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Monday, 11 May 2026

ऐतरेयोपनिषद् के द्वितीय खण्ड, प्रथम मन्त्र पर शंकरभाष्य का दार्शनिक एवं शोधपूर्ण विवेचन

संसारार्णव में देवताओं की देह-अन्वेषणा

ऐतरेयोपनिषद् के द्वितीय खण्ड, प्रथम मन्त्र पर शंकरभाष्य का दार्शनिक एवं शोधपूर्ण विवेचन

मन्त्र

ता एता देवताः सृष्टाः अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतन्।

तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जताम्।

ता एनमब्रुवन् — आयतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति॥१॥


पदच्छेद / संधि-विच्छेद

ताः एताः देवताः

सृष्टाः

अस्मिन् महति अर्णवे

प्रापतन्

तम् अशनाया-पिपासाभ्याम् अन्ववार्जताम्

ताः एनम् अब्रुवन्

आयतनम् नः प्रजानीहि

यस्मिन् प्रतिष्ठिताः

अन्नम् अदाम इति

अन्वय (गद्यक्रम)


ताः एताः देवताः ईश्वरेण सृष्टाः अस्मिन् महति अर्णवे प्रापतन्।

तम् अशनाया-पिपासाभ्याम् अन्ववार्जताम्।

ताः एनम् अब्रुवन् — “नः आयतनं प्रजानीहि, यस्मिन् प्रतिष्ठिताः वयम् अन्नम् अदाम” इति।

शब्दार्थ

देवताः — इन्द्रियों के अधिष्ठाता दैवी तत्त्व

महत्यर्णवे — महान् अर्णव में, संसार-सागर में

अशनाया — भूख

पिपासा — प्यास

आयतनम् — निवास-स्थान, शरीर, अधिष्ठान

प्रतिष्ठिताः — स्थित होकर, समर्थ होकर

अन्नम् अदाम — अन्न का भोग करें, अनुभव करें

भावार्थ

वे देवताएँ, जो ईश्वर द्वारा उत्पन्न की गयी थीं, इस महान् संसार-सागर में आ गिरीं। तब भूख और प्यास ने उन्हें घेर लिया। उन्होंने उस सृष्टिकर्ता से कहा— “हमारे लिए ऐसा आयतन (शरीर या अधिष्ठान) उत्पन्न कीजिए जिसमें स्थित होकर हम अन्न का अनुभव और भोग कर सकें।”


आदि शंकराचार्य का भाष्य (मूल संस्कृत)

ता एता अग्न्यादयो देवताः लोकपालत्वेन संकल्प्य सृष्टाः ईश्वरेण अस्मिन् संसारार्णवे निरालम्बे विषयेन्द्रियजनितसुखलवलक्षणविश्रामे पञ्चेन्द्रियार्थतृष्णामारुतविक्षोभोत्थितानर्थशतमहोर्मिमालिनि महारौरवाद्यनेकनिरयगतहाहेत्यादिकूजिताक्रोशनोद्भूतमहारवे सत्यार्जवदानदयाऽहिंसाशमदमाद्यात्मगुणपाथेयपूर्णज्ञानोपेतसत्सङ्गसर्वत्यागमार्गमोक्षतीरे महत्यर्णवे प्रापतन् पतितवत्यः।

तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जताम्।

ताः एनम् अब्रुवन् — आयतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिताः अन्नम् अदाम इति।

शंकभाष्य का हिंदी अनुवाद

शंकराचार्य कहते हैं कि अग्नि आदि देवताएँ, जिन्हें ईश्वर ने लोकपालों के रूप में उत्पन्न किया था, इस महा-संसार-सागर में आ गिरीं। यह संसार ऐसा अर्णव है जिसमें कोई स्थायी आश्रय नहीं; जहाँ विषय और इन्द्रियों से उत्पन्न सुख केवल क्षणिक विश्राम है। पाँच इन्द्रियों के विषयों की तृष्णा रूपी वायु से यह संसार-सागर निरन्तर उद्वेलित रहता है, और उसमें दुःखरूपी महान् तरंगें उठती रहती हैं।


यह संसार—

जन्म-मरण का क्षेत्र,

तृष्णा का प्रवाह,

दुःख का महासागर,

और निरन्तर आकांक्षाओं का कम्पन है।

इन देवताओं को भूख और प्यास ने घेर लिया। तब उन्होंने सृष्टिकर्ता से प्रार्थना की— “हमें ऐसा शरीर या अधिष्ठान दीजिए जिसमें स्थित होकर हम अन्न का अनुभव कर सकें।”


“देवताः” — उपनिषद् की दैवी शक्तियाँ

यहाँ “देवता” से अभिप्राय पौराणिक देवताओं से अधिक गहरा है। उपनिषद् में देवता cosmic functions हैं—

वाक् = अभिव्यक्ति की शक्ति

प्राण = जीवन-ऊर्जा

चक्षु = प्रकाश-ग्रहण शक्ति

श्रोत्र = ध्वनि-अनुभूति

मन = अन्तःचेतना

अतः देवता यहाँ universal cognitive powers हैं।


उपनिषद् मनुष्य को केवल जैविक सत्ता नहीं मानता; वह ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संगम है।


“महत्यर्णवे” — संसार-सागर का रहस्य

शंकराचार्य ने “महत्यर्णव” की अत्यन्त काव्यमय और दार्शनिक व्याख्या की है। संसार एक ऐसा महासागर है—

जिसमें तृष्णा की वायु चलती है,

दुःख की तरंगें उठती हैं,

विषय-सुख क्षणिक विश्राम देते हैं,

और जीव निरन्तर अस्थिरता में डूबा रहता है।

यह वर्णन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहन existential analysis है।

आधुनिक Existential Philosophy भी मनुष्य को एक असुरक्षित, अनिश्चित और अर्थ-खोजी सत्ता के रूप में देखती है। उपनिषद् इस स्थिति को “संसारार्णव” कहता है।

अशनाया और पिपासा — अस्तित्वगत भूख

“अशनाया” और “पिपासा” का अर्थ केवल जैविक भूख-प्यास नहीं है। यह जीवन की मूल अपूर्णता का प्रतीक है।


मनुष्य—

भोजन चाहता है,

अनुभव चाहता है,

प्रेम चाहता है,

ज्ञान चाहता है,

अमरता चाहता है।

अर्थात् चेतना निरन्तर किसी पूर्णता की खोज में है।

इस दृष्टि से भूख और प्यास existential longing हैं।


“आयतनम्” — embodiment की आवश्यकता

देवताओं ने “आयतन” माँगा। आयतन अर्थात्—

शरीर,

निवास,

अनुभव का माध्यम।


यहाँ उपनिषद् एक अत्यन्त आधुनिक प्रश्न उठाता है—

क्या चेतना बिना शरीर के अनुभव कर सकती है?

उपनिषद् का उत्तर है— अनुभव के लिए embodiment आवश्यक है।

इन्द्रियाँ बिना शरीर के अनुभव नहीं कर सकतीं। अतः चेतना को स्वयं को प्रकट करने हेतु रूप और संरचना चाहिए।


“अन्नम् अदाम” — अन्न की उपनिषदिक अवधारणा

यहाँ “अन्न” केवल भोजन नहीं है। उपनिषद् में अन्न सम्पूर्ण अनुभव-वस्तु (object of experience) का प्रतीक है।

जो देखा जाए,

जो सुना जाए,

जो भोगा जाए,

जो जाना जाए—

वह सब “अन्न” है।

इस प्रकार—

आत्मा = अनुभवकर्ता

इन्द्रियाँ = अनुभव के उपकरण

अन्न = अनुभव की वस्तु

यह subject-object relation की अत्यन्त सूक्ष्म उपनिषदिक व्याख्या है।

अद्वैत वेदान्त की स्थापना

Adi Shankaracharya इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को अद्वैत की दृष्टि से देखते हैं। देवता आत्मा से पृथक् स्वतंत्र सत्ता नहीं हैं। वे आत्मा की शक्तियाँ हैं।

अतः—

अनुभवकर्ता आत्मा,

अनुभव का माध्यम इन्द्रियाँ,

और अनुभव-वस्तु जगत्—

तीनों अन्ततः एक ही चेतना की विविध अवस्थाएँ हैं।


Consciousness Studies और Embodiment

आधुनिक Consciousness Studies यह प्रश्न उठाती है—

क्या चेतना शरीर से उत्पन्न होती है, या शरीर चेतना का उपकरण है?

यह मन्त्र दूसरे पक्ष की ओर संकेत करता है। यहाँ शरीर चेतना का expression-medium है।


आधुनिक embodied cognition theory भी यह मानती है कि अनुभव केवल मस्तिष्क का कार्य नहीं; सम्पूर्ण शरीर cognition में सहभागी होता है।

Phenomenology और Maurice Merleau-Ponty


Maurice Merleau-Ponty के अनुसार शरीर “lived body” है — चेतना का जीवित माध्यम।

उपनिषद् का “आयतनम्” इसी सत्य को आध्यात्मिक भाषा में व्यक्त करता है। चेतना को अनुभव हेतु embodiment चाहिए।

Comparative Philosophy

विश्व की अनेक दार्शनिक परम्पराओं में cosmic longing की अवधारणा मिलती है। Plato के दर्शन में आत्मा पूर्णता की ओर आकृष्ट होती है। बौद्ध दर्शन में “तृष्णा” संसार का कारण कही गयी है।

किन्तु उपनिषद् की विशेषता यह है कि वह इस तृष्णा के आधार में आत्मा की पूर्णता-खोज को देखता है।

अन्य उपनिषदों से सम्बन्ध

तैत्तिरीय उपनिषद् में अन्न को ब्रह्मरूप कहा गया है।

छान्दोग्य उपनिषद् में समस्त जगत् को “सत्” की अभिव्यक्ति कहा गया।

प्रश्न उपनिषद् में प्राण और इन्द्रियों के सम्बन्ध का सूक्ष्म विवेचन मिलता है।


ऐतरेयोपनिषद् इन सभी को एकीकृत कर चेतना और embodiment का अद्वितीय दर्शन प्रस्तुत करता है।

साधना एवं आत्मचिन्तन

यह मन्त्र साधक को अपनी इच्छाओं को केवल जैविक न मानकर चेतना की गहन खोज के रूप में देखने की प्रेरणा देता है।

ध्यान में साधक विचार कर सकता है—

“मैं वास्तव में क्या खोज रहा हूँ?”

“क्या मेरी भूख केवल शरीर की है?”

“क्या समस्त अनुभव आत्मा की पूर्णता-यात्रा है?”

यह चिन्तन witnessing awareness की ओर ले जाता है।

ऐतरेय उपनिषद् का यह मन्त्र मानव-अस्तित्व की अत्यन्त सूक्ष्म व्याख्या प्रस्तुत करता है। इन्द्रियाँ अनुभव के लिए शरीर की खोज करती हैं; भूख और प्यास अस्तित्वगत अधूरेपन का प्रतीक हैं; और embodied existence चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम है। शंकराचार्य इस संसार को तृष्णा और दुःख का महासागर बताते हुए यह स्थापित करते हैं कि आत्मा का ज्ञान ही वास्तविक आश्रय और मोक्ष का तट है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

Sunday, 10 May 2026

ऐतरेयोपनिषद् का द्वितीय खण्ड : चेतना, जीवप्रवेश और मानव-अस्तित्व का उपनिषदिक रहस्य

 

 

ऐतरेयोपनिषद् का द्वितीय खण्ड : चेतना, जीवप्रवेश और मानव-अस्तित्व का उपनिषदिक रहस्य

प्रथम खण्ड से सम्बन्धित एक शोधपूर्ण दार्शनिक अध्ययन

ऐतरेय उपनिषद् उपनिषद्-दर्शन का एक अत्यन्त गम्भीर और सूक्ष्म भाग है। यदि प्रथम खण्ड कोसृष्टि और विराट चेतना का खण्डकहा जाए, तो द्वितीय खण्डजीव-प्रवेश, आत्मानुभूति और मानव-अस्तित्वका खण्ड है। प्रथम खण्ड में उपनिषद् ने आत्मा से लोकों, विराट पुरुष और इन्द्रियों की उत्पत्ति का वर्णन किया था; द्वितीय खण्ड में वही आत्मा उस विराट संरचना मेंप्रवेशकरती है और जीवित चेतना के रूप में अनुभवगम्य बनती है।

इस प्रकार प्रथम और द्वितीय खण्ड परस्पर गहरे रूप से सम्बद्ध हैं

  • प्रथम खण्ड = ब्रह्माण्डीय संरचना (Cosmic Structure)
  • द्वितीय खण्ड = चेतना का जीव-अनुभव (Embodied Consciousness)

प्रथम खण्ड में आत्मा जगत् का कारण है; द्वितीय खण्ड में वही आत्मा जीव के रूप में अनुभवकर्ता बनती है।

 

द्वितीय खण्ड में कितने मन्त्र हैं?

ऐतरेय उपनिषद् में कुल छः मन्त्र माने जाते हैं (कुछ पाठों में गणना-भेद भी मिलता है) इन मन्त्रों में मुख्यतः निम्न विषयों का वर्णन है

मन्त्र

मुख्य विषय

1

देवताओं का शरीर में प्रवेश

2

भूख और प्यास की उत्पत्ति

3

अन्न की रचना

4

अन्न को ग्रहण करने के प्रयास

5

प्राण और अपान की भूमिका

6

आत्मा का शरीर में प्रवेश औरपुरुषका जीवित अनुभवकर्ता बनना

यह सम्पूर्ण खण्ड मानव-अस्तित्व की दार्शनिक व्याख्या है। यहाँ शरीर केवल जैविक संरचना नहीं, बल्कि चेतना का उपकरण बन जाता है।


प्रथम खण्ड से द्वितीय खण्ड का सम्बन्ध

प्रथम खण्ड में उपनिषद् ने

  • लोकों की रचना,
  • लोकपालों की स्थापना,
  • विराट पुरुष की उत्पत्ति,
  • इन्द्रियों और उनके देवताओं की अभिव्यक्ति

का वर्णन किया था।

किन्तु एक महत्वपूर्ण प्रश्न अभी शेष था

यदि इन्द्रियाँ और शरीर बन गए, तो उनमें चेतना कैसे आई?

द्वितीय खण्ड इसी प्रश्न का उत्तर है।

यहाँ उपनिषद् कहता है कि केवल शरीर या इन्द्रियाँ पर्याप्त नहीं; जब तक आत्मा उनमें प्रवेश नहीं करती, तब तक अनुभव सम्भव नहीं।

यह विचार आधुनिक Philosophy of Mind में उपस्थित “hard problem of consciousness” से अत्यन्त निकट है। शरीर और मस्तिष्क की संरचना होने पर भीअनुभवकैसे उत्पन्न होता हैयह आधुनिक विज्ञान का भी एक रहस्य है। उपनिषद् इसका उत्तर आत्मा केप्रवेशमें देखता है।

 

देवताओं का शरीर में प्रवेश

द्वितीय खण्ड के प्रारम्भिक मन्त्रों में वर्णन है कि इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता शरीर में प्रवेश करते हैं

  • अग्नि वाणी बनकर मुख में,
  • वायु प्राण बनकर नासिका में,
  • आदित्य चक्षु बनकर नेत्रों में,
  • दिशाएँ श्रवण बनकर कानों में

स्थित होते हैं।

यह अत्यन्त गम्भीर प्रतीकात्मक वर्णन है। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई बाहरी देवता शरीर में आकर बैठ गए; बल्कि यह कि ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ मानव-अनुभव में रूपान्तरित हो गयीं।

उपनिषद् मानव कोकॉस्मिक बीइंग” (Cosmic Being) के रूप में देखता है।

जो शक्तियाँ विश्व में कार्य कर रही हैं, वही मनुष्य के भीतर भी सक्रिय हैं।

 

भूख और प्यास : अस्तित्व की अपूर्णता

द्वितीय खण्ड मेंअशनायाअर्थात् भूख और प्यास का उल्लेख अत्यन्त महत्वपूर्ण है। उपनिषद् कहता है कि देवताओं ने आत्मा से कहा

हमारे लिए ऐसा स्थान चाहिए जहाँ हम स्थित होकर अन्न का अनुभव कर सकें।

यहाँ भूख केवल जैविक भूख नहीं, बल्कि अस्तित्व की मूल अपूर्णता (existential incompleteness) का प्रतीक है।

मनुष्य

  • भोजन चाहता है,
  • अनुभव चाहता है,
  • सम्बन्ध चाहता है,
  • ज्ञान चाहता है।

अर्थात् चेतना स्वयं को पूर्ण करने का प्रयास करती रहती है।

आधुनिक Existential Psychology भी मनुष्य को एक “seeking being” के रूप में देखती है। उपनिषद् इस खोज को आत्मा की अभिव्यक्ति मानता है।

 

अन्न की उपनिषदिक अवधारणा

द्वितीय खण्ड में आत्माअन्नकी सृष्टि करता है। यहाँअन्नकेवल भोजन नहीं, बल्कि समस्त अनुभव-वस्तु (object of experience) का प्रतीक है।

उपनिषद् के अनुसार

  • अनुभवकर्ता = आत्मा,
  • अनुभव का माध्यम = इन्द्रियाँ,
  • अनुभव की वस्तु = अन्न।

यहाँ सम्पूर्ण अस्तित्व एक चेतन-अनुभव संरचना बन जाता है।

तैत्तिरीय उपनिषद् में भी अन्न को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। वहाँ कहा गया

अन्नं ब्रह्मेति।

अर्थात् अन्न केवल पदार्थ नहीं; वह जीवन और चेतना का आधार है।

 

प्राण और अपान की भूमिका

द्वितीय खण्ड में यह भी कहा गया कि अन्य इन्द्रियाँ अन्न को पकड़ने में असफल रहीं; अन्ततः अपान ने अन्न को ग्रहण किया।

यह अत्यन्त सूक्ष्म प्रतीक है।

यहाँ उपनिषद् यह बताता है कि

  • जीवन केवल ज्ञान नहीं,
  • बल्कि ग्रहण और पाचन की प्रक्रिया भी है।

प्राण और अपान केवल जैविक श्वास नहीं, बल्कि जीवन-ऊर्जा के मूल प्रवाह हैं।

आधुनिक Embodied Cognition Theory भी यह मानती है कि चेतना केवल मस्तिष्क की प्रक्रिया नहीं; सम्पूर्ण शरीर अनुभव में सहभागी होता है।

 

आत्मा का शरीर में प्रवेश

द्वितीय खण्ड का सबसे महत्वपूर्ण विषय हैआत्मा का शरीर में प्रवेश।

उपनिषद् कहता है कि आत्मा ने विचार किया

यदि वाणी बोले, नेत्र देखें, कान सुनेंतो मैं कौन हूँ?”

इसके पश्चात् आत्माविदृतिअर्थात् ब्रह्मरन्ध्र के माध्यम से शरीर में प्रवेश करती है।

यहाँ एक अत्यन्त गम्भीर दार्शनिक सत्य व्यक्त होता है

इन्द्रियाँ अनुभव नहीं करतीं; आत्मा उनके माध्यम से अनुभव करती है।

यही उपनिषद् कासाक्षी-चेतनासिद्धान्त है।

शरीर और मन उपकरण हैं; अनुभवकर्ता आत्मा है।

 

पुरुषकी उपनिषदिक व्याख्या

आत्मा के प्रवेश के पश्चात् ही वह संरचनापुरुषकहलाती है। यहाँपुरुषका अर्थ केवल मानव नहीं, बल्कि चेतना-सम्पन्न अस्तित्व है।

यह वही विचार है जो बाद में अद्वैत वेदान्त मेंजीव-ब्रह्म ऐक्यके रूप में विकसित होता है।

Adi Shankaracharya के अनुसार आत्मा वास्तव में शरीर में प्रवेश नहीं करती; क्योंकि वह सर्वव्यापक है।प्रवेशकेवल उपाधि-सम्बन्ध का प्रतीक है।

जैसे सूर्य जल में प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही आत्मा शरीर-मन में प्रतिबिम्बित होकरजीवके रूप में अनुभव होती है।

आधुनिक Consciousness Studies से सम्बन्ध

द्वितीय खण्ड आधुनिक Consciousness Studies के लिए अत्यन्त प्रासंगिक है।

आज Cognitive Science यह प्रश्न पूछती है

मस्तिष्क की भौतिक प्रक्रियाओं से subjective experience कैसे उत्पन्न होता है?”

उपनिषद् का उत्तर है

अनुभव का मूल कारण आत्मा है; मस्तिष्क और इन्द्रियाँ केवल उपकरण हैं।

यह दृष्टिकोण आधुनिक Panpsychism और Idealism से कुछ सीमा तक साम्य रखता है।


Phenomenology और Embodied Consciousness

Edmund Husserl तथा Maurice Merleau-Ponty ने चेतना और शरीर के सम्बन्ध को अत्यन्त गम्भीरता से समझाया।

Merleau-Ponty के अनुसार

शरीर केवल वस्तु नहीं; वह चेतना का lived medium है।

उपनिषद् यही बात आध्यात्मिक भाषा में कहता है।

 

मानव-अस्तित्व की उपनिषदिक समझ

द्वितीय खण्ड मनुष्य को केवल जैविक प्राणी नहीं मानता। मनुष्य

  • चेतना का केन्द्र,
  • cosmic forces का संगम,
  • अनुभव का माध्यम,
  • और आत्मा का प्राकट्य

है।

यहाँ मानव-अस्तित्व को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की गई है।

ऐतरेय उपनिषद् प्रथम खण्ड की सृष्टि-व्याख्या को जीव-अनुभव की दिशा में आगे बढ़ाता है। प्रथम खण्ड में जहाँ आत्मा से जगत् और विराट पुरुष की उत्पत्ति हुई थी, वहीं द्वितीय खण्ड में वही आत्मा शरीर में प्रवेश कर अनुभवकर्ता बनती है। इन्द्रियाँ, प्राण, अन्न और चेतनासब मिलकर मानव-अस्तित्व की उपनिषदिक संरचना निर्मित करते हैं। यह खण्ड स्पष्ट करता है कि मनुष्य केवल पदार्थ नहीं, बल्कि आत्मा की जीवित अभिव्यक्ति है; और चेतना ही सम्पूर्ण अनुभव-जगत् का अंतिम आधार है।

 

Mukesh

 

 

ऐतरेयोपनिषद् के प्रथम अध्याय, प्रथम खण्ड, तृतीय मन्त्र पर शंकरभाष्य का दार्शनिक विवेचन मन्त्र

 

लोकपाल-सृष्टि और विराट पुरुष की अभिव्यक्ति

ऐतरेयोपनिषद् के प्रथम अध्याय, प्रथम खण्ड, तृतीय मन्त्र पर शंकरभाष्य का दार्शनिक विवेचन

मन्त्र

ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति।
सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत्॥३॥
ऐतरेय उपनिषद्

पदच्छेद

  • सः ईक्षत
  • इमे नु लोकाः
  • लोकपालान् नु सृजा इति
  • सः अद्भ्यः एव पुरुषम् समुद्धृत्य अमूर्च्छयत्

अन्वय

सः ईक्षत — “इमे लोकाः सन्ति; एतेषां लोकानां लोकपालान् सृजामिइति।
सः अद्भ्यः एव पुरुषं समुद्धृत्य अमूर्च्छयत्।

शब्दार्थ

  • ईक्षतविचार किया, संकल्प किया
  • लोकपालान्लोकों के अधिष्ठाता एवं नियामक तत्त्व
  • अद्भ्यःजल से, आद्य तत्त्व से
  • पुरुषम्विराट चेतन पुरुष
  • समुद्धृत्यऊपर उठाकर, प्रकट करके
  • अमूर्च्छयत्आकार दिया, अवयवयुक्त बनाया

भावार्थ

उस परमात्मा ने विचार किया — “ये लोक तो उत्पन्न हो गए; अब इनके संचालन और संरक्षण के लिए लोकपालों की रचना करूँ।तब उसने आद्य जलतत्त्व से विराट पुरुष को प्रकट कर उसे अंग-प्रत्यंगयुक्त रूप प्रदान किया।


आदि शंकराचार्य का भाष्य (मूल संस्कृत)

ईक्षतइमे नु लोकाः सृष्टाः। लोकपालान् नु सृजा इति।
सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्य अमूर्च्छयत्।
पुरुषाकारमपां पिण्डं कृत्वा अवयवविशिष्टं विराडात्मकं पुरुषम् अकरोत्।

 

 

शंकरभाष्य का हिंदी अनुवाद

शंकराचार्य कहते हैं कि परमात्मा ने विचार किया — “ये लोक तो उत्पन्न हो गए हैं; अब इनके पालन और संचालन हेतु लोकपालों की रचना करनी चाहिए।

तत्पश्चात् उसनेअद्भ्यःअर्थात् जलतत्त्व से पुरुष को प्रकट किया। यहाँजलकेवल भौतिक जल नहीं, बल्कि आद्य सृष्टि-सामग्री या मूल संभाव्यता का प्रतीक है। परमात्मा ने उस जलतत्त्व से पुरुषाकार पिण्ड को उठाकर उसे अंग-प्रत्यंगयुक्त विराट पुरुष के रूप में व्यवस्थित किया।

अमूर्च्छयत्का अर्थ हैअव्यक्त सत्ता को संगठित रूप देना; चेतना के लिए एक अनुभवयोग्य रूप की रचना करना।

लोक और लोकपाल की दार्शनिक अवधारणा

इस मन्त्र मेंलोकऔरलोकपालअत्यन्त महत्वपूर्ण दार्शनिक शब्द हैं।

लोकका सामान्य अर्थ संसार या जगत् है, किन्तु उपनिषदों में लोक केवल भौतिक स्थान नहीं, बल्कि अनुभव-क्षेत्र (fields of experience) हैं। प्रत्येक लोक चेतना की एक विशेष अवस्था या अस्तित्व-स्तर का द्योतक है।

जब लोकों की रचना हो जाती है, तब उनके संतुलन, संचालन और व्यवस्था के लिएलोकपालआवश्यक होते हैं। अतः लोकपाल केवल पौराणिक देवता नहीं, बल्कि cosmic regulating principles हैंवे शक्तियाँ जो ब्रह्माण्डीय व्यवस्था (ऋत) को सम्भव बनाती हैं।

यहाँ उपनिषद् एक अत्यन्त सूक्ष्म सत्य व्यक्त करता है

अस्तित्व केवल पदार्थ से नहीं चलता; उसके पीछे चेतन व्यवस्था भी होती है।

 

अद्भ्यः एव पुरुषम्” — जल से पुरुषोत्पत्ति

वैदिक साहित्य मेंआपःया जल का अर्थ केवल भौतिक जल नहीं होता। वह

  • आद्य संभाव्यता,
  • जीवन-बीज,
  • सृजनात्मक ऊर्जा,
  • अव्यक्त प्रकृति

का प्रतीक है।

इसलिएअद्भ्यः पुरुषम्का अर्थ यह नहीं कि कोई जैविक शरीर जल से बना; बल्कि यह कि विराट चेतना ने अव्यक्त संभाव्यता से व्यक्त रूप धारण किया।

 

विराट पुरुष की अवधारणा

यहपुरुषसाधारण मनुष्य नहीं, बल्कि विराट चेतन सत्ता है।

यह वही दार्शनिक कल्पना है जो पुरुषसूक्त मेंसहस्रशीर्षा पुरुषःके रूप में व्यक्त होती है।

विराट पुरुष

  • सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीकात्मक शरीर है,
  • जिसमें सभी लोक, देवता, प्राणी और शक्तियाँ अन्तर्भूत हैं।

शंकराचार्यविराडात्मकं पुरुषम्कहकर स्पष्ट करते हैं कि यह समष्टि-चेतना का रूप है।

अमूर्च्छयत्” — चेतना का रूपग्रहण

अमूर्च्छयत्शब्द अत्यन्त दार्शनिक है। इसका अर्थ केवलबनायानहीं है।

यह अव्यक्त चेतना के व्यक्त संरचना ग्रहण करने की प्रक्रिया को सूचित करता है।

अर्थात्

  • निराकार चेतना,
  • अनुभव के लिए,
  • रूप, संरचना और अवयव ग्रहण करती है।

इसे आधुनिक भाषा में embodiment कहा जा सकता है।

अद्वैत वेदान्त की स्थापना

यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विराट पुरुष आत्मा से पृथक् नहीं है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार

  • आत्मा ही जगत् के रूप में प्रकट होता है,
  • वही विराट पुरुष बनता है,
  • वही जीवों में चेतना रूप से विद्यमान रहता है।

अतः सृष्टि आत्मा से अलग कोई दूसरी सत्ता नहीं; वह आत्मा की अभिव्यक्ति है।

Cosmology और Cosmic Man Theory

विश्व की अनेक परम्पराओं में “Cosmic Man” की अवधारणा मिलती है। आधुनिक Comparative Mythology में इसे मानव-चेतना के सार्वभौमिक archetype के रूप में देखा जाता है।

किन्तु उपनिषद् की विशेषता यह है कि यहाँ विराट पुरुष केवल मिथकीय प्रतीक नहीं, बल्कि चेतना और अस्तित्व की अद्वैतात्मक व्याख्या है।


Phenomenology और Embodiment

आधुनिक Phenomenology शरीर को केवल जैविक वस्तु नहीं, बल्कि चेतना की अभिव्यक्ति मानती है।

Maurice Merleau-Ponty ने “lived body” की अवधारणा प्रस्तुत कीशरीर चेतना का अनुभवात्मक माध्यम है।

उपनिषद् काअमूर्च्छयत्इसी ओर संकेत करता है कि चेतना स्वयं को अनुभव के लिए रूप प्रदान करती है।


Depth Psychology और Archetype

Carl Gustav Jung के अनुसार मानव-मन में कुछ सार्वभौमिक archetypes उपस्थित रहते हैं। “Cosmic Man” या “Primordial Being” ऐसा ही एक archetype है।

विराट पुरुष की उपनिषदिक कल्पना इस archetypal consciousness की अत्यन्त उच्च दार्शनिक अभिव्यक्ति मानी जा सकती है।

साधना एवं आत्मचिन्तन

यह मन्त्र साधक को यह अनुभव कराने का प्रयास करता है कि शरीर केवल जैविक संरचना नहीं, बल्कि चेतना का उपकरण है।

ध्यान में साधक निम्न चिन्तन कर सकता है

क्या यह शरीर केवल पदार्थ है?”
क्या चेतना स्वयं को अनुभव हेतु रूप प्रदान करती है?”
क्या मेरा व्यक्तिगत अस्तित्व विराट चेतना की अभिव्यक्ति है?”

यह चिन्तन व्यक्ति को देहाभिमान से साक्षीभाव की ओर ले जाता है।

निष्कर्ष

ऐतरेय उपनिषद् का यह मन्त्र लोक-सृष्टि के पश्चात् चेतना के विराट पुरुष रूप में प्राकट्य का दार्शनिक वर्णन करता है। लोकपाल ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के प्रतीक हैं, और विराट पुरुष समष्टि-चेतना का रूप है। शंकराचार्य इस मन्त्र द्वारा यह स्थापित करते हैं कि जगत्, लोक, देवता और पुरुषसब आत्मा की ही विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। इस प्रकार उपनिषद् सृष्टि को जड़ पदार्थ की प्रक्रिया नहीं, बल्कि चेतना की सृजनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।

Mukesh,,,,,,,