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Saturday, 30 May 2026

एक चेहरा था जिसे मैंने अपना समझ लिया था

  एक चेहरा था जिसे मैंने अपना समझ लिया था


एक चेहरा था

जिसे मैंने अपना समझ लिया था

जैसे आईने में दिखती परछाईं

कभी छूट ही नहीं सकती।

उसकी हँसी में

मैंने अपने दिनों की रोशनी रख दी,

उसकी आँखों में

अपने सारे यक़ीन।

मगर चेहरों की भी उम्र होती है,

वक़्त उन्हें बदल देता है

जैसे धूप दीवारों के रंग चुरा लेती है।

अब वो चेहरा

कहीं है भी, या नहीं

मुझे नहीं मालूम।

बस इतना जानता हूँ,

सबसे मुश्किल है ‘मैं ठीक हूँ’ कहना

सबसे मुश्किल है

‘मैं ठीक हूँ’ कहना।

ये दो शब्द

ज़ुबान से निकलते तो हैं आसानी से,

पर गले में

काँटों की तरह अटक जाते हैं।

क्योंकि हर बार जब कोई पूछता है,

तो जवाब में

सिर्फ़ ‘ठीक हूँ’ कहना पड़ता है,

जबकि भीतर

सारे शहर ढह चुके होते हैं।

‘मैं ठीक हूँ’

दरअसल सबसे बड़ा झूठ है

जो हम अपने ही टुकड़ों पर

पर्दा डालने के लिए बोलते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

Friday, 29 May 2026

चुपचाप बैठना और देखना

 चुपचाप बैठना और देखना


कभी-कभी

मैं कुछ नहीं करता।


न सोचता हूँ,

न लिखता हूँ,

न किसी को याद करता हूँ।


बस बैठ जाता हूँ।


जैसे कोई पुरानी कुर्सी

कमरे के एक कोने में

सालों से बैठी हो।


तब दुनिया धीरे-धीरे

अपना काम शुरू करती है।


दीवार पर धूप

थोड़ी-सी सरकती है।


घड़ी की टिक-टिक

अचानक सुनाई देने लगती है,

हालाँकि वह पहले भी

उतनी ही आवाज़ कर रही थी।


एक मक्खी

खिड़की के शीशे से टकराती है।


फिर रुक जाती है।


फिर टकराती है।


जैसे उसे विश्वास हो

कि पारदर्शिता ही रास्ता है।


मैं देखता हूँ—


मेज़ पर रखी किताब

बंद है,


लेकिन उसके भीतर

सैकड़ों वाक्य

अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।


पानी का गिलास

कुछ नहीं कहता,


फिर भी

उसकी सतह पर तैरती रोशनी

लगातार बदलती रहती है।


धीरे-धीरे


मुझे लगता है


कि चीज़ें

वस्तुएँ नहीं हैं।


वे अपने-अपने जीवन में

व्यस्त प्राणी हैं।


जूते

दरवाज़े की ओर देख रहे हैं।


परदा

हवा का इंतज़ार कर रहा है।


खाली कप

अपने भीतर

किसी पुरानी चाय की गर्मी

संभाले बैठा है।


और तब


अचानक


मुझे पता चलता है


कि देखने वाली चीज़

मैं भी नहीं हूँ।


कमरा मुझे देख रहा है।


धूप मुझे पढ़ रही है।


खिड़की

मेरे चेहरे पर पड़ती छाया से

मेरा हाल जान रही है।


मैं जितना स्थिर होता हूँ,


उतना ही

दुनिया चलने लगती है।


और जितना

दुनिया को चलता देखता हूँ,


उतना ही

अपने भीतर की भीड़

शांत होने लगती है।


फिर एक समय आता है


जब कमरे में


कुछ भी नहीं होता।


सिर्फ़


एक आदमी,


एक कुर्सी,


थोड़ी-सी धूप,


और देखने की घटना।


शायद


जीवन का एक अर्थ


यह भी है—


कि हम कभी-कभी


किसी निष्कर्ष तक पहुँचे बिना,


किसी प्रार्थना के बिना,


किसी उपलब्धि के बिना,


बस


चुपचाप बैठें


और देखें


कि संसार


हमारी अनुपस्थिति में भी


कितनी सुंदरता से


घटित होता रहता है।


मुकेश ,,,,,

जहाँ शहर की आवाज़ें लगभग समाप्त हो जाती हैं


रात अब पूरी तरह उतर आई थी।

 रात अब पूरी तरह उतर आई थी।

सामने की सड़क पर गाड़ियों की आवाजाही कम हो गई थी।

दूर कहीं किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आती, फिर बहुत देर तक कुछ नहीं सुनाई देता।

उस “कुछ नहीं” में ही शहर का असली चेहरा रहता है —

दिन की भीड़ से अलग, बिना मुखौटे का, थोड़ा थका हुआ, थोड़ा अकेला।


वह अब भी उसी तरह बैठा था।


खिड़की के शीशे में उसका धुँधला प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।

उसे हमेशा यह अजीब लगता था कि रात में खिड़कियाँ बाहर से ज़्यादा भीतर दिखाने लगती हैं।


दिन में आदमी दुनिया देखता है।

रात में वही शीशा उसे उसका अपना चेहरा लौटा देता है।


उसने ध्यान से अपने प्रतिबिंब को देखा।


बालों की सफ़ेदी अब कनपटियों से आगे बढ़ चुकी थी।

आँखों के नीचे हल्की सूजन थी।

चेहरे पर वह थकान नहीं थी जो मेहनत से आती है —

वह दूसरी तरह की थकान थी, जो बहुत वर्षों तक जीवन को भीतर चुपचाप ढोने से आती है।


उसे अचानक याद आया —

एक समय था जब उसे अपने चेहरे से मोह था।


कॉलेज के दिनों में वह शीशे के सामने खड़े होकर बाल सँवारा करता।

नई कमीज़ पहनते हुए उसे लगता, दुनिया अभी शुरू हुई है और उसमें उसके लिए बहुत जगह बची हुई है।


अब उसे अपने चेहरे से कोई शिकायत भी नहीं थी, कोई लगाव भी नहीं।


उम्र का एक पड़ाव ऐसा आता है जहाँ आदमी अपने चेहरे को ऐसे देखने लगता है, जैसे किसी पुराने किरायेदार को देख रहा हो —

बहुत साल साथ रहे, मगर अब बातचीत कम रह गई हो।


कमरे में रखे पुराने रेडियो से हल्की खरखराहट उठी।

शायद स्टेशन ठीक से नहीं पकड़ रहा था।

फिर अचानक एक पुराना गीत उभरा —


“वक़्त ने किया क्या हसीं सितम…”


वह मुस्कराया नहीं।

बस उसकी उँगलियाँ मग पर थोड़ी कस गईं।


कुछ गाने संगीत नहीं होते।

वे बंद कमरों के दरवाज़े होते हैं।


और हर आदमी के भीतर कुछ कमरे ऐसे होते हैं, जिन्हें वह जान-बूझकर बंद रखता है।


लेकिन स्मृति बड़ी धैर्यवान चीज़ है।

वह दरवाज़ा नहीं तोड़ती।

बस वर्षों तक धीरे-धीरे दस्तक देती रहती है।


उसे वह शाम याद आई जब उसने पहली बार अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा था।


कोई फ़िल्मी दृश्य नहीं था।

न बारिश, न संगीत।


बस स्टेशन का प्लेटफ़ॉर्म था।

भीड़ बहुत थी।

ट्रेन छूटने वाली थी।

और भीड़ में बिछड़ न जाए, इसलिए उसने उसका हाथ पकड़ लिया था।


लेकिन उस क्षण उसे पहली बार महसूस हुआ था कि किसी दूसरे मनुष्य का हाथ पकड़ना सिर्फ़ स्पर्श नहीं होता —

वह अपने अकेलेपन का थोड़ा हिस्सा किसी और को सौंप देना भी होता है।


उसने आँखें बंद कर लीं।


उसे अब उसकी उँगलियों की बनावट तक याद नहीं थी।

सिर्फ़ एक एहसास बचा था।

जैसे बहुत पुरानी बारिश की नमी दीवारों में रह जाती है, जबकि पानी कब का सूख चुका होता है।


बाहर से एक मोटरसाइकिल तेज़ आवाज़ में गुज़री।

वह हल्का-सा चौंका।


उसे महसूस हुआ कि वह अब छोटी आवाज़ों से भी चौंकने लगा है।


शायद इसलिए कि अकेले रहने वाले लोग धीरे-धीरे आवाज़ों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो जाते हैं।

उनके भीतर चुप्पी का क्षेत्र बड़ा होता जाता है।


उसने कमरे पर नज़र डाली।


किताबें।

पुराना सोफ़ा।

दीवार पर टँगी तस्वीरें।

लकड़ी की अलमारी, जिसके निचले हिस्से का रंग नमी से उखड़ने लगा था।


सब कुछ वैसा ही था।


और फिर भी, सब बदल चुका था।


उसे अचानक लगा कि घर कभी स्थिर नहीं रहते।

वे भी हमारे साथ बूढ़े होते हैं।


दीवारें हमारी आदतें सीख लेती हैं।

फ़र्श हमारे चलने की दिशा याद रखता है।

कुर्सियाँ जानती हैं कि हम सबसे ज़्यादा थककर कहाँ बैठते हैं।


और फिर एक दिन वही घर हमें ऐसे देखने लगता है, जैसे वह हमसे ज़्यादा समय का साक्षी हो।


उसने कॉफ़ी का आख़िरी घूँट लिया।

ठंडी, लगभग बेस्वाद।


लेकिन उसने मग नीचे नहीं रखा।


उसकी आँखें अब फिर बाहर थीं।


सड़क लगभग खाली हो चुकी थी।

नीम का पेड़ अँधेरे में सिर्फ़ एक काला आकार रह गया था।


और तभी उसे बहुत भीतर कहीं एक अजीब-सी बात महसूस हुई —


शायद जीवन में सबसे गहरी त्रासदी मृत्यु नहीं होती।

त्रासदी यह होती है कि मनुष्य धीरे-धीरे उन चीज़ों का आदी हो जाता है, जो एक दिन उससे छिन जाने वाली हैं।


प्रेम।

साथ।

आवाज़ें।

रात के खाने पर किसी का इंतज़ार।

खिड़की के पास रखी दूसरी कुर्सी।


उसने धीमे से सिर पीछे टिकाया।


घड़ी अब भी चल रही थी।


समय हमेशा चलता रहता है।

चाहे किसी के जीवन में कुछ बचा हो या नहीं।


कमरे की रोशनी बहुत मुलायम हो गई थी।

उसके चेहरे पर आधा उजाला था, आधा अँधेरा।


और उसी अधूरे प्रकाश में वह आदमी बैठा रहा 

कॉफ़ी का खाली मग हाथ में लिए,

जैसे कोई व्यक्ति नहीं,

बल्कि अपनी ही बीती हुई उम्र का अंतिम पहरेदार हो।


मुकेश ,,,,,,,,,

उस शाम कमरे में एक ऐसी ख़ामोशी थी

 उस शाम कमरे में एक ऐसी ख़ामोशी थी, जो किसी अनुपस्थित व्यक्ति की तरह मौजूद रहती है।

न बोलती है, न हटती है — बस धीरे-धीरे हर चीज़ पर अपनी महीन धूल बिछाती रहती है।

वह आदमी खिड़की के पास बैठा था।
पचपन या छप्पन की उम्र होगी।
उस उम्र का चेहरा, जिसमें आदमी बूढ़ा कम और अपने ही भीतर ज़्यादा रहने लगता है।

उसके हाथ में कॉफ़ी का मग था।
कॉफ़ी अब गुनगुनी भी नहीं रही थी, लेकिन वह उसे वैसे ही पकड़े हुए था, जैसे लोग कभी-कभी किसी पुरानी चिट्ठी को पकड़े रहते हैं — पढ़ते नहीं, सिर्फ़ पकड़े रहते हैं।

कमरे में हल्की पीली रोशनी थी।
दीवार के कोने पर लगी घड़ी बहुत धीमी आवाज़ में चल रही थी।
इतनी धीमी कि उसकी टिक-टिक सुनने के लिए भीतर का शोर कम करना पड़ता।

खिड़की के बाहर वही सड़क थी, जिस पर वह पिछले बाईस वर्षों से शाम उतरते देखता आया था।

उसी मोड़ पर पान वाला।
उसी बिजली के खंभे पर झुका तार।
उसी अधबने मकान की छत पर बैठे कबूतर।
और वही नीम का पेड़, जिसकी एक शाख़ कुछ महीने पहले आँधी में टूट गई थी।

उसे उस टूटी शाख़ का दुख अजीब तरह से याद था।

लोग सोचते हैं, आदमी बड़े दुखों से टूटता है।
लेकिन सच यह है कि मनुष्य अक्सर उन चीज़ों से टूटता है, जिन्हें कोई घटना भी नहीं मानता।

जैसे एक दिन अचानक यह महसूस होना कि अब घर में किसी के चप्पलों की आवाज़ नहीं आती।

उसने धीरे से मग होंठों तक उठाया।
कॉफ़ी में अब कड़वाहट ज़्यादा थी।

उसे याद आया — कभी इसी कमरे में चाय की भाप और बातचीत साथ-साथ उठते थे।
उसकी पत्नी को कॉफ़ी पसंद नहीं थी।
वह हमेशा इलायची वाली चाय बनाती।

और हर बार कप रखते हुए पूछती —
“इतनी खिड़की के बाहर क्या देखते रहते हो?”

वह कभी जवाब नहीं दे पाता था।

शायद इसलिए कि आदमी जिन चीज़ों को सबसे ज़्यादा देखता है, उन्हें कभी ठीक से समझा नहीं पाता।

पत्नी को गए सात साल हो चुके थे।
“गए” — उसने मन ही मन यह शब्द दोहराया और उसे लगा, मृत्यु के लिए भाषा ने कितना मुलायम शब्द चुना है।
जैसे कोई सिर्फ़ दूसरे कमरे में गया हो और अभी लौट आएगा।

लेकिन कुछ लोग लौटते नहीं।
सिर्फ़ उनकी आदतें लौटती हैं।

सुबह अलमारी खोलते समय।
बरसात की पहली गंध में।
किसी पुराने गाने की दो पंक्तियों में।
या रात के उस हिस्से में, जहाँ नींद और स्मृति एक-दूसरे में घुलने लगते हैं।

उसने सामने रखी मेज़ को देखा।

मेज़ पर अब भी एक हल्का गोल निशान था —
वहीं, जहाँ उसकी पत्नी अपना कप रखा करती थी।

सात वर्षों में उसने वह मेज़ नहीं बदली।

कभी-कभी उसे लगता था, मनुष्य प्रेम में नहीं रहता —
वह वस्तुओं में बस जाता है।

एक पुराना तकिया।
एक कंघी।
अधूरी पढ़ी किताब में रखा सूखा पत्ता।
दरवाज़े की कुंडी बंद करने का वही ढंग।

और फिर एक दिन वे चीज़ें अपनी जगह पर रहती हैं, लेकिन जिनके कारण उनमें अर्थ था, वे नहीं रहते।

तब कमरा धीरे-धीरे कमरा नहीं रह जाता।
वह स्मृतियों का संग्रहालय बन जाता है।

बाहर सड़क पर अज़ान की आवाज़ तैरती हुई आई।
उस आवाज़ में हमेशा उसे एक अजीब उदासी लगती थी —
जैसे कोई बहुत दूर से किसी को पुकार रहा हो।

उसने खिड़की से बाहर देखा।

एक लड़का साइकिल पर गुज़र रहा था।
पीछे उसकी बेटी बैठी थी, दोनों हँस रहे थे।

उस क्षण उसे अपनी बेटी याद आई —
छोटी थी तब इसी खिड़की पर चढ़कर बारिश देखा करती थी।
अब कनाडा में रहती थी।
फोन पर बात होती थी, मगर बातचीतों में अब वह घरेलू बेतकल्लुफ़ी नहीं बची थी, जिसमें लोग बिना वजह भी चुप रह सकते हैं।

अब हर बातचीत में सूचना ज़्यादा होती थी, अपनापन कम।

“पापा, दवा टाइम से ले रहे हैं न?”
“हाँ।”

“ठंड बहुत है वहाँ?”
“ठीक है।”

फिर दोनों कुछ सेकंड चुप रहते।
और वही चुप्पी सबसे सच्ची बात होती।

उसने महसूस किया कि उम्र दरअसल शरीर की नहीं, अनुपस्थितियों की गिनती है।

जितने लोग भीतर से कम होते जाते हैं, आदमी उतना बूढ़ा होता जाता है।

कमरे में हल्की ठंड बढ़ रही थी।
उसने शॉल अपने कंधे पर ठीक की।

टेबल पर रखी किताब खुली हुई थी, मगर वह कई मिनटों से एक ही पंक्ति पर अटका था।

उसे अचानक लगा —
जीवन शायद किसी बड़े अर्थ की तरफ़ नहीं जाता।

हम बस धीरे-धीरे अपनी आदतों के भीतर बैठते जाते हैं।
और फिर एक दिन समय आकर उन आदतों को हमसे अलग कर देता है।

पहले लोग छूटते हैं।
फिर रास्ते।
फिर शहर।
फिर इच्छाएँ।

अंत में आदमी सिर्फ़ एक खिड़की बच जाता है,
जिससे वह दुनिया को नहीं, अपने बीते हुए समय को देखता रहता है।

बाहर रात थोड़ी और गहरी हो गई थी।

सड़क की बत्तियाँ जल चुकी थीं।
उनकी पीली रोशनी में हवा में उड़ती धूल ऐसे दिख रही थी, जैसे समय स्वयं छोटे-छोटे कणों में टूटकर तैर रहा हो।

उसने मग को दोनों हाथों से थाम लिया।

कॉफ़ी अब बिल्कुल ठंडी हो चुकी थी।

लेकिन वह फिर भी उसी तरह बैठा रहा 
खिड़की के पास,
धीरे-धीरे अँधेरे में डूबते कमरे में,
जैसे कोई आदमी नहीं,
अपनी ही स्मृतियों का अंतिम दर्शक बैठा हो।


मुकेश ,,,,,,,,

धूप से गुफ़्तगू — और बंद पड़ी घड़ी

 धूप से गुफ़्तगू — और बंद पड़ी घड़ी


घर में एक घड़ी थी

जो कई बरसों से बंद पड़ी थी।


उसकी सुइयाँ

तीन बजकर सत्रह मिनट पर अटकी थीं,

जैसे वक़्त ने

वहीं आकर साँस लेना छोड़ दिया हो।


मैं अक्सर उसे देखता था,

मगर उस दिन

धूप सीधे उसी पर जाकर ठहरी।


उसने काँच पर

अपनी उँगलियाँ फेरीं,

और घड़ी के भीतर

जमी धूल अचानक चमक उठी।


मैंने पूछा —

“तुम रोज़ इसे छूती हो,

फिर भी यह चलती क्यों नहीं?”


धूप ने

धीरे से मुस्कुराकर कहा —


“हर चीज़ का चलना ज़रूरी नहीं होता।

कुछ चीज़ें

रुककर ज़्यादा सच हो जाती हैं।”


मैं चुप रहा।


कमरे में

पुराने काग़ज़ों और दवाइयों की मिली-जुली गंध थी।

खिड़की से आती हवा

परदों को ऐसे हिला रही थी

जैसे कोई अदृश्य आदमी

कमरे में टहल रहा हो।


मैंने घड़ी को देखा।

उसकी बंद सुइयों में

एक अजीब-सी ज़िद थी।


धूप बोली 


“तुम इंसान

वक़्त को बहुत ग़लत समझते हो।


तुम्हें लगता है

वह सिर्फ़ आगे बढ़ता है।

जबकि सच यह है

कि कुछ लम्हे

हमारे भीतर हमेशा के लिए रुक जाते हैं।”


फिर उसने

दीवार पर मेरी परछाईं की तरफ़ इशारा किया।


“देखो,”

वह बोली,

“तुम अभी भी

कई साल पहले वाले अपने आप को

अपने भीतर लिए घूम रहे हो।


वही डर,

वही अधूरी बातें,

वही किसी के जाने की आवाज़।”


मुझे लगा

कमरा अचानक थोड़ा छोटा हो गया है।


जैसे दीवारें

धीरे-धीरे भीतर की तरफ़ खिसक रही हों।


मैंने पूछा —

“तो क्या आदमी कभी बदलता नहीं?”


धूप कुछ देर

बंद घड़ी के काँच में चमकती रही।


फिर बहुत धीमे से बोली 


“बदलता है।

मगर पेड़ की तरह नहीं…

सुगंध की तरह।


दिखाई नहीं देता,

बस एक दिन

पूरा कमरा अलग लगने लगता है।”


मुकेश ,,,,,,,,,

Thursday, 28 May 2026

धूप से गुफ़्तगू — और बूढ़ा बरामदा

 धूप से गुफ़्तगू — और बूढ़ा बरामदा


घर का वह बरामदा

अब बूढ़ा हो चला है।


उसकी दीवारों से

चूने की परतें ऐसे उतरती हैं

जैसे किसी वृद्ध के हाथों से

धीरे-धीरे स्मृतियाँ झरती हों।


मैं वहीं बैठा था

जब धूप आई।


वह पहले

बरामदे की टूटी मोज़ेक पर फैली,

फिर धीरे से

पुरानी बेंत की कुर्सी पर जा बैठी —

ठीक वहाँ

जहाँ कभी अब्बा शाम को अख़बार पढ़ा करते थे।


कुछ देर

हम दोनों चुप रहे।


बरामदे में

हल्दी, पुरानी लकड़ी

और बरसों से रखे लोहे की मिली-जुली गंध थी।


मैंने धूप से पूछा 


“क्या जगहें भी बूढ़ी होती हैं?”


धूप ने

दीवार पर टंगी धुँधली तस्वीर को छुआ

और मुस्कुराई।


“जगहें बूढ़ी नहीं होतीं,”

वह बोली,

“वे बस

अपने भीतर जमा आवाज़ों से भर जाती हैं।”


तभी हवा चली।

बरामदे का पुराना पंखा

हल्का-सा काँपा,

जैसे नींद में किसी ने उसका नाम लिया हो।


धूप ने कहा 


“देखो इस बरामदे को।

यह सिर्फ़ ईंट और लकड़ी नहीं।

यह उन लोगों की प्रतीक्षा है

जो यहाँ बैठकर

कभी लौट आने वालों का इंतज़ार करते थे।”


मैंने फ़र्श पर

धूप के छोटे-छोटे टुकड़े देखे।

वे ऐसे बिखरे थे

जैसे किसी बुज़ुर्ग की जेब से

पुराने सिक्के गिर पड़े हों।


मैंने धीरे से पूछा 

“और जो लोग लौटकर नहीं आते?”


धूप कुछ देर

खाली कुर्सी पर ठहरी रही।


फिर बोली 


“बरामदे उन्हें भूलते नहीं।


वे उनकी हँसी

दीवारों में टाँग लेते हैं,

उनकी आदतें

दरवाज़ों में छुपा देते हैं।


इसलिए पुराने घरों में

अचानक कभी-कभी

बिना वजह

अपनापन महसूस होता है।”


शाम उतरने लगी थी।

धूप धीरे-धीरे

बरामदे से खिसक रही थी।


जाते-जाते उसने कहा 


“कुछ जगहें

मकान नहीं होतीं।


वे समय के थके हुए कंधे होती हैं,

जहाँ बीती हुई ज़िंदगियाँ

थोड़ी देर बैठकर

अब भी साँस लेती हैं।”


मुकेश ,,,,,,