महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २७ - त्याग और संन्यास — कर्म छोड़ना या कर्तृत्व का अतिक्रमण?
महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २७ - त्याग और संन्यास — कर्म छोड़ना या कर्तृत्व का अतिक्रमण? कर्मयोग की चर्चा के बाद शान्तिपर्व एक अत्यन्त सूक्ष्म प्रश्न के सामने आता है—यदि कर्म करते हुए भी मनुष्य को फलासक्ति से मुक्त होना है, तो फिर त्याग और संन्यास का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या संन्यास का अर्थ कर्म से पूरी तरह हट जाना है? क्या गृह, राज्य, समाज और संबंधों को छोड़ देना ही त्याग है? या मनुष्य कर्म करता हुआ भी भीतर से उस बंधन से मुक्त हो सकता है जिसे कर्म अपने साथ लेकर आता है? यही वह बिन्दु है जहाँ शान्तिपर्व का मोक्षधर्म केवल बाहरी जीवन-व्यवस्था की चर्चा नहीं करता, बल्कि कर्तृत्व-बोध की जड़ तक पहुँचता है। मनुष्य सामान्यतः कहता है—“मैंने यह किया”, “मैंने यह पाया”, “मैंने यह खोया।” कर्म का बंधन केवल कर्म में नहीं, इस ‘मैं कर्ता हूँ’ की अनुभूति में भी छिपा रहता है। इसलिए बाहरी कर्म का त्याग और आन्तरिक कर्तृत्व-त्याग एक ही बात नहीं हैं। त्याग की पहली परीक्षा यदि कोई व्यक्ति अपने कर्मों को छोड़ दे, लेकिन मन में उनके प्रति आसक्ति बनी रहे, तो बाहरी परिवर्तन से भीतर का बंधन समाप्त नहीं होता...