चिंतन - अध्याय–12 : कर्म क्या है? - भाग–5 : आरण्यकों में कर्म
चिंतन - अध्याय –12 : कर्म क्या है ? - भाग –5 : आरण्यकों में कर्म बाह्य अनुष्ठान से आन्तरिक साधना की ओर भारतीय दार्शनिक परम्परा के विकास में आरण्यक - ग्रन्थ (Āra ṇ yaka Texts) एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संक्रमण - बिन्दु का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि वेदों ने कर्म की आधारभूमि निर्मित की और ब्राह्मण - ग्रन्थों ने उसे यज्ञ - विधि और अनुष्ठान के रूप में व्यवस्थित किया , तो आरण्यकों ने पहली बार यह प्रश्न उठाया कि — क्या कर्म का वास्तविक मूल्य केवल बाह्य अनुष्ठान में है , या उसके पीछे स्थित आन्तरिक चेतना में भी ? यही प्रश्न भारतीय दर्शन की दिशा बदल देता है। " आरण्यक " शब्द का सम्बन्ध अरण्य ( वन ) से है। परम्परा के अनुसार इन ग्रन्थों का अध्ययन उन साधकों द्वारा किया जाता था जो जीवन के उत्तरार्द्ध में वन की शान्ति में रहकर यज्ञ के बाह्य रूप से अधिक उसके आन्तरिक अर्थ (Inner Meaning) का अन्वेषण करना चाहते थे। यह परिवर्तन केवल स्थान का नहीं , बल्कि दृष्टि...