तुम्हारी याद और जामुन की कच्ची मिठास
तुम्हारी याद…
सीधी नहीं आती,
वो भीतर कहीं
धीरे-धीरे घुलती है
जैसे जामुन का पहला कौर
जिसमें मिठास से पहले
एक हल्की-सी कसक होती है।
वो कसक…
जो जीभ पर नहीं,
दिल के किसी कोने में उतरती है।
तुम्हें याद करना
कोई घटना नहीं है,
ये एक स्वाद है
जो अचानक
बिना बुलाए
मुंह में भर जाता है।
पहले हल्का-सा खट्टापन,
फिर
एक अधूरी-सी मिठास,
और उसके बाद
एक रंग—
जो देर तक
छूटता नहीं।
तुम्हारी याद में
कोई शोर नहीं है,
न कोई पुकार
बस एक धीमी-सी उपस्थिति,
जो हर चीज़ के किनारे
लगी रहती है।
जैसे गर्मी की दोपहर में
पेड़ के नीचे
गिरे हुए जामुन,
जिन्हें कोई उठा नहीं रहा,
पर उनकी गंध
हवा में बनी हुई है।
कभी-कभी
मैं खुद को रोकता हूँ
तुम्हें याद करने से
पर यादें
रोकने से नहीं रुकतीं,
वो तो बस
और गहरी हो जाती हैं।
जैसे जामुन का रंग
हाथों पर चढ़कर
धीरे-धीरे
त्वचा में उतरता है।
तुम्हारे जाने के बाद
कुछ भी पूरी तरह कड़वा नहीं रहा,
और कुछ भी
पूरी तरह मीठा भी नहीं।
हर चीज़ में
थोड़ी-सी तुम हो
और थोड़ी-सी
तुम्हारी कमी।
तुम्हारी याद…
अब कोई चेहरा नहीं रही,
न कोई आवाज़—
बस एक स्वाद है,
जो कभी खत्म नहीं होता,
बस बदलता रहता है
खट्टे से मीठे में,
मीठे से
फिर उस अजीब-सी कसैलापन में
जिसका कोई नाम नहीं।
और मैं…
हर बार
उसी स्वाद को चखता हूँ,
जैसे कोई
जान-बूझकर
कच्चा जामुन खा ले
ये जानते हुए भी
कि उसके बाद
प्यास और बढ़ेगी।
मुकेश ,,,,