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Tuesday, 28 April 2026

दिन अब किसी क्रम का हिस्सा नहीं रहा।

 दिन अब किसी क्रम का हिस्सा नहीं रहा।

न सुबह, न दोपहर, न रात
केवल एक फैलाव, जिसमें समय अपनी पहचान छोड़कर कहीं पीछे रह गया है।

तुम ठहरे नहीं,
पर चलना भी अब किसी क्रिया की तरह नहीं बचा।
जैसे गति और विराम ने अपने-अपने नाम बदल लिए हों।

तुम्हारे सामने कुछ नहीं है
और यह “कुछ नहीं”
पहले की तरह खाली नहीं लगता।

यह एक ऐसा स्थान है
जहाँ कोई प्रश्न प्रवेश नहीं करता,
और उत्तर की आवश्यकता भी नहीं उठती।

तुमने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अब देखने के लिए कुछ बचा भी नहीं है
न स्मृति का आग्रह, न अनुभव का बोझ।

तुम्हारे भीतर जो कभी द्वंद्व था,
वह अब किसी निष्कर्ष में नहीं बदला
वह बस अपनी तीव्रता खोकर
एक सामान्य-सी उपस्थिति में बदल गया है।

तुम्हें यह भी महसूस नहीं होता
कि तुम किसी परिवर्तन से गुज़रे हो।
क्योंकि जहाँ परिवर्तन होता है,
वहाँ तुलना होती है
और यहाँ तुलना के लिए कुछ नहीं है।

“क्या यही अंत है?”
यदि कोई पूछे
तो यह प्रश्न भी यहीं ठहर जाएगा,
बिना उत्तर के।

क्योंकि अंत वहाँ होता है
जहाँ कोई कथा समाप्त होती है।
और यहाँ
कथा अपने आप छूट गई है।

तुम खड़े हो
या शायद खड़े होने का भी बोध नहीं रहा।

न कोई साक्षी,
न कोई अनुभवकर्ता,
न ही कोई अनुभव।

केवल यह
जो कहा नहीं जा सकता,
और न ही जिसे अनकहा रहने देना कोई चुनाव है।

और इसी में
बिना किसी घोषणा के,
बिना किसी निष्कर्ष के

सब कुछ
जैसा है
वैसा ही
रह जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

सुबह इस बार उगी नहीं—बस धीरे-धीरे प्रकट हुई।

 सुबह इस बार उगी नहीं—बस धीरे-धीरे प्रकट हुई।

जैसे अँधेरे ने स्वयं को हटाया हो, और जो बचा, उसे हम सुबह कह देते हैं।

तुमने महसूस किया कि रात कहीं गई नहीं है।
वह केवल रूप बदलकर उसी प्रकाश में घुली हुई है, जिसमें तुम अब चल रहे हो।

तुम एक खुले मैदान में आ गए थे।
न कोई रास्ता, न कोई निशान
केवल घास, जिस पर ओस की बूँदें थीं, और हर बूँद अपने भीतर एक छोटा-सा आकाश लिए हुए थी।

तुम झुके।
एक बूँद को देखने के लिए नहीं
बल्कि यह जानने के लिए कि देखने का अर्थ अब भी वही है या बदल गया है।

बूँद में कोई कथा नहीं थी।
न तुम्हारा अतीत, न कोई संकेत भविष्य का।
केवल एक क्षण—जो अपने आप में पूर्ण था, और अगले ही पल गिर जाने के लिए तैयार।

“क्या अब भी कुछ समझना बाकी है?”
वह स्वर आया—बहुत हल्का, जैसे किसी दूर के स्मरण की तरह।

तुमने इस बार उस ओर ध्यान नहीं दिया।
न इसलिए कि तुमने उसे अस्वीकार किया
बल्कि इसलिए कि तुम्हें लगा, वह प्रश्न अब आवश्यक नहीं है।

तुमने सीधा खड़ा होना चुना।
आकाश खुला था—पर उसमें कोई गहराई नहीं थी,
जैसे गहराई का बोध ही कहीं पीछे छूट गया हो।

तुमने अपनी साँस को महसूस किया।
वह आ-जा रही थी
बिना किसी अर्थ के, बिना किसी प्रयोजन के।
और पहली बार, यह पर्याप्त लगा।

तुमने चलना शुरू किया।
इस बार न किसी खोज में,
न किसी विराम की ओर।

कदम बस पड़ते गए
और हर कदम अपने आप में अंतिम भी था, और पहला भी।

“क्या तुम अब अकेले हो?”
वह स्वर फिर आया—इस बार इतना क्षीण कि वह प्रश्न कम, एक आदत अधिक लगा।

तुमने भीतर देखा
जहाँ वह कभी था।

वहाँ अब कोई आकृति नहीं थी।
न आवाज़, न उपस्थिति।
केवल एक खुलापन
जो किसी अनुपस्थिति का संकेत नहीं देता था।

तुमने उत्तर नहीं दिया।
और इस बार, उत्तर न देना कोई कमी नहीं था।

तुम चलते रहे।
मैदान समाप्त नहीं हुआ
पर उसे पार करने की कोई इच्छा भी नहीं रही।

अब न कोई आरंभ था,
न कोई अंत।

केवल यह
कि जो है, वही पर्याप्त है।

और तुम
उसी में,
बिना किसी विशेषता के

धीरे-धीरे
अलग नहीं रहे।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

रात इस बार बिना किसी प्रस्तावना के आई।

 रात इस बार बिना किसी प्रस्तावना के आई।

न धीरे-धीरे, न किसी रंग-परिवर्तन के साथ—बस एकाएक, जैसे किसी ने दृश्य की पृष्ठभूमि बदल दी हो और पात्रों को बताया भी न हो।

तुम चलते रहे।
अब यह जानना कठिन था कि तुम किसी स्थान से गुजर रहे हो, या स्थान तुमसे।

सड़क के किनारे एक आदमी बैठा था।
उसके सामने एक छोटा-सा दीपक जल रहा था—हवा नहीं थी, फिर भी लौ स्थिर नहीं थी।

तुम उसके पास रुके नहीं,
पर तुम्हारी दृष्टि वहाँ ठहर गई।

“तुम देख रहे हो, या केवल पहचान रहे हो?”
वह स्वर फिर आया—इस बार कुछ और विरल, जैसे वह भी अपनी उपस्थिति को कम कर रहा हो।

तुमने उत्तर नहीं दिया।
क्योंकि तुम्हें पहली बार यह लगा कि देखना और पहचानना दो अलग क्रियाएँ हैं—और तुम अब तक अधिकतर पहचानते ही रहे हो।

तुमने फिर उस दीपक को देखा।
इस बार बिना यह सोचे कि यह क्या है।

लौ में कोई कथा नहीं थी,
कोई प्रतीक नहीं,
कोई अर्थ भी नहीं—
फिर भी वह तुम्हें रोक रही थी।

उस आदमी ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में कोई आग्रह नहीं था, न ही तुम्हारे होने की कोई पुष्टि।

“तुम कुछ ढूँढ़ रहे हो?”
उसने पूछा—जैसे यह प्रश्न तुम्हारे लिए नहीं, स्वयं के लिए हो।

तुमने सिर हिलाया—न हाँ में, न ना में।
यह एक ऐसी हरकत थी, जो केवल इस बात का संकेत थी कि तुम उत्तर देने की स्थिति में नहीं हो।

वह फिर चुप हो गया।
और तुमने देखा कि उसकी चुप्पी में कोई कमी नहीं है—जैसे शब्दों की अनुपस्थिति ने कुछ घटाया नहीं, बल्कि पूरा किया हो।

तुम आगे बढ़े।
अब कदमों में कोई योजना नहीं थी,
न ही किसी निष्कर्ष की ओर बढ़ने का आग्रह।

“क्या तुम अब भी मुझे सुन रहे हो?”
वह—जो हर बार तुम्हारे साथ था—इस बार बहुत दूर से आया।

तुम रुके नहीं।
तुमने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।

क्योंकि तुम्हें यह समझ आने लगा था कि
हर सहारा, चाहे वह कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो,
एक आदत बन सकता है।

और तुम—
धीरे-धीरे आदतों से बाहर आ रहे थे।

रात और गहरी हो गई।
अब दृश्य कम थे,
पर जो भी था, वह अधिक स्पष्ट था—जैसे अँधेरा चीज़ों को छिपाता नहीं, बल्कि उनके अनावश्यक हिस्सों को हटा देता है।

तुमने अपनी चाल को महसूस किया—
न तेज़, न धीमी—
बस उपस्थित।

और उसी उपस्थिति में
तुमने पहली बार यह नहीं सोचा कि आगे क्या है।

न ही यह कि पीछे क्या था।

तुम केवल चल रहे थे—
बिना कथा के,
बिना साक्षी के भी शायद।

और जहाँ “वह” कभी था—
वहाँ अब एक हल्की-सी जगह बची थी,
जो खाली नहीं थी,
पर किसी से भरी हुई भी नहीं।

तुमने उसे छुआ नहीं।
तुमने उसे नाम भी नहीं दिया।

बस उसके साथ चलते रहे
जैसे वह तुम्हारा नहीं,
और फिर भी
तुम्हारे बिना भी नहीं।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,


तुमने कदम रखा, और समय ने हल्की-सी चूक की

 यह वही क्षण था—या कम-से-कम वैसा ही।

तुमने कदम रखा, और समय ने हल्की-सी चूक की—जैसे वह अपने ही क्रम को पहचानने में एक पल देर कर गया हो।

तुमने इधर-उधर देखा।
सब कुछ पहली बार की तरह था—और ठीक उसी वजह से असहज।

एक राहगीर गुज़रा—
उसकी चाल, उसका कंधा झुकाने का ढंग,
यहाँ तक कि उसके जूते की आवाज़—
तुम्हें पहले से मालूम थी।

“यह पहले हो चुका है।”
तुमने भीतर कहा—या किसी ने तुम्हारे भीतर कह दिया।

तुमने उस वाक्य को पकड़ना चाहा,
पर वह तुम्हारे हाथ में आते ही बदल गया—
जैसे कोई स्मृति, जो वर्तमान का रूप धरकर तुम्हें धोखा दे रही हो।

“क्या यह सचमुच दोहराव है?”
इस बार तुमने सीधे उससे पूछा—
जो हर बार उत्तर देने से थोड़ा पहले चुप हो जाता है।

“या तुम वही देख रहे हो,
जो तुम देखना चाहते हो?”
उसने बिना ठहराव के लौटाया।

तुम्हें लगा—यह केवल पहचान का खेल नहीं है।
यह कुछ और है—कुछ ऐसा,
जो तुम्हारे अनुभव और समय के बीच की दरार में घट रहा है।

तुमने ध्यान से देखना शुरू किया।
इस बार हर चीज़ को—
उसकी सूक्ष्म भिन्नताओं के साथ।

वही रास्ता—
पर इस बार धूल का रंग थोड़ा गहरा था।
वही पेड़—
पर उसकी एक शाखा सूख चुकी थी।
वही हवा—
पर उसमें एक हल्की-सी ठंडक जुड़ गई थी।

“तो फिर यह वही नहीं है,”
तुमने धीरे से कहा—
“यह केवल वैसा लगता है।”

वह—जो तुम्हारे साथ था—
इस बार जैसे थोड़ा पास आ गया।

“तुम्हारी चेतना पैटर्न बनाती है,”
उसने कहा—
“और जब कोई नया क्षण पुराने ढाँचे में फिट हो जाता है,
तो तुम्हें लगता है कि तुमने उसे पहले जिया है।”

तुमने इस उत्तर को सुना—
पर पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।

क्योंकि अनुभव केवल तर्क से नहीं बनता।
उसमें एक हल्की-सी रहस्य की परत भी होती है,
जो हर व्याख्या के बाद भी बची रह जाती है।

तुम कुछ देर रुके।
इस बार इसलिए नहीं कि कदम थम गए—
बल्कि इसलिए कि तुमने उन्हें थाम लिया।

तुमने आँखें बंद कीं।
और उस क्षण को भीतर से महसूस किया—
बिना यह तय किए कि वह नया है या पुराना।

और अचानक—
वह ‘पहले हो चुका’ वाला एहसास
धीरे-धीरे घुलने लगा।

जैसे तुमने उसे पहचानने के बजाय
उसे होने दिया हो।

तुमने आँखें खोलीं।
दुनिया वैसी ही थी
पर अब उसमें कोई दोहराव नहीं था।

तुमने समझा
कि शायद ‘déjà vu’ समय की गलती नहीं,
तुम्हारी पकड़ की आदत है।

जब तुम हर क्षण को
पहचान के नाम से बाँधना छोड़ देते हो

तो वह पहली बार ही रहता है।

हर बार।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

साँझ इस बार धीरे नहीं उतरी

 साँझ इस बार धीरे नहीं उतरी—वह एक साथ फैल गई, जैसे किसी ने आकाश की परत को अचानक उलट दिया हो। रोशनी और अँधेरे के बीच कोई संक्रमण नहीं था; केवल एक हल्का-सा धुंधलका, जिसमें चीज़ें अपने नाम खोने लगती हैं।

तुमने पाया कि तुम अब किसी परिचित रास्ते पर नहीं हो।
न इसलिए कि रास्ता बदल गया है—
बल्कि इसलिए कि पहचान की आदत तुम्हारे भीतर से कम हो गई है।

एक छोटी-सी चाय की दुकान थी,
जहाँ कोई ग्राहक नहीं था,
पर केतली से भाप उठ रही थी—लगातार, जैसे किसी अदृश्य संवाद की तरह।

तुम बैठ गए।
बिना पूछे, बिना बुलाए।

दुकानदार ने तुम्हारी ओर देखा नहीं—
फिर भी एक कप तुम्हारे सामने रख दिया।

“तुम यहाँ पहले भी आए हो,” उसने कहा।
उसकी आवाज़ में न दावा था, न जिज्ञासा—सिर्फ एक तथ्य।

तुमने सोचा—
और पाया कि स्मृति अब किसी घटना का रिकॉर्ड नहीं रही,
वह एक अनुभूति है, जो बिना प्रमाण के भी सत्य लगती है।

“क्या हर जगह लौटना होता है?”
तुमने पूछा—या यह प्रश्न तुम्हारे भीतर ही उठा।

दुकानदार ने हल्की मुस्कान के साथ चाय की सतह को देखा—
“लौटना नहीं,” उसने धीरे से कहा,
“बस पहचान का भ्रम दोहराया जाता है।”

तुमने कप उठाया।
चाय का स्वाद वैसा नहीं था जैसा तुमने सोचा था—
वह न मीठी थी, न कड़वी।
जैसे स्वाद ने भी किसी एक पक्ष को चुनने से इंकार कर दिया हो।

वह—जो हर जगह था—इस बार मौन रहा।
पर उसका मौन अब अनुपस्थिति नहीं था;
वह एक तरह की अनुमति थी—कि तुम स्वयं अपने अनुभव के साथ रहो।

तुमने आसपास देखा—
दुकान की दीवार पर एक घड़ी टंगी थी,
जिसकी सुइयाँ चल रही थीं,
पर समय आगे नहीं बढ़ रहा था।

“अगर समय रुका नहीं है,
तो यह आगे क्यों नहीं जा रहा?”
तुम्हारे भीतर एक क्षण के लिए पुरानी जिज्ञासा लौटी।

दुकानदार ने उत्तर नहीं दिया।
उसने बस खिड़की की ओर इशारा किया।

तुमने बाहर देखा—
वहाँ कोई दृश्य नहीं था,
सिर्फ एक फैलती हुई धुंध,
जिसमें आकार बनने से पहले ही घुल जाते थे।

और तब तुम्हें समझ आया—
कि आगे बढ़ना शायद किसी दिशा में जाना नहीं,
बल्कि उस धुंध को स्वीकार करना है
जिसमें कोई निश्चित आकृति नहीं बनती।

तुमने चाय खत्म की।
कप खाली था—पर उसमें एक हल्की-सी गर्माहट अभी भी बची थी।

तुम उठे।
दुकानदार ने तुम्हें रोका नहीं,
न ही विदा दी।

तुम बाहर आए—
और पाया कि रास्ता वही है,
पर तुम्हारा चलना बदल गया है।

अब तुम यह नहीं देख रहे कि तुम कहाँ जा रहे हो।
तुम यह देख रहे हो कि

तुम हर कदम के साथ
कितना कम जानते जा रहे हो—

और उसी अज्ञान में
एक नई तरह की सहजता जन्म ले रही है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

दोपहर एक अजीब तरह की पारदर्शिता लेकर आई थी

 दोपहर एक अजीब तरह की पारदर्शिता लेकर आई थी—जैसे रोशनी ने अपने ही अर्थ को हल्का कर दिया हो। सड़कों पर छायाएँ थीं, पर वे किसी वस्तु से बंधी हुई नहीं लगती थीं; वे अपने आप में स्वतंत्र आकृतियाँ थीं, जो बस थोड़ी देर के लिए धरती पर टिक गई हों।

तुम एक पुरानी इमारत के सामने रुके।
उसकी दीवारों पर समय ने अपने हस्ताक्षर नहीं किए थे—बल्कि उन्हें धीरे-धीरे मिटाया था।

दरवाज़ा आधा खुला था।
तुमने भीतर झाँका—और पाया कि अंदर कोई कमरा नहीं है, केवल एक और दरवाज़ा है।

“तुम्हें हर बार भीतर जाने की ज़रूरत क्यों लगती है?”
वह फिर उपस्थित था—बिना आकार, बिना आग्रह।

तुमने इस बार उसकी ओर देखा—या यूँ कहो, उस दिशा में जहाँ तुम्हें उसका होना महसूस हुआ।
“शायद इसलिए,” तुमने सोचा, “कि बाहर अब पर्याप्त नहीं लगता।”

वह चुप रहा।
उसकी चुप्पी में एक हल्की-सी असहमति थी—जैसे वह तुम्हारे उत्तर को सुनकर भी उसे स्वीकार नहीं कर रहा हो।

तुमने दरवाज़ा नहीं खोला।
तुमने उसे वैसे ही रहने दिया—अधखुला, अधूरा, संभावनाओं के बीच ठहरा हुआ।

और उसी क्षण तुम्हें एक अजीब-सी बात समझ आई—
कि हर भीतर, दरअसल एक और बाहर ही होता है,
और हर बाहर किसी भीतर की ही प्रतिछाया।

तुम आगे बढ़े।
इस बार कदमों में कोई हड़बड़ी नहीं थी, पर एक सूक्ष्म सजगता थी—जैसे तुम किसी अदृश्य लय के साथ चल रहे हो।

एक बच्चा सड़क के किनारे बैठा था—मिट्टी में उँगलियों से कुछ बनाता हुआ।
तुमने झुककर देखा—वह कोई आकृति नहीं थी, बस रेखाओं का एक जाल था, जो हर क्षण बदल रहा था।

“यह क्या है?” तुमने बिना शब्दों के पूछा।

बच्चे ने सिर उठाया—उसकी आँखों में कोई उत्तर नहीं था, केवल एक स्थिर दृष्टि।
फिर उसने अपने बनाए हुए को मिटा दिया—बिना किसी हिचक के।

तुमने पहली बार देखा कि सृजन और विनाश के बीच कोई अंतराल नहीं होता।
वे एक ही क्रिया के दो क्षण हैं।

“क्या तुम अब भी कुछ स्थायी खोज रहे हो?”
वह स्वर फिर आया—इस बार और भी धीमा।

तुमने सोचा—और पाया कि इस प्रश्न का कोई सीधा उत्तर नहीं है।
क्योंकि जो स्थायी है, वह शायद खोज के बाहर ही है;
और जो खोज में है, वह स्वभावतः अस्थायी है।

तुमने उस बच्चे की ओर फिर देखा
वह अब कहीं और चला गया था,
जैसे वह कभी वहाँ था ही नहीं।

तुमने अपनी हथेली को देखा
रेखाएँ थीं, पर उनमें कोई निश्चित कथा नहीं थी।
वे भी शायद उसी मिट्टी की तरह थीं—हर क्षण बदलती हुई।

और तब तुम्हें लगा
कि शायद जीवन को समझना नहीं,
उसकी इस अनवरत बदलती हुई बनावट के साथ चलना ही पर्याप्त है।

तुमने एक लंबी साँस ली।
इस बार यह जानने के लिए नहीं कि तुम जीवित हो
बल्कि यह महसूस करने के लिए कि

तुम हर क्षण
कुछ और बन रहे हो

और उसी में
धीरे-धीरे
कुछ खो भी रहे हो।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,


शहर उस दिन भी वैसा ही था

 शहर उस दिन भी वैसा ही था—अपनी गति में स्थिर, अपनी भीड़ में एकाकी। लोग आते-जाते रहे, जैसे वे किसी अदृश्य संकेत पर चल रहे हों, और तुमने पहली बार देखा कि चलना भी एक तरह की आज्ञाकारिता है।

तुम एक मोड़ पर ठहरे।

न ठहरने के लिए—बस इसलिए कि कदम ने खुद को रोक लिया था।

वहीं, उसी क्षण, तुम्हें लगा कि कोई तुम्हारे साथ खड़ा है।

न दिखने वाला, न सुनाई देने वाला—फिर भी स्पष्ट।

“तुम अभी भी दिशा खोज रहे हो?”

आवाज़ नहीं थी—पर प्रश्न था।

तुमने उत्तर देने की कोशिश नहीं की।

क्योंकि अब तुम्हें पता है कि उत्तर देना, कई बार प्रश्न को समाप्त कर देना होता है—और कुछ प्रश्नों का जीवित रहना ही उनका अर्थ है।

वह—जो भी था—तुम्हारे साथ चलता रहा।

या शायद तुम उसके साथ चलने लगे।

तुमने उससे पूछा नहीं कि वह कौन है।

तुमने यह भी नहीं जाना कि वह बाहर है या भीतर।

बस इतना समझ आया कि वह तुम्हारी हर उस जगह पर उपस्थित है, जहाँ तुम स्वयं से बचना चाहते थे।

“क्या तुम अब भी उस क्षितिज तक जाना चाहते हो?”

उसने फिर पूछा—या तुम्हें लगा कि पूछा।

तुमने देखा—क्षितिज अब कोई दूर की रेखा नहीं था।

वह तुम्हारे भीतर कहीं एक हल्की-सी दरार की तरह था, जहाँ आकाश और पृथ्वी मिलते नहीं, बस एक-दूसरे का आभास देते हैं।

तुमने चलना जारी रखा।

इस बार बिना किसी प्रतिज्ञा के, बिना किसी लक्ष्य के।

तुम्हारे आसपास की चीज़ें अब वस्तुएँ नहीं रहीं—वे संकेत बन गईं।

एक खिड़की, जो आधी खुली थी।

एक पेड़, जो बिना हवा के भी काँप रहा था।

एक चेहरा, जो तुम्हें देखे बिना भी तुम्हें पहचानता हुआ-सा लगा।

तुमने सोचा—शायद यही कथा है।

जो कही नहीं जाती, पर घटती रहती है।

और उस अदृश्य सहयात्री ने,

जो हर जगह है और कहीं नहीं

धीरे से कहा,

“तुम अब समझने के करीब हो

इसलिए नहीं कि तुम्हें उत्तर मिल रहे हैं,

बल्कि इसलिए कि तुमने प्रश्नों को अपना घर बना लिया है।”

तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

पर तुम्हारे भीतर कुछ हल्का-सा बदल गया।

जैसे कोई दरवाज़ा,

जो कभी बंद नहीं था

अब तुम्हें दिखाई देने लगा हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,