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Friday, 10 April 2026

घर का भेदी लंका ढाए

 घर का भेदी लंका ढाए

कभी सोचा न था

दीवारें यूँ ढह जाएँगी,

जो अपने थे,

वही राह दिखाएँगे अँधेरों की ओर।


लड़ाई बाहर से होती,

तो शायद संभल जाते हम

पर ये वार भीतर से था,

जहाँ विश्वास की जड़ें लगी थीं गहरी।


तुम्हारी मुस्कान में

हमने सुकून पढ़ा था,

कहाँ पता था

वही लफ़्ज़ एक दिन

आग बन जाएँगे।


घर की चौखट पर

हमने जो दीप जलाए थे,

उन्हीं की लौ से

अपना ही आशियाना जलता देखा।


ये कैसी विडंबना है

दुश्मन से नहीं हारे हम,

अपनों की ख़ामोशी से हार गए।


तुम थे तो दीवारें मज़बूत थीं,

तुम ही से दरारें भी आईं

जैसे कोई चाबी

ख़ुद ताले का राज़ खोल दे।


कहते हैं—

“घर का भेदी लंका ढाए”…

अब समझ आया

लंका बाहर नहीं जलती,

वो भीतर राख होती है पहले।


विश्वास जब टूटता है,

तो आवाज़ नहीं करता

बस धीरे-धीरे

सब कुछ ख़ामोश कर देता है।


फिर भी—

इस राख में कहीं

एक चिंगारी बची रहती है,

जो सिखाती है—


कि घर बनाते वक़्त

दीवारों से ज़्यादा

दिलों को मज़बूत करना पड़ता है।


और भरोसा…

उसे हर रोज़ जीना पड़ता है,

वरना एक दिन

वही अपना

सब कुछ जला देता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

नाच न जाने, आँगन टेढ़ा

 नाच न जाने, आँगन टेढ़ा


मनुष्य का स्वभाव बड़ा विचित्र है

वह अपनी सफलताओं का श्रेय स्वयं लेता है,

पर अपनी असफलताओं के लिए

कोई न कोई “आँगन” खोज ही लेता है,

जिसे वह टेढ़ा कह सके।


“नाच न जाने, आँगन टेढ़ा”

यह कहावत केवल हास्य नहीं,

बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे उस अहंकार का सूक्ष्म चित्र है,

जो अपनी कमियों को स्वीकार करने से कतराता है।


कल्पना कीजिए

एक नर्तक, जिसे लय का ज्ञान नहीं,

जिसके पाँव ताल से अनजान हैं,

वह जब आँगन में उतरता है,

तो नृत्य की सुंदरता उसके हाथ से छूट जाती है।


पर वह ठहरकर यह नहीं सोचता

कि शायद अभ्यास की कमी है,

या समझ की आवश्यकता है

वह तुरंत कह उठता है,

“आँगन ही टेढ़ा है!”


यही तो मनुष्य का सबसे सहज बहाना है

अपनी सीमाओं को छुपाने के लिए

परिस्थितियों को दोष देना।


हमारे जीवन में भी यह आँगन

कई रूपों में सामने आता है

कभी समय को दोष देते हैं,

कभी परिस्थितियों को,

कभी दूसरों को…

और कभी-कभी तो भाग्य को भी।


पर सच यह है

आँगन अक्सर सीधा ही होता है,

बस हमारे कदमों में ही संतुलन की कमी होती है।


यह कहावत हमें एक दर्पण देती है

जिसमें हम अपने भीतर की उस प्रवृत्ति को देख सकते हैं,

जो आत्मालोचन से बचना चाहती है।


आत्मस्वीकृति आसान नहीं होती।

अपनी कमियों को मान लेना

अहंकार को चोट पहुँचाता है।

पर यही चोट

विकास का पहला कदम भी बनती है।


जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं

कि नृत्य में कमी हमारी है,

तभी हम सीखने की ओर बढ़ते हैं।

अन्यथा हम जीवन भर

टेढ़े आँगन की शिकायत करते रह जाते हैं।


इस कहावत का सौंदर्य

इसके व्यंग्य में छिपा है

वह हमें हँसाते-हँसाते

हमारी सच्चाई से मिला देती है।


अंततः,

“नाच न जाने, आँगन टेढ़ा”

सिर्फ़ एक कहावत नहीं,

बल्कि एक चेतावनी है


कि अगर हम अपने भीतर झाँकने का साहस नहीं करेंगे,

तो हर आँगन हमें टेढ़ा ही दिखेगा…

और हमारा नृत्य

कभी पूर्ण नहीं हो पाएगा।


मुकेश ,,,,,,,,,

ऊँट के मुँह में जीरा

ऊँट के मुँह में जीरा

रेगिस्तान की नीरवता में खड़ा ऊँट—विशाल, धैर्यवान, और अपनी भूख में एक अलग ही विस्तार लिए—जब अपने मुँह में जीरे का एक छोटा-सा दाना महसूस करता होगा, तो शायद वह भी क्षणभर के लिए ठिठक जाता होगा।

यह दाना न तो उसकी भूख को शांत कर सकता है, न ही उसकी थकान को हर सकता है। फिर भी, वह उसे ग्रहण करता है—जैसे जीवन की विडंबनाओं को चुपचाप स्वीकार कर लेना उसकी नियति हो।


“ऊँट के मुँह में जीरा”—यह कहावत केवल मात्रा की न्यूनता का संकेत नहीं, बल्कि मनुष्य के अनुभवों की उस गहराई को भी छूती है, जहाँ अपेक्षाएँ और प्राप्तियाँ एक-दूसरे से बहुत दूर खड़ी होती हैं।


हमारे जीवन में भी ऐसे अनेक क्षण आते हैं, जब हमारी आकांक्षाएँ ऊँट की भूख की तरह विस्तृत होती हैं, और जो हमें मिलता है, वह जीरे के दाने जितना सूक्ष्म।

किसी विद्यार्थी की मेहनत के सामने मिले अंक,

किसी श्रमिक के श्रम के सामने मिली मजदूरी,

या किसी प्रेमी के समर्पण के सामने मिला उत्तर

कई बार सब कुछ “ऊँट के मुँह में जीरा” ही प्रतीत होता है।


पर इस कहावत का एक दूसरा, सूक्ष्म अर्थ भी है

यह हमें हमारी अपेक्षाओं की प्रकृति पर विचार करने को प्रेरित करती है।

क्या सच में हमारी भूख इतनी बड़ी है, या हमने उसे अनावश्यक रूप से विस्तृत कर लिया है?

क्या हर बार हमें संतोष के लिए विशालता ही चाहिए, या छोटे-छोटे जीरे के दानों में भी जीवन का स्वाद छिपा हो सकता है?


जीरा—जो अपने आप में छोटा है,

पर अपनी सुगंध में अद्भुत है।

वह भोजन को स्वाद देता है,

उसकी उपस्थिति कम होकर भी प्रभावशाली होती है।


शायद जीवन भी हमें यही सिखाता है

कि हर छोटी चीज़ को केवल उसकी मात्रा से नहीं,

उसके प्रभाव से भी आँकना चाहिए।


ऊँट का विशाल मुँह और जीरे का सूक्ष्म दाना

इन दोनों के बीच जो दूरी है,

वही मनुष्य के भीतर की अतृप्ति और संतोष के बीच की दूरी भी है।


यह कहावत हमें हँसाती जरूर है,

पर भीतर कहीं एक गंभीर प्रश्न भी छोड़ जाती है

क्या हम सच में अभाव में हैं,

या हमारी इच्छाएँ ही हमें अभाव का अनुभव कराती हैं?


अंततः, “ऊँट के मुँह में जीरा” केवल एक व्यंग्य नहीं,

बल्कि जीवन का एक दर्पण है

जो हमें दिखाता है कि

संतोष का आकार बाहर नहीं,

भीतर तय होता है।


मुकेश',,,,,,,, 

मैं—नदी का घाट।

 मैं—नदी का घाट।

पत्थरों की सीढ़ियों में ढली एक स्मृति,

जहाँ जल केवल बहता नहीं

जीवन ठहर-ठहर कर अपने अर्थ खोजता है।


तुम मुझे बस उतरने-चढ़ने की जगह समझते हो,

पर मैं उन कदमों का संग्रह हूँ

जो श्रद्धा, थकान, प्रेम और विरह लेकर

मेरी देह पर पड़ते हैं।


मैंने अनगिनत सूर्योदय देखे हैं

जब पहली किरण

नदी के माथे को छूती है,

और लोग अपने भीतर की अंधेरी परतों को

जल में उतारने आते हैं।


मेरी सीढ़ियाँ केवल पत्थर नहीं,

ये समय के पन्ने हैं

जहाँ हर कदम एक कहानी है,

हर ठहराव एक प्रार्थना।


कभी कोई माँ

अपने बच्चे का पहला स्नान कराती है,

तो कहीं कोई वृद्ध

अपने जीवन की अंतिम इच्छाएँ

जल में सौंप जाता है।


मैंने हँसी भी सुनी है,

और रोना भी

मेरे किनारों पर

जीवन और मृत्यु

एक साथ बैठकर बातें करते हैं।


शाम होते ही

दीपों की कतारें सजती हैं,

और मैं रोशनी से भर उठता हूँ

जैसे अँधेरे को भी

कोई रास्ता मिल गया हो।


पर मेरी कहानी केवल आध्यात्मिक नहीं

मैं इतिहास का साक्षी भी हूँ।

मेरे किनारों पर सभ्यताएँ पनपीं,

व्यापार हुआ, संवाद हुआ,

और समय ने अपने निशान छोड़े।


आज भी लोग आते हैं

पर बदल गई है उनकी दृष्टि।

कुछ मेरे सौंदर्य में तस्वीरें खोजते हैं,

कुछ मेरी गहराई में अर्थ।


मेरे पत्थर घिस गए हैं,

पर मेरी स्मृतियाँ नहीं

हर लहर के साथ

वे फिर जीवित हो उठती हैं।


कभी-कभी मैं भी थक जाता हूँ

जब मेरे जल को मैला किया जाता है,

जब मेरी शांति को शोर से भर दिया जाता है।


पर मैं फिर भी स्थिर हूँ

क्योंकि मेरा धर्म है

लोगों को जोड़ना

धरती से जल,

और जल से आत्मा तक।


मैं घाट हूँ

नदी का किनारा नहीं,

बल्कि उस किनारे का अर्थ हूँ।


अगर कभी तुम सच में

खुद से मिलना चाहो,

तो मेरी सीढ़ियों पर बैठना

और बहते जल को देखना…


शायद तुम्हें समझ आ जाए

कि जीवन भी एक नदी है,

और हम सब

बस उसके किनारे ठहरते हुए

कुछ पल के यात्री।


मुकेश ,,,,,,,,,

मैं—एक कबूतर।

 मैं—एक कबूतर।

तुम्हारी नज़र में साधारण,

पर विज्ञान की दृष्टि में

एक जटिल रहस्य।


मेरा नाम भले ही आम है,

पर मेरी प्रजाति—Columba livia

सदियों से मानव सभ्यता के साथ

एक सहजीवी (symbiotic) संबंध में रही है।


मैंने तुम्हारे शहर बसते देखे हैं,

और उनसे पहले

चट्टानों की खामोशी में भी जीवन जिया है।

आज तुम मुझे इमारतों पर देखते हो

पर ये दीवारें ही मेरे लिए

आधुनिक “चट्टानें” हैं।


मेरी सबसे बड़ी पहचान

मेरी “घर लौटने की क्षमता” (homing ability)।

तुमने सुना होगा

दूर छोड़े जाने के बाद भी

मैं अपने घोंसले तक पहुँच जाता हूँ।


यह जादू नहीं,

बल्कि एक जटिल जैव-भौतिक प्रणाली है

मैं पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) को महसूस करता हूँ,

सूर्य की दिशा को पढ़ता हूँ,

और गंध के संकेतों को भी पहचानता हूँ।


कई प्रयोग हुए हैं मुझ पर

वैज्ञानिकों ने मुझे सैकड़ों किलोमीटर दूर छोड़ा,

और मैंने फिर भी रास्ता खोज लिया।


तुम सोचते हो,

मैं बस दाने चुगता हूँ

पर मेरे भोजन चयन में भी

ऊर्जा-संतुलन (energy optimization) छिपा है।


मैं बीज खाता हूँ,

पर उसी के साथ

शहरों की पारिस्थितिकी (urban ecology) का हिस्सा बन जाता हूँ।


मेरे प्रजनन का तरीका भी रोचक है

मैं और मेरी संगिनी

मिलकर अंडों को सेते हैं।

हाँ,

यहाँ “पितृत्व” भी सक्रिय है

मैं केवल साथी नहीं,

सह-पालक (co-parent) हूँ।


मेरे बच्चों को

मैं “क्रॉप मिल्क” (crop milk) खिलाता हूँ

यह एक विशेष द्रव है,

जो मेरे शरीर में बनता है।


तुम्हें लगता है

मैं हर जगह एक जैसा हूँ

पर मेरे रंग, आकार, व्यवहार

पर्यावरण के अनुसार बदलते हैं।


मैंने युद्धों में भी सेवा दी

संदेशवाहक बनकर,

जब तकनीक इतनी विकसित नहीं थी।


पर आज

मैं भीड़ में खो गया हूँ।

लोग मुझे अनदेखा कर देते हैं,

या केवल “गंदगी” का कारण मानते हैं।


मेरे अस्तित्व का अध्ययन

अब भी जारी है

क्योंकि मैं केवल एक पक्षी नहीं,

बल्कि “अनुकूलन” (adaptation) का जीवित उदाहरण हूँ।


मैं कबूतर हूँ

न कोई रहस्यपूर्ण चमत्कार,

न ही कोई साधारण जीव


मैं विज्ञान और जीवन के बीच

एक पुल हूँ।


अगर तुम सच में मुझे समझना चाहो,

तो मुझे केवल उड़ते हुए मत देखो

मेरी दिशा को समझो…


क्योंकि मैं

केवल पंखों से नहीं,

ज्ञान से भी उड़ता हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

मैं—एक गिलहरी

 मैं—एक गिलहरी।

छोटी-सी, चंचल-सी,

पर मेरी कहानी

केवल फुर्ती नहीं,

विज्ञान की बारीकियों में भी दर्ज है।


मेरे शरीर की ये तीन धारियाँ

कोई अलंकार नहीं,

ये पहचान हैं मेरी प्रजाति की,

जैसे किसी शोधपत्र में लिखा गया

एक स्थायी निष्कर्ष।


मैं पेड़ों पर दौड़ती हूँ,

पर ये सिर्फ़ खेल नहीं

ये “अनुकूलन” (adaptation) है,

मेरे पंजों की पकड़,

मेरी पूँछ का संतुलन,

सब प्रकृति की प्रयोगशाला में सिद्ध हुआ है।


तुम्हें लगता है,

मैं बस दाने इकट्ठा करती हूँ

पर ये संग्रह नहीं,

“भविष्य-नियोजन” (future planning) है,

जहाँ हर छुपाया हुआ बीज

एक संभावना है

या तो भोजन,

या एक नया पेड़।


हाँ,

मैं अनजाने में जंगल उगाती हूँ।


मेरी याददाश्त पर भी

कई अध्ययन हुए हैं

मैं सब याद नहीं रख पाती,

पर जो भूल जाती हूँ,

वही धरती याद रख लेती है।


इस तरह,

मेरी भूल भी

पर्यावरण का योगदान बन जाती है।


मैं छोटी हूँ,

पर मेरा डर बड़ा है

हर पल सतर्क रहना पड़ता है,

क्योंकि शिकारी केवल जंगल में नहीं,

अब शहरों में भी हैं।


तुम्हारी दुनिया

मेरे लिए आसान नहीं रही

पेड़ कम हुए,

दीवारें बढ़ीं,

पर मैंने खुद को ढाला

अब मैं तारों पर भी दौड़ लेती हूँ,

छतों को भी जंगल बना लेती हूँ।


मेरी भाषा

तुम्हें “चिक-चिक” लगती है,

पर वह संचार है

खतरे का संकेत,

या साथी को पुकार।


मैं खेलती भी हूँ,

कूदती भी हूँ

पर हर हरकत में

जीवविज्ञान का संतुलन छिपा है।


कभी ध्यान से देखना

मैं जब रुकती हूँ,

तो स्थिर नहीं होती,

मैं “निरीक्षण” (observation) कर रही होती हूँ,

चारों ओर की हर हलचल को पढ़ती हुई।


मैं गिलहरी हूँ

न तो जंगल की रानी,

न शहर की मालिक

पर दोनों के बीच

एक सेतु जरूर हूँ।


मेरी कहानी

न तो सिर्फ़ प्यारी है,

न ही केवल साधारण


यह एक जीवित शोध है,

जहाँ हर छलाँग

एक निष्कर्ष है,

और हर डर

एक परिकल्पना।


अगर तुम सच में समझना चाहो,

तो मुझे केवल देखना मत

मुझे “पढ़ना”…


क्योंकि मैं

एक छोटी-सी गिलहरी नहीं,

प्रकृति की चलती-फिरती

एक शोध-पत्र हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,,

पुरुष का प्रेम झरने की तरह होता है

 पुरुष का प्रेम झरने की तरह होता है

अचानक, तीव्र, और पूरे अस्तित्व के साथ गिर पड़ने वाला।

वह शुरुआत में धीमा नहीं होता,

वह ठहर-ठहर कर बोलना नहीं जानता

जब प्रेम करता है,

तो सीधे ऊँचाइयों से कूद पड़ता है,

बिना यह सोचे कि नीचे कितनी गहराई है।


उसके प्रेम में शब्द कम होते हैं,

पर प्रवाह बहुत होता है।

वह “कहता” कम है,

“बहता” ज़्यादा है।


वह हर पल खुद को तोड़ता है

अपनी जिद, अपना अहं, अपनी खामोशी…

और उन्हीं टुकड़ों को

प्रेम की बूँदों में बदल देता है।


पर लोग अक्सर उसके शोर को ही सुनते हैं,

उसकी गहराई नहीं समझते।


जैसे झरना

ऊपर से देखने पर बस गिरता हुआ पानी लगता है,

पर उसके भीतर

पहाड़ की पूरी कहानी बह रही होती है।


पुरुष का प्रेम भी ऐसा ही है

वह सीधे इज़हार नहीं करता,

पर हर गिरावट में, हर कोशिश में,

वह अपना सब कुछ सौंप देता है।


कभी-कभी वह कठोर भी लगता है

पत्थरों से टकराता हुआ,

आवाज़ करता हुआ…

पर वही टकराहट

उसे संगीत देती है।


और जब उसका प्रेम सच्चा होता है,

तो उसकी बूँदों में भी इंद्रधनुष दिखता है

बस देखने वाली नज़र चाहिए।


पर एक सच्चाई और है

झरना हमेशा झरना नहीं रहता…

वह आगे चलकर नदी बन जाता है।


ठीक वैसे ही,

पुरुष का प्रेम भी

समय के साथ शांत, गहरा और विस्तृत हो जाता है।


शुरुआत में वह झरने की तरह होता है

उन्मुक्त, बेकाबू, और पूरी तरह समर्पित।


और अगर वह टिक गया,

तो वही प्रेम

नदी बनकर जीवन भर साथ बहता है।


क्योंकि

पुरुष का प्रेम दिखता कम है,

पर जब होता है,

तो पूरे अस्तित्व के साथ होता है…

एक झरने की तरह

जो गिरता भी है,

और जीवन भी देता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,