चिंतन - क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है?
चिंतन - क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है? हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ गति को सफलता समझ लिया गया है। सब कुछ शीघ्र चाहिए—ज्ञान भी, धन भी, प्रेम भी, प्रतिष्ठा भी। प्रतीक्षा अब गुण नहीं, बाधा मानी जाने लगी है। अधैर्य हमारे समय का सबसे बड़ा संस्कार बनता जा रहा है। तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है? धैर्य का अर्थ रुक जाना नहीं है। धैर्य का अर्थ है—चलते रहना, बिना घबराए। नदी को समुद्र तक पहुँचने की जल्दी नहीं होती। वह हर मोड़ को स्वीकार करती है, हर पत्थर को छूती है, हर घाट को प्रणाम करती हुई आगे बढ़ती है। यदि वह अधीर हो जाए, तो बाढ़ बन जाएगी; यदि धैर्य रखे, तो जीवन बन जाएगी। मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है। जब वह समय से लड़ता है, तो भीतर बाढ़ आ जाती है। जब वह समय के साथ चलना सीखता है, तो जीवन में लय उतर आती है। धैर्य की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि वह देर तक प्रतीक्षा कर सकता है। उसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि प्रतीक्षा के दौरान भी उसका विश्वास नहीं टूटता। यही धैर्य को साधारण सहनशीलता से अलग करता है। सहन करना कभी-कभी विवशत...