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Monday, 16 March 2026

इश्क़ का दूसरा आसमान

 इश्क़ का दूसरा आसमान


इश्क़

सिर्फ़ ज़मीन पर चलने वाला

कोई रिश्ता नहीं

वो तो रूह का

एक दूसरा आसमान है।


जहाँ

लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं पड़ती,

और ख़ामोशियाँ भी

मायने रखने लगती हैं।


वहाँ

दिल किसी को

अपना कहकर बाँधता नहीं—

बस

उसकी मौजूदगी में

एक उजली-सी रौशनी महसूस करता है।


कुछ रूहें

इस आसमान तक पहुँचती हैं,

मगर लौटकर

उसी पुरानी दुनिया में

खो जाती हैं।


और कुछ

उसकी ऊँचाइयों में

इतनी दूर निकल जाती हैं

कि फिर

धरती की छोटी-छोटी बंदिशें

उन्हें छू भी नहीं पातीं।


इश्क़ का यह दूसरा आसमान

हर किसी को नसीब नहीं होता

क्योंकि वहाँ पहुँचने के लिए

दिल को

ख़ुद से भी थोड़ा

आज़ाद होना पड़ता है।


और जब कोई रूह

सचमुच वहाँ पहुँच जाए—

तो उसे समझ आता है

कि मोहब्बत


सिर्फ़ एक एहसास नहीं,

बल्कि

रूह की परवाज़ का

दूसरा आसमान है


मुकेश ,,,,,,

तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू की तहरीर

 तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू की तहरीर


तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू में

जो तहरीर छिपी है,

मैं उसे पढ़ सकता हूँ

धीरे-धीरे,

जैसे कोई दरवेश

रात की ख़ामोशी में

किसी अनदेखी किताब के पन्ने पलट रहा हो।


मुझे मालूम है

उस महक में

कितनी अनकही बातें बसती हैं,

कितने मौसम

चुपचाप अपना रंग छोड़ जाते हैं।


मैं चाहूँ

तो उन खुशबुओं को

नज़्मों में ढाल सकता हूँ

शब्दों की रौशनी में रखकर

उन्हें एक नई आवाज़ दे सकता हूँ।


पर शायद

कविता की सबसे बड़ी विडम्बना यही है

कि कुछ तहरीरें

पढ़ी तो जा सकती हैं,

पर लिखी नहीं जा सकतीं।


और कुछ खुशबुएँ

समझी तो जा सकती हैं,

पर किसी किताब में

कैद नहीं की जा सकतीं।


यह भी सच है

कि तुम

अपनी महकती साँसों को

किसी को पढ़ने नहीं दोगी


क्योंकि

कुछ रहस्य

उसी वक़्त तक ख़ूबसूरत रहते हैं

जब तक वे

किसी की ख़ामोश साँसों में

छिपे रहते हैं।


और शायद

इसीलिए

मैं उन्हें पढ़ते हुए भी

कभी पूरी तरह लिख नहीं पाता।


मुकेश ,,,,,,,

इश्क़ का गुमशुदा क़ाफ़िला

 इश्क़ का गुमशुदा क़ाफ़िला


इश्क़

कभी-कभी

किसी रेगिस्तान से गुज़रते

एक क़ाफ़िले जैसा होता है—


जो दूर से

धूल और रौशनी के बीच

धीरे-धीरे चलता दिखाई देता है।


कुछ रूहें

उसके साथ थोड़ी दूर तक चलती हैं,

कुछ

किसी मोड़ पर

अचानक बिछड़ जाती हैं।


किसी को

उसकी मंज़िल मिल जाती है,

और कोई

राह की तन्हाई में

ख़ुद को ढूँढने लग जाता है।


मगर अजीब बात है

इश्क़ का क़ाफ़िला

कभी पूरी तरह मिलता नहीं,

और कभी

पूरी तरह खोता भी नहीं।


वो बस

यादों के रेगिस्तान में

अपने निशान छोड़ता हुआ

आगे बढ़ जाता है।


और पीछे रह जाते हैं

कुछ अधूरे क़दम,

कुछ बुझती हुई शामें,

और दिल में उठती

एक धीमी-सी पुकार


कि शायद

किसी और सफ़र में

फिर कहीं

मिल जाए


वही

इश्क़ का गुमशुदा क़ाफ़िला


मुकेश ,,,,,,,,,

इश्क़ की नमकीन हवा

इश्क़ की नमकीन हवा


कभी-कभी

इश्क़

समुंदर की तरफ़ से आती

उस नमकीन हवा जैसा होता है


जो चेहरे को छूकर

चुपचाप गुज़र जाती है,

मगर दिल में

एक गहरी ताज़गी छोड़ जाती है।


उसमें

लहरों की बेचैनी भी होती है,

और दूर कहीं

डूबते सूरज की उदासी भी।


वो हवा

किसी को रोकती नहीं,

न ही किसी से

अपने होने का सबूत माँगती है


बस आती है,

रूह को छूती है

और फिर

किसी अनदेखे किनारे की तरफ़

चल देती है।


मगर उसके जाने के बाद भी

दिल की फिज़ा में

उसकी हल्की-सी महक

देर तक बनी रहती है।


शायद इसी लिए

इश्क़ को समझना

आसान नहीं


क्योंकि वो

किसी क़ैद में नहीं रहता,

वो तो बस

समुंदर से उठती

एक नमकीन हवा है


जो कभी

दिल को महका जाती है

और कभी

रूह को थोड़ा-सा

उदास भी कर जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,

दिल की बे-तअल्लुक़ी का नूर

 दिल की बे-तअल्लुक़ी का नूर


कभी-कभी

दिल को सबसे गहरी रौशनी

तअल्लुक़ से नहीं,

बे-तअल्लुक़ी से मिलती है।


जब इंसान

हर रिश्ते को पकड़ कर रखने की

बेचैनी छोड़ देता है

तब उसके अंदर

एक अजीब-सी रौशनी उतरती है।


वो रौशनी

शोर नहीं करती,

बस ख़ामोशी में

रूह को सुकून देती रहती है।


फिर मोहब्बत

मालिकाना हक़ नहीं बनती,

न ही किसी को

अपने पास रखने की जिद रह जाती है।


दिल बस इतना समझ जाता है

जो मेरी तक़दीर का उजाला है

वो मेरी राह में ठहर जाएगा,


और जो मेरी रूह का हिस्सा नहीं

वो किसी और आसमान का

सितारा होगा।


यही वह मुक़ाम है

जहाँ इंसान

तअल्लुक़ की गिरहों से निकल कर

ख़ामोश आज़ादी में साँस लेता है।


और तब

दिल की गहराइयों में

एक नर्म-सी रौशनी फैलती है


जिसे सूफ़ी

दिल की बे-तअल्लुक़ी का नूर कहते हैं।


मुकेश ,,,,,,

इश्क़ — ज़िंदगी की साँस

 इश्क़ — ज़िंदगी की साँस


इश्क़

सिर्फ़ एक एहसास नहीं

वो ज़िंदगी के लिए

हवा है, धूप है,

ख़ाद है, पानी है।


जिस तरह

हवा के बिना

साँस अधूरी हो जाती है,

उसी तरह

इश्क़ के बिना

दिल की धड़कनें भी

सूनी लगती हैं।


वो धूप की तरह है

जो ठंडी रूह को

गरमाहट देती है,

और अँधेरी राहों में

उम्मीद की रौशनी भर देती है।


वो पानी की तरह है—

जो सूखी ज़मीन-ए-दिल को

फिर से हरा-भरा कर देता है,

और ख़्वाबों के बीज को

चुपचाप अंकुर बना देता है।


और वो ख़ाद की तरह है

जो दर्द और तजुर्बों की मिट्टी में

मोहब्बत का पौधा उगा देती है।


इसलिए

इश्क़ को हल्के में मत समझो

क्योंकि वही

ज़िंदगी के बाग़ को

महकाता भी है

और सँभालता भी।


सच तो यह है—


इश्क़

ज़िंदगी के लिए

सिर्फ़ एक जज़्बा नहीं,


बल्कि

उसकी सबसे ज़रूरी साँस है।


मुकेश ,,,,,,,,,

इश्क़ सच में एक ख़ुशबू है

 इश्क़ एक ख़ुशबू है

चाहे जिस्मानी हो

या रूहानी।


वो दिल के बाग़ में

चुपचाप खिलने वाला

एक ऐसा फूल है

जिसकी महक

लफ़्ज़ों से ज़्यादा

एहसास में बसती है।


कभी

किसी की आँखों की नमी में

वो महक उठती है,

कभी

किसी मुस्कान की हल्की-सी लकीर में

अपना पता दे जाती है।


जिस्मानी इश्क़

वसंत की हवा की तरह होता है

नर्म, मदहोश

और फूलों की खुशबू से भरा हुआ।


और रूहानी इश्क़

इबादत की तरह होता है

जहाँ दिल

ख़ामोशी में भी

एक नूर महसूस करता है।


मगर इश्क़ की असल पहचान

उसकी सच्चाई में है

क्योंकि खुशबू

अगर असली हो

तो वो देर तक ठहरती है,


और अगर बनावटी हो

तो हवा का एक झोंका ही

उसे मिटा देता है।


इसलिए

इश्क़ को पकड़ो मत

बस उसे

दिल की फिज़ा में

महकने दो।


क्योंकि

इश्क़ सच में एक ख़ुशबू है

चाहे वो जिस्मानी हो

या रूहानी।


मुकेश ,,,,,,,,,