शब्दयात्री : अधूरे ख़तों का संदूक
शब्दयात्री : अधूरे ख़तों का संदूक मेरे पास उसका कोई ख़त नहीं है। न कोई तस्वीर। न कोई निशानी। न कोई ऐसी चीज़ जिसे हाथ में लेकर मैं कह सकूँ—यह उसके होने का सबूत है। फिर भी अजीब बात है कि मेरे भीतर एक पूरा संदूक रखा है, जो उसी की चीज़ों से भरा हुआ है। जब मैं उसे खोलता हूँ तो उसमें काग़ज़ नहीं मिलते। उसमें अधूरे ख़त मिलते हैं। वे ख़त जो कभी लिखे ही नहीं गए। वे सवाल जो कभी पूछे नहीं गए। वे जवाब जो कभी मिले नहीं। वे विदाइयाँ जो कभी बोली नहीं गईं। और वे मुलाक़ातें जो शायद हो सकती थीं, लेकिन हुई नहीं। जीवन का बड़ा हिस्सा जो घटता है, वह नहीं होता जो हमारे साथ घट चुका है। वह होता है जो घट सकता था और नहीं घटा। वही सबसे लम्बे समय तक हमारे भीतर रहता है। मैं कभी-कभी उस संदूक के सामने बैठ जाता हूँ। उसका ढक्कन खोलता हूँ। और एक-एक करके वे अधूरे ख़त पढ़ने लगता हूँ। एक ख़त में मैंने उससे पूछा था कि वह अचानक क्यों चली गई। उस ख़त का जवाब कभी नहीं आया। दूसरे ख़त में मैंने उसे बताया था कि उसके जाने के बाद मेरे दिनों का रंग बदल गया है। वह ख़त भी कभी भेजा नहीं गया। एक और ख़त था जिसम...