ऊँट के मुँह में जीरा
रेगिस्तान की नीरवता में खड़ा ऊँट—विशाल, धैर्यवान, और अपनी भूख में एक अलग ही विस्तार लिए—जब अपने मुँह में जीरे का एक छोटा-सा दाना महसूस करता होगा, तो शायद वह भी क्षणभर के लिए ठिठक जाता होगा।
यह दाना न तो उसकी भूख को शांत कर सकता है, न ही उसकी थकान को हर सकता है। फिर भी, वह उसे ग्रहण करता है—जैसे जीवन की विडंबनाओं को चुपचाप स्वीकार कर लेना उसकी नियति हो।
“ऊँट के मुँह में जीरा”—यह कहावत केवल मात्रा की न्यूनता का संकेत नहीं, बल्कि मनुष्य के अनुभवों की उस गहराई को भी छूती है, जहाँ अपेक्षाएँ और प्राप्तियाँ एक-दूसरे से बहुत दूर खड़ी होती हैं।
हमारे जीवन में भी ऐसे अनेक क्षण आते हैं, जब हमारी आकांक्षाएँ ऊँट की भूख की तरह विस्तृत होती हैं, और जो हमें मिलता है, वह जीरे के दाने जितना सूक्ष्म।
किसी विद्यार्थी की मेहनत के सामने मिले अंक,
किसी श्रमिक के श्रम के सामने मिली मजदूरी,
या किसी प्रेमी के समर्पण के सामने मिला उत्तर
कई बार सब कुछ “ऊँट के मुँह में जीरा” ही प्रतीत होता है।
पर इस कहावत का एक दूसरा, सूक्ष्म अर्थ भी है
यह हमें हमारी अपेक्षाओं की प्रकृति पर विचार करने को प्रेरित करती है।
क्या सच में हमारी भूख इतनी बड़ी है, या हमने उसे अनावश्यक रूप से विस्तृत कर लिया है?
क्या हर बार हमें संतोष के लिए विशालता ही चाहिए, या छोटे-छोटे जीरे के दानों में भी जीवन का स्वाद छिपा हो सकता है?
जीरा—जो अपने आप में छोटा है,
पर अपनी सुगंध में अद्भुत है।
वह भोजन को स्वाद देता है,
उसकी उपस्थिति कम होकर भी प्रभावशाली होती है।
शायद जीवन भी हमें यही सिखाता है
कि हर छोटी चीज़ को केवल उसकी मात्रा से नहीं,
उसके प्रभाव से भी आँकना चाहिए।
ऊँट का विशाल मुँह और जीरे का सूक्ष्म दाना
इन दोनों के बीच जो दूरी है,
वही मनुष्य के भीतर की अतृप्ति और संतोष के बीच की दूरी भी है।
यह कहावत हमें हँसाती जरूर है,
पर भीतर कहीं एक गंभीर प्रश्न भी छोड़ जाती है
क्या हम सच में अभाव में हैं,
या हमारी इच्छाएँ ही हमें अभाव का अनुभव कराती हैं?
अंततः, “ऊँट के मुँह में जीरा” केवल एक व्यंग्य नहीं,
बल्कि जीवन का एक दर्पण है
जो हमें दिखाता है कि
संतोष का आकार बाहर नहीं,
भीतर तय होता है।
मुकेश',,,,,,,,