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Sunday, 19 April 2026

श्रुति-परंपरा की पुनःस्थापना — “इति शुश्रुम धीराणाम्…” पद का (संभूति–असंभूति सन्दर्भ में) निबंधात्मक विवेचन

श्रुति-परंपरा की पुनःस्थापना — “इति शुश्रुम धीराणाम्…” पद का (संभूति–असंभूति सन्दर्भ में) निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

इति — एवं;

शुश्रुम — श्रुतवन्तः वयम्;

धीराणाम् — धीमतां वचनम्;

ये नः तत् विचचक्षिरे — व्याकृत-अव्याकृत-उपासना-फलम् व्याख्यातवन्तः इत्यर्थः॥१३॥

ईशावास्योपनिषद् के त्रयोदश मन्त्र का यह समापन-पद— “इति शुश्रुम धीराणाम् ये नस्तद्विचचक्षिरे”— केवल एक प्रमाणसूचक वाक्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विवेचन की प्रामाणिकता और परंपरागत आधार को दृढ़ करता है। यहाँ उपनिषद् यह स्पष्ट करता है कि सम्भूति (व्याकृत) और असम्भूति (अव्याकृत) — इन दोनों उपासनाओं के भिन्न-भिन्न फलों का जो निरूपण किया गया है, वह किसी व्यक्तिगत चिन्तन का परिणाम नहीं, बल्कि धीर आचार्यों की अनुभूति-समर्थित शिक्षा है।

“इति” — उपदेश का समाहार

“इति” शब्द यहाँ समस्त पूर्वोक्त विचारों का समाहार करता है—

सम्भूति और असम्भूति का भेद

उनके फल का पृथक्करण

समुच्चय की आवश्यकता

अर्थात्—

जो कुछ अभी तक कहा गया, वह इसी प्रकार है— “एवं”।

“शुश्रुम” — श्रवण का आध्यात्मिक अर्थ

“शुश्रुम” का सामान्य अर्थ “हमने सुना है” है, किन्तु यहाँ इसका आशय अत्यन्त गहरा है—

यह श्रुति-परंपरा का द्योतक है

यह श्रवण—

गुरु से शिष्य तक

शास्त्रसम्मत और अनुभवसमन्वित

अतः—

- यह ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं,

-बल्कि अनुभव-प्रमाणित परंपरागत सत्य है।

“धीराणाम्” — तत्त्वदर्शी आचार्य

“धीर” वे हैं—

जिनकी बुद्धि स्थिर है

जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया है

जो शास्त्र और अनुभव दोनों में निपुण हैं

आदि शंकराचार्य के अनुसार, ऐसे धीर पुरुष ही वास्तविक प्रमाण हैं, क्योंकि उनका वचन प्रत्यक्षानुभव से उत्पन्न होता है।

“ये नः तद्विचचक्षिरे” — व्याख्यान की परंपरा

यहाँ “विचचक्षिरे” शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है—

इसका अर्थ है—

विस्तारपूर्वक समझाया

संशयों का समाधान किया

तत्त्व का विश्लेषण किया

अर्थात्—

इन धीर आचार्यों ने—

व्याकृत (संभूति) की उपासना का फल

अव्याकृत (असंभूति) की उपासना का फल

दोनों को स्पष्ट रूप से व्याख्यात किया है।

“व्याकृत–अव्याकृत उपासना-फल” — ज्ञान का विषय

इस पद में यह भी निहित है कि—

उपनिषद् का विषय केवल उपासना नहीं,

बल्कि उसके फल का यथार्थ विवेचन है

सम्भूति → अणिमा आदि ऐश्वर्य, उच्च लोक

असम्भूति → प्रकृतिलय, अज्ञानात्मक लय

इन दोनों के भेद को जानना—

साधक के लिए अत्यन्त आवश्यक है

दार्शनिक महत्त्व

यह पद एक अत्यन्त गहरी बात स्थापित करता है—

आध्यात्मिक ज्ञान का आधार परंपरा है

यह—

न तो व्यक्तिगत मत है

न ही केवल तर्क का निष्कर्ष

बल्कि—

यह एक जीवित ज्ञान-धारा है,

जिसे आचार्यों ने अनुभव से प्रमाणित किया है।

साधक के लिए संदेश

इस पद से साधक को तीन प्रमुख शिक्षाएँ मिलती हैं—

गुरु-परंपरा का आश्रय अनिवार्य है

फलभेद को समझना आवश्यक है

स्वतंत्र कल्पना से अधिक महत्त्वपूर्ण है — प्रमाणिक श्रवण

इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि सम्भूति और असम्भूति की उपासनाओं के फल का जो विवेचन किया गया है, वह धीर आचार्यों की परंपरा से प्राप्त है।

अतः—

“इति शुश्रुम धीराणाम्” केवल एक कथन नहीं, बल्कि यह उद्घोष है कि यह ज्ञान—

 परंपरागत है,

अनुभवसिद्ध है,

और साधक के लिए मार्गदर्शक है।

यही इस पद का सार है—

सत्य वही है, जो धीरों की परंपरा से श्रवण कर, विवेकपूर्वक ग्रहण किया जाए।


मुकेश',,,,,,,,,,,,,

अव्याकृत-उपासना का फल — “असंभवाद् अन्यत्…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन

 अव्याकृत-उपासना का फल — “असंभवाद् अन्यत्…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

तथा च अन्यत् आहुः असंभवात् — असंभूतेः, अन्यात् व्याकृतात्, अव्याकृत-उपासनात्।

यत् उक्तम्— “अन्धं तमः प्रविशन्ति” इति; “प्रकृतिलयः” इति च पौराणिकेषु उच्यते॥१३॥

ईशावास्योपनिषद् के त्रयोदश मन्त्र पर आदि शंकराचार्य का यह भाष्यांश “असंभव” अथवा “असंभूति” की उपासना के फल को स्पष्ट करता है। जहाँ “संभव” (कार्य-ब्रह्म) की उपासना से अणिमा आदि ऐश्वर्य की प्राप्ति बताई गई, वहीं यहाँ यह प्रतिपादित किया जा रहा है कि “असंभव”— अर्थात् अव्याकृत, प्रकृति— की उपासना का फल उससे सर्वथा भिन्न है।

“असंभवात्” — अव्याकृत का निर्देश

शंकराचार्य “असंभव” का अर्थ करते हैं—

असंभूति — जो उत्पन्न नहीं हुआ

अव्याकृत — अप्रकट अवस्था

प्रकृति — मूल कारण


यह वह स्थिति है—

जिससे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है

परन्तु जो स्वयं जड़ और अचेतन है

“अन्यत् आहुः” — फल की भिन्नता

यहाँ “अन्यत्” शब्द पुनः यह स्पष्ट करता है—

असम्भूति की उपासना का फल

सम्भूति (कार्य-ब्रह्म) की उपासना से सर्वथा भिन्न है


यह भिन्नता केवल मात्रा में नहीं,

बल्कि स्वरूप में है।

“अव्याकृतोपासनात्” — जड़ कारण की उपासना

जो साधक—

अव्याकृत (प्रकृति) को ही अंतिम सत्य मानकर

उसकी उपासना करते हैं

वे—

जड़ कारण में ही आसक्त रहते हैं

यह उपासना—

चेतना का उत्कर्ष नहीं करती

बल्कि उसे मूल कारण में विलीन कर देती है

“अन्धं तमः प्रविशन्ति” — उपनिषद् का प्रतिपादन

शंकराचार्य यहाँ पूर्व मन्त्र (१२) का स्मरण कराते हैं—

“अन्धं तमः प्रविशन्ति”

अर्थात्—

ऐसे साधक गहन अज्ञान में प्रवेश करते हैं

यह अज्ञान—

बाह्य अन्धकार नहीं

बल्कि आत्म-दर्शन का अभाव है

“प्रकृतिलयः” — पौराणिक परिभाषा

इस भाष्य का एक अत्यन्त रोचक और महत्वपूर्ण पक्ष है—

“प्रकृतिलय”

शंकराचार्य कहते हैं कि—

पौराणिक ग्रन्थों में इस अवस्था को “प्रकृतिलय” कहा गया है।

अर्थात्—

साधक प्रकृति में ही लीन हो जाता है

वह अपने कारण में विलय को प्राप्त होता है

किन्तु—

यह मोक्ष नहीं है

क्योंकि—

इसमें आत्मज्ञान का उदय नहीं होता

केवल कारण में लय होता है

प्रकृतिलय की सीमाएँ

“प्रकृतिलय” देखने में उच्च अवस्था प्रतीत हो सकती है,

परन्तु वास्तव में—

यह जड़ में विलय है

चेतना का उत्कर्ष नहीं

अतः—

यह एक प्रकार का स्थगन (suspension) है,

न कि मुक्ति (liberation)

दार्शनिक गहराई

यह भाष्यांश एक अत्यन्त सूक्ष्म भेद को स्पष्ट करता है—

कार्य में लय (हिरण्यगर्भ) → चेतन, सूक्ष्म अवस्था

कारण में लय (प्रकृति) → जड़, अज्ञानात्मक अवस्था

दोनों ही—

अंतिम सत्य नहीं हैं

दृष्टांत

जैसे—

कोई नदी समुद्र में मिल जाए (चेतन विस्तार),

और कोई जलकण मिट्टी में समा जाए (जड़ लय)—

दोनों में लय है,

परन्तु दोनों की प्रकृति भिन्न है।

इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “असंभव” (अव्याकृत, प्रकृति) की उपासना का फल “प्रकृतिलय” है— जहाँ साधक जड़ कारण में ही विलीन हो जाता है।

यह अवस्था—

“अन्धं तमः” — आत्मदर्शन के अभाव का द्योतक है

अतः—

अव्याकृत में लय मोक्ष नहीं,

बल्कि अज्ञान की एक सूक्ष्म अवस्था है।

यही इस पद का गूढ़ और दार्शनिक संदेश है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

समुच्चय-साधना का फलभेद — “अन्यदेव…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन

 समुच्चय-साधना का फलभेद — “अन्यदेव…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

अधुना उभयोः उपासनयोः समुच्चय-कारणम् अवयव-फल-भेदम् आह— “अन्यदेव…”।

अन्यदेव = पृथक् एव आहुः;

एवं सम्भवात् = संसृतेः कार्य-ब्रह्म-उपासनात्, अणिमा-आदि ऐश्वर्य-लक्षणं (फलम्) व्याख्यातवन्तः इत्यर्थः॥१३॥

ईशावास्योपनिषद् के त्रयोदश मन्त्र पर आदि शंकराचार्य का यह भाष्यांश साधना-पथ के एक अत्यन्त सूक्ष्म सिद्धान्त को उद्घाटित करता है— उभय उपासनाओं के समुच्चय की आवश्यकता उनके फलभेद के कारण है।

यहाँ उपनिषद् केवल यह नहीं कहता कि “संभव” और “असंभव” के फल भिन्न हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि यह भिन्नता ही दोनों के समुच्चय का कारण है।

“समुच्चय-कारणम्” — क्यों आवश्यक है संयुक्त साधना?

शंकराचार्य कहते हैं—

उभयोरुपासनयोः समुच्चय-कारणम् अवयव-फल-भेदः

अर्थात्—

दोनों उपासनाओं के फल भिन्न-भिन्न (अवयव-रूप) होने के कारण ही उनका समुच्चय आवश्यक है।

यहाँ—

“अवयव” = आंशिक, अपूर्ण

“फलभेद” = विभिन्न परिणाम

अर्थात्

कोई भी एक उपासना पूर्ण फल नहीं देती

प्रत्येक केवल एक अंश प्रदान करती है

“अन्यदेव” — पृथक् फल का प्रतिपादन

“अन्यदेव” का अर्थ है—

“निश्चित रूप से भिन्न”

शंकराचार्य इसे स्पष्ट करते हैं—

“पृथक् एव आहुः”

अर्थात्—

दोनों उपासनाओं के फल

एक-दूसरे से भिन्न हैं

और स्वतंत्र रूप से प्राप्त होते हैं

“सम्भवात्” — कार्यब्रह्म उपासना का फल

यहाँ “सम्भव” का अर्थ है—

कार्य-ब्रह्म (विशेषतः हिरण्यगर्भ)

इसकी उपासना से—

“अणिमा-आदि ऐश्वर्य” की प्राप्ति होती है

अर्थात्—

अणिमा (सूक्ष्मतम होने की शक्ति)

लघिमा, गरिमा आदि सिद्धियाँ

उच्च लोकों की प्राप्ति

ये सब

उपासना के फल हैं

“संसृतेः” — अभी भी संसार के भीतर

शंकराचार्य यहाँ एक सूक्ष्म संकेत देते हैं—

यह सब “संसृतेः” — संसार के अन्तर्गत ही है

अर्थात्

ये सिद्धियाँ उच्च हैं

परन्तु अभी भी परम मोक्ष नहीं

यहाँ तक कि,हिरण्यगर्भ की प्राप्ति भी

अंतिम सत्य नहीं है

“अवयव-फल” — अपूर्णता का सिद्धान्त

यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण दार्शनिक बिन्दु है

प्रत्येक उपासना का फल “अवयव” है

अर्थात्

आंशिक

सीमित

साधनात्मक

इससे यह स्पष्ट होता है कि

कोई भी एक मार्ग पूर्णता नहीं देता

पूर्णता के लिए समन्वय आवश्यक है

समुच्चय की अनिवार्यता

इसीलिए

जब दोनों उपासनाएँ मिलती हैं,

तब साधना पूर्णता की ओर बढ़ती है

यहाँ समुच्चय का अर्थ है

कारण (असंभव) की समझ

कार्य (संभव) की उपासना

दोनों का संतुलन

साधक को उच्चतर सत्य की ओर ले जाता है

दार्शनिक गहराई

यह भाष्यांश एक अत्यन्त गहरी बात स्थापित करता है

विविध साधन, विविध फल देते हैं

किन्तु

अंतिम सत्य इन सबके पार है

अतः

साधक को भेद समझना चाहिए

और समुच्चय अपनाना चाहिए

दृष्टांत

जैसे

कोई व्यक्ति केवल शरीर का विकास करे या केवल बुद्धि का,

तो वह पूर्ण नहीं बनता;

उसी प्रकार

केवल एक उपासना साधक को पूर्णता नहीं देती

निष्कर्ष

इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “अन्यदेव…” पद का अभिप्राय केवल भिन्नता बताना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि

फलभेद ही समुच्चय का कारण है।

संभव (कार्य-ब्रह्म) की उपासना से अणिमा आदि ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं, परन्तु वे संसार के भीतर ही सीमित हैं। अतः—

समुच्चय के बिना साधना अपूर्ण है,

और समन्वय ही साधना को पूर्णता की ओर ले जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

ईशावास्योपनिषद् — त्रयोदश मन्त्र का निबंधात्मक विवेचन (संभव–असंभव के भेद का श्रुति-प्रमाण

 ईशावास्योपनिषद् — त्रयोदश मन्त्र का निबंधात्मक विवेचन (संभव–असंभव के भेद का श्रुति-प्रमाण)

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसंभवात् ।

इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥१३॥

धीराः (विद्वांसः) आहुः— सम्भवात् अन्यत् एव (फलम्), असम्भवात् अन्यत् आहुः।

इति (एवं) वयम् शुश्रुम— ये नः तत् विचचक्षिरे (तेभ्यः)।

धीर पुरुष कहते हैं कि “संभव” (कार्य-ब्रह्म, हिरण्यगर्भ आदि) से प्राप्त फल कुछ और है, और “असंभव” (अव्याकृत, प्रकृति आदि) से प्राप्त फल उससे भिन्न है। ऐसा हमने उन धीर पुरुषों से सुना है जिन्होंने हमें इसका यथार्थ उपदेश दिया है।

ईशावास्योपनिषद् का यह त्रयोदश मन्त्र, द्वादश मन्त्र में उठे हुए गूढ़ प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करता है। द्वादश मन्त्र में यह कहा गया कि असम्भूति (अव्याकृत कारण) की उपासना अन्धकार की ओर ले जाती है और सम्भूति (कार्य-ब्रह्म) में रत रहने वाले उससे भी अधिक गहन अन्धकार में प्रविष्ट होते हैं। यह कथन प्रथम दृष्टि में विरोधाभासी प्रतीत होता है और साधक के मन में यह संशय उत्पन्न करता है कि इन दोनों उपासनाओं का यथार्थ स्वरूप और फल क्या है।

इसी संशय के निवारणार्थ यह मन्त्र उद्घोष करता है—

“अन्यदेव आहुः सम्भवात्, अन्यदाहुः असम्भवात्”।

अर्थात्—

- सम्भूति और असम्भूति— दोनों के फल परस्पर भिन्न हैं।

यहाँ “अन्यत्” शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह केवल भिन्नता नहीं, बल्कि—

स्वरूपतः और फलतः पूर्ण भेद का द्योतक है।

“सम्भव” और “असम्भव” का दार्शनिक अर्थ

शांकरभाष्य के अनुसार—

सम्भव = कार्य-ब्रह्म, विशेषतः हिरण्यगर्भ (व्यक्त, चेतन सृष्टि का कारण)

असम्भव = अव्याकृत प्रकृति, मूल कारण (अव्यक्त, जड़ अवस्था)

अतः—

एक चेतन, प्रकट सत्ता है

- दूसरा जड़, अप्रकट कारण

इन दोनों के साधन और फल भी स्वाभाविक रूप से भिन्न होंगे।

भिन्न फल का सिद्धान्त

यह मन्त्र यह स्थापित करता है कि—

असम्भव (प्रकृति) की उपासना → जड़ता, कारण-अवस्था में लय

सम्भव (हिरण्यगर्भ) की उपासना → उच्चतर लोक, सूक्ष्म चेतन अवस्था

किन्तु—

दोनों ही परम ब्रह्म नहीं हैं

दोनों ही साधन के स्तर पर सीमित हैं

इस प्रकार—

यह भेद साधक को यह समझाने के लिए है कि

किसी एक को अंतिम सत्य न माने।

“इति शुश्रुम धीराणाम्” — प्रमाण का पुनःस्थापन

इस मन्त्र में पुनः वही पद आता है—

“इति शुश्रुम धीराणाम्”

यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि—

यह उपदेश किसी व्यक्तिगत मत पर आधारित नहीं है

यह श्रुति-परंपरा से प्राप्त है

“धीर” वे हैं—

जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया है

जिनका ज्ञान अनुभव से पुष्ट है

आदि शंकराचार्य के अनुसार, ऐसे तत्त्वदर्शी पुरुषों का वचन ही वास्तविक प्रमाण है।

“ये नः तद्विचचक्षिरे” — परंपरा का प्रवाह

यहाँ यह भी स्पष्ट किया गया है कि—

यह ज्ञान हमें उन आचार्यों से प्राप्त हुआ है

जिन्होंने इसे विस्तारपूर्वक समझाया है

अर्थात्—

यह ज्ञान परंपरागत है

गुरु-शिष्य श्रृंखला के माध्यम से प्रवाहित हुआ है

पूर्व मन्त्रों से सम्बन्ध

द्वादश मन्त्र → एकांगी उपासना की निन्दा

त्रयोदश मन्त्र → उनके फल का भेद स्पष्ट करना

अतः—

यह मन्त्र निन्दा का कारण बताता है

और साधक के संशय को दूर करता है

दार्शनिक निष्कर्ष

इस मन्त्र का मुख्य संदेश है—

संभव और असंभव— दोनों के फल भिन्न हैं, परन्तु दोनों ही सीमित हैं।

अतः—

इनमें से किसी एक को अंतिम न मानें

दोनों को साधन के रूप में समझें

उपसंहार

ईशावास्योपनिषद् का यह त्रयोदश मन्त्र साधक को स्पष्ट दिशा देता है कि साधना के विभिन्न स्तरों में भेद करना आवश्यक है।

न तो प्रकृति ही अंतिम है,

न ही सृष्टि का सूक्ष्म कारण;

बल्कि दोनों के पार जो परम सत्य है— वही साध्य है।

और उस सत्य तक पहुँचने का मार्ग—

श्रुति-परंपरा और धीर आचार्यों के उपदेश से ही स्पष्ट होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

सूक्ष्म बन्धन की पराकाष्ठा — “ततो भूय इव ते तमः…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन

 सूक्ष्म बन्धन की पराकाष्ठा — “ततो भूय इव ते तमः…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

ततः — तस्मात् अपि;

भूयः इव — बहुतरम् इव, अधिकम् इव;

ते तमः प्रविशन्ति — ते गहनतरम् अज्ञानम् आप्नुवन्ति;

ये उ सम्भूत्याम् — कार्यब्रह्मणि, हिरण्यगर्भाख्ये;

रताः — आसक्ताः, अभिरताः॥१२॥

ईशावास्योपनिषद् के द्वादश मन्त्र का यह उत्तरार्ध— “ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः”— प्रथम दृष्टि में अत्यन्त विस्मयकारी प्रतीत होता है। जहाँ पूर्व भाग में असम्भूति (अव्याकृत प्रकृति) की उपासना को अन्धकार कहा गया था, वहीं यहाँ यह कहा जा रहा है कि जो “संभूति” अर्थात् कार्यब्रह्म—हिरण्यगर्भ—में रत हैं, वे उससे भी अधिक गहन अन्धकार में प्रविष्ट होते हैं।

इस विरोधाभास के भीतर ही शास्त्र का गूढ़तम रहस्य निहित है, जिसे आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में अत्यन्त सूक्ष्मता से उद्घाटित करते हैं।

“ततः… भूय इव” — अधिक अन्धकार का संकेत

“ततः” का अर्थ है—

उस (असंभूति-उपासना) से भी आगे

“भूय इव” —

मानो अधिक, अधिकतर, गहनतर

यहाँ “इव” (मानो) शब्द अत्यन्त सूक्ष्म है—

यह यह नहीं कहता कि वह निश्चय ही अधिक अन्धकार है,

बल्कि—

उसके समान प्रतीत होने वाला, या उससे भी अधिक सूक्ष्म बन्धन।

“संभूत्याम्” — कार्यब्रह्म, हिरण्यगर्भ

शंकराचार्य “संभूति” का अर्थ करते हैं—

कार्यब्रह्म

विशेषतः — हिरण्यगर्भ

यह—

सृष्टि का सूक्ष्म कारण

चेतन सत्ता

उपासना का उच्च विषय

अतः यह असम्भूति (जड़ प्रकृति) से उच्चतर है।

“रताः” — आसक्ति का सूक्ष्म रूप

यहाँ “रताः” शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है—

केवल उपासना नहीं,

बल्कि आसक्ति, अभिमान और तल्लीनता

अर्थात्,साधक उस स्थिति में इतना रच-बस जाता है

कि उसे ही अंतिम सत्य मान लेता है

अधिक अन्धकार क्यों?

यहाँ मुख्य प्रश्न उठता है

 उच्चतर उपासना होने पर भी “अधिक अन्धकार” क्यों?

इसका उत्तर अत्यन्त सूक्ष्म है

सूक्ष्म अहंकार

साधक को लगता है— “मैंने सर्वोच्च प्राप्त कर लिया”

यह ज्ञानाभिमान उसे रोक देता है

द्वैत की स्थिरता

उपासक और उपास्य का भेद बना रहता है

यह भेद ही बन्धन का कारण है

रुक जाना (stagnation)

वह आगे आत्मज्ञान की ओर नहीं बढ़ता

उसी अवस्था को अंतिम मान लेता है

अतः  यह अज्ञान स्थूल नहीं, बल्कि अत्यन्त सूक्ष्म है

और इसी कारण अधिक गहन कहा गया है

असम्भूति से भी गहन बन्धन

असम्भूति (प्रकृति) → जड़ अज्ञान

संभूति (हिरण्यगर्भ) → चेतन, परन्तु द्वैतयुक्त अज्ञान

दूसरी अवस्था—

अधिक refined है

परन्तु अधिक सूक्ष्म बन्धन उत्पन्न करती है

जैसे, एक साधारण बन्धन दिखाई देता है

परन्तु स्वर्ण की जंजीर अधिक आकर्षक होकर भी बन्धन ही होती है

समुच्चय की पृष्ठभूमि

यहाँ भी वही शास्त्रीय पद्धति कार्य कर रही है—

पहले असम्भूति की निन्दा

फिर संभूति की निन्दा

उद्देश्य,

दोनों के एकांगी ग्रहण का खण्डन

और आगे

दोनों के समुच्चय की स्थापना

दार्शनिक संकेत

यह पद एक अत्यन्त गहरी चेतावनी देता है

आध्यात्मिक प्रगति के उच्च स्तर पर भी

रुक जाना सम्भव है

और वह रुकना

सबसे बड़ा बन्धन बन सकता है

इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “संभूति” अर्थात् कार्यब्रह्म—हिरण्यगर्भ—की उपासना अपने आप में उच्च होते हुए भी, यदि उसे अंतिम मान लिया जाए, तो वह साधक को और भी सूक्ष्म अज्ञान में बाँध देती है।

अतः—

उच्चतर साधना भी बन्धन बन सकती है, यदि वह अंतिम सत्य तक न ले जाए।

यही इस पद का गूढ़ संदेश है—

न जड़ में रुकना है,

 न सृष्टि में,

बल्कि दोनों के पार जाकर उस परम अद्वैत सत्य को जानना है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

काम-कर्मबीजस्वरूप अव्याकृत (असंभूति) की उपासना — “अन्धं तमः प्रविशन्ति…”

काम-कर्मबीजस्वरूप अव्याकृत (असंभूति) की उपासना — “अन्धं तमः प्रविशन्ति…” पद पर शांकरार्थ का निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

अविद्यां काम-कर्म-बीजभूताम् अदर्शनात्मकां च उपासते ये,

ते तद् अनुरूपम् एव अन्धं तमः अदर्शनात्मकं प्रविशन्ति।

शावास्योपनिषद् के द्वादश मन्त्र के “अन्धं तमः प्रविशन्ति…” पद का आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया यह भाष्य अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक संकेतों से युक्त है। यहाँ “असंभूति” या “अव्याकृत प्रकृति” को केवल एक दार्शनिक तत्त्व के रूप में नहीं, बल्कि काम (इच्छा) और कर्म के बीज के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

“अविद्यां काम-कर्म-बीजभूताम्” — प्रकृति का आन्तरिक स्वरूप

शंकराचार्य “असंभूति” को केवल बाह्य प्रकृति नहीं मानते, बल्कि—

 काम (इच्छा) और कर्म (क्रिया) का मूल बीज

यह वही अवस्था है

जहाँ से समस्त वासनाएँ उत्पन्न होती हैं

जहाँ से कर्मों की प्रेरणा जन्म लेती है

अतः “अविद्या” यहाँ

केवल अज्ञान नहीं,

बल्कि संसार-चक्र का कारणरूप बीज है।

“अदर्शनात्मक” — अज्ञान का मूल स्वरूप

इस पद में “अदर्शनात्मक” शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

“दर्शन” = सत्य का प्रत्यक्ष ज्ञान

“अदर्शन” = उस सत्य का अभाव

अतः , यह अविद्या ऐसी अवस्था है जहाँ

आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता

यही अज्ञान—

वासनाओं को जन्म देता है

कर्मों को प्रेरित करता है

और संसार के चक्र को चलाता है

“उपासते” — जड़ कारण में आसक्ति

जो साधक इस अविद्या-रूप, काम-कर्म-बीजस्वरूप प्रकृति की ही उपासना करते हैं—

वे वस्तुतः,वासनाओं के स्रोत में ही रमे रहते हैं

कारण अवस्था को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं

यह उपासना—

चेतना को ऊर्ध्व नहीं ले जाती

बल्कि उसे उसी मूल अज्ञान में स्थिर कर देती है

“तद् अनुरूपम् एव” — फल की समानता का सिद्धान्त

यहाँ एक अत्यन्त गहरा नियम बताया गया है—

जैसा उपास्य, वैसा ही फल

यदि साधक—

जड़, अज्ञानात्मक कारण की उपासना करता है,

तो,उसका फल भी वैसा ही होगा

अर्थात्, वह उसी “अदर्शनात्मक” स्थिति को प्राप्त होगा

“अन्धं तमः” — गहन अज्ञान की अवस्था

इसका परिणाम है—

 “अन्धं तमः” — पूर्ण अज्ञान

यह अन्धकार

बाह्य नहीं

बल्कि आन्तरिक चेतना का अन्धकार है

जहाँ, आत्मा का प्रकाश अनुपस्थित है

केवल वासनाओं और कर्मों का बीज शेष है


दार्शनिक गहराई

यह भाष्यांश एक अत्यन्त सूक्ष्म सत्य को उद्घाटित करता है—

संसार का मूल कारण बाह्य जगत् नहीं

बल्कि अन्तःस्थित वासनाएँ (काम) और कर्मबीज हैं

और यदि साधक, इन्हीं को साधना का विषय बना ले,

तो वह उसी चक्र में और गहराई से फँस जाता है


दृष्टांत

जैसे,कोई व्यक्ति वृक्ष के बीज को ही अंतिम सत्य मानकर उसी में रमा रहे,

और कभी वृक्ष के फल या उससे परे न जाए,

तो वह उसी बीज की सीमाओं में बँधा रहेगा।


उसी प्रकार, काम-कर्म-बीजस्वरूप अविद्या में रत साधक

उसी अज्ञान में स्थित रहता है।


इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “असंभूति” या अव्याकृत प्रकृति केवल एक तत्त्व नहीं, बल्कि काम और कर्म के बीज का स्रोत है।

जो साधक उसकी ही उपासना करते हैं, वे उसी के अनुरूप—

“अदर्शनात्मक अन्धकार” को प्राप्त होते हैं।

अतः—

जड़ कारण में आसक्ति, चेतना को ऊर्ध्व नहीं ले जाती, बल्कि उसे उसी अज्ञान में स्थिर कर देती है।

यही इस पद का गूढ़ और चेतावनीपूर्ण संदेश है।


मुकेश ,,,,

असंभूति–संभूति उपासना का समुच्चय-विवेचन — “अन्धं तमः प्रविशन्ति…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विस्तार

असंभूति–संभूति उपासना का समुच्चय-विवेचन — “अन्धं तमः प्रविशन्ति…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विस्तार

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

अधुना व्याकृत-अव्याकृत-उपासनयोः समुच्चय-चिकीर्षया, प्रत्येकं निन्दा उच्यते—

“अन्धं तमः प्रविशन्ति ये असम्भूतिम्…”।

संभवनं संभूतिः; सा यस्य कार्यस्य, तस्याः अन्याऽसंभूतिः—प्रतिः कारणम्,

अविद्या, अव्याकृताख्या, प्रकृतिः।

ईशावास्योपनिषद् के द्वादश मन्त्र पर आदि शंकराचार्य का यह भाष्यांश एक अत्यन्त सूक्ष्म दार्शनिक उद्देश्य को उद्घाटित करता है। यहाँ उपनिषद् असंभूति (अव्याकृत, कारण) और संभूति (व्याकृत, कार्य) — इन दोनों की उपासनाओं का प्रतिपादन करता है, किन्तु प्रत्यक्ष रूप से उनकी निन्दा करता हुआ प्रतीत होता है।

यह निन्दा वास्तविक निषेध नहीं, बल्कि एक गूढ़ शास्त्रीय विधि है—

-समुच्चय (संयोजन) की स्थापना के लिए, प्रत्येक की पृथक् निन्दा।

“समुच्चय-चिकीर्षा” — निन्दा का वास्तविक उद्देश्य

शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि

यहाँ उपनिषद् का उद्देश्य

व्याकृत (संभूति) और अव्याकृत (असंभूति) — दोनों उपासनाओं का समुच्चय स्थापित करना है।

इसी कारण. पहले असम्भूति की निन्दा

फिर संभूति की निन्दा

यह शैली पहले भी (विद्या–अविद्या में) देखी जा चुकी है।

अर्थात्—

- निन्दा का प्रयोजन त्याग नहीं,

- बल्कि एकांगी दृष्टि का निराकरण है।

“असंभूति” — अव्याकृत कारण (प्रकृति)

शंकराचार्य “असंभूति” का अर्थ करते हैं—

अव्याकृत (अप्रकट)

प्रकृति

कारण अवस्था

यह वह स्थिति है

जिससे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है

परन्तु जो स्वयं अप्रकट रहती है

इसे “अविद्या” भी कहा गया है, क्योंकि

- यह मूल कारण है, परन्तु चेतन नहीं

- जड़ है, अज्ञानात्मक है

“संभूति” — व्याकृत कार्य (सृष्टि)

इसके विपरीत “संभूति” का अर्थ है

संभवनम् — जो उत्पन्न हुआ है

व्याकृत — प्रकट रूप

कार्य-ब्रह्म (हिरण्यगर्भ)

यह सृष्टि का प्रकट रूप है—

- चेतनता से युक्त

- उपासना का उच्चतर विषय

“अन्धं तमः प्रविशन्ति…” — असम्भूति की निन्दा

जो साधक केवल असंभूति (प्रकृति, कारण) की उपासना करते हैं—

- वे “अन्धं तमः” — गहन अज्ञान में प्रवेश करते हैं

क्यों?

क्योंकि,

प्रकृति जड़ है

उसमें चेतना का प्रकाश नहीं

अतः—

उसका ध्यान साधक को चेतन उन्नति नहीं देता

- वह जड़ता में ही स्थित रहता है

निन्दा का गूढ़ अर्थ

यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त है—

उपनिषद् यहाँ किसी उपासना का निषेध नहीं कर रहा

बल्कि—

यह दिखा रहा है कि

केवल एक पक्ष में रुक जाना ही अज्ञान है

केवल कारण (असंभूति) → जड़ बन्धन

केवल कार्य (संभूति) → सूक्ष्म बन्धन

समुच्चय की अनिवार्यता

शंकराचार्य का मुख्य उद्देश्य यह है कि—

साधक इन दोनों को एक साथ समझे

क्योंकि—

कारण बिना कार्य अधूरा है

कार्य बिना कारण अधूरा है

इस प्रकार—

दोनों का समन्वय ही सम्पूर्ण दृष्टि देता है

दार्शनिक गहराई

यह भाष्यांश एक अत्यन्त सूक्ष्म सत्य को उद्घाटित करता है—

“असंभूति” → मूल कारण (प्रकृति)

“संभूति” → प्रकट सृष्टि (हिरण्यगर्भ)

किन्तु—

दोनों ही परम ब्रह्म नहीं हैं

अतः—

इनमें से किसी एक को अंतिम मान लेना ही अज्ञान है

दृष्टांत

जैसे—

कोई व्यक्ति बीज (कारण) को ही सम्पूर्ण वृक्ष मान ले,

या केवल वृक्ष (कार्य) को ही अंतिम समझे—

दोनों ही अधूरी दृष्टि हैं।

पूर्ण सत्य—

बीज और वृक्ष दोनों के समन्वय से ही समझ में आता है।

इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “अन्धं तमः प्रविशन्ति…” यह निन्दा वास्तविक निषेध नहीं, बल्कि साधक को एकांगी दृष्टि से हटाकर समुच्चय की ओर ले जाने का उपाय है।

असंभूति (प्रकृति) और संभूति (सृष्टि) — दोनों ही साधना के विषय हैं, किन्तु दोनों में रुक जाना अज्ञान है।

अतः—

समुच्चय ही पूर्णता है, और एकांगी दृष्टि ही अन्धकार।

यही इस पद का गूढ़ और दार्शनिक संदेश है।


मुकेश ,,,,,,,,