दर्शन —कश्मीर शैव (त्रिक) दर्शन - भाग–1 : पाशुपत से कश्मीर शैव तक
कश्मीर शैव ( त्रिक ) दर्शन — चेतना , स्पन्द , प्रत्यभिज्ञा , शिवाद्वैत और मानव - अनुभव का समग्र दार्शनिक अध्ययन दर्शन — भाग –1 : पाशुपत से कश्मीर शैव तक — एक नये शैव दर्शन की आवश्यकता क्यों पड़ी ? भारतीय दर्शन के इतिहास में ऐसे अनेक अवसर आए जब किसी नई दार्शनिक परम्परा का उदय केवल इसलिए नहीं हुआ कि पुराने मत असत्य सिद्ध हो गए थे , बल्कि इसलिए कि मनुष्य के सामने नए दार्शनिक प्रश्न उपस्थित हो चुके थे। एक दर्शन अपने समय की जिज्ञासाओं का समाधान देता है , परन्तु समय बदलने पर नई समस्याएँ जन्म लेती हैं और तब एक नया दार्शनिक दृष्टिकोण विकसित होता है। कश्मीर शैव दर्शन का उदय भी इसी प्रकार समझा जाना चाहिए। यह पाशुपत परम्परा का विरोध नहीं है , बल्कि उसके बाद विकसित हुई चेतना - केंद्रित दार्शनिक यात्रा का स्वाभाविक और परिपक्व चरण है। प्रश्न यह नहीं है कि पाशुपत दर्शन में क्या कमी थी। वास्तविक प्रश्न यह है कि जब पाशुपत दर्शन अनेक शताब्दियों तक प्रभा...