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यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे...” — पृथ्वी सूक्त के दशम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

  यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे...” — पृथ्वी सूक्त के दशम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या पृथ्वी सूक्त का दशम मंत्र पृथ्वी के मापन, उसके विस्तार, उसके संरक्षण तथा उसके पोषणकारी स्वरूप का अत्यंत गहन वर्णन प्रस्तुत करता है। इस मंत्र में अश्विनीकुमार , विष्णु और इन्द्र का उल्लेख आता है। किंतु इसे केवल पौराणिक आख्यान के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। वैदिक साहित्य में देवता अनेक प्राकृतिक, ब्रह्माण्डीय और मानवीय शक्तियों के प्रतीक भी हैं। यह मंत्र पृथ्वी के मापन (Measurement) , अन्वेषण (Exploration) , अधिवास (Habitation) तथा पोषण (Sustenance) जैसे विषयों को स्पर्श करता है। आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसमें भूगोल, सर्वेक्षण-विज्ञान, पृथ्वी-अध्ययन और मानव-सभ्यता के विकास से जुड़े संकेत मिलते हैं। मंत्र-पाठ यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे। इन्द्रो यां चक्र आत्मनेडनामित्रां शचीपतिः। सा नो भूमिर्वि सूजतां माता पुत्राय मे पयः॥ १०॥ जिस पृथ्वी का अश्विनीकुमारों ने मापन किया, जिस पर विष्णु ने अपने व्यापक चरण स्थापित किए, जिसे इन्द्र ने अपने ...

यस्यामापः परिचराः समानीरहोरात्रे...” — पृथ्वी सूक्त के नवम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

  यस्यामापः परिचराः समानीरहोरात्रे...” — पृथ्वी सूक्त के नवम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या पृथ्वी सूक्त का नवम मंत्र पृथ्वी और जल के गहन संबंध का अत्यंत सुंदर वर्णन करता है। यदि तृतीय मंत्र में समुद्रों, नदियों और अन्नोत्पादन की चर्चा थी, तो इस मंत्र में ऋषि जल के निरन्तर प्रवाह, उसके चक्र तथा पृथ्वी की पोषणकारी शक्ति पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। यह मंत्र विशेष रूप से आधुनिक जलविज्ञान (Hydrology) , जलचक्र (Water Cycle) तथा पारिस्थितिकी (Ecology) के सन्दर्भ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता है। ऋषि जल को स्थिर पदार्थ नहीं मानते। उनके लिए जल एक सतत गतिशील शक्ति है जो दिन-रात पृथ्वी पर जीवन का पोषण करती रहती है। यही कारण है कि वे पृथ्वी को "भूरिधारा" अर्थात् असंख्य धाराओं की धारिणी कहते हैं। मंत्र-पाठ -  यस्यामापः परिचराः समानीर् अहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति। सा नो भूमिर्भूरिधारा पयो दुहाम् अथो उक्षतु वर्चसा॥ ९॥ जिस पृथ्वी पर जलराशियाँ निरन्तर प्रवाहित होती रहती हैं, जो दिन-रात बिना प्रमाद के अपना कार्य करती हैं, वह अनेक धाराओं वाली पृथ्वी हमारे लिए पोषक ...

या अर्णवेऽधि सलिलमग्र आसीत्...” — पृथ्वी सूक्त के अष्टम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या

  या अर्णवेऽधि सलिलमग्र आसीत्...” — पृथ्वी सूक्त के अष्टम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या पृथ्वी सूक्त का अष्टम मंत्र सम्पूर्ण सूक्त के सर्वाधिक गूढ़ और दार्शनिक मंत्रों में से एक है। यहाँ ऋषि पृथ्वी के वर्तमान स्वरूप का नहीं, बल्कि उसके आदिम अस्तित्व, उसके रहस्य, उसके अन्तरतम सत्य तथा उसके द्वारा राष्ट्र को प्रदान की जाने वाली शक्ति का वर्णन करते हैं। इस मंत्र में सृष्टिविज्ञान (Cosmology), दर्शन, भूविज्ञान और राष्ट्रचिन्तन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। आधुनिक विज्ञान पृथ्वी की उत्पत्ति को लगभग 4.54 अरब वर्ष पूर्व की घटना मानता है। वैदिक ऋषि वैज्ञानिक भाषा का प्रयोग नहीं करते, किन्तु वे सृष्टि के आदिम जल, ब्रह्माण्डीय रहस्य और पृथ्वी के अन्तर्निहित सत्य की चर्चा करते हैं। इसलिए यह मंत्र विशेष रूप से वैज्ञानिक और दार्शनिक अध्ययन की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मंत्र-पाठ या अर्णवेऽधि सलिलमग्र आसीत्,यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः। यस्या हृदयं परमे व्योमन्,सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः। सा नो भूमिस्त्विषिं बलं,राष्ट्रे दधातूत्तमे॥ ८॥ जो पृथ्वी आदिकाल में जलराशि के मध्य...

यदि भगवद्गीता नदी है, तो उपनिषद् समुद्र हैं

 यदि भगवद्गीता नदी है, तो उपनिषद् समुद्र हैं उपनिषदों और भगवद्गीता का तुलनात्मक दार्शनिक अध्ययन प्रस्तावना भारतीय दार्शनिक परम्परा में यदि किसी ग्रन्थ को सर्वाधिक लोकप्रियता और व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त हुई है, तो वह भगवद्गीता है। दूसरी ओर, यदि किसी साहित्य-संपदा को भारतीय अध्यात्म का मूल स्रोत, मूल चिन्तन और मूल अनुभूति कहा जाए, तो वह उपनिषद् हैं। अनेक विद्वानों ने कहा है कि भगवद्गीता उपनिषदों का सार है । स्वयं गीता के प्रत्येक अध्याय के अंत में आने वाला पुष्पिका-वाक्य इस तथ्य की पुष्टि करता है—  “इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे...” अर्थात् गीता स्वयं को उपनिषदों की परम्परा में स्थित मानती है। यदि एक रूपक में कहा जाए, तो उपनिषद् समुद्र हैं और भगवद्गीता उस समुद्र से निकली हुई एक विशाल नदी है , जो समुद्र की ही जलराशि को जनसामान्य तक पहुँचाती है। उपनिषद् : भारतीय अध्यात्म का मूल स्रोत उपनिषद् वैदिक साहित्य का अंतिम भाग हैं। इन्हें वेदान्त कहा जाता है—अर्थात् वेदों का अन्त और वेदों का सार। ऋषियों ने उपनिषदों में पहली बार यह प्रश्न उठाया— ...

शब्दयात्री : ओंकार की प्रतिध्वनि

 शब्दयात्री : ओंकार की प्रतिध्वनि कुछ ध्वनियाँ सुनाई नहीं देतीं, फिर भी जीवन भर हमारे भीतर गूँजती रहती हैं। उसके जाने के बाद मैंने बहुत समय तक शब्दों में उसे खोजा। फिर एक दिन लगा कि वह शब्दों के पार चली गई है। जैसे कोई मंत्र बार-बार जपने के बाद अक्षरों से मुक्त होकर केवल स्पन्दन बन जाता है। तभी मुझे ओंकार का स्मरण हुआ। ओम्—जिसे ऋषियों ने नाद कहा, सृष्टि का मूल स्पन्दन कहा। उसका उच्चारण समाप्त हो जाता है, पर उसकी प्रतिध्वनि कुछ क्षण तक हवा में बनी रहती है। और कभी-कभी उससे भी अधिक देर तक भीतर। वह भी अब मेरे जीवन में वैसी ही प्रतिध्वनि है। न उसका चेहरा स्पष्ट है। न उसकी आवाज़। न वे दिन जिन्हें मैंने कभी बहुत क़ीमती समझा था। लेकिन उसके साथ जो एक आन्तरिक कम्पन जन्मा था, वह अब भी मौजूद है। जैसे ध्यान के बाद भी भीतर हल्की-सी गूँज बनी रहती है। मैंने समझा कि प्रेम का अन्त मौन में होता है, पर वह मौन रिक्त नहीं होता। उसमें एक नाद छिपा रहता है। वही नाद मनुष्य को भीतर की ओर ले जाता है। अब जब मैं अकेला बैठता हूँ, तो मुझे उसकी कमी कम और उसकी प्रतिध्वनि अधिक महसूस होती है। वह मुझे पुकारती नहीं, रो...

शब्दयात्री : अक्षयवट

 शब्दयात्री : अक्षयवट हर नगर में कुछ वृक्ष होते हैं। और हर मनुष्य के भीतर भी। वे वृक्ष समय से बड़े होते हैं। ऋतुएँ उन्हें छूती हैं, पर समाप्त नहीं कर पातीं। लोग आते हैं, चले जाते हैं। पीढ़ियाँ बदल जाती हैं। मगर वे खड़े रहते हैं—अपनी जड़ों में सदियों का मौन लिए। मेरे भीतर भी एक अक्षयवट है। मैं उसके नीचे अक्सर आकर बैठता हूँ। पहले मुझे लगता था कि प्रेम एक फूल है—सुन्दर, सुगन्धित और क्षणभंगुर। फिर लगा, वह एक ऋतु है। उसके बाद लगा, वह एक नदी है। लेकिन अब कभी-कभी महसूस होता है कि वह एक वृक्ष था। एक ऐसा वृक्ष जिसकी छाया का एहसास उसके चले जाने के बाद हुआ। जब वह थी, तब मैं उसके साथ बिताए हुए समय को देखता था। जब वह नहीं रही, तब मैंने जाना कि उसने मेरे भीतर कितनी जड़ें छोड़ दी हैं। अक्षयवट की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि वह पुराना है। उसकी विशेषता यह है कि वह टिके रहना जानता है। आँधियों के बाद। बाढ़ों के बाद। सूखे के बाद। वह हर बार अपने भीतर से जीवन निकाल लेता है। शायद स्मृतियाँ भी ऐसी ही होती हैं। वे हमें बाँधती नहीं, सहारा देती हैं। यदि हम उन्हें पकड़कर न बैठ जाएँ। मैं ...

शब्दयात्री : अस्वप्नाः

 शब्दयात्री : अस्वप्नाः कुछ लोग रात में सोते हैं। कुछ लोग सपने देखते हैं। और कुछ ऐसे भी होते हैं जो दोनों के बीच कहीं ठहरे रहते हैं। मैंने अथर्ववेद में एक शब्द पढ़ा था— अस्वप्नाः । वे जो सोते नहीं। या यूँ कहिए, वे जो सजग रहते हैं। जो पहरा देते हैं। जो अन्धकार के बीच भी अपनी चेतना की लौ बुझने नहीं देते। उसके जाने के बाद कई रातें ऐसी आईं जब नींद तो आई, पर विश्राम नहीं आया। आँखें बन्द थीं, लेकिन भीतर कोई जाग रहा था। कोई चुपचाप मेरी स्मृतियों के द्वार पर बैठा हुआ था। पहले मुझे लगता था कि वह बेचैनी है। फिर समझ में आया कि वह एक प्रकार की रखवाली थी। मेरे भीतर जो कुछ सचमुच मूल्यवान था—कुछ प्रेम, कुछ करुणा, कुछ प्रतीक्षा, कुछ शब्द—उनके पास कोई अस्वप्न प्रहरी बैठा था। वह मुझे टूटने नहीं देता था। वह मुझे भूलने भी नहीं देता था। और शायद पूरी तरह डूबने भी नहीं देता था। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि मनुष्य को जीवन में कुछ अस्वप्न क्षण अवश्य मिलने चाहिए। ऐसे क्षण, जब वह संसार के शोर से अलग होकर अपने भीतर के मौन को सुन सके। जहाँ न स्वप्न हों, न भ्रम। केवल जागरूकत...