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Wednesday, 18 March 2026

मैं, मोहब्बत और एक तन्हा रात

 मैं, मोहब्बत और एक तन्हा रात


मैं हरी फसल नहीं था,

बस उस ज़मीन की तरह था

जिस पर किसी ने वक़्त ही नहीं दिया

बस उम्मीदें बोईं और छोड़ दिया...


मैं ख्वाब नहीं देखता था,

ख्वाब खुद मेरी आंखों में उतर आते थे

और तुम...

हर ख्वाब में वही थी

जैसे रौशनी में लिपटी एक छलावा —

साया भी तेरा, धोखा भी।


जब सड़कें पार करता था

तू ज़िंदगी की मीठी बातें करती थी

मैं तुझे सुनता था

तेरी आँखों में कोई घर ढूंढता था

तू आगे देखती थी

मैं सिर्फ़ तुझे देखता रहा।


तेरी हँसी में जो सुकून था

वो अब बेरोज़गारी के कोलाहल में गुम है

अब न निवाले हैं, न आग़ोश

बस कुछ लम्बी रातें हैं

जिनमें ठंडी दीवारें और तेरी यादें हैं।


तू मुझे चादर ओढ़ा कर

किसी और ख्वाब में चली गई

और मैं?

मैं उसी चादर को आँखों तक खींचे

तेरी गैरमौजूदगी की ठंड से काँपता रहा।


अब मुझे अंधेरे से डर नहीं लगता

अब तो रौशनी से डर लगता है

कहीं फिर तू ना दिख जाए

एक और मुस्कान के पीछे छुपी बेवफाई बनकर।


अब मोहब्बत नहीं करता

किसी से भी नहीं

क्योंकि अब भरोसा नहीं

किसी आवाज़ पर, किसी हाथ पर

किसी कसम पर...


मैं अब मिट्टी भी नहीं

मैं अब राख हूँ

जिसमें कोई फूल नहीं उगता

बस कुछ जले हुए लफ़्ज़

जो हर रात तेरे नाम से जलते हैं...


मुकेश ,,,,,,

जब याद की महक लौटती है

 जब याद की महक लौटती है


कुछ यादें

कभी पूरी तरह नहीं जातीं।


वे बस

किसी कोने में छिप जाती हैं।


फिर अचानक

किसी दिन

कोई खुशबू आती है—


और

वे सब

एक साथ लौट आती हैं।


जैसे

समय ने

अचानक

पीछे मुड़कर देख लिया हो।


मुकेश ,,

ख़ुशबू का अदृश्य पत्र

ख़ुशबू का अदृश्य पत्र


कभी-कभी

कोई ख़त

लिखा तो जाता है

पर भेजा नहीं जाता।


वह

साँसों की महक बनकर

हवा में उड़ता रहता है।


जिसे

कोई डाकिया नहीं लाता,


पर दिल

उसे फिर भी पढ़ लेता है।


मुकेश ,,,,,,


साँसों में छिपा हुआ मौसम

 साँसों में छिपा हुआ मौसम


तुम्हारी साँसों में

एक मौसम छिपा है


कभी

वह बसंत की तरह महकता है,


कभी

शाम की ठंडी हवा बन जाता है।


और कभी

बरसात की पहली मिट्टी की तरह

दिल को

अचानक भर देता है।


शायद

इसीलिए

तुम्हारे पास बैठना

मौसम बदलने जैसा लगता है।


मुकेश ,,,

जब हवा कोई राज़ कहती है

 जब हवा कोई राज़ कहती है


रात के सन्नाटे में

जब हवा धीरे-धीरे चलती है,

तो लगता है

जैसे वह

कोई पुराना राज़ कह रही हो।


किसी की याद,

किसी की हँसी,

किसी की साँसों की महक


सब

उसके साथ चलने लगते हैं।


और तब

दिल समझ जाता है

कि हवा

कभी खाली नहीं चलती।


मुकेश ,,,,,,,

तुम्हारी महक का रहस्य

 तुम्हारी महक का रहस्य


तुम्हारी महक में

कुछ ऐसा है

जो शब्दों में नहीं आता।


जैसे

किसी पुराने शहर की गली

जहाँ

हर मोड़ पर

एक कहानी छिपी हो।


मैंने कई बार

उस रहस्य को समझने की कोशिश की,


पर हर बार

वह खुशबू

थोड़ी और दूर चली गई।


शायद

कुछ रहस्य

समझने के लिए नहीं,

बस महसूस करने के लिए होते हैं।


मुकेश ,,,

हवा में तैरती हुई तहरीर

 हवा में तैरती हुई तहरीर


कभी-कभी

हवा भी लिखती है


पर उसकी स्याही

ख़ुशबू होती है।


वह

किसी के पास से गुज़रती है

और

एक अदृश्य तहरीर

आसमान में छोड़ जाती है।


जिसे

सिर्फ़ वही पढ़ पाता है

जिसने

कभी किसी की याद को

गहराई से महसूस किया हो।


बाक़ी लोग

उसे सिर्फ़ हवा समझते हैं।


मुकेश ,,,,,,