महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 18 : कृष्ण कौन हैं? — मानव, योगेश्वर या परम तत्त्व?
महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 18 : कृष्ण कौन हैं? — मानव, योगेश्वर या परम तत्त्व? महाभारत की पूरी कथा में यदि किसी एक पात्र की उपस्थिति सबसे अधिक स्तरों पर दिखाई देती है, तो वह कृष्ण हैं। वे यादव हैं, वसुदेव–देवकी के पुत्र हैं, गोकुल और वृन्दावन की स्मृतियों से जुड़े हैं, मथुरा के राजनीतिक संघर्ष में उपस्थित हैं, द्वारका के निर्माता हैं, पाण्डवों के मित्र हैं, द्रौपदी के सम्बन्धी हैं, शान्तिदूत हैं और कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथी हैं। लेकिन गीता में वही कृष्ण अचानक एक और आयाम ग्रहण करते हैं। वे कहते हैं— अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥ — भगवद्गीता 10.8 “मैं सम्पूर्ण का उद्गम हूँ; मुझसे ही सब प्रवर्तित होता है।” अब प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि कृष्ण कौन हैं? प्रश्न यह है— महाभारत कृष्ण को किस स्तर पर प्रस्तुत करता है? क्या वे इतिहास के एक असाधारण मनुष्य हैं, जिनके व्यक्तित्व को बाद की परम्परा ने दिव्यता प्रदान की? क्या वे प्रारम्भ से ही परम पुरुष के रूप में प्रस्तुत हैं? या महाभारत स्वयं इन दोनों स्तरों को एक साथ लेकर चलता है? यही ...