होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Thursday, 4 June 2026

अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

 अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

तो लगता है

मैं प्रकाश की तलाश में नहीं था

मैं तो केवल

अपने भीतर के उस व्यक्ति को खोज रहा था

जो हर रोशनी के बाद भी

अधूरा रह जाता था

और हर अँधेरे के बाद भी

पूरी तरह समाप्त नहीं होता था।

शायद वही मैं था

और शायद वही

मेरे सारे शब्दों से परे था।

मुकेश ,,,,,,,,,,

एक समय ऐसा भी आया

 एक समय ऐसा भी आया

जब मैंने अंधकार से लड़ना छोड़ दिया

उसे समझने की कोशिश की

तब जाना

कि वह कोई शत्रु नहीं था

वह मेरी ही एक भूली हुई आकृति थी

जो वर्षों से

मेरे दरवाज़े पर बैठी थी

और मैं उसे पहचानने के बजाय

उससे बचता रहा।

मुकेश ,,,,,,,,,,

मेरे भीतर एक कमरा था

 मेरे भीतर एक कमरा था

जिसकी खिड़की हमेशा बंद रही

मैंने उसके बाहर बगीचे बनाए

चित्र टाँगे

दीपक जलाए

मगर खिड़की नहीं खोली

क्योंकि मुझे भय था

कि यदि वह खुल गई

तो जो हवा भीतर आएगी

वह मेरे सारे सजाए हुए अर्थ

उड़ा ले जाएगी।


मुकेश ,,,,,,,,,,

मैंने बहुत समय तक सोचा

 मैंने बहुत समय तक सोचा

कि मेरा दुख लोगों से आया है

उनसे जो चले गए

उनसे भी जो रुके रहे

फिर एक दिन जाना

दुख का सबसे पुराना स्रोत

कोई मनुष्य नहीं होता

वह वह जीवन होता है

जिसे हम जी सकते थे

मगर नहीं जी पाए।

मुकेश ,,,,,,,,,,


कुछ घाव ऐसे थे

 कुछ घाव ऐसे थे

जिन्हें मैंने कभी छिपाया नहीं

उन्हें दिखाता रहा लोगों को

उन पर कविताएँ लिखीं
उनके बारे में बातें कीं

मगर जो सबसे गहरा घाव था

उसकी ओर मैं स्वयं भी नहीं देखता था

वह किसी चोट की तरह नहीं

एक अनुपस्थिति की तरह था

जैसे जीवन में कुछ होना चाहिए था

और वह कभी हुआ ही नहीं।

मुकेश ,,,,,,,,,,

मैंने अपने भीतर उतरने की कई बार कोशिश की

 मैंने अपने भीतर उतरने की कई बार कोशिश की

हर बार कुछ दूर जाकर लौट आया

वहाँ कोई राक्षस नहीं था
कोई भयावह स्मृति भी नहीं

फिर भी एक झिझक थी

जैसे कोई आदमी
बरसों बाद अपने ही पुराने घर में प्रवेश करे

और उसे डर हो

कि कहीं दीवारें
उसे पहचान न लें।

मुकेश ,,,,,,,,,,

जो कुछ मैंने लिखा

 जो कुछ मैंने लिखा

वह मेरे होने का प्रमाण नहीं था

वह केवल उन जगहों का नक्शा था

जहाँ-जहाँ मैं नहीं पहुँच पाया

मेरी कविताएँ
मेरे उत्तर नहीं थीं

वे उन प्रश्नों की राख थीं

जो बहुत देर तक जलते रहे

और जिनकी आग

आज भी कहीं
मेरे मौन में बची हुई है।

मुकेश ,,,,,,,,,,