दर्शन -अध्याय–०१ | भाग–०८ | दर्शन क्या है? | शब्द, भाषा और अर्थ
दर्शन -अध्याय–०१ | भाग–०८ | दर्शन क्या है? | शब्द, भाषा और अर्थ किसी दर्शन को समझने में मूल स्रोतों का महत्व स्पष्ट हो जाने के बाद भी एक कठिनाई शेष रहती है— भाषा की कठिनाई। दर्शन शब्दों के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करता है, लेकिन दार्शनिक शब्द सामान्य भाषा के शब्दों से हमेशा समान अर्थ नहीं रखते। यहीं से दार्शनिक अध्ययन की एक बड़ी समस्या उत्पन्न होती है। हम किसी ग्रंथ को पढ़ते हैं। उसमें “आत्मा”, “चेतना”, “ज्ञान”, “मुक्ति”, “कर्म”, “प्रकृति” या “सत्य” जैसे शब्द आते हैं। हम इन शब्दों को अपने आधुनिक अर्थ में समझ लेते हैं और मान लेते हैं कि हमने दर्शन को समझ लिया। लेकिन सम्भव है कि जिस अर्थ में उस दर्शन ने शब्द का प्रयोग किया था, वह हमारे वर्तमान अर्थ से बिल्कुल अलग हो। इसलिए दर्शन को समझने से पहले शब्दों को समझना आवश्यक है। शब्द समान, अर्थ अलग दार्शनिक परम्पराओं में एक ही शब्द अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त हो सकता है। “आत्मा” शब्द इसका स्पष्ट उदाहरण है। यदि कोई व्यक्ति इस शब्द को केवल “व्यक्तिगत आत्मिक सत्ता” के सामान्य अर्थ में समझता है, तो वह विभिन्न दर्शनों में इसके प्रयोग को गलत ...