पुराने स्वेटर की ऊष्मा
सर्दियाँ अब वैसी नहीं रहीं
जैसी पहले हुआ करती थीं।
अब धूप में
वह पुरानी आलस्य भरी गर्मी नहीं उतरती,
और रातें भी
इतनी चुप नहीं होतीं।
फिर भी
हर वर्ष दिसंबर आते ही
मैं अलमारी के सबसे नीचे रखे
उस पुराने स्वेटर को निकाल लेता हूँ।
उसका रंग
अब ठीक-ठीक याद नहीं आता।
शायद कभी नीला था।
या धूसर।
समय ने
रंगों को भी धीरे-धीरे
स्मृति में बदल दिया है।
उसकी बाँहें
हल्की ढीली पड़ चुकी हैं,
ऊन कई जगह से उभर आई है,
और गर्दन के पास
एक छोटा-सा धागा
अब भी बाहर निकला हुआ है।
उसे पहनते ही
हर बार
एक अजीब-सी अनुभूति होती है।
जैसे शरीर नहीं,
कोई पुराना समय
फिर से मुझे ढँक रहा हो।
मुझे हमेशा लगता है —
कपड़े सिर्फ़ कपड़े नहीं होते।
वे अपने भीतर
मनुष्यों की ऋतुएँ बचाकर रखते हैं।
इस स्वेटर ने
कितनी सर्दियाँ देखी होंगी।
रेलवे प्लेटफ़ॉर्म की ठंडी सुबहें,
कोहरे में खोई सड़कें,
छत पर बैठकर पी गई चाय,
देर रात तक पढ़ी गई किताबें,
और वे चुप शामें
जब जीवन
बिना किसी स्पष्ट कारण के
बहुत उदास लगने लगता था।
कभी-कभी
मुझे लगता है
उसकी ऊन में
अब भी कुछ आवाज़ें अटकी हुई हैं।
किसी का कहना —
“इतनी ठंड में बाहर मत जाइए…”
किसी का
हँसते हुए बाँह खींच लेना।
किसी का
बहुत पास आकर
धीरे से पूछना —
“आप हमेशा इतने चुप क्यों रहते हैं?”
और मैं सोचता हूँ —
मनुष्य
सबसे ज़्यादा उन्हीं चीज़ों से जुड़ता है
जो धीरे-धीरे पुरानी होती जाती हैं।
नई वस्तुओं में
चमक होती है,
लेकिन पुरानी चीज़ों में
जीवन जमा रहता है।
मैंने स्वेटर की बाँह पर
हाथ फेरा।
ऊन ठंडी थी,
लेकिन उसके भीतर
एक बहुत हल्की ऊष्मा बची हुई थी।
जैसे कोई अनुपस्थित व्यक्ति
अब भी
पूरी तरह गया न हो।
बाहर शाम उतर रही थी।
पड़ोस में
किसी ने पानी गरम करने की मशीन चलाई,
दूर मंदिर से घंटी की आवाज़ आई,
और आकाश में
धुँध धीरे-धीरे भरने लगी।
मैं कुर्सी पर बैठा रहा।
कमरे में
धीरे-धीरे अँधेरा बढ़ता गया,
लेकिन उस पुराने स्वेटर के भीतर
अब भी
किसी बीती हुई सर्दी की धड़कन बची हुई थी।
और मुझे लगा —
कुछ वस्तुएँ
समय को रोक नहीं पातीं,
लेकिन उसके चले जाने के बाद भी
उसकी थोड़ी-सी गर्मी बचाकर रख लेती हैं।
— मुकेश