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ग़ज़ल - बारूद की जगह हाथों में किताब तो अच्छा हो,

  ग़ज़ल बारूद की जगह हाथों में किताब तो अच्छा हो, हर आँख में इंसानियत का ख़्वाब तो अच्छा हो। जो लोग बना बैठे हैं नफ़रत को ही मज़हब, उनके लिए भी कोई नया जवाब तो अच्छा हो। पत्थर की तरह दिल न रहें शहर के लोगों के, हर दिल में मुहब्बत का कोई गुलाब तो अच्छा हो। बच्चों के खिलौनों में न हों जंग के हथियार, आँगन में कोई चाँद-सा आफ़ताब तो अच्छा हो। जो सच को छुपाते रहे चेहरों के नक़ाबों में, उन आँखों में अब सच का कोई ख़्वाब तो अच्छा हो। मज़दूर के हाथों में हो मेहनत की नई दुनिया, हर भूखे के हिस्से में थोड़ा हिसाब तो अच्छा हो। सीमा पे खड़े लोग भी लौटें कभी घर अपने, धरती के लिए जंग नहीं—कोई सैलाब तो अच्छा हो। इंसान को इंसान समझने लगे दुनिया, इस दौर में इतना-सा इंक़लाब तो अच्छा हो। ‘मुकेश’ अब न पूछो कि कहाँ है सुकूँ दुनिया में, हर दिल में अगर अपना ही जवाब तो अच्छा हो। — मुकेश

ग़ज़ल - हर शहर की सड़कों पर सन्नाटा नहीं, हँसी हो,

  ग़ज़ल हर शहर की सड़कों पर सन्नाटा नहीं, हँसी हो, हर घर में लौटती हुई ख़ुशी तो अच्छी हो। जिस आँख में ठहरा है बरसों से दर्द गहरा, उस आँख में थोड़ी-सी रौशनी तो अच्छी हो। दीवार बहुत ऊँची है रिश्तों के दरमियाँ अब, दीवार से बड़ी कोई सादगी तो अच्छी हो। नफ़रत के ये बाज़ार बहुत गर्म हैं ज़माने में, इस दौर में थोड़ी-सी आदमी तो अच्छी हो। बच्चों के हाथ में फिर क़लम दिखाई दे कुछ, उनकी किताब में कोई ज़िंदगी तो अच्छी हो। मज़हब के नाम पर जो बँटे हैं तमाम चेहरे, उनके बीच फिर थोड़ी दोस्ती तो अच्छी हो। हर ओर धुआँ-धुआँ है, हर ओर ख़ौफ़ का मौसम, इस रात के बाद कोई ताज़गी तो अच्छी हो। पत्थर लिए जो निकले थे घर से किसी के ख़िलाफ़, उन हाथों में फूलों की बंदगी तो अच्छी हो। हमने तो उम्र भर बस यही माँगा है जहाँ से, इंसान में बची हुई इंसानगी तो अच्छी हो। ‘मुकेश’ अब और क्या चाहिए इस सफ़र में हमको, दिल में किसी के लिए थोड़ी ख़ुशी तो अच्छी हो। — मुकेश

महाभारत — भीष्मपर्व — कुरुक्षेत्र : युद्ध के पहले का मौन

  महाभारत — भीष्मपर्व — कुरुक्षेत्र : युद्ध के पहले का मौन उद्योगपर्व में शांति का अंतिम प्रयास विफल हो चुका था। कृष्ण हस्तिनापुर गए। उन्होंने समझाया। संधि का प्रस्ताव रखा गया। पाण्डवों ने अपने अधिकार को न्यूनतम सीमा तक घटा दिया। पाँच गाँव। दुर्योधन इसके लिए भी तैयार नहीं हुआ। अब वह क्षण आ गया था जहाँ शब्दों की सीमा समाप्त हो चुकी थी। दोनों पक्ष युद्ध के लिए तैयार होने लगे। दो सेनाएँ, एक वंश कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ एकत्रित होती हैं। एक ओर कौरवों की विशाल सेना। दूसरी ओर पाण्डवों की सेना।  यह केवल दो राजाओं की सेनाएँ नहीं हैं। एक ही वंश के लोग दो ओर खड़े हैं। भीष्म कौरव-पक्ष में हैं। द्रोण कौरव-पक्ष में हैं। कृपाचार्य कौरव-पक्ष में हैं। कर्ण दुर्योधन के पक्ष में है। और दूसरी ओर— अर्जुन। भीम। युधिष्ठिर। नकुल। सहदेव। द्रौपदी के पुत्र। अभिमन्यु। और उनके साथ कृष्ण। युद्ध की सबसे बड़ी विडम्बना यही है—  शत्रु बाहर से नहीं आया है। शत्रु वही है जिसे कभी अपना कहा गया था। कृष्ण ने शस्त्र क्यों नहीं उठाया? उद्योगपर्व का वह प्रसंग यहाँ अपना वास्तविक अर्थ प्राप्त करता है। कृष्ण ने ...

महाभारत — उद्योगपर्व — शांति का अंतिम प्रयास

  महाभारत — उद्योगपर्व — शांति का अंतिम प्रयास विराटनगर में पाण्डवों की पहचान प्रकट हो चुकी है। तेरह वर्ष की शर्त पूरी हो गई। अब उनके सामने एक सीधा प्रश्न है—  क्या उन्हें उनका राज्य वापस मिलेगा? पाण्डवों की ओर से अब तत्काल युद्ध की घोषणा नहीं होती। पहले प्रयास होता है—  संधि का।  यहीं से उद्योगपर्व आरम्भ होता है। “उद्योग” का अर्थ यहाँ केवल उद्योग या परिश्रम नहीं, बल्कि किसी बड़े कार्य के लिए किया गया प्रयास और तैयारी भी है। और महाभारत में यह तैयारी दो दिशाओं में चलती है—  युद्ध की तैयारी  और  शांति की तैयारी। विराट से हस्तिनापुर तक विराट की पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से होता है। इस विवाह के अवसर पर पाण्डवों के अनेक सहयोगी राजा एकत्र होते हैं। अब पाण्डव अकेले नहीं हैं। उनके पास मित्र-राज्य हैं, सेनाएँ हैं और कृष्ण का समर्थन है। दूसरी ओर हस्तिनापुर में दुर्योधन भी युद्ध की तैयारी कर रहा है। इस प्रकार दोनों पक्षों की शक्ति स्पष्ट होने लगती है। लेकिन अभी एक प्रश्न खुला है—  क्या युद्ध वास्तव में आवश्यक है? संजय का दूत बनकर जान...

महाभारत - आदिपर्व - विराटपर्व अज्ञातवास : जब राजकुमार अपनी ही पहचान से बाहर हो गए

 विराटपर्व अज्ञातवास : जब राजकुमार अपनी ही पहचान से बाहर हो गए बारह वर्ष का वनवास पूरा हो चुका था। अब पाण्डवों के सामने सबसे कठिन वर्ष था— तेरहवाँ वर्ष । शर्त थी कि उन्हें एक वर्ष तक अपनी पहचान छिपाकर रहना होगा। यदि पहचान प्रकट हो गई, तो फिर बारह वर्ष का वनवास दोहराना पड़ेगा। पाँचों भाई और द्रौपदी अब केवल अपने शत्रुओं से नहीं, अपनी पहचान से भी बच रहे थे। वे पहुँचे—  मत्स्य देश , जिसके राजा थे विराट । मत्स्य देश की आधुनिक भौगोलिक स्थिति सामान्यतः राजस्थान के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र और राजस्थान–हरियाणा के आसपास की प्राचीन राजनीतिक भूगोल से जोड़ी जाती है, जबकि विराटनगर की पहचान आज के बैराट (जिला जयपुर, राजस्थान) से की जाती है; इस पहचान को पूर्णतः निर्विवाद मानना उचित नहीं होगा। छह लोग, छह नई पहचान पाण्डवों ने विराट के दरबार में अलग-अलग रूप धारण किए। युधिष्ठिर बने—कंक, जो द्यूत और नीति जानने वाले सभासद हैं। भीम बने—बल्लव, राजभोजनशाला के रसोइए और बलशाली सेवक। अर्जुन बने—बृहन्नला, नृत्य-संगीत सिखाने वाले नपुंसक के रूप में। नकुल घोड़ों की देखभाल करने लगे। सहदेव पशुओं की देखरेख करन...

महाभारत -आदिपर्व - आख्यानों और उपाख्यानों को वर्तमान दृष्टि से पढ़ने की आवश्यकता

कथा → मूल प्रश्न → तार्किक/ऐतिहासिक सम्भावना → आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि → प्रतीकात्मक अर्थ → क्या सिद्ध है और क्या केवल सम्भावित व्याख्या है। भूमिका : आख्यानों और उपाख्यानों को वर्तमान दृष्टि से पढ़ने की आवश्यकता महाभारत में अनेक ऐसी कथाएँ आती हैं जिनमें देवता मनुष्यों से संवाद करते हैं, मृत्यु से वार्तालाप होता है, वरदान और शाप तत्काल परिणाम उत्पन्न करते हैं, मनुष्य असाधारण शक्तियाँ प्राप्त करता है और प्रकृति तथा अलौकिक सत्ता के बीच कोई स्पष्ट सीमा दिखाई नहीं देती। आधुनिक पाठक के सामने स्वाभाविक प्रश्न उठता है— क्या इन कथाओं को उसी रूप में ऐतिहासिक घटना मान लिया जाए?  क्या इन्हें केवल कल्पना और मिथक कहकर छोड़ दिया जाए? या इनके भीतर ऐसी मानवीय, प्राकृतिक अथवा सांस्कृतिक स्मृतियाँ हो सकती हैं जिन्हें प्राचीन कथाकार ने अपने समय की भाषा में व्यक्त किया? हमारा उद्देश्य इनमें से किसी एक उत्तर को पहले से स्वीकार करना नहीं होगा। महाभारत को समझने के लिए आवश्यक है कि हम उसके आख्यानों के साथ न श्रद्धाहीन होकर चलें, न अंधविश्वास के साथ। हमारी नई पद्धति अब तक हमने नल–दमयंती, सावित्री–सत्यवान, र...

महाभारत - आदिपर्व से वनपर्व की ओर वनवास : राजसत्ता से बाहर निकलकर दूसरे संसार में प्रवेश

 आदिपर्व से वनपर्व की ओर वनवास : राजसत्ता से बाहर निकलकर दूसरे संसार में प्रवेश द्यूतसभा में सब कुछ हारने के बाद पाण्डवों को बारह वर्ष का वनवास और उसके बाद एक वर्ष का अज्ञातवास स्वीकार करना पड़ा। इन्द्रप्रस्थ पीछे छूट गया। द्रौपदी के साथ पाँचों पाण्डव राजमहल से निकलकर वन की ओर चले। यह महाभारत की कथा में एक बड़ा परिवर्तन है। अब तक पाण्डवों का संघर्ष मुख्यतः राजसत्ता, उत्तराधिकार और राजसभाओं के भीतर था। अब वही पात्र वन, आश्रम, ऋषियों और दूसरे जीवन-जगतों के बीच दिखाई देंगे। जो लोग अभी तक राजसभा में धर्म का प्रश्न पूछ रहे थे, अब उन्हें वन में उसी धर्म को जीना है। 1. वन में प्रवेश पाण्डव वनवास के दौरान काम्यक वन और द्वैत वन जैसे वन-क्षेत्रों में रहते हैं। इन स्थानों की आधुनिक भौगोलिक पहचान पूरी तरह निश्चित नहीं मानी जाती, इसलिए इन्हें किसी एक वर्तमान जिले या राज्य से जोड़ना उचित नहीं होगा। उनके साथ अनेक ब्राह्मण भी हो जाते हैं। राजमहल की सुविधाएँ समाप्त हो चुकी हैं। अब भोजन, आश्रय, सुरक्षा और दैनिक जीवन स्वयं परीक्षा बन जाते हैं। द्रौपदी के भीतर अपमान की अग्नि है। भीम प्रतिशोध के लिए...

महाभारत - आदिपर्व — द्यूत की ओर बढ़ता हुआ संकट अगला भाग : राजसूय के बाद

 आदिपर्व — द्यूत की ओर बढ़ता हुआ संकट अगला भाग : राजसूय के बाद राजसूय यज्ञ सम्पन्न हो चुका है। युधिष्ठिर की प्रतिष्ठा बढ़ी है। अनेक राजा उनके अधीन या सहयोगी बन चुके हैं। इन्द्रप्रस्थ अब केवल पाण्डवों का निवास नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक शक्ति का केंद्र बन चुका है। और इसी समय दुर्योधन इन्द्रप्रस्थ से लौटता है। उसने देखा है— मायासभा का वैभव, पाण्डवों की सम्पन्नता, दूर-दूर से आए राजाओं का सम्मान, और युधिष्ठिर की बढ़ती प्रतिष्ठा। मायासभा में स्वयं उसके साथ हुई घटना ने उसके भीतर पहले से मौजूद ईर्ष्या को और तीखा कर दिया है। लेकिन महाभारत यहाँ तुरंत युद्ध नहीं करवाता। युद्ध के स्थान पर आता है—  द्यूत।  और यहीं से कथा धीरे-धीरे उस बिंदु की ओर बढ़ती है जहाँ परिवार के भीतर का विवाद सम्पूर्ण भारतवर्ष के युद्ध में बदल जाएगा। दुर्योधन की दृष्टि दुर्योधन हस्तिनापुर लौटकर अपने मन की स्थिति व्यक्त करता है। उसके लिए पाण्डवों का वैभव असह्य हो चुका है। लेकिन केवल ईर्ष्या ही समस्या नहीं है। उसे लगता है कि यदि पाण्डव इसी प्रकार शक्तिशाली होते गए तो हस्तिनापुर की वास्तविक शक्ति उनके सामने कम ...

महाभारत - आदिपर्व — मायासभा अद्भुत वास्तु से राजसूय तक : वैभव, दृष्टि और सत्ता

 आदिपर्व — मायासभा अद्भुत वास्तु से राजसूय तक : वैभव, दृष्टि और सत्ता खाण्डववन के दहन के बाद कथा में एक नया पात्र उभरता है— मय । वह सामान्य शिल्पी नहीं है। महाभारत उसे दानवों में श्रेष्ठ वास्तुकार के रूप में प्रस्तुत करता है। अर्जुन ने उसका जीवन बचाया था, इसलिए मय पाण्डवों के लिए एक ऐसी सभा बनाने का प्रस्ताव करता है जो साधारण मानवीय निर्माण से भिन्न हो। यहीं से मायासभा का प्रसंग आरम्भ होता है। लेकिन इस भाग में हमारा प्रश्न केवल यह नहीं होगा कि सभा कितनी अद्भुत थी। हम पूछेंगे—  महाभारत में एक “दानव” द्वारा पाण्डवों के लिए राजसभा बनवाने का क्या अर्थ है? कथा संक्षेप में मय अर्जुन से वर माँगता है। अर्जुन उससे अपने लिए कुछ माँगने के बजाय उसे अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने देता है। मय पाण्डवों के लिए एक भव्य सभा का निर्माण करता है। उसमें ऐसी वास्तु-कौशलपूर्ण रचनाएँ हैं कि वास्तविक और आभासी का अंतर समझना कठिन हो जाता है। कहीं जल दिखाई देता है जहाँ जल नहीं है। कहीं भूमि जल जैसी प्रतीत होती है। कहीं द्वार है तो कहीं द्वार का भ्रम। सभा केवल विशाल नहीं है—  वह देखने वाले की धारणा ...

महाभारत - आदिपर्व — खाण्डवप्रस्थ से इन्द्रप्रस्थ वन से नगर तक : सभ्यता, प्रकृति और सत्ता का रूपांतरण

 आदिपर्व — खाण्डवप्रस्थ से इन्द्रप्रस्थ वन से नगर तक : सभ्यता, प्रकृति और सत्ता का रूपांतरण द्रौपदी के विवाह के बाद पाण्डवों की राजनीतिक स्थिति बदल जाती है। अब उन्हें समाप्त कर देना आसान नहीं है। धृतराष्ट्र अंततः पाण्डवों को राज्य का एक भाग देने का निर्णय करते हैं। उन्हें मिलता है—  खाण्डवप्रस्थ। यह क्षेत्र उपजाऊ, विकसित राजधानी के रूप में प्रस्तुत नहीं होता। पाण्डवों को वहाँ जाकर अपना नया राज्य स्थापित करना है। यहीं से कथा का एक नया प्रश्न शुरू होता है—  राज्य केवल प्राप्त किया जाता है, या उसे बनाया भी जाता है? खाण्डवप्रस्थ : एक निर्जन भूमि? महाभारत में खाण्डवप्रस्थ को ऐसी भूमि के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसे पाण्डवों को विकसित करना है। वे वहाँ जाते हैं और अपनी नई राजधानी का निर्माण करते हैं। इसका नाम पड़ता है—  इन्द्रप्रस्थ।   अब तक पाण्डवों की कथा मुख्यतः संघर्ष और बचाव की कथा थी। अब पहली बार वे निर्माता बनते हैं। यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है। इन्द्रप्रस्थ केवल एक नगर नहीं इन्द्रप्रस्थ का निर्माण पाण्डवों के राजनीतिक पुनर्जन्म जैसा है। हस्तिनापुर में ...