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Wednesday, 25 March 2026

धूप में सूखती भीगी हुई कमीज़

 धूप में सूखती भीगी हुई कमीज़

धूप में टंगी
भीगी हुई कमीज़
धीरे-धीरे
हल्की होने लगती है।

हर बूँद
चुपचाप उड़ जाती है
जैसे कोई दुख
बिना आवाज़ के
छूट रहा हो।

कपड़ा वही है,
पर वज़न बदल गया है—
शायद
भीगना ही
उसे सूखना सिखाता है।

मनोविज्ञान कहता है
जो भीतर भीगता है,
वो एक दिन
धूप ढूँढ़ ही लेता है।

और फिर
हम
उसी कमीज़ को पहनकर
फिर से
ज़िंदगी में निकल पड़ते हैं…।

बंद खिड़की के पीछे कैद होती हवा

 बंद खिड़की के पीछे कैद होती हवा


बंद खिड़की के पीछे

हवा कैद नहीं होती

बस

अपना रास्ता भूल जाती है।


परदे हल्के-हल्के हिलते हैं,

जैसे कोई याद

अंदर आना चाहती हो।


कमरा भरा है,

फिर भी कुछ कमी है

शायद

एक खुलापन…


मनोविज्ञान कहता है

हम खुद को

दीवारों से नहीं,

अपने डर से बंद करते हैं।


खिड़की खोलो

हवा नहीं,

शायद

तुम खुद

अंदर आ जाओ…।


मुकेश ,,,,,,,

टूटे हैंडल वाला कप और अधूरी चाय

 टूटे हैंडल वाला कप और अधूरी चाय


टूटे हैंडल वाला कप

अब भी कप ही होता है

बस

उसे पकड़ने का तरीका

बदल जाता है।


अधूरी चाय

ठंडी होकर भी

कुछ कहती रहती है

जैसे बात

बीच में ही छूट गई हो।


कभी किसी ने

जल्दी में रख दिया होगा उसे,

या किसी ख़याल ने

घूँट को रोक लिया होगा।


हैंडल का टूटना

सिर्फ़ एक दरार नहीं

ये उस लम्हे की निशानी है

जब पकड़

थोड़ी ढीली पड़ गई थी।


हम चीज़ों को नहीं,

उनसे जुड़ी

अपनी अधूरी अवस्थाओं को

संभालते हैं।


इसलिए

वो कप फेंका नहीं जाता,

वो रखा रहता है—

किसी कोने में,

जैसे एक चुप गवाह।


और चाय

वो हर बार

पूरी नहीं पी जाती,

कभी-कभी

बस उतनी ही रह जाती है

जितनी याद

हमें ज़िंदा रख सके।


शायद

टूटे हैंडल और अधूरी चाय में ही

ज़िंदगी का सच है


कि सब कुछ

सही-सलामत हो

ये ज़रूरी नहीं,


बस

इतना काफ़ी है

कि हम

उसे फिर भी

थामे रहें…।


मुकेश ,,,,,,,

रुक-रुक कर चलती घड़ी का धैर्य

 रुक-रुक कर चलती घड़ी का धैर्य


रुक-रुक कर चलती घड़ी

समय को नहीं रोकती

बस

उसकी चाल पर

थोड़ा-सा प्रश्नचिह्न रख देती है।


हर टिक

जैसे किसी संकोच से निकलता है,

हर टॉक

जैसे किसी सोच में अटका हो।


वो तेज़ नहीं भागती,

पर रुकती भी नहीं पूरी तरह

बीच का यह ठहराव ही

उसका धैर्य है।


कभी लगता है

जैसे वक़्त भी

थक गया हो थोड़ा—

और घड़ी

उसकी सांसों की तरह

धीरे-धीरे चल रही हो।


मनोविज्ञान कहता है

हमारा भीतर

सीधी रेखा में नहीं चलता,

वो ठहर-ठहर कर

खुद को समझता है।


शायद इसलिए

कुछ घड़ियाँ

दौड़ती नहीं,

बल्कि

सोचती हुई चलती हैं।


उनकी सुस्ती में

एक गहराई छुपी होती है

जैसे हर पल

पूरी तरह जीया जा रहा हो।


और तब

समय नहीं,

हम बदलते हैं


धीरे-धीरे,

रुक-रुक कर,

पर

थोड़ा और सच्चे होकर…


मुकेश ,,,,,,,

पगडंडी पर छूटे कदमों के निशान

 पगडंडी पर छूटे कदमों के निशान


पगडंडी पर

छूटे हुए कदमों के निशान

कहीं जाते नहीं

बस

धीरे-धीरे मिटने लगते हैं।


मिट्टी याद रखती है

हर गुज़र

चाहे वो हल्का-सा हो

या बोझिल।


कुछ निशान

गहरे होते हैं

जैसे कोई फ़ैसला

पूरी देह से लिया गया हो।


कुछ

बस छूकर निकल जाते हैं

जैसे कोई रिश्ता

पूरा हुए बिना ही लौट गया हो।


धूप आती है,

बारिश गुजरती है,

हवा अपने तरीके से

सब कुछ बराबर करना चाहती है

फिर भी

कुछ छापें रह जाती हैं

अनदेखी।


मनोविज्ञान कहता है

हम हर जगह

थोड़ा-थोड़ा छोड़ते चलते हैं खुद को,

और फिर उम्र भर

उन्हीं बिखरे हिस्सों को

खोजते रहते हैं।


पगडंडी पूछती नहीं,

बस समेटती है

हर कदम, हर ठहराव,

हर लौटना।


और अंत में

जब कोई नहीं होता वहाँ,

तब भी

मिट्टी के भीतर

धीरे से धड़कते रहते हैं

कदमों के निशान…


जैसे

रास्ते कभी खाली नहीं होते,

बस

चलने वाले बदल जाते हैं…।


मुकेश ,,,,,,,,,,

खाली गिलास में बची हुई प्यास

 खाली गिलास में बची हुई प्यास


खाली गिलास

सिर्फ़ खाली नहीं होता

उसमें

थोड़ी-सी बची हुई प्यास

ठहरी रहती है।


आख़िरी घूँट के बाद भी

कुछ रह जाता है

होंठों की गर्मी,

और अधूरी तसल्ली का स्वाद।


गिलास

सब कुछ दे देता है,

पर प्यास—

वो पूरी तरह जाती नहीं,

बस थोड़ी देर

चुप हो जाती है।


मनोविज्ञान कहता है

इच्छाएँ बुझती नहीं,

वे रूप बदलती हैं;

एक तृप्ति के बाद

दूसरी चाह

धीरे से जन्म लेती है।


इसलिए

खाली गिलास

कभी सच में खाली नहीं होता

वो इंतज़ार होता है,

अगले भराव का,

अगले स्पर्श का।


हम सोचते हैं

हमने पी लिया सब कुछ

पर भीतर कहीं

एक कोना

अब भी सूखा रह जाता है।


शायद

प्यास ही

हमें ज़िंदा रखती है,


और गिलास

बस एक बहाना है

उसे थोड़ी देर

नाम देने का…।


मुकेश ,,,,,,,,

पुराने दरवाज़े की चरमराती हुई यादें

 पुराने दरवाज़े की चरमराती हुई यादें


पुराना दरवाज़ा

जब खुलता है

तो सिर्फ़ लकड़ी नहीं बोलती,

उसमें फँसी हुई

कई उम्रों की आवाज़ें

एक साथ चरमराती हैं।


उसकी दरारों में

धूल नहीं,

रुकी हुई मुलाक़ातें रहती हैं

आधे खुले, आधे बंद

किस्से…


कभी

किसी ने उसे धीरे से खोला होगा,

डरते हुए—

जैसे कोई राज़

आवाज़ न कर दे।


कभी

वो झटके से भी खुला होगा

गुस्से में,

या लौट आने की जल्दी में।


अब—

वो वहीं खड़ा है,

थोड़ा झुका हुआ,

थोड़ा थका हुआ,


हर चरमराहट में

एक याद छोड़ता हुआ।


मनोविज्ञान कहता है—

यादें बंद नहीं होतीं,

बस दब जाती हैं

और किसी पुराने दरवाज़े की तरह

मौका मिलते ही

आवाज़ कर उठती हैं।


शायद इसलिए

हम कुछ दरवाज़े

खोलना नहीं चाहते—

डरते हैं,

कि कहीं

अंदर जो है,

वो फिर से

ज़िन्दा न हो जाए।


पर सच तो ये है

दरवाज़े बंद रखने से

आवाज़ें मरती नहीं,

बस गहरी हो जाती हैं…


और एक दिन

वो खुद ही

चरमराकर

हमें पुकार लेती हैं।


मुकेश ,,,,,,,