Posts

चिंतन — अध्याय–25 : साक्षी क्या है? — भाग–8 : साक्षी, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार

  चिंतन — अध्याय–25 : साक्षी क्या है? — भाग–8 : साक्षी, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार भारतीय दर्शन में यदि कोई प्रश्न सबसे अधिक भ्रम उत्पन्न करता है, तो वह यह है— क्या साक्षी ही मन है? बहुत से लोग ध्यान करते समय मन को ही साक्षी समझ लेते हैं। कुछ लोग बुद्धि को साक्षी मान लेते हैं, क्योंकि वही निर्णय करती है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि "मैं सोच रहा हूँ", इसलिए सोचने वाला ही साक्षी होगा। किन्तु भारतीय दर्शन की अधिकांश परम्पराएँ—विशेषतः उपनिषद, वेदान्त, योग और सांख्य—इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार साक्षी नहीं हैं; वे स्वयं साक्षी द्वारा प्रकाशित और ज्ञात होने वाले उपकरण (Instruments) हैं। यह भाग इन्हीं चारों अन्तःकरण-वृत्तियों और साक्षी के बीच के सम्बन्ध को स्पष्ट करेगा।   अन्तःकरण क्या है? भारतीय मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य के भीतर केवल मस्तिष्क ही नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म मानसिक व्यवस्था भी कार्य करती है, जिसे अन्तःकरण कहा जाता है। यह चार प्रमुख कार्यों में विभाजित है— मन — संकल्प-विकल्प करता है। बुद्धि — निर्णय करती है। चित्त...

चिंतन — अध्याय–25 : साक्षी क्या है? — भाग–7 : साक्षी, आत्मा और चेतना

  चिंतन — अध्याय –25 : साक्षी क्या है ? — भाग –7 : साक्षी , आत्मा और चेतना भारतीय दर्शन में " साक्षी ", " आत्मा " और " चेतना " तीन ऐसे शब्द हैं जिनका प्रयोग अनेक बार एक - दूसरे के स्थान पर कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि ये तीनों पूर्णतः समानार्थी हैं। वस्तुतः ऐसा नहीं है। कुछ दर्शन इन तीनों को एक ही सत्य के भिन्न नाम मानते हैं , जबकि कुछ दर्शन इनके बीच स्पष्ट भेद स्थापित करते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान और चेतना - अध्ययन (Consciousness Studies) भी "Consciousness", "Self", "Awareness" और "Observer" जैसे शब्दों के बीच अंतर करने का प्रयास करते हैं। इसलिए इस भाग का उद्देश्य किसी मत का समर्थन करना नहीं , बल्कि यह समझना है कि — साक्षी क्या है ?, आत्मा क्या है ?, चेतना क्या है ?,   क्या ये तीनों समान हैं या भिन्न ? यही प्रश्न भारतीय दर्शन के सबसे गहन विमर्शों में से एक ...