दर्शन — न्याय दर्शन भाग–७ : हेत्वाभास — जब तर्क सही दिखाई दे, पर प्रमाणित न करे
दर्शन — न्याय दर्शन भाग – ७ : हेत्वाभास — जब तर्क सही दिखाई दे , पर प्रमाणित न करे “ हर तर्क जो सुनने में सही लगे , क्या वह वास्तव में सही होता है ?” पिछले भाग में न्याय ने हमें संशय से निर्णय तक पहुँचने की प्रक्रिया दिखाई। लेकिन निर्णय तक पहुँचने के लिए केवल तर्क प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं है। तर्क का आधार भी सही होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति कहे — “ पर्वत पर अग्नि है , क्योंकि वहाँ धुआँ है। ” तो हमें पूछना होगा — क्या वहाँ वास्तव में धुआँ है ? क्या वह धुआँ अग्नि से व्याप्त है ? क्या धुएँ का कोई दूसरा कारण तो नहीं ? क्या कोई ऐसा प्रमाण है जो अग्नि के निष्कर्ष को बाधित करता हो ? यदि इनमें से किसी स्तर पर दोष हो , तो अनुमान विफल हो सकता है। इसीलिए न्याय दर्शन ने अनुमान की शुद्धता के साथ - साथ गलत हेतु की पहचान के लिए एक विस्तृत व्यवस्था विकसित की — हेत्वाभास। हेत्वाभास क्या है ? हेतु + आभास = हेत्वाभास। अर्थात...