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शाङ्कर दर्शन भाग 2 — शंकराचार्य के मूल ग्रंथ और भाष्य-परंपरा

  शाङ्कर दर्शन भाग 2 — शंकराचार्य के मूल ग्रंथ और भाष्य - परंपरा पिछले भाग में हमने देखा कि शाङ्कर दर्शन किसी शून्य से उत्पन्न हुआ मत नहीं है। उसकी जड़ें उपनिषदों की उस धारा में हैं जहाँ मनुष्य से पूछा जाता है — जिसे तुम ‘ मैं ’ कहते हो , उसका वास्तविक स्वरूप क्या है ? अब प्रश्न थोड़ा अधिक व्यावहारिक है — शंकराचार्य को पढ़ें कहाँ से ? यह प्रश्न इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि शंकराचार्य के नाम से आज अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं , परंतु सभी की प्रामाणिकता समान नहीं है। यदि हम बाद की अद्वैत - परंपरा , लोकप्रिय ग्रंथों और स्वयं शंकराचार्य के विचारों को बिना भेद किए एक साथ रख देंगे , तो “ शंकर दर्शन ” के स्थान पर “ अद्वैत परंपरा ” का सामान्य परिचय बन जाएगा। इसलिए इस भाग का विषय केवल ग्रंथों की सूची नहीं , बल्कि शंकराचार्य के दर्शन तक पहुँचने का सही द्वार है। शंकराचार्य के दर्शन के तीन मुख्य आधार वेदान्त की परंपरा में तीन ग्रंथ - समूह विशेष महत्त्व रख...