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Saturday, 16 May 2026

ईशावास्योपनिषद् का त्रयोदश मंत्र : सम्भूति–असम्भूति फलभेद एवं शंकरभाष्य का दार्शनिक विवेचन

 

ईशावास्योपनिषद् का त्रयोदश मंत्र : सम्भूतिअसम्भूति फलभेद एवं शंकरभाष्य का दार्शनिक विवेचन


मूल मंत्र (यथावत)

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे १३

 

मंत्र का हिंदी अनुवाद

कुछ लोग कहते हैं कि सम्भूति (कार्य ब्रह्म की उपासना) से प्राप्त फल भिन्न है, और कुछ लोग कहते हैं कि असम्भूति (अव्यक्त/अविद्या उपासना) से प्राप्त फल भिन्न है। इस प्रकार हमने धीर और बुद्धिमान आचार्यों से यह परम्परा सुनी है, जिन्होंने हमें इसका स्पष्ट विवेचन किया।

 

शंकरभाष्य (संशोधित एवं यथावत संस्कृत रूप)

अधुना उभयोरुपासनयोः समुच्चयकारणम् अवयवफलभेदम् आहअन्यदेव इति। अन्यदेव आहुः फलं सम्भवात् सम्भूतेः कार्यब्रह्मोपासनात् अणिमाद्यैश्वर्यलक्षणम् इत्यर्थः। तथा अन्यदाहुः असम्भवात् असम्भूतेः अव्याकृतात् अव्याकृतोपासनात् यदुक्तम्अन्धं तमः प्रविशन्तिइति प्रकृतिलय इति पौराणिकैः उच्यते इति एवं शुश्रुम धीराणां वचनम् ये नः तत् विचचक्षिरे व्याकृताव्याकृतोपासनफलम् व्याख्यातवन्तः इत्यर्थः १३

 

शंकरभाष्य का हिंदी अनुवाद (यथारूप)

अब दोनों उपासनाओं के समुच्चय के कारण के रूप में उनके भिन्न-भिन्न फलों का वर्णन किया गया है।

अन्यदेव आहुः सम्भवात्” —
कुछ लोग कहते हैं कि सम्भूति (कार्य ब्रह्म) की उपासना से प्राप्त फल अलग है, जो अणिमा आदि ऐश्वर्य रूप है।

तथाअन्यदाहुः असम्भवात्” —
असम्भूति (अव्यक्त प्रकृति/अविद्या) की उपासना से भी भिन्न फल बताया जाता है, जैसा किअन्धं तमः प्रविशन्तिआदि श्रुतियों तथा पुराणों मेंप्रकृतिलयकहा गया है।

इस प्रकार हमने धीर बुद्धिमान आचार्यों से यह वचन सुना है, जिन्होंने हमें व्याकृत और अव्याकृत उपासना के फलों का स्पष्ट विवेचन किया।

 

शोधपूर्ण निबंध

ईशावास्योपनिषद् के त्रयोदश मंत्र में सम्भूति-असम्भूति उपासना के फलभेद एवं शंकराचार्य की समन्वय दृष्टि

ईशावास्योपनिषद् का यह त्रयोदश मंत्र उपनिषद् दर्शन में उपासना-मार्ग के फलभेद को स्पष्ट करने वाला एक महत्वपूर्ण दार्शनिक सूत्र है। इसमें यह बताया गया है कि सम्भूति और असम्भूति की उपासनाओं के परिणाम भिन्न-भिन्न होते हैं, और यही भेद उनके समुच्चय (combined understanding) का आधार बनता है।

आदि शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या में यह स्पष्ट करते हैं कि उपनिषद् किसी एक उपासना को निरर्थक नहीं कहता, बल्कि प्रत्येक साधना के अलग-अलग स्तर और फल को दर्शाता है।

 

सम्भूति और असम्भूति का स्वरूप

शंकराचार्य के अनुसार

  • सम्भूति = कार्य ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) की उपासना
  • असम्भूति = अव्याकृत प्रकृति / अविद्या

ये दोनों ब्रह्म के सापेक्ष रूप हैं, कि अंतिम सत्य।

फलभेद का सिद्धान्त

इस मंत्र का मुख्य दार्शनिक बिंदु यह है कि

उपासना

फल

सम्भूति (कार्य ब्रह्म)

ऐश्वर्य, अणिमा आदि सिद्धियाँ

असम्भूति (अव्यक्त)

प्रकृतिलय / सीमित लय अवस्था

इस प्रकार उपासना के स्तर के अनुसार फल भी भिन्न होते हैं।

अन्यदेवका दार्शनिक अर्थ

अन्यदेवका अर्थ केवल भिन्नता नहीं, बल्कि यह संकेत है कि

  • प्रत्येक साधना का क्षेत्र अलग है
  • प्रत्येक का परिणाम सीमित है
  • कोई भी अंतिम मोक्ष नहीं है

शंकराचार्य की समन्वय दृष्टि

शंकराचार्य यहाँ एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करते हैं

उपनिषद् का उद्देश्य उपासनाओं का विरोध नहीं, बल्कि उनके सीमित स्वरूप का बोध कराना है।

अर्थात्

  • उपासना = साधन
  • ब्रह्मज्ञान = अंतिम लक्ष्य

धीर आचार्यों की परम्परा

मंत्र मेंधीराणां वचनम्का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह ज्ञान

  • व्यक्तिगत मत नहीं
  • बल्कि आचार्य-परम्परा (गुरु-शिष्य परम्परा) का परिणाम है

अद्वैत दृष्टि में स्थान

अद्वैत वेदान्त के अनुसार

  • सम्भूति और असम्भूति दोनों व्यावहारिक स्तर पर सत्य हैं
  • परन्तु अंतिम सत्य इनसे परे है

इसलिए यह मंत्र साधक को क्रमिक समझ की ओर ले जाता है।

 

ईशावास्योपनिषद् का यह त्रयोदश मंत्र उपासना के विविध स्तरों और उनके फलभेद को स्पष्ट करता है।

आदि शंकराचार्य की व्याख्या यह स्थापित करती है कि उपनिषद् साधक को क्रमशः उच्चतर चेतना की ओर ले जाने वाला मार्ग दिखाता है, जहाँ सभी सीमित फल अन्ततः आत्मज्ञान की ओर संकेत करते हैं।

इस प्रकार यह मंत्र साधना की विविधता को स्वीकार करते हुए भी एक गहन अद्वैत सत्य की ओर संकेत करता है।

 

 

भीतर की भीड़

 भीतर की भीड़

(एक आन्तरिक एकालाप)

लोग अक्सर कहते हैं

तुम बहुत चुप रहते हो।


लेकिन वे नहीं जानते

कि चुप रहना

हमेशा खाली होना नहीं होता।


कुछ लोगों के भीतर

इतनी आवाज़ें होती हैं

कि वे बाहर बोल ही नहीं पाते।


एक स्मृति बोलती है,

एक पछतावा,

एक अधूरी इच्छा,

एक पुराना भय।


और इन सबके बीच

मनुष्य

धीरे-धीरे

अपनी ही आवाज़ पहचानना भूल जाता है।


मैंने कई बार

किसी से कुछ कहना चाहा,

लेकिन शब्द

भीतर ही कहीं उलझ गए।


जैसे

मन की सीढ़ियों पर

बहुत भीड़ हो

और कोई वाक्य

दरवाज़े तक पहुँच ही न पाए।


शायद इसलिए

कुछ लोग लिखते हैं।


क्योंकि बोलते समय

दुनिया बीच में आ जाती है,

लेकिन काग़ज़

तुम्हें बिना टोके सुनता है।


मैंने महसूस किया है

जो लोग बाहर से शांत होते हैं,

वे अक्सर

भीतर सबसे अधिक थके हुए होते हैं।


उन्हें हर समय

अपने ही विचारों के साथ रहना पड़ता है।

और विचार

वे भीड़ से ज़्यादा निर्दयी हो सकते हैं।


वे तुम्हें सोने नहीं देते,

तुम्हें अतीत में वापस ले जाते हैं,

तुमसे वही प्रश्न बार-बार पूछते हैं

जिनका कोई उत्तर नहीं होता।


धीरे-धीरे

मनुष्य

दुनिया से कम

अपने ही भीतर से हारने लगता है।


फिर एक दिन

वह बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखता है,

लेकिन भीतर

उसके कई हिस्से

बहुत पहले टूट चुके होते हैं।


और शायद

परिपक्वता का अर्थ

सिर्फ़ इतना है

कि आदमी

अपनी भीतर की भीड़ के साथ भी

शांत बैठना सीख जाए।


मुकेश ',,,,,,,,,

जो अपने भीतर अधिक बोलते हैं

 जो अपने भीतर अधिक बोलते हैं

(एक आन्तरिक एकालाप)


कुछ लोग

दुनिया से कम बात करते हैं,

लेकिन अपने भीतर

बहुत अधिक।


वे बाहर से शांत दिखते हैं,

जैसे सब कुछ समझ चुके हों,

लेकिन भीतर

एक पूरा नगर चलता रहता है

प्रश्नों का,

संवादों का,

और अनकहे उत्तरों का।


मैंने ऐसे लोगों को देखा है

जो भीड़ में भी अकेले रहते हैं,

और अकेले होकर भी

कभी खाली नहीं होते।


उनकी आँखों में

एक धीमा-सा संवाद चलता रहता है

किसी ऐसे व्यक्ति से

जो वहाँ मौजूद नहीं है।


वे बात नहीं करते,

क्योंकि उनके भीतर

बहुत कुछ पहले से चल रहा होता है।


शायद यही कारण है

कि उन्हें समझना आसान नहीं होता।


वे अपने शब्दों को

दुनिया में खर्च नहीं करते,

उन्हें भीतर ही संजोए रखते हैं

जैसे कोई

बहुत कीमती चीज़ को

बाहर की हवा से बचा रहा हो।


कभी-कभी

मुझे लगता है

कि ऐसे लोग

अपने जीवन को नहीं,

अपने ही विचारों को जी रहे होते हैं।


उनका मौन

खाली नहीं होता,

वह भरा हुआ होता है

अनकहे वाक्यों से।


और सबसे अजीब बात यह है

वे जितना कम बोलते हैं

उतना ही अधिक सुनते हैं,

लेकिन किसी और को नहीं,

अपने ही भीतर उठती हुई आवाज़ों को।


क्या यह आत्म-संवाद

मनुष्य को गहरा बनाता है

या धीरे-धीरे

दुनिया से दूर कर देता है?


शायद दोनों ही सच हैं।


क्योंकि जो भीतर अधिक जीता है

वह बाहर से थोड़ा कम बचता है।


फिर भी

उनकी आँखों में

एक तरह की शांति होती है

जैसे उन्होंने

अपने ही भीतर

किसी अनंत गलियारे में

रास्ता ढूँढ लिया हो।


मुकेश ,,,,,,,,,

बिना नाम की प्रतीक्षा

 बिना नाम की प्रतीक्षा

(एक आन्तरिक एकालाप)

अब यह समझ में आता है

कि प्रतीक्षा हमेशा किसी व्यक्ति की नहीं होती,

कभी-कभी वह

सिर्फ़ एक स्थिति होती है

जहाँ कुछ भी नहीं आता,

फिर भी मनुष्य रुका रहता है।


मैंने बहुत देर तक

अपने भीतर किसी उत्तर को खोजा है।

लेकिन उत्तर

हमेशा प्रश्न से पहले ही

कहीं और चला जाता है।


शायद यही जीवन है

लगातार

किसी अदृश्य दरवाज़े पर खड़े रहना,

जिसका कोई दस्तक-चिह्न नहीं होता।


दिन गुजरते हैं

जैसे कोई नदी

अपने ही प्रवाह से अनजान हो।

रातें आती हैं

और भीतर

कुछ चीज़ें और गहरी हो जाती हैं।


मैंने देखा है

समय

सबसे अधिक नुकसान

शोर से नहीं करता,

वह चुपचाप करता है।


जैसे

किसी तस्वीर का रंग

धीरे-धीरे हल्का पड़ता जाता है,

और एक दिन

वह तस्वीर नहीं रहती,

सिर्फ़ दीवार रह जाती है।


मैं अब

लोगों को देखते हुए

उन्हें पूरी तरह नहीं देख पाता।

उनके पीछे

एक और परत दिखाई देती है

उनके बीते हुए समय की।


हर चेहरा

अब केवल चेहरा नहीं रहा,

वह एक इतिहास बन गया है।


और इतिहास

हमेशा थोड़ा उदास होता है।


कभी-कभी

मुझे लगता है

मैं अपने ही जीवन का

एक देर से पहुँचा हुआ यात्री हूँ।


सब कुछ घट चुका है

और मैं

अब उसकी गूँज पकड़ने की कोशिश कर रहा हूँ।


क्या यह संभव है

कि मनुष्य

अपने ही जीवन में पीछे छूट जाए?


और फिर भी

वह चलता रहे

जैसे उसे कहीं पहुँचना हो।


मैं नहीं जानता

अंत में क्या बचेगा।


शायद कुछ नहीं।

या शायद

बस यही प्रतीक्षा

जो बिना नाम के भी

पूरे अस्तित्व को थामे रहती है।


मुकेश,,,,,,,,,,,,,,


अँधेरे में बची हुई आकृति

 अँधेरे में बची हुई आकृति

(एक आन्तरिक एकालाप)

अब जबकि

धीरे-धीरे

मेरे भीतर की अनेक आवाज़ें शांत हो चुकी हैं,

मैं अपने ही मौन को

पहचानना सीख रहा हूँ।


पहले

मुझे लगता था

मनुष्य अपने विचारों से बना है।

अब समझ में आता है

वह अपनी अनुपस्थितियों से बनता है।


जो नहीं मिला,

जो छूट गया,

जो कभी कहा नहीं जा सका

वही भीतर

सबसे अधिक जगह घेरता है।


मैंने जीवन में

बहुत-सी चीज़ों को बचाए रखने की कोशिश की

कुछ संबंध,

कुछ विश्वास,

कुछ स्वप्न।


लेकिन समय

धीरे-धीरे

हर चीज़ को अपनी तरफ़ खींच लेता है।


तुम रोक नहीं सकते।


तुम सिर्फ़

देख सकते हो

कि कैसे एक दिन

कोई बहुत प्रिय चेहरा

स्मृति की धुंध में बदलने लगता है।


और यह

मनुष्य की सबसे गहरी पराजय है

कि वह

भूलना नहीं चाहता,

फिर भी भूलता चला जाता है।


मैं कई बार

रात के अंतिम पहर में

अपने कमरे की बत्ती बुझाकर बैठता हूँ।


अँधेरे में

चीज़ें अपना वास्तविक आकार खो देती हैं।

मेज़, कुर्सियाँ, किताबें

सब एक समान छाया में बदल जाते हैं।


शायद मृत्यु भी

ऐसा ही कोई अँधेरा है

जहाँ व्यक्तित्व मिट जाते हैं

और केवल अस्तित्व बचता है।


लेकिन फिर मैं सोचता हूँ

यदि सब कुछ मिट ही जाना है

तो मनुष्य प्रेम क्यों करता है?

क्यों किसी की आवाज़

वर्षों बाद भी भीतर गूँजती रहती है?

क्यों एक छोटा-सा स्पर्श

पूरे जीवन पर छाया रह सकता है?


शायद इसलिए

कि नश्वरता ही

प्रेम को इतना असहनीय रूप से सुंदर बनाती है।


यदि सब शाश्वत होता,

तो किसी के खो जाने का भय न होता।

और बिना भय के

शायद प्रेम भी इतना गहरा न होता।


इसलिए

अब मैं दुख से भागता नहीं।


मैं जानता हूँ

जिस मनुष्य ने

सचमुच प्रेम किया है,

उसके भीतर

कहीं-न-कहीं

एक स्थायी शोक अवश्य रहेगा।


मुकेश' ,,,,,,,,,,,,,


शून्य के किनारे बैठा आदमी

 शून्य के किनारे बैठा आदमी

(एक आन्तरिक एकालाप)


अब मुझे

भीड़ से नहीं,

उन क्षणों से डर लगता है

जब सब कुछ अचानक शांत हो जाता है।


क्योंकि उसी ख़ामोशी में

मैं अपनी भीतर की दरारें सुन पाता हूँ।


दिन भर

मनुष्य अपने आपको

कितनी चीज़ों में बाँटे रखता है

कामों में,

लोगों में,

बातचीतों में,

मोबाइल की चमकती स्क्रीन में।


लेकिन रात

हर छल को धीरे-धीरे उतार देती है।


और तब

तुम अपने वास्तविक आकार में रह जाते हो,

एक अकेली चेतना,

जिसे नहीं पता

वह इस विराट ब्रह्मांड में

किस कारण रखी गई है।


मैंने कई बार

अपने भीतर झाँकने की कोशिश की है।

मगर वहाँ

कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला।


सिर्फ़

पुरानी आवाज़ों की धूल,

कुछ अधजले सपने,

और एक लंबा गलियारा

जिसमें स्मृतियाँ

धीरे-धीरे चलती रहती हैं।


क्या मनुष्य

वास्तव में वर्तमान में जीता है?

या वह

अपने बीते हुए कल की राख में

लगातार कुछ खोजता रहता है?


कभी-कभी

मुझे लगता है

हम सब

अपने भीतर एक अदृश्य शोक लेकर चलते हैं।


कोई उसे कविता में छिपा देता है,

कोई धर्म में,

कोई प्रेम में,

और कोई

हँसी के पीछे।


लेकिन वह रहता सबके भीतर है

एक मौन ग्रह की तरह,

जो अपनी परिक्रमा

कभी बंद नहीं करता।


अब मैं समझता हूँ

कि उम्र बढ़ना

सिर्फ़ समय का बीतना नहीं है।


यह धीरे-धीरे

अपने ही भ्रमों का अंतिम संस्कार देखना भी है।


तुम्हें पता चलता है

कि जिन चीज़ों को स्थायी समझा था

वे सब अस्थायी थीं।


और जिन्हें मामूली समझकर

नज़रअंदाज़ किया था

एक आवाज़,

एक स्पर्श,

किसी का तुम्हारा नाम लेना

असल में वही जीवन था।


बाक़ी सब

सिर्फ़ व्यवस्था थी।


मुकेश ,,,,,,,,

धूल में दबा हुआ मनुष्य

 धूल में दबा हुआ मनुष्य

(एक आन्तरिक एकालाप)

धीरे-धीरे

मुझे यह समझ में आने लगा है

कि मनुष्य

अपनी जीवित देह से ज़्यादा

अपनी टूटी हुई चीज़ों से पहचाना जाता है।


किसी की आवाज़ टूटती है,

किसी का भरोसा,

किसी का ईश्वर।


और कुछ लोग

पूरी उम्र

अपने भीतर गिरी हुई दीवारों के बीच

चलते रहते हैं।


मैं भी

शायद उन्हीं में से एक हूँ।


बाहर से

सब कुछ लगभग सामान्य है।

मैं लोगों से मिलता हूँ,

ज़रूरी काम करता हूँ,

समय पर मुस्कुरा भी देता हूँ।


लेकिन भीतर

एक जगह लगातार धँस रही है।


जैसे

स्मृति कोई पुरानी इमारत हो

जिसकी नींव में

बरसों से पानी भर रहा हो।


कभी-कभी

मुझे अपने ही शब्दों पर विश्वास नहीं होता।

वे मुँह से निकलते हैं,

मगर आत्मा तक नहीं पहुँचते।


क्या यह वही क्षण है

जब भाषा

मनुष्य का साथ छोड़ने लगती है?


मैं रात को

बहुत देर तक जागता हूँ।

और सोचता हूँ

क्या दुख सचमुच

एक भाव है?

या वह

धीरे-धीरे फैलता हुआ

एक अँधेरा पदार्थ है

जो चेतना की नसों में जमता जाता है।


अब मुझे

रोने से भी भय लगता है।


क्योंकि आँसू

कभी-कभी

सिर्फ़ पानी नहीं होते,

वे भीतर टूटती हुई

आख़िरी दीवार की आवाज़ भी होते हैं।


मैंने देखा है,

कुछ लोग

इतना अधिक सह लेते हैं

कि अंततः

उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं बचता।


वे चलते हैं,

बोलते हैं,

जीते हुए दिखाई देते हैं

लेकिन वास्तव में

वे अपनी ही अनुपस्थिति का अभिनय कर रहे होते हैं।


और शायद

मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यही है

कि वह

पूरी तरह टूट जाने के बाद भी

दुनिया से कहता रहता है :

“मैं ठीक हूँ।”


मुकेश ,,,,,,,