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चिंतन - क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं?

  चिंतन -  क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं? मनुष्य ने अपने हाथों की शक्ति बढ़ाने के लिए औज़ार बनाए। फिर उसने अपनी गति बढ़ाने के लिए वाहन बनाए। उसके बाद उसने अपनी स्मृति, गणना और विश्लेषण की क्षमता बढ़ाने के लिए यंत्रों का निर्माण किया। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऐसे कार्य कर रही है, जिनकी कभी कल्पना भी कठिन थी। पर तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं? बुद्धि जानती है। चेतना जागती है। बुद्धि तुलना करती है। चेतना साक्षी होती है। बुद्धि उत्तर खोजती है। चेतना प्रश्न के पीछे छिपे हुए स्वयं को खोजती है। यहीं से दोनों के बीच का अंतर स्पष्ट होने लगता है। यंत्र गणना कर सकते हैं। वे स्मृतियों का विशाल भंडार बन सकते हैं। वे भाषा रच सकते हैं। चित्र बना सकते हैं। संगीत की रचना भी कर सकते हैं। पर क्या वे किसी शिशु की मुस्कान देखकर भीतर उठने वाली करुणा का अनुभव कर सकते हैं? क्या वे किसी प्रियजन के वियोग में मौन हो जाने का अर्थ जी सकते हैं? क्या वे मृत्यु के सामने खड़े होकर अपने अस्तित्व पर प्रश्न कर सकते हैं? ...

तुम्हारा इंतज़ार

  तुम्हारा इंतज़ार इंतज़ार का भी अपना एक सौन्दर्य होता है। यह बात मुझे तुमसे मिलने के बाद समझ में आई। पहले लगता था कि प्रतीक्षा केवल समय को लंबा कर देती है। अब लगता है, प्रतीक्षा ही समय को अर्थ देती है। जब तुम आने वाली होती हो, तो मैं घड़ी नहीं देखता। मैं धूप का रंग देखता हूँ, हवा की चाल देखता हूँ, पेड़ों की पत्तियों को देखता हूँ। जाने क्यों, तुम्हारे आने से पहले पूरी दुनिया में एक हल्की-सी तैयारी शुरू हो जाती है। जैसे मौसम भी जानता हो कि कोई ऐसा आने वाला है, जिसके आने से साधारण क्षण भी याद बन जाते हैं। तुम्हारे आने का कोई निश्चित समय नहीं होता, लेकिन तुम्हारी आहट का एक अपना समय होता है। वह दिल को सबसे पहले सुनाई देती है। फिर आँखें दरवाज़े की ओर उठती हैं, और उसके बाद होंठों पर अनायास एक मुस्कान चली आती है। शायद यही प्रेम का सबसे सरल परिचय है—किसी के आने से पहले ही उसका असर महसूस होने लगे। और जब तुम सामने होती हो, तब समझ में आता है कि प्रतीक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती। वह हमारे भीतर मिलने की क्षमता पैदा करती है। जो सहज मिल जाता है, उसका सुख क्षणिक होता है; लेकिन जिसका इंतज़ार किया गया ...

तुम... और तुम्हारी शरारतें

  तुम... और तुम्हारी शरारतें तुम्हारी सबसे ख़ूबसूरत बात तुम्हारी मुस्कुराहट नहीं है। तुम्हारी सबसे ख़ूबसूरत बात है—तुम्हारी शरारतें। वो शरारतें जिनका कोई शोर नहीं होता, कोई ऐलान नहीं होता। बस आँखों के किसी कोने में चुपके से जन्म लेती हैं और बिना इजाज़त दिल में उतर जाती हैं। कभी तुम बात करते-करते अचानक रुक जाती हो, जैसे कोई राज़ अपने ही होंठों के पीछे छिपा लिया हो। कभी मेरी ओर देखकर यूँ मुस्कुरा देती हो, मानो तुम्हें पहले से मालूम हो कि मैं अगले ही पल अपनी नज़रें झुका लूँगा। और फिर तुम धीरे से हँस देती हो—उस हँसी में जीत का कोई अहंकार नहीं होता, बस अपनापन होता है। तुम्हारी शरारतें अजीब हैं। वे किसी बच्चे की तरह मासूम भी हैं और किसी ग़ज़ल के मतले की तरह दिलकश भी। वे कभी किसी तितली की तरह मेरे आसपास मंडराती हैं, तो कभी किसी ख़ुशबू की तरह मेरे भीतर उतर जाती हैं। उन्हें पकड़ना मुमकिन नहीं, बस महसूस किया जा सकता है। कई बार सोचता हूँ, अगर तुम इतनी शरारती न होतीं, तो शायद मेरी ज़िंदगी इतनी ख़ामोश होती कि उसमें हँसी की आवाज़ गुम हो जाती। तुम्हारी वही छोटी-छोटी अदाएँ, बेवजह की छेड़छाड़, और आ...

तुम्हारी छोटी-छोटी आदतें

  तुम्हारी छोटी-छोटी आदतें मुझे नहीं पता कि प्रेम कब शुरू होता है। शायद उस दिन नहीं, जब कोई पहली बार अच्छा लगता है; शायद उस दिन भी नहीं, जब दिल उसकी धड़कनों का हिसाब रखने लगता है। प्रेम तो शायद तब जन्म लेता है, जब किसी की छोटी-छोटी आदतें हमारी अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनने लगती हैं। तुम्हारी भी कुछ ऐसी ही आदतें हैं। बात करते-करते अचानक कहीं खो जाना, फिर जैसे ही मैं तुम्हें पुकारूँ, हल्की-सी मुस्कुराकर मेरी ओर देखना। कभी बेख़याली में अपनी ज़ुल्फ़ों को कान के पीछे सरका लेना, कभी चाय का प्याला दोनों हथेलियों में लेकर देर तक उसकी भाप को निहारते रहना। तुम्हें शायद ये सब बिल्कुल साधारण लगता होगा, लेकिन मुझे इन्हीं क्षणों में तुम्हारा सबसे सच्चा परिचय मिलता है। अजीब बात है, इंसान किसी के चेहरे का नहीं, उसकी आदतों का आदी हो जाता है। चेहरे समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन आदतें स्मृतियों में उसी तरह जीवित रहती हैं, जैसे किसी पुराने घर में अब भी किसी प्रिय की हँसी गूँजती हो। मैंने कभी तुम्हें बदलने की इच्छा नहीं की। तुम्हारी छोटी-सी ज़िद, तुम्हारी बेवजह की मुस्कान, बातों के बीच अचानक चुप हो जाने...

चिंतन -क्या मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष संसार से नहीं, अपने ही बने हुए स्वरूप से होता है?

  चिंतन - क्या मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष संसार से नहीं, अपने ही बने हुए स्वरूप से होता है? मनुष्य जब जन्म लेता है, तब उसके पास कोई परिचय नहीं होता। न कोई पद, न कोई प्रतिष्ठा, न कोई उपाधि। वह केवल एक संभावना होता है। धीरे-धीरे संसार उसे नाम देता है। परिवार उसे पहचान देता है। समाज उसे भूमिकाएँ देता है। और एक दिन वह स्वयं भी अपने बारे में एक कहानी बना लेता है। तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष संसार से नहीं, अपने ही बने हुए स्वरूप से होता है? हम सोचते हैं कि हमारा संघर्ष परिस्थितियों से है। प्रतिस्पर्धा से है। समय से है। भाग्य से है। पर यदि ध्यान से देखें, तो पाएँगे कि सबसे अधिक थकान हमें उन चेहरों को बचाने में होती है, जिन्हें हमने स्वयं गढ़ा है। हम एक छवि बना लेते हैं— "मैं हमेशा सफल दिखूँ।" "मैं कभी कमज़ोर न दिखाई दूँ।" "लोग मुझे असाधारण समझें।" फिर जीवन का बड़ा भाग उस छवि की रक्षा में बीत जाता है। मुझे लगता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा कारागार बाहर नहीं होता। वह उसके भीतर बना हुआ 'मैं कौन हूँ' का कठोर चित्र होता ...

चिंतन - क्या प्रेम का सर्वोच्च रूप सुख नहीं, सत्य है?

  चिंतन -  क्या प्रेम का सर्वोच्च रूप सुख नहीं, सत्य है? प्रेम की चर्चा होते ही मन में कोमलता, निकटता और आनंद के चित्र उभर आते हैं। हम प्रेम को प्रायः उस अनुभूति के रूप में देखते हैं, जो जीवन को सुंदर बना दे, अकेलेपन को भर दे और हृदय को प्रसन्न कर दे। पर तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या प्रेम का सर्वोच्च रूप सुख नहीं, सत्य है? सुख प्रेम का एक पुष्प हो सकता है, पर उसकी जड़ नहीं। यदि प्रेम केवल सुख देने के लिए हो, तो वह परिस्थितियों का बंदी बन जाएगा। जिस दिन सुख कम होगा, प्रेम भी डगमगाने लगेगा। पर जो प्रेम सत्य पर आधारित हो, वह सुख और दुःख दोनों में अपना प्रकाश बनाए रखता है। मुझे लगता है कि प्रेम का पहला दायित्व प्रसन्न करना नहीं, जगाना है। जो हमें हमारी दुर्बलताओं से परिचित न करा सके, वह केवल आकर्षण हो सकता है, प्रेम नहीं। जो हमारी भूलों पर केवल मुस्कुरा दे, पर हमें बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा न दे, वह साथ तो हो सकता है, साधना नहीं। सच्चा प्रेम कभी-कभी असुविधाजनक भी होता है। वह प्रश्न पूछता है। वह आईना दिखाता है। वह हमारी आत्मा को उसकी संभावनाओं का स्मरण कराता है। इ...

चिंतन - क्या मनुष्य अपने विचारों से अधिक, अपने प्रश्नों से पहचाना जाता है?

  चिंतन -  क्या मनुष्य अपने विचारों से अधिक, अपने प्रश्नों से पहचाना जाता है? जब हम किसी मनुष्य से मिलते हैं, तो सबसे पहले उसके विचार सुनते हैं। वह क्या मानता है, किसका समर्थन करता है, किसका विरोध करता है—इन सबके आधार पर हम उसके व्यक्तित्व का अनुमान लगाने लगते हैं। पर क्या मनुष्य की पहचान केवल उसके विचारों से होती है? तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या मनुष्य अपने विचारों से अधिक, अपने प्रश्नों से पहचाना जाता है? विचार समय के साथ बदलते रहते हैं। जो बात हमें बीस वर्ष की आयु में सत्य लगती थी, वह चालीस वर्ष की आयु में अधूरी प्रतीत हो सकती है। अनुभव, अध्ययन और जीवन, तीनों मिलकर विचारों को बदलते रहते हैं। पर प्रश्न... वे मनुष्य के भीतर बहुत गहराई से जन्म लेते हैं। वे उसकी जिज्ञासा का परिचय देते हैं। उसकी बेचैनी का। उसकी ईमानदारी का। जिस मनुष्य के प्रश्न छोटे हैं, उसका संसार भी प्रायः छोटा रह जाता है। और जिसके प्रश्न बड़े हैं, उसका जीवन उत्तर मिलने से पहले ही विस्तृत होने लगता है। मुझे लगता है कि सभ्यता का विकास उत्तरों से कम, प्रश्नों से अधिक हुआ है। यदि किसी ने यह न पूछा ह...