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Tuesday, 19 May 2026

जैसे कोई पुरानी स्याही काग़ज़ पर लौट आई हो।

 शाम

धीरे-धीरे
कमरे के कोनों में भर रही है,
जैसे कोई पुरानी स्याही
काग़ज़ पर लौट आई हो।

खिड़की के बाहर
आकाश का रंग
निर्णय नहीं कर पा रहा
कि उसे उजाला रहना है
या स्मृति बन जाना है।

मेज़ पर रखा गिलास
आधा पानी से,
आधा पारदर्शिता से भरा है।

मैं उसे छूता हूँ
और अचानक महसूस करता हूँ
कि चीज़ें
अपने उपयोग से अधिक
अपनी चुप्पियों में जीवित रहती हैं।

किताब के भीतर दबा हुआ
एक सूखा पत्ता
इतने वर्षों बाद भी
हरा होने की कोशिश करता है।

समय यहाँ
आगे नहीं बढ़ता —
वह केवल
वस्तुओं की सतह पर
धीरे-धीरे जमता रहता है।

दीवार पर टँगी परछाईं
मेरी हर हरकत के साथ
थोड़ी देर से चलती है,
मानो उसे भी
विश्वास न हो
कि मैं सचमुच यहाँ हूँ।

बहुत देर बाद
जब कमरे में
सिर्फ़ साँसों की आवाज़ बचती है,
मैं महसूस करता हूँ —

मनुष्य शायद
अपने जीवन में
कभी पूरी तरह उपस्थित नहीं होता।

वह हमेशा
थोड़ा-सा कहीं और रहता है,
किसी अदृश्य गलियारे में
अपने ही लौटने की प्रतीक्षा करता हुआ।

अपनी ही उपस्थिति से भरता कमरा

 धीरे-धीरे

अपनी ही उपस्थिति से भरता कमरा

मुझे देखता है

जैसे मैं कोई वस्तु नहीं,

एक अधूरा उच्चारण हूँ।


दोपहर

काँच की सतह पर टिककर

बहुत देर तक

अपनी ही चमक सुनती रहती है।


बाहर

पेड़ों की परछाइयाँ

धरती पर नहीं गिरतीं अब —

वे हवा में ठहरी रहती हैं

किसी अनकहे निर्णय की तरह।


मैं मेज़ पर रखी

खुली हुई पुस्तक के पास बैठा हूँ

जहाँ शब्द

अपना अर्थ छोड़ चुके हैं

और केवल आकृतियाँ रह गए हैं।


घड़ी की सुइयाँ

समय नहीं बतातीं,

वे सिर्फ़

एक ही वृत्त को

बार-बार पूरा करती हैं।


मेरे भीतर

कोई बहुत पुरानी आवाज़

धीमे स्वर में

मेरा नाम दोहराती है,

मानो स्मृति भी

अब विश्वास के बिना बोलती हो।


रोशनी

दीवार पर एक सफ़ेद दरार खोलती है

और मैं अचानक

अपने ही चेहरे के भीतर

एक और चेहरा देख लेता हूँ —

न शांत,

न व्याकुल,

बस उपस्थित।


फिर सब कुछ

वैसा ही रह जाता है।


केवल मैं

थोड़ा कम वास्तविक होकर

कुर्सी पर बैठा रहता हूँ,

जैसे किसी विचार ने

क्षण भर के लिए

मनुष्य का आकार ले लिया हो।


मुकेश ,,,,,,,

रात के लगभग तीन बजे

 रात के लगभग तीन बजे

अचानक
नींद खुली
तो लगा
कमरे में कोई और भी है।

अँधेरा
सामान्य से थोड़ा अधिक गहरा था,
जैसे उसने
किसी चीज़ को छुपा रखा हो।

मैं उठकर बैठ गया।

मेज़ पर रखा गिलास
आधा भरा था,
और उसके भीतर की स्थिरता में
कुछ ऐसा था
जो मुझे असहज कर रहा था।

दूर कहीं
रेल गुज़री।

उसकी आवाज़
धीरे-धीरे
दीवारों से टकराकर
कमरे में फैल गई,
जैसे किसी ने
बहुत पुरानी याद का दरवाज़ा खोल दिया हो।

मैंने सोचा
कितने लोग होंगे इस समय जागते हुए —
कोई अस्पताल में,
कोई स्टेशन पर,
कोई किसी के लौट आने की प्रतीक्षा में,
और कोई
सिर्फ़ इसलिए
कि नींद अब उससे प्रेम नहीं करती।

खिड़की के बाहर
एक पेड़ स्थिर खड़ा था।

इतना स्थिर
कि कुछ देर के लिए
मुझे वह पेड़ नहीं,
अँधेरे का विचार लगा।

सुबह होने से ठीक पहले
कमरे की चीज़ें
धीरे-धीरे
अपना आकार वापस पाने लगीं।

कुर्सी फिर कुर्सी बनी,
दीवार फिर दीवार,
और मैं
फिर वही आदमी
जो दिन भर
सामान्य दिखाई देता है।

— मुकेश

दरवाज़ा खोलते ही मुझे लगा

 आज सुबह

दरवाज़ा खोलते ही
मुझे लगा
गलियारा थोड़ा लम्बा हो गया है।

अंत में लगी खिड़की
पहले से ज़्यादा दूर थी,
और वहाँ से आती रोशनी
किसी दूसरे मौसम की लग रही थी।

मैं धीरे-धीरे चला
जैसे अस्पतालों में चलते हैं लोग —
बिना किसी निश्चित डर के,
लेकिन पूरी तरह निश्चिन्त भी नहीं।

रास्ते में
दीवार पर टँगी एक तस्वीर
टेढ़ी मिली।

उसमें जो आदमी मुस्कुरा रहा था
उसे मैं पहचानता था,
हालाँकि
वह मैं नहीं था।

रसोई में
केतली बहुत देर तक
उबलती रही।

उसकी आवाज़ में
एक अजीब हड़बड़ी थी,
जैसे पानी नहीं,
समय खौल रहा हो भीतर।

मैंने कप में चाय डाली
तो भाप उठी
और कुछ क्षणों के लिए
मुझे लगा
कोई अदृश्य चेहरा
मेरे बहुत पास आ गया है।

बाहर
पेड़ों पर धूप थी,
लेकिन सड़क पर चलते लोग
ऐसे लग रहे थे
जैसे वे अपने-अपने सपनों से
निकाले जा चुके हों।

शाम तक
घर फिर सामान्य हो गया।

गलियारा
अपनी पुरानी लम्बाई में लौट आया,
तस्वीर सीधी हो गई,
और केतली चुप।

सिर्फ़ मेरे भीतर
कुछ हल्का-सा बदल गया था,
जिसका नाम
मैं अब तक नहीं जानता।

— मुकेश

एक दिन अचानक घर की सारी चीज़ों ने

 एक दिन

अचानक
घर की सारी चीज़ों ने
अपनी जगह बदल ली।

कुर्सी
खिड़की के पास चली गई,
घड़ी
दीवार से उतरकर
मेज़ पर रखी मिली,
और आईना
पूरा दिन
उल्टा टँगा रहा।

सिर्फ़ मैं
अपनी जगह पर बैठा रहा
जैसे किसी पुराने नक्शे में
भूल गया कोई शहर।

रात को
रसोई से
बर्तनों की बहुत धीमी आवाज़ें आती रहीं।

लगता था
वे आपस में
हम लोगों के बारे में बात कर रहे हों।

नींद में
मैंने देखा
कि मेरी परछाईं
मुझसे अलग होकर
सीढ़ियाँ उतर रही है।

उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

सुबह
दरवाज़े के बाहर
कीचड़ से भरे जूते पड़े थे,
हालाँकि रात भर
बारिश नहीं हुई थी।

मैंने उन्हें छुआ नहीं।

कुछ चीज़ें
समझ लेने के लिए नहीं,
सिर्फ़ धीरे-धीरे
अपने भीतर उतर जाने के लिए होती हैं।

और शायद
डर भी
एक तरह का दूसरा जीवन है
जिसे हम
अपने कमरे में
चुपचाप रहने देते हैं।

— मुकेश

मुझे समुद्र सुनाई देता रहा।

 कल रात

फ्रिज की हल्की आवाज़ में
मुझे समुद्र सुनाई देता रहा।

मैं रसोई में गया
तो देखा —
मेज़ पर रखा नींबू
धीरे-धीरे सूखते हुए
किसी छोटे ग्रह जैसा लग रहा था।

घर में
कई दिनों से
कोई ऊँची आवाज़ नहीं हुई थी।

फिर भी
दीवारों पर
तनाव की एक पतली परत जमी थी,
जैसे धुएँ की।

मैंने खिड़की खोली।

सामने वाली इमारत में
एक आदमी
रात के दो बजे
अपनी शर्ट इस्त्री कर रहा था।

इतनी रात गए
कौन
अपने कपड़ों की सिलवटें ठीक करता है?

शायद वही लोग
जो दिन भर
अपनी आत्मा की सिलवटें छुपाते रहे हों।

दूर कहीं
एक कुत्ता भौंका,
फिर सब कुछ
अचानक बहुत साफ़ सुनाई देने लगा —

घड़ी की टिक-टिक,
नल से गिरती बूँद,
मेरी साँस,
और भीतर
लगातार चलता हुआ
कोई पुराना पछतावा।

सुबह तक
नींबू और सिकुड़ गया था।

और मुझे लगा
समय
असल में इसी तरह बीतता है —

धीरे-धीरे
अपनी नमी खोते हुए।

— मुकेश

एक दिन अचानक

 एक दिन

अचानक
घर की सारी चीज़ों ने
अपनी जगह बदल ली।

कुर्सी
खिड़की के पास चली गई,
घड़ी
दीवार से उतरकर
मेज़ पर रखी मिली,
और आईना
पूरा दिन
उल्टा टँगा रहा।

सिर्फ़ मैं
अपनी जगह पर बैठा रहा
जैसे किसी पुराने नक्शे में
भूल गया कोई शहर।

रात को
रसोई से
बर्तनों की बहुत धीमी आवाज़ें आती रहीं।

लगता था
वे आपस में
हम लोगों के बारे में बात कर रहे हों।

नींद में
मैंने देखा
कि मेरी परछाईं
मुझसे अलग होकर
सीढ़ियाँ उतर रही है।

उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

सुबह
दरवाज़े के बाहर
कीचड़ से भरे जूते पड़े थे,
हालाँकि रात भर
बारिश नहीं हुई थी।

मैंने उन्हें छुआ नहीं।

कुछ चीज़ें
समझ लेने के लिए नहीं,
सिर्फ़ धीरे-धीरे
अपने भीतर उतर जाने के लिए होती हैं।

और शायद
डर भी
एक तरह का दूसरा जीवन है
जिसे हम
अपने कमरे में
चुपचाप रहने देते हैं।

— मुकेश