शंकराचार्य का संवाद — (गद्यात्मक फिक्शन)
वह बहुत कम उम्र में बहुत दूर तक देख लेता था।
उसके लिए संसार एक प्रश्न था, और प्रश्न का उत्तर कोई स्थिर वाक्य नहीं, बल्कि बदलती हुई दृष्टि थी।
वह चलता था, पर उसका चलना किसी यात्रा जैसा नहीं था।
जैसे वह किसी स्थान पर नहीं, बल्कि किसी भ्रम से गुजर रहा हो।
लोग उसे सुनते थे, पर अक्सर ऐसा लगता था कि वे शब्द नहीं, अपने ही विचार सुन रहे हैं।
वह कहता था — “यह सब परिवर्तन है।”
और लोग सोचते थे कि वह दुनिया को नकार रहा है।
पर वह दुनिया को नकार नहीं रहा था — वह उसकी स्थिरता के भ्रम को देख रहा था।
एक दिन वह एक नदी के किनारे बैठा।
नदी बह रही थी, जैसे हमेशा से बह रही हो।
उसने कहा — “यदि यह वही नदी नहीं है, तो इसे नदी कौन कहता है?”
प्रश्न सरल था, पर उसके भीतर की गहराई सरल नहीं थी।
लोग उत्तर खोजते रहे,
पर वह उत्तर से पहले प्रश्न की जगह को देख रहा था।
उसके लिए ज्ञान किसी वस्तु का संग्रह नहीं था।
वह वस्तुओं के पीछे की अस्थिरता को समझने की प्रक्रिया थी।
कभी-कभी वह मौन हो जाता।
और उस मौन में ऐसा लगता था जैसे सब कुछ थोड़ी देर के लिए अपने नाम भूल गया हो।
वह किसी युद्ध का विरोधी नहीं था,
न किसी संसार का त्यागी।
वह केवल यह देख रहा था कि जो दिखाई देता है, वह हमेशा वैसा नहीं रहता जैसा हम उसे मान लेते हैं।
और अंत में,
वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा
क्योंकि उसके लिए सत्य कोई गंतव्य नहीं था,
बल्कि देखने का तरीका था।
मुकेश ,,,,,,,