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Monday, 18 May 2026

एक रात मैंने सपना देखा -14

 एक रात

मैंने सपना देखा

कि पूरी पृथ्वी
लंबे अँधेरे में डूबी हुई है।

सभ्यताएँ
अपने ही शोर से थककर
खंडहरों में बदल चुकी थीं,
और मनुष्य
अपनी आत्मा का रास्ता भूल चुका था।

समुद्रों पर धुआँ था,
आकाश पर
टूटे हुए उपग्रहों की राख तैर रही थी,
और शहरों में
मंदिर, मस्जिद, संसद, बाज़ार —
सब एक जैसे सुनसान थे।

तभी
बहुत दूर पूर्व दिशा में
एक हल्की-सी आभा दिखाई दी।

पहले लगा
जैसे कोई पुराना दीपक हो,
मगर धीरे-धीरे
वह प्रकाश
एक विराट सूरज में बदलने लगा।

वह सूरज
भारत से उग रहा था।

उसकी रोशनी में
कोई विजय का गर्व नहीं था,
कोई साम्राज्य नहीं,
कोई युद्धघोष नहीं।

बस
ऋषियों की शांत आँखें थीं,
उपनिषदों की धीमी गूँज,
बुद्ध की करुणा,
कबीर की उलझी हुई साखियाँ,
और किसी अनाम संत का मौन।

दुनिया के थके हुए लोग
धीरे-धीरे
उस रोशनी की तरफ़ चलने लगे।

क्योंकि सदियों बाद
उन्हें पहली बार
ऐसा प्रकाश दिखाई दिया था
जो आँखों को नहीं,
भीतर के अँधेरे को उजाला दे रहा था।

मैंने उस उगते हुए सूरज से पूछा 
“क्या तुम दुनिया बदल दोगे?”

उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

बस उसकी रोशनी में
मनुष्यों के चेहरे
धीरे-धीरे शांत होने लगे।

और बहुत समय बाद
पृथ्वी पर
पहली बार
शोर कम हुआ।

मुकेश

एक रात मैंने सपना देखा -13

 एक रात

मैंने सपना देखा

कि दुनिया के सारे धर्मगुरु
एक ही पर्वत की चोटी पर
इकट्ठा हो गए हैं।

किसी के हाथ में
धर्मग्रंथ था,
किसी के पास
माला, तस्बीह, क्रॉस या ध्वज।

नीचे
पूरा संसार
अपने ही विश्वासों में जल रहा था।

मंदिरों की घंटियाँ,
मस्जिदों की अज़ानें,
गिरजाघरों की प्रार्थनाएँ,
और मठों का मौन 
सब आपस में टकराकर
एक अजीब शोर में बदल गए थे।

पर्वत की चोटी पर
सभी गुरु
ईश्वर पर बोल रहे थे।

कोई कहता —
“वह प्रेम है।”

कोई कहता —
“वह न्याय है।”

कोई कहता —
“वह शून्य है।”

और कोई —
“वह सिर्फ़ हमारा है…”

बहुत देर तक
बहस चलती रही।

फिर अचानक
भीड़ के पीछे बैठा
एक छोटा-सा बच्चा उठकर खड़ा हुआ।

उसने धीरे से पूछा —

“अगर ईश्वर एक है
तो उसके नाम इतने बेचैन क्यों हैं?”

पूरा पर्वत
अचानक शांत हो गया।

धर्मग्रंथों के पन्ने
हवा में काँपने लगे,
और सभी धर्मगुरु
कुछ क्षणों के लिए
एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

मगर किसी के पास
उस बच्चे के प्रश्न का उत्तर नहीं था।

तभी
पूर्व दिशा में
धीरे-धीरे सुबह होने लगी।

और पहली धूप में
सभी परछाइयाँ
एक जैसी दिखाई देने लगीं।

मुकेश

एक रात मैंने सपना देखा -12

 एक रात

मैंने सपना देखा

कि दुनिया के सारे राष्ट्राध्यक्ष
एक ही गोल मेज़ पर इकट्ठा हो गए हैं।

उनके सामने
देशों के नक़्शे थे,
पर सीमाएँ
धीरे-धीरे पिघल रही थीं।

सभागार के बाहर
पूरा विश्व जल रहा था 
समुद्र धुएँ से भर चुके थे,
बच्चे
खाली कटोरियाँ लिए सो गए थे,
और शहर
अपनी ही राख में दबते जा रहे थे।

मगर भीतर
अब भी भाषण चल रहे थे।

हर नेता
मानवता की बात कर रहा था,
और हर वाक्य के पीछे
सत्ता की ठंडी गंध छुपी हुई थी।

अंत में
एक बूढ़ा सफ़ाईकर्मी बचा था
जो सभा ख़त्म होने के बाद
धीरे-धीरे कुर्सियाँ ठीक कर रहा था।

मैंने उससे पूछा 
“क्या उन्होंने दुनिया बचाने का कोई रास्ता निकाला?”

उसने थकी हुई आँखों से
खाली मेज़ की तरफ़ देखा
जहाँ पानी के आधे भरे गिलास
अब भी रखे थे।

फिर बहुत धीमे स्वर में बोला 

“वे दुनिया बचाना नहीं चाहते थे,
वे सिर्फ़
इतिहास में अपना नाम बचाना चाहते थे…”

इतना कहकर
उसने आख़िरी कुर्सी सीधी की
और सभागार की सारी बत्तियाँ बुझा दीं।

अँधेरे में
सिर्फ़ पृथ्वी का एक छोटा-सा ग्लोब बचा रहा
जो मेज़ पर
धीरे-धीरे घूम रहा था।

मुकेश

एक रात मैंने सपना देखा -11

 एक रात

मैंने सपना देखा

कि पूरी दुनिया
एक बंद पड़े कारख़ाने की तरह
खामोश हो गई है।

गगनचुंबी इमारतों की खिड़कियों में
अब कोई रोशनी नहीं थी,
और शेयर बाज़ार की स्क्रीन पर
सिर्फ़ एक शब्द चमक रहा था —
“शून्य”।

सड़कें
लक्ज़री कारों से भरी थीं,
मगर उन्हें चलाने वाला
कोई नहीं बचा था।

अंत में
सिर्फ़ स्टीव जॉब्स बचा था।

वह
एक खाली ऑडिटोरियम के मंच पर
काले टर्टलनेक में खड़ा
अपनी हथेली में
एक बुझा हुआ फ़ोन लिए हुए था।

दुनिया जल रही थी,
मगर उसकी आँखों में
अब भी
किसी अधूरे विचार की चमक थी।

मैंने उससे पूछा —
“क्या तकनीक मनुष्य को बचा पाएगी?”

स्टीव जॉब्स ने
धीरे से उस काले स्क्रीन वाले फ़ोन को देखा
जिसमें अब
कोई नोटिफ़िकेशन नहीं आ रहा था।

फिर कहा —

“तकनीक
मनुष्य को जोड़ती कम है,
उसके खालीपन को
ज़्यादा सुंदर बना देती है…”

इतना कहकर
उसने फ़ोन बंद कर दिया।

और उसी क्षण
पूरी पृथ्वी की स्क्रीनें
एक साथ अँधेरी हो गईं।

अंत में
सिर्फ़ एक हल्की नीली रोशनी बची रही
जो धीरे-धीरे
किसी मरती हुई स्मृति की तरह
बुझती जा रही थी।

मुकेश

एक रात मैंने सपना देखा -10

 एक रात

मैंने सपना देखा

कि पूरी दुनिया के विद्यालय
अचानक संग्रहालयों में बदल गए हैं।

कक्षाओं में
कुर्सियाँ थीं,
ब्लैकबोर्ड थे,
सूखी हुई चॉक की धूल थी,
मगर बच्चे नहीं थे।

किताबें
अपना अर्थ खो चुकी थीं,
और परीक्षाएँ
खाली काग़ज़ों पर ली जा रही थीं।

लोग
डिग्रियों को सीने से लगाए
भटक रहे थे,
जैसे ज्ञान नहीं,
उसकी रसीदें बची हों।

अंत में
सिर्फ़ पाउलो फ़्रेरे बचा था।

वह
एक उजड़े हुए स्कूल के बरामदे में बैठा
धीरे-धीरे
मिट्टी पर कुछ लिख रहा था।

मैंने पास जाकर देखा —
वह बच्चों के नाम लिख रहा था
जो कभी
सवाल पूछना चाहते थे।

मैंने उससे पूछा —
“क्या शिक्षा समाप्त हो गई?”

फ़्रेरे ने
टूटी हुई खिड़की से बाहर देखते हुए कहा —

“शिक्षा
कभी किताबों में नहीं रहती।

वह उस क्षण जन्म लेती है
जब कोई मनुष्य
डरना छोड़कर
पहला प्रश्न पूछता है…”

इतना कहकर
उन्होंने मिट्टी पर लिखे नामों पर
धीरे से हाथ फेर दिया।

और अचानक
हवा चलने लगी।

सारे नाम
धीरे-धीरे मिट गए,
मगर धूल में
अब भी
कुछ अधूरे प्रश्न चमक रहे थे।

मुकेश

एक रात मैंने सपना देखा - 9

 एक रात

मैंने सपना देखा

कि पूरी पृथ्वी
एक विशाल सोशल नेटवर्क में बदल गई है।

लोग
एक-दूसरे से जुड़े हुए थे,
मगर कोई
किसी को छू नहीं पा रहा था।

हर चेहरे पर
एक मुस्कान अपलोड थी,
और हर आत्मा के भीतर
धीरे-धीरे अँधेरा डाउनलोड हो रहा था।

शहरों के ऊपर
विशाल स्क्रीनें चमक रही थीं
जहाँ लोग
अपने अकेलेपन को
“स्टेटस” की तरह लिख रहे थे।

अंत में
सिर्फ़ ज़िग्मुंट बॉमन बचा था।

वह
किसी खाली मेट्रो स्टेशन पर
धीरे-धीरे टहल रहा था,
जैसे रिश्तों की टूटती हुई आवाज़ें
अब भी सुन पा रहा हो।

मैंने उससे पूछा —
“क्या प्रेम भी समाप्त हो गया?”

बॉमन ने
कुछ देर चुप रहकर
रेल की अँधेरी सुरंग की तरफ़ देखा।

फिर कहा —

“प्रेम समाप्त नहीं हुआ,
बस तरल हो गया है।

अब लोग
रिश्तों में नहीं रहते,
वे सिर्फ़
थोड़ी देर के लिए
एक-दूसरे की स्क्रीन पर दिखाई देते हैं…”

इतना कहकर
वह प्लेटफ़ॉर्म की आख़िरी बेंच पर बैठ गया।

और तभी
पूरे स्टेशन की रोशनी
एक-एक करके बुझने लगी।

अंत में
सिर्फ़ मोबाइल स्क्रीन की हल्की चमक बची रही
जिसमें
मनुष्य अपनी ही अनुपस्थिति पढ़ रहा था।

मुकेश

एक रात मैंने सपना देखा -8

 एक रात

मैंने सपना देखा

कि पूरी दुनिया का बाज़ार
अचानक बंद हो गया है।

स्टॉक एक्सचेंज की विशाल स्क्रीनें
काली पड़ चुकी थीं,
और मुद्राएँ
सूखे पत्तों की तरह
सड़कों पर उड़ रही थीं।

लोग
अपनी जेबों में भरी दौलत लेकर
रोटी खोज रहे थे,
मगर दुकानों में
अब सिर्फ़ सन्नाटा बिक रहा था।

अंत में
सिर्फ़ कार्ल मार्क्स बचा था।

वह
किसी पुराने कारख़ाने की टूटी सीढ़ियों पर बैठा
धीरे-धीरे धुएँ में घुलते शहर को
देख रहा था।

उसके पास
एक जंग लगी मशीन थी
जो अब भी
अपने आप चल रही थी,
जैसे श्रम की स्मृति
मृत्यु के बाद भी समाप्त न हुई हो।

मैंने उससे पूछा 
“क्या पूँजी आख़िरकार हार गई?”

मार्क्स ने
अपनी भारी आँखों से
भीड़ की तरफ़ देखा
जो अब भी
कुछ खरीदने की कोशिश कर रही थी।

फिर बहुत धीमे स्वर में कहा 

“पूँजी
कभी वस्तुओं में नहीं रहती।
वह मनुष्य की इच्छाओं में छिप जाती है।

और जब तक
इच्छाएँ बिकती रहेंगी,
दुनिया
अपनी ही आत्मा का व्यापार करती रहेगी…”

इतना कहकर
उन्होंने अपनी पुरानी किताब बंद कर दी।

और उसी क्षण
पूरे शहर की बिजली चली गई।

अँधेरे में
सिर्फ़ मशीन की धीमी आवाज़ बची रही
जो किसी अदृश्य फ़ैक्टरी में
अब भी काम कर रही थी।

मुकेश