चिंतन — अध्याय–23 : धर्म क्या है? — भाग–6 : बौद्ध, जैन और सिख परम्पराओं में धर्म
चिंतन — अध्याय–23 : धर्म क्या है? — भाग–6 : बौद्ध, जैन और सिख परम्पराओं में धर्म पिछले भाग में हमने भारतीय आस्तिक दर्शनों में धर्म की अवधारणा का अध्ययन किया। अब हम तीन ऐसी महान भारतीय परम्पराओं की ओर बढ़ते हैं— बौद्ध, जैन और सिख परम्परा —जिन्होंने धर्म को एक विशिष्ट दिशा दी। इन तीनों परम्पराओं की विशेषता यह है कि इन्होंने धर्म को केवल सिद्धान्त या कर्मकाण्ड के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्यक्ष आचरण के रूप में विकसित किया। यहाँ धर्म का मूल्य व्यक्ति के विश्वास से अधिक उसके व्यवहार में दिखाई देता है। बौद्ध परम्परा में 'धम्म' बौद्ध धर्म में संस्कृत के धर्म का पालि रूप धम्म (Dhamma) है। धम्म का अर्थ केवल बुद्ध का उपदेश नहीं है। वह— सत्य, नैतिक जीवन, अस्तित्व का नियम, और दुःख से मुक्ति का मार्ग भी है। बुद्ध ने धर्म का केन्द्र किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर को नहीं बनाया, बल्कि दुःख, उसके कारण, उसके निरोध और उसके निरोध के मार्ग को बनाया। इसलिए बौद्ध धम्म का आधार अनुभव, करुणा और प्रज्ञा है। अष्टांगिक मार्ग : धर्म का व्यावहारिक स्वरूप बुद्ध ने धर्म को जीवन में उतार...