महाभारत — विराटपर्व — समेकित शोध-निष्कर्ष : पहचान से पुनर्स्थापना तक
महाभारत — विराटपर्व — समेकित शोध-निष्कर्ष : पहचान से पुनर्स्थापना तक विराटपर्व महाभारत का चौथा पर्व है। कथा की दृष्टि से यह वनपर्व के बाद आने वाला अपेक्षाकृत छोटा पर्व है, किन्तु महाभारत की सम्पूर्ण संरचना में इसका स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यहाँ पाण्डवों के जीवन में एक ऐसी अवस्था आती है जिसमें उनसे उनका राज्य पहले ही छिन चुका है, वनवास समाप्त हो चुका है और अब उन्हें अपने अस्तित्व को ही एक वर्ष के लिए सार्वजनिक संसार से छिपाना है। इसीलिए विराटपर्व को केवल अज्ञातवास का पर्व कहना पर्याप्त नहीं है। यह वास्तव में पहचान, शक्ति, संयम, मर्यादा और राजनीतिक पुनर्स्थापना का पर्व है। वनपर्व ने पाण्डवों को बाहरी सत्ता से दूर करके उनके व्यक्तित्व का पुनर्निर्माण किया था। विराटपर्व में उसी व्यक्तित्व की परीक्षा होती है—क्या राज्य, राजसी वस्त्र, अस्त्र और नाम के बिना भी व्यक्ति वही रहता है? महाभारत का उत्तर स्पष्ट है—हाँ। युधिष्ठिर कंक बन जाते हैं, भीम वल्लभ, अर्जुन बृहन्नला, नकुल अश्वपाल, सहदेव गोपाल और द्रौपदी सैरन्ध्री। उनके नाम बदल जाते हैं, उनके कार्य बदल जाते हैं, उनका सामाजिक स्थान ...