अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ
तो लगता है
मैं प्रकाश की तलाश में नहीं था
मैं तो केवल
अपने भीतर के उस व्यक्ति को खोज रहा था
जो हर रोशनी के बाद भी
अधूरा रह जाता था
और हर अँधेरे के बाद भी
पूरी तरह समाप्त नहीं होता था।
शायद वही मैं था
और शायद वही
मेरे सारे शब्दों से परे था।
मुकेश ,,,,,,,,,,