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महाभारत - अध्याय 1.4 आख्यान, इतिहास, धर्म और दर्शन का सह-अस्तित्व

 अध्याय 1.4 आख्यान, इतिहास, धर्म और दर्शन का सह-अस्तित्व एक ग्रंथ—इतने सारे रूप? महाभारत को पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात विस्मित करती है, वह उसका आकार नहीं, बल्कि उसका स्वरूप है। एक ही ग्रंथ में हमें युद्ध की कथा मिलती है और उसके साथ वंशावली भी। राजाओं और राज्यों का वर्णन मिलता है तो ऋषियों के संवाद भी। राजनीतिक संघर्ष है तो धर्म का प्रश्न भी। युद्धनीति है तो मोक्ष का विवेचन भी। कथा है तो दर्शन भी। तब स्वाभाविक प्रश्न उठता है—  आखिर महाभारत है क्या? क्या यह इतिहास है?  क्या यह महाकाव्य है? क्या यह धर्मग्रंथ है? क्या यह आख्यान-संग्रह है? क्या यह दर्शनग्रंथ है? या फिर इनमें से प्रत्येक शब्द महाभारत के केवल एक पक्ष को पकड़ता है, जबकि उसका वास्तविक स्वरूप इन सबके सह-अस्तित्व में है? यही प्रश्न इस उपाध्याय का केंद्र है। आधुनिक श्रेणियों की सीमा आधुनिक अकादमिक जगत में हम ज्ञान को अलग-अलग विषयों में बाँटते हैं— इतिहास, साहित्य, धर्म, दर्शन,  राजनीति, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान। इस विभाजन से अध्ययन सुविधाजनक होता है। लेकिन प्राचीन भारतीय ग्रंथों को पढ़ते समय यही विभाजन कभी-कभी ...

महाभारत - अध्याय 1.3 महाभारत का आकार : एक ग्रंथ या विकसित होता हुआ ग्रंथ-संसार?

  अध्याय 1.3 महाभारत का आकार : एक ग्रंथ या विकसित होता हुआ ग्रंथ-संसार? प्रश्न की शुरुआत : “महाभारत कितना बड़ा है?” जब हम कहते हैं कि महाभारत संसार के सबसे बड़े महाकाव्यात्मक ग्रंथों में से एक है , तो सामान्यतः हमारे मन में उसकी प्रसिद्ध संख्या आती है—  लगभग एक लाख श्लोक। परंतु शोध की दृष्टि से यह उत्तर पर्याप्त नहीं है। क्योंकि यहाँ पहला प्रश्न यह होना चाहिए—  एक लाख श्लोक किस पाठ में? और उससे भी पहले—  हम “महाभारत” से किस पाठ को समझ रहे हैं? यदि किसी आधुनिक पुस्तक की निश्चित मुद्रित प्रति हो, तो उसके पृष्ठों और शब्दों की संख्या बताना सरल है। लेकिन महाभारत का इतिहास किसी आधुनिक लेखक द्वारा एक समय में लिखी गई पुस्तक का इतिहास नहीं है। यह एक दीर्घ पाठ-परंपरा है। इसलिए “महाभारत का आकार” पूछना वास्तव में तीन प्रश्न पूछना है— परंपरा महाभारत के आकार के बारे में क्या कहती है? उपलब्ध पाठ हमें क्या बताते हैं? इन दोनों के बीच संबंध को कैसे समझा जाए? यहीं से “महाभारत” एक पुस्तक से बढ़कर ग्रंथ-संसार दिखाई देने लगता है। एक लाख श्लोक : परंपरा की प्रसिद्ध धारणा महाभारत की प्रसिद...

महाभारत - अध्याय 1.2 जय → भारत → महाभारत : ग्रंथ के विस्तार की परंपरा

  अध्याय 1.2 जय → भारत → महाभारत : ग्रंथ के विस्तार की परंपरा 1. प्रश्न : क्या महाभारत आरम्भ से ही “महाभारत” था? महाभारत को आज हम जिस विशाल रूप में जानते हैं, वह लगभग एक लाख श्लोकों वाला, अठारह पर्वों में विभक्त, असंख्य आख्यानों, उपाख्यानों, संवादों, धर्मचर्चाओं, राजधर्म, मोक्षधर्म, नीति, तीर्थ, वंशावली, युद्ध और दर्शन से भरा हुआ ग्रंथ है। लेकिन भारतीय परंपरा स्वयं हमें संकेत देती है कि इस विशाल ग्रंथ को उसकी वर्तमान व्यापकता में समझने से पहले उसके एक संक्षिप्ततर मूल आख्यान की कल्पना की जाती रही है। यही वह स्थान है जहाँ तीन नाम सामने आते हैं—  जय → भारत → महाभारत इन तीनों को यदि केवल तीन पर्यायवाची नाम मान लिया जाए, तो इस परंपरा का गहरा अर्थ छूट जाता है। और यदि इन्हें आधुनिक अर्थ में तीन निश्चित, स्वतंत्र, ऐतिहासिक संस्करण घोषित कर दिया जाए, तो भी हम प्रमाण से आगे निकल जाते हैं। अतः अधिक सावधान दृष्टि यह होगी कि— “जय → भारत → महाभारत” को महाभारत-परंपरा द्वारा अपने ही विकास और विस्तार को समझाने के लिए निर्मित अथवा संरक्षित एक पारंपरिक मॉडल के रूप में पढ़ा जाए। यह मॉडल हमें बता...

महाभारत - अध्याय 1.1 महाभारत नाम का अर्थ और उसकी परंपरा

  अध्याय 1.1 महाभारत नाम का अर्थ और उसकी परंपरा प्रश्न की शुरुआत : “महाभारत” नाम आखिर कहता क्या है? “महाभारत” शब्द को देखते ही सामान्यतः हमारे सामने एक विशाल युद्ध, कुरुक्षेत्र, पाण्डव और कौरव, श्रीकृष्ण और अठारह अक्षौहिणी सेनाओं का चित्र उभरता है। लेकिन शोध की दृष्टि से पहली सावधानी यही है कि महाभारत को उसके युद्ध से नहीं, उसके नाम से पढ़ना आरम्भ किया जाए। क्योंकि किसी ग्रंथ का नाम केवल उसका परिचय नहीं देता; अनेक बार वह उस ग्रंथ की परंपरागत आत्म-समझ का संकेत भी होता है। “महाभारत” दो पदों से बना है—  महा + भारत “महा” का सामान्य अर्थ है—बड़ा, महान, विस्तृत, श्रेष्ठ, गंभीर या असाधारण। “भारत” के अर्थ-क्षेत्र में एक ओर भरतवंश , दूसरी ओर भरत नामक परंपरा , और आगे चलकर भारतवर्ष तथा उससे संबंधित सांस्कृतिक-सामाजिक संसार की धारणाएँ आती हैं। इसलिए “महाभारत” का पहला सहज अर्थ होगा—  महान भारत का आख्यान। लेकिन यहीं रुक जाना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि स्वयं महाभारत की परंपरा इस नाम को केवल “भरतवंश की बड़ी कथा” के अर्थ में नहीं रखती। आदिपर्व के अनुक्रमणिका-प्रसंग में एक प्रसिद्ध आत्म-नि...

थोड़ा सा ठहरना

 थोड़ा सा ठहरना हर जगह पहुँचने की जल्दी में हमने यह देखना छोड़ दिया कि जाना कहाँ है। हर किसी को पीछे छोड़ते हुए एक दिन अपने ही पीछे रह गए। अब लगता है कुछ रास्ते चलने के लिए नहीं होते, सिर्फ़ यह समझने के लिए होते हैं कि हमें वहाँ नहीं जाना। थोड़ा सा ठहरना भी ज़रूरी है। क्योंकि कभी-कभी उत्तर रास्ते में नहीं, उस क्षण में मिलता है जब हम चलना बंद कर देते हैं। — मुकेश

सुबह निकलो तो

  सुबह निकलो तो चेहरे पर थोड़ी-सी सफलता लगाकर निकलो। थकान घर पर छोड़ दो— उसे देखकर कौन प्रभावित होगा? ऑफिस पहुँचो तो मुस्कुराओ भले ही भीतर कोई रोज़ इस्तीफ़ा लिख रहा हो। बॉस के सामने विचार रखो मगर इतने ही कि उनके विचारों से टकराएँ नहीं। दोस्त से मिलो तो पूछो— “सब बढ़िया?” और उसके जवाब का इंतज़ार मत करो। सोशल मीडिया पर एक तस्वीर डालो जिसमें तुम मुस्कुरा रहे हो। लोग समझेंगे तुम सुखी हो। शाम को लौटो तो आईने के सामने कुछ देर खड़े रहो। देखो— चेहरा वही है जिसे सुबह लेकर निकले थे? अगर हाँ, तो समझो तुमने आज भी शहर में आदमी होने की परीक्षा पास कर ली। और अगर चेहरा बदल गया हो— तो उसे जल्दी से धो लेना। कल फिर काम पर जाना है।

तुम्हारे हिस्से की ख़ामोशी

   तुम्हारे हिस्से की ख़ामोशी कुछ रिश्ते शायद इसलिए ख़ूबसूरत रहते हैं कि उनमें सब कुछ कह दिया नहीं जाता। हमारे बीच भी न जाने कब एक ऐसी ख़ामोशी आकर ठहर गई, जिसमें शब्दों से ज़्यादा मतलब था। तुम मिलती हो तो बहुत सहज होकर अपने दिन की छोटी-बड़ी बातें बताती हो—किसी किताब का ज़िक्र, किसी पुराने गीत की याद, रास्ते में देखी कोई मामूली-सी बात। मैं सुनता रहता हूँ और हैरत से सोचता हूँ कि तुम्हारी इन मामूली बातों में भी मेरे लिए इतना कुछ क्यों छुपा रहता है। समय बीत रहा है। हम दोनों बदल रहे हैं। चेहरे पर उम्र की बहुत हल्की-सी परछाइयाँ उतर आई हैं, मगर तुम्हें देखने की मेरी आदत जाने क्यों वैसी ही नहीं रही—वह हर दिन थोड़ी और गहरी होती गई है। पहले तुम्हारा इंतज़ार करता था, अब तुम्हारी मौजूदगी के बाद की ख़ामोशी भी याद आती है। तुम कभी-कभी बहुत क़रीब आकर कोई बात कहती हो, फिर अचानक किसी और विषय पर चली जाती हो। मुझे मालूम है, उस अधूरे वाक्य में कुछ और भी था। मगर मैं उसे पूरा करने की कोशिश नहीं करता। शायद तुम्हारी आँखों का वह ठहराव, तुम्हारे होंठों पर आकर लौट जाने वाला वह लफ़्ज़—उसे सुन लेने से ज़्य...

दो आत्माओं के बीच का मौन

    दो आत्माओं के बीच का मौन तुम्हारे बिना पहला दिन प्रेम का पता तब चलता है, जब कोई सामने नहीं होता। उपस्थिति में तो सब कुछ सहज लगता है। लेकिन अनुपस्थिति... मनुष्य को उसके अपने भीतर ले जाती है। वह शहर से बाहर गई थी। केवल तीन दिनों के लिए। सिर्फ़ तीन दिन। इतने छोटे, कि कैलेंडर पर उन्हें देखकर कोई भी कह सकता था "यह तो कुछ भी नहीं।" लेकिन प्रेम में समय घड़ी से नहीं चलता। वह प्रतीक्षा से चलता है। पहली सुबह मैंने सहजता से फ़ोन उठाया। फिर याद आया— आज उसका कोई संदेश नहीं आएगा। मैंने फ़ोन वापस रख दिया। कुछ देर बाद फिर उठा लिया। फिर वापस रख दिया। मनुष्य अपने भीतर कितनी छोटी-छोटी आदतें बना लेता है, उसे तब पता चलता है, जब वे अचानक अनुपस्थित हो जाती हैं। नाश्ते की मेज़ पर चाय रखी थी। मैंने कप उठाया। एक घूँट लिया। फिर अनायास मुस्कुरा दिया। वह हमेशा कहती थी— *"तुम चाय को पीते नहीं हो... उसे धीरे-धीरे ख़त्म करते हो।"* मैंने कप को देखा। आज चाय कुछ अधिक कड़वी थी। शायद चीनी कम थी। या शायद... उसकी आवाज़ नहीं थी। दिन भर काम में मन लगाने की कोशिश की। किताब खोली। कुछ पंक्तियाँ पढ़ीं। फिर...