काश मेरे घर की खिड़की
तुम्हारे घर के सामने होती,
तो सुबह की पहली धूप
हम दोनों के दरम्यान
एक ही रंग में उतरती।
मैं परदा हल्का-सा सरकाता,
और देखता—
तुम चाय की भाप में
अपनी उनींदी आँखें छुपाए खड़ी हो।
हम कुछ कहते नहीं,
सिर्फ़ खिड़कियाँ खुलतीं,
और हवा
दो घरों के बीच
रिश्ता बनकर बहती रहती।
शाम को जब थकान
दीवारों से टिककर बैठती,
तो तुम्हारी परछाईं
मेरे कमरे की दीवार पर
धीमे से उतर आती।
कभी तुम मुस्कुरातीं,
और मुझे लगता
जैसे मेरी खिड़की के बाहर
अचानक कोई सितारा जल उठा हो।
बारिश की रातों में
बूंदें दोनों शीशों पर
एक ही ताल में गिरतीं,
जैसे आसमान
हमारी ख़ामोश बातों का
साथ दे रहा हो।
काश मेरे घर की खिड़की
तुम्हारे घर के सामने होती,
तो दूरी
सिर्फ़ सड़क भर की होती,
और मोहब्बत
आवाज़ दिए बिना
आ-जा सकती।
फिर शायद
चिट्ठियों की ज़रूरत न पड़ती,
फ़ोन की घंटियाँ भी नहीं,
बस एक नज़र,
एक हल्की-सी मुस्कान,
और दिन मुकम्मल।
काश…
पर शायद यही दूरी
इस ख़्वाब को
इतना ख़ूबसूरत बनाए रखती है
मुकेश ,,,,,,,,,,,