पाणिनीय दर्शन भाग–९ देवभाषा क्यों? — संस्कृत, वाक्, व्याकरण और भाषा की वैज्ञानिक संरचना
पाणिनीय दर्शन भाग – ९ देवभाषा क्यों ? — संस्कृत , वाक् , व्याकरण और भाषा की वैज्ञानिक संरचना पिछले भाग में हमने एक अत्यन्त प्राचीन प्रश्न से शुरुआत की थी — अव्यक्त ध्वनि - प्रवाह व्याकृत भाषा कैसे बना ? वहीं से हमने “ व्याकरण ” का अर्थ , इन्द्र द्वारा वाणी के व्याकरण की वैदिक कथा और प्रकृति – प्रत्यय की पाणिनीय संरचना को देखा। अब उसी यात्रा को एक स्वाभाविक अगले प्रश्न तक ले चलना चाहिए — जिस भाषा को इतनी गहराई से व्याकृत किया गया , उसे भारतीय परम्परा ने “ देवभाषा ”, “ देववाणी ”, “ गीर्वाणवाणी ” क्यों कहा ? क्या इसका अर्थ सचमुच यह है कि — संस्कृत देवताओं की भाषा थी ? या “ देवभाषा ” का कोई अधिक गहरा सांस्कृतिक , वैदिक और दार्शनिक अर्थ है ? और यदि संस्कृत को “ वैज्ञानिक भाषा ” कहा जाता है , तो — वास्तव में उसकी वैज्ञानिकता कहाँ है और कहाँ केवल अतिशयोक्ति ? इन प्रश्नों का उत्तर श्रद्धा से नहीं , शोध और प्रमाण से खोजना आवश्यक है। पहले एक भ...