महाभारत — उद्योगपर्व — भाग 17 : उलूक-दूत — शान्ति के बाद युद्ध की खुली चुनौती
महाभारत — उद्योगपर्व — भाग 17 : उलूक-दूत — शान्ति के बाद युद्ध की खुली चुनौती उद्योगपर्व की शुरुआत शान्ति की खोज से हुई थी। पाण्डवों ने अपना अधिकार माँगा। संजय दूत बनकर गया। विदुर ने धृतराष्ट्र को समझाया। सनत्सुजात ने मृत्यु और अमृत का प्रश्न उठाया। कृष्ण स्वयं शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर गए। कर्ण को जन्म-सत्य बताया गया। कुन्ती ने अपने पुत्र से युद्ध के बीच पुत्रधर्म की माँग की। और अन्ततः दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी सेनाएँ एकत्र कर लीं। अब दुर्योधन की ओर से उलूक पाण्डवों के पास भेजा जाता है। लेकिन इस बार दूत का उद्देश्य सन्धि कराना नहीं है। अब भाषा बदल चुकी है। दूत वही है, लेकिन राजनीति की भाषा बदल गई है। उलूक का आगमन उलूक पाण्डवों के पास दुर्योधन का संदेश लेकर आता है। यह प्रसंग युद्ध के ठीक पूर्व का है और इसकी विशेषता यह है कि दुर्योधन अपने प्रतिद्वन्द्वियों से सीधे संवाद करने के बजाय दूत के माध्यम से चुनौती देता है। यह प्राचीन कूटनीति की सामान्य संरचना के भीतर है। दूत स्वयं युद्ध नहीं करता। वह राजा की वाणी लेकर आता है। इसलिए उलूक के शब्दों को केवल उसके व्यक्तिगत विचार नहीं माना जा सकता...