सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति” — एक शोधात्मक एवं वैज्ञानिक व्याख्या
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति” — एक शोधात्मक एवं वैज्ञानिक व्याख्या मंत्र-पाठ सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्नी उरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥ — अथर्ववेद, पृथ्वी सूक्त (12.1.1) यह पृथ्वी सूक्त का प्रथम मंत्र है और सम्पूर्ण सूक्त का आधारभूत दार्शनिक उद्घोष माना जाता है। ऋषि यहाँ यह नहीं कहते कि पृथ्वी केवल गुरुत्वाकर्षण या किसी भौतिक शक्ति से धारण की हुई है, बल्कि वे उन आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक तत्त्वों का उल्लेख करते हैं जो पृथ्वी पर जीवन और सभ्यता को स्थिर रखते हैं। पदच्छेद एवं शब्दार्थ सत्यम् — सत्य, यथार्थता बृहत् — विशालता, उदारता, व्यापक दृष्टि ऋतम् उग्रम् — कठोर एवं अटल सार्वभौमिक नियम दीक्षा — अनुशासन, संकल्प, आत्मनियमन तपः — परिश्रम, आत्मसंयम, साधना ब्रह्म — ज्ञान, चेतना, विद्या यज्ञः — परस्पर सहयोग, समर्पण, लोककल्याण पृथिवीं धारयन्ति — पृथ्वी को धारण करते हैं सा नः — वह पृथ्वी हमें भूतस्य भव्यस्य पत्नी — भूत और भविष्य की संरक्षिका उरुं लोकम् — विस्तृत जीव...