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Sunday, 3 May 2026

शहर की रौनक में तन्हा-सा खड़ा था मैं

 शहर की रौनक में तन्हा-सा खड़ा था मैं

अपने ही साये से जैसे ही कटा था मैं


रात ने चुपके से आकर ये बताया मुझको

दिन के हर शोर में कितना ही छला था मैं


लोग चेहरों पे हँसी ओढ़ के मिलते थे मगर

उनकी आँखों में कहीं ग़म से जुड़ा था मैं


वक़्त की धूप ने झुलसा दिया अंदर तक यूँ

ख़ुद ही अपने लिए इक सहरा बना था मैं


तेरे जाने का असर यूँ भी दिखाई देता

भीड़ में रह के भी हर रोज़ सड़ा था मैं


आइनों से नज़रें मिलाने की हिम्मत न रही

इतना टूटा कि हर इक अक्स से डरा था मैं


ज़िंदगी मुझको पढ़ाती रही सबक़ दर सबक़

और हर बार वही भूल दोहरा था मैं


मुकेश ,,,,,,

एक बहुत बोझिल-सी जब शाम उतर आई

 एक बहुत बोझिल-सी जब शाम उतर आई

सूने दिल में यादों का कोहराम उतर आई


रात की चादर ने जब मुझको घेरा तो

ख़्वाब की आँखों में फिर नाकाम उतर आई


तेरे जाने से जो वीराना बसा दिल में

उसमें हर सूरत तेरी हर गाम उतर आई


हमने चाहा था कि हँसते ही रहें हरदम

आँख भीगी तो हँसी गुमनाम उतर आई


शहर की रौनक में तन्हा-सा खड़ा था मैं

भीड़ के चेहरे पे भी इक शाम उतर आई


दिन भर अपने ही ख़यालों से उलझता रहा

रात आई तो थकन बेहिसाब उतर आई


नाम अपना भी किसी मोड़ पे खो बैठा मैं

याद आई तो कोई इल्ज़ाम उतर आई


मुकेश ,,,,

रात मिली तन्हाई मिली, इक जाम मिला

 रात मिली तन्हाई मिली, इक जाम मिला

घर से निकले तो हर इक गाम अंजाम मिला


एक बहुत बोझिल-सी जब शाम उतर आई

सूने दिल को यादों का कोहराम मिला


वही मोहल्ला, वही घर, वही चौखट लेकिन

दर पे देखा तो किसी और का नाम मिला


दिन भर दौड़े रोटी की ख़ातिर हम लेकिन

बेकारी में खुद से ही इक काम मिला


आईनों में ढूँढा जब अपना ही चेहरा

हर सूरत में टूटा हुआ अंजाम मिला


लोग मिले तो सिर्फ़ दिलासा ही बाँटा

दर्द टटोला तो सच्चा पैग़ाम मिला


लिखते-लिखते उम्र की स्याही सूख गई

नाम न आया फिर भी सुकून-ए-काम मिला


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

Saturday, 2 May 2026

वहाँ आग कम थी, धुआँ ही ज़्यादा था

 

वहाँ आग कम थी, धुआँ ही ज़्यादा था
हर इक चेहरा यहाँ आधा-आधा था

जो सच था, उसे किसने देखा भला
यहाँ झूठ का शोर भी ज़्यादा था

हमारी ख़ामोशी को इल्ज़ाम मिला
हर इक फ़ैसला भी यहाँ आधा था

किसी ने न पूछा कि दिल पर क्या गुज़री
हर इक दर्द का ज़िक्र भी आधा था

उजाले की बातें बहुत थीं मगर
हर इक घर में बस धुआँ ही ज़्यादा था

मक़्ता:
मुकेश इलाहाबादी ये कैसा शहर था
हर इक आदमी भी यहाँ आधा था

सब तो दरिया थे हम ही सराब निकले

 सब तो दरिया थे हम ही सराब निकले

अपने ही दिल से कितने अज़ाब निकले

जिसको चाहा था उम्र भर अपना
वो ही रिश्ते में बेहिसाब निकले

आईनों से नज़र मिलाते रहे
ख़ुद ही अपने से हम नक़ाब निकले

हर तरफ़ रौशनी का दावा था
हम ही अंदर से बे-चिराग़ निकले

वक़्त ने जब भी सच दिखाया हमें
हम ही अपने ही सवाल-ओ-जवाब निकले

न कोई और था गुनहगार यहाँ
हम ही अपने लिए ख़राब निकले

मक़्ता:
मुकेश इलाहाबादी ये राज़ खुला आख़िर
हम ही अपने ही किस्सों की किताब निकले

लोग तो अच्छे थे हम ही ख़राब निकले

लोग तो अच्छे थे हम ही ख़राब निकले

अपने ही अंदर से हम ही अज़ाब निकले


हर क़दम पर खुद से ही लड़ते रहे हम

हम अपने ही रास्तों के नायाब निकले


जिसको समझा था सुकून का इक सहारा

वही तो दर्दों का पूरा हिसाब निकले


आईने ने भी हमें सच कह दिया आख़िर

हम ही अपने ही वजूद के बेहिसाब निकले


वक़्त ने हर बार हमें तोड़कर देखा

हम ही अपने ही सफ़र के जवाब निकले


न कोई शिकवा रहा, न कोई अब गिला है

हम अपने ही दिल के सच्चे जवाब निकले


मुकेश इलाहाबादी ये बात समझ आई

हम ही अपने ही किस्सों की किताब निकले


मुकेश ,,,,,,,,,,,


इस ग़ज़ल की बहर (Meter Name)


बहर-ए-रमल मुसद्दस महज़ूफ़

Strict Aruz Scansion


लोग तो अच्छे थे हम ही ख़राब निकले

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


अपने ही अंदर से हम ही अज़ाब निकले

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


हर क़दम पर खुद से ही लड़ते रहे हम

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


हम अपने ही रास्तों के नायाब निकले

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


जिसको समझा था सुकून का इक सहारा

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


वही तो दर्दों का पूरा हिसाब निकले

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


मुकेश इलाहाबादी ये बात समझ आई

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन


हम ही अपने ही किस्सों की किताब निकले

फाएलातुन | फाएलातुन | फाइलुन

उसी ज़मीन उसी आसमाँ के साथ रहे

 उसी ज़मीन उसी आसमाँ के साथ रहे

हम अपने दिल के हर इक इम्तिहाँ के साथ रहे


जहाँ का दर्द मिला, वो ही ओढ़ कर बैठे

नए थे लोग मगर दास्ताँ के साथ रहे


न जाने किसने हमें राह से जुदा कर दिया

क़दम तो अपने थे पर कारवाँ के साथ रहे


वो जो ख़्वाब थे, आँखों से उतरते ही नहीं

हम अपने ख़्वाब की हर दास्ताँ के साथ रहे


गुज़र गए कई मौसम, मगर ये रंज रहा

हम एक लम्हे की बस रहगुज़ार के साथ रहे


न थी कोई भी पनाह, न कोई साया था

अजीब लोग थे, हम आसमाँ के साथ रहे


कभी जो सच ने पुकारा, तो डर भी साथ रहा

हम अपने डर के भी इक राज़दाँ के साथ रहे


मुकेश ,,,,,,,,