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Monday, 6 April 2026

तुम मेरी आदत बनती जा रही हो

 तुम मेरी आदत बनती जा रही हो


तुम

धीरे-धीरे नहीं आई

तुम तो

चुपचाप उतर गईं

मेरे रोज़ के होने में,

जैसे साँस

बिना बताए

अपना हक़ ले लेती है।


अब

तुम्हें याद करना

कोई कोशिश नहीं रहा,

यह तो

वैसा ही है

जैसे सुबह आँख खुलते ही

रोशनी का होना।


तुम

किसी खास पल में नहीं,

हर छोटे-छोटे लम्हे में हो

चाय की पहली भाप में,

खाली कुर्सी के सन्नाटे में,

और उन शब्दों के बीच

जो मैं कह नहीं पाता।


मैंने कभी सोचा नहीं था

कि कोई

इतना साधारण होकर भी

इतना जरूरी हो सकता है

पर तुम

मेरी आदत बनती जा रही हो।


यह इश्क़

शोर नहीं करता,

कोई दावा नहीं करता

बस

धीरे-धीरे

मुझे मुझसे कम

और तुम्हें मुझमें ज़्यादा

करता जाता है।


अब

अगर एक दिन भी

तुम्हारा ख्याल न आए,

तो लगता है

कुछ अधूरा रह गया

जैसे कोई इबादत

बिना नीयत के पूरी हो गई हो।


तुम्हारा होना

अब कोई सवाल नहीं,

कोई उलझन नहीं

तुम

एक सहज-सी निरंतरता हो,

जो बिना वजह

चलती रहती है।


तुम मेरी आदत

नहीं बन रही

तुम

मेरे वजूद का हिस्सा

होती जा रही हो।


और शायद

सबसे गहरा इश्क़ वही होता है

जो आदत बनकर

रूह में बस जाए,

और

कभी छूटने का ख्याल भी

न आए।


मुकेश,,,,,,, 

रूह के आईने में धुंधला सा तुम

 रूह के आईने में धुंधला सा तुम


रूह के आईने पर

कोई धूल नहीं थी,

फिर भी

तुम साफ़ दिखाई नहीं दिए

जैसे पहचान

इच्छा से नहीं,

इजाज़त से जन्म लेती हो।


मैंने बहुत चाहा

कि तुम्हें स्पष्ट देख लूँ

तुम्हारी आँखें,

तुम्हारा चेहरा,

तुम्हारी पूरी मौजूदगी

पर हर बार

तुम

बस एक आभास बनकर रह गए।


धुंधलापन

कमी नहीं था,

वह

तुम्हारा तरीका था

खुद को छुपाकर

और गहरा उतर जाने का।


मैंने आईना पोंछा नहीं,

क्योंकि समझ गया

जो साफ़ दिख जाए

वह अक्सर

ठहरता नहीं।


तुम्हारा होना

अब किसी रूप में नहीं,

किसी नाम में नहीं

तुम

एक हल्की-सी परत हो,

जो हर साफ़ तस्वीर के पीछे

धीरे-धीरे सांस लेती है।


जब भी

मैं खुद को देखने बैठता हूँ,

तुम

बीच में आ जाते हो

न पूरी तरह सामने,

न पूरी तरह ओझल

बस

इतना कि

मैं खुद को

पूरी तरह देख न पाऊँ।


और शायद

यही इश्क़ का सच है

कि

रूह के आईने में

कोई भी चेहरा

अकेला नहीं होता।


तुम

मेरे भीतर

धुंधले नहीं हो

तुम

उस स्पष्टता के पार हो

जहाँ

हर पहचान

मिटने लगती है।


रूह के आईने में

धुंधला सा तुम

कभी खोते नहीं

बस

हर बार

थोड़ा और

गहरा हो जाते हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,

जहाँ तलाश खत्म नहीं, बदल जाती है

 जहाँ तलाश खत्म नहीं, बदल जाती है


मैं तुम्हें ढूँढता रहा

रास्तों में,

लोगों में,

उन आवाज़ों में

जो मेरे नाम से मिलती-जुलती थीं।


हर मोड़ पर लगा

अब तुम मिल जाओगे,

हर ठहराव ने कहा

बस यहीं कहीं हो तुम।


पर हर बार

तलाश थोड़ी और लंबी हो गई,

और मैं

थोड़ा और भीतर उतर गया।


एक दिन

थककर मैंने पूछ लिया

खुद से,

कि क्या सच में

तुम कहीं बाहर हो?


तभी

कुछ बदला

न दृश्य,

न समय,

न ही दुनिया की रफ़्तार

बस

तलाश की दिशा।


अब मैं तुम्हें

ढूँढता नहीं,

महसूस करता हूँ

उस खामोशी में

जो हर शोर के बाद बचती है,

उस खालीपन में

जो हर भराव के बाद आता है।


तुम अब

कोई मंज़िल नहीं,

कोई जवाब नहीं

तुम

वह सवाल हो

जो मुझे

खुद तक ले जाता है।


तलाश खत्म नहीं हुई

वह

अपने रूप बदल चुकी है

बाहर से भीतर,

चाहत से समझ तक,

और

इश्क़ से इबादत तक।


अब जब भी

मैं तुम्हें ढूँढता हूँ,

तो

खुद को पा लेता हूँ

और जब

खुद को खो देता हूँ,

तो

तुम मिल जाते हो।


जहाँ तलाश खत्म नहीं,

बस बदल जाती है

वहीं से

सफर शुरू होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

बहाव के विरुद्ध ठहरा हुआ एहसास

बहाव के विरुद्ध ठहरा हुआ एहसास


नदी अपने स्वभाव में थी—

बहती हुई,

बिना रुके,

बिना पीछे देखे।


और मैं…

उसी किनारे खड़ा

एक उलझन की तरह,

जहाँ सब कुछ आगे जा रहा था,

पर कुछ

जाने से इंकार कर रहा था।


तुम्हारा एहसास

कुछ ऐसा ही था

जैसे पानी के भीतर

एक पत्थर,

जो डूबकर भी

अपनी जगह से हिलता नहीं।


समय ने समझाया बहुत,

लहरों ने धक्का दिया,

हवाओं ने रास्ता दिखाया

कि छोड़ दो,

कि बह जाओ,

कि हल्का हो जाओ।


पर कुछ भाव

हल्के होने के लिए नहीं होते

वे

अपनी गहराई में

जड़ें उगा लेते हैं।


मैंने देखा है

बहाव के खिलाफ खड़े उस एहसास को

वह थकता नहीं,

टूटता नहीं,

बस

और अधिक स्पष्ट होता जाता है।


तुम अब कोई चाहत नहीं,

कोई अधूरा सपना नहीं

तुम

एक स्थिर सत्य हो,

जो हर बदलती लहर के बीच

अडिग खड़ा है।


जब सब कुछ

समय के साथ बदल जाता है,

तब भी

यह एहसास

अपनी जगह बनाए रखता है

जैसे

नदी के भीतर

एक शांत गहराई।


बहाव के विरुद्ध

ठहरा हुआ एहसास

संघर्ष नहीं करता

वह बस

अपने होने से

बहाव को अर्थ देता है।


मुकेश ,,,,

बहते हुए समय में ठहरा हुआ नाम

 बहते हुए समय में ठहरा हुआ नाम


बहते हुए समय के किनारे

मैंने तुम्हें नहीं लिखा

तुम खुद ही

एक धड़कन की तरह

मेरे भीतर उतर आए।


घड़ी की सूइयाँ

अपनी आदत से मजबूर

आगे बढ़ती रहीं,

दिन

रात में बदलते रहे,

पर एक क्षण ऐसा था

जो कहीं गया ही नहीं

वह

तुम्हारा नाम था।


नदियाँ गुज़रती रहीं,

रास्ते बदलते रहे,

चेहरे आते-जाते रहे,

पर मेरे भीतर

एक जगह ऐसी रही

जहाँ समय ने

अपने कदम रोक दिए।


मैंने बहुत कोशिश की

तुम्हें भूलने की—

जैसे कोई

बहते पानी में

अपनी परछाईं मिटाना चाहता है,

पर हर बार

लहरें लौटकर

तुम्हें और साफ़ कर गईं।


तुम अब कोई स्मृति नहीं,

कोई घटना नहीं

तुम

एक ठहराव हो

जो हर बहाव के बीच

अपनी जगह बना लेता है।


जब भी

वक़्त तेज़ भागता है,

मैं वहीं लौट आता हूँ—

उस एक पल में,

जहाँ तुम हो,

और सब कुछ

थमा हुआ।


बहते हुए समय में

ठहरा हुआ नाम

मिटता नहीं

वह

समय को भी

धीरे-धीरे

अपने भीतर समेट लेता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

लहरों के बीच रखा हुआ वादा

 लहरों के बीच रखा हुआ वादा


नर्म धूप के किनारे

और बहती हुई हवा के दरमियान

मैंने तुम्हें पुकारा

आवाज़ से नहीं,

एक धीमे से ख़याल में,

जो किसी तक पहुँचने की जल्दी में नहीं था।


तुम आईं नहीं,

पर कुछ बदला

पानी की सतह पर

एक हल्की-सी कंपकंपी उठी,

जैसे किसी ने

अंदर ही अंदर

तुम्हारा नाम छुआ हो।


किनारे चुप थे,

पेड़ भी स्थिर,

पर उस ठहराव में

एक अनकहा संवाद था

तुम्हारे और मेरे बीच,

जिसे कोई सुन नहीं सकता।


मैंने कोई अक्षर नहीं लिखे,

कोई निशान नहीं छोड़ा,

बस एक वादा

धीरे से

लहरों के बीच रख दिया

कि तुम आओ या न आओ,

यह प्रतीक्षा

बहती नहीं।


हर शाम

जब सूरज ढलता है

और पानी सुनहरा हो जाता है,

वह वादा

थोड़ा और गहरा हो जाता है

जैसे समय

उसे मिटाने की जगह

संभाल रहा हो।


तुम्हारा होना

अब किसी जगह पर नहीं,

किसी नाम में नहीं

तुम

उस ठहराव में हो

जो बहते हुए भी

अडिग रहता है।


लहरों के बीच रखा हुआ वादा

टूटता नहीं

बस

हर गुज़रते पल के साथ

और अधिक

सच हो जाता है।


मुकेश ,,,,,,,

ठहरने से पहले

 ठहरने से पहले

मैं भागता रहा

उत्तर की तरफ़,

सत्य की तरफ़,

अपने ही बनाए हुए किसी शिखर की तरफ़।


हर बार लगा

बस थोड़ा और…

और मैं पा लूँगा

वह अंतिम अर्थ

जिसके लिए यह सब घट रहा है।


रास्ते में

बहुत से “मैं” मिले

एक जो सफल होना चाहता था,

एक जो समझदार दिखना चाहता था,

एक जो बस

किसी की आँखों में टिक जाना चाहता था।


मैंने सबको

थोड़ा-थोड़ा जी लिया,

और हर बार

कुछ अधूरा रह गया।


फिर एक दिन

थककर

मैं रुक गया


ना ध्यान में,

ना प्रार्थना में,

बस

थकान में।


और उसी थकान में

कुछ गिरा


जैसे भीतर का कोई बोझ

बिना आवाज़ के

जमीन पर रख दिया गया हो।


मैंने देखा—

जब मैं नहीं भाग रहा था,

तो कुछ भी पीछे नहीं छूट रहा था।


जब मैं नहीं खोज रहा था,

तो कुछ भी खो नहीं रहा था।


तभी

एक बहुत साधारण सी बात

अचानक

गहरी हो गई


कि शायद

सत्य कहीं पहुँचने में नहीं,

बल्कि

रुक जाने में छिपा है।


अब

मैं फिर चलता हूँ

पर बिना मंज़िल के,


सोचता हूँ

पर बिना निष्कर्ष के,


जीता हूँ

पर बिना उस पकड़ के

जो हर चीज़ को “मेरा” बना लेती थी।


और हर कदम पर

ऐसा लगता है


जैसे कुछ घट नहीं रहा,

बल्कि

कुछ हट रहा है।


शायद

यही रास्ता है

जहाँ पहुँचने से पहले ही

तुम पहुँच चुके होते हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,,