भाग–३ : योग का दार्शनिक आधार — चित्त, वृत्ति और पुरुष
भाग – ३ : योग का दार्शनिक आधार — चित्त , वृत्ति और पुरुष इस भाग में चर्चा केवल सूत्रों के अर्थ तक सीमित न रहकर यह खोजेगी कि पतञ्जलि के यहाँ योग वास्तव में किस समस्या का समाधान है । इसके केंद्र में रहेगा — चित्त की संकल्पना चित्त और पुरुष का भेद वृत्ति का स्वरूप चित्तवृत्ति - निरोध का वास्तविक अर्थ प्रमाण , विपर्यय , विकल्प , निद्रा और स्मृति क्लेश और चित्त की अशुद्धि सांख्य और योग का दार्शनिक संबंध पुरुष की साक्षित्व - स्थिति समाधि की ओर चित्त की गति योग को केवल साधना नहीं , बल्कि चेतना - विज्ञान के रूप में समझने की सम्भावना योग का दार्शनिक आधार — चित्त , वृत्ति और पुरुष प्रस्तावना : योग आखिर किस समस्या का उत्तर है ? पतञ्जलि का योगदर्शन यदि केवल आसन , प्राणायाम , ध्यान और समाधि की साधना - पद्धति होता , तो उसे समझना अपेक्षाकृत सरल होता। लेकिन पतञ्जलि का उद्देश्य इससे कहीं अधिक गहरा है। वे मनुष्य से यह नहीं पूछते कि — “ तुम अपने म...