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अनुपस्थिति का गणित

  अनुपस्थिति का गणित वह चला गया और दुनिया ने गणित सी बदल दी: कुछ दूरीयों के बीच घाव-बिंदु पैदा हो गए, कुछ समीकरणों में शून्य के स्थान पर कोई नाम लग गया, और उससे भी गहरा  एहसासों का बिंदु विभाजित हो गया। कुछ मौसम बिना कारण भारी हो उठे, कुछ गीत बीच में सांस थाम लेते, और कुछ रास्ते अनजाने में दूरियाँ बढ़ा लेते  जैसे किसी ने मानचित्र पर चुपके से रेखाएँ खिंची हों। यह सबसे सटीक प्रमाण है: किसी की उपस्थिति की सत्यता का पैमाना यह नहीं कि वह बोलता था, बल्कि यह कि जब वह नहीं है तो सब कुछ सोच में पड़ जाता है। मुकेश ,,,,

रिक्तकाल का साक्ष्य

  रिक्तकाल का साक्ष्य उसके जाने की ख़बर नहीं थी किसी अख़बार में, पर शहर ने अपने रंग कुछ फीके कर लिए। कुछ लोग वही रहे, मगर बातें बीचों-बीच रुकीं, और कुछ हँसीयाँ दूसरी भाषा बोलने लगीं। एक आदमी के जीवन में उसकी उपस्थिति का प्रमाण वही है कि जब वह नहीं होता तो चीज़ें चोरी-सी होती हैं — मौसम की मुस्कान, गीतों का पूरा सुर, रास्तों की सीधी चाल। कभी-कभी रात में मैं उठकर खिड़की पर खड़ा होता हूँ, ताकता हूँ उन बदलते-टिकते फसलों को — और महसूस करता हूँ कि जो खोया है, वह कहीं और से लौटता नहीं, पर कहीं और का सूरज ढलता है। मुकेश ,,,,

भगवद्गीता प्रथम अध्याय, प्रथम श्लोक : एक शोधपूर्ण एवं नवोन्मेषी विश्लेषण

  भगवद्गीता प्रथम अध्याय, प्रथम श्लोक : एक शोधपूर्ण एवं नवोन्मेषी विश्लेषण मूल श्लोक धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।  मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ १.१॥ अन्वय हे सञ्जय! धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा रखने वाले मेरे पुत्र और पाण्डु के पुत्र एकत्र होकर क्या कर रहे थे? सामान्य हिन्दी अर्थ धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं—हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए एकत्रित हुए मेरे पुत्र तथा पाण्डवों ने क्या किया? सम्पूर्ण भगवद्गीता का प्रारम्भ एक प्रश्न से होता है। यह अत्यन्त आश्चर्यजनक तथ्य है कि भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश बाद में आता है, पहले आता है एक अंधे राजा का प्रश्न। यदि सम्पूर्ण गीता को मानव-चेतना का महाग्रन्थ माना जाए, तो यह पहला श्लोक मानव-मस्तिष्क के संकट का उद्घाटन है। आज तक अधिकांश भाष्यकारों ने इस श्लोक को ऐतिहासिक, नैतिक अथवा आध्यात्मिक दृष्टि से देखा है। यहाँ हम इसे चेतना-विज्ञान (Consciousness Science), मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience), क्वाण्टम संभावना तथा आध्यात्मिकता के संयुक्त दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करेंगे। 1. धृ...

मौन : वैदिक साहित्य और आधुनिक मनोविज्ञान के आलोक में एक शोधपूर्ण निबन्ध

 मौन : वैदिक साहित्य और आधुनिक मनोविज्ञान के आलोक में एक शोधपूर्ण निबन्ध मानव सभ्यता का अधिकांश इतिहास शब्दों में व्यक्त हुआ है, किन्तु मानव की सबसे गहरी अनुभूतियाँ प्रायः शब्दों के पार जाकर मौन में ही प्रकट हुई हैं। शब्द ज्ञान का माध्यम हैं, परन्तु मौन ज्ञान की परिपक्वता का। बोलना मनुष्य की सामाजिक आवश्यकता है, जबकि मौन उसकी आन्तरिक आवश्यकता। भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व यह अनुभव कर लिया था कि सत्य के कुछ आयाम ऐसे हैं जिन्हें भाषा व्यक्त नहीं कर सकती। इसलिए उन्होंने मौन को केवल "चुप रहना" नहीं माना, बल्कि उसे साधना, आत्मानुशासन और आत्मबोध का एक महत्वपूर्ण साधन माना। आधुनिक मनोविज्ञान भी अब इस निष्कर्ष पर पहुँच रहा है कि निरन्तर शोर, सूचना-प्रवाह और वाचालता से भरे युग में मौन मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन और रचनात्मकता के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इस प्रकार वैदिक परम्परा और आधुनिक मनोविज्ञान, दोनों ही अपने-अपने ढंग से मौन की महत्ता को स्वीकार करते हैं। 1. मौन का अर्थ : केवल चुप रहना नहीं सामान्यतः मौन का अर्थ बोलना बन्द कर देना समझा जाता है। किन्तु भारतीय दर्शन मे...

निद्रा : आधुनिक मनोविज्ञान, आयुर्वेद और पतञ्जलि योग के आलोक में एक शोधात्मक निबन्ध

  निद्रा : आधुनिक मनोविज्ञान , आयुर्वेद और पतञ्जलि योग के आलोक में एक शोधात्मक निबन्ध मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में भोजन , जल और वायु के साथ - साथ निद्रा (Sleep) का भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि भोजन कुछ दिनों तक न मिले तो मनुष्य जीवित रह सकता है , किन्तु यदि उसे पर्याप्त निद्रा न मिले तो उसकी मानसिक , शारीरिक तथा भावनात्मक क्षमताएँ शीघ्र ही प्रभावित होने लगती हैं। आधुनिक विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि निद्रा केवल विश्राम की अवस्था नहीं है , बल्कि यह शरीर और मस्तिष्क के पुनर्निर्माण (Restoration) की एक जटिल जैविक प्रक्रिया है। भारतीय ज्ञान - परम्परा में भी निद्रा को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। आयुर्वेद में इसे स्वास्थ्य के तीन प्रमुख स्तम्भों में स्थान प्राप्त है , जबकि पतञ्जलि योगसूत्र में निद्रा को चित्त की एक विशिष्ट वृत्ति माना गया है। इस प्रकार निद्रा केवल जैविक घटना नहीं , बल्कि दार्शनिक , मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से ...