मीमांसा की व्याख्या-पद्धति : तात्पर्य-निर्णय के सात लक्षण
मीमांसा की व्याख्या-पद्धति : तात्पर्य-निर्णय के सात लक्षण भारतीय मीमांसा दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने किसी भी ग्रन्थ, वाक्य अथवा शास्त्रीय कथन का वास्तविक अभिप्राय (तात्पर्य) ज्ञात करने के लिए अत्यन्त सूक्ष्म और वैज्ञानिक पद्धति विकसित की। यह पद्धति केवल वैदिक वाङ्मय तक सीमित नहीं है, बल्कि किसी भी गम्भीर ग्रन्थ—चाहे वह धार्मिक हो, दार्शनिक, साहित्यिक, विधिक अथवा वैज्ञानिक—की व्याख्या में समान रूप से उपयोगी सिद्ध हो सकती है। मीमांसकों का मत है कि किसी भी ग्रन्थ का अर्थ केवल एक वाक्य पढ़ लेने से निर्धारित नहीं किया जा सकता। उसके उद्देश्य, प्रसंग, पुनरावृत्ति, परिणाम तथा तर्क-संगति का समग्र अध्ययन आवश्यक है। इसी कारण उन्होंने तात्पर्य-निर्णय के सात प्रमुख लक्षण बताए हैं— उपक्रमोपसंहारोऽभ्यासोऽपूर्वता फलम्। अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये॥ अर्थात् उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति —ये सात किसी भी ग्रन्थ के वास्तविक तात्पर्य को समझने के प्रमुख साधन हैं। १. उपक्रम (प्रारम्भ) परिभाषा ग्रन्थ अथवा किसी प्रकरण के आरम्भ में जिस विषय का प्रतिपादन किया ...