पाणिनीय दर्शन भाग–७ पद, कारक और वाक्य — शब्द जब सम्बन्धों में प्रवेश करता है
पाणिनीय दर्शन भाग – ७ पद , कारक और वाक्य — शब्द जब सम्बन्धों में प्रवेश करता है एक शब्द का अर्थ कहाँ समाप्त होता है और वाक्य का अर्थ कहाँ आरम्भ होता है ? पिछले भाग में हमने एक निर्णायक प्रश्न उठाया था — शब्द और अर्थ का सम्बन्ध क्या है ? हमने देखा कि शब्द केवल ध्वनि नहीं है। उसके साथ व्याकरणिक संरचना , संकेत , प्रयोग और अर्थ - बोध का सम्बन्ध है। लेकिन वहीं एक और कठिनाई सामने आई — एक अकेला शब्द सामान्यतः पूर्ण कथन नहीं करता। जब शब्द वाक्य में प्रवेश करता है , तब वह दूसरे शब्दों के साथ सम्बन्ध स्थापित करता है। उदाहरण के लिए — रामः वनं गच्छति। यहाँ तीन पद हैं — रामः — वनम् — गच्छति। लेकिन इन तीनों को अलग - अलग जान लेना वाक्य के पूर्ण अर्थ को जान लेना नहीं है। “ रामः ” केवल एक व्यक्ति का बोध नहीं करा रहा। वह — गमन - क्रिया का कर्ता बन रहा है। “ वनम् ” केवल एक स्थान का नाम नहीं। वह — गमन - क्रिया का लक्ष्य / कर्म - संबन्ध प्रकट कर रहा...