तुम्हारी याद और शाम का अकेलापन
शाम ढल रही है,
और खिड़की से आती हवा
थोड़ी ठंडी है।
तुम्हारी याद
धीरे-धीरे
कमरे में फैल रही है,
जैसे
अकेलापन भी
उसके साथ बैठ गया हो।
कोई आवाज़ नहीं,
सिर्फ़
दिल की हल्की-सी धड़कन
और तुम्हारी याद का
सुकून।
शाम अब
ख़ाली नहीं—
तुम्हारी याद
उसमें रह गई है।
मुकेश्,,,