भगवद्गीता प्रथम अध्याय, अष्टादश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन
भगवद्गीता प्रथम अध्याय, अष्टादश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन मूल श्लोक द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् ॥ १.१८ ॥ अन्वय हे पृथिवीपते! द्रुपदः, द्रौपदेयाः च, महाबाहुः सौभद्रः च, सर्वशः पृथक् पृथक् शङ्खान् दध्मुः। सामान्य हिन्दी अर्थ हे राजन्! द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र तथा महाबाहु अभिमन्यु ने भी अपने-अपने शंख अलग-अलग बजाए। भूमिका : अब भविष्य बोल रहा है अब तक जिन योद्धाओं का वर्णन हुआ, वे अनुभवी थे। भीष्म द्रोण विराट सात्यकि धृष्टद्युम्न इन सबके पीछे अनुभव का विशाल संसार था। किन्तु इस श्लोक में व्यास अचानक तीन पीढ़ियों को एक साथ खड़ा कर देते हैं— द्रुपद (पुरानी पीढ़ी) द्रौपदेय (नई पीढ़ी) अभिमन्यु (भविष्य की पीढ़ी) यह केवल सैनिकों की सूची नहीं है। यह समय की तीन धाराओं का संगम है। अतीत। वर्तमान। भविष्य। और तीनों धर्म के पक्ष में खड़े हैं। 1. "द्रुपदः" — अपमान से जागी चेतना द्रुपद का जीवन महाभारत की एक गहरी शिक्षा है। वे द्रोणाचार्य के मित्र थे। फिर परिस्थितियाँ बदलीं। मित्रता शत्रुता में बदल गई। अपमान...