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तुम, तुम्हारी हँसी और ये बारिश

  तुम, तुम्हारी हँसी और ये बारिश बारिश जब भी होती है, मुझे तुम्हारी हँसी याद आती है। शायद इसलिए कि दोनों की फ़ितरत एक-सी है बिना दस्तक दिए आते हैं, और जाते-जाते दिल की ज़मीन को हरियाली दे जाते हैं। आज भी खिड़की पर ठहरी हुई बारिश की बूँदें तुम्हारा नाम लिख रही हैं, और मैं धुँधले शीशे पर उँगलियों से तुम्हारी मुस्कुराहट का चेहरा बना रहा हूँ। तुम हँसती हो, तो लगता है बादलों ने अपना सारा बोझ रौशनी में बदल दिया हो। हवा भी भीगते दरख़्तों के दरमियान तुम्हारी हँसी का तरन्नुम धीरे-धीरे गुनगुनाने लगती है। काश... कभी ऐसा हो कि एक ही छतरी के नीचे तुम, मैं और ये बारिश तीनों एक साथ हों। तुम्हारे भीगे हुए बाल मेरे कंधे से छूकर गुज़रें, तुम्हारी हँसी बारिश की बूँदों में घुल जाए, और वक़्त अपनी तमाम रफ़्तार भूलकर उसी लम्हे में ठहर जाए। फिर न कोई मंज़िल ज़रूरी हो, न कोई सफ़र। बस तुम्हारा हाथ, तुम्हारी हँसी, और बारिश की वह ख़ामोश सरगोशी, जो हर बूँद के साथ मेरे दिल से यही कहे— कुछ मोहब्बतें इज़हार से नहीं, बरसात से मुकम्मल होती हैं। — मुकेश

तुम्हारी हँसी के बाद

  तुम्हारी हँसी के बाद तुम जब हँसती हो, तो ऐसा नहीं लगता कि सिर्फ़ तुम्हारे लबों पर एक मुस्कुराहट खिली है। यूँ महसूस होता है, जैसे किसी ख़ामोश फ़िज़ा में अचानक रूह का कोई परिंदा तरन्नुम छेड़ दे। तुम्हारी हँसी गुलाब की ख़ुशबू जैसी नहीं, क्योंकि ख़ुशबू कुछ देर ठहरकर बिखर जाती है। तुम्हारी हँसी तो उस दुआ की मानिंद है जो बरसों बाद भी अपने असर से महरूम नहीं होती। मैंने कई बार तुम्हें चुपचाप मुस्कुराते देखा है। हर बार तुम्हारी पलकों के साये में एक नई कहानी जन्म लेती है, और तुम्हारी आँखों की चमक मेरे तमाम अल्फ़ाज़ से ज़्यादा फ़सीह हो जाती है। अजीब बात है... तुम कुछ कहती नहीं, मगर तुम्हारी मुस्कुराहट मेरे दिल के हर सवाल का जवाब लिख देती है। उस एक लम्हे में न कोई शिकवा रहता है, न कोई फ़ासला, न कोई अधूरापन। बस ऐसा लगता है, जैसे पूरी कायनात अपने तमाम रंग समेटकर तुम्हारे लबों पर आ ठहरी हो। अगर मोहब्बत की कोई सूरत होती, तो यक़ीनन वो तुम्हारी यही बेआवाज़ मुस्कुराहट होती— जो हर बार मुझे तुमसे पहली बार की तरह मोहब्बत करना सिखा जाती है। — मुकेश

बस एक मुस्कुराहट

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बस एक मुस्कुराहट आप जब भी मुस्कुरा देती हैं, लगता है किसी ने आसमान की तह से एक मुट्ठी रौशनी उतारकर ज़मीं पर बिखेर दी हो। लबों की वह हल्की-सी जुंबिश कोई साधारण मुस्कान नहीं, वो तो दिल की सल्तनत का बेआवाज़ फ़रमान होती है। मैं उसे देखता नहीं, अपने भीतर उतरते हुए महसूस करता हूँ। उस एक मुस्कुराहट में महकते गुलाबों का लम्स भी है, बारिश की पहली बूँद का सुकून भी, और उस दुआ की तासीर भी, जो बरसों से किसी पाक दिल ने माँगी हो। कभी-कभी यूँ लगता है, आपके होंठ मुस्कुराते नहीं, बल्कि मोहब्बत ख़ुद आपकी सूरत इख़्तियार करके लबों पर आ बैठती है। मैंने चाहा भी नहीं कि उस लम्हे को क़ैद कर लूँ, कुछ हुस्न यादों में ज़्यादा ख़ूबसूरत रहते हैं। बस इतना चाहता हूँ— जब कभी ज़िंदगी आपको उदास करने लगे, तो मेरी मोहब्बत आपकी मुस्कुराहट की वजह बन जाए। और अगर मेरी तक़दीर में आपका साथ न भी लिखा हो, तो भी रब से यही दुआ रहेगी— आपके लबों पर यह मुस्कुराहट हमेशा ऐसे ही महकती रहे, जैसे चाँदनी झील के पानी पर, या जैसे एक नाज़ुक तितली कँवल की पंखुड़ी पर अपने पर फैलाकर दुनिया को हुस्न का मतलब समझा रही हो। — मुकेश

लबों की तितली

  लबों की तितली आपके लबों पर ठहरी हुई ये नर्म-सी मुस्कुराहट... यूँ लगती है, जैसे कोई रंगीन तितली कँवल की पंखुड़ी पर अपने नाज़ुक पर समेटे उड़ान से पहले एक आख़िरी लम्हा ठहर गई हो। उस हँसी में न जाने कितनी रौशनियाँ आबाद हैं, कितनी दुआएँ, कितनी मासूम शरारतें, और कितनी अनकही मोहब्बतें, जो अल्फ़ाज़ का सहारा लिए बग़ैर सीधे दिल तक उतर जाती हैं। मैं जब भी आपके लबों की जानिब देखता हूँ, वक़्त अपनी रफ़्तार भूल जाता है। धड़कनों पर एक मीठी-सी ख़ामोशी उतर आती है, और रूह आपकी मुस्कुराहट का दामन थामकर दूर तलक भटकने लगती है। काश... उस मुस्कुराहट का एक छोटा-सा सबब मैं भी होता। काश... उसके पीछे छिपी हर ख़ुशी का एक नाम मेरा भी होता। फिर शायद हर सुबह का आफ़्ताब कुछ और रौशन होता, हर शाम की चाँदनी कुछ और नरम होती, और मेरी हर दुआ आपके लबों पर ठहरी उसी मुस्कुराहट की हिफ़ाज़त माँगती। क्योंकि सच तो यह है— दुनिया में हसीन चेहरे बहुत होंगे, मगर दिल को अपना घर हर मुस्कुराहट नहीं देती। कुछ मुस्कुराहटें सिर्फ़ देखी नहीं जातीं, उन्हें उम्र भर महसूस किया जाता है। — मुकेश

ईशावास्योपनिषद् के पंचम मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या

  ईशावास्योपनिषद् के पंचम मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या ब्रह्म की परात्परता और सर्वान्तर्यामी सत्ता का दार्शनिक विवेचन ईशावास्योपनिषद् का पंचम मन्त्र उपनिषद् के सर्वाधिक गूढ़ मन्त्रों में से एक है। यदि चतुर्थ मन्त्र में ब्रह्म की अचलता, सर्वव्यापकता और इन्द्रियातीत स्वरूप का निरूपण किया गया था, तो पंचम मन्त्र उसी सत्य को एक नए आयाम से उद्घाटित करता है। यहाँ उपनिषद् ब्रह्म को केवल जगत् का आधार नहीं बताता, बल्कि यह स्पष्ट करता है कि वही परम सत्ता दूर भी है और निकट भी, बाहर भी है और भीतर भी। पहली दृष्टि में यह कथन विरोधाभासी प्रतीत होता है, किन्तु मीमांसात्मक दृष्टि से यही विरोधाभास ब्रह्म के स्वरूप की ओर संकेत करने वाला दार्शनिक उपकरण बन जाता है। यह मन्त्र मनुष्य को तर्क की सीमाओं से आगे बढ़ाकर उस अनुभूति की ओर ले जाता है जहाँ विरोध एकत्व में विलीन हो जाते हैं। मन्त्र है— "तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥" सामान्य अर्थ में इस मन्त्र का भाव यह बताया जाता है कि ब्रह्म चलता भी है और नहीं भी चलता; वह दूर भी है और निकट भी; वह सबके भीतर ...

ईशावास्योपनिषद् के चतुर्थ मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या

  ईशावास्योपनिषद् के चतुर्थ मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या ब्रह्म की अचलता और सर्वव्यापकता का दार्शनिक विवेचन ईशावास्योपनिषद् का चतुर्थ मन्त्र उपनिषद्-दर्शन के उन विलक्षण मन्त्रों में है जहाँ भाषा अपनी सामान्य सीमाओं का अतिक्रमण करती प्रतीत होती है। अब तक उपनिषद् ने ईश्वरव्याप्ति, निष्काम कर्म तथा आत्मविस्मृति के परिणाम का निरूपण किया था; किन्तु इस मन्त्र में वह उस परम तत्त्व का स्वरूप प्रतिपादित करता है, जिसकी अनुभूति से पूर्ववर्ती सभी शिक्षाएँ अर्थपूर्ण हो जाती हैं। यह मन्त्र किसी दृश्य वस्तु का वर्णन नहीं करता, बल्कि उस चैतन्य सत्ता का संकेत करता है जो समस्त परिवर्तनशील जगत् का अपरिवर्तनीय आधार है। मन्त्र है— "अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्। तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥" सामान्य अर्थ में इस मन्त्र का भाव यह बताया जाता है कि ब्रह्म अचल होते हुए भी मन से अधिक वेगवान है; इन्द्रियाँ उसे प्राप्त नहीं कर सकतीं; वह स्थिर रहकर भी सबको पीछे छोड़ देता है और उसी में सम्पूर्ण विश्व-व्यवस्था स्थित है। किन्तु मीमांसात्मक दृष्टि से प्रश्न यह...

ईशावास्योपनिषद् के तृतीय मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या

ईशावास्योपनिषद् के तृतीय मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या अविद्या, आत्मविस्मृति और आध्यात्मिक पतन का दार्शनिक विवेचन ईशावास्योपनिषद् का तृतीय मन्त्र प्रथम और द्वितीय मन्त्रों के उपदेश का स्वाभाविक परिणाम प्रस्तुत करता है। प्रथम मन्त्र में उपनिषद् ने ईश्वरव्याप्ति का दर्शन कराया, द्वितीय मन्त्र में कर्तव्य-कर्म के माध्यम से जीवन को पवित्र बनाने का मार्ग बताया और अब तृतीय मन्त्र यह स्पष्ट करता है कि जो मनुष्य इस दिव्य दृष्टि की उपेक्षा करता है, उसका आध्यात्मिक परिणाम क्या होता है। इस प्रकार यह मन्त्र भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि आत्मविद्या की अनिवार्यता को स्थापित करने के लिए कहा गया है। मन्त्र है— "असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽवृताः। ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥" सामान्य अर्थ में इस मन्त्र का आशय यह बताया जाता है कि जो आत्मा का नाश करने वाले हैं, वे मृत्यु के पश्चात् अन्धकारमय लोकों को प्राप्त होते हैं। किन्तु मीमांसात्मक दृष्टि से इस मन्त्र का वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या यहाँ किसी परलोक का वर्णन किया जा रहा है, अथवा मनुष्य की आध्यात्मिक स्थिति का द...