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Sunday, 24 May 2026

मेरे कमरे की सारी किताबें धीरे-धीरे फुसफुसाने लगीं।

 एक रात

मेरे कमरे की सारी किताबें
धीरे-धीरे फुसफुसाने लगीं।

पहले
आवाज़ बहुत हल्की थी,
जैसे काग़ज़
नींद में करवट ले रहे हों।

फिर अचानक
पूरा कमरा
धीमी बातचीतों से भर गया।

पुरानी कविताओं की किताबें
सबसे उदास स्वर में बोल रही थीं।

उपन्यास
लम्बी साँसें लेते थे,
और शब्दकोश
बार-बार
अपने भीतर खोए हुए अर्थ खोजते रहते।

मैं बिस्तर पर बैठा
सुनता रहा।

एक किताब कह रही थी :

“मनुष्य अब
हमें पढ़ता कम है,
सजाता ज़्यादा है।”

दूसरी ने बहुत थकी आवाज़ में कहा :

“लोग अब
पूरा दुःख नहीं पढ़ पाते।
वे बीच में ही
मोबाइल देखने लगते हैं।”

एक बहुत पुरानी डायरी
लगातार काँप रही थी।

उसके पन्नों में
दबी हुई स्याही
जैसे अब भी
किसी का इंतज़ार कर रही थी।

अचानक
ऊपरी शेल्फ़ से
एक पतली-सी किताब नीचे गिरी।

उसके पन्ने खुल गए।

लेकिन उनमें
एक भी शब्द नहीं था।

सिर्फ़ खाली सफ़े।

मैंने उसे उठाया।

किताब गर्म थी,
जैसे अभी-अभी
किसी ने उसे पढ़ा हो।

मैंने कान लगाया।

अंदर से
बहुत धीमी आवाज़ आई :

“शब्द चले जाते हैं।
लेकिन जो सचमुच पढ़ लिया गया हो,
वह खालीपन बनकर रह जाता है।”

उस क्षण
कमरे की सारी फुसफुसाहट बन्द हो गई।

घड़ी की टिक-टिक लौट आई।
बाहर से
दूर जाती किसी मोटर की आवाज़ आई।

सब कुछ सामान्य था।

सिर्फ़ मेरी मेज़ पर
वह खाली किताब अब भी खुली पड़ी थी।

और अजीब बात 

जितनी देर मैं उसे देखता रहा,
उतना ही
मुझे लगता गया
कि उसके सफ़ेद पन्नों पर
धीरे-धीरे
मेरा अपना जीवन उभर रहा है।

— मुकेश

एक दिन मेरी किताब के सारे शब्द हवा में उड़ने लगे।

 एक दिन

मेरी किताब के सारे शब्द
हवा में उड़ने लगे।

पहले
मुझे लगा
यह सिर्फ़ थकान है,
या देर रात तक जागने का असर।

लेकिन फिर
मैंने साफ़ देखा —

एक-एक करके
शब्द पन्नों से उठ रहे थे।

बहुत हल्के,
जैसे किसी पुराने पेड़ से
सूखे पत्ते टूटते हैं।

“प्रेम”
सबसे पहले उड़ा।

वह कुछ देर
कमरे में चक्कर लगाता रहा,
फिर अचानक
एक अजीब-सी खुशबू में बदल गया।

कमरे में
भीगी मिट्टी,
पुरानी चिट्ठियों
और किसी भूले हुए आलिंगन की
मिली-जुली गन्ध भर गई।

“दुःख”
धीरे-धीरे खिड़की की ओर गया।

वहाँ से आती धूप में
वह घुलने लगा,
और कुछ क्षणों बाद
सिर्फ़ हल्की चमक बची।

ऐसा लगा
जैसे रोशनी भी
कभी-कभी
किसी टूटे हुए शब्द का दूसरा रूप होती है।

कुछ शब्द
बहुत बेचैन थे।

वे कमरे में
ऊपर-नीचे तैरते रहे,
जैसे उन्हें तय न हो
कि अर्थ में रहना है
या शून्य में।

“घर”
काफ़ी देर तक
पंखे के पास मंडराता रहा।

“माँ”
धीरे से मेज़ पर आ बैठा
और फिर
इतना हल्का हो गया
कि दिखाई देना बन्द हो गया।

“अकेलापन”
कमरे से बाहर चला गया।

मैंने उसे
गलियारे में,
सीढ़ियों पर,
यहाँ तक कि सड़क तक जाते देखा।

उसके पीछे
थोड़ी ठंडक छूटती जा रही थी।

कुछ शब्द
बहुत दूर उड़ गए।

इतने दूर
कि शायद अब
किसी दूसरे शहर,
दूसरी भाषा,
या किसी अजन्मे आदमी के सपनों में होंगे।

और कुछ का
कभी पता ही नहीं चला।

मैंने उन्हें बहुत खोजा।

पुरानी दराज़ों में,
तकियों के नीचे,
किताबों की जिल्दों में,
यहाँ तक कि
अपनी ही आवाज़ में।

लेकिन वे
जैसे दुनिया से नहीं,
अस्तित्व से गायब हो गए थे।

धीरे-धीरे
पूरा कमरा खाली हो गया।

पन्नों पर
अब सिर्फ़ सफ़ेदी बची थी।

एक भयावह,
निर्दोष,
शांत सफ़ेदी।

मैं उन खाली पन्नों को लिये
बहुत देर तक
वहीं बैठा रहा।

बाहर
शाम उतर रही थी।

खिड़की से आती हवा
अब भी
पन्नों को हिला रही थी,
जैसे उनमें
कुछ लिखा हो।

और तभी
मुझे पहली बार समझ में आया —

शब्द
कभी हमारे नहीं होते।

हम सिर्फ़ कुछ समय के लिए
उन्हें अपने भीतर ठहरने देते हैं।

फिर एक दिन
वे लौट जाते हैं 

खुशबू बनकर,
रोशनी बनकर,
मौन बनकर,
या किसी ऐसी जगह
जहाँ तक
लेखक की पहुँच नहीं होती।

उस रात
मैंने किताब बन्द नहीं की।

मैं देर तक
उन खाली पन्नों को देखता रहा,
और अजीब बात —

जितने अधिक वे खाली होते जा रहे थे,
उतना ही
मुझे लग रहा था
कि उनमें
कुछ बहुत गहरा लिखा है।

— मुकेश

दुनिया की सभी घड़ियाँ एक साथ सिर्फ़ तीन मिनट के लिए रुक गईं।

 सन् 2084 में

दुनिया की सभी घड़ियाँ
एक साथ
सिर्फ़ तीन मिनट के लिए रुक गईं।

कोई नहीं जानता
यह कैसे हुआ।

न परमाणु युद्ध,
न सौर तूफ़ान,
न किसी हैकर का हमला।

बस अचानक —

टिक-टिक बन्द।

ट्रेनें चलती रहीं,
हवाई जहाज़ हवा में रहे,
लोग बोलते रहे,
लेकिन समय
मानो अपनी कुर्सी छोड़कर
कहीं चला गया हो।

पहले मिनट में
लोगों ने घबराकर
मोबाइल देखे।

दूसरे मिनट में
कुछ अजीब होने लगा।

एक आदमी
जो वर्षों से
अपने भाई से बात नहीं कर रहा था,
अचानक रो पड़ा।

एक स्त्री
ऑपरेशन थिएटर में
अपने मृत बेटे का चेहरा देखने लगी।

जेलों में बन्द कैदियों को
अपने बचपन की गन्ध आने लगी।

और दुनिया भर के होटल कमरों में
सो रहे लोग
एक ही सपना देखने लगे :

एक विशाल मैदान,
जहाँ कोई आवाज़ नहीं थी,
सिर्फ़ हवा
और दूर खड़ा
एक दरवाज़ा।

तीसरे मिनट तक
स्थिति और विचित्र हो गई।

कुछ लोगों ने दावा किया
कि उन्होंने
अपने शरीर के बाहर से
खुद को देखा।

कुछ ने कहा
कि उन्हें पहली बार
समझ में आया
कि वे वास्तव में किससे प्रेम करते हैं।

और कुछ इतने भयभीत हुए
कि समय लौटने के बाद भी
उन्होंने घड़ियाँ पहनना छोड़ दिया।

फिर अचानक
सब कुछ सामान्य हो गया।

टिक-टिक वापस।
रेलें समय पर।
समाचार चैनल सक्रिय।

सरकारों ने बयान जारी किए।
वैज्ञानिकों ने सम्मेलन किए।
धर्मगुरुओं ने भविष्यवाणियाँ।

लेकिन असली परिवर्तन
चुपचाप हुआ।

उस घटना के बाद
पूरी दुनिया में
लोगों ने
धीरे बोलना शुरू कर दिया।

तलाक कम हुए।
आत्महत्याएँ कुछ घट गईं।
और रात के तीन बजे
बहुत से लोग
अचानक उठकर
खिड़की के बाहर देखने लगे।

जैसे उन्हें
अब भी इंतज़ार हो
कि समय
कभी भी फिर से
अपनी कुर्सी छोड़ सकता है।

— मुकेश

जब पृथ्वी पर आख़िरी दर्ज़ी मरा,

 जब पृथ्वी पर

आख़िरी दर्ज़ी मरा,

उस दिन
कई देशों के झंडे
धीरे-धीरे उधड़ने लगे।

लोगों ने पहले ध्यान नहीं दिया।

उन्हें लगा
यह सिर्फ़ कपड़े का घिस जाना है।

लेकिन कुछ ही महीनों में
सीमाओं के किनारे से धागे निकलने लगे,
राष्ट्रगान गाते समय
लोग शब्द भूलने लगे,
और सैनिकों की वर्दियों पर
सिले हुए चिन्ह
रातों-रात गायब होने लगे।

संयुक्त राष्ट्र ने
आपात बैठक बुलाई।

वैज्ञानिकों ने कहा :
“यह राजनीतिक समस्या नहीं है।”

इतिहासकार बोले :
“सभ्यताएँ पहले भी टूटती रही हैं।”

लेकिन एक बहुत बूढ़ी स्त्री,
जो जीवन भर
कपड़े रफ़ू करती रही थी,
धीरे से बोली :

“नहीं।
दुनिया से सिलाई की कला खत्म हो रही है।”

उसकी बात पर
लोग हँसे।

लेकिन उसी रात
पूरी दुनिया में
अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।

टूटे हुए रिश्ते
अब वापस नहीं जुड़ते थे।

माफ़ियाँ
घावों पर टिकती नहीं थीं।

माएँ
बच्चों के फटे कपड़े तो सी देतीं,
लेकिन उनके डर नहीं।

प्रेमी
एक-दूसरे को छूते,
और उनके बीच
बहुत महीन दरारें महसूस होतीं।

यहाँ तक कि
भाषाएँ भी उधड़ने लगीं।

कविताओं से
क्रियाएँ गिरने लगीं,
प्रार्थनाओं से विश्वास,
और भाषणों से अर्थ।

दुनिया
धीरे-धीरे
एक ऐसे कपड़े में बदल रही थी
जिसकी बुनावट खुलती जा रही हो।

तब लोगों ने
दर्ज़ियों को खोजने की कोशिश की।

लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

आख़िरी दर्ज़ी
पहले ही मर चुका था,
और अपने साथ
वह यह रहस्य भी ले गया था
कि दो टूटती हुई चीज़ों को
धैर्य से
फिर से कैसे जोड़ा जाता है।

अब
रातों में
पूरा ग्रह
हल्की-हल्की चरमराहट करता है।

जैसे ब्रह्मांड के अँधेरे में
कहीं कोई पुराना वस्त्र
धीरे-धीरे फट रहा हो।

— मुकेश

मेरे शहर में एक आदमी रहता था

 मेरे शहर में

एक आदमी रहता था
जो टूटे हुए सपनों से
छतरियाँ बनाता था।

उसकी दुकान
रेलवे पुल के नीचे थी,
जहाँ हमेशा
थोड़ी-सी नमी रहती थी
और लोहे की गन्ध आती थी।

लोग उसके पास
पुराने सपने लेकर आते 

किसी का सपना था
गायक बनने का,
जो अब सरकारी दफ़्तर में फाइलें ढो रहा था।

किसी ने
समुद्र देखने का सपना
तीन बच्चों और एक बीमार पिता के बीच
कहीं रखकर भूल दिया था।

एक औरत आई
जिसका सपना था
कि कोई उसे
उसके असली नाम से पुकारे।

वह आदमी
बहुत ध्यान से
उन सपनों को खोलता,
उनकी सिलाइयाँ देखता,
और फिर उनसे
छतरियाँ बनाने लगता।

अजीब बात थी —
उन छतरियों के नीचे
बारिश कम लगती थी।

जो लोग उन्हें लेकर चलते,
वे थोड़ा हल्का महसूस करते।

एक लड़के ने कहा
कि उस छतरी के नीचे
उसे पहली बार लगा
कि असफलता भी
पूरी तरह बदसूरत चीज़ नहीं होती।

धीरे-धीरे
पूरा शहर
उसी की छतरियों से भर गया।

सड़कों पर चलते लोग
ऊपर से सामान्य दिखते थे,
लेकिन उनके सिरों के ऊपर
किसी न किसी टूटे हुए सपने की परछाईं खुली रहती।

फिर एक साल
बारिश बिल्कुल नहीं हुई।

लोगों ने छतरियाँ खोलना बन्द कर दिया।

वे अलमारियों में पड़ी रहीं,
धीरे-धीरे धूल जमा करती हुईं।

लेकिन आश्चर्य 

उस वर्ष
शहर में सबसे अधिक लोग बीमार पड़े।

डॉक्टरों ने कहा
हवा में कोई अजीब सूखापन है।

तब पहली बार
लोगों को समझ आया

कि मनुष्य
सिर्फ़ रोटी और पानी से नहीं बचता,
उसे थोड़ी-सी नमी
अपने टूटे हुए सपनों की भी चाहिए।

— मुकेश

एक पाठक ने कहा “आपकी कहानियों में बहुत कम घटनाएँ होती हैं।”

 एक पाठक ने कहा 

“आपकी कहानियों में
बहुत कम घटनाएँ होती हैं।”

मैं मुस्कुरा दिया।

उसे कैसे समझाता
कि मनुष्य की सबसे बड़ी घटनाएँ
अक्सर बाहर नहीं घटतीं।

वे भीतर होती हैं —
इतनी चुपचाप
कि पास बैठा व्यक्ति भी
उन्हें सुन नहीं पाता।

एक आदमी
अचानक
अपने पिता जैसा बोलने लगता है।

एक स्त्री
बरसों बाद
किसी पुराने गीत से टूट जाती है।

कोई
भीड़ भरी सड़क पार करते हुए
अचानक महसूस करता है
कि अब वह पहले वाला व्यक्ति नहीं रहा।

ये छोटी बातें लगती हैं,
लेकिन यहीं
मनुष्य बदलता है।

युद्ध, दुर्घटनाएँ, प्रेम, बिछड़न 
ये सब बाद की चीज़ें हैं।

असल घटना तो वह क्षण है
जब भीतर
कोई विश्वास चुपचाप मरता है,
या कोई नई संवेदना
पहली बार आँख खोलती है।

मैं उन्हीं क्षणों को लिखता हूँ।

इसलिए मेरी कहानियों में
कई बार
लोग सिर्फ़ बैठे रहते हैं,
खिड़की से बाहर देखते हैं,
चाय पीते हैं,
या देर तक कुछ नहीं कहते।

क्योंकि मनुष्य
सबसे अधिक
उसी समय घटित हो रहा होता है
जब बाहर से
कुछ भी घटता हुआ नहीं दिखता।

और शायद
जीवन भी
कोई तेज़ उपन्यास नहीं,

बल्कि एक धीमी-सी बारिश है
जो वर्षों तक
भीतर गिरती रहती है।

— मुकेश

एक पाठक ने मुझसे पूछा

 एक पाठक ने मुझसे पूछा —

“आप अपनी कहानियों में
पात्रों के नाम क्यों नहीं लिखते?”

मैं कुछ देर चुप रहा।

कैसे बताता उसे
कि नाम देते ही
दुःख छोटा हो जाता है।

वह किसी एक आदमी का दुःख बन जाता है,
किसी एक स्त्री की प्रतीक्षा,
किसी एक घर की चुप्पी।

जबकि मैंने जो दुःख देखे हैं,
वे इतने व्यक्तिगत नहीं थे।

वे बस दुःख थे।

बारिश की तरह
जो यह नहीं चुनती
कि किस छत पर गिरेगी।

मैंने स्टेशन पर रोते हुए लोगों को देखा है,
अस्पतालों में
धीरे-धीरे बुझती आँखें देखी हैं,
रात के आख़िरी पहर
खाली रसोई में बैठे आदमी देखे हैं।

उन सबके चेहरे अलग थे,
लेकिन भीतर की थकान
लगभग एक जैसी।

इसलिए
मैं नाम हटा देता हूँ।

ताकि कहानी
किसी एक की न रह जाए।

ताकि पढ़ते समय
हर आदमी को लगे —
“यह थोड़ा-सा मेरे बारे में भी है।”

सुख के साथ भी
कुछ ऐसा ही है।

एक बच्चा
बरसात में भीगकर हँसता है,
एक बूढ़ी स्त्री
सर्दियों की धूप में बैठी चुप रहती है,
कोई प्रेम में
पहली बार अपना नाम
दूसरे की आवाज़ में सुनता है।

ये सुख
किसी एक के नहीं होते।

वे मनुष्य के पुराने अनुभव हैं,
जो बार-बार
अलग शरीरों में जन्म लेते रहते हैं।

इसलिए
मेरी कहानियों में
कई बार कोई पात्र नहीं होता।

सिर्फ़ एक कमरा होता है,
एक मौसम,
एक आवाज़,
एक प्रतीक्षा,
या भीतर लगातार गिरती हुई
कोई अदृश्य चीज़।

धीरे-धीरे
भाव ही पात्र बन जाते हैं।

और शायद
साहित्य का सबसे सच्चा क्षण वही है
जब मनुष्य
अपना नाम भूलकर भी
अपने को पहचान लेता है।

— मुकेश