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Wednesday, 15 April 2026

वो खुश हो जाती है

वो खुश हो जाती है

बस गोलगप्पे खिला देने से,

जैसे स्वाद नहीं,

किसी ने उसे याद किया हो।


McDonald’s का एक छोटा-सा बर्गर,

उसके लिए दावत नहीं

तुम्हारा साथ होता है।


Pizza Hut की एक स्लाइस में भी,

वो ढूंढ लेती है

रिश्ते की गर्माहट।


एक पसंदीदा कपड़ा

बस इतना ही काफी है,

उसे यह यकीन दिलाने के लिए

कि तुमने उसे देखा है।


जब तुम कहते हो

“खाना बहुत अच्छा बना है”,

वो मुस्कुराती नहीं,

भीतर कहीं खिल उठती है।


उसकी नाराज़गी भी अजीब है

बात छोटी होती है,

पर उसमें छुपा होता है

अनदेखा रह जाने का डर।


वो रूठती है

क्योंकि उसे हक़ लगता है,

और मनाने की उम्मीद

प्यार की भाषा होती है।


कभी एक मैसेज ना आए

तो दिल में सवाल उठते हैं,

“याद हूँ भी या नहीं?”


उसकी खुशी बड़ी नहीं होती

बस सच्ची होती है,

इसलिए छोटी-छोटी चीज़ों में

पूरा दिल लगा देती है।


वो गुस्सा भी करती है

और उसी में छुपा होता है,

कि उसे परवाह है

तुम्हारे हर छोटे व्यवहार की।


मुकेश ,,,,,,,,,,

वर्तमान समय में विश्व की बौद्धिक चेतना

  वर्तमान समय में विश्व की बौद्धिक चेतना

(पिछले पच्चीस वर्षों के प्रमुख चिंतकों के आलोक में एक गंभीर विवेचन)

इक्कीसवीं सदी का प्रथम चतुर्थांश मानव इतिहास में एक असाधारण संक्रमणकाल के रूप में दर्ज होगा। तकनीक की तीव्र गति, लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा, जलवायु संकट, पहचान-राजनीति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, महामारी और वैश्विक पूँजी की पुनर्रचना—इन सबने मिलकर विश्व की बौद्धिक चेतना को एक नई दिशा दी है।


पिछले लगभग 25 वर्षों में विश्व-प्रसिद्ध चिंतकों ने जिस प्रकार मानव सभ्यता के भविष्य पर विचार किया है, वह न केवल चेतावनी देता है, बल्कि नए प्रतिमानों की खोज का आग्रह भी करता है। यह निबंध इन्हीं बौद्धिक प्रवृत्तियों का सम्यक् विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

1. वैश्वीकरण से “उत्तर-वैश्वीकरण” तक

बीसवीं सदी के अंतिम दशक में वैश्वीकरण को मानव विकास का स्वाभाविक पथ माना गया। परंतु 21वीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते इसकी सीमाएँ स्पष्ट होने लगीं।

Yuval Noah Harari ने अपनी कृतियों में यह संकेत दिया कि मनुष्य अब जैविक प्राणी से “डेटा-प्राणी” में रूपांतरित हो रहा है। उनके अनुसार भविष्य का संघर्ष विचारधाराओं का नहीं, बल्कि डेटा के नियंत्रण का होगा।

Thomas Piketty ने वैश्विक पूँजीवाद की असमानताओं को उजागर करते हुए दिखाया कि संपत्ति का संकेन्द्रण लोकतंत्र के लिए खतरा है।

इस प्रकार विश्व बौद्धिक चेतना में यह भाव उभरा कि आर्थिक प्रगति पर्याप्त नहीं; न्यायपूर्ण संरचना भी अनिवार्य है।

2. लोकतंत्र, पहचान और असुरक्षा

21वीं सदी में लोकतंत्र की परिभाषा पुनः प्रश्नांकित हुई।

Francis Fukuyama ने “इतिहास के अंत” की अपनी पूर्व धारणा के बाद स्वयं स्वीकार किया कि पहचान-राजनीति (Identity Politics) आधुनिक लोकतंत्रों को चुनौती दे रही है।

Martha Nussbaum ने करुणा और नैतिक शिक्षा को लोकतंत्र की रक्षा का साधन माना।

विश्व चेतना में यह द्वंद्व स्पष्ट है—व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामूहिक पहचान के बीच संतुलन कैसे बने?

3. तकनीकी चेतना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता

पिछले 25 वर्षों की सबसे निर्णायक शक्ति—प्रौद्योगिकी।

Elon Musk और Nick Bostrom जैसे विचारकों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संभावित अस्तित्वगत जोखिमों पर चेताया।

वहीं दूसरी ओर Ray Kurzweil ने “सिंगुलैरिटी” की संभावना को मानव उत्कर्ष का चरण माना।

यहाँ बौद्धिक चेतना द्विभाजित दिखती है

एक ओर तकनीक मुक्ति का साधन है,

दूसरी ओर वही मानव नियंत्रण से बाहर जा सकती है।

यह बहस आज की वैश्विक विमर्शधारा का केंद्रीय बिंदु है।

4. जलवायु संकट और नैतिक उत्तरदायित्व

21वीं सदी का बौद्धिक विमर्श जलवायु संकट के बिना अधूरा है।

Greta Thunberg ने युवाओं की चेतना को वैश्विक मंच दिया।

Naomi Klein ने पूँजीवाद और जलवायु विनाश के अंतर्संबंध को रेखांकित किया।

यहाँ विश्व चेतना में एक नैतिक आग्रह उभरा—

“प्रगति” यदि पृथ्वी के विनाश पर आधारित है, तो वह प्रगति नहीं, आत्मघात है।

5. उत्तर-मानववाद और अस्तित्व का प्रश्न

वर्तमान बौद्धिक चेतना में “मनुष्य” स्वयं एक प्रश्न बन गया है।

जैव-प्रौद्योगिकी, जीन-संपादन, साइबोर्ग अवधारणाएँ—ये सब संकेत देती हैं कि मानव की परिभाषा स्थिर नहीं है।

Slavoj Žižek ने महामारी और वैश्विक संकटों को पूँजीवादी संरचना के अंतर्विरोध के रूप में देखा।

महामारी (COVID-19) के बाद बौद्धिक जगत में यह प्रश्न गहरा हुआ—

क्या सभ्यता का वर्तमान मॉडल टिकाऊ है?

6. आध्यात्मिकता की पुनरावृत्ति

पिछले दो दशकों में पश्चिम में भी ध्यान, माइंडफुलनेस, योग और पूर्वीय दर्शन की ओर रुझान बढ़ा।

यह प्रवृत्ति केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और अस्तित्वगत संतुलन की खोज है।

आधुनिक चिंतक विज्ञान और अध्यात्म के संवाद की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं—जहाँ चेतना, मस्तिष्क और अनुभव का समेकित अध्ययन हो।

7. सूचना-युग और सत्य का संकट

सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया, परंतु “सत्य” को जटिल भी।

फेक न्यूज़, एल्गोरिदमिक पक्षपात, वैचारिक ध्रुवीकरण—ये सब आधुनिक बौद्धिक चेतना की चिंता हैं।

अब प्रश्न यह है कि

ज्ञान और सूचना में भेद कैसे किया जाए?

बुद्धि और एल्गोरिद्म में संतुलन कैसे बने?

समेकित विश्लेषण

यदि हम पिछले 25 वर्षों की वैश्विक बौद्धिक चेतना को संक्षेप में समझें, तो उसमें निम्न प्रवृत्तियाँ स्पष्ट हैं:

प्रौद्योगिकी-केंद्रित भविष्यदृष्टि

आर्थिक असमानता की तीव्र आलोचना

लोकतंत्र और पहचान का द्वंद्व

जलवायु नैतिकता का उदय

मानव-परिभाषा का पुनर्विचार

अध्यात्म और विज्ञान का संवाद

यह चेतना केवल आलोचनात्मक नहीं, बल्कि संक्रमणशील है—पुराने प्रतिमानों का विघटन और नए प्रतिमानों की खोज।

वर्तमान विश्व की बौद्धिक चेतना एक “संक्रमणकालीन चेतना” है। यह न तो पूर्णतः आधुनिक है, न उत्तर-आधुनिक; न पूर्णतः वैज्ञानिक, न आध्यात्मिक; न केवल वैश्विक, न पूर्णतः स्थानीय।

यह चेतना प्रश्न करती है

मनुष्य क्या है?

प्रगति का अर्थ क्या है?

क्या तकनीक मानव का विस्तार है या प्रतिस्थापन?

क्या पृथ्वी के बिना मानव सभ्यता संभव है?

पिछले पच्चीस वर्षों के चिंतन से यह स्पष्ट है कि विश्व बौद्धिकता अब एक समन्वित दृष्टि की ओर बढ़ रही है—जहाँ विज्ञान, नैतिकता, पर्यावरण और चेतना एक ही विमर्श में समाहित हों।

आज की वैश्विक बौद्धिक चेतना का मूल स्वर यही है:

सत्ता से अधिक उत्तरदायित्व, प्रगति से अधिक संतुलन, और ज्ञान से अधिक प्रज्ञा।

मुकेश श्रीवास्तव। 

आत्मन्तुलन आध्यत्मिक ऊर्जा केंद्र 

बालाजी ग्रीन विला 

विला नंबर 12 

ग्रेटर नॉएडा 


Tuesday, 14 April 2026

ईशावास्योपनिषद्—शंकरभाष्य, जयमंगलवार्तिक सहित” पर महामंडलेश्वर काशिकानन्द गिरि जी महाराज की कृति : एक शोधपूर्ण विवेचन

 ईशावास्योपनिषद्—शंकरभाष्य, जयमंगलवार्तिक सहित” पर महामंडलेश्वर काशिकानन्द गिरि जी महाराज की कृति : एक शोधपूर्ण विवेचन

भारतीय दार्शनिक परम्परा में उपनिषद् ज्ञान के सर्वोच्च शिखर माने जाते हैं। उनमें भी ईशावास्योपनिषद् अत्यन्त संक्षिप्त होते हुए भी गहनतम आध्यात्मिक रहस्यों को उद्घाटित करने वाला ग्रन्थ है। इस उपनिषद् पर आदि शंकराचार्य का भाष्य अद्वैत वेदान्त की आधारशिला है, और उस पर आधारित “जयमंगलवार्तिक” सहित काशिकानन्द गिरि (महामंडलेश्वर) की कृति आधुनिक युग में एक महत्त्वपूर्ण व्याख्यात्मक प्रयास के रूप में सामने आती है। प्रस्तुत निबंध में इस ग्रन्थ की शास्त्रीय, दार्शनिक और व्याख्यात्मक महत्ता का विश्लेषण किया गया है।

1. ईशावास्योपनिषद् का स्वरूप और महत्त्व

ईशावास्योपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद का अंश है और केवल 18 मन्त्रों में सम्पूर्ण वेदान्त का सार प्रस्तुत करता है। इसका प्रारम्भिक मन्त्र—

“ईशावास्यमिदं सर्वं…”

समस्त जगत् को ईश्वरमय मानने का अद्वैत सिद्धान्त प्रतिपादित करता है।

इस उपनिषद् के प्रमुख विषय हैं—

ईश्वर की सर्वव्यापकता

त्याग और भोग का समन्वय

कर्म और ज्ञान का सम्बन्ध

आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता

2. शंकरभाष्य की दार्शनिक भूमिका

आदि शंकराचार्य का भाष्य इस उपनिषद् की अद्वैतपरक व्याख्या करता है। उनके अनुसार—

“ईशावास्यम्” = समस्त जगत् ब्रह्म से आवृत है

त्याग = आसक्ति का परित्याग

भोग = कर्तव्य कर्म का निर्वाह

शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि—

- ज्ञान ही मोक्ष का एकमात्र साधन है

- कर्म केवल चित्तशुद्धि के लिए है

उनका भाष्य उपनिषद् के प्रत्येक मन्त्र को अद्वैत वेदान्त के सिद्धान्तों से जोड़ता है।

3. जयमंगलवार्तिक : परम्परा और उद्देश्य

“जयमंगलवार्तिक” शंकरभाष्य की व्याख्या पर आधारित एक विस्तृत टीका-परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है। “वार्तिक” का उद्देश्य केवल भाष्य की पुनरुक्ति नहीं, बल्कि—

शंका-समाधान

तर्क-वितर्क

गूढ़ार्थ का विस्तार

इस वार्तिक में अनेक दार्शनिक आपत्तियों का समाधान करते हुए अद्वैत सिद्धान्त को और अधिक दृढ़ किया गया है।

4. काशिकानन्द गिरि जी की कृति की विशेषताएँ

काशिकानन्द गिरि द्वारा प्रस्तुत यह ग्रन्थ शास्त्रीय परम्परा और आधुनिक दृष्टि का अद्भुत समन्वय है।

(क) त्रिस्तरीय व्याख्या-पद्धति

उनकी कृति में तीन स्तरों पर व्याख्या मिलती है—

मूल मन्त्र

शंकरभाष्य

जयमंगलवार्तिक सहित सरल व्याख्या

यह पद्धति पाठक को क्रमशः गहराई में ले जाती है।

(ख) सरलता और गाम्भीर्य का संगम

उन्होंने कठिन अद्वैत सिद्धान्तों को सहज भाषा में प्रस्तुत किया है, जिससे यह ग्रन्थ—

शोधार्थियों के लिए उपयोगी

सामान्य साधकों के लिए सुबोध

दोनों बन जाता है।

(ग) दार्शनिक समन्वय

काशिकानन्द गिरि जी ने केवल अद्वैत को ही नहीं, बल्कि—

कर्मयोग

भक्ति

ध्यान

इन सबको भी समाहित करते हुए समग्र आध्यात्मिक दृष्टि प्रस्तुत की है।

5. प्रमुख दार्शनिक विषयों का विश्लेषण

(i) ईश्वर और जगत् का सम्बन्ध

ग्रन्थ में यह स्पष्ट किया गया है कि—

- जगत् मिथ्या नहीं, बल्कि व्यवहारिक सत्य है

- परम सत्य केवल ब्रह्म है

यह शंकराचार्य के अद्वैत का ही विस्तार है।

(ii) त्याग और भोग का समन्वय

पहले मन्त्र की व्याख्या में बताया गया है—

त्याग = मानसिक अनासक्ति

भोग = कर्तव्य पालन

अतः संसार का परित्याग नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का परिवर्तन आवश्यक है।

(iii) कर्म और ज्ञान का सम्बन्ध

ग्रन्थ में यह प्रश्न उठता है—

- क्या कर्म और ज्ञान साथ-साथ चल सकते हैं?

उत्तर में यह प्रतिपादित किया गया है—

प्रारम्भ में कर्म आवश्यक है

अन्ततः ज्ञान ही मोक्ष देता है

(iv) अविद्या और विद्या

उपनिषद् के प्रसिद्ध मन्त्र—

“विद्यां चाविद्यां च…”

की व्याख्या में कहा गया है—

अविद्या = कर्म, विज्ञान, जगत् का ज्ञान

विद्या = आत्मज्ञान

दोनों का समन्वय जीवन को संतुलित बनाता है।

6. मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक आयाम

काशिकानन्द गिरि जी की व्याख्या में आधुनिक मनोविज्ञान की झलक भी मिलती है—

अहंकार = मानसिक बन्धन

अनासक्ति = मानसिक स्वतंत्रता

आत्मज्ञान = ultimate awareness

इस प्रकार उपनिषद् को केवल दार्शनिक न मानकर, जीवन-प्रबंधन (life management) का ग्रन्थ भी बनाया गया है।

7. समालोचनात्मक मूल्यांकन

(सकारात्मक पक्ष)

शास्त्रीयता और आधुनिकता का संतुलन

जटिल सिद्धान्तों की सरल प्रस्तुति

साधना और दर्शन का समन्वय

(सीमाएँ)

अत्यधिक सरलता कभी-कभी गूढ़ता को कम कर देती है

वार्तिक के कुछ दार्शनिक तर्कों का संक्षेपण हो गया है

फिर भी, यह कृति अपने उद्देश्य में अत्यन्त सफल है।

“ईशावास्योपनिषद्—शंकरभाष्य, जयमंगलवार्तिक सहित” पर काशिकानन्द गिरि की यह कृति भारतीय दर्शन के अध्ययन में एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। यह न केवल अद्वैत वेदान्त की गहराई को उद्घाटित करती है, बल्कि उसे आधुनिक जीवन के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक बनाती है।

अन्ततः यह ग्रन्थ हमें यह बोध कराता है कि

संसार में रहते हुए भी उससे ऊपर उठा जा सकता है

ज्ञान और कर्म विरोधी नहीं, पूरक हैं

और आत्मा ही परम सत्य है

इस प्रकार यह कृति उपनिषद् की शाश्वत शिक्षाओं को जीवंत और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करने वाला एक सेतु सिद्ध होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

“श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम” पर राधेश्याम चतुर्वेदी की टीका : एक शोधपूर्ण विवेचन

श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम” पर राधेश्याम चतुर्वेदी की टीका : एक शोधपूर्ण विवेचन

भारतीय तांत्रिक परम्परा में “शक्ति” की उपासना केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक साधना-पथ है। इस परम्परा के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों में श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम विशेष स्थान रखता है, जिस पर विद्वान आचार्य राधेश्याम चतुर्वेदी द्वारा की गई टीका इसे और अधिक सुलभ, तात्त्विक तथा शोधयोग्य बनाती है। प्रस्तुत निबंध में इस ग्रन्थ एवं उसकी टीका का तांत्रिक, दार्शनिक और साधनात्मक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण किया गया है।

1. ग्रन्थ का स्वरूप एवं परम्परा

“श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम” मूलतः शक्ति-साधना से सम्बद्ध एक तांत्रिक ग्रन्थ है, जिसमें देवी के विविध रूपों, मन्त्रों, यंत्रों तथा साधना-विधियों का विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया है। यह ग्रन्थ शाक्त तंत्र परम्परा का प्रतिनिधि है, जिसमें शक्ति को परम सत्ता (Ultimate Reality) के रूप में स्वीकार किया गया है।

तांत्रिक ग्रन्थों की भाँति इसमें भी

मन्त्र (ध्वनि-ऊर्जा)

यंत्र (रूप-ऊर्जा)

तत्त्व (दार्शनिक आधार)

तीनों का समन्वय मिलता है।

2. राधेश्याम चतुर्वेदी की टीका की विशेषता

राधेश्याम चतुर्वेदी की टीका इस ग्रन्थ को केवल अनुष्ठानिक ग्रन्थ न रहने देकर उसे दार्शनिक-व्याख्यात्मक ग्रन्थ का रूप प्रदान करती है। उनकी टीका की प्रमुख विशेषताएँ हैं—

(क) भाषिक सरलता और शास्त्रीयता का संतुलन

उन्होंने कठिन तांत्रिक शब्दावली को सरल भाषा में स्पष्ट किया है, किन्तु शास्त्रीयता से कोई समझौता नहीं किया।

(ख) मन्त्रार्थ का गूढ़ विश्लेषण

प्रत्येक मन्त्र के

बीजाक्षर (seed syllables)

स्वर-विन्यास

ध्वन्यात्मक शक्ति

का सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत किया गया है।

(ग) तांत्रिक साधना का मनोवैज्ञानिक पक्ष

टीका में साधना को केवल बाह्य क्रिया न मानकर, चेतना के रूपांतरण (transformation of consciousness) के रूप में देखा गया है।

3. तांत्रिक दर्शन की अभिव्यक्ति

इस ग्रन्थ में शक्ति को केवल देवी-स्वरूप में नहीं, बल्कि सर्वव्यापक ऊर्जा (cosmic energy) के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(i) शक्ति = ब्रह्म का गतिशील पक्ष

जहाँ वेदांत ब्रह्म को निर्गुण मानता है, वहीं तंत्र उसे शक्ति के रूप में गतिशील स्वीकार करता है।

(ii) कुण्डलिनी सिद्धान्त

ग्रन्थ में मानव शरीर को एक सूक्ष्म ब्रह्माण्ड माना गया है, जिसमें

मूलाधार से सहस्रार तक

ऊर्जा का आरोहण साधना का लक्ष्य है।

(iii) अद्वैत का तांत्रिक रूप

यहाँ अद्वैत केवल बौद्धिक सिद्धान्त नहीं, बल्कि अनुभवजन्य साधना है—

साधक = साध्य (देवी)

4. मन्त्र और साधना-विधि

“श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम” में मन्त्रों को केवल जप का साधन नहीं, बल्कि चेतना को परिवर्तित करने वाली शक्ति माना गया है।

मन्त्र की तीन अवस्थाएँ:

वाचिक (उच्चारण)

उपांशु (धीमा)

मानस (मन में)

टीका में बताया गया है कि वास्तविक साधना मानसिक स्तर पर होती है, जहाँ ध्वनि ऊर्जा बन जाती है।

5. यंत्र और प्रतीकवाद

ग्रन्थ में वर्णित यंत्र केवल चित्र नहीं, बल्कि ऊर्जा के ज्यामितीय रूप (geometric energy patterns) हैं।

त्रिकोण = शक्ति

वृत्त = अनन्तता

बिन्दु = परम तत्त्व

चतुर्वेदी जी ने इन प्रतीकों की गहन व्याख्या करते हुए उन्हें ध्यान (meditation) के उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

6. साधना का आन्तरिक रूप

टीका का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह बाह्य अनुष्ठानों से आगे बढ़कर साधना के आन्तरिकीकरण (internalization) पर बल देती है—

यज्ञ = आन्तरिक शुद्धि

पूजा = चेतना का केन्द्रित होना

देवी = स्वयं की चेतना का उच्चतम रूप

इस प्रकार तंत्र को रहस्यवाद से निकालकर आत्मानुभूति की प्रक्रिया के रूप में स्थापित किया गया है।

7. आधुनिक सन्दर्भ में प्रासंगिकता

आज के मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विमर्श में इस ग्रन्थ की प्रासंगिकता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है—

(i) मानसिक ऊर्जा का विज्ञान

मन्त्र और ध्यान को आज neuroscience और psychology भी स्वीकार करने लगे हैं।

(ii) स्त्री-शक्ति का दार्शनिक पुनर्पाठ

शक्ति को सर्वोच्च सत्ता मानना आधुनिक स्त्री-विमर्श (feminist philosophy) के लिए भी प्रेरक है।

(iii) आन्तरिक उपचार (Inner Healing)

तांत्रिक साधना को आज “energy healing” के रूप में भी देखा जा रहा है।

8. समालोचनात्मक दृष्टि

यद्यपि यह ग्रन्थ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, किन्तु कुछ आलोचनात्मक बिंदु भी हैं—

तांत्रिक ग्रन्थों की गूढ़ता साधारण पाठक के लिए कठिन है

कुछ अनुष्ठान आधुनिक सामाजिक सन्दर्भ में अप्रासंगिक प्रतीत हो सकते हैं

गुरु-परम्परा के बिना साधना का दुरुपयोग सम्भव है

किन्तु चतुर्वेदी जी की टीका इन सीमाओं को काफी हद तक संतुलित करती है।

"श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम” पर राधेश्याम चतुर्वेदी की टीका तांत्रिक साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह केवल एक व्याख्या नहीं, बल्कि तंत्र को दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से पुनर्स्थापित करने का प्रयास है।

यह ग्रन्थ हमें बताता है कि

शक्ति बाहर नहीं, भीतर है

मन्त्र शब्द नहीं, चेतना है

साधना क्रिया नहीं, अनुभव है

अतः यह कृति तंत्र को अंधविश्वास से निकालकर ज्ञान, अनुभव और आत्मबोध की दिशा में ले जाने वाली एक सेतु के रूप में स्थापित होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

सुनो कमला…

 सुनो  कमला…


तुम्हें हमने

कभी नाम से नहीं पुकारा

हमारे लिए तुम हमेशा

“अकेली औरत” ही रहीं।


गली के उस मकान में

जहाँ दरवाज़ा कम

और नज़रें ज़्यादा खुलती हैं

तुम रहती हो।


सुबह

तुलसी में पानी डालती हुई,

शाम

चुपचाप दीया जलाती हुई


जैसे तुम्हारा जीवन

बस इन दो समयों के बीच

अटका हुआ हो।


कहते हैं

तुम्हारी शादी नहीं हुई।


कुछ कहते हैं

हुई थी…

पर निभी नहीं।


कुछ कहते हैं

वह चला गया

या तुम छोड़ दी गईं।


सच क्या है

यह किसी ने जानना नहीं चाहा।


क्योंकि

हमारे लिए

कहानी से ज़्यादा

उसका निष्कर्ष ज़रूरी था


“अकेली है…”


हाँ! कमला…


हमने तुम्हें

हमेशा शक की नज़र से देखा


तुम हँस दो तो

“इशारा”

तुम चुप रहो तो

“घमंड”


तुम किसी से बात कर लो तो

“चरित्र”

और न करो तो

“रहस्य”


तुम्हारे जीवन का हर रंग

हमने

अपनी सुविधा से तय किया।


तुम बाज़ार जाती हो

तो आँखें पीछा करती हैं।


तुम छत पर कपड़े सुखाती हो

तो फुसफुसाहटें उठती हैं।


तुम रात को

थोड़ा देर तक जाग जाओ

तो कहानियाँ बन जाती हैं।


और इन सबके बीच

तुम बस जीती हो

धीरे-धीरे,

बिना शोर के।


कितनी बार

तुमने चाहा होगा

कि कोई तुम्हें

नाम से पुकारे


कोई पूछे

“कमला, तुम कैसी हो?”


पर हमने

तुम्हारी पहचान को

एक शब्द में समेट दिया

“अकेली”


हाँ! कमला…


तुम अधूरी नहीं थीं—

हमारी सोच अधूरी थी।


तुम छूटी नहीं थीं

हमने तुम्हें छोड़ दिया था।


तुम अकेली नहीं थीं

हम सब मिलकर

तुम्हें अकेला करते रहे।


और आज भी

जब तुम दरवाज़े पर बैठी

चुपचाप दुनिया देखती हो—


तो लगता है

तुम हमसे नहीं,

हमारी नज़रों से थक गई हो।


हाँ…


अगर अकेलापन

एक दोष है

तो दोषी तुम नहीं,

हम हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

सुहानी…

 सुहानी…

रात के ढाई बजे

जब शहर सो चुका होता है,

तुम जाग रही होती हो


हेडसेट कानों पर,

आवाज़ में मुस्कान लगाकर—

“हेलो सर…”


और उस “सर” के पीछे

कितनी बार

तुम्हें अपने ही स्वर से

घृणा हुई होगी—

हम कभी नहीं जान पाए।


दिन में

जब धूप दीवारों पर चढ़ती है,

तुम सोती हो


नींद में नहीं,

थकान में डूबी हुई—


और हम कहते हैं—

“देखो, दिन में सोती है…”


जैसे यह भी

कोई अपराध हो।


हाँ,

हमने तुम्हें देखा है—


कैब से उतरते हुए,

रात के सन्नाटे में

धीरे-धीरे चलते हुए


और हमारी आँखों में

सवाल नहीं,

संदेह था।


हमने तुम्हारा नाम नहीं जाना

बस तुम्हारा समय जान लिया

“रात में आती-जाती है…”


और बस

इतना ही काफ़ी था

तुम्हारा चरित्र तय करने के लिए।


तुम्हारी आवाज़

दूसरों की समस्याएँ हल करती रही—


“सर, मैं आपकी मदद कर सकती हूँ…”


पर तुम्हारे हिस्से की

कोई मदद

कभी किसी ने ऑफर नहीं की।


तुम्हारे लिए

रात नौकरी थी

हमारे लिए

रात एक कल्पना।


और हमने

अपनी कल्पनाओं से

तुम्हें बना दिया—

“वैसी लड़की…”


कितनी बार

तुमने हँसकर टाल दिया होगा

किसी ग्राहक की

फूहड़ बात


कितनी बार

अपनी चुप्पी में

अपमान निगला होगा


क्योंकि

कॉल कट करना

नौकरी खोना था।


घर में

माँ पूछती है

“इतनी रात तक काम ठीक है न?”


और तुम कहती हो

“हाँ…”


उस “हाँ” में

कितनी “ना” छिपी थीं

हम कभी नहीं समझ पाए।


हाँ! सुहानी…


तुम्हारी दुनिया

एयर-कंडीशन्ड दफ्तरों में थी,

पर तुम्हारी लड़ाई

गली-मोहल्ले की नजरों से थी।


हमने तुम्हें

आधुनिक कहा

फिर उसी आधुनिकता से

डर गए।


हमने तुम्हें

स्वतंत्र कहा

फिर उसी स्वतंत्रता को

संदेह बना दिया।


और अंत में

बहुत आसानी से कह दिया

“चरित्रहीन…”


जैसे यह शब्द

हमारे सारे अपराध

धो देता हो।


हाँ! सुहानी…


तुम गलत नहीं थीं

गलत हमारे पैमाने थे।


तुम बिखरी नहीं थीं

हमारी सोच बिखरी हुई थी।


तुम रात में काम करती थीं

हम अंधेरे में जी रहे थे।


और आज भी

जब कोई लड़की

रात में काम करती दिखती है


हम बदलते नहीं,

बस नाम बदल देते हैं।


हाँ…

अगर “चरित्र” इतना सस्ता है

तो चरित्रहीन तुम नहीं,

हम हैं।


मुकेश ,,,,,,,

पप्पू नेता…


 पप्पू नेता…

(एक छुटभैया राजनीतिक पार्टी का मामूली कार्य करता )

पप्पू नेता…

चौराहे की उस दीवार पर

आज भी चिपका है तुम्हारा पसीना

पोस्टर के गोंद में मिला हुआ,

सूखकर भी

छूटता नहीं।


तुम्हें पहली बार देखा था

हाथ में ब्रश,

कंधे पर बाल्टी,

और आँखों में

एक अजीब-सी चमक।

तुम नेता नहीं थे

पर “नेता” कहलाना

तुम्हें अच्छा लगता था।


रात-रात भर

तुम दीवारों पर

चेहरे चिपकाते थे

किसी और के।

सुबह होते-होते

पूरा शहर

किसी और का हो जाता था

और तुम

फिर भी अपने ही मोहल्ले में

अजनबी बने रहते थे।


नारे तुम्हारे थे

आवाज़ तुम्हारी थी

पर शब्द

किसी और के।

“ज़िंदाबाद!”

तुम चिल्लाते थे

और जिंदाबाद

किसी और का हो जाता था।


रैलियों में

सबसे आगे दौड़ते हुए

तुम्हें देखा है

लाठी भी पहले

तुम पर ही पड़ी थी,

और फोटो में

नेता जी मुस्कुरा रहे थे।


तुम्हारे घर की दीवार पर

अब भी

एक कैलेंडर टंगा है

जिसमें नेता जी के साथ

तुम्हारी एक धुंधली-सी फोटो है।

तुम हर आने वाले को दिखाते हो

“ये देखो, मैं भी साथ था…”

जैसे वह फोटो

तुम्हारी जिंदगी की

सबसे बड़ी उपलब्धि हो।


हाँ,

हम भी हँसे थे तुम पर

“अरे पप्पू, तुझे क्या मिलेगा?”

और तुम हँसकर कहते थे

“देख लेना, एक दिन…”


वह “एक दिन”

कभी नहीं आया।


चुनाव आए

तुमने पोस्टर लगाए,

झंडे बाँधे,

भीड़ जुटाई

और जीत के बाद

तुम्हारा फोन

कभी नहीं उठा।


तुम दरवाज़े पर खड़े रहे

अंदर कुर्सियाँ भर गई थीं।

तुम्हारे लिए

कोई जगह नहीं बची थी।


पप्पू नेता…

तुम्हें इस्तेमाल किया गया

और तुम

खुश थे इस्तेमाल होकर।

क्योंकि तुम्हें लगता था

यही रास्ता है

“ऊपर” जाने का।


पर असल में

तुम सीढ़ी थे

जिस पर चढ़कर

कोई और ऊपर गया।

और सीढ़ियाँ

कभी ऊपर नहीं जातीं।


आज भी

तुम किसी पोस्टर के पीछे

खड़े हो

चेहरा ढका हुआ,

नाम गायब

पर आवाज़ वही

“ज़िंदाबाद!”


हाँ…

अगर राजनीति

सेवा है

तो सेवक तुम थे।

अगर राजनीति

सत्ता है

तो सत्ता

कभी तुम्हारी नहीं थी।


और सच कहूँ

नेता तुम नहीं थे,

पप्पू…

नेता तो

हम सब हैं

जो तुम्हें देखकर भी

कुछ नहीं बदलते।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,