पाणिनीय दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला भाग–१५ : शब्द से बोध तक — पाणिनीय परम्परा का दार्शनिक उत्कर्ष और समापन
पाणिनीय दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला भाग – १५ : शब्द से बोध तक — पाणिनीय परम्परा का दार्शनिक उत्कर्ष और समापन शोध - टिप्पणी पन्द्रह भागों की इस यात्रा का यह समापन - भाग है। यहाँ पाणिनि , पतञ्जलि और भर्तृहरि को एक ही दार्शनिक मत का प्रतिनिधि मानने के बजाय एक विकसित होती हुई व्याकरण - परम्परा के क्रम में देखा गया है। पाणिनि की अष्टाध्यायी मुख्यतः औपचारिक व्याकरणिक व्यवस्था है ; पतञ्जलि का महाभाष्य उसके भाषिक , प्रयोगात्मक और दार्शनिक प्रश्नों को विस्तार देता है ; और भर्तृहरि का वाक्यपदीय शब्द , वाक्य , अर्थ , बोध और सत्ता के प्रश्न को दार्शनिक ऊँचाई तक ले जाता है। अतः “ पाणिनीय दर्शन ” यहाँ किसी एक ग्रन्थ में प्रतिपादित दर्शन के अर्थ में नहीं , बल्कि पाणिनीय व्याकरण से विकसित दार्शनिक परम्परा के अर्थ में प्रयुक्त है। हमारी यात्रा कहाँ से आरम्भ हुई थी ? पन्द्रह भाग पहले हमारे सामने एक सरल - सा प्रश्न था — व्याकरण आखिर है क्या ? पहली दृष्टि ...