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Thursday, 19 March 2026

एक आवारा जब अपने शहर को देखता है,,

 एक आवारा जब अपने शहर को देखता है,,

चल पड़ा हूँ धुएँ के साये में, चुपचाप सिगरेट सुलगाता,

ये शहर भी अब मुझे देख के मुँह फेर लेता है, मुस्काता।

कल जो मेरी साँसों की दस्तक पर हर शाम दीवाना था,

आज वही चेहरा मेरे अश्कों से दामन बचाता।

हर मोड़ पर इक साया मिला, जो मुझको मुझसे चुराता था,

ज़ख्मों की स्याही से कोई फिर मेरा नाम लिख जाता।

चौराहों पर खड़ा वक़्त भी अब मुझसे कतराने लगा है,

मैं जो भी किस्सा शुरू करूँ, कोई और उसे दोहराता।

हाथ में छाले, जेबें ख़ाली, और निगाहें बुझी-बुझी सी,

हर गली, हर मोड़ मुझे मेरा ग़म ही ग़ज़ल में सुनाता।

वो जो कहता था "तू ही तू है", आज उसी की जुबां पर मैं,

अजनबी सा एक नाम हूँ, जो किसी को अब ना भाता।

कभी ख़्वाबों में जो था शामिल, आज हकीकत से दूर बहुत,

वो मेरा अपना सा कल भी अब मुझसे नज़र चुराता।

मुक़द्दर से शिकवा क्या करूँमुकेश’, जब ख़ुद पे ही शक है,

ये आईना भी अब मुझको, मेरा चेहरा नहीं दिखाता।

मुकेश इलाहाबादी ----------------

 

बारिश की बूँदें खिड़की पर सजदा कर रही हैं,

 बारिश की बूँदें खिड़की पर सजदा कर रही हैं,

मेरी साँसें तेरी गर्दन पर सरक रही हैं।
रात का काला आसमान हमें लपेटे हुए है,
तेरा हाथ मेरी कमर पर ठहर गया है, फना हो गया।

तेरी आँखों का समंदर मेरी रूह का किनारा,
हर स्पर्श में डूब रहा हूँ मैं, खुदा को पा रहा हूँ।
तेरे होंठों की अमृत बूँद मेरी प्यास का वज़ीफ़ा,
एक चुम्बन में खो गया पूरा जहान-ओ-जहाँ।

मेरी उँगलियाँ तेरे बालों में उलझ रही हैं,
मैं तेरी गर्दन पर सिर रखूँ तो इबादत लगती है।
कमरे में बस हमारी साँसों का कलमा गूँज रहा,
बारिश बाहर, तूफ़ान भीतर—दोनों एक हो गए।

तेरा तन मेरे तन से लिपट रहा है,
जैसे दो चिंगारियाँ मिलकर आग बन गईं।
हर धड़कन पुकार रही—यह पल जहान है,
तेरे संग जीना ही मेरी हक़ीक़त हो गई।

सुबह की पहली किरण तक लिपटे रहेंगे हम,
बारिश की बाहों में, रूह के मिलन में,
फ़ना होकर भी बाक़ी रहेंगे हमेशा।


मुकेश 

चलो किसी वीरान अहसास की गली में

 चलो किसी वीरान अहसास की गली में

ज़िन्दगी की चुप दीवारों पर

तेरे नाम की कोई दरार ढूँढें।

जहाँ मोहब्बत गर्द की तरह उड़ती हो,

और यादें बिन कहे आँखें नम कर दें।

 

दास्तानों की धूल में दबी

वो पहली मुस्कराहट...

अब भी मेरे लफ़्ज़ों की चादर में

आराम देखती है।

तुम्हारा साथ उस छाँव की तरह था

जो तपते दिन में

एक दरख़्त के नीचे ख़्वाब बन कर बैठ जाता है।

 

मैंने वक़्त के सफ़्हों पर

तुम्हारे नाम की तहरीर की है,

जैसे कोई सूफियाना नग़मा

किसी बेज़ुबान दिल से निकलता हो।

कभी कभी लगता है

ज़िन्दगी एक लम्बा सफ़र है

जिसमें हम दोनों एक दूसरे की कमी बनकर

हमेशा साथ चलते हैं।

 

तेरे बिना जो लम्हे गुज़रे

वो ख़ामोशी के रेगिस्तान में

क़दमों के निशान जैसे हैं

ना कोई आवाज़, ना कोई साया

सिर्फ़ एहसास की तपिश।

और फिर भी

हर दहकती रेत में तेरा नाम

ठंडी हवा सा चूम जाता है।

 

मुहब्बत की कूंचियों से

मैंने इक आसमां रंगा है

जो तन्हा है, मुकम्मल

बस अधूरी दुआओं का असर है उसमें।

 

तो चलो, फिर से उस मोड़ पे मिलें

जहाँ तुम मुस्कराए थे

और मैंने पहली बार

ख़ुद को मुकम्मल महसूस किया था।

 

मुकेश इलाहाबादी -----------

ये बुझते लम्हों का मौसम है...

 ये बुझते लम्हों का मौसम है...

 

ना पलाश की दहक है,

ना चाँदनी की नमी,

सिर्फ़ एक ख़ामोश रौशनी है

जो दीवारों पे थकी हुई चलती है...

 

दिन अब

सुनसान गलियों से गुज़रते हैं,

जहाँ सूरज

बस दीवारों से सिर टकरा कर

उलझ जाता है।

 

बदन पे धूप की कोई दस्तक नहीं,

ना साया कोई पीछा करता है,

बस हवा

थकी-हारी

कुछ अनकही दुआओं की तरह

गुज़र जाती है।

 

मेरे महबूब,

अब वो आंधियाँ नहीं रहीं

जो बाल बिखेर देती थीं

अब तो बस धूल है

जो आँखों में घर कर लेती है

और रुला भी नहीं सकती।

 

शामें अब

चंदन नहीं जलातीं,

बल्कि राख में लिपटी

कुछ बुझी अगरबत्तियाँ छोड़ जाती हैं...

 

और रातें?

वो तो

सियाह रेशमी चादर की तरह

लिपट जाती हैं ख़्वाबों से,

जैसे कोई ग़म

धीरे से दस्तक देकर

पलकों में उतर जाए।

 

हर रोज़

एक ठंडी साँस की तरह

गुज़र जाता है

ना आवाज़,

ना आहट,

बस एक एहसास

कि कुछ था

जो अब नहीं है...

 

हाँ, मेरे महबूब,

ये बुझते लम्हों का मौसम है...

जहाँ इश्क़ भी

धीरे-धीरे

राख होने का हुनर सीखता है।

 

मुकेश इलाहाबादी ------------

तुम्हारी आँखें --

 

तुम्हारी आँखें --

तुम्हारी आँखें लिख दूँ तुम्हारे कहने से
मगर आँखें लिखते ही शब्द पानी बन जाते हैं।
क्योंकि आँखें सिर्फ़ देखने का ज़रिया नहीं,
ये रूह की खिड़कियाँ हैं
जहाँ से दिल अपने राज़ कहता है।

तुम्हारी आँखें
कभी चाँद की ठंडी रौशनी जैसी लगती हैं,
कभी सागर की गहराई जैसी।
उनमें झाँकूँ तो
मुझे अपना ही चेहरा नहीं,
अपनी सारी कमज़ोरियाँ और तमन्नाएँ दिखाई देती हैं।

तुम्हारे लिए आँखें
शायद आईने हैं
जिनसे तुम दुनिया देखती हो।
पर मेरे लिए
तुम्हारी आँखें वो दरवाज़ा हैं
जहाँ से मैं ख़ुदा तक पहुँचता हूँ।

इन आँखों में कभी हँसी की चमक है,
कभी आँसुओं की धुंध।
कभी खामोश सवाल हैं,
तो कभी बिन कहे जवाब।
ये आँखें बोलती नहीं,
मगर हर लफ़्ज़ से ज़्यादा गहरी होती हैं।

मैं तुम्हारी आँखें लिखने चला था
तुम्हारी ख़ूबसूरती को समेटने के लिए।
पर मुझे मिला
उनका सन्नाटा
जिसमें मोहब्बत भी है,
विरह भी,
और एक अधूरी दुआ भी।

तुम्हारी आँखों ने मुझे सिखाया
कि दुनिया देखने से ज़्यादा
महसूस करने की जगह है।
और सच यह है
अगर किसी ने दिल को पढ़ना है,
तो लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं,
सिर्फ़ आँखों की रौशनी काफ़ी है।


मुकेश 

 

तुम्हारे पास ठहरी हुई सुबह

 तुम्हारे पास ठहरी हुई सुबह

हम चुप हैं,
जैसे शब्दों ने
आज छुट्टी ले ली हो।

तुम खिड़की के पास बैठी हो,
और धूप
तुम्हारे बालों में
धीरे-धीरे उलझ रही है—
जैसे कोई मासूम बच्चा
खेल रहा हो।

मैं तुम्हें देखता हूँ,
बिना कुछ कहे,
और इस देखने में ही
एक पूरी बातचीत हो जाती है।

कभी तुम्हारी आँखें उठती हैं,
कभी हल्की-सी मुस्कान
होंठों तक आती है
और फिर सब कुछ
फिर से शांत हो जाता है।

इस सन्नाटे में
कोई बोझ नहीं है,
सिर्फ़ एक अपनापन है
जो धीरे-धीरे
दिल में उतरता जाता है।

मुझे लगता है
अगर समय को कहीं रोकना हो,
तो वह पल
यही है

तुम्हारे पास बैठी हुई
एक शांत,
धीमी-सी धड़कती
सुबह।

मुकेश 

रात चुपचाप उतर रही है,

 रात चुपचाप उतर रही है,

खिड़की के बाहर चाँद की सफ़ेद परतें गिर रही हैं,

भीतर एक हल्का कंपन है,

जो धीरे-धीरे साँस में उतरता जा रहा है।


मैं स्थिर हूँ—

पर भीतर हलचल है।

हवा जब कानों के पास से गुजरती है

तो उसमें एक अनकहा स्पर्श छिपा होता है।


पलकों के नीचे नर्म उजाला थरथरा रहा है,

पलकों के बीच कोई सपना पिघलता है।

हर बार आँखें बंद होती हैं

तो कोई छवि अपने आप बन जाती है

धुंधली, फिर स्पष्ट,

और फिर वापिस धुंध में खो जाती है।


माथे की सतह पर पसीने की हल्की नमी,

गालों पर उतरती हवा का ठंडा स्पर्श,

मेरे शरीर से मिलकर

जैसे कोई अदृश्य संगीत बना रहा है।


मैं अपनी सांसों को सुनता हूँ,

हर साँस जैसे एक रेखा हो—

ऊपर उठती, फिर नीचे उतरती,

अपने पीछे एक निश्चल निशान छोड़ती।


गर्दन की नसों में

धड़कन की धुन तेज़ हो रही है,

और सीने की हर हलचल

उस लय के साथ चलती है।


हथेलियाँ अब शांत नहीं,

वे धीरे-धीरे बिस्तर की सतह को छूती हैं,

जैसे किसी पुरानी याद का चेहरा सहला रही हों।

हर रेशा, हर नस

अब अपनी बात कहने लगा है।


पीठ की गर्माहट

धीरे-धीरे नीचे की ओर बहती है,

हर स्पर्श एक राग बनता जा रहा है।

देह अब एक वाद्ययंत्र है—

हर अंग में संगीत,

हर हलचल में एक ध्वनि।


उंगलियों के पोर गीले हैं,

अंदर कोई अनजानी लहर है

जो हर स्पर्श को अर्थ देती है।

उंगलियाँ शब्द नहीं जानतीं,

पर वे भाषा से गहरी हैं—

उनके बीच बहता है

कई जन्मों का अनुभव।


गिरती साँस का ताप

सीने को चीरकर पेट तक उतरता है,

जहाँ संवेदना

धीरे-धीरे चेतना में बदल जाती है।

मैं वहाँ टिक जाता हूँ,

उस मध्य बिंदु पर

जहाँ शरीर और आत्मा का मिलन होता है।


विचार गलते हैं,

स्मृतियाँ वाष्प बनकर उड़ जाती हैं।

बचा रह जाता है सिर्फ़ यह अब,

यह क्षण,

यह बेहद नाजुक, बेहद जीवन्त क्षण।


त्वचा के नीचे

रक्त का प्रवाह गुनगुनाता है,

हर स्पंदन में संगीत है,

हर मौन में कोई ध्वनि छिपी है।


मैं अब स्वयं को महसूस करता हूँ,

बिना दर्पण, बिना सीमा।

त्वचा के नीचे के कंपन में

जैसे पूरी सृष्टि condensed है।


कमर के नीचे फैलती गर्मी,

जंघाओं के पास उठता धीमा तनाव,

रीढ़ के सिरे तक भरी ऊर्जा

यह सब किसी गहरे समुद्र की लहरें हैं

जो मुझमें बढ़ती हैं और मुझे ही भर देती हैं।


साँसें और गहरी होती जाती हैं,

बहुत कुछ अब घट रहा है

जो कहा नहीं जा सकता।

यह अनुभव शब्दों से परे है।


होठों की नमी बढ़ गई है,

हर साँस में चाँदनी उतर आई है।

मेरे बालों के सिरों तक

कोई करुण शांति बह रही है।


मैं इस स्पर्श को स्वीकार करता हूँ,

जैसे धरती वर्षा को करती है,

जैसे सीप मोती को,

और जैसे आत्मा अपने ईश्वर को।


मेरा पूरा अस्तित्व

अब एक प्रवाह बन गया है

संगीत, मौन, लय,

सब एक लकीर में घुलते जा रहे हैं।

कहीं कोई आरंभ नहीं,

कहीं कोई अंत नहीं।


मेरी हथेलियाँ अब जड़ नहीं हैं,

वे ब्रह्मांड से बहती ऊर्जा को थामती हैं।

मैं उसकी गति के साथ हिलता हूँ,

जैसे नदी अपने ही किनारे पर टूट जाए।


यह आनंद सीमित नहीं,

यह किसी मिलन का परिणाम नहीं

यह तो जीवन का वह गुप्त हिस्सा है

जो अक्सर अनकहा रह जाता है।


रात अब अपने मध्य में है।

मेरी सांसें और धीमी हैं,

पर गहरी, जीवित, थकी नहीं।

माथे पर ठहरता पसीना

किसी आँसू की तरह पवित्र लगता है।


अब मैं खुद को देख रहा हूँ

बिना शब्द, बिना विचार।

देह स्थिर है,

पर भीतर एक प्रकाश जल रहा है।


यह प्रकाश मेरे सीने से उठता है,

गले तक आता है,

और फिर आँखों के पीछे झिलमिल करने लगता है।

वहाँ से पूरी देह

एक उजले कम्पन से भर जाती है।


मैं अब देह नहीं रहा,

न चेतना, न विचार।

बस एक स्पर्श,

एक अनुभव।

मेरे भीतर बहती हवाओं की दिशा बदल गई है,

मैं अब उनका हिस्सा बन गया हूँ।


धीरे-धीरे सब थम जाता है।

साँस सामान्य होती है,

धड़कनें धीमी,

और त्वचा पर

सिर्फ़ चाँदनी रह जाती है।


वो क्षण पूर्ण है—

न उसमें वासना है, न विरक्ति।

सिर्फ़ एक उदात्त मौन,

जिसमें मैं, देह, और ब्रह्मांड

एक ही लहर में,

एक ही अर्थ में समाए हुए हैं।


मुकेश ,,,,,,