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सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति” — एक शोधात्मक एवं वैज्ञानिक व्याख्या

  सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति” — एक शोधात्मक एवं वैज्ञानिक व्याख्या मंत्र-पाठ सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्नी उरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥ — अथर्ववेद, पृथ्वी सूक्त (12.1.1) यह पृथ्वी सूक्त का प्रथम मंत्र है और सम्पूर्ण सूक्त का आधारभूत दार्शनिक उद्घोष माना जाता है। ऋषि यहाँ यह नहीं कहते कि पृथ्वी केवल गुरुत्वाकर्षण या किसी भौतिक शक्ति से धारण की हुई है, बल्कि वे उन आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक तत्त्वों का उल्लेख करते हैं जो पृथ्वी पर जीवन और सभ्यता को स्थिर रखते हैं। पदच्छेद एवं शब्दार्थ सत्यम् — सत्य, यथार्थता बृहत् — विशालता, उदारता, व्यापक दृष्टि ऋतम् उग्रम् — कठोर एवं अटल सार्वभौमिक नियम दीक्षा — अनुशासन, संकल्प, आत्मनियमन तपः — परिश्रम, आत्मसंयम, साधना ब्रह्म — ज्ञान, चेतना, विद्या यज्ञः — परस्पर सहयोग, समर्पण, लोककल्याण पृथिवीं धारयन्ति — पृथ्वी को धारण करते हैं सा नः — वह पृथ्वी हमें भूतस्य भव्यस्य पत्नी — भूत और भविष्य की संरक्षिका उरुं लोकम् — विस्तृत जीव...

शब्दयात्री : रेतघड़ी

शब्दयात्री : रेतघड़ी मेरे भीतर एक रेतघड़ी भी है। धूपघड़ी की तरह उसे सूर्य की आवश्यकता नहीं। वह अपने भीतर ही समय को बहाती रहती है। मैं उसे देखता हूँ तो लगता है, जीवन भी कुछ ऐसा ही है। ऊपर का पात्र भविष्य है, नीचे का पात्र स्मृति। और वर्तमान वह सँकरा-सा मार्ग है, जहाँ से होकर हर कण गुज़रता है। जब वह मेरे साथ थी, तब मैंने रेत को गिरते हुए नहीं देखा। सुख में समय का प्रवाह दिखाई नहीं देता। लेकिन उसके जाने के बाद पहली बार मुझे हर गिरता हुआ कण सुनाई देने लगा। एक दिन। एक मौसम। एक वर्ष। फिर दूसरा। फिर तीसरा। धीरे-धीरे ऊपर का पात्र खाली होता गया। लेकिन आश्चर्य यह है कि नीचे का पात्र भरता गया। वहाँ स्मृतियाँ जमा होती रहीं। उसकी हँसी। उसकी चुप्पी। एक अधूरा वाक्य। एक अनकही विदाई। रेतघड़ी ने मुझे सिखाया कि समय कभी नष्ट नहीं होता। वह केवल अपना स्थान बदलता है। जो भविष्य था, वह वर्तमान बनता है। जो वर्तमान था, वह स्मृति। और अन्ततः हम सब अपने ही भीतर भरी हुई उस रेत को देखते रह जाते हैं, जो कभी हमारे हाथों से फिसलती चली गई थी। मैं आज भी उस रेतघड़ी को उलटता नहीं। उसे बहने देता हूँ। क्योंकि कुछ यात्राएँ रोक...

शब्दयात्री : धूपघड़ी

 शब्दयात्री : धूपघड़ी मेरे भीतर एक धूपघड़ी है। वह किसी पत्थर की नहीं बनी, फिर भी उतनी ही पुरानी लगती है। जब मैं उसके पास बैठता हूँ तो मुझे अक्सर उन प्राचीन धूपघड़ियों का ख़याल आता है जिन्हें हमारे पुरखे समय जानने के लिए बनाया करते थे। उनमें कोई मशीन नहीं होती थी, कोई स्प्रिंग, कोई बैटरी, कोई टिक-टिक नहीं। बस एक सीधा-सा स्तम्भ या सूचक होता था, और सूर्य। सूर्य चलता रहता था, और उसकी छाया पृथ्वी पर सरकती रहती थी। मनुष्य उस छाया को देखकर समय पढ़ता था। मुझे यह बात हमेशा विस्मित करती है कि धूपघड़ी समय नहीं दिखाती, वह केवल छाया दिखाती है। समय स्वयं कभी दिखाई नहीं देता। वह अपनी छाया के माध्यम से ही समझ में आता है। शायद इसी कारण मुझे धूपघड़ी से एक गहरा अपनापन महसूस होता है। उसके जाने के बाद मैंने भी समय को सीधे नहीं देखा। मैंने उसकी छाया देखी। वह छाया मेरे दिनों पर पड़ी। मेरी आदतों पर। मेरे शब्दों पर। मेरी ख़ामोशियों पर। पहले मुझे लगता था कि मैं उसकी अनुपस्थिति में जी रहा हूँ। अब लगता है कि मैं उसकी छाया में जी रहा हूँ। और छाया का अपना एक सौन्दर्य होता है। धूपघड़ी का स्तम्भ...

शब्दयात्री : कृष्ण विवर

 शब्दयात्री : कृष्ण विवर बहुत दिनों तक मुझे लगता रहा कि उसके जाने के बाद मेरे भीतर एक रिक्तता पैदा हुई है। फिर एक दिन समझ में आया कि वह रिक्तता नहीं थी। वह एक कृष्ण विवर था। एक ऐसा मौन, जो केवल खाली नहीं होता, बल्कि अपने आसपास की हर चीज़ को अपनी ओर खींचता रहता है। पहले-पहल उसने मेरी हँसी को निगला। फिर मेरी नींदों को। फिर मेरे दिनों की सहजता को। और धीरे-धीरे उन रास्तों को भी, जिन पर चलकर मैं कभी अपने आप तक पहुँच जाया करता था। मैं उससे लड़ता रहा। हर मनुष्य लड़ता है। कौन चाहेगा कि उसके भीतर कोई ऐसा अन्धकार जन्म ले, जिसकी तह तक कोई प्रकाश न पहुँच सके? लेकिन वक़्त ने मुझे एक विचित्र बात सिखाई। खगोलविद कहते हैं कि कृष्ण विवर केवल विनाश की कहानी नहीं हैं। उनके चारों ओर प्रकाश के अद्भुत वलय बनते हैं। उनके गुरुत्वाकर्षण के कारण दूर-दूर के तारे अपनी दिशा बदल लेते हैं। वे केवल निगलते नहीं, ब्रह्माण्ड की संरचना को भी प्रभावित करते हैं। शायद दुःख भी ऐसा ही होता है। वह केवल छीनता नहीं। वह हमें बदलता भी है। उसके जाने के बाद मेरे भीतर जो कृष्ण विवर बना, उसने बहुत कुछ अपने भीतर सम...

शब्दयात्री : अन्तर्ध्वनि

 शब्दयात्री : अन्तर्ध्वनि उस रात के बाद मैंने उसकी याद को बुलाना लगभग छोड़ दिया। पहले मैं जान-बूझकर उन गलियों में जाता था जहाँ स्मृतियाँ रहती थीं। पुराने गीत सुनता, पुरानी शामों को याद करता, अधूरे वाक्यों को मन में दोहराता। अब ऐसा कम होने लगा है। स्मृति ने जैसे अपना घर बदल लिया हो। वह बाहर की चीज़ नहीं रही, भीतर की ध्वनि बन गई। कभी-कभी प्रातःकाल ध्यान में बैठते हुए ऐसा लगता है जैसे हृदय के बहुत भीतर कोई सूक्ष्म नाद उठ रहा हो। वह शब्द नहीं है, पर मौन भी नहीं। उसमें किसी का नाम नहीं, पर एक परिचित आभा है। मैं उसे सुनता हूँ तो मुझे उसकी याद नहीं आती; मुझे अपने भीतर का वह भाग याद आता है जो उसके कारण जागा था। यही शायद प्रेम का सबसे गहरा रूप है—जब वह किसी व्यक्ति से हटकर चेतना की गुणवत्ता बन जाता है। तब प्रिय का चेहरा धुँधला पड़ सकता है, पर उसके कारण उत्पन्न हुई करुणा नहीं मिटती। उसकी आवाज़ भूल सकती है, पर उससे सीखी हुई सुनने की क्षमता बनी रहती है। उसका साथ समाप्त हो सकता है, पर उसके कारण भीतर खुला हुआ आकाश बन्द नहीं होता। मैं अब भी वक़्त के समन्दर में यात्रा कर रहा हूँ। कश्ती वही है, पाल...

शब्दयात्री : तुरीयातीत

 शब्दयात्री : तुरीयातीत एक समय था जब मैं उसे याद करता था। फिर एक समय आया जब मैं उसे भूलने की कोशिश करता था। और अब एक समय है जब न याद करने का प्रयत्न है, न भूलने का। वह मेरे भीतर वैसे ही उपस्थित है जैसे साँझ के बाद आकाश में अन्धकार उपस्थित होता है—न उसे बुलाना पड़ता है, न हटाना। शायद यही वह जगह है जहाँ स्मृति अपने सबसे शांत रूप में पहुँचती है। मैंने उपनिषदों में पढ़ा था कि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के पार भी एक अवस्था है—तुरीय। और कुछ साधकों ने उसके भी आगे एक शब्द रखा— तुरीयातीत । वह अवस्था जहाँ नाम और रूप का आकर्षण समाप्त हो जाता है। जहाँ अनुभव बचता है, अनुभव करने वाला नहीं। जहाँ नदी भी नहीं रहती, किनारे भी नहीं रहते, केवल जल का सत्य रह जाता है। कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी स्मृति भी अब उसी दिशा में चल पड़ी है। पहले उसकी आँखें याद आती थीं। फिर उसकी आवाज़। फिर उसके साथ बिताए हुए दिन। फिर वे भावनाएँ जो उसके साथ जुड़ी थीं। अब इनमें से कुछ भी स्पष्ट नहीं है। लेकिन एक शान्ति बची हुई है। एक उजाला। एक करुणा। एक मधुर विषाद। मैं नहीं जानता वह उससे आया था या मेरे भीतर पह...

शब्दयात्री : निहारिकाएँ

 शब्दयात्री : निहारिकाएँ कुछ चीज़ें जितनी दूर होती हैं, उतनी ही अधिक अपनी लगती हैं। निहारिकाएँ भी उन्हीं में से हैं। रात के आकाश में वे स्पष्ट दिखाई नहीं देतीं। उन्हें देखने के लिए आँखों से अधिक धैर्य चाहिए। वे किसी तारे की तरह चमकती नहीं, किसी चाँद की तरह आकर्षित नहीं करतीं। वे बस दूर कहीं प्रकाश और धूल का एक स्वप्न बनकर ठहरी रहती हैं। मैं अक्सर सोचता हूँ कि स्मृतियाँ भी निहारिकाओं जैसी होती हैं। जब वे नई होती हैं, तब तारे होती हैं—चमकीली, स्पष्ट, तीखी। उनका हर विवरण दिखाई देता है। एक आवाज़, एक चेहरा, एक हँसी, एक शब्द—सब कुछ। लेकिन समय बीतता है। वर्ष अपने पाँव रखकर गुज़र जाते हैं। और फिर स्मृति का तारा धीरे-धीरे निहारिका बनने लगता है। चेहरा धुँधला पड़ जाता है। आवाज़ का लहजा खो जाता है। शब्द याद नहीं रहते। केवल एक उजला-सा विस्तार बचता है। एक एहसास। एक आभा। एक ऐसी मौजूदगी जिसका कोई निश्चित आकार नहीं होता। वह भी अब मेरे भीतर किसी निहारिका की तरह रहती है। कभी मैं उसकी आँखों को याद करने की कोशिश करता हूँ और असफल हो जाता हूँ। कभी उसकी आवाज़ को पकड़ना चाहता हूँ, लेकिन व...