ग़ज़ल - बारूद की जगह हाथों में किताब तो अच्छा हो,
ग़ज़ल बारूद की जगह हाथों में किताब तो अच्छा हो, हर आँख में इंसानियत का ख़्वाब तो अच्छा हो। जो लोग बना बैठे हैं नफ़रत को ही मज़हब, उनके लिए भी कोई नया जवाब तो अच्छा हो। पत्थर की तरह दिल न रहें शहर के लोगों के, हर दिल में मुहब्बत का कोई गुलाब तो अच्छा हो। बच्चों के खिलौनों में न हों जंग के हथियार, आँगन में कोई चाँद-सा आफ़ताब तो अच्छा हो। जो सच को छुपाते रहे चेहरों के नक़ाबों में, उन आँखों में अब सच का कोई ख़्वाब तो अच्छा हो। मज़दूर के हाथों में हो मेहनत की नई दुनिया, हर भूखे के हिस्से में थोड़ा हिसाब तो अच्छा हो। सीमा पे खड़े लोग भी लौटें कभी घर अपने, धरती के लिए जंग नहीं—कोई सैलाब तो अच्छा हो। इंसान को इंसान समझने लगे दुनिया, इस दौर में इतना-सा इंक़लाब तो अच्छा हो। ‘मुकेश’ अब न पूछो कि कहाँ है सुकूँ दुनिया में, हर दिल में अगर अपना ही जवाब तो अच्छा हो। — मुकेश