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शब्दयात्री — बिना शिकायत चले जाना

  शब्दयात्री — बिना शिकायत चले जाना उम्र के एक पड़ाव पर आकर समझ में आता है कि जीवन में आने जितनी ही बड़ी कला, चले जाना भी है। हम आना तो सीख जाते हैं, जाना नहीं। हर जगह अपनी मौजूदगी का निशान छोड़ देना चाहते हैं। चाहते हैं कि लोग हमें याद रखें, हमारी कमी महसूस करें, हमारे जाने पर ठहर जाएँ। शायद इसी चाहत में विदा भी एक दावा बन जाती है। लेकिन प्रकृति को देखिए। सूरज हर शाम बिना शिकायत डूब जाता है। वह यह नहीं पूछता कि उसके बाद अँधेरा क्यों आएगा। चाँद भी हर महीने अपनी रोशनी घटा देता है। वृक्ष पतझड़ में अपने पत्तों को रोककर नहीं रखते। नदी किसी मोड़ से गुज़र जाने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखती कि किनारे उसे याद कर रहे हैं या नहीं। शायद इसलिए प्रकृति में विदा कभी दुखद नहीं लगती। वहाँ जाना भी उतना ही स्वाभाविक है, जितना आना। मनुष्य का दुःख यह नहीं कि उसे जाना पड़ता है। दुःख यह है कि वह जाते हुए अपने साथ शिकायतों की एक गठरी बाँध लेता है। उसे याद रहता है कि किसने उसे नहीं समझा, किसने उसका साथ नहीं दिया, किसने उसके प्रेम का उत्तर नहीं दिया, किसने उसके श्रम का सम्मान नहीं किया। वह चला तो जाता है, ...

शब्दयात्री — समर्पण

  शब्दयात्री — समर्पण समर्पण शब्द को मैंने हमेशा ग़लत समझा था। मुझे लगता था कि समर्पण का अर्थ है हार मान लेना, परिस्थितियों के सामने झुक जाना या अपने अधिकार छोड़ देना। शायद इसलिए इस शब्द से एक अनजाना-सा भय भी जुड़ा रहा। मन हमेशा जीतना चाहता था, नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहता था। उसे लगता था कि यदि उसने पकड़ ढीली कर दी, तो सब कुछ बिखर जाएगा। लेकिन जीवन धीरे-धीरे अपने अर्थ स्वयं खोलता है। एक दिन महसूस हुआ कि जितनी चीज़ों को मैं अपनी मुट्ठी में क़ैद रखना चाहता था, वे उतनी ही तेज़ी से मुझसे दूर होती चली गईं। रिश्ते, लोग, समय, इच्छाएँ, योजनाएँ—सब अपनी-अपनी दिशा में चलते रहे। मेरी पकड़ केवल मेरी थकान बढ़ाती रही। तब पहली बार समझ में आया कि समर्पण हार नहीं, विश्वास है। जिस तरह एक नदी अपने स्रोत से निकलते ही समुद्र का रास्ता पूछना शुरू नहीं करती, उसी तरह जीवन भी हर मोड़ का हिसाब नहीं देता। नदी बहती रहती है। उसे हर पत्थर से लड़ना नहीं पड़ता। वह कभी उसके चारों ओर से निकल जाती है, कभी उसे छूकर आगे बढ़ जाती है। उसका भरोसा अपने बहाव पर होता है। शायद समर्पण भी ऐसा ही बहाव है। हम अपने जीवन में ब...

शब्दयात्री — साक्षीभाव

  शब्दयात्री — साक्षीभाव इन दिनों मैंने अपने भीतर एक अजीब-सी जगह खोज ली है। वह कोई स्थान नहीं, कोई विचार नहीं, कोई भावना भी नहीं। वह बस एक उपस्थिति है, जो चुपचाप सब कुछ देखती रहती है। पहले मुझे उसका पता नहीं था। मैं जो कुछ भी महसूस करता था, वही बन जाता था। दुःख आता तो लगता, मैं ही दुःख हूँ। क्रोध उठता तो मैं उसी की आग में जलने लगता। प्रसन्नता आती तो उसी के साथ बह निकलता। हर अनुभव मेरी पहचान बन जाता था। मुझे कभी यह ख़याल ही नहीं आया कि अनुभव और अनुभव करने वाले के बीच भी कोई दूरी हो सकती है। धीरे-धीरे जीवन ने सिखाया कि भीतर एक ऐसा भी बिंदु है, जहाँ न कोई हलचल पहुँचती है, न कोई शोर। वहाँ बैठकर यदि अपने ही मन को देखा जाए, तो पता चलता है कि विचार बिना बुलाए आते हैं और बिना विदा लिए चले जाते हैं। भावनाएँ भी मौसमों की तरह आती-जाती रहती हैं। कभी भीतर धूप उतरती है, कभी बादल घिर आते हैं, कभी बरसात होती है और कभी सब कुछ सूना-सूना लगता है। लेकिन इन सबके बीच कोई है जो न धूप होता है, न बादल, न वर्षा। वह केवल देखता है। शायद यही साक्षीभाव है। साक्षीभाव का अर्थ जीवन से दूर हो जाना नहीं है। यह संवेद...

शब्दयात्री — प्रतीक्षा

  शब्दयात्री — प्रतीक्षा इन दिनों मैं प्रतीक्षा को नए अर्थों में समझने लगा हूँ। पहले लगता था, प्रतीक्षा का मतलब है—किसी के आने तक ठहरे रहना। अब मालूम हुआ, प्रतीक्षा किसी और के आने की नहीं, अपने भीतर कुछ घटने की भी होती है। हम सब किसी-न-किसी इंतज़ार में जीते हैं। कोई ख़त का इंतज़ार करता है, कोई आवाज़ का, कोई एक मुलाक़ात का, कोई उस एक अल्फ़ाज़ का, जो बरसों से किसी के होंठों तक नहीं आ पाया। लेकिन सबसे लंबी प्रतीक्षा शायद अपनी ही होती है। उस दिन की, जब हम अपने भीतर लौट सकेंगे। मैंने देखा है— बीज कभी अधीर नहीं होता। वह मिट्टी के अँधेरे में पड़ा रहता है, बिना शिकायत, बिना शोर। उसे मालूम है कि हर ऋतु का अपना वक़्त होता है। नदी समुद्र तक पहुँचने की जल्दी में अपने किनारों को नहीं छोड़ती। सुबह भी रात को धक्का देकर नहीं आती। वह धीरे-धीरे उजाला बुनती है, और अँधेरा ख़ुद-ब-ख़ुद विदा हो जाता है। शायद प्रकृति इसलिए इतनी सुंदर है, क्योंकि उसे प्रतीक्षा का सलीक़ा आता है। सिर्फ़ हम हैं जो हर फल को पकने से पहले तोड़ लेना चाहते हैं, हर जवाब को समय से पहले सुन लेना चाहते हैं, हर रिश्ते को खिलने से पहले ...

शब्दयात्री — ठहरना

  शब्दयात्री — ठहरना इन दिनों मुझे कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं रहती। अजीब-सी बात है जितनी जल्दी कम हुई है, उतना ही रास्ता खुलने लगा है। पहले मैं हर सफ़र को मंज़िल तक पहुँचने के लिए तय करता था। अब रास्ते में ठहरने के लिए चलता हूँ। कभी किसी पेड़ की छाँव के नीचे, कभी किसी नदी के किनारे, कभी किसी पुरानी इमारत की ख़ामोशी में, और कभी अपने ही भीतर। तब समझ में आया— ठहरना, रुक जाना नहीं होता। ठहरना तो वक़्त के साथ एक ही साँस में बैठ जाना है। बहती हुई नदी भी ठहरती है। हर मोड़ पर एक पल के लिए अपना चेहरा देखती है, फिर आगे बढ़ जाती है। डूबता हुआ सूरज भी ठहरता है। क्षितिज पर कुछ लम्हे अपनी आख़िरी रौशनी रखकर ही रात के हवाले होता है। हवा भी ठहरती है। किसी पत्ते पर, किसी फूल की ख़ुशबू में, किसी बच्चे की हँसी में। प्रकृति जानती है— बिना ठहरे कोई सफ़र मुकम्मल नहीं होता। सिर्फ़ इंसान है जो भागते-भागते यह भूल गया है कि रास्ते सिर्फ़ चलने के लिए नहीं होते, जीने के लिए भी होते हैं। मैंने देखा है जो लोग हर वक़्त दौड़ते रहते हैं, वे अक्सर अपने ही दिल से बिछड़ जाते हैं। और जो कभी-कभार ठहर जाते हैं, उन्हें अप...

शब्दयात्री — देखना

  शब्दयात्री — देखना इन दिनों मैं कम देखता हूँ। या शायद पहली बार सचमुच देखना सीख रहा हूँ। पहले आँखें सिर्फ़ चीज़ों को पहचानती थीं। अब वे उनके भीतर ठहरे हुए वक़्त को भी देखने लगी हैं। पहले मैं चेहरों को देखता था। अब चेहरों पर गुज़रती हुई उम्र को देखता हूँ। मुस्कुराहटों के पीछे छिपी हुई थकान को देखता हूँ। आँखों की नमी में बरसों से अटके हुए मौसमों को देखता हूँ। तब समझ में आया देखना, आँखों का हुनर कम है, दिल की रौशनी ज़्यादा। जो सिर्फ़ आँखों से देखता है, उसे दुनिया दिखाई देती है। जो दिल से देखता है, उसे दुनिया के भीतर छिपी हुई कहानी दिखाई देती है। हर मंज़र अपनी ज़बान नहीं खोलता। कुछ दृश्य ख़ामोश रहते हैं। उन्हें पढ़ना नहीं, महसूस करना पड़ता है। एक सूखा हुआ पत्ता भी कभी-कभी पूरी पतझड़ की दास्तान कह देता है। किसी पुरानी दीवार की दरारों में गुज़रे हुए बरस दिखाई देने लगते हैं। किसी सुनसान सड़क पर शाम का उतरना, अकेलेपन का सबसे सच्चा चित्र बन जाता है। मैंने देखा है नदी सिर्फ़ बहती नहीं, अपने किनारों को उम्र भर देखती भी रहती है। पहाड़ सिर्फ़ खड़े नहीं रहते, वे सदियों से आसमान को देखते हुए बूढ...

शब्दयात्री — सुनने का हुनर

  शब्दयात्री — सुनने का हुनर इन दिनों मुझे बोलने से ज़्यादा सुनना अच्छा लगता है। शायद इसलिए नहीं कि लोगों के पास कहने को बहुत कुछ है, बल्कि इसलिए कि जो सबसे ज़रूरी होता है, वह अक्सर कहा नहीं जाता। वह आवाज़ और अल्फ़ाज़ के दरमियान कहीं ठहरा रहता है। पहले मैं सिर्फ़ अल्फ़ाज़ सुनता था। अब उनके पीछे की ख़ामोशी भी सुनने लगा हूँ। किसी की मुस्कुराहट के पीछे छिपी थकान सुन लेता हूँ। किसी की हँसी में दबा हुआ अकेलापन सुन लेता हूँ। किसी के "मैं ठीक हूँ" के भीतर टूटती हुई आवाज़ सुन लेता हूँ। तब समझ में आया कि सुनना, कानों का काम कम और दिल का काम ज़्यादा है। हर आवाज़ सुन लेना, सुनना नहीं होता। सुनना तब शुरू होता है जब अपने भीतर का शोर थोड़ा-सा थम जाए। जब अपने जवाबों की जल्दी ख़त्म हो जाए। जब सामने वाले की बात पूरी होने से पहले अपनी राय देने की बेचैनी मर जाए। सुनना दरअसल किसी को अपनी मौजूदगी का सबसे ख़ूबसूरत तोहफ़ा देना है। बिना टोके... बिना समझाए... बिना फ़ैसला सुनाए... बस उसके साथ ठहर जाना। मैंने देखा है— पेड़ हवा को सुनते हैं, नदियाँ किनारों को सुनती हैं, रात सितारों को सुनती है, और धरती ...