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Friday, 20 March 2026

रूह का अदृश्य विलय

 रूह का अदृश्य विलय


रात की तह में

एक धीमी-सी हरकत थी

जैसे कोई परछाईं

ख़ुद से ही अलग होकर

ख़ुद में ही लौट रही हो।


मैंने उसे “मैं” कहा

वो मुस्कुराई,

और बिना आवाज़

कहीं और फैल गई।


रूह

कभी जाती नहीं,

बस अपनी शक्ल बदलती है


कभी श्वास,

कभी सन्नाटा,

कभी एक अनदेखी रोशनी

जो आँख बंद करते ही

और साफ़ दिखती है।


मैंने तुम्हें

उस रोशनी में ढूँढा


पर वहाँ

कोई चेहरा नहीं था,

सिर्फ़ एक अहसास


जो

मुझे मुझसे

धीरे-धीरे

अलग कर रहा था।


सूफ़ी उसे

फ़ना कहता है

जहाँ “मैं”

एक गिरती हुई दीवार है।


और अद्वैत

उसे विलय

जहाँ दीवार कभी थी ही नहीं।


मैंने गिरना स्वीकार किया


पर गिरते हुए

कहीं ज़मीन नहीं मिली,

बस

एक असीम फैलाव—


जहाँ

हर दिशा

मुझसे ही शुरू होती थी

और मुझमें ही ख़त्म।


अब

मैं रूह नहीं रहा


न शरीर,

न नाम,

न कोई कहानी


बस एक

अनकहा-सा विस्तार हूँ,


जिसमें

तुम भी हो,

मैं भी


और वो भी

जो कभी अलग था ही नहीं।


रूह का अदृश्य विलय

कोई घटना नहीं,

एक स्मरण है

कि हम कभी बिछड़े ही नहीं थे।


मुकेश ,,,,,,

श्वास और शून्य के बीच

 श्वास और शून्य के बीच


श्वास आती है

जैसे कोई पुरानी याद

बिना दस्तक

अंदर उतर आती हो।


श्वास जाती है

जैसे कोई रिश्ता

धीरे-धीरे

अपने ही अर्थ से मुक्त हो रहा हो।


इन दोनों के बीच

एक बेहद महीन-सा ठहराव है,

जहाँ

न जीवन पूरी तरह है,

न मृत्यु पूरी तरह।


बस एक

अलिखित विराम।


मैंने उसी विराम में

तुम्हें ढूँढना चाहा


पर वहाँ “तुम” नहीं थीं,

न ही “मैं” था।


सिर्फ़

एक साक्षी

जो न देख रहा था,

न देखा जा रहा था।


सूफ़ी उसे

फ़ना का दरवाज़ा कहता है


जहाँ

हर पहचान

अपनी ही धूल में

गिर जाती है।


और अद्वैत

उसे ही

ब्रह्म का स्पर्श कहता है


जहाँ

कुछ भी अलग नहीं बचता।


मैं

हर श्वास के साथ

जन्म लेता हूँ,


और

हर निश्वास में

मर जाता हूँ


पर जो

इन दोनों के बीच है


वो न जन्मा,

न मरा।


वही

मेरा असली नाम है


जिसे मैं

कभी बोल नहीं पाया।


अब

मैं श्वास नहीं लेता


श्वास

मुझे लेती है,


और शून्य

मुझे

हर बार

पूरा कर देता है।


श्वास और शून्य के बीच

मैं नहीं,

सिर्फ़ “है” घटित होता है।


मुकेश ,

एक नज़्म उन मर्दों के नाम, जिन्हें उनकी मोहब्बत ने ठुकरा दिया

 एक नज़्म उन मर्दों के नाम, जिन्हें उनकी मोहब्बत ने ठुकरा दिया


वो मर्द…

जिन्हें उनकी मोहब्बत ने ठुकरा दिया,

मगर उन्होंने

मोहब्बत को ठुकराया नहीं।


उन्होंने रोया भी

मगर शोर नहीं किया,

आँखें भीगीं,

पर इज़हार नहीं किया।


वो मर्द…

जो टूटे,

मगर बिखरे नहीं—

जैसे कोई शीशा

अंदर ही अंदर दरक जाए,

और बाहर से

अब भी पूरा दिखाई दे।


उन्होंने

न ज़िन्दगी से मुँह मोड़ा,

न ज़िम्मेदारियों से,

न ही किसी के आगे

मोहब्बत की भीख माँगी।


बस एक अजीब-सी थसक थी उनमें

कि चाहेंगे भी

तो सिर उठाकर,

और ठुकराए जाएँगे भी

तो मुस्कुराकर।


वो मर्द…

जिन्होंने अपने जख़्म

किसी को दिखाए नहीं,

बस कभी-कभी

रात के सन्नाटे में

एक गिलास में

थोड़ी-सी ख़ामोशी घोल ली।


हाँ…

कभी शौक़ में शराब पी ली,

कभी सिगरेट जला ली

मगर ये आदत नहीं थी,

बस एक लम्हे की तसल्ली थी

जिसे वो सुबह होने से पहले

भुला देते थे।


कभी किसी अपने से

इशारों में कुछ कह भी दिया—

मगर आधी बात,

हमेशा आधी ही रही।


उनकी मोहब्बत…

अब भी वैसी ही थी—

बिना शिकवा,

बिना इल्ज़ाम,

बस थोड़ी-सी खामोश

और थोड़ी-सी दूर।


वो मर्द…

जो जानते थे

कि हर चाहत मुकम्मल नहीं होती,

फिर भी उन्होंने

चाहने का सलीक़ा नहीं छोड़ा।


और एक दिन

आईने में खुद को देखकर

हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—


“ठीक हूँ…”


जैसे ये दो लफ़्ज़

उनकी पूरी दास्तान हों।


(यह नज़्म हर उस मर्द के नाम,

जो ठुकराए जाने के बाद भी

अपनी थसक से जीता रहा।)


— मुकेश इलाहाबादी

मैं जंगल से बातें करता हूँ…

 मैं जंगल से बातें करता हूँ…

क्योंकि लोग सुनते नहीं,

और पेड़ बोलते नहीं

फिर भी सब कह देते हैं।


जब भीतर बहुत शोर होता है,

मैं यहाँ चला आता हूँ,

और अपनी ख़ामोशियाँ

इन पत्तों के हवाले कर देता हूँ।


हवा उन्हें हिलाती है

जैसे कोई जवाब

धीरे से सिर हिला रहा हो।


यहाँ

कोई सवाल नहीं करता,

कोई शक नहीं करता,

बस एक गहरी तन्हाई

मेरे साथ बैठ जाती है।


और तब समझ आता है

मैं जंगल से नहीं,

अपने ही अंदर उगे

एक सच से बातें कर रहा हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,,,


इश्क़ का बेकिनारा दरिया (एक और रंग)

 इश्क़ का बेकिनारा दरिया (एक और रंग)


इश्क़

एक ऐसा दरिया

जिसमें उतरते ही

अपने ही पैरों के निशान

डूब जाते हैं।


कोई किनारा नहीं,

कोई सहारा नहीं,

बस एक बहाव है

जो नाम लेकर नहीं,

रूह लेकर चलता है।


मैंने सोचा था

तैर लूँगा आसानी से,

पर ये पानी

हिसाब नहीं रखता

ये तो बस

डूबना सिखाता है।


अजीब है ये दरिया

जितना डूबो,

उतना हल्का कर देता है,

जितना खोओ,

उतना पा लेते हो।


और फिर एक पल आता है

जब समझ में आता है,

कि किनारे की तलाश ही

सबसे बड़ी दूरी थी…


क्योंकि इश्क़ में

मंज़िल नहीं होती,

सिर्फ़

बेकिनारा होना होता है।


मुकेश ,,,,,,,,

इश्क़ का बेकिनारा दरिया

 इश्क़ का बेकिनारा दरिया


इश्क़

एक दरिया है

जिसका कोई किनारा नहीं,

बस गहराई है

जो हर क़दम पर

और गहरी होती जाती है।


मैं उतरा था

बस पाँव भिगोने,

पर ये पानी

रूह तक उतर गया—

और अब लौटना

मुमकिन नहीं।


लहरें

कभी सहलाती हैं,

कभी डुबो देती हैं

पर हर डूब में भी

एक अजीब-सी राहत है।


यहाँ

कोई दिशा नहीं,

कोई मंज़िल नहीं,

सिर्फ़ बहना है

अपने ही वजूद से

दूर,

और शायद

किसी और के क़रीब।


इश्क़ का ये दरिया

डराता भी है,

बुलाता भी

और जो एक बार उतरे,

वो फिर

किनारे की ख़्वाहिश

भूल जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

सन्नाटे के शहर में जलता हुआ दिल

 सन्नाटे के शहर में जलता हुआ दिल


एक शहर है—

जहाँ शोर नहीं,

बस सन्नाटा दीवारों से टकराकर

वापस लौट आता है।


गलियाँ ख़ाली हैं,

दरवाज़े बंद,

और खिड़कियों में

कोई चेहरा नहीं ठहरता।


पर इसी वीराने में

एक दिल है

जो अब भी

चुपचाप जल रहा है।


न धुआँ उठता है,

न कोई चीख़,

बस एक धीमी-सी आँच

जो हर साँस के साथ

और गहरी हो जाती है।


अजीब है

इतनी ख़ामोशी के बीच भी

ये दिल

इतना बेचैन कैसे है?


शायद इसलिए

कि सन्नाटा

आवाज़ों को नहीं,

अंदर के शोर को

और साफ़ कर देता है।


और तब समझ में आता है

कि इस शहर में

सब कुछ बुझा हुआ नहीं है…


कहीं न कहीं

एक दिल अब भी

जल रहा है

और वही

इस सन्नाटे को

ज़िंदा रखे हुए है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,