Posts

दर्शन -सांख्य दर्शन — भाग ९ पुरुष करता नहीं, फिर भी कर्ता क्यों दिखाई देता है?

  सांख्य दर्शन — भाग ९ पुरुष करता नहीं , फिर भी कर्ता क्यों दिखाई देता है ? — अविवेक , संयोग और बन्धन का रहस्य पिछले भाग में हम सांख्य के विकासक्रम को प्रकृति से महत् , महत् से अहंकार , अहंकार से मन , इन्द्रियों और तन्मात्राओं तथा तन्मात्राओं से महाभूतों तक देख चुके हैं। लेकिन वहाँ एक प्रश्न अधूरा रह गया था। यदि — बुद्धि प्रकृति का परिणाम है , मन प्रकृति का परिणाम है , इन्द्रियाँ प्रकृति का परिणाम हैं , शरीर प्रकृति का परिणाम है — तो फिर मनुष्य क्यों कहता है — “ मैं सोचता हूँ। ” “ मैं जानता हूँ। ” “ मैं करता हूँ। ” “ मैं सुखी हूँ। ” “ मैं दुखी हूँ। ” सांख्य दर्शन का उत्तर यहीं से अपनी सबसे सूक्ष्म भूमि में प्रवेश करता है। उसके अनुसार समस्या यह नहीं कि पुरुष में कर्तृत्व है। समस्या यह है कि — अकर्तृत्ववान् पुरुष को कर्ता मान लिया जाता है। और इसी भूल का नाम है — अविवेक। पुरुष क्या करता है ? सांख्य के अनुसार पुरुष — द्रष्टा है। वह चेतन है। वह सा...