महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 30 : बुद्धियोग — सही कर्म का निर्णय करने वाली बुद्धि क्या है?
महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 30 : बुद्धियोग — सही कर्म का निर्णय करने वाली बुद्धि क्या है? कर्मयोग के प्रश्न के बाद गीता के सामने एक और अधिक सूक्ष्म प्रश्न आता है। यदि मनुष्य को कर्म करना ही है, यदि कर्म का त्याग मुक्ति का अनिवार्य मार्ग नहीं है, यदि फल उसके पूर्ण नियंत्रण में नहीं है—तो फिर वह कर्म का निर्णय कैसे करे? हर कर्म से पहले एक निर्णय होता है। और हर निर्णय के पीछे कोई न कोई बुद्धि काम करती है। मनुष्य केवल कर्म करने वाला प्राणी नहीं है। वह निर्णय करने वाला भी है। यहीं से गीता का बुद्धियोग सामने आता है। गीता के दूसरे अध्याय में कृष्ण कहते हैं— एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥ — भगवद्गीता 2.39 अर्थात् अब उस बुद्धि को सुनो जिसके द्वारा युक्त होकर मनुष्य कर्म के बन्धन को छोड़ सकता है। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है। कृष्ण कर्म को समाप्त करने की बात नहीं कर रहे। वे कर्म के बन्धन को समाप्त करने वाली बुद्धि की बात कर रहे हैं। यही बुद्धियोग का मूल है। बुद्धि क्या है? सामान्य अर्थ में बुद्धि का अर...