अधखुली पलकों का शहर
अधखुली पलकों का शहर बसता है मेरी रूह में,
जहाँ हर ख्वाब धीरे-धीरे अपने पंख फैलाता है।
रात की चादर तले
चुपचाप सायों की महफ़िल सजती है,
और चाँद की रौशनी हर कोने में गीत गुनगुनाती है।
सड़कें शांत, मगर यादें गहन,
हर कोने में एक नाम, एक मुस्कान,
जो हवा में घुलकर
दिल की दीवारों तक उतर आती है।
मैं चलता हूँ उस शहर में,
अधखुली आँखों के साथ,
हर पल उसकी धड़कन सुनता हूँ
और हर साँस में उसकी खुशबू पाता हूँ।
यहाँ समय नहीं, केवल लम्हे हैं,
जो थक कर बैठ जाते हैं,
जैसे रूह की अलमारी में
कभी खोए, कभी ढूँढे हुए ख़्वाब।
हर मोड़ पर यादें मिलती हैं,
हर कोने में अधूरी बातें पलती हैं,
और मैं उनके साथ चलता हूँ,
जैसे कोई मुसाफिर अपने मंज़िल की तलाश में।
शहर की गलियों में कभी हल्की हँसी सुनाई देती है,
कभी पुरानी शायरी की सरगोशी।
और मैं बैठ कर देखता हूँ,
कैसे अधखुली पलकों के पीछे
अँधेरे और रौशनी खेलते हैं,
कैसे हर साया अपनी कहानी कहता है।
यहाँ हर साँस में सूफ़ियाना रहस्य है,
हर धड़कन में इक गीत बसा है।
और जब मैं पलकें बंद करता हूँ,
तो लगता है कि यह शहर मेरी रूह में
हमेशा के लिए ठहर गया।
अधखुली पलकों का शहर…
जहाँ हर याद, हर ख्वाब,
और हर एहसास
रूहानी मोड़ पर मिलकर
मेरे भीतर का आकाश बना देते हैं
मुकेश ,,,,,,,,,,,