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Wednesday, 1 April 2026

जब तक किसी मोबाइल की स्क्रीन पर

 

जब तक

किसी मोबाइल की स्क्रीन पर

एक आम आदमी

उँगलियों से देश बचा रहा है

तब तक

हकीकत और भ्रम के बीच

एक अजीब-सी रोशनी जलती रहेगी दोस्तों!


वह आदमी

जो सुबह उठते ही

भगवान से पहले

नोटिफिकेशन देखता है


देश रात भर में

कितनी बार बचा

और कितनी बार

खतरे में आया

सब उसकी टाइमलाइन पर लिखा होता है।


वह चाय की पहली चुस्की के साथ

एक पोस्ट डालता है

"अब नहीं जागे तो कभी नहीं जागेंगे!"


और

उसे लगता है

कि इस एक वाक्य से

इतिहास की दिशा बदल जाएगी।


उसकी उँगलियाँ

कीबोर्ड पर

तलवार की तरह चलती हैं


कमेंट्स में

वह अकेला ही

पूरी बहस जीत लेता है

तर्क से,

कटाक्ष से,

और कभी-कभी

सिर्फ़ CAPS LOCK से।


वह हर मुद्दे पर

पारंगत है

सीमा सुरक्षा से लेकर

अर्थव्यवस्था तक,

खेल से लेकर

संस्कृति तक


उसके पास

हर सवाल का जवाब है,

बस

समय नहीं है

खुद से पूछने का।


घर में

टीवी चल रहा होता है,

बच्चे कुछ पूछते हैं,

पत्नी आवाज़ देती है


पर वह

"बस एक मिनट" कहकर

देश को बचाने में लगा रहता है।


वह शेयर करता है

वीडियो,

पोस्ट,

गुस्सा,

गर्व


और हर शेयर के साथ

उसे लगता है

कि उसने

एक और लड़ाई जीत ली।


कभी-कभी

वह अपने जैसे

हजारों लोगों को देखता है

सब एक ही बात कह रहे हैं,

सब एक ही जोश में


और वह

थोड़ा और आश्वस्त हो जाता है

कि वह अकेला नहीं है।


असल ज़िन्दगी में

वह

शायद किसी से बहस नहीं करता

पड़ोसी से भी नहीं


पर फेसबुक पर

वह

पूरा योद्धा है।


मैंने एक दिन पूछा

"सच में कुछ बदलता है?"


वह बोला

"कम से कम आवाज़ तो उठा रहे हैं…"


और उस "आवाज़" में

इतनी तसल्ली थी

कि सच और संतोष

थोड़ा-सा मिल गए।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी

वह पढ़ेगा,

थोड़ा हँसेगा,

और शायद

इसे भी शेयर कर देगा


कैप्शन लिखकर

"कड़वी सच्चाई!"


जाने क्यों मन करता है

उसे एक दिन

मोबाइल से बाहर निकालकर

सड़क पर खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

देश यहाँ भी है

इन गड्ढों में,

इन लाइनों में,

इन चुप लोगों में


यहाँ भी

थोड़ा बचा लो।


अरे ओ फेसबुक वाले देशभक्त!

तुम्हारा ये जोश

झूठा नहीं है

बस

थोड़ा अधूरा है


आओ,

आज

एक पोस्ट कम डालो

और एक काम

ज़्यादा कर दो…


शायद

देश सच में

थोड़ा-सा बच जाए यार!


मुकेश ,,,,,,,,,

डिजिटल शहर में खोते हुए लोग

 डिजिटल शहर में खोते हुए लोग


वे ऑनलाइन रहने वाले

लोगों से ज़्यादा

ऑनलाइन रहने वाले दिल हैं


उनके मोबाइल के स्क्रीन टाइम देखिए

व्हाट्सऐप

इंस्टाग्राम

रील्स

नोटिफिकेशन

और अनगिनत अनरीड मैसेज मिलेंगे


उन्हें अपनों की फ़िक्र भी है

मगर अपने अब

डीपी में सिमट चुके हैं

उनकी हँसी अब

इमोजी बन चुकी है


"कैसे हो?" के जवाब में : 👍

👍 के जवाब में : ❤️

❤️ के जवाब में : Seen

और Seen के जवाब में

एक लंबी चुप्पी—

हमारे समय की सबसे आम भाषा है


लोग हर दिन सुनना चाहते हैं

"चलो मिलते हैं कभी!"

मगर ऐसा हो नहीं पाता

कितना आर्टिफ़िशियल हँसते हैं

वीडियो कॉल पर लोग!


मेट्रो और कैफ़े में

स्क्रीन में झाँकते हैं लोग

खुद से बचने के लिए

दूसरों में खोते हैं लोग


पास बैठा इंसान

किसी दूर के स्टेटस से हार जाता है

कुछ लोगों के लिए

वे सोशल नहीं

सिर्फ़ डेटा बन चुके हैं!


कभी नहीं बताते लोग

आज किस पोस्ट ने उन्हें चुभा

किस कमेंट ने उन्हें तोड़ा

किस तुलना ने उन्हें छोटा किया


वे जब रात को फोन रखते हैं

ऐसा लगता है जैसे

आँखों में नीली रोशनी भर गई हो


एक मिनट भी रुकते नहीं

फिर से स्क्रॉल करने लगते हैं

जाँचते हैं किसने देखा

किसने नहीं


फिर वे थक जाते हैं

और फिर भी रुकते नहीं


सबको अपनी ज़िंदगी का

सुंदर हिस्सा दिखाकर

अंदर के अँधेरे को

एयरप्लेन मोड कर देते हैं


कोई चैट खोलता है

कोई रील

तो कोई पुरानी तस्वीरें

यादों को ज़ूम करता है


जब सब कुछ बंद कर

फोन साइड में रखते हैं

एक खालीपन

उनके सीने में उभरता है


और उन्हें नींद नहीं आती


उस खालीपन के बारे में

न कोई फ्रेंड जानता है

न कोई फॉलोवर समझता है

और बड़े से बड़ा एल्गोरिदम भी

इस दर्द को नहीं पढ़ पाता


ऑनलाइन रहने वाले लोग

सुबह उठकर

फिर से खुद को

ऑनलाइन कर लेते हैं!


मुकेश ,,,,,,,,

रिश्तों के भंवर में फँसी लड़की

 रिश्तों के भंवर में फँसी लड़की


वो फँसी हुई है...

जैसे नदी के बीचों-बीच

एक चुप चक्कर खाता पानी,

जिसे किनारे याद हैं

पर पहुँच नहीं पाता।


उसकी आँखों में

कई रास्तों की धूल है,

हर रास्ता किसी अपने तक जाता है

और हर अपना

उसे थोड़ा और उलझा देता है।


वो हँसती है...

पर उसकी हँसी में

किसी और के फैसलों की आहट होती है,

जैसे किसी और ने

उसके होंठों पर मुस्कान रख दी हो।


उसके "हाँ" में

अक्सर एक थका हुआ "ना" छुपा होता है,

और उसके "ना" में

एक अधूरा-सा डर

कि कहीं सब छूट न जाए।


वो हर किसी की हो जाती है

थोड़ी-थोड़ी

माँ की उम्मीद,

पिता की इज़्ज़त,

समाज की मर्यादा,

और किसी के सपनों की अधूरी तस्वीर।


पर खुद की?

वो खुद की कभी नहीं हो पाती।


उसके भीतर

एक कमरा है बंद,

जहाँ वो सच में रहती है

बिना रिश्तों के नाम के,

बिना किसी की आवाज़ के,

सिर्फ़ अपनी धड़कनों के साथ।


कभी-कभी

वो उस कमरे का दरवाज़ा खोलती है,

थोड़ी-सी हवा बाहर आती है

और फिर

कोई पुकार उसे वापस खींच लेती है

उसी भंवर में।


वो डूबती नहीं...

बस तैरती रहती है,

थक कर भी,

टूट कर भी


क्योंकि उसे सिखाया गया है

कि लड़की होना

अक्सर

अपने ही किनारों से दूर रहना है।


और वो...

अब भी वहीं है

रिश्तों के भंवर में,

धीरे-धीरे

खुद से दूर जाती हुई।


मुकेश ,,,,,,,,,,

Tuesday, 31 March 2026

अधूरी प्रेम कहानियों का बूढ़ा संग्रहालय

 अधूरी प्रेम कहानियों का बूढ़ा संग्रहालय 


जब तक

किसी पुराने शहर की

किसी तंग गली में

एक बूढ़ा संग्रहालय

अधूरी प्रेम कहानियों का

चुपचाप खुला है

तब तक

मोहब्बत कभी पूरी तरह खत्म नहीं होती दोस्तों!


वह संग्रहालय

जिसकी दीवारों पर

कोई पेंटिंग नहीं टंगी,

पर हर ईंट में

किसी का “कह न सका”

धीरे-धीरे साँस लेता है।


दरवाज़ा

हल्का-सा चरमराता है

जैसे पूछ रहा हो

“पक्का आना चाहते हो अंदर?”


और जो भी

हिम्मत करके दाखिल होता है,

वह

थोड़ा-सा अपना अतीत

बाहर ही छोड़ देता है।


अंदर

शीशे के बक्सों में रखी हैं


कुछ अधूरी चिट्ठियाँ,

जिनमें “प्रिय” के बाद

शब्द काँपते रह गए,


कुछ सूखे हुए फूल,

जो कभी किताबों में दबे थे,


कुछ टिकट के टुकड़े,

जिन पर साथ बैठने का सपना

अकेले उतर गया।


एक कोने में

एक पुराना रेडियो रखा है

जिसमें

अब भी वही गाना अटका है

जो

किसी ने किसी के लिए

कभी भेजा था।


यहाँ

हर कहानी पूरी नहीं होती

बस

रुक जाती है कहीं


किसी “अगर” पर,

किसी “क्यों” पर,

या

किसी “चलो छोड़ो” पर।


इस संग्रहालय का

कोई गाइड नहीं

हर आने वाला

खुद ही

अपनी कहानी पहचान लेता है।


कभी

कोई बूढ़ा आदमी आता है

धीरे-धीरे चलता हुआ,

किसी एक बक्से के सामने

लंबे समय तक खड़ा रहता है


और फिर

हल्का-सा मुस्कुरा कर

आँखें पोंछ लेता है।


कभी

कोई अधेड़ स्त्री आती है

एक चिट्ठी को

बस दूर से देखती है

छूती नहीं


जैसे

छू लिया तो

सालों से संभाली हुई

शांति टूट जाएगी।


यहाँ

रोना मना नहीं है,

हँसना भी नहीं


बस

ज़्यादा देर ठहरना

थोड़ा खतरनाक है।


मैंने एक दिन

उस बूढ़े संग्रहालय से पूछा

"तुम बंद क्यों नहीं हो जाते?"


वह बोला

"कहानियाँ पूरी हो जातीं

तो शायद बंद हो जाता…"


और इस जवाब में

इतनी सच्चाई थी

कि मेरे पास

कोई सवाल नहीं बचा।


मैं जानता हूँ

यह कविता

किसी न किसी को

इस दरवाज़े तक ले आएगी


वह अंदर जाएगा,

कुछ पहचानेगा,

कुछ छुपाएगा,

और

चुपचाप बाहर आ जाएगा।


जाने क्यों मन करता है

दुनिया के हर सफल प्रेम के सामने

इस संग्रहालय को खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

जो पूरा नहीं हुआ,

वही सबसे ज़्यादा बचा रहा


जो मिल गया,

वह शायद

इतना याद नहीं रहा।


अरे ओ

अधूरी प्रेम कहानियों के

बूढ़े संग्रहालय!

तुम्हारी ये खामोशियाँ

कितनी बोलती हैं…


आओ,

आज

तुम्हारी किसी शेल्फ पर

अपनी भी

एक अधूरी कहानी रख दूँ


ताकि

थोड़ी-सी मोहब्बत

और बची रहे यार!


मुकेश ,,,,,,

मॉल में घूमता हुआ खाली जेब वाला आदमी

 मॉल में घूमता हुआ खाली जेब वाला आदमी


जब तक

किसी मॉल की चमकती हुई रोशनी में

एक आदमी

खाली जेब लेकर

धीरे-धीरे चलता हुआ

ज़िंदा है

तब तक

चमक पूरी सच्चाई नहीं है दोस्तों!


वह आदमी

जिसके कदम

एस्केलेटर पर भी

संकोच से चढ़ते हैं,

जिसकी आँखें

हर दुकान के शीशे में

थोड़ी देर ठहर जाती हैं


जैसे

देख रहा हो

एक ऐसी दुनिया

जो उसकी है भी

और नहीं भी।


ब्रांडेड कपड़ों के बीच

वह अपने पुराने शर्ट को

हल्का-सा ठीक करता है

जैसे

अपनी इज़्ज़त को

क्रीज़ दे रहा हो।


हर दुकान में

"SALE" लिखा है

पर

उसके लिए

हर चीज़ अब भी

"OUT OF REACH" है।


वह रुकता है

एक जूते की दुकान के सामने,

कीमत देखता है,

और

हल्का-सा मुस्कुरा देता है


जैसे

अपने ही ख़्वाब से

मज़ाक कर लिया हो।


फूड कोर्ट में

भीड़ है

हँसी है,

ट्रे हैं,

कॉफी है


वह

एक कोने में खड़ा होकर

मेन्यू बोर्ड पढ़ता है,

फिर

पानी पीकर

तसल्ली कर लेता है।


बच्चों को देखता है

आइसक्रीम खाते हुए,

खिलौनों पर झगड़ते हुए


उसकी आँखों में

एक पुराना रविवार

हल्का-सा जाग जाता है।


मोबाइल निकालता है

किसी को कॉल नहीं करता

बस

स्क्रीन देखता है,

जैसे

खुद से बच रहा हो।


सिक्योरिटी गार्ड

एक नज़र देखता है उसे

वह

थोड़ा सीधा हो जाता है

जैसे

अपनी गरीबी को

जेब में छुपा रहा हो।


कभी-कभी

वह

किसी महँगी दुकान में

अंदर चला भी जाता है


एसी की ठंडक में

थोड़ी देर खड़ा रहता है,

किसी शर्ट को छूता है,

और

फिर धीरे से

बाहर आ जाता है


जैसे

किसी और की दुनिया में

बस मेहमान बनकर आया हो।


वह आदमी

कुछ नहीं खरीदता

पर

बहुत कुछ लेकर जाता है


थोड़ी-सी चाह,

थोड़ी-सी शर्म,

थोड़ी-सी हँसी,

और

थोड़ी-सी चुप्पी।


मैंने एक दिन पूछा

"कुछ लिया नहीं?"


वह बोला

"घूमने आया था…"


और इस "घूमने" में

इतनी गहराई थी

कि मैं

अपनी भरी हुई थैली

थोड़ी हल्की महसूस करने लगा।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी

वह पढ़ेगा,

हल्का-सा हँसेगा,

और कहेगा


"अरे! इतना भी क्या…"


पर

अंदर ही अंदर

थोड़ा और भर जाएगा।


जाने क्यों मन करता है

हर उस आदमी के सामने

उसे खड़ा कर दूँ

जो मॉल में

सिर्फ़ खरीदने आता है


और कहूँ


देखो!

यह आदमी

कुछ खरीदे बिना भी

ज़िन्दगी को देख रहा है


और तुम

सब कुछ खरीदकर भी

शायद कुछ नहीं देख पा रहे।


अरे ओ खाली जेब वाले आदमी!

तुम्हारी यह चुप चाल

कितनी बड़ी कहानी है


आओ,

आज

मॉल की रोशनी से बाहर निकलो

और एक चाय की दुकान पर

बैठकर

थोड़ी-सी दुनिया

अपने हिसाब से जी लो यार!


मुकेश ,,,,,,

घर में रहकर भी घर से बाहर हो चुकी स्त्री

घर में रहकर भी घर से बाहर हो चुकी स्त्री

(जिसकी ज़रूरतें अब सिर्फ़ काम तक सीमित हैं) 


जब तक

किसी घर के बीचों-बीच

एक स्त्री

रहकर भी

घर से बाहर हो चुकी है

तब तक

दीवारें सिर्फ़ दीवारें हैं दोस्तों,

घर नहीं।


वह स्त्री

जिसके कदमों की आहट से

कभी सुबह होती थी,

जिसकी हँसी से

दोपहर हल्की हो जाती थी


अब

उसी के होने का मतलब

सिर्फ़ काम रह गया है।


वह उठती है

सबसे पहले,

सोती है

सबके बाद,


पर

उसके बीच का पूरा दिन

किसी और का होता है।


रसोई में

उसकी उँगलियाँ

रोटी बेलती हैं,

सब्ज़ी काटती हैं,

चाय बनाती हैं


पर

कोई नहीं पूछता

"तुमने खाया?"


वह बोलती है

तो बस काम के लिए

"दूध रख दिया है"

"कपड़े सुखा दिए हैं"


उसकी आवाज़

धीरे-धीरे

निर्देश बन गई है,

बात नहीं।


घर में

हर चीज़ अपनी जगह पर है

कपड़े, बर्तन, बच्चे, समय


बस

वह खुद

कहीं नहीं है।


कभी

आईने के सामने रुकती है

अपने चेहरे को देखती है,

जैसे

पहचानने की कोशिश कर रही हो


"मैं… कौन हूँ अब?"


उसकी पसंद

धीरे-धीरे

गायब हो गई है

कपड़े वही

जो घर को ठीक लगें,

खाना वही

जो सबको पसंद हो


उसकी अपनी भूख

कब की

चुप हो चुकी है।


हँसी भी आती है उसे

पर

हल्की-सी,

संभलकर


जैसे

ज़्यादा हँसना

अब उसके हिस्से में नहीं।


बीमार पड़ती है

तो भी

काम करती है

दवा खाकर

फिर खड़ी हो जाती है


क्योंकि

उसके रुकने से

घर रुक जाता है।


कभी

कोई मेहमान पूछ ले

"क्या करती हैं आप?"


तो वह मुस्कुरा देती है

और जवाब

गले में ही रह जाता है।


मैंने एक दिन पूछा

"थकती नहीं?"


वह बोली

"आदत है…"


और इस "आदत" में

इतनी गहरी थकान थी

कि नींद भी

शायद उसे आराम न दे पाए।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी

वह पढ़ेगी,

थोड़ा ठहरेगी,

और फिर

किसी को आवाज़ देगी


"चाय बना दी है…"


जाने क्यों मन करता है

हर उस घर के सामने

इस स्त्री को खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

यह औरत

गायब नहीं हुई है

बस

तुम्हारी नज़रों से

ओझल हो गई है।


अरे ओ घर में रहकर भी

घर से बाहर हो चुकी स्त्री!

तुम्हारी यह खामोशी

कोई हार नहीं


बस

एक लंबा इंतज़ार है

उस दिन का

जब कोई

तुमसे पूछेगा


"तुम कैसी हो?"


आओ,

आज

रसोई की आंच थोड़ी धीमी करो

और एक कप चाय में

अपना नाम घोल दो…


शायद

तुम खुद को

फिर से पा लो।


मुकेश ,,,,

एक "माँ" बेटी की विदाई के बाद

 एक "माँ" बेटी  की विदाई के बाद 


जब तक

किसी रसोई की आँच पर

एक माँ

बेटी की विदाई के बाद भी

दो कप चाय रख देती है—

तब तक

ममता पूरी तरह विदा नहीं होती दोस्तों!


वह माँ

जिसके हाथों की महक

बेटी के बालों में बसती थी,

जिसकी डाँट में भी

मीठी-सी छाँव होती थी—


अब

उसी रसोई में

थोड़ा धीमे चलती है।


उसकी अलमारी में

एक कोना वैसा ही है—

जहाँ बेटी के कपड़े

अब भी तह करके रखे हैं,


कभी

उन्हें खोलकर देखती है,

सूँघती है हल्का-सा,

और फिर

चुपचाप

वापस रख देती है।


सुबह उठकर

पहले की तरह आवाज़ लगाती है—

"उठ जा… देर हो जाएगी!"


फिर

खुद ही ठहर जाती है—

और समझ जाती है

कि अब

कोई नहीं उठेगा उस आवाज़ से।


फोन पर बात होती है—

"खाना खाया?"

"ससुराल में सब ठीक?"


हर सवाल में

चिंता कम

और आदत ज़्यादा होती है—


और "हाँ माँ" सुनकर

वह

अपने आँचल से

दिल की धड़कन ढँक लेती है।


वह माँ

जो पहले

बेटी के साथ

हर छोटी बात बाँटती थी—


अब

अपनी ही बातों को

अंदर रख लेती है,

जैसे

खुद ही अपनी सहेली बन गई हो।


रसोई में

कभी वही पकवान बनाती है

जो बेटी को पसंद थे—


फिर

थाली में परोसते हुए

एक पल को रुक जाती है—

और

थोड़ा-सा

नमक बढ़ जाता है।


घर में

सब कुछ है—

दीवारें, सामान, लोग—


बस

एक आवाज़ की कमी है

जो

हर कोने को

घर बनाती थी।


कभी

बेटी की पुरानी चोटी

या रिबन हाथ लग जाए—

तो वह

थोड़ी देर के लिए

वक्त को उल्टा जी लेती है—


फिर

धीरे-धीरे

वर्तमान में लौट आती है।


मैंने एक दिन पूछा—

"कैसा लग रहा है?"


वह मुस्कुराई—

"अच्छा है…

बेटी अपने घर में खुश है…"


और इस "अच्छा है" में

इतना गहरा खालीपन था

कि शब्द भी

थोड़ा ठहर गए।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी—

वह पढ़ेगी,

आँखों पर पल्लू रखेगी,

और कहेगी—


"सब माँओं की यही कहानी है…"


जाने क्यों मन करता है—

हर उस इंसान के सामने

इस माँ को खड़ा कर दूँ—

और कहूँ—


देखो!

यह स्त्री

अपना एक हिस्सा

खुद से अलग करके भी

मुस्कुरा रही है—


यह त्याग नहीं,

यह

जीवन का सबसे गहरा प्रेम है।


अरे ओ बेटी की माँ!

तुम्हारी यह खामोशी भी

एक लोरी है—


आओ,

आज

रसोई की आँच थोड़ी धीमी करो—

और एक कप चाय में

अपनी यादें घोल दो…


शायद

तुम्हारी गोद

फिर से भर उठे

किसी अहसास से।


मुकेश ,,,,,