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मौन - 2

 मौन लोग समझते हैं मौन का अर्थ है कुछ न कहना। पर मैंने देखा है सबसे अधिक शोर अक्सर उन्हीं के भीतर होता है जो बहुत कम बोलते हैं। कोई अपनी अधूरी प्रेम-कथा दोहरा रहा है। कोई बीस वर्ष पुराना अपमान। कोई एक असफलता। कोई एक भय जो कभी घटित ही नहीं हुआ। बाहर से सब शांत दिखाई देते हैं। जैसे झील। जैसे संध्या। जैसे बंद खिड़की। पर भीतर विचारों की हवा चलती रहती है। स्मृतियों के पत्ते लगातार हिलते रहते हैं। और मनुष्य उसे जीवन समझ लेता है। शायद मौन चुप हो जाना नहीं है। शायद मौन वह क्षण है जब स्मृति भी विश्राम करे, कल्पना भी, भय भी, आशा भी— और जो शेष बचे वह केवल देखना हो। इस पुस्तक के सभी पात्र मौन की बात करेंगे। कुछ उसे खोजेंगे। कुछ उससे डरेंगे। कुछ उसे बीमारी समझेंगे। कुछ मुक्ति। पर अंततः उन्हें यह जानना होगा कि मौन कहीं बाहर नहीं रहता। वह उसी स्थान पर प्रतीक्षा करता है जहाँ मनुष्य पहली बार अपने भीतर के शोर को सुन लेता है। — मुकेश

मौन

 मौन इस समय धरती पर सबसे संकटग्रस्त चीज़ शायद मौन है। हर तरफ़ आवाज़ें हैं। घोषणाएँ। विज्ञापन। बहसें। प्रमाणपत्र। व्याख्याएँ। मगर मौन लगातार पीछे हट रहा है। जैसे जंगल शहरों से पीछे हटते हैं। जैसे नदियाँ कारखानों से। एक दिन जब आख़िरी मौन भी विलुप्त हो जाएगा तब मनुष्य को पता चलेगा कि उसने सुनना कब का छोड़ दिया था। मुकेश ,,,,

हस्ताक्षर

 हस्ताक्षर क़लम अब सिर्फ़ हस्ताक्षर नहीं करती। वह रोती भी है। जब उसे किसी कवि की मेज़ से उठाकर किसी समझौते पर रख दिया जाता है। जब उसे प्रेमपत्र से हटाकर त्यागपत्र लिखवाया जाता है। जब उससे कविता की जगह केवल स्वीकृतियाँ माँगी जाती हैं। स्याही जानती है कि उसका जन्म मुहर बनने के लिए नहीं हुआ था। वह नदी बनना चाहती थी। मुकेश ,,,,

खिड़की

  खिड़की घरों में खिड़कियाँ बची हुई हैं मगर खुलती नहीं। लोगों को डर है कि कहीं हवा कोई नया विचार न ले आए। कहीं धूप पुराने विश्वासों पर सवाल न लिख दे। कहीं कोई चिड़िया स्वतंत्रता का गीत न गा बैठे। इसलिए खिड़कियाँ बन्द हैं। और भीतर दम घुटने को "सुरक्षा" कहा जा रहा है। मुकेश ,,,,

आदमी

  आदमी धीरे-धीरे अपने परिचय-पत्र में बदल रहा है। उसका नाम एक नम्बर हो गया है। उसकी पहचान एक क्यूआर कोड। उसकी उपस्थिति एक ओटीपी। उसकी अनुपस्थिति एक डेटा एरर। लेकिन उसकी माँ आज भी उसे उसी नाम से बुलाती है जिस नाम से पहली बार बुखार में उसका माथा छुआ था। तकनीक हर बार यहीं आकर हार जाती है। मुकेश ,,,,

समाचार

 समाचार समाचारों ने सच्चाई से तलाक़ ले लिया है। अब वे हर शाम नये वस्त्र पहनकर आते हैं और चीख़ने लगते हैं। एक किसान की चुप्पी कहीं खबर नहीं बनती। एक मज़दूर का पसीना किसी बहस का विषय नहीं। पर एक झूठ यदि पर्याप्त शोर करे तो मुख्य शीर्षक बन जाता है। सच अब भी वहीं बैठा है पुराने बरगद के नीचे अपनी बारी की प्रतीक्षा में। उसे मालूम है कैमरे कभी उसकी ओर नहीं मुड़ेंगे। मुकेश ,,,,

पुस्तकालय

 पुस्तकालय पुस्तकालयों में अब उतनी ही चुप्पी बची है जितनी किसी बूढ़े पिता के पास सलाह देने के बाद बचती है। रैक पर रखी किताबें एक-दूसरे को देखती हैं जैसे बरसों से बिछड़े रिश्तेदार रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर। कई किताबों के पन्ने अब भी अधखुले हैं किसी पाठक की उँगलियों की प्रतीक्षा में। मगर शहर को जल्दी है। उसे ज्ञान नहीं, जानकारी चाहिए। और जानकारी इतनी तेज़ दौड़ रही है कि बुद्धि सड़क पार नहीं कर पा रही। मुकेश ,,,,