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कालसूक्त — तृतीय मन्त्र : काल — एक सत्य के अनेक रूप

 कालसूक्त — तृतीय मन्त्र : काल — एक सत्य के अनेक रूप मन्त्र पूर्णः कुम्भोऽधि काल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तः। स इमा विश्वा भुवनानि प्रत्यङ् कालं तमाहुः परमे व्योमन्॥३॥ हिन्दी अर्थ काल के ऊपर एक पूर्ण कुम्भ के समान सम्पूर्णता स्थित है। हम वर्तमान में रहते हुए उसी काल को अनेक रूपों में देखते हैं। वही काल इन सम्पूर्ण भुवनों के सम्मुख गतिमान है। ज्ञानी पुरुष उस काल को परम आकाश में स्थित ब्रह्म कहते हैं। वैज्ञानिक व्याख्या पहले मन्त्र में काल अश्व था। दूसरे मन्त्र में काल चक्र और अक्ष बना। इस तीसरे मन्त्र में ऋषि काल को पूर्ण कुम्भ के रूप में देखते हैं। यह प्रतीक अत्यन्त गहरा है। कुम्भ अपने भीतर कुछ धारण करता है। वह खाली स्थान को सीमित करता है और किसी द्रव्य को अपने भीतर समेटे रहता है। जब ऋषि कहते हैं— “पूर्णः कुम्भः” , तो यहाँ काल की उस पूर्णता का संकेत दिखाई देता है, जिसके भीतर सम्पूर्ण अनुभव और परिवर्तन घटित होते हैं। आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से हम किसी घटना को समय से बाहर रखकर नहीं समझ सकते। किसी वस्तु का जन्म है। उसका विकास है। उसका परिवर्तन है। और उसका अन्त है। इन सभी अव...

कालसूक्त — द्वितीय मन्त्र : काल — ब्रह्माण्डीय चक्रों का अक्ष

 कालसूक्त — द्वितीय मन्त्र : काल — ब्रह्माण्डीय चक्रों का अक्ष मन्त्र सप्त चक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभीरमृतं न्वक्षः। स इमा विश्वा भुवनान्यञ्जत् कालः स ईयते प्रथमो नु देवः॥२॥ हिन्दी अर्थ यह काल सात चक्रों को धारण करता हुआ गतिमान है। इसके सात नाभि-केन्द्र हैं और इसका अक्ष अमृत अर्थात् अविनाशी है। यही काल इन सम्पूर्ण भुवनों को प्रकट करता हुआ आगे बढ़ता है। काल ही आदि देव के रूप में सबसे पहले गतिमान है। वैज्ञानिक व्याख्या प्रथम मन्त्र में ऋषि ने काल को अश्व के रूप में देखा था। द्वितीय मन्त्र में वही काल अब चक्र और अक्ष के रूप में प्रकट होता है। यह परिवर्तन अत्यन्त महत्वपूर्ण है। अश्व गति का प्रतीक था। चक्र नियमित और पुनरावर्ती गति का प्रतीक है। आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से ब्रह्माण्ड में गति केवल सीधी रेखा में नहीं होती। ग्रह अपनी कक्षाओं में घूमते हैं। पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। वह सूर्य की परिक्रमा करती है। ऋतुएँ चक्र में लौटती हैं। प्रकृति में परिवर्तन का एक बड़ा भाग चक्रीय संरचना में दिखाई देता है। इसीलिए मन्त्र का पहला कथन है— “सप्त चक्रान् वहति काल एष।” यह काल सात चक्र...

काल सूक्त प्रथम मन्त्र : काल — ब्रह्माण्ड की गतिशील शक्ति -

प्रथम मन्त्र : काल — ब्रह्माण्ड की गतिशील शक्ति मन्त्र कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः। तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा॥ हिन्दी अर्थ काल एक अश्व के समान निरन्तर गतिमान है। उसकी सात रश्मियाँ हैं। वह सहस्र नेत्रों वाला है। वह अजर है और अपार सृजन-शक्ति से सम्पन्न है। ज्ञानी और दूरदर्शी पुरुष उस काल पर आरोहण करते हैं। उसके चक्र सम्पूर्ण भुवनों में गतिशील हैं। वैज्ञानिक व्याख्या ऋषि ने काल को अश्व कहा है। यह उपमा अत्यन्त गहरी है। अश्व गति का प्रतीक है। वह ठहराव का नहीं, निरन्तर आगे बढ़ने का प्रतीक है। काल भी इसी प्रकार किसी एक स्थान पर रुकता नहीं। वह प्रत्येक वस्तु को परिवर्तन की दिशा में ले जाता है। आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से समय को किसी दिखाई देने वाली वस्तु के रूप में नहीं देखा जाता। हम समय को उसके प्रभावों से पहचानते हैं। पृथ्वी घूमती है। ऋतुएँ बदलती हैं। शरीर में परिवर्तन होता है। तारे जन्म लेते हैं और नष्ट होते हैं। अर्थात् जहाँ परिवर्तन है, वहाँ समय की उपस्थिति है । इस दृष्टि से काल स्वयं कोई घड़ी नहीं है। वह परिवर्तन के क्रम का आधार है। ऋष...

चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–9 : क्या समय वास्तव में बहता है?

 चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–9 : क्या समय वास्तव में बहता है? मनुष्य समय के विषय में सबसे सहज वाक्य कहता है—  “समय बीत रहा है।” हम कहते हैं— समय निकल गया। समय आगे बढ़ रहा है। समय रुकता नहीं। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। लेकिन इन सभी वाक्यों में एक बात लगभग बिना जाँचे स्वीकार कर ली जाती है—  समय बहता है। यहीं से काल-दर्शन का एक अत्यन्त गम्भीर प्रश्न जन्म लेता है— क्या समय वास्तव में बहता है, या केवल घटनाएँ एक निश्चित कालिक क्रम में घटित होती हैं और मनुष्य उस क्रम को “समय का प्रवाह” कहता है? यह प्रश्न सुनने में भाषा का प्रश्न प्रतीत हो सकता है, लेकिन वास्तव में यह अस्तित्व की हमारी पूरी समझ को चुनौती देता है। “प्रवाह” का अर्थ क्या है? किसी नदी के बहने की बात करें तो हम जानते हैं कि नदी में जल एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर गति करता है। किसी वस्तु के चलने की बात करें तो हम उसके स्थान में परिवर्तन देखते हैं। अर्थात् प्रवाह या गति के लिए किसी वस्तु या अवस्था में परिवर्तन आवश्यक है। लेकिन जब हम कहते हैं कि समय बह रहा है , तो प्रश्न उठता है—  समय किसके सापेक्ष...

चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–8 : अतीत, वर्तमान और भविष्य — अस्तित्व की तीन अवस्थाएँ या चेतना का विभाजन?

  चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–8 : अतीत, वर्तमान और भविष्य — अस्तित्व की तीन अवस्थाएँ या चेतना का विभाजन? मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन-अनुभव को सामान्यतः तीन शब्दों में बाँटकर समझता है— अतीत, वर्तमान और भविष्य । हम कहते हैं कि हमने अतीत में कुछ किया, वर्तमान में कुछ कर रहे हैं और भविष्य में कुछ करेंगे। यह विभाजन हमारी भाषा, स्मृति, योजना और दैनिक जीवन में इतना स्वाभाविक रूप से उपस्थित है कि हम प्रायः यह प्रश्न ही नहीं करते कि जिन तीन कालिक अवस्थाओं के आधार पर हम अपने अस्तित्व को समझते हैं, क्या वे वास्तव में अस्तित्व की तीन अलग-अलग अवस्थाएँ हैं, अथवा मनुष्य ने घटनाओं और अनुभवों को व्यवस्थित करने के लिए काल की निरन्तरता को तीन मानसिक नाम दे दिए हैं? यहीं से काल का प्रश्न घटनाओं के क्रम से आगे बढ़कर अस्तित्व की सत्ता का प्रश्न बन जाता है। अतीत—जो था, क्या अब भी है? अतीत के विषय में हमारी सामान्य धारणा अत्यन्त स्पष्ट प्रतीत होती है— जो घट चुका, वह अतीत है । लेकिन जैसे ही हम इस सरल वाक्य को थोड़ा गहराई से देखते हैं, इसके भीतर एक कठिन दार्शनिक प्रश्न छिपा हुआ दिखाई देता है— जो घ...

चिंतन — अध्याय–15 : काल क्या है? — भाग–7 : कालचक्र — क्या समय रैखिक है?

  चिंतन — अध्याय –15 : काल क्या है ? — भाग –7 : कालचक्र — क्या समय रैखिक है ? अब तक हमने काल को — क्षण और क्रम के स्तर पर देखा। अब प्रश्न बदलता है। यदि घटनाएँ क्रम में घटित होती हैं — तो क्या यह क्रम एक सीधी रेखा है ? क्या — एक आरम्भ है। फिर एक निरन्तर आगे बढ़ना। और अन्त में — एक अन्तिम बिन्दु ? या — क्या अस्तित्व स्वयं लौटता है ? ऋतुएँ लौटती हैं। चन्द्रमा की कलाएँ लौटती हैं। दिन के बाद रात आती है। रात के बाद दिन। भारतीय ऋषि ने इस आवर्तन को केवल प्रकृति का खेल नहीं माना। यहीं से — कालचक्र का विचार जन्म लेता है।   रेखा और चक्र रैखिक समय की कल्पना सरल है। एक रेखा कीजिए। बायाँ सिरा — अतीत। बीच — वर्तमान। दायाँ सिरा — भविष्य। समय — बाएँ से दाएँ बढ़ता है। यह चित्र आधुनिक मनुष्य की सामान्य मानसिक संरचना से बहुत निकट है। हम कहते हैं — “ समय आगे बढ़ता है। ” “ भविष्य सामने है। ” “ अतीत पीछे छूट गया। ” लेकिन चक्र में — आगे और प...