संसारार्णव में देवताओं की देह-अन्वेषणा
ऐतरेयोपनिषद् के द्वितीय खण्ड, प्रथम मन्त्र पर शंकरभाष्य का दार्शनिक एवं शोधपूर्ण विवेचन
मन्त्र
ता एता देवताः सृष्टाः अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतन्।
तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जताम्।
ता एनमब्रुवन् — आयतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति॥१॥
पदच्छेद / संधि-विच्छेद
ताः एताः देवताः
सृष्टाः
अस्मिन् महति अर्णवे
प्रापतन्
तम् अशनाया-पिपासाभ्याम् अन्ववार्जताम्
ताः एनम् अब्रुवन्
आयतनम् नः प्रजानीहि
यस्मिन् प्रतिष्ठिताः
अन्नम् अदाम इति
अन्वय (गद्यक्रम)
ताः एताः देवताः ईश्वरेण सृष्टाः अस्मिन् महति अर्णवे प्रापतन्।
तम् अशनाया-पिपासाभ्याम् अन्ववार्जताम्।
ताः एनम् अब्रुवन् — “नः आयतनं प्रजानीहि, यस्मिन् प्रतिष्ठिताः वयम् अन्नम् अदाम” इति।
शब्दार्थ
देवताः — इन्द्रियों के अधिष्ठाता दैवी तत्त्व
महत्यर्णवे — महान् अर्णव में, संसार-सागर में
अशनाया — भूख
पिपासा — प्यास
आयतनम् — निवास-स्थान, शरीर, अधिष्ठान
प्रतिष्ठिताः — स्थित होकर, समर्थ होकर
अन्नम् अदाम — अन्न का भोग करें, अनुभव करें
भावार्थ
वे देवताएँ, जो ईश्वर द्वारा उत्पन्न की गयी थीं, इस महान् संसार-सागर में आ गिरीं। तब भूख और प्यास ने उन्हें घेर लिया। उन्होंने उस सृष्टिकर्ता से कहा— “हमारे लिए ऐसा आयतन (शरीर या अधिष्ठान) उत्पन्न कीजिए जिसमें स्थित होकर हम अन्न का अनुभव और भोग कर सकें।”
आदि शंकराचार्य का भाष्य (मूल संस्कृत)
ता एता अग्न्यादयो देवताः लोकपालत्वेन संकल्प्य सृष्टाः ईश्वरेण अस्मिन् संसारार्णवे निरालम्बे विषयेन्द्रियजनितसुखलवलक्षणविश्रामे पञ्चेन्द्रियार्थतृष्णामारुतविक्षोभोत्थितानर्थशतमहोर्मिमालिनि महारौरवाद्यनेकनिरयगतहाहेत्यादिकूजिताक्रोशनोद्भूतमहारवे सत्यार्जवदानदयाऽहिंसाशमदमाद्यात्मगुणपाथेयपूर्णज्ञानोपेतसत्सङ्गसर्वत्यागमार्गमोक्षतीरे महत्यर्णवे प्रापतन् पतितवत्यः।
तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जताम्।
ताः एनम् अब्रुवन् — आयतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिताः अन्नम् अदाम इति।
शंकभाष्य का हिंदी अनुवाद
शंकराचार्य कहते हैं कि अग्नि आदि देवताएँ, जिन्हें ईश्वर ने लोकपालों के रूप में उत्पन्न किया था, इस महा-संसार-सागर में आ गिरीं। यह संसार ऐसा अर्णव है जिसमें कोई स्थायी आश्रय नहीं; जहाँ विषय और इन्द्रियों से उत्पन्न सुख केवल क्षणिक विश्राम है। पाँच इन्द्रियों के विषयों की तृष्णा रूपी वायु से यह संसार-सागर निरन्तर उद्वेलित रहता है, और उसमें दुःखरूपी महान् तरंगें उठती रहती हैं।
यह संसार—
जन्म-मरण का क्षेत्र,
तृष्णा का प्रवाह,
दुःख का महासागर,
और निरन्तर आकांक्षाओं का कम्पन है।
इन देवताओं को भूख और प्यास ने घेर लिया। तब उन्होंने सृष्टिकर्ता से प्रार्थना की— “हमें ऐसा शरीर या अधिष्ठान दीजिए जिसमें स्थित होकर हम अन्न का अनुभव कर सकें।”
“देवताः” — उपनिषद् की दैवी शक्तियाँ
यहाँ “देवता” से अभिप्राय पौराणिक देवताओं से अधिक गहरा है। उपनिषद् में देवता cosmic functions हैं—
वाक् = अभिव्यक्ति की शक्ति
प्राण = जीवन-ऊर्जा
चक्षु = प्रकाश-ग्रहण शक्ति
श्रोत्र = ध्वनि-अनुभूति
मन = अन्तःचेतना
अतः देवता यहाँ universal cognitive powers हैं।
उपनिषद् मनुष्य को केवल जैविक सत्ता नहीं मानता; वह ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संगम है।
“महत्यर्णवे” — संसार-सागर का रहस्य
शंकराचार्य ने “महत्यर्णव” की अत्यन्त काव्यमय और दार्शनिक व्याख्या की है। संसार एक ऐसा महासागर है—
जिसमें तृष्णा की वायु चलती है,
दुःख की तरंगें उठती हैं,
विषय-सुख क्षणिक विश्राम देते हैं,
और जीव निरन्तर अस्थिरता में डूबा रहता है।
यह वर्णन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहन existential analysis है।
आधुनिक Existential Philosophy भी मनुष्य को एक असुरक्षित, अनिश्चित और अर्थ-खोजी सत्ता के रूप में देखती है। उपनिषद् इस स्थिति को “संसारार्णव” कहता है।
अशनाया और पिपासा — अस्तित्वगत भूख
“अशनाया” और “पिपासा” का अर्थ केवल जैविक भूख-प्यास नहीं है। यह जीवन की मूल अपूर्णता का प्रतीक है।
मनुष्य—
भोजन चाहता है,
अनुभव चाहता है,
प्रेम चाहता है,
ज्ञान चाहता है,
अमरता चाहता है।
अर्थात् चेतना निरन्तर किसी पूर्णता की खोज में है।
इस दृष्टि से भूख और प्यास existential longing हैं।
“आयतनम्” — embodiment की आवश्यकता
देवताओं ने “आयतन” माँगा। आयतन अर्थात्—
शरीर,
निवास,
अनुभव का माध्यम।
यहाँ उपनिषद् एक अत्यन्त आधुनिक प्रश्न उठाता है—
क्या चेतना बिना शरीर के अनुभव कर सकती है?
उपनिषद् का उत्तर है— अनुभव के लिए embodiment आवश्यक है।
इन्द्रियाँ बिना शरीर के अनुभव नहीं कर सकतीं। अतः चेतना को स्वयं को प्रकट करने हेतु रूप और संरचना चाहिए।
“अन्नम् अदाम” — अन्न की उपनिषदिक अवधारणा
यहाँ “अन्न” केवल भोजन नहीं है। उपनिषद् में अन्न सम्पूर्ण अनुभव-वस्तु (object of experience) का प्रतीक है।
जो देखा जाए,
जो सुना जाए,
जो भोगा जाए,
जो जाना जाए—
वह सब “अन्न” है।
इस प्रकार—
आत्मा = अनुभवकर्ता
इन्द्रियाँ = अनुभव के उपकरण
अन्न = अनुभव की वस्तु
यह subject-object relation की अत्यन्त सूक्ष्म उपनिषदिक व्याख्या है।
अद्वैत वेदान्त की स्थापना
Adi Shankaracharya इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को अद्वैत की दृष्टि से देखते हैं। देवता आत्मा से पृथक् स्वतंत्र सत्ता नहीं हैं। वे आत्मा की शक्तियाँ हैं।
अतः—
अनुभवकर्ता आत्मा,
अनुभव का माध्यम इन्द्रियाँ,
और अनुभव-वस्तु जगत्—
तीनों अन्ततः एक ही चेतना की विविध अवस्थाएँ हैं।
Consciousness Studies और Embodiment
आधुनिक Consciousness Studies यह प्रश्न उठाती है—
क्या चेतना शरीर से उत्पन्न होती है, या शरीर चेतना का उपकरण है?
यह मन्त्र दूसरे पक्ष की ओर संकेत करता है। यहाँ शरीर चेतना का expression-medium है।
आधुनिक embodied cognition theory भी यह मानती है कि अनुभव केवल मस्तिष्क का कार्य नहीं; सम्पूर्ण शरीर cognition में सहभागी होता है।
Phenomenology और Maurice Merleau-Ponty
Maurice Merleau-Ponty के अनुसार शरीर “lived body” है — चेतना का जीवित माध्यम।
उपनिषद् का “आयतनम्” इसी सत्य को आध्यात्मिक भाषा में व्यक्त करता है। चेतना को अनुभव हेतु embodiment चाहिए।
Comparative Philosophy
विश्व की अनेक दार्शनिक परम्पराओं में cosmic longing की अवधारणा मिलती है। Plato के दर्शन में आत्मा पूर्णता की ओर आकृष्ट होती है। बौद्ध दर्शन में “तृष्णा” संसार का कारण कही गयी है।
किन्तु उपनिषद् की विशेषता यह है कि वह इस तृष्णा के आधार में आत्मा की पूर्णता-खोज को देखता है।
अन्य उपनिषदों से सम्बन्ध
तैत्तिरीय उपनिषद् में अन्न को ब्रह्मरूप कहा गया है।
छान्दोग्य उपनिषद् में समस्त जगत् को “सत्” की अभिव्यक्ति कहा गया।
प्रश्न उपनिषद् में प्राण और इन्द्रियों के सम्बन्ध का सूक्ष्म विवेचन मिलता है।
ऐतरेयोपनिषद् इन सभी को एकीकृत कर चेतना और embodiment का अद्वितीय दर्शन प्रस्तुत करता है।
साधना एवं आत्मचिन्तन
यह मन्त्र साधक को अपनी इच्छाओं को केवल जैविक न मानकर चेतना की गहन खोज के रूप में देखने की प्रेरणा देता है।
ध्यान में साधक विचार कर सकता है—
“मैं वास्तव में क्या खोज रहा हूँ?”
“क्या मेरी भूख केवल शरीर की है?”
“क्या समस्त अनुभव आत्मा की पूर्णता-यात्रा है?”
यह चिन्तन witnessing awareness की ओर ले जाता है।
ऐतरेय उपनिषद् का यह मन्त्र मानव-अस्तित्व की अत्यन्त सूक्ष्म व्याख्या प्रस्तुत करता है। इन्द्रियाँ अनुभव के लिए शरीर की खोज करती हैं; भूख और प्यास अस्तित्वगत अधूरेपन का प्रतीक हैं; और embodied existence चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम है। शंकराचार्य इस संसार को तृष्णा और दुःख का महासागर बताते हुए यह स्थापित करते हैं कि आत्मा का ज्ञान ही वास्तविक आश्रय और मोक्ष का तट है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,