श्रीकृष्णोपनिषद् : मूलपाठ, हिन्दी अर्थ एवं दार्शनिक व्याख्या
श्रीकृष्णोपनिषद् अथर्ववेदीय वैष्णवोपनिषदों में गिनी जाती है। यह आकार में लघु होने पर भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें सम्पूर्ण कृष्णावतार को वैदिक एवं उपनिषदिक प्रतीकों के माध्यम से समझाया गया है। उपलब्ध पाठभेदों में मन्त्र-संख्या कुछ भिन्न मिलती है, किन्तु सामान्यतः इसमें लगभग 27–30 मन्त्र माने जाते हैं।
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायुः॥
हिन्दी अर्थ
हे देवताओं! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें, नेत्रों से मंगलमय दृश्य देखें तथा स्वस्थ शरीर से ईश्वर की स्तुति करते हुए अपना जीवन पूर्ण करें।
व्याख्या
समस्त उपनिषदों की भाँति यहाँ भी आध्यात्मिक ज्ञान के ग्रहण हेतु अन्तःकरण की शुद्धि की कामना की गई है।
प्रथम मन्त्र
हरिः ॐ।
देवा ह वै वैकुण्ठलोकेऽसन्।
तदा ब्रह्माणमूचुः—भगवन्! कोऽयं कृष्णो नाम?
हिन्दी अर्थ
देवता वैकुण्ठलोक में स्थित थे। उन्होंने ब्रह्माजी से पूछा—हे भगवन्! यह कृष्ण नामक परम पुरुष कौन हैं?
व्याख्या
उपनिषद् का प्रारम्भ एक दार्शनिक प्रश्न से होता है। प्रश्न केवल ऐतिहासिक कृष्ण के विषय में नहीं है, बल्कि उस परम तत्त्व के विषय में है जिसे कृष्ण कहा जाता है।
द्वितीय मन्त्र
स होवाच ब्रह्मा—
कृष्णो वै परमं दैवतम्।
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माजी बोले—कृष्ण ही परम देवता हैं।
व्याख्या
यह उपनिषद् का मूल सिद्धान्त है। यहाँ कृष्ण को किसी देवता विशेष का अवतार नहीं, बल्कि समस्त देवताओं के मूलाधार परब्रह्म के रूप में स्वीकार किया गया है।
तृतीय मन्त्र
गोविन्दान्मृत्युर् बिभेति।
हिन्दी अर्थ
मृत्यु भी गोविन्द से भयभीत रहती है।
व्याख्या
मृत्यु संसार का परम भय है। उपनिषद् कहती है कि जो कृष्णतत्त्व को प्राप्त कर लेता है वह जन्म-मरण से परे हो जाता है।
चतुर्थ मन्त्र
गोपीजनवल्लभज्ञानात् पञ्चपदं मनुं लभेत्।
हिन्दी अर्थ
गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण के ज्ञान से साधक पंचपद मन्त्र की प्राप्ति करता है।
व्याख्या
यहाँ भक्ति को ज्ञान का सर्वोच्च रूप माना गया है। गोपीजनवल्लभ का अर्थ है—प्रेमस्वरूप परमात्मा।
पंचम मन्त्र
देवक्या ओंकाररूपत्वम्।
हिन्दी अर्थ
देवकी वास्तव में ओंकारस्वरूप हैं।
व्याख्या
यह उपनिषद् का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रतीकवाद है।
देवकी = प्रणव (ॐ)
जिस प्रकार सम्पूर्ण वेदों का सार ॐ है, उसी प्रकार सम्पूर्ण दिव्यता का आविर्भाव देवकी से होता है।
षष्ठ मन्त्र
वसुदेवो निगमो वेदार्थः।
हिन्दी अर्थ
वसुदेव वेदों के निगमभाग का स्वरूप हैं।
व्याख्या
वसुदेव ज्ञान के आधार हैं। वेद और कृष्ण का सम्बन्ध यहाँ प्रत्यक्ष स्थापित किया गया है।
सप्तम मन्त्र
गावो वै ऋचः।
हिन्दी अर्थ
गौएँ वास्तव में वेदमन्त्र हैं।
व्याख्या
वृन्दावन की गौओं को केवल पशु न मानकर वेदस्वरूप बताया गया है। इसका तात्पर्य है कि सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान कृष्ण की ओर प्रवाहित होता है।
अष्टम मन्त्र
गोप्य उपनिषदः।
हिन्दी अर्थ
गोपियाँ वास्तव में उपनिषदें हैं।
व्याख्या
यह इस उपनिषद् का सर्वाधिक प्रसिद्ध वचन है।
उपनिषदें जिस ब्रह्म की खोज करती हैं, वही ब्रह्म श्रीकृष्ण हैं। अतः गोपियों का कृष्ण-प्रेम उपनिषदों की ब्रह्मप्राप्ति का प्रतीक बन जाता है।
नवम मन्त्र
बलरामोऽनन्तः।
हिन्दी अर्थ
बलराम ही अनन्त शेष हैं।
व्याख्या
यहाँ पौराणिक एवं वैदिक परम्परा का समन्वय है। बलराम को अनन्तनाग का अवतार कहा गया है।
दशम मन्त्र
रोहिणी दया।
हिन्दी अर्थ
रोहिणी दया की मूर्ति हैं।
व्याख्या
कृष्णलीला के प्रत्येक पात्र को किसी आध्यात्मिक गुण का प्रतीक माना गया है।
एकादश मन्त्र
सत्यभामा भूशक्तिः।
हिन्दी अर्थ
सत्यभामा पृथ्वीशक्ति हैं।
व्याख्या
यहाँ पृथ्वीदेवी का सत्यभामा रूप में अवतरण बताया गया है।
द्वादश मन्त्र
उद्धवो दमः।
हिन्दी अर्थ
उद्धव आत्मसंयम (दम) के स्वरूप हैं।
व्याख्या
भक्ति केवल भावुकता नहीं, बल्कि इन्द्रियनिग्रह और विवेक भी है।
त्रयोदश मन्त्र
अक्रूरः सत्यं।
हिन्दी अर्थ
अक्रूर सत्यस्वरूप हैं।
व्याख्या
कृष्ण तक पहुँचने के लिए सत्य का आश्रय अनिवार्य है।
चतुर्दश मन्त्र
सुदामा शमः।
हिन्दी अर्थ
सुदामा मनःशान्ति के प्रतीक हैं।
व्याख्या
कृष्णभक्ति का आधार अन्तःकरण की निर्मलता है।
असुरों का प्रतीकवाद
उपनिषद् आगे विभिन्न असुरों का दार्शनिक अर्थ बताती है—
| असुर | प्रतीक |
|---|---|
| कंस | अहंकार |
| चाणूर | द्वेष |
| मुष्टिक | दर्प |
| अघासुर | पाप |
| बकासुर | कपट |
| पूतना | मिथ्या ममता |
| तृणावर्त | मोह |
व्याख्या
यहाँ सम्पूर्ण भागवत कथा को मनोवैज्ञानिक साधना का रूप दिया गया है।
जब साधक के भीतर के कंस, पूतना और अघासुर नष्ट होते हैं, तभी कृष्ण का जन्म होता है।
श्रीकृष्ण का दार्शनिक स्वरूप
उपनिषद् का निष्कर्ष है—
कृष्ण एव परं ब्रह्म।
कृष्ण एव परं तपः।
कृष्ण एव परं ज्योतिः।
हिन्दी अर्थ
कृष्ण ही परब्रह्म हैं।
कृष्ण ही परम तप हैं।
कृष्ण ही परम ज्योति हैं।
व्याख्या
यहाँ कृष्ण को सगुण-निर्गुण दोनों रूपों का आधार माना गया है। वे लीलापुरुषोत्तम भी हैं और परब्रह्म भी।
श्रीकृष्णोपनिषद् का दार्शनिक महत्त्व
इस उपनिषद् के पाँच मुख्य सिद्धान्त हैं—
- कृष्ण ही परब्रह्म हैं।
- गोपियाँ उपनिषदों का प्रतीक हैं।
- गौएँ वेदमन्त्रों का प्रतीक हैं।
- असुर मानव-मन के दोषों के प्रतीक हैं।
- भक्ति और ब्रह्मज्ञान अन्ततः एक ही सत्य तक पहुँचाते हैं।
श्रीकृष्णोपनिषद् आकार में छोटी किन्तु विचार में अत्यन्त विशाल उपनिषद् है। यह भागवत-भक्ति और उपनिषदिक ब्रह्मविद्या का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है। यहाँ वृन्दावन कोई भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि शुद्ध अन्तःकरण का प्रतीक है; गोपियाँ उपनिषदें हैं; गौएँ वेद हैं; और श्रीकृष्ण स्वयं वह परम ब्रह्म हैं जिसकी खोज समस्त वेद और उपनिषद करते हैं।
इसी कारण श्रीकृष्णोपनिषद् को वैष्णव वेदान्त का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दार्शनिक ग्रन्थ माना जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,