सावन, झूला… और तुम
सावन उतरा है
धीमे-धीमे, भीगा हुआ,
जैसे आसमान ने
अपने दिल की बात
धरती पर लिख दी हो…
और उस भीगी हुई ख़ामोशी में
तुम हो…
एक झूले पर बैठी,
पीपल की उस पुरानी शाख़ से बंधी
रस्सियों के सहारे
हवा से बातें करती हुई…
तुम्हारा लहँगा
भीगी पत्तियों-सा हरा,
और चुन्नी
जैसे बादलों की कोई नरम लहर
तुम्हारे कंधों पर ठहर गई हो…
मैं पास खड़ा हूँ
धोती-कुर्ता पहने,
भीगता हुआ…
पर भीगता नहीं…
क्योंकि जो भीग रहा है
वो बाहर नहीं,
अंदर है…
…
तुम झूलती हो
धीरे-धीरे,
फिर ज़रा तेज़…
और हर बार
जब तुम मेरी तरफ आती हो
तुम्हारी आँखों में
एक शरारत चमकती है…
जैसे पूछ रही हो
“पकड़ सकते हो मुझे?”
और मैं—
बस मुस्कुरा देता हूँ…
क्योंकि कुछ चीज़ें
पकड़ी नहीं जातीं
उन्हें बस
देखा जाता है,
महसूस किया जाता है…
…
बारिश की बूँदें
तुम्हारे बालों से फिसलकर
ज़मीन पर गिरती हैं…
और हर बूँद
जैसे कोई धड़कन हो
जो मेरे नाम से टकरा रही हो…
…
मैं झूले को
हल्का-सा धक्का देता हूँ
और तुम हवा में
थोड़ी और ऊपर उठ जाती हो…
जैसे इश्क़
अपने ही वज़न से
हल्का हो जाता है…
…
तुम हँसती हो
और तुम्हारी हँसी
सावन की पहली गूँज बन जाती है…
मैं उसे पकड़ना चाहता हूँ—
पर वो भी
बारिश की तरह
हथेलियों से फिसल जाती है…
…
उस पल
ना वक़्त है,
ना दुनिया…
बस एक झूला है
जो आगे-पीछे नहीं,
दो दिलों के बीच
झूल रहा है…
…
तुम अचानक
रुक जाती हो
और मुझे देखती हो…
गहरी,
ठहरी हुई नज़र से…
जैसे पूछ रही हो
“ये जो है…
ये कितना सच्चा है?”
मैं पास आता हूँ
भीगी मिट्टी की ख़ुशबू में लिपटा हुआ
और धीरे से कहता हूँ
“इतना…
कि ये सावन भी
एक दिन ख़त्म हो जाएगा
पर ये एहसास नहीं…”
…
और फिर
तुम फिर से झूलने लगती हो…
सावन फिर से बरसता है…
और मैं—
वहीं खड़ा—
तुम्हें देखता रहता हूँ…
जैसे हर बारिश
तुमसे ही शुरू होती हो…
मुकेश ,,,,


