महाभारत - आदिपर्व — गांधारी और कौरवों का जन्म
एक तटस्थ विचार महाभारत में मनुष्य और अलौकिक सत्ता के बीच कोई कठोर दीवार नहीं है। गंगा, वसु, देवता, नाग, गंधर्व आदि कथा-जगत में सक्रिय हैं; दूसरी ओर सत्यवती, शांतनु, धृतराष्ट्र, पाण्डु, विदुर आदि स्पष्टतः मानवीय सामाजिक-राजनीतिक संसार से आते हैं। विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि वंश की निरंतरता बार-बार असामान्य जन्म-कथाओं से जुड़ती है । भीष्म का जन्म वसुओं और गंगा से जुड़ा है; धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर की उत्पत्ति नियोग की असाधारण सामाजिक व्यवस्था से होती है; पाण्डवों का जन्म देवताओं के आह्वान से बताया जाता है; और कौरवों का जन्म तो और भी असामान्य रूप में प्रस्तुत किया गया है। इससे एक सम्भावित व्याख्या निकलती है— महाभारत अपने पात्रों को केवल जैविक मनुष्य के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य, प्रकृति, देवत्व, कर्म और व्यापक चेतना के परस्पर-संबंधित संसार के भीतर रखता है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। इससे यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं होता कि महाभारत के लेखक किसी आधुनिक अर्थ में “ब्रह्माण्डीय चेतना” का सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे थे। यह हमारी ओर से किया गया दार्शनिक पाठ होग...