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महाभारत — वनपर्व — यक्ष–युधिष्ठिर : तीर्थयात्रा से धर्म के सबसे गहरे प्रश्न तक

  महाभारत — वनपर्व — यक्ष–युधिष्ठिर : तीर्थयात्रा से धर्म के सबसे गहरे प्रश्न तक अब हम उस प्रसंग पर पहुँचते हैं जिसे वनपर्व की पूरी संरचना में एक दार्शनिक शिखर कहा जा सकता है। एक आवश्यक बात पहले स्पष्ट कर लें। यक्ष–युधिष्ठिर प्रसंग को गन्धमादन के ठीक बाद का अगला भौगोलिक पड़ाव नहीं मानना चाहिए। वनपर्व की कथा में पाण्डवों की यात्राएँ, निवास और विभिन्न आख्यान एक सीधी आधुनिक यात्रा-रेखा में नहीं चलते। इसलिए आगे हम दो मानचित्र साथ रखेंगे— महाभारत में वर्णित तीर्थों का क्रम कथा के भीतर पाण्डवों के वास्तविक घटनाक्रम का क्रम यक्ष-प्रसंग द्वैतवन में घटित होता है और तीर्थयात्रा के बाद वनवास की कथा में आता है। इसलिए इसे उसी रूप में पढ़ना अधिक सही है।  कथा की शुरुआत — एक ब्राह्मण की अग्नि पाण्डव वन में रह रहे हैं। एक दिन एक ब्राह्मण की अरणियाँ —अग्नि उत्पन्न करने वाली लकड़ियाँ—एक हिरण के सींगों में उलझ जाती हैं और हिरण उन्हें लेकर भाग जाता है। ब्राह्मण अपनी अग्निहोत्र-विधि बाधित होने से चिंतित होकर पाण्डवों से सहायता माँगता है। युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ हिरण के पीछे जाते हैं। लेकिन ...

महाभारत — वनपर्व — सावित्री–सत्यवान : मृत्यु के सामने एक स्त्री का संकल्प

  महाभारत — वनपर्व — सावित्री–सत्यवान : मृत्यु के सामने एक स्त्री का संकल्प गन्धमादन और उसके आसपास की तीर्थयात्रा के बीच पाण्डवों का जीवन केवल यात्रा और तपस्या में नहीं बीत रहा था। जहाँ भी वे जाते, लोमश अथवा अन्य ऋषि उन्हें किसी पुराने आख्यान से जोड़ देते। ऐसे ही एक अवसर पर युधिष्ठिर के सामने एक ऐसी कथा आती है जिसमें युद्ध नहीं है, राज्य नहीं है, अस्त्र नहीं हैं—लेकिन मृत्यु स्वयं सामने खड़ी है। यह कथा है—  सावित्री और सत्यवान की। कथा कहाँ से शुरू होती है? मद्रदेश के राजा अश्वपति के कोई संतान नहीं थी। वे संतान की इच्छा से दीर्घकाल तक तपस्या करते हैं। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर सावित्री देवी का वर मिलता है। कुछ समय बाद उनके यहाँ एक कन्या जन्म लेती है। उसका नाम रखा जाता है—  सावित्री।  वह बड़ी होती है। उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली है कि उसके लिए उपयुक्त वर खोजना कठिन हो जाता है। तब उसके पिता उसे स्वयं वर चुनने की अनुमति देते हैं। सावित्री सत्यवान को चुनती है सावित्री विभिन्न प्रदेशों में जाती है और अंततः सत्यवान को अपने पति के रूप में चुनती है। सत्यवान कोई समृद्ध...

महाभारत — वनपर्व — गन्धमादन से आगे : सौगन्धिक पुष्प, यक्ष-प्रदेश और कुबेर

  महाभारत — वनपर्व — गन्धमादन से आगे : सौगन्धिक पुष्प, यक्ष-प्रदेश और कुबेर गन्धमादन में पाण्डवों का निवास अब केवल यात्रा नहीं रह गया था। हिमालय का यह प्रदेश उनके लिए एक ऐसा संसार बन चुका था जहाँ प्रकृति, ऋषि-परंपरा और लोकविश्वास एक ही कथा-भूमि में दिखाई देते हैं। भीम–हनुमान प्रसंग को हम पीछे छोड़ चुके हैं। अब कथा वहीं से आगे बढ़ती है जहाँ सौगन्धिक पुष्प की खोज भीम को गन्धमादन के भीतर ले जाती है। सौगन्धिक पुष्प की खोज द्रौपदी को प्राप्त हुआ सुगंधित पुष्प उन्हें अत्यंत प्रिय लगता है। वह भीम से ऐसे और पुष्प लाने की इच्छा व्यक्त करती हैं। भीम निकल पड़ते हैं। लेकिन इस यात्रा में एक महत्वपूर्ण बात है— वे उस प्रदेश में प्रवेश कर रहे हैं जो मनुष्यों के सामान्य अधिकार-क्षेत्र से बाहर बताया गया है। वहाँ पुष्प केवल प्राकृतिक वस्तु नहीं है। वह एक ऐसे प्रदेश की पहचान है जिसका संरक्षण यक्षों के हाथ में है। यहीं से एक साधारण-सी इच्छा—एक फूल प्राप्त करने की इच्छा—एक बड़े सांस्कृतिक प्रश्न में बदल जाती है: प्राचीन भारतीय कल्पना में वन, पर्वत, जल और प्राकृतिक संपदा पर अधिकार किसका था? यक्षों से ...

महाभारत — वनपर्व — हिमालय और गन्धमादन : पाण्डवों की यात्रा और एक रहस्यमय पर्वतीय भूगोल

  महाभारत — वनपर्व — हिमालय और गन्धमादन : पाण्डवों की यात्रा और एक रहस्यमय पर्वतीय भूगोल प्रयाग और गंगा-यमुना क्षेत्र के तीर्थों के बाद पाण्डवों की यात्रा धीरे-धीरे हिमालय की ओर बढ़ती है। मैदान पीछे छूटते जाते हैं। भूमि ऊँची होती जाती है। नदियाँ अधिक तीव्र होती जाती हैं। वन घने होते जाते हैं। और जैसे-जैसे पाण्डव हिमालय के भीतर प्रवेश करते हैं, महाभारत की कथा में प्राकृतिक भूगोल और पौराणिक भूगोल एक-दूसरे के बहुत निकट आते जाते हैं। यहीं से हमारी यात्रा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव आता है—  गन्धमादन पर्वत पाण्डवों का मार्ग अब तक की यात्रा को हमारे शोध-नक्शे में इस प्रकार रखा जा सकता है— काम्यक वन -  पुष्कर -  जम्बूमार्ग - तण्डुलिकाश्रम- अगस्त्य-सरोवर- विभिन्न तीर्थ-  गया-  गंगा–यमुना क्षेत्र-  प्रयाग- गंगा का ऊपरी प्रदेश- कनखल- हिमालय- गन्धमादन क्षेत्र यहाँ से आगे हमें विशेष सावधानी रखनी होगी, क्योंकि महाभारत में वर्णित प्राचीन स्थानों की आधुनिक पहचान हर जगह निश्चित नहीं है। गन्धमादन आखिर है कहाँ? यही हमारे लिए एक महत्वपूर्ण शोध-प्रश्न है। आज जब हम उत्तराखण्ड...

महाभारत — वनपर्व — हिमालय से आगे : तीर्थयात्रा का विस्तार

  महाभारत — वनपर्व — हिमालय से आगे : तीर्थयात्रा का विस्तार किरातार्जुनीय प्रसंग को हम पहले ही अलग दृष्टि से देख चुके हैं, इसलिए यहाँ उसे पुनः नहीं दोहराएँगे। हमारी कथा वहीं से आगे बढ़ती है जहाँ पाण्डवों की तीर्थयात्रा हिमालयी प्रदेश में प्रवेश कर चुकी है। अब यात्रा का स्वर और गंभीर होता जाता है। पाण्डव केवल तीर्थों के दर्शन नहीं कर रहे—वे ऐसे भूभाग में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ मनुष्य, प्रकृति और देवकथा की सीमाएँ एक-दूसरे में मिलती हुई दिखाई देती हैं। हिमालय में आगे का मार्ग पाण्डवों का मार्ग अब लगभग इस प्रकार समझा जा सकता है— प्रयाग -  गंगा का ऊपरी प्रदेश-  कनखल-  हिमालय-विभिन्न ऋषि-आश्रम एवं पर्वतीय तीर्थ- गन्धमादन पर्वत की दिशा  यहीं से कथा का एक अत्यंत सुंदर भाग आरम्भ होता है। गन्धमादन केवल कोई पर्वत नहीं है। महाभारत के लिए यह ऋषियों, सिद्धों, देवताओं और दुर्लभ वनस्पतियों का प्रदेश है। गन्धमादन की ओर पाण्डवों को बताया जाता है कि आगे का मार्ग अत्यंत कठिन है। ऊँचे पर्वत हैं। घने वन हैं। तेज बहती नदियाँ हैं। कहीं मार्ग दिखाई देता है, कहीं नहीं। इसलिए तीर्थयात्रा...

महाभारत — वनपर्व — प्रयाग से हिमालय की ओर : गंगा के साथ पाण्डवों की यात्रा

  महाभारत — वनपर्व — प्रयाग से हिमालय की ओर : गंगा के साथ पाण्डवों की यात्रा प्रयाग में गंगा और यमुना के संगम पर स्नान, तप और तीर्थ-विधि पूरी करने के बाद पाण्डवों की यात्रा आगे बढ़ती है। अब कथा का भूगोल बदलने लगता है। मैदान पीछे छूटते हैं और यात्रा धीरे-धीरे गंगा के ऊपरी प्रदेश और हिमालय की ओर बढ़ती है। लेकिन इस यात्रा को केवल तीर्थों की सूची की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। यहाँ पहली बार हमें दिखाई देता है कि तीर्थयात्रा एक वास्तविक कठिन यात्रा भी थी। पाण्डवों का मार्ग अब तक के मार्ग को महाभारत के क्रम के अनुसार इस प्रकार रख सकते हैं— काम्यक वन → पुष्कर → जम्बूमार्ग → तण्डुलिकाश्रम → अगस्त्य-सरोवर → अन्य तीर्थ → प्रयाग → गंगा–यमुना क्षेत्र → गंगा के ऊपरी प्रदेश → कनखल → हिमालय की ओर यह आधुनिक सड़क का GPS-नक्शा नहीं है। प्राचीन स्थानों की पहचान आज के भूगोल से जोड़ते समय कुछ स्थानों पर विद्वानों में मतभेद भी हैं। इसलिए जहाँ पहचान निश्चित नहीं है, वहाँ हम उसे निश्चित तथ्य की तरह नहीं लिखेंगे। कनखल — जहाँ गंगा तीर्थ बन जाती है गंगा के ऊपरी क्षेत्र में पहुँचकर पाण्डव कनखल आते हैं। ...

जब चन्द्रमा घट रहा था, तब कृष्ण जन्मे

जब चन्द्रमा घट रहा था, तब कृष्ण जन्मे मन, चन्द्रमा और चेतना के बीच कृष्ण-जन्म का एक अनकहा रहस्य भारतीय संस्कृति में समय केवल बीतता नहीं है, वह कुछ कहता भी है। हमारे यहाँ दिन केवल दिन नहीं, तिथि भी है; रात केवल रात नहीं, नक्षत्र भी है; चन्द्रमा केवल आकाश में चमकता हुआ पिण्ड नहीं, मन का प्रतीक भी है। शायद इसीलिए भारतीय परम्परा में किसी महापुरुष का जन्म केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं रह जाता। उसके साथ जुड़ी तिथि, नक्षत्र, पक्ष और समय भी उस व्यक्तित्व के अर्थ को खोलने लगते हैं। इसी दृष्टि से श्रीकृष्ण का जन्म एक अद्भुत रहस्य अपने भीतर छिपाए हुए है। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी। रोहिणी नक्षत्र। अर्धरात्रि। मथुरा का कारागार। बाहर रात थी। चारों ओर अंधकार था। सत्ता के भय से संसार काँप रहा था। देवकी और वसुदेव बंधन में थे। और ठीक उसी समय, उसी अंधकार के भीतर, कृष्ण का प्राकट्य हुआ। प्रश्न उठता है— आखिर अष्टमी ही क्यों? यदि किसी महान पुरुष के जन्म के लिए केवल प्रकाश का प्रतीक चुनना होता तो पूर्णिमा इससे अधिक सुंदर तिथि क्या होती? पूर्ण चन्द्रमा—आकाश में पूर्ण प्रकाश, पूर्णता और शीतलता का प्रतीक...

महाभारत — वनपर्व — तीर्थ-यात्रा : पाण्डवों का मार्ग और गंगा-प्रदेश की ओर

महाभारत — वनपर्व — तीर्थ-यात्रा : पाण्डवों का मार्ग और गंगा-प्रदेश की ओर पुष्कर में बारह रातों का निवास और तीर्थ-व्रत पूरा करने के बाद पाण्डव आगे बढ़ते हैं। महाभारत स्वयं बताता है कि पुष्कर से आगे जम्बूमार्ग , फिर तण्डुलिकाश्रम और अगस्त्य-सरोवर आदि तीर्थ आते हैं। अर्थात् पुष्कर कोई अकेला पड़ाव नहीं था; वह एक लंबे तीर्थ-मार्ग का एक प्रमुख चरण था।  यहीं से हमारे लिए पाण्डवों के मार्ग का एक प्रारम्भिक नक्शा बनता है— पुष्कर → जम्बूमार्ग → तण्डुलिकाश्रम → अगस्त्य-सरोवर → आगे अनेक आश्रम और तीर्थ → गंगा–यमुना क्षेत्र → प्रयाग यह आधुनिक सड़क-मार्ग का नक्शा नहीं है। यह महाभारत के कथित तीर्थ-क्रम का नक्शा है। प्रयाग की ओर यात्रा आगे बढ़ती है। पाण्डव अब उस भूभाग में पहुँचते हैं जहाँ गंगा और यमुना का संगम है। महाभारत इस स्थान को अत्यंत ऊँचा तीर्थ मानता है। यहाँ ब्रह्मा द्वारा यज्ञ किए जाने की कथा कही जाती है और प्रयाग को देवताओं, ऋषियों और पितरों से सम्बद्ध महान तीर्थ बताया जाता है। लेकिन इस बार हमारे पास केवल तीर्थ-महिमा नहीं है। पाण्डव स्वयं यहाँ क्या करते हैं—यह भी पाठ स्पष्ट रूप से बतात...

महाभारत — वनपर्व — गया के बाद : तीर्थयात्रा का अगला चरण

  महाभारत — वनपर्व — गया के बाद : तीर्थयात्रा का अगला चरण गया के बाद तीर्थयात्रा का स्वर बदलता है। अब कथा केवल किसी एक तीर्थ की महिमा बताने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पाण्डवों की यात्रा उन्हें ऐसे अनेक स्थलों तक ले जाती है जहाँ नदियाँ, आश्रम, ऋषि, देवकथाएँ और प्राचीन राजवंशों की स्मृतियाँ एक-दूसरे से जुड़ती हैं। लेकिन यहाँ हम हर स्थान की लंबी धार्मिक कथा नहीं दोहराएँगे। जहाँ कोई नया ऐतिहासिक या दार्शनिक प्रश्न होगा, वहीं ठहरेंगे। गया से आगे—गंगा की ओर लोमश ऋषि पाण्डवों को आगे के तीर्थों का परिचय देते हुए उन्हें गंगा के विभिन्न पवित्र स्थलों की ओर ले जाते हैं। यहाँ एक विशेष बात ध्यान देने योग्य है। गंगा महाभारत में पहली बार नहीं आ रही। कथा के आरम्भ में वही गंगा— देवी है, भीष्म की माता है, और शान्तनु की पत्नी है। अब वनपर्व में वही गंगा—  तीर्थ है। यह परिवर्तन महाभारत की कथा-रचना की दृष्टि से अत्यंत रोचक है। गंगा—एक नदी से कहीं अधिक यदि हम केवल प्राकृतिक विज्ञान की दृष्टि से देखें तो गंगा हिमालय से निकलने वाली एक विशाल नदी-प्रणाली है। लेकिन किसी सभ्यता के लिए नदी केवल जल नहीं हो...

महाभारत — वनपर्व — पुष्कर तीर्थ : यज्ञ, ब्रह्मा और प्राचीन तीर्थ-स्मृति

  महाभारत — वनपर्व — पुष्कर तीर्थ : यज्ञ, ब्रह्मा और प्राचीन तीर्थ-स्मृति पुष्कर आज राजस्थान के अजमेर क्षेत्र में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थ है। महाभारत में इसका उल्लेख प्राचीन तीर्थ के रूप में मिलता है और इसके साथ अनेक धार्मिक आख्यान जुड़े हैं। हमारा प्रश्न केवल यह नहीं होगा कि “पुष्कर क्यों पवित्र है?” बल्कि—  पुष्कर की तीर्थ-परंपरा कितनी प्राचीन है, महाभारत उसे किस रूप में जानता है, और आज का पुष्कर उस प्राचीन स्मृति से किस प्रकार जुड़ता है? पुष्कर का कथा-संसार पुष्कर की परंपरा में ब्रह्मा और यज्ञ का विशेष स्थान है। बाद की प्रसिद्ध कथा में ब्रह्मा द्वारा पुष्कर में यज्ञ किए जाने का वर्णन आता है और पुष्कर को ब्रह्मा के प्रमुख तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठा मिलती है। लेकिन यहाँ हमें एक सावधानी रखनी होगी। आज पुष्कर में जो कथा लोकप्रिय है, उसकी प्रत्येक परत को महाभारत के काल में उसी रूप में उपस्थित मान लेना उचित नहीं होगा। हमारा काम होगा—  पुरानी परंपरा और बाद की परंपरा को अलग-अलग पहचानना। पुष्कर का भूगोल पुष्कर राजस्थान के वर्तमान अजमेर जिले में स्थित है। इसके आसपास का भूभाग आ...