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Monday, 8 June 2026

उपनिषद सूचना नहीं, दृष्टि देते हैं

“उपनिषद सूचना नहीं, दृष्टि देते हैं” — यह वाक्य उपनिषदों की सम्पूर्ण शिक्षापद्धति का अत्यन्त सारगर्भित निरूपण है।

सूचना (Information) और दृष्टि (Vision) में मूलभूत अन्तर है। सूचना हमें किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना के बारे में तथ्य बताती है, जबकि दृष्टि हमें उस तथ्य के पीछे छिपे सत्य को देखने की क्षमता प्रदान करती है। सूचना स्मृति में रहती है, दृष्टि चेतना को परिवर्तित करती है।

उपनिषदों का उद्देश्य मनुष्य को केवल यह बताना नहीं है कि ब्रह्म क्या है, आत्मा क्या है, जगत क्या है; उनका प्रयोजन यह है कि साधक स्वयं उस सत्य का साक्षात्कार करे। इसीलिए उपनिषद बार-बार कहते हैं—

“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।”
(बृहदारण्यकोपनिषद्)

अर्थात् आत्मा के विषय में केवल सुनना पर्याप्त नहीं है; उसे देखना, समझना और अनुभव करना आवश्यक है।

यदि कोई व्यक्ति हजारों ग्रन्थ पढ़ ले कि अग्नि गर्म होती है, तो यह सूचना है। किन्तु जब वह अग्नि का स्पर्श करता है, तब उसे अग्नि का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। उपनिषद इसी प्रत्यक्षता की ओर ले जाते हैं। वे सिद्धान्तों का संग्रह नहीं, अनुभव की यात्रा हैं।

उदाहरण के लिए, “तत्त्वमसि” महावाक्य केवल एक दार्शनिक कथन नहीं है। यदि इसे सूचना की तरह लिया जाए, तो इसका अर्थ होगा—“तू वही है।” किन्तु उपनिषद चाहते हैं कि साधक अपने भीतर झाँककर उस एकत्व को अनुभव करे जहाँ जीव और ब्रह्म का भेद मिट जाता है। यही दृष्टि है।

आधुनिक शिक्षा का बड़ा भाग सूचना-केंद्रित है। विद्यार्थी बहुत कुछ जानता है, परन्तु जीवन को देखने की दृष्टि नहीं विकसित कर पाता। उपनिषद ज्ञान को केवल बौद्धिक संचय नहीं मानते; वे ज्ञान को चित्त की परिपक्वता और अस्तित्व की जागृति समझते हैं। इसलिए उपनिषदों में गुरु उत्तर कम देता है, प्रश्न अधिक जगाता है। वह शिष्य को तैयार उत्तर नहीं देता, बल्कि ऐसी दृष्टि देता है जिससे शिष्य स्वयं सत्य को देख सके।

ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मन्त्र इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। वहाँ ऋषि यह सूचना नहीं देते कि संसार में ईश्वर है; वे ऐसी दृष्टि देते हैं कि सम्पूर्ण जगत ही ईश्वर से आवृत दिखाई देने लगे—

“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”

यह एक विश्वदृष्टि (Worldview) है, मात्र सूचना नहीं।

इसी प्रकार केनोपनिषद् में जब पूछा जाता है—“मन किसके द्वारा प्रेरित होकर कार्य करता है?”—तो उपनिषद कोई यांत्रिक उत्तर नहीं देता। वह साधक को उस चेतना की ओर इंगित करता है जो मन, वाणी और इन्द्रियों के पीछे कार्यरत है। यहाँ लक्ष्य सूचना देना नहीं, दृष्टि बदलना है।

अतः कहा जा सकता है कि—

वेद ज्ञान का भण्डार हैं, पर उपनिषद उस ज्ञान को देखने की आँख हैं।
सूचना बुद्धि को भरती है, दृष्टि चेतना को बदलती है।
उपनिषद तथ्य नहीं, तत्त्व देते हैं; उत्तर नहीं, अनुभूति का मार्ग देते हैं।

यही कारण है कि उपनिषदों को पढ़ लेने से अधिक महत्त्वपूर्ण है उन्हें जीना। जब उपनिषद की शिक्षा जीवन-दृष्टि बन जाती है, तभी उसका वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होता है। तभी मनुष्य सूचना-संग्राहक से सत्य-द्रष्टा बनता है।

मुकेश ,



अमृतनादोपनिषद् : नाद-ब्रह्म और योग का उपनिषद्

अमृतनादोपनिषद् : नाद-ब्रह्म और योग का उपनिषद्

उपनिषद् साहित्य भारतीय ज्ञान-परम्परा का वह शिखर है जहाँ मनुष्य बाह्य जगत् से भीतर की यात्रा आरम्भ करता है। यदि ईश, केन, कठ और माण्डूक्य उपनिषद् ब्रह्मविद्या के महान् स्तम्भ हैं, तो योगोपनिषद् उस ब्रह्मविद्या को अनुभव में परिणत करने वाले साधना-ग्रन्थ हैं। इन्हीं योगोपनिषदों में अमृतनादोपनिषद् (Amṛtanāda Upaniṣad) का विशिष्ट स्थान है।

"अमृतनाद" शब्द दो पदों से बना है— अमृत अर्थात् अमरत्व अथवा मोक्ष, और नाद अर्थात् दिव्य ध्वनि या मूल स्पन्दन। इस प्रकार अमृतनादोपनिषद् उस दिव्य नाद की साधना का ग्रन्थ है जिसके माध्यम से साधक अमर तत्त्व अर्थात् ब्रह्म की अनुभूति करता है।

यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध माना जाता है तथा 108 उपनिषदों की मुक्तिका-सूची में इसका उल्लेख प्राप्त होता है। इसे योगोपनिषदों की श्रेणी में रखा जाता है। उपलब्ध पाठों में सामान्यतः 39 मन्त्र माने जाते हैं।

अमृतनादोपनिषद् का मुख्य विषय है—

  1. ओंकार का रहस्य
  2. नादोपासना
  3. प्राणायाम
  4. षडङ्ग योग
  5. मनोनिग्रह
  6. समाधि
  7. ब्रह्मसाक्षात्कार

यह उपनिषद् बताता है कि शास्त्रों का अध्ययन साधन है, साध्य नहीं। जब ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है तब शास्त्र उसी प्रकार छोड़ दिये जाते हैं जैसे नदी पार करने के बाद नौका।

यद्यपि इसमें पृथक अध्याय नहीं हैं, तथापि इसके 39 मन्त्रों को विषयवस्तु के आधार पर निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है—

खण्डविषय
1–5ओंकार और ब्रह्ममार्ग
6–12योग की आवश्यकता
13–20प्राणायाम और नाड़ीशोधन
21–30धारणा, ध्यान, तर्क
31–39समाधि और ब्रह्मानुभूति

ऋषियों ने कहा—

"नादः ब्रह्म"

अर्थात् सम्पूर्ण जगत् मूलतः स्पन्दन (Vibration) है।

अमृतनादोपनिषद् के अनुसार साधक जब ओंकार का जप करता है, तब धीरे-धीरे वह बाह्य ध्वनि से सूक्ष्म ध्वनि की ओर जाता है।

यात्रा इस प्रकार है—

शब्द → नाद → शून्य → ब्रह्म

जब समस्त मानसिक वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं तब अनाहत नाद का अनुभव होता है। यही नाद साधक को ब्रह्म की ओर ले जाता है।


ओंकार की साधना

उपनिषद् में ओंकार को एक रथ की उपमा दी गयी है।

साधक ओंकार रूपी रथ पर आरूढ़ होकर ब्रह्मलोक की यात्रा करता है। परन्तु जब लक्ष्य प्राप्त हो जाता है तब रथ का भी परित्याग कर देता है।

यहाँ ओंकार केवल ध्वनि नहीं है बल्कि चेतना की सीढ़ी है।

माण्डूक्य उपनिषद् की भाँति यहाँ भी ओंकार को जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अवस्थाओं का प्रतीक माना गया है।

षडङ्ग योग

अमृतनादोपनिषद् का एक महत्वपूर्ण योगदान इसका षडङ्ग योग है।

यह छह अंगों का उल्लेख करता है—

  1. प्राणायाम
  2. प्रत्याहार
  3. धारणा
  4. ध्यान
  5. तर्क
  6. समाधि

यहाँ "तर्क" को योग का अंग माना गया है। यह अत्यन्त रोचक तथ्य है क्योंकि पतञ्जलि के अष्टाङ्ग योग में तर्क का पृथक उल्लेख नहीं मिलता।

उपनिषद् के अनुसार तर्क का अर्थ वाद-विवाद नहीं बल्कि आत्मचिन्तन है।

प्राणायाम का महत्त्व

उपनिषद् में प्राणायाम को विशेष महत्त्व दिया गया है।

यह कहता है कि जैसे अग्नि धातु की अशुद्धियों को जला देती है, वैसे ही प्राणायाम इन्द्रियों के दोषों को नष्ट कर देता है।

प्राणायाम के तीन अंग बताए गये हैं—

  • पूरक (श्वास लेना)
  • कुम्भक (रोकना)
  • रेचक (छोड़ना)

साथ ही गायत्री-मन्त्र और प्रणव (ॐ) के साथ प्राणायाम करने का निर्देश भी मिलता है।

मन और समाधि

अमृतनादोपनिषद् का मानना है कि मन ही बन्धन और मोक्ष दोनों का कारण है।

जब मन विषयों में भटकता है तब संसार है।

जब वही मन आत्मा में स्थित हो जाता है तब मोक्ष है।

धारणा, ध्यान और समाधि का उद्देश्य मन को आत्मा में विलीन करना है।

समाधि की अवस्था में—

  • भय समाप्त हो जाता है।
  • क्रोध नष्ट हो जाता है।
  • अहंकार गल जाता है।
  • साधक ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।

अमृतनादोपनिषद् का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

अब प्रश्न उठता है कि क्या इस उपनिषद् की शिक्षाओं का आधुनिक विज्ञान से कोई सम्बन्ध है?

उत्तर आश्चर्यजनक रूप से "हाँ" है।

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड स्पन्दन है

आधुनिक भौतिकी के अनुसार पदार्थ वस्तुतः ऊर्जा का संघनित रूप है।

क्वाण्टम सिद्धान्त बताता है कि परमाणु स्तर पर सब कुछ कम्पन (Vibration) है।

ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व कहा—

नाद से सृष्टि उत्पन्न हुई।

आज विज्ञान कहता है—

Universe is fundamentally vibrational.

यद्यपि दोनों की भाषा अलग है, पर मूल संकेत समान दिखाई देता है।

ध्वनि और मस्तिष्क

आधुनिक न्यूरोसाइंस ने सिद्ध किया है कि ध्वनि-आधारित ध्यान (Sound Meditation) मस्तिष्क की तरंगों को प्रभावित करता है।

"ॐ" के उच्चारण से—

  • तनाव घटता है,
  • हृदयगति संतुलित होती है,
  • अल्फा और थीटा ब्रेनवेव्स बढ़ती हैं,
  • मानसिक शान्ति प्राप्त होती है।

अमृतनादोपनिषद् का नाद-ध्यान इसी दिशा की आध्यात्मिक तकनीक है।

प्राणायाम और जैव-विज्ञान

आज चिकित्सा विज्ञान मानता है कि नियंत्रित श्वसन—

  • रक्तचाप कम करता है,
  • तनाव हार्मोन घटाता है,
  • ऑक्सीजन आपूर्ति बढ़ाता है,
  • तंत्रिका तंत्र को संतुलित करता है।

उपनिषद् में प्राणायाम द्वारा इन्द्रिय-दोषों के नाश की जो बात कही गयी है, उसे आधुनिक भाषा में मनोदैहिक (Psychophysiological) संतुलन कहा जा सकता है।

ध्यान और न्यूरोप्लास्टिसिटी

आधुनिक अनुसंधान बताता है कि नियमित ध्यान से मस्तिष्क की संरचना में परिवर्तन सम्भव है।

ध्यान—

  • एकाग्रता बढ़ाता है,
  • स्मृति सुधारता है,
  • भावनात्मक संतुलन देता है।

अमृतनादोपनिषद् का ध्यान-समाधि मार्ग इसी आन्तरिक रूपान्तरण का आध्यात्मिक प्रतिरूप है।

दार्शनिक मूल्यांकन

अमृतनादोपनिषद् वेदान्त और योग का सुन्दर समन्वय प्रस्तुत करता है।

वेदान्त कहता है—

"तत्त्वमसि"

योग कहता है—

"चित्तवृत्ति निरोधः"

अमृतनादोपनिषद् दोनों को जोड़कर कहता है—

चित्त के निरोध द्वारा ब्रह्म की अनुभूति करो।

यह केवल सिद्धान्त नहीं, बल्कि अनुभव का मार्ग है।

अमृतनादोपनिषद् भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का एक अद्भुत योगग्रन्थ है। इसके 39 मन्त्र साधक को शास्त्र से अनुभव, ध्वनि से मौन, मन से आत्मा और आत्मा से ब्रह्म की ओर ले जाते हैं।

इस उपनिषद् की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मुक्ति को किसी दार्शनिक अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि साधना के प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में प्रस्तुत करता है। नाद, प्राणायाम, ध्यान और समाधि के माध्यम से यह बताता है कि मनुष्य अपने भीतर ही उस अमृत तत्त्व को खोज सकता है जिसे उपनिषद् "ब्रह्म" कहते हैं।

अतः अमृतनादोपनिषद् केवल एक प्राचीन ग्रन्थ नहीं, बल्कि चेतना-विज्ञान (Science of Consciousness) का एक शाश्वत दस्तावेज है, जिसकी प्रासंगिकता आधुनिक विज्ञान और मनोविज्ञान के युग में भी बनी हुई है।

मुकेश ,


आत्मा और जीवात्मा का वेदान्तीय स्वरूप तथा जन्मकुंडली में उसका प्रतिबिंब

  आत्मा और जीवात्मा का वेदान्तीय स्वरूप तथा जन्मकुंडली में उसका प्रतिबिंब

उपनिषदों की गूढ़ वाणी बार–बार हमें स्मरण कराती है –
“आत्मा नित्य है, शुद्ध है, बुद्ध है, मुक्त है।”
यह आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है। वह अद्वितीय सत्य है, जो सभी अनुभवों का साक्षी है।

किन्तु जब यही आत्मा मायाजाल में बंधकर देह और मन से स्वयं को जोड़ लेती है, तब वह जीवात्मा कहलाती है। वेदान्त इसे एक दर्पण की भाँति समझाता है – आत्मा स्वयं सूर्य है, निर्विकार प्रकाश है, परन्तु जब यह जल–तरंगों में प्रतिबिम्बित होती है, तब उसकी छाया काँपने लगती है। यही जीवात्मा की स्थिति है।

उपनिषद और आत्मशुद्धि

उपनिषद बार–बार कहते हैं कि जीवात्मा की मलिनता उसकी वास्तविकता नहीं है।
श्रवण, मनन और निदिध्यासन” – इन तीन साधनों द्वारा मन के आवरण हटते हैं और आत्मा की शुद्धता प्रकट होती है।
छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया – “तत्त्वमसि श्वेतकेतो।”
अर्थात् – “तू वही ब्रह्म है।”
यह वाक्य जीवात्मा और परमात्मा की भिन्नता को मिटा देता है।

ज्योतिष और आत्मा का प्रतिबिंब

जन्मकुंडली केवल ग्रहों का गणित नहीं, आत्मा का दर्पण भी है। यहाँ तीन विशेष संकेतक आत्मा की स्थिति को प्रकट करते हैं –

  1. लग्न (Ascendant) – यह आत्मा का प्रकट रूप है। जिस प्रकार शरीर आत्मा का वाहन है, वैसे ही लग्न आत्मा के प्रकट होने का द्वार है। यदि लग्न बलवान हो, तो जीव आत्मबोध के समीप होता है।

  2. चन्द्रमा (Moon) – चन्द्र आत्मा का प्रतिबिम्ब है, जो मन के रूप में दिखाई देता है। मन की शुद्धि और स्थिरता ही आत्मज्ञान की ओर ले जाती है। विक्षिप्त चन्द्र आत्मा को अस्थिर करता है, जबकि शान्त चन्द्र आत्मा के प्रकाश को स्पष्ट करता है।

  3. आत्मकारक (Jaimini system) – जिस ग्रह की डिग्री सर्वाधिक होती है, वही आत्मकारक कहलाता है। यह ग्रह बताता है कि आत्मा किस क्षेत्र में अपने कर्म–ऋण से बँधी है और किस साधना द्वारा वह शुद्धि प्राप्त कर सकती है।

आत्मा का स्तर ज्ञात करने की प्रक्रिया

  • यदि लग्नेश और आत्मकारक शुभ स्थिति में हों, तो आत्मा की यात्रा सरल और शुद्ध होती है।

  • यदि चन्द्रमा अमावस्या या पापग्रहदृष्ट हो, तो जीवात्मा अशान्त और विकल रहती है।

  • यदि आत्मकारक उच्च राशि या केन्द्र–त्रिकोण में हो, तो आत्मा का मार्ग मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।

दार्शनिक निष्कर्ष

इस प्रकार वेदान्त और ज्योतिष का संगम हमें यह सिखाता है कि आत्मा की वास्तविकता सदा शुद्ध और मुक्त है। ज्योतिषीय जन्मकुण्डली उसके आवरणों और यात्रा की दिशा को दिखाती है।
आत्मा सूर्य है, जीवात्मा उसकी छाया है, और कुंडली उस छाया के आकार का मानचित्र है।
अन्ततः साधना, शास्त्र और अनुभव – इन तीनों के मिलन से ही आत्मा अपनी मूल शुद्धि को पहचान पाती है।

मुकेश ,

सोलमेट की अवधारणा: दर्शन, विचार और विज्ञान के आलोक में

  सोलमेट की अवधारणा: दर्शन, विचार और विज्ञान के आलोक में

“सोलमेट” शब्द आज प्रेम, विवाह और भावनात्मक जुड़ाव के संदर्भ में अत्यंत लोकप्रिय है। आम धारणा यह है कि संसार में कोई एक ऐसा व्यक्ति होता है जो हमारे लिए “निर्धारित” है—जिससे मिलन होते ही पूर्णता का अनुभव होता है। किंतु क्या यह विचार केवल रोमांटिक कल्पना है, या इसके पीछे गहरी दार्शनिक और वैज्ञानिक जड़ें भी हैं? इस निबंध में हम सोलमेट की अवधारणा को भारतीय दर्शन, पश्चिमी विचारधारा और आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करेंगे।

1. भारतीय दर्शन में सोलमेट की अवधारणा

भारतीय दर्शन में “सोलमेट” शब्द सीधे नहीं मिलता, परंतु आत्मिक संबंध और कर्म की अवधारणा इसके बहुत निकट है।

(क) आत्मा और कर्म सिद्धांत

उपनिषदों और वेदांत दर्शन के अनुसार आत्मा नित्य, अविनाशी और अनेक जन्मों से यात्रा करती है। आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में आत्मा और ब्रह्म की एकता पर बल दिया गया है। इस दृष्टि से किसी विशेष “एकमात्र” सोलमेट की अवधारणा गौण हो जाती है, क्योंकि सभी आत्माएँ मूलतः एक ही सत्य का अंश हैं।

कर्म सिद्धांत यह मानता है कि हमारे जीवन में मिलने वाले संबंध—पति-पत्नी, मित्र या गुरु—पूर्वजन्मों के कर्मों का फल होते हैं। यहाँ सोलमेट चयन नहीं, बल्कि संयोग और ऋणानुबंध का परिणाम है।

(ख) पुरुष और प्रकृति

सांख्य दर्शन में पुरुष (चेतना) और प्रकृति (ऊर्जा) के संतुलन से सृष्टि चलती है। इस दृष्टि से सोलमेट वह हो सकता है जो हमारे जीवन में संतुलन और आत्मविकास में सहायक बने—न कि केवल रोमांटिक पूर्णता का साधन।

भारतीय दृष्टिकोण का सार:

सोलमेट कोई “एक तय व्यक्ति” नहीं, बल्कि वह संबंध है जो आत्मिक विकास और कर्म-परिपक्वता में सहायक हो।

2. पश्चिमी विचारधारा में सोलमेट

पश्चिमी दर्शन और साहित्य में सोलमेट की धारणा अधिक व्यक्तिकेंद्रित और रोमांटिक रही है।

(क) प्लेटो की अवधारणा

प्लेटो ने अपनी रचना Symposium में कहा कि प्रारंभ में मनुष्य पूर्ण था, किंतु देवताओं ने उसे दो भागों में बाँट दिया। तब से हर व्यक्ति अपने “दूसरे आधे” की खोज में है। यही विचार आधुनिक सोलमेट की धारणा की बुनियाद बनता है।

(ख) आधुनिक मनोविज्ञान और रोमांटिक आदर्श

सिग्मंड फ्रायड के अनुसार प्रेम में हम अक्सर अपने अवचेतन की इच्छाओं और अधूरी भावनात्मक आवश्यकताओं को दूसरे पर प्रक्षेपित करते हैं।

पश्चिमी संस्कृति में फिल्मों और उपन्यासों ने सोलमेट को “परफेक्ट मैच” के रूप में प्रस्तुत किया—जिससे अपेक्षाएँ बढ़ती हैं और संबंध टूटने की संभावना भी।

पश्चिमी दृष्टिकोण का सार:

सोलमेट वह है जो भावनात्मक और रोमांटिक रूप से हमें “पूरा” कर दे—हालाँकि यह धारणा कई बार आदर्शवाद से ग्रस्त होती है।

3. विज्ञान सोलमेट के बारे में क्या कहता है?

आधुनिक विज्ञान सोलमेट को किसी दैवी या पूर्वनिर्धारित सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारकों के परिणाम के रूप में देखता है।

(क) न्यूरोसाइंस और रसायन

प्रेम के समय मस्तिष्क में डोपामिन, ऑक्सीटोसिन और सेरोटोनिन जैसे रसायन सक्रिय होते हैं, जो जुड़ाव और सुख की अनुभूति कराते हैं। यह अनुभूति “वही एक है” जैसा भ्रम पैदा कर सकती है।

(ख) मनोविज्ञान और संगतता

वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि साझा मूल्य, संचार कौशल और भावनात्मक सुरक्षा—ये सभी किसी भी सफल संबंध के मूल आधार हैं। मनोविज्ञान यह भी कहता है कि एक व्यक्ति जीवन में एक से अधिक लोगों के साथ गहरे, अर्थपूर्ण संबंध बना सकता है।

(ग) विकासवादी दृष्टिकोण

विकासवादी मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य ऐसे साथी की ओर आकर्षित होता है जो सुरक्षा, सहयोग और संतुलन प्रदान कर सके—यह प्रक्रिया “एकमात्र सोलमेट” की बजाय उपयुक्त साथी की खोज है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सार:

सोलमेट कोई अलौकिक सत्य नहीं, बल्कि गहरी संगतता और भावनात्मक निवेश का परिणाम है।

भारतीय दर्शन सोलमेट को आत्मिक यात्रा और कर्म का हिस्सा मानता है, पश्चिमी विचारधारा उसे रोमांटिक पूर्णता के रूप में देखती है, जबकि विज्ञान इसे जैविक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का परिणाम बताता है।

अतः कहा जा सकता है कि सोलमेट “मिलता” नहीं, बल्कि संबंध में समझ, साधना और परिपक्वता से “बनता” है।

शायद सच्चा सोलमेट वही है जो हमारे साथ रहते हुए हमें बेहतर मनुष्य बनने में सहायता करे—चाहे वह एक हो या जीवन में एक से अधिक।


मुकेश ,,,,,

कोहरे का धर्मग्रंथ

 कोहरे का धर्मग्रंथ

कोहरे का अपना

एक धर्मग्रंथ है।

उसमें लिखा है

जो स्पष्ट दिखाई दे,

उस पर विश्वास मत करो।

वृक्ष को वृक्ष से अधिक समझो।

मनुष्य को मनुष्य से कम।

और प्रेम को

कभी परिभाषित मत करो,

क्योंकि परिभाषा

हर रहस्य की मृत्यु है।

मुकेश ,,,,,,,

अंतिम नक्षत्र

 अंतिम नक्षत्र

एक दिन ऐसा आएगा

जब सारे नक्षत्र

अपने-अपने स्थान छोड़ देंगे।

आकाश खाली हो जाएगा।

देवता लौट जाएँगे।

मिथक बुझ जाएँगे।

और उस विराट अंधकार में

यदि कुछ चमकेगा,

तो शायद

किसी का किसी को

याद करना।

मुकेश ,,,,,,,

अँधेरे की खेती

 अँधेरे की खेती

अँधेरा कोई घटना नहीं।

वह एक फ़सल है

जिसे समय बोता है।

दिन भर की रोशनियाँ

धीरे-धीरे गलती हैं,

स्मृतियों का पानी पड़ता है,

और रात तक

काले फूल उग आते हैं।

चाँद

उनका अकेला माली है।

मुकेश ,,,,,,,