बचे हुए लोगों को सुरक्षित निकालना। ...

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ६ : जरा का बाण और कृष्ण का प्रस्थान

 महाभारत — मौसलपर्व - भाग ६ : जरा का बाण और कृष्ण का प्रस्थान बलराम के प्रस्थान के बाद समुद्र का तट असाधारण रूप से शांत था। अभी कुछ समय पहले तक जहाँ यादवों की विशाल शक्ति, उत्सव और संघर्ष की स्मृतियाँ थीं, वहीं अब केवल समुद्र की लहरें थीं और उस विराट वंश के अंत की निस्तब्धता। कृष्ण एक वृक्ष के नीचे एकांत में बैठे थे। द्वारका के राजमहलों से दूर, युद्धों की राजनीति से दूर, अपने संबंधियों और मित्रों से दूर—मानो उनका जीवन जिस संसार को गति देता रहा था, अब उसी संसार से स्वयं पीछे हट रहा था। महाभारत यहाँ कृष्ण को किसी विजय-उत्सव के नायक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे मनुष्य के रूप में दिखाता है जो अपने कार्य की अंतिम परिणति को सामने देख रहा है। उनका शरीर वृक्ष के नीचे था, पर कथा का संकेत इससे कहीं आगे जाता है। जिस युग को उन्होंने दिशा दी थी, वह समाप्त हो चुका था। उसी समय जरा नाम का एक शिकारी उस क्षेत्र में आया। दूर से उसे वृक्ष के नीचे कृष्ण के पैर का एक भाग दिखाई दिया। उसे वह किसी हिरण के शरीर का अंग प्रतीत हुआ। उसने अपना बाण छोड़ा। बाण जाकर कृष्ण के पैर में लगा। जरा निकट आया तो उसके सामन...

महाभारत — मौसलपर्व - भाग 5 : बलराम का प्रस्थान

महाभारत — मौसलपर्व - भाग 5 : बलराम का प्रस्थान प्रभास का विनाश समाप्त हो चुका था। यादववंश के असंख्य वीर धरती पर पड़े थे। जिस कुल ने अपने पराक्रम से अनेक राजाओं को चुनौती दी थी, उसका अंत अब अपने ही हाथों से हो चुका था। इस विनाश के बीच बलराम एक ओर चले गए।  वे समुद्र के निकट एक शांत स्थान पर बैठ गए और योग में स्थित हो गए। उनका मन अब संसार की घटनाओं से अलग हो चुका था। श्रीकृष्ण ने उन्हें देखा। दोनों भाई जीवन भर अनेक घटनाओं के साथ रहे थे। कृष्ण ने नीति, राजनीति और धर्म के जटिल संघर्षों में सक्रिय भूमिका निभाई थी; बलराम का स्वभाव अपेक्षाकृत सीधा और अपने सिद्धान्तों में स्थिर रहा था। अब दोनों के जीवन का अंतिम चरण सामने था। बलराम ने योग के द्वारा अपने शरीर का परित्याग किया। महाभारत इस घटना को सामान्य मृत्यु की तरह नहीं प्रस्तुत करता। उनके शरीर से एक विशाल श्वेत नाग के निकलने और समुद्र की ओर चले जाने का वर्णन मिलता है। परम्परा में इसे शेषनाग के रूप में बलराम के स्वरूप से जोड़ा गया है। इस प्रसंग को दो स्तरों पर पढ़ा जा सकता है। परम्परागत दृष्टि में बलराम शेषनाग के अवतार माने जाते हैं। इसलि...

महाभारत — मौसलपर्व - भाग 4 : यादवों का आत्मविनाश

महाभारत — मौसलपर्व - भाग 4 : यादवों का आत्मविनाश प्रभास का वातावरण कुछ ही क्षणों में बदल चुका था। जहाँ थोड़ी देर पहले उत्सव था, वहीं अब क्रोध था। पुरानी शत्रुताएँ फिर सामने थीं और प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर वर्षों से संचित आक्रोश को जैसे बाहर निकाल देना चाहता था। सात्यकि और कृतवर्मा के विवाद ने जो आग लगाई थी, वह अब पूरे यादवसमुदाय में फैल गई। यादव एक-दूसरे पर टूट पड़े। एरक घास हाथों में आते ही कठोर मूसल बन जाती थी। जो वस्तु अभी तक धरती का सामान्य तृण दिखाई दे रही थी, वही अब मृत्यु का साधन बन चुकी थी। प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, साम्ब और अनेक अन्य वीर इस संघर्ष में खिंच गए। एक के बाद एक योद्धा गिरने लगे। यह कोई योजनाबद्ध युद्ध नहीं था। न कोई सेना थी। न कोई सेनापति। न कोई स्पष्ट पक्ष।  यह उस समाज का विघटन था जिसमें संयम की अंतिम रेखा टूट चुकी थी। श्रीकृष्ण ने परिस्थिति को देखा। उन्होंने भी अस्त्र उठाया। बलराम भी वहाँ उपस्थित थे, लेकिन इस विनाश को रोकने की दिशा में उनका व्यवहार वैसा नहीं था जैसा किसी सामान्य युद्ध में अपेक्षित होता। यादवों की शक्ति अब उनके विरुद्ध ही प्रयुक्त हो रही थी। जो ...