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Wednesday, 25 February 2026

समय से परे एक लम्हा

 समय से परे एक लम्हा


वो लम्हा

जिसने घड़ी की कलाई पकड़कर

उसे रोक दिया—

हमारे दरम्यान

कुछ ऐसा ठहर गया

जो उम्र नहीं गिनता था।


तुम्हारी आँखों में

उस दिन वक़्त

किसी शर्मीले बच्चे की तरह

कोने में जा छुपा था,

और मैं

तुम्हारे ख़ामोश मुस्कुराने में

अपनी सारी सदियाँ भूल बैठा।


हवा भी

साज़िश में शामिल थी—

वह तुम्हारे दुपट्टे से उलझकर

मेरी साँसों तक आती रही,

जैसे हर बार

मुझे याद दिला रही हो

कि इश्क़

छूने से नहीं,

महसूस होने से पूरा होता है।


उस एक पल में

तुम्हारा नाम

मेरे होंठों तक आया,

मगर आवाज़ नहीं बना—

सीधे दिल में उतर गया,

और वहाँ

हमेशा के लिए

ठहर गया।


हम कुछ नहीं बोले,

फिर भी

सब कुछ कह दिया—

तुम्हारा देखना

मेरी इबादत बन गया,

और मेरा ठहरना

तुम्हारी तसल्ली।


वो लम्हा

न बीता, न गुज़रा,

वह बस

हमारे बीच

एक नर्म-सी लकीर बन गया

जिसे पार करने की

हिम्मत भी इश्क़ थी,

और न करने की भी।


अब जब भी

ज़िंदगी तेज़ चलने लगती है,

मैं आँखें बंद करता हूँ

और उसी लम्हे में

वापस उतर जाता हूँ

जहाँ तुम

अब भी

मेरे सामने हो,

और वक़्त

अब भी

हमसे हार रहा है।


क्योंकि

कुछ मुलाक़ातें

घड़ियों में नहीं,

रूह में घटती हैं

और कुछ लम्हे

समय से परे जाकर

सिर्फ़

इश्क़ हो जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

ख़ामोशी की इबादत

 ख़ामोशी की इबादत

ख़ामोशी आज

मेरे पास बैठी है

बिलकुल तुम्हारी तरह,

बिना कुछ कहे

सब कुछ कहती हुई।


हवा ने जब

दीपक की लौ से

धीरे-से बात की,

तो साया समझ गया

कि उजाला

सिर्फ़ आँखों का मोहताज नहीं।


इस आँगन में

जहाँ साँसें

ज़िक्र बन जाती हैं,

और धड़कनें

तस्बीह की तरह

उँगलियों में फिसलती हैं,

वहाँ वक़्त

अपने जूते उतारकर

नंगे पाँव चलता है।


रात की पेशानी पर

जब नींद

चुपचाप हाथ रखती है,

तो सपने

किसी पुराने ख़त की तरह

ख़ुद-ब-ख़ुद खुलने लगते हैं

स्याही अब भी गीली,

मानी अब भी ज़िंदा।


मैंने देखा है

रूह को

अपने ही साए से

लिपटते हुए,

जब दुनिया की थकान

हड्डियों में उतर आती है।


उस लम्हे

कोई फ़रिश्ता नहीं उतरता,

बस एक एहसास

सीने के दरवाज़े पर

दस्तक देता है—

और कहता है,

“डरो मत,

तुम अकेले नहीं हो।”


यादें यहाँ

तस्वीरें नहीं बनतीं,

वे सुगंध हैं

जो अचानक

किसी दुआ के बीच

महक उठती हैं।


तुम्हारा होना

अब किसी शक्ल में नहीं,

तुम एक दिशा हो—

जिस तरफ़

मेरी तन्हाई

सज्दा करती है।


और जब

सब कुछ

अदृश्य हो जाता है,

तब समझ आता है

ईश्वर

कहीं बाहर नहीं,

वह इसी ख़ामोशी में

धीरे-धीरे

सांस ले रहा है।


आज फिर

दिल ने यही सीखा

पूरा होना

किसी के मिलने से नहीं,

बल्कि

अपने बिखरे टुकड़ों को

रोशनी में

समेट लेने से होता है।


और उस रोशनी में

अब भी

एक नर्म-सा सुकून है

जो कुछ भी नहीं माँगता,

सिर्फ़

ठहर जाने को कहता है।


मुकेश ,,,,,,,,

इंतज़ार करती औरत

 इंतज़ार करती औरत

शाम के झुटपुटे में

वह दरवाज़े की चौखट के पास

कुछ देर यूँ ही खड़ी रहती है

जैसे हवा से पूछ रही हो

कदमों की आहट का हाल।


चाय दो बार गरम हो चुकी है,

रोटी तवे से उतर कर

ढक दी गई है,

और दीवार पर लगी घड़ी

उसे हर मिनट

थोड़ा और समझदार बना रही है।


वह जानती है

इंतज़ार सिर्फ़ किसी के आने का नहीं होता,

कभी-कभी

अपने हिस्से की क़दर का भी होता है।


मोबाइल मेज़ पर रखा है,

स्क्रीन बार-बार नहीं देखती,

पर हर हल्की-सी आवाज़ पर

दिल ज़रूर चौंक जाता है।


वह बाहर से शांत है,

भीतर से हल्की-सी हलचल।

आँखों में शिकायत कम,

आदत ज़्यादा है।


दरवाज़ा अब भी बंद है।

रात थोड़ी और गहरी।


वह धीरे से कुंडी लगा देती है

जैसे उम्मीद को

आज के लिए

आराम दे रही हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,

झाड़ू बुहारती औरत

 झाड़ू बुहारती औरत


सुबह की हल्की ठंड में

वो आँगन में झाड़ू लगाती है।

धूल की महीन परत

रात भर चुपचाप जमी थी

जैसे कुछ अनकही बातें

दिल पर उतर आती हैं।


उसके हाथ

आदत से चलते हैं।

झाड़ू की सरसराहट

एक सीधी, थकी हुई लय

जिसमें न शिकायत है

न उतावलापन।


वो कोनों में जमी गंदगी

बड़ी सफ़ाई से खींच लाती है,

दरवाज़े के पास ढेर बना देती है

जैसे हर बिखराव को

काबू में करना

उसकी फितरत हो।


उसे मालूम है

धूल रोज़ लौटेगी।

फिर भी

वो हर सुबह

उसी समर्पण से

उसे बाहर कर आती है।


मगर एक चीज़ है

जो हर रोज़ लौटती है

और ढेर बनाकर

दरवाज़े से बाहर नहीं जाती।


वो है

उसके भीतर की थकान,

अनसुनी आवाज़ें,

अधूरे सपनों की किरचें।


उन्हें वो

झाड़ू से नहीं समेट पाती।


झुकते-झुकते

उसकी कमर में

सिर्फ़ उम्र नहीं,

कुछ चुप रह जाने की आदत भी भर गई है।


कभी वो सोचती है

क्या दुःख भी धूल होते

तो कितना आसान होता—

एक किनारे इकट्ठा करती,

कूड़ेदान में डाल आती,

और आँगन की तरह

दिल भी चमक उठता।


पर दुःख

कोनों में नहीं जमते

वो साँसों में बसते हैं।


आँगन साफ़ हो जाता है।

फर्श पर पानी का छिड़काव,

हल्की-सी ठंडक,

संतोष की एक रेखा।


वो सीधी होकर

चारों ओर देखती है

सब कुछ व्यवस्थित।


बस एक जगह

अब भी धूल बाकी है

उसके भीतर।


और वहाँ

वो हर सुबह

झाड़ू नहीं लगा पाती।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

एक तनहा स्त्री और मोबाइल सर्फिंग

 एक तनहा स्त्री और मोबाइल सर्फिंग


रात के साढ़े ग्यारह बजे

जब पड़ोस की आख़िरी बत्ती बुझती है

और रसोई में रखा बर्तन भी

ठंडा हो चुका होता है,

वो अपने बिस्तर के सहारे

मोबाइल खोलती है।


दिन भर की सधी हुई आवाज़,

नपे-तुले जवाब,

घर–दफ़्तर के बीच झूलती समझदारी

सब उतार कर

वो उँगलियों को

स्क्रीन पर रख देती है।


सबसे पहले

ख़बरों पर नज़र

दुनिया में क्या टूटा,

कहाँ क्या महँगा हुआ,

किसने किसे क्या कहा।

जैसे उसकी अपनी बेचैनी

वैश्विक हो।


फिर रील्स शुरू होती हैं

तीस सेकंड की हँसी,

किसी का ट्रेंडिंग डांस,

किसी की “मॉर्निंग रूटीन”

जिसमें सब कुछ चमकता हुआ।


वो मुस्कुरा कर

स्क्रॉल कर देती है।


फिर कुछ मोटिवेशनल वीडियो

“खुद से प्यार करो”,

“किसी के इंतज़ार में मत रहो”,

“स्ट्रॉन्ग वुमन बनो”—

वो आधा सुनती है,

आधा महसूस करती है,

और आधा अपने अंदर

रख लेती है।


कभी कुकिंग रील्स—

नई रेसिपी,

सजावटी थाली,

मीठी आवाज़ में समझाती कोई औरत—

वो सोचती है,

“मैं भी बना सकती हूँ…”

फिर याद आता है

खाने वाले कितने हैं।


कभी शायरी वाली रील—

धीमी आवाज़ में

“तन्हाई”, “इंतज़ार”, “आदत” जैसे शब्द

वो एक पल को ठहरती है,

जैसे किसी ने

उसका हाल चुरा लिया हो।


फेसबुक पर

वो पुरानी सहेलियों की पोस्ट पढ़ती है

बच्चों की तस्वीरें,

परिवार की छुट्टियाँ,

सजावट से भरी सालगिरहें।

वो दिल का इमोजी भेज देती है,

और अपने दिल को

समझा देती है।


कभी वो

महिला समूहों की पोस्ट पढ़ती है—

रिश्तों की उलझनें,

पति की बेरुख़ी,

स्वाभिमान की बातें

वो चुपचाप पढ़ती है,

जैसे कोई आईना हो

जिसमें अपना चेहरा दिखता हो।


कभी पुरानी चैट तक जाती है

जहाँ बातें लंबी थीं

और रात छोटी।

अब जवाब छोटे हैं

और रात लंबी।


उसकी उँगलियाँ

एक नाम पर रुकती हैं,

फिर आगे बढ़ जाती हैं

जैसे आत्मसम्मान

इच्छा से थोड़ा भारी हो।


मोबाइल की बैटरी

धीरे-धीरे कम होती है,

रील्स बदलती रहती हैं,

चेहरे बदलते रहते हैं

पर उसकी तनहाई

वही रहती है।


आख़िर में

वो स्क्रीन बंद करती है।

कमरा अँधेरा हो जाता है।

नीली रोशनी बुझ जाती है

मगर भीतर की

हल्की-सी चमक

अब भी जागती रहती है।


वो करवट बदलती है

खाली जगह की तरफ़।


और सोचती है

कल शायद

मैं कम स्क्रॉल करूँगी,

और ज़रा-सा

खुद को ज़्यादा पढ़ूँगी।


मुकेश ,,,,,,,,

मुझे मालूम है…

 मुझे मालूम है…


मुझे मालूम है

तुम मोबाइल में क्या–क्या देखती हो

और क्या स्क्रॉल करके

आगे बढ़ जाती हो।


तुम हर तस्वीर पर नहीं ठहरती—

बस उन चेहरों पर

जहाँ कभी तुम्हारा नाम

हल्के से चमका था।


तुम हर शेर को नहीं पढ़ती—

सिर्फ़ वो अल्फ़ाज़

जो तुम्हारी रातों की तरह

थोड़े अधूरे,

थोड़े बेचैन होते हैं।


मुझे मालूम है

तुम किस पोस्ट पर मुस्कुरा देती हो

और किसे बिना प्रतिक्रिया

चुपचाप गुज़र जाने देती हो—

जैसे कुछ लोग ज़िन्दगी में

आए भी थे

और तुमने जताया भी नहीं।


तुम “online” सबको देखती हो

पर खुद को “available” नहीं करती,

तुम्हारी उँगलियाँ

कई बार किसी नाम तक जाती हैं

फिर लौट आती हैं—

जैसे दरवाज़े तक पहुँच कर

इज़्ज़त से वापस मुड़ जाना।


तुम स्टेटस पढ़ती हो—

खुशियों के, यात्राओं के,

नई मोहब्बतों के—

और तुम्हारे भीतर

एक पुरानी शाम

हल्का-सा करवट लेती है।


तुम जानती हो

हर चमकती तस्वीर

रोशनी नहीं होती,

कुछ बस फ़िल्टर होते हैं—

और तुम फ़िल्टरों से

सच पहचानना सीख चुकी हो।


मुझे ये भी मालूम है

तुम देर रात

पुरानी चैट ऊपर तक स्क्रॉल करती हो—

जहाँ “ख़याल रखना”

अब भी पड़ा है

बिना किसी जवाब के।


फिर तुम स्क्रीन लॉक कर देती हो,

जैसे दिल पर ताला लगा हो—

आवाज़ें आती रहें,

पर अंदर कोई हलचल न हो।


मगर सुनो,

तुम सिर्फ़ देखने वाली नहीं हो—

तुम्हारे भीतर भी

एक पूरी कहानी है

जिसे तुम अभी

पोस्ट नहीं करती।


और एक दिन

जब तुम स्क्रॉल करना छोड़ कर

अपने हिस्से की रोशनी चुनोगी,

तो मोबाइल की स्क्रीन नहीं,

तुम्हारी आँखें चमकेंगी—

बिना किसी नोटिफ़िकेशन के।


मुकेश ,,,,,,,,,,

तुम, तनहाई, तुम्हारा बिस्तर और मोबाइल

 तुम, तनहाई, तुम्हारा बिस्तर और मोबाइल

रात के आख़िरी पहर में

जब दीवारों पर टंगी घड़ी

अपनी ही धड़कन सुनती है,

तुम अपने बिस्तर के कोने पर सिमटी होती हो

जैसे कोई सवाल

अपने ही जवाब से डर रहा हो।


तकिये की सिलवटों में

दिन भर की थकान पड़ी रहती है,

और चादर पर

तुम्हारी उंगलियों के हल्के-हल्के निशान

जैसे किसी ने ख़ामोशी से

किसी का नाम लिखा हो

और फिर खुद ही मिटा दिया हो।


मोबाइल की नीली रौशनी

तुम्हारे चेहरे पर गिरती है,

एक ठंडी चाँदनी की तरह—

बिना मौसम, बिना आसमान।

वो रौशनी

तुम्हारी आँखों में उतर कर

पुराने चैट, अधूरी बातें,

और “last seen” का सूखा सा सच

फिर से जगा देती है।


तुम उँगलियों से

स्क्रीन पर रिश्तों को स्क्रॉल करती हो—

कुछ हँसते हुए इमोजी,

कुछ आधे-अधूरे वादे,

कुछ तस्वीरें

जिनमें मुस्कुराहटें पूरी थीं

मगर इरादे आधे।


तनहाई

कोई शोर नहीं करती—

वो बस तुम्हारे पास बैठ जाती है,

तुम्हारे बालों में हाथ फेरती है

और कहती है—

“देखो, सब यहीं है,

बस वो नहीं है

जिसके लिए तुम जाग रही हो।”


बिस्तर तुम्हारा हमराज़ है,

वो जानता है

किस करवट पर आह निकलती है,

किस करवट पर आँख भर आती है।

मोबाइल तुम्हारा आईना है

वो दिखाता है

कि कितने लोग “online” हैं

और कितनी दूरियाँ “active”।


तुम एक मैसेज लिखती हो—

“कैसे हो?”

फिर उसे मिटा देती हो।

जैसे दिल ने दरवाज़ा खोला हो

और अक़्ल ने चुपके से

कुंडी चढ़ा दी हो।


रात बढ़ती जाती है,

बैटरी गिरती जाती है,

और तुम्हारी उम्मीद

चार्जर ढूँढती रहती है।


आख़िरकार

तुम मोबाइल को सीने पर रख

आँखें बंद कर लेती हो

जैसे किसी का हाथ हो

जो अब सिर्फ़

वज़न भर रह गया है।


और तनहाई

वो मुस्कुरा कर

तुम्हारे पास लेट जाती है,

बिलकुल बराबर में,

जहाँ कभी

कोई और हुआ करता था।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,