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मेरी आँखों में वो सपना अगर ठहर जाता,

  ग़ज़ल मेरी आँखों में वो सपना अगर ठहर जाता, मैं ज़रा ख़ुद को समझता तो सँवर जाता। तेरी ख़ामोश निगाहों में था कुछ ऐसा भी, मैं अगर पढ़ता इशारा तो उधर जाता। उम्र भर अपने ही साये से बचा फिरता रहा, एक दिन ख़ुद से जो मिलता तो किधर जाता। वक़्त ने रोक लिया मुझको कई मोड़ों पर, मैं अगर लौट के जाता तो बिखर जाता। जिसको खोने का हमेशा ही रहा डर मुझको, वो अगर पास में रहता तो मैं मर जाता। शहर की भीड़ में आवाज़ बहुत थी लेकिन, एक तेरा नाम जो सुनता तो ठहर जाता। कुछ पुराने से ख़तों में जो महक बाक़ी थी, मैं उन्हें खोल के पढ़ता तो निखर जाता। अब न मंज़िल की तमन्ना है, न रस्ते का गिला, तू अगर साथ में चलता तो सफ़र जाता। मैंने हर दर्द को चुपचाप जिया है अब तक, कोई पूछता जो हालात तो कह जाता। मुकेश,,,,,,,,

अब किसी से वो बहुत घुलती-मिलती नहीं,

  ग़ज़ल अब किसी से वो बहुत घुलती-मिलती नहीं, अपने भीतर से भी शायद वो निकलती नहीं। उसके चेहरे पे हँसी अब भी दिखाई देती है, बस किसी बात पे पहले-सी वो खिलती नहीं। लोग कहते हैं कि बदली है बहुत पहले से, क्या करें, ज़ख़्म की तह आसानी से सिलती नहीं। एक कमरे में कई शामें गुज़ार आती है, अब किसी राह में बेवजह वो मिलती नहीं। जिसको अपना कह के सब कुछ ही बता देती थी, अब वो दिल की कोई परत किसी से खोलती नहीं। उसके दरवाज़े पे दस्तक तो बहुत होती है, वो मगर हर किसी आवाज़ पे उठती नहीं। शायद इक उम्र लगी ख़ुद को समझने में उसे, अब वो हर शख़्स को अपनी कहानी देती नहीं। कोई पूछे तो बस इतना ही कहती है वो “ठीक हूँ…” और ज़्यादा कभी कहती नहीं। उसकी ख़ामोशियों में भी कई मौसम हैं, बस वो मौसम किसी चेहरे पे ढलती नहीं। मैंने देखा है उसे दूर से कुछ शामों में, वो मुझे देख के अब भी कभी रुकती नहीं। मुकेश

मैं अपने ही सवालों से अगर डर जाता,

ग़ज़ल मैं अपने ही सवालों से अगर डर जाता, तो शायद अपनी नज़र में भी सँवर जाता। जिसे खोने का मुझे उम्र से ज़्यादा डर था, वो अगर साथ रहा होता तो मैं मर जाता। मैं अपने घर की तरफ़ लौटना तो चाहता था, मगर हर मोड़ पे कोई नया शहर जाता। वो एक ख़त जो मेरे पास आज भी बाक़ी है, उसे पढ़ता तो कई साल पीछे उतर जाता। मैं अपने हिस्से की ख़ामोशियाँ लिए बैठा, कोई पुकारता दिल से तो मैं ठहर जाता। बहुत करीब था मंज़र, मगर समझ न सका, ज़रा-सा और जो रुकता तो देख पाता। मेरी हथेली में कुछ रेखाएँ अधूरी थीं, उन्हें पढ़ता तो शायद ख़ुद को पढ़ पाता। कई मकान बनाए, कई शहर बदले मैंने, मगर जहाँ मेरा दिल था, वहीं न घर पाया। जो लोग मेरे थे, उनसे ही दूर होता गया, किसी को अपना समझता तो कुछ बचा पाता। अब इस मुकाम पे आकर यही समझ आया जो वक़्त बीत गया, उसको कौन लौटा पाता। मुकेश

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 24 : श्रद्धा — मनुष्य जैसा मानता है, वैसा ही क्यों बनता है?

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 24 : श्रद्धा — मनुष्य जैसा मानता है, वैसा ही क्यों बनता है? दैवी और आसुरी सम्पदा के विवेचन के बाद गीता का प्रश्न और सूक्ष्म हो जाता है। यदि मनुष्य के भीतर अलग-अलग प्रकार की प्रवृत्तियाँ हैं, तो उनका मूल कहाँ है? एक मनुष्य सत्य, करुणा और संयम की ओर क्यों जाता है? दूसरा लोभ, क्रोध और अहंकार की ओर क्यों? क्या केवल बाहरी परिस्थितियाँ इसके लिए उत्तरदायी हैं? या मनुष्य के भीतर कोई ऐसी गहरी मान्यता होती है जो धीरे-धीरे उसके विचार, व्यवहार और चरित्र को आकार देती है? अर्जुन इसी प्रश्न को सामने रखता है। श्रद्धा का प्रश्न अर्जुन पूछते हैं— ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।  तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥  — भगवद्गीता 17.1 हे कृष्ण! जो लोग शास्त्र-विधि को छोड़कर श्रद्धा से युक्त होकर उपासना करते हैं, उनकी निष्ठा कैसी है—सात्त्विक, राजसिक या तामसिक? यह प्रश्न साधारण धार्मिक प्रश्न नहीं है। अर्जुन पूछ रहे हैं— क्या श्रद्धा अपने आप में पर्याप्त है? यदि किसी व्यक्ति को किसी बात पर गहरा विश्वास है, तो क्या केवल उस विश्वास के कारण वह स...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 23 : दैवी और आसुरी सम्पदा — धर्म और अधर्म मनुष्य के भीतर कैसे बनते हैं?

  महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 23 : दैवी और आसुरी सम्पदा — धर्म और अधर्म मनुष्य के भीतर कैसे बनते हैं? महाभारत का युद्ध बाहर दिखाई देता है। एक ओर पाण्डव हैं, दूसरी ओर कौरव। एक ओर कृष्ण हैं, दूसरी ओर दुर्योधन। लेकिन यदि गीता को केवल युद्ध की बाहरी कथा मानकर पढ़ा जाए, तो उसका सबसे गहरा प्रश्न छूट जाता है। क्योंकि कुरुक्षेत्र केवल दो सेनाओं का संघर्ष नहीं है। वह मनुष्य के भीतर धर्म और अधर्म की सम्भावनाओं का भी संघर्ष है। भाग 22 में हमने क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम का विवेचन किया था। अब प्रश्न यह है कि पुरुषोत्तम की ओर जाने वाली चेतना और उससे विमुख होने वाली चेतना में अन्तर कैसे पहचाना जाए? गीता इसके लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विभाजन करती है— दैवी सम्पदा और आसुरी सम्पदा। यहाँ “दैवी” और “आसुरी” को किसी जाति, समुदाय या बाहरी प्राणी के रूप में समझना गीता के आशय को छोटा कर देगा। यह मनुष्य के भीतर उपस्थित चेतना की प्रवृत्तियों का विवेचन है। दैवी सम्पदा गीता के सोलहवें अध्याय का आरम्भ होता है— अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ अहिंसा सत्यमक्रोधस...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 22 : क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम — परिवर्तन के पार वह क्या है?

  महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 22 : क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम — परिवर्तन के पार वह क्या है? कृष्ण के स्वरूप पर विचार करते हुए एक प्रश्न बार-बार सामने आता है— यदि संसार निरन्तर बदल रहा है, शरीर बदल रहा है, मन बदल रहा है, विचार बदल रहे हैं और जीवन जन्म से मृत्यु की ओर बढ़ रहा है, तो क्या इस परिवर्तन के पीछे कोई ऐसा तत्त्व है जो स्वयं परिवर्तन से परे है? और यदि ऐसा कोई तत्त्व है, तो क्या वही आत्मा है? क्या वही परमात्मा है? या इन दोनों के बीच भी कोई दार्शनिक अन्तर है? भगवद्गीता का पन्द्रहवाँ अध्याय इस प्रश्न को एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण त्रिभाजन के माध्यम से रखता है— क्षर — अक्षर — पुरुषोत्तम।  यहीं से गीता का दर्शन एक नये स्तर पर पहुँचता है। क्षर और अक्षर  कृष्ण कहते हैं—  द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।  क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥  — भगवद्गीता 15.16 इस लोक में दो प्रकार के पुरुष कहे गए हैं—क्षर और अक्षर। क्षर हैं सभी भूत अर्थात् परिवर्तनशील प्राणी-सत्ताएँ; और जो कूटस्थ है, वह अक्षर कहा जाता है। यहाँ दो शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं—  क्...

भीष्मपर्व — भाग 21 : कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि — अठारह अक्षौहिणी सेना वास्तव में कैसे व्यवस्थित हुई?

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 20 : जीव और ईश्वर — एक, भिन्न या सम्बन्धित? पिछले भागों में हमने कृष्ण को मानव, योगेश्वर और परम तत्त्व—इन तीन स्तरों पर समझने का प्रयास किया। फिर अवतार का प्रश्न आया। अब एक और प्रश्न सामने है— यदि कृष्ण परम सत्ता हैं, तो अर्जुन कौन है? यदि परमात्मा एक है और जीव अनेक हैं, तो दोनों का सम्बन्ध क्या है? क्या जीव परमात्मा से अलग है? क्या जीव उसी परमात्मा का अंश है? क्या दोनों मूलतः एक ही हैं? या फिर जीव और ईश्वर का सम्बन्ध ऐसा है जिसमें एकता और भिन्नता दोनों किसी न किसी स्तर पर सत्य हैं? गीता इस प्रश्न का उत्तर किसी एक दार्शनिक सूत्र में नहीं देती। बल्कि उसके अनेक श्लोक मिलकर एक बहुस्तरीय दृष्टि बनाते हैं। Text — दो स्तरों का संकेत गीता कहती है— ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥ — भगवद्गीता 15.7 “जीवलोक में स्थित जीव मेरा ही सनातन अंश है।” यहाँ “अंश” शब्द सबसे महत्वपूर्ण है। यदि अंश का अर्थ भौतिक टुकड़ा लिया जाए, तो परमात्मा को विभाज्य मानना पड़ेगा। यदि अंश का अर्थ सम्बन्ध, आश्रितता या अभिव्यक्ति लिया जाए, तो अर्थ अलग हो जा...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 19 : अवतार — परमात्मा मनुष्य क्यों बनता है?

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 19 : अवतार — परमात्मा मनुष्य क्यों बनता है? पिछले भाग में कृष्ण के तीन स्तर सामने आए—मानव कृष्ण, योगेश्वर कृष्ण और परम तत्त्व के रूप में कृष्ण। अब उसी से एक और कठिन प्रश्न निकलता है। यदि कृष्ण स्वयं को परम सत्ता का स्वरूप बताते हैं, तो परम सत्ता को मनुष्य के रूप में जन्म लेने की आवश्यकता क्यों है? जो स्वयं सम्पूर्ण जगत का आधार है, उसे किसी एक शरीर में आने की आवश्यकता क्यों पड़े? क्या अवतार का अर्थ वास्तव में परमात्मा का पृथ्वी पर जन्म लेना है? या यह मनुष्य के लिए परम सत्ता को समझने का एक ऐसा रूप है, जिसमें अनन्त सीमित के माध्यम से प्रकट होता है? गीता इस प्रश्न का उत्तर केवल धार्मिक कथा के रूप में नहीं देती। वह अवतार को धर्म, इतिहास, कर्म और चेतना के प्रश्न से जोड़ती है। अवतार का मूल सूत्र गीता में कृष्ण कहते हैं—  यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।  अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥  — भगवद्गीता 4.7–8 जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, त...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 18 : कृष्ण कौन हैं? — मानव, योगेश्वर या परम तत्त्व?

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 18 : कृष्ण कौन हैं? — मानव, योगेश्वर या परम तत्त्व? महाभारत की पूरी कथा में यदि किसी एक पात्र की उपस्थिति सबसे अधिक स्तरों पर दिखाई देती है, तो वह कृष्ण हैं। वे यादव हैं, वसुदेव–देवकी के पुत्र हैं, गोकुल और वृन्दावन की स्मृतियों से जुड़े हैं, मथुरा के राजनीतिक संघर्ष में उपस्थित हैं, द्वारका के निर्माता हैं, पाण्डवों के मित्र हैं, द्रौपदी के सम्बन्धी हैं, शान्तिदूत हैं और कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथी हैं। लेकिन गीता में वही कृष्ण अचानक एक और आयाम ग्रहण करते हैं। वे कहते हैं— अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥ — भगवद्गीता 10.8 “मैं सम्पूर्ण का उद्गम हूँ; मुझसे ही सब प्रवर्तित होता है।” अब प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि कृष्ण कौन हैं? प्रश्न यह है—  महाभारत कृष्ण को किस स्तर पर प्रस्तुत करता है? क्या वे इतिहास के एक असाधारण मनुष्य हैं, जिनके व्यक्तित्व को बाद की परम्परा ने दिव्यता प्रदान की? क्या वे प्रारम्भ से ही परम पुरुष के रूप में प्रस्तुत हैं? या महाभारत स्वयं इन दोनों स्तरों को एक साथ लेकर चलता है? यही ...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 17 : भक्ति — ज्ञान के बाद हृदय का प्रश्न

  महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 17 : भक्ति — ज्ञान के बाद हृदय का प्रश्न कुरुक्षेत्र में अर्जुन की यात्रा अब एक विशेष मोड़ पर पहुँच चुकी है। उसने शरीर और आत्मा का प्रश्न सुना। कर्म और ज्ञान का सम्बन्ध पूछा। कर्तापन और प्रकृति को समझा। त्रिगुणों को देखा। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विवेचन सुना। बन्धन और मोक्ष का प्रश्न उठाया। ध्यान के द्वारा मन को स्थिर करने का मार्ग जाना और फिर व्यक्तिगत चेतना तथा परम सत्ता के सम्बन्ध पर विचार किया। लेकिन मनुष्य केवल जानने वाला प्राणी नहीं है। वह प्रेम करता है, श्रद्धा करता है, समर्पित होता है। यहीं से एक नया प्रश्न जन्म लेता है— यदि परम सत्य को जान लिया जाए, तो उसके साथ मनुष्य का सम्बन्ध क्या होगा? क्या सत्य केवल जानने की वस्तु है? या उसके साथ कोई ऐसा सम्बन्ध भी सम्भव है जिसमें ज्ञान हृदय में उतर जाए? गीता इस प्रश्न का उत्तर भक्ति के माध्यम से देती है। भक्ति का प्रथम दार्शनिक सूत्र गीता कहती है— मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ — भगवद्गीता 12.8 मन को मुझमें स्थापित करो और बुद्धि को मुझमें समर्पित करो; तब तुम मु...