चिंतन - क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है?
चिंतन - क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है? मनुष्य ने बोलना बहुत पहले सीख लिया था, पर मौन को पढ़ना आज तक नहीं सीख पाया। शब्दों का अपना व्याकरण है, अपना कोश है, अपना इतिहास है; किंतु मौन का कोई शब्दकोश नहीं। उसे किसी भाषा में नहीं बाँधा जा सकता। वह लिखा कम जाता है, जिया अधिक जाता है। शायद इसीलिए मैं कभी-कभी सोचता हूँ—क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है? ऐसा शास्त्र, जिसे पढ़ने के लिए आँखों से अधिक अंतःकरण की आवश्यकता होती है। हमने ज्ञान को प्रायः शब्दों में खोजा है। ग्रंथ लिखे, भाष्य रचे, वाद-विवाद किए। किंतु क्या यह विचित्र नहीं कि सबसे बड़ी अनुभूतियाँ शब्दों के समाप्त होने पर ही घटित होती हैं? प्रेम अपने चरम पर पहुँचकर चुप हो जाता है। शोक अपनी गहराई में पहुँचकर रोना भी छोड़ देता है। प्रार्थना अपने शुद्धतम रूप में शब्दों की याचना नहीं रहती, केवल एक मौन उपस्थिति बन जाती है। मानो शब्द यात्रा हों और मौन गंतव्य। मौन को अक्सर लोग अनुपस्थिति समझ लेते हैं। जैसे कुछ न कहना, कुछ न होना। परंतु मौन रिक्तता नहीं, परिपूर्णता भी हो सकता है। जिस प्रकार आकाश खाली दिखाई देता है, जबकि उसी ...