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Monday, 20 April 2026

बुद्ध्यात्मना जगत् समस्तम्… सोऽहमस्मि” — ‘पुरुष’ पद का परम अद्वैतार्थ -निबंधात्मक विवेचन, षोडश मन्त्र

 बुद्ध्यात्मना जगत् समस्तम्… सोऽहमस्मि” — ‘पुरुष’ पद का परम अद्वैतार्थ -निबंधात्मक विवेचन, षोडश मन्त्र


मूल पदांश (संशोधित रूप में)

बुद्ध्यात्मना जगत् समस्तम् इति पुरुषः,

पुरि-शयनात् वा पुरुषः।

सः अहम् अस्मि — भवामि॥१६॥


ईशावास्योपनिषद् के षोडश मन्त्र के अंतिम भाग— “सोऽहमस्मि”— का यह शांकरभाष्य अद्वैत वेदान्त के चरम सत्य को उद्घाटित करता है। आदि शंकराचार्य यहाँ “पुरुष” शब्द की व्युत्पत्ति और उसके तात्त्विक अर्थ को स्पष्ट करते हुए यह सिद्ध करते हैं कि उपास्य देवता और साधक का आत्मा— दोनों वास्तव में एक ही हैं।


“बुद्ध्यात्मना जगत् समस्तम्” — समष्टि-चेतना का स्वरूप

यहाँ “बुद्ध्यात्मना” का अर्थ है—

बुद्धि के रूप में स्थित आत्मा

अर्थात्—

वही चेतना

जो समस्त जगत् में बुद्धि के रूप में प्रकट होती है

इस प्रकार—

 “पुरुष” वह है—

जो सम्पूर्ण जगत् में

चेतन सत्ता के रूप में व्याप्त है

यह—

समष्टि-चैतन्य (cosmic consciousness) है

“पुरुषः” — व्युत्पत्ति और अर्थ

शंकराचार्य “पुरुष” शब्द की दो प्रकार से व्याख्या करते हैं—

1. बुद्ध्यात्मना जगत् समस्तम् इति पुरुषः

जो सम्पूर्ण जगत् को आत्मरूप से धारण करता है

2. पुरि-शयनात् पुरुषः

“पुरि” (नगर, अर्थात् शरीर) में जो शयन करता है

अर्थात्—

यह चेतना

प्रत्येक शरीर में निवास करती है

इस प्रकार—

वही एक “पुरुष”

सबमें व्याप्त है

“सोऽहमस्मि” — अद्वैत का प्रत्यक्ष उद्घोष

अब साधक कहता है—

“सः अहम् अस्मि”

अर्थात्—

“वह (पुरुष) मैं हूँ”

यहाँ—

उपासक और उपास्य का भेद समाप्त हो जाता है

देवता और जीव का अंतर मिट जाता है

यह—

अद्वैत वेदान्त का चरम सत्य है


“भवामि” — अनुभूति की पुष्टि

“भवामि” शब्द यह संकेत करता है कि—

यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं

बल्कि जीवित अनुभव है

साधक—

उस सत्य को “हो” जाता है

उपासना  से ज्ञान तक की यात्रा

इस एक पद में सम्पूर्ण साधना-पथ समाहित है—


देवता की उपासना

उसके स्वरूप का ज्ञान

उससे अभेद-बोध

“सोऽहमस्मि” की अनुभूति


दार्शनिक गहराई

यह भाष्य यह सिखाता है कि—

“पुरुष” कोई बाह्य सत्ता नहीं

वही आत्मा है

और—

जो ब्रह्माण्ड में है

वही मेरे भीतर है

अतः—

भेद केवल अज्ञान का परिणाम है


दृष्टांत

जैसे—

एक ही आकाश विभिन्न घड़ों में अलग-अलग प्रतीत होता है,

परन्तु वास्तव में वह एक ही है—

उसी प्रकार—

एक ही चेतना

अनेक शरीरों में भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है


इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि—


“पुरुष” = समष्टि-चेतना

“पुरि-शयन” = प्रत्येक शरीर में निवास

“सोऽहमस्मि” = अद्वैत का प्रत्यक्ष अनुभव

अतः—

यह मन्त्र उपासना का अंत और आत्मज्ञान का आरम्भ है।

यही—

वेदान्त का परम निष्कर्ष है—

“जो वहाँ है, वही यहाँ है;

जो ब्रह्म है, वही आत्मा है।”


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

असौ आदित्य-मण्डले पुरुषः…” — ‘पुरुष’ पद का शांकरार्थ निबंधात्मक विवेचन

 असौ आदित्य-मण्डले पुरुषः…” — ‘पुरुष’ पद का शांकरार्थ निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

असौ आदित्य-मण्डले स्थितः व्याहृत्य-अवयवः पुरुषः,

पुरुष-आकारत्वात्।

पूर्णः वा अनेन— प्राणः॥१६॥


ईशावास्योपनिषद् के षोडश मन्त्र में “योऽसावसौ पुरुषः” इस पद का आदि शंकराचार्य अत्यन्त सूक्ष्म अर्थ प्रस्तुत करते हैं। यहाँ “पुरुष” कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि एक दार्शनिक तत्त्व है— जो ब्रह्म के सगुण, उपास्य और साक्षात् अनुभवगम्य स्वरूप का द्योतक है।


“असौ आदित्य-मण्डले” — उपासना का आलम्बन

“असौ” (वह) और “आदित्य-मण्डले” —

 यह संकेत करता है—



सूर्य में स्थित उस चेतन सत्ता की ओर

जो उपासना का आलम्बन है

यहाँ सूर्य—

केवल भौतिक पिण्ड नहीं,

बल्कि चैतन्य का प्रतीक है


“व्याहृत्य-अवयवः” — समष्टि-चेतना का स्वरूप

“व्याहृत्य-अवयव” का अर्थ—

वह जिसमें सम्पूर्ण जगत् (व्याहृतियाँ— भूर्, भुवः, स्वः आदि) अवयव के रूप में स्थित हैं

अर्थात्—

यह “पुरुष”

समष्टि (cosmic totality) का अधिष्ठाता है

यह—

हिरण्यगर्भ का स्वरूप है

“पुरुष-आकारत्वात्” — चेतन सत्ता का रूप

यहाँ “पुरुष” शब्द का कारण बताया गया है—

“पुरुष-आकारत्वात्”

अर्थात्—

वह चेतन सत्ता

जो अनुभव में “व्यक्ति-सदृश” प्रतीत होती है

यह आकार—

वास्तविक नहीं,

उपासना के लिए कल्पित (उपाधि) है


“पूर्णः वा” — सर्वव्यापकता का बोध

“पूर्ण” शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है—

जो सबमें व्याप्त है

जिसमें कुछ भी अभाव नहीं

यह—

ब्रह्म का लक्षण है

अतः—

यह “पुरुष”

सीमित नहीं,

बल्कि पूर्णता का प्रतीक है


“अनेन प्राणः” — जीवन-शक्ति का आधार

यहाँ संकेत है—

उसी “पुरुष” से

प्राण (जीवन-शक्ति) संचालित होती है

अर्थात्—



वह चेतना

समस्त जीवों के जीवन का आधार है


दार्शनिक गहराई

यह भाष्यांश यह स्पष्ट करता है कि—

“पुरुष” कोई देहधारी व्यक्ति नहीं,

बल्कि एक दार्शनिक प्रतीक है—



समष्टि-चेतना

प्राण का स्रोत

उपासना का केन्द्र

उपासना और ज्ञान का सेतु

यहाँ “पुरुष” की कल्पना—

उपासना के लिए है

किन्तु—

इसका उद्देश्य साधक को

अद्वैत ज्ञान की ओर ले जाना है

अतः—

पहले → “वह पुरुष”

अंत में → “सोऽहमस्मि”

दृष्टांत

जैसे—

कोई विद्यार्थी पहले मानचित्र (map) के माध्यम से स्थान को समझता है,

फिर वास्तविक स्थान तक पहुँचता है—

उसी प्रकार—

“पुरुष” एक मानचित्र है

ब्रह्म की ओर ले जाने वाला


इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि—

“पुरुष” = समष्टि-चेतना

“आदित्य-मण्डल” = उपासना का आलम्बन

“पूर्ण” = ब्रह्म का लक्षण

अतः—

यह ‘पुरुष’ उपासना का विषय होते हुए भी

अंततः साधक को उसके अपने आत्मस्वरूप तक ले जाता है।

यही—

“सोऽहमस्मि” की अनुभूति का आधार है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

उपसंहर ते तेजः…” — शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन (षोडश मन्त्र)

उपसंहर ते तेजः…” — शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन (षोडश मन्त्र)

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

उपसंहर ते तेजः तापकं ज्योतिः।

यत् ते तव रूपं कल्याणतमम् अत्यन्त-शोभनं, तत् ते तव आत्मनः प्रसादात् पश्यामि।

किं च— अहं न तु त्वां भृत्यवत् याचे;

यः असौ आदित्य-मण्डले पुरुषः…॥१६॥

ईशावास्योपनिषद् के षोडश मन्त्र में साधक की प्रार्थना अब अपने चरम बिन्दु पर पहुँचती है। यहाँ वह बाह्य सूर्य के तेज को कम करने का निवेदन करता है, परन्तु आदि शंकराचार्य के भाष्य में यह स्पष्ट किया गया है कि यह केवल भौतिक प्रकाश को घटाने की बात नहीं, बल्कि अविद्या के आवरण को हटाने की आन्तरिक आकांक्षा है।

“उपसंहर ते तेजः” — बाह्य प्रखरता का शमन

“उपसंहर” का अर्थ है—

समेट लो, शान्त कर दो

“तेजः तापकं ज्योतिः” —

वह प्रकाश जो तपाता है, दाहक है

साधक कहता है—

“हे सूर्य! अपने इस दाहक तेज को समेट लो”

दार्शनिक अर्थ में—

यह बाह्य इन्द्रिय-गोचर जगत् का प्रखर आकर्षण है

जो मन को विचलित करता है

अतः—

यह निवेदन है कि

बाह्य चकाचौंध शांत हो, ताकि सत्य प्रकट हो सके

“कल्याणतमं रूपम्” — परम मंगलमय स्वरूप

साधक उस रूप को देखना चाहता है—

जो “कल्याणतम” है

अर्थात्—

अत्यन्त शुद्ध

निर्विकार

मंगलमय

यह—

ब्रह्म का शुद्ध स्वरूप है

जो नाम-रूप के पार है

“तत् ते… प्रसादात् पश्यामि” — कृपा से साक्षात्कार

यहाँ एक महत्वपूर्ण बिन्दु है—

“प्रसादात्” — अनुग्रह से

अर्थात्—

यह दर्शन केवल प्रयास से नहीं

बल्कि अनुग्रह से संभव है

किन्तु यह अनुग्रह—

बाह्य नहीं,

आत्मस्वरूप का ही उद्भव है

“न तु त्वां भृत्यवत् याचे” — याचना नहीं, अधिकार

यह वाक्य अत्यन्त गूढ़ है—

“मैं आपको भृत्य (दास) की तरह नहीं माँगता”

अर्थात्—

यह कोई लौकिक याचना नहीं है

यह कोई फल-प्रार्थना नहीं है

यह—

अधिकारपूर्ण ज्ञान की अभिव्यक्ति है

साधक—

स्वयं को देवता से भिन्न नहीं मानता

“यः असौ आदित्य-मण्डले पुरुषः” — अन्तिम लक्ष्य

यहाँ संकेत है—

उस पुरुष की ओर

जो सूर्य-मण्डल में स्थित है

शांकरार्थ में—

यह कोई भौतिक पुरुष नहीं

बल्कि ब्रह्म-चैतन्य है

दार्शनिक उत्कर्ष

इस पदांश में साधक की स्थिति स्पष्ट होती है—

वह अब याचक नहीं रहा

वह ज्ञाता बन चुका है

वह भेद को मिटाने के निकट है

उपासना से अद्वैत तक

यहाँ एक अद्भुत परिवर्तन है—

पहले → “हे सूर्य!” (द्वैत)

अब → “मैं तुझे भृत्यवत् नहीं माँगता” (अभेद-बोध)

और आगे—

“सोऽहमस्मि” (पूर्ण अद्वैत)

दृष्टांत

जैसे—

कोई व्यक्ति गुरु से ज्ञान प्राप्त कर अंततः यह अनुभव करे कि

“मैं वही हूँ”

तो वह अब याचक नहीं रहता—

वह स्वरूप में स्थित हो जाता है


इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि—

“उपसंहर ते तेजः” → अविद्या-आवरण का शमन

“कल्याणतमं रूपम्” → ब्रह्म का शुद्ध स्वरूप

“न तु त्वां भृत्यवत् याचे” → अभेद-बोध

अतः—

यह केवल प्रार्थना नहीं,

बल्कि आत्मज्ञान के उदय का क्षण है।

यहीं से—

साधक देवता से एक हो जाता है,

और अद्वैत का प्रत्यक्ष अनुभव करता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

प्राजापत्य, व्यूह, समूह” — शांकरभाष्य के पदों का निबंधात्मक विवेचन (षोडश मन्त्र)

प्राजापत्य, व्यूह, समूह” — शांकरभाष्य के पदों का निबंधात्मक विवेचन (षोडश मन्त्र)

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

प्राजापत्य — प्रजापतेः अपत्यं, हे प्राजापत्य!

व्यूह — विगमय रश्मीन् स्वान्।

समूह — एकीकरोतु (एकीकरणं कुरु)॥१६॥

ईशावास्योपनिषद् के षोडश मन्त्र में साधक द्वारा सूर्य को संबोधित करते हुए जो निवेदन किया गया है— “व्यूह रश्मीन्, समूह”— उसका आदि शंकराचार्य ने अत्यन्त सूक्ष्म और दार्शनिक अर्थ में विवेचन किया है। यहाँ यह केवल भौतिक किरणों को हटाने का आग्रह नहीं, बल्कि ज्ञान के मार्ग में उपस्थित आवरणों को दूर करने की आन्तरिक पुकार है।

“प्राजापत्य” — सृष्टि-क्रम का धारक

“प्राजापत्य” का अर्थ है—

प्रजापति का अपत्य (पुत्र)

यहाँ सूर्य को “प्राजापत्य” कहा गया है क्योंकि—

वह सृष्टि-चक्र का धारक है

जीवन के प्रवाह को बनाए रखता है

दार्शनिक रूप में—

यह उस ब्रह्म-शक्ति का प्रतीक है

जो सृष्टि को व्यवस्थित रूप से संचालित करती है

“व्यूह” — आवरण का अपसारण

“व्यूह” शब्द की व्युत्पत्ति—

विगमय (हटा दो, दूर कर दो)

यहाँ साधक कहता है—

“अपनी किरणों को हटा दो”

परन्तु शांकरार्थ में—

“रश्मि” केवल प्रकाश नहीं

बल्कि आवरण (उपाधि, माया, नाम-रूप) भी हैं

अतः—

“व्यूह” = उन आवरणों को हटाना

जो सत्य के दर्शन में बाधक हैं

“रश्मीन् स्वान्” — अपने ही प्रकाश का आवरण

यहाँ एक गहन विरोधाभास है—

वही प्रकाश (सूर्य)

जो सबको प्रकाशित करता है

वही—

अपने अत्यधिक तेज के कारण

सत्य को ढँक भी देता है

इसलिए साधक कहता है—

“अपने ही प्रकाश को कुछ हटाओ”

अर्थात्—

बाह्य प्रखरता कम हो

ताकि आन्तरिक सत्य प्रकट हो सके

“समूह” — एकीकरण की प्रक्रिया

“समूह” का अर्थ है—

एकीकरण करो, समेट लो

यहाँ संकेत है—

बिखरी हुई किरणों को समेटना

विविधता को एकता में लाना

दार्शनिक रूप में—

यह विविध नाम-रूपों का लय है

जो एक ब्रह्म में समाहित हो जाते हैं

“व्यूह” और “समूह” — द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया

ये दोनों शब्द मिलकर एक सम्पूर्ण साधना-पथ को दर्शाते हैं—

व्यूह → हटाना (निवृत्ति)

समूह → एक करना (अद्वैत में स्थित होना)

अतः—

पहले आवरण हटता है

फिर सत्य एकरूप में प्रकट होता है

दार्शनिक गहराई

यहाँ साधक की स्थिति अत्यन्त उच्च है—

वह बाह्य जगत् से हट रहा है

नाम-रूप के आवरणों को त्याग रहा है

और एकत्व की ओर अग्रसर है

यह—

उपासना से ज्ञान की ओर संक्रमण है

दृष्टांत

जैसे—

जब सूर्य की तीव्र किरणें आँखों को चकाचौंध कर देती हैं,

तो उन्हें थोड़ा कम करने पर ही हम स्पष्ट देख पाते हैं—

उसी प्रकार—

बाह्य जगत् का प्रबल आकर्षण

सत्य को ढँक देता है

और—

उसके शांत होने पर ही

आत्मदर्शन संभव होता है

इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि—

“प्राजापत्य” सृष्टि के धारक का संकेत है

“व्यूह” आवरण-निवृत्ति का प्रतीक है

“समूह” एकत्व-स्थापन का द्योतक है

अतः—

यह मन्त्र साधक की उस अन्तिम अवस्था को प्रकट करता है,

जहाँ वह विविधता से उठकर एकत्व में स्थित होना चाहता है।

यही—

उपनिषद् का परम रहस्य है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

यम, ख (सूर्य), प्राजापत्य” — सम्बोधन-पदों का शांकरार्थ मूल पदांश (संशोधित रूप में)

 “यम, ख (सूर्य), प्राजापत्य” — सम्बोधन-पदों का शांकरार्थ मूल पदांश (संशोधित रूप में)

संयमनात् यमः — हे यम!

तथा रश्मीनां, प्राणानां, रसानां च स्वीकरणात् खयः (सूर्यः) — हे ख (सूर्य)!

प्रजापतेः अपत्यं प्राजापत्यः — हे प्राजापत्य!॥१६॥


ईशावास्योपनिषद् के षोडश मन्त्र में साधक द्वारा सूर्य को संबोधित करते हुए प्रयुक्त “यम”, “ख/सूर्य” और “प्राजापत्य” जैसे पद, आदि शंकराचार्य के भाष्य में गहन दार्शनिक अर्थ धारण कर लेते हैं। ये शब्द केवल देवता के नाम नहीं, बल्कि ब्रह्म के विविध कार्य-रूपों और सत्ता-आयामों के प्रतीक हैं।


“यम” — संयम और नियमन का अधिष्ठाता

“यम” शब्द की व्युत्पत्ति है—

संयमनात् यमः

अर्थात्—

जो संयम करता है, नियंत्रित करता है

यहाँ “यम” का अर्थ—


मृत्यु-देवता मात्र नहीं

बल्कि समस्त जगत् का नियामक सिद्धान्त

सूर्य—

काल को नियंत्रित करता है

जीवन-मृत्यु के चक्र को संचालित करता है

अतः—

“हे यम!” — साधक उस परम नियन्ता को सम्बोधित कर रहा है

“ख/सूर्य” — ग्रहण करने वाली शक्ति

शंकराचार्य के अनुसार—

रश्मीनां, प्राणानां, रसानां च स्वीकरणात्

अर्थात्—

सूर्य अपनी किरणों द्वारा

प्राणों और रसों (ऊर्जा, जीवन-तत्त्व) को ग्रहण करता है

इसलिए उसे “ख” (या यहाँ सूर्य के एक विशेष कार्यरूप) कहा गया है।

दार्शनिक अर्थ में—

यह वह शक्ति है—

जो सबको अपने में समाहित करती है

जो जीवन के प्रवाह को संचालित करती है


“प्राजापत्य” — सृष्टि-क्रम का प्रतिनिधि

“प्राजापत्य” का अर्थ है—

प्रजापति का अपत्य (पुत्र)

अर्थात्—

सृष्टिकर्ता (प्रजापति) से उत्पन्न

सृष्टि-व्यवस्था का प्रतिनिधि

यहाँ सूर्य—

सृष्टि के क्रम को बनाए रखने वाला

जीवन-चक्र का धारक

इस प्रकार—

“हे प्राजापत्य!” — साधक सृष्टि के मूल स्रोत से सम्बद्ध सत्ता को पुकार रहा है

सम्बोधनों का समन्वित अर्थ

इन तीनों सम्बोधनों को एक साथ देखें—

यम → नियमन, नियंत्रण

ख/सूर्य → ग्रहण और पोषण

प्राजापत्य → सृष्टि का स्रोत


तो स्पष्ट होता है कि—

 साधक सूर्य में

सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का दर्शन कर रहा है


उपासना का आन्तरिक रूप

यहाँ उपासना केवल बाह्य सूर्य की नहीं है, बल्कि—

उस चेतन सत्ता की है

जो—

नियंत्रित करती है (यम)

पोषण करती है (पूषन्/सूर्य)

उत्पन्न करती है (प्राजापत्य)

ज्ञान की ओर संकेत

इन सम्बोधनों के माध्यम से साधक—

पहले देवता को विभिन्न रूपों में पहचानता है

फिर उसके कार्यों को समझता है

और अंततः उस एकत्व की ओर बढ़ता है


दार्शनिक गहराई

यह भाष्य यह सिखाता है कि—

ब्रह्म एक ही है,

परन्तु—

उसके कार्य अनेक हैं

और उपासना—

इन कार्यरूपों के माध्यम से

उस एक सत्य तक पहुँचने का मार्ग है


इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “यम”, “ख (सूर्य)” और “प्राजापत्य” जैसे सम्बोधन, ब्रह्म के विविध कार्य-रूपों का प्रतीक हैं।

अतः—

साधक इन रूपों के माध्यम से

एक ही परम सत्य का अनुभव करने की दिशा में अग्रसर होता है।

यही इन सम्बोधनों का गूढ़ और दार्शनिक आशय है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

पूषन्नेकर्षे…” पद का शांकरभाष्य — सम्बोधन-पदों का निबंधात्मक विवेचन

 “पूषन्नेकर्षे…” पद का शांकरभाष्य — सम्बोधन-पदों का निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

[पूषन्निति] — पूषन्, हे पूषन्! जगतः पोषणात् पूषा रविः।

तथा — एक एव ऋषति (गच्छति) इति एकर्षिः।

हे एकर्षे! तथा— सर्वस्य नियन्ता…॥१६॥

ईशावास्योपनिषद् के षोडश मन्त्र का आरम्भ “पूषन् एकर्षे…” इन सम्बोधन-पदों से होता है। आदि शंकराचार्य इन पदों की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि यहाँ साधक केवल सूर्य को संबोधित नहीं कर रहा, बल्कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड के पोषक, नियन्ता और साक्षी चैतन्य को पुकार रहा है।

ये सम्बोधन मात्र काव्यात्मक अलंकार नहीं, बल्कि साधक की अन्तःस्थिति और उसके ज्ञान-उद्गार के प्रतीक हैं।

“पूषन्” — जगत् का पोषक

“पूषन्” शब्द की व्युत्पत्ति है—

पोषणात् पूषा

अर्थात्—

जो सम्पूर्ण जगत् का पोषण करता है

शंकराचार्य के अनुसार—

सूर्य समस्त प्राणियों के जीवन का आधार है

वह अन्न, ऊर्जा और जीवन का स्रोत है

अतः—

“पूषन्” यहाँ जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक है


किन्तु गूढ़ अर्थ में

यह ब्रह्म की पोषण-शक्ति का संकेत है

“एकर्षे” — एकमात्र गमनशील, सर्वपथ-प्रदर्शक

“एकर्षि” शब्द का अर्थ है—

“एक एव ऋषति (गच्छति)”

अर्थात्—

जो अकेला चलता है


यहाँ संकेत है

सूर्य आकाश में एकमात्र गति करता हुआ प्रतीत होता है

वह सबका मार्गदर्शक है


दार्शनिक अर्थ में

यह उस चेतना का बोध है

जो—


स्वयंप्रकाश है

और सबको मार्ग दिखाती है

“हे एकमे” — अद्वैत का संकेत

यह सम्बोधन साधक के अद्वैत-बोध को प्रकट करता है—

“एकमे” — तू एक ही है

अर्थात्—

कोई द्वैत नहीं

कोई दूसरा नहीं

यहाँ साधक—

देवता में एकत्व का अनुभव करने लगा है

“सर्वस्य…” — नियन्ता और अधिष्ठाता

शंकराचार्य आगे संकेत करते हैं—

यह पूषन्

केवल पोषक ही नहीं

बल्कि सर्वस्य नियन्ता भी है

अर्थात्—

समस्त जगत् का संचालन उसी से है

वही नियमों का आधार है

यह—

ब्रह्म की ईश्वर-रूप अभिव्यक्ति है

सम्बोधन-पदों का आन्तरिक अर्थ

इन सभी सम्बोधनों को यदि एक साथ देखें—

पूषन् → पोषण करने वाला

एकर्षे → मार्गदर्शक

एकमे → अद्वितीय

सर्वस्य → नियन्ता


तो यह स्पष्ट होता है कि—

साधक बाह्य सूर्य में

ब्रह्म के समस्त गुणों का दर्शन कर रहा है

उपासना से ज्ञान की ओर संक्रमण

यहाँ एक महत्वपूर्ण बिन्दु है—

ये सम्बोधन उपासना के हैं,

परन्तु इनका लक्ष्य ज्ञान है

साधक—

पहले देवता को पुकारता है

फिर उसके स्वरूप को समझता है

और अंततः उसमें एकत्व का अनुभव करता है

दार्शनिक गहराई

यह भाष्यांश यह सिखाता है कि—

उपासना में प्रयुक्त नाम और रूप

वास्तव में ब्रह्म के संकेत हैं


यदि साधक—

उनके गूढ़ अर्थ को समझ ले,

तो वही उपासना—

ज्ञान में परिवर्तित हो जाती है


दृष्टांत

जैसे—

कोई बालक सूर्य को केवल प्रकाश मानता है,

परन्तु धीरे-धीरे वह समझता है कि वही जीवन का आधार है—

उसी प्रकार—

साधक देवता के बाह्य रूप से

उसके आन्तरिक सत्य तक पहुँचता है

इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “पूषन्”, “एकर्षे” आदि सम्बोधन केवल नाम नहीं, बल्कि ब्रह्म के विविध आयामों के द्योतक हैं।

अतः—

उपासना के ये शब्द साधक को बाह्य देवता से उठाकर

आन्तरिक अद्वैत सत्य की ओर ले जाते हैं।

यही इन सम्बोधनों का गूढ़ और दार्शनिक अर्थ है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

ईशावास्योपनिषद् — षोडश मन्त्र का निबंधात्मक विवेचन (उपासना से आत्मदर्शन की उत्कट प्रार्थना)

 ईशावास्योपनिषद् — षोडश मन्त्र का निबंधात्मक विवेचन (उपासना से आत्मदर्शन की उत्कट प्रार्थना)

मन्त्र

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्‌ समूह ।

तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥१६॥

अन्वय

हे पूषन्! हे एकर्षे! हे यम! हे सूर्य! हे प्राजापत्य!

(त्वं) रश्मीन् व्यूह, समूह।

यत् ते कल्याणतमं तेजोरूपं (अस्ति), तत् अहं पश्यामि।

यः असौ असौ पुरुषः, सः अहम् अस्मि।

सामान्य अर्थ

हे पूषन् (पालन करने वाले सूर्य)! हे एकर्षे (एकमात्र मार्गदर्शक)! हे यम (नियन्ता)! हे सूर्य! हे प्रजापति के पुत्र! आप अपने किरणों को समेट लें और अपना तेज कम करें, ताकि मैं आपका वह कल्याणकारी स्वरूप देख सकूँ। जो वह पुरुष (ब्रह्म) वहाँ है— वही मैं हूँ।

ईशावास्योपनिषद् का यह षोडश मन्त्र उपासना-पथ के चरम भाव को व्यक्त करता है। यहाँ साधक बाह्य सूर्य से संवाद करता हुआ प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में यह संवाद अन्तःस्थित ब्रह्म-चैतन्य से है। यह प्रार्थना नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार की दहलीज़ पर खड़े साधक की अन्तिम पुकार है।

“पूषन्, एकर्षे, यम, सूर्य, प्राजापत्य” — एक ही सत्य के विविध रूप

इस मन्त्र में सूर्य को अनेक नामों से संबोधित किया गया है—

पूषन् — पोषण करने वाला

एकर्षे — अकेला चलने वाला, सबका पथ-प्रदर्शक

यम — संयम और नियंत्रण का अधिष्ठाता

सूर्य — प्रकाशस्वरूप

प्राजापत्य — सृष्टिकर्ता का प्रतिनिधि

ये सभी नाम—

एक ही परम सत्य के विभिन्न आयाम हैं

साधक यहाँ बाह्य देवता के माध्यम से—

आन्तरिक ब्रह्म का आवाहन कर रहा है।

“व्यूह रश्मीन्, समूह” — आवरण हटाने की प्रार्थना

यहाँ साधक कहता है—

“अपनी किरणों को समेट लो”

यह अत्यन्त गूढ़ संकेत है—

“रश्मि” = प्रकाश, परन्तु यहाँ आवरण भी

बाह्य तेज इतना प्रबल है कि वह सत्य को ढँक देता है

अतः—

साधक चाहता है कि यह बाह्य प्रकाश हटे

ताकि वह आन्तरिक सत्य को देख सके

“तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमम्” — परम मंगलमय स्वरूप

साधक उस रूप को देखना चाहता है—

जो “कल्याणतम” है

अर्थात्—

जो सर्वोच्च मंगल है

जो शुद्ध, निष्कलंक, निरुपाधिक है

यह—

ब्रह्म का शुद्ध स्वरूप है

जो न नाम है, न रूप है

“तत्ते पश्यामि” — साक्षात्कार की कामना

यह केवल देखने की इच्छा नहीं है—

यह प्रत्यक्ष अनुभूति की आकांक्षा है

यहाँ साधक—

ज्ञान के अंतिम चरण पर है

और अब केवल प्रत्यक्षता चाहता है

“योऽसावसौ पुरुषः” — वह परम पुरुष

“असौ पुरुषः” का अर्थ है—

वह परम पुरुष

जो सूर्य में स्थित है

जो समस्त सृष्टि का आधार है

यहाँ “पुरुष” का अर्थ—

ब्रह्म, आत्मा, चेतन सत्ता

“सोऽहमस्मि” — अद्वैत का चरम उद्घोष

यह मन्त्र का सबसे महत्वपूर्ण भाग है—

 “सोऽहमस्मि”

अर्थात्—

“वह मैं हूँ”

यह—

उपासना का अंत है

द्वैत का लय है

अद्वैत का प्रत्यक्ष अनुभव है

यहाँ साधक—

देवता और अपने बीच का भेद समाप्त कर देता है

दार्शनिक उत्कर्ष

इस मन्त्र में एक अद्भुत यात्रा दिखाई देती है—

देवता का आवाहन

आवरण हटाने की प्रार्थना

शुद्ध स्वरूप का दर्शन

अद्वैत की अनुभूति (सोऽहम्)

पूर्व मन्त्रों से सम्बन्ध

पहले मन्त्रों में → कर्म, उपासना, समुच्चय

अब → प्रत्यक्ष अनुभव

यहाँ साधना—

ज्ञान में परिणत हो जाती है


दृष्टांत

जैसे—

कोई व्यक्ति दर्पण पर जमी धूल हटाकर अपना वास्तविक चेहरा देखे,

उसी प्रकार—

साधक आवरण हटाकर आत्मा को देखता है

इस मन्त्र में आदि शंकराचार्य के अनुसार साधक उपासना से उठकर आत्मज्ञान की अंतिम अवस्था में प्रवेश करता है।

“व्यूह रश्मीन्” — आवरण हटता है

“तत्ते पश्यामि” — सत्य का दर्शन होता है

“सोऽहमस्मि” — अद्वैत की अनुभूति होती है

अतः—

यह मन्त्र केवल प्रार्थना नहीं,

बल्कि आत्मा और ब्रह्म की अभेद अनुभूति का उद्घोष है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,