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Wednesday, 22 April 2026

बरसात में भुट्टा बेचती औरत - एक शब्द चित्र

 बरसात में भुट्टा बेचती औरत - एक शब्द चित्र 

1

बरसात की बूँदें

धीरे-धीरे गिर रही हैं,

और वो अंगीठी के पास

भुट्टे सेंक रही है।

2

धुएँ में

उसका चेहरा आधा छिपा है,

आँखों में

एक सीधी-सी चमक।

3

भुट्टा आग पर घूमता है,

और उसकी उँगलियाँ

आदत से

हर दाना पहचानती हैं।

4

कुछ पुरुष

भुट्टा लेने के बहाने रुकते हैं,

नज़रें भुट्टे पर कम,

उस पर ज़्यादा ठहरती हैं।

5

वो समझती है,

पर अनदेखा करती है—

जैसे ये भी

रोज़ का हिस्सा हो।

6

लड़कियाँ हँसती हुई कहती हैं,

“थोड़ा और नमक…

नींबू भी ज़्यादा लगाओ।”

7

वो मुस्कुराकर

भुट्टे को पत्ते में लपेटती है,

नमक-मिर्च की खुशबू

बारिश में घुल जाती है।

8

हाथ तेज़ हैं उसके,

पर चाल में

एक थकी हुई ठहराव।

9

कोई मोबाइल बढ़ाता है,

वो QR कोड दिखा देती है,

और कुछ सिक्के

चुपचाप बोरी के नीचे सरका देती है।

10

बारिश, धुआँ, और भीड़

सबके बीच

वो खड़ी है

अपने छोटे-से संसार के साथ।

11

उसकी हथेलियों में

गर्म भुट्टा है,

और आँखों में

ठंडी समझदारी।

12

बरसात में भुट्टा बेचती औरत

सिर्फ़ स्वाद नहीं देती,

थोड़ी-सी ज़िंदगी

भी थमा जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

अधखुला दरवाज़ा

 अधखुला दरवाज़ा

1

अधखुला दरवाज़ा

जैसे कोई बात

पूरी कही नहीं गई।

2

एक तरफ़ रोशनी है,

दूसरी तरफ़ साया

बीच में

एक झिझक ठहरी है।

3

हवा धीरे से

अंदर-बाहर होती है,

जैसे आने-जाने का

फैसला टल रहा हो।

4

किसी ने खोला था,

पर पूरी तरह नहीं—

शायद यक़ीन

अभी आधा है।

5

किवाड़ की चरमराहट

कुछ कहना चाहती है,

पर आवाज़

दरारों में अटक जाती है।

6

उसके पीछे

कोई इंतज़ार है,

या फिर

कोई लौटने से डर रहा है।

7

अधखुला रहना

उसकी मजबूरी नहीं,

एक तरह की

उम्मीद भी है।

8

कोई आएगा

तो पूरी तरह खुलेगा,

कोई जाएगा

तो धीरे से बंद होगा।

9

दहलीज़ पर

पैरों की हल्की-सी आहट है,

जैसे कहानी

अभी खत्म नहीं हुई।

10

अधखुला दरवाज़ा

रिश्तों की तरह,

न पूरा पास,

न पूरी दूरी।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

टूटी कंघी

 टूटी कंघी

1

टूटी कंघी

दराज़ में पड़ी है,

जैसे कोई रिश्ता

धीरे-धीरे छूट गया हो।

2

उसके दाँतों में

कहीं-कहीं खाली जगह है,

जैसे बातों के बीच

खामोशी आ गई हो।

3

कभी बालों में

आसानी से चलती थी,

अब उलझनों में

खुद अटक जाती है।

4

हाथ में लो तो

पहचान अब भी वही है,

बस साथ निभाने की

ताकत कम हो गई है।

5

उस पर जमे बाल

कुछ कहानियाँ हैं,

जो हर सुबह

सँवरते-सँवरते रह गईं।

6

नई कंघी

साफ़-सुथरी रखी है,

पर ये पुरानी

स्पर्श का इतिहास जानती है।

7

टूटकर भी

फेंकी नहीं गई,

शायद यादों का

कोई सिरा जुड़ा है।

8

आईने के पास

चुपचाप पड़ी रहती है,

जैसे खुद को

अब कम ही देखती हो।

9

कभी कोई

उसे फिर उठा लेता है,

और वो

थोड़ी देर के लिए

फिर काम आ जाती है।

10

टूटी कंघी

सिर्फ़ एक चीज़ नहीं,

थोड़ा-सा बीता हुआ समय,

जो अभी भी

सँवरना चाहता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

नटखट बच्चे को नहलाती माँ — एक शब्द-चित्र

 नटखट बच्चे को नहलाती माँ — एक शब्द-चित्र 

बाल्टी में गुनगुना पानी है,

धूप खिड़की से आकर

फर्श पर छोटी-सी नदी बना रही है।

माँ के हाथों में साबुन की झाग,

और सामने

पानी से खेलता एक छोटा-सा तूफ़ान।

वो बार-बार फिसलता है,

हँसता है,

छप-छप करके दुनिया को भिगो देना चाहता है।

माँ की डाँट भी

मुस्कान में घुली है—

“चुप बैठो…”

और उँगलियाँ फिर से उसे थाम लेती हैं।

झाग उसके बालों में

बादल बन जाते हैं,

और आँखों में

सिर्फ़ खेल की चमक है।

अचानक

मुँह में साबुन चला जाता है—

वो रो पड़ता है,

आँखें सिकुड़ जाती हैं,

छोटी-सी दुनिया

नमक-सी लगने लगती है।

माँ जल्दी से

पानी के छींटे देती है,

“बस-बस…” कहती हुई

रोने को

अपने हाथों में समेट लेती है।

नहला कर

मुलायम तौलिये में लपेटती है,

फिर अपने आँचल से

उसके गाल, माथा, बाल

धीरे-धीरे पोंछती है।

उसके रोने की जगह

अब सिसकियाँ हैं,

और माँ की हथेलियों में

सारा सुकून।

आँखों में काजल लगाती है,

एक छोटा-सा टीका—

नज़र से बचाने को

ममता का पहरा।

गोद में लेकर

आँचल के भीतर

दूध पिलाती है—

जैसे दुनिया को

फिर से भर रही हो।

बच्चा

धीरे-धीरे शांत होता है,

साँसें लय में आती हैं,

और नींद

उसकी पलकों पर उतर जाती है।

माँ उसे सुलाती है,

हल्का-सा धिठौना लगाकर,

एक बार

तृप्त नज़र से देखती है—

जैसे कोई पूजा

पूरी हो गई हो।

फिर चुपचाप उठकर

घर के काम में लग जाती है,

पर उसके भीतर

वो पल

अब भी गुनगुना रहा होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

रोटी बेलती औरत

 रोटी बेलती औरत

1

रोटी बेलती औरत

आटे में

दिन भर की थकान गूँथती है।

2

उसकी हथेलियों में

एक लय है,

जैसे कोई पुराना गीत

धीरे-धीरे बज रहा हो।

3

बेलन चलता है,

गोलाई बनती है—

जैसे जीवन को

फिर से समेट रही हो।

4

आँच पर रखी तवा,

और उसके सामने

उसकी चुप मेहनत।

5

रोटी फूलती है,

वो हल्का-सा मुस्कुराती है

जैसे छोटी-सी जीत

मिल गई हो।

6

आटे की खुशबू में

घर बसता है,

और उसके हाथों में

सबका पेट।

7

वो बोलती कम है,

पर हर रोटी में

कुछ कह जाती है।

8

हाथ रुकते नहीं,

भले मन

कहीं और चला जाए।

9

रात के खाने में

सबका हिस्सा है,

पर उसकी थकान

किसी थाली में नहीं आती।

10

रोटी बेलती औरत

घर की सबसे साधारण,

और सबसे ज़रूरी

कविता होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,

टूटी कुर्सी

 टूटी कुर्सी


1

टूटी कुर्सी

कोने में पड़ी है,

जैसे कोई बात

अधूरी रह गई हो।


2

एक पाया डगमगाता है,

फिर भी खड़ी है—

जैसे ज़िद

अब भी बाकी हो।


3

उस पर बैठने वाले

कितने लोग बदले,

पर उसकी जगह

वहीं की वहीं रही।


4

पीठ का सहारा

थोड़ा झुक गया है,

जैसे समय ने

धीरे से दबा दिया हो।


5

कभी उस पर

लंबी बातें होती थीं,

अब सन्नाटा

वहीं बैठा रहता है।


6

लकड़ी की दरारों में

पुरानी आवाज़ें फँसी हैं,

जो छूने पर

हल्की-सी गूंज उठती हैं।


7

कोई बैठता है तो

चरमराती है,

जैसे शिकायत

धीरे से निकल आई हो।


8

फेंकी नहीं गई अभी,

शायद उम्मीद है

कि कोई

इसे फिर ठीक करेगा।


9

टूटी है,

पर बेकार नहीं

बस थोड़ा-सा

समय चाहिए।


10

टूटी कुर्सी—

थके हुए दिनों का

वो ठिकाना,

जो अब भी

सहारा देना चाहता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

छतें

 छतें

1

छतें

घर की चुप आँखें हैं,

सब देखती हैं,

कुछ कहती नहीं।

2

दोपहर में तपती हैं,

रात में ठंडी हो जाती हैं,

जैसे दिन-भर की बातें

खुद में समेट लेती हों।

3

कभी बच्चों की दौड़,

कभी कपड़ों की सरसराहट

हर आवाज़

यहीं ठहरती है।

4

शाम को

कोई टहलता है,

और आसमान

थोड़ा पास आ जाता है।

5

कोनों में

पुरानी चीज़ें पड़ी हैं,

जैसे यादें

धूप में सूख रही हों।

6

कभी-कभी

वो गवाह बनती हैं,

दो लोगों की

धीमी-सी बातों की।

7

बरसात में

भीगती रहती हैं,

जैसे दुख

बिना छतरी के गुजर रहा हो।

8

रात को

तारे उतर आते हैं,

और छत

आसमान बन जाती है।

9

सुबह की पहली धूप

सबसे पहले

उन्हीं पर उतरती है।

10

छतें

घर के ऊपर नहीं,

उसकी खामोश यादों के

सबसे करीब होती हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,