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Wednesday, 1 April 2026

दुनिया बहुत जल्दी में है

 दुनिया बहुत जल्दी में है


1.

दुनिया बहुत जल्दी में है

इतनी जल्दी

कि

रुककर

अपनी ही धड़कन नहीं सुनती।


2.

मैंने

लोगों को भागते देखा है

बिना यह जाने

कि

उन्हें पहुँचना कहाँ है।


3.

घड़ियाँ

अब समय नहीं बतातीं

बस

हड़बड़ी का हिसाब रखती हैं।


4.

एक बच्चा

धीरे-धीरे चल रहा था

किसी ने कहा, “जल्दी करो!”

और

उस दिन

उसकी चाल में

बचपन कम हो गया।


5.

मैंने

एक बूढ़े को देखा

जो धीरे-धीरे

अपनी साँसें गिन रहा था

दुनिया

उसे पीछे छोड़कर

आगे निकल गई।


6.

यहाँ

सब कुछ तेज़ है

सड़कें,

सपने,

रिश्ते

बस

ठहराव

सबसे पीछे छूट गया है।


7.

लोग

खुशियाँ भी

जल्दी-जल्दी मनाते हैं

जैसे

दुःख कहीं

इंतज़ार कर रहा हो।


8.

किसी के पास

समय नहीं है

पर

सबके पास

थकान बहुत है।


9.

ज़िन्दगी

कोई दौड़ नहीं थी

हमने ही

उसे रेस बना दिया।


10.

मैंने

कई लोगों को

मंज़िल पर पहुँचते देखा

पर

उनकी आँखों में

रास्ता नहीं था।


11.

दुनिया बहुत जल्दी में है

और मैं

थोड़ा-सा ठहर गया हूँ


शायद

यही

मेरी सबसे बड़ी

जल्दी है।


मुकेश ,,,,,,,,,

टूटी चप्पल में भागता हुआ विजेता

 टूटी चप्पल में भागता हुआ विजेता


1.

कहाँ गया वो लड़का

जिसकी चप्पल हमेशा

एड़ी से छूट जाती थी

पर

वो फिर भी

सबसे आगे दौड़ता था?


2.

एक हाथ से

चप्पल संभालता,

दूसरे से

संतुलन

और

पैर

फिर भी

हार मानने को तैयार नहीं।


3.

लोग हँसते थे—

“अरे, पहले चप्पल ठीक कर!”

पर

उसे जल्दी थी

जीतने की नहीं,

रुकने से बचने की।


4.

उसकी दौड़

सीधी नहीं थी

थोड़ी टेढ़ी,

थोड़ी डगमग

पर

हर ठोकर के बाद

वो और तेज़ हो जाता था।


5.

एक बार

चप्पल पूरी तरह टूट गई

और वो

नंगे पैर ही दौड़ पड़ा

शायद

यही असली आज़ादी थी।


6.

धूल उड़ती थी

उसके पीछे

जैसे

कोई कह रहा हो

“देखो,

यह लड़का

हालात से तेज़ है!”


7.

न कोई ट्रॉफी,

न कोई तालियाँ

बस

अपनी साँसों की आवाज़

और

धड़कनों का शोर

यही

उसकी जीत थी।


8.

अब

वो लड़का

शायद बड़ा हो गया है

जूते सही हैं,

कदम संभले हुए

पर

वो बेपरवाह दौड़

कहीं छूट गई।


9.

ज़िन्दगी में

सब कुछ ठीक हो जाए

तो

दौड़

धीमी पड़ जाती है

टूटी चप्पल

शायद

हिम्मत देती थी।


10.

ऐसे भी विजेता हैं

जो हारने से डरते हैं

और

ऐसे भी

जो टूटकर भी

दौड़ते रहते हैं।


11.

मेरे दोस्त!

अगर कभी

सब कुछ सही लगे

तो

थोड़ा-सा

टूट जाना


ताकि

तुम्हें याद रहे

विजेता

हमेशा

सही हालत में नहीं होते।


मुकेश ,,,,,

साइकिल के टायर को डंडे से दौड़ाता लड़का

 साइकिल के टायर को डंडे से दौड़ाता लड़का


1.

कहाँ गई वो गली

जहाँ

एक टेढ़ा-सा डंडा

और एक पुराना टायर

पूरी दुनिया बन जाते थे

और एक लड़का

उसे दौड़ाते-दौड़ाते

खुद उड़ने लगता था।


2.

मैं

उस टायर के पीछे

भागता था

या

वो टायर

मुझे कहीं ले जा रहा था

आज तक समझ नहीं पाया।


3.

न कोई गोलपोस्ट,

न कोई स्कोर

बस

गिरने से पहले

उसे संभाल लेना

यही

जीत थी।


4.

एक मोड़ पर

टायर अक्सर डगमगा जाता

और मैं

हड़बड़ाकर

उसे सीधा करता

जैसे

ज़िन्दगी का संतुलन

मेरे ही हाथ में हो।


5.

गली के लोग

हँसते थे

पर

मुझे फर्क नहीं पड़ता था

क्योंकि

मैं

किसी रेस में नहीं,

खुद में था।


6.

कभी-कभी

टायर भाग जाता

बहुत आगे

और मैं

पीछे छूट जाता

शायद

यही होता है

बड़ा होना।


7.

अब

सड़कें चौड़ी हैं,

गाड़ियाँ तेज़

पर

किसी के पास

वो टायर नहीं

जिसे

दिल से दौड़ाया जाए।


8.

मैंने

उस टायर के साथ

कई सपने दौड़ाए थे

कुछ गिर गए,

कुछ मुड़ गए

पर

कुछ आज भी

कहीं घूम रहे हैं।


9.

ज़िन्दगी

शायद वही टायर है

जिसे

सीधा रखने के लिए

एक डंडा चाहिए

और

थोड़ी-सी जिद।


10.

ऐसे भी बच्चे हैं

जो अब

स्क्रीन पर दौड़ते हैं

पर

उनकी साँसें

कभी नहीं हाँफतीं।


11.

मेरे दोस्त!

अगर कहीं मिले

वो पुराना टायर—

तो

एक बार फिर

दौड़ाना—


देखना,

तुम

फिर से

थोड़े छोटे हो जाओगे।


मुकेश ,,,,

जाड़े की रातों में अलाव तापते हुए — घर भर के साथ ‘हवामहल’ सुनना

 जाड़े की रातों में अलाव तापते हुए — घर भर के साथ ‘हवामहल’ सुनना


1.

जाड़े की रात थी,

आँगन में अलाव जलता था

और हम

गोल घेरा बनाकर बैठते थे—

बीच में आग,

और किनारों पर

हमारी साँसें भाप बनती हुई।


2.

रेडियो की आवाज़

थोड़ी खड़खड़ाती थी

पर

‘हवामहल’ शुरू होते ही

पूरा घर

किसी और दुनिया में चला जाता था।


3.

मैं

दादी के पास बैठा रहता था

और

उनकी उँगलियों की गर्मी में

कहानी के डर भी

धीमे पड़ जाते थे।


4.

हर किरदार

रेडियो से निकलकर

हमारे बीच बैठ जाता था

और

हम

बिना देखे

सब कुछ देख लेते थे।


5.

बीच-बीच में

कोई लकड़ी खिसकाता,

कोई राख कुरेदता

और

कहानी

फिर से जल उठती थी।


6.

अब

अलाव कम जलते हैं,

रेडियो भी चुप है

और

घर के लोग

अपने-अपने कमरों में

अलग-अलग कहानियाँ सुनते हैं।


7.

कभी-कभी

ठंडी रात में

मन करता है

फिर से वही सब हो—

एक अलाव,

एक रेडियो,

और

पूरा घर

एक ही कहानी में सिमटा हुआ।


मुकेश ,,,,,,,,

स्कूल के बाद की वो आधी धूप

 स्कूल के बाद की वो आधी धूप

(एक पुरुष की तरफ़ से — सात छोटी कविताएँ)


1.

स्कूल छूटते ही

जो आधी धूप गिरती थी गली में

वहीं

कुछ लड़कियाँ

अपनी चोटी खोलकर

हँसी पहन लेती थीं—

मैं

बस दूर खड़ा

देखता रह जाता था।


2.

उनके बस्ते

हल्के हो जाते थे

घर पहुँचने से पहले

जैसे

किताबें नहीं,

दिन भर की बंदिशें

उतार फेंकी हों उन्होंने।


3.

मैंने

कभी उनसे बात नहीं की

पर

उनकी हँसी

मुझे नाम से पुकारती थी

और मैं

हर बार अनसुना कर देता था।


4.

आधी धूप में

उनके साये

लम्बे हो जाते थे

और

मैं सोचता था

क्या उनके सपने भी

इतने ही लम्बे होंगे?


5.

एक लड़की थी

जो चलते-चलते

बार-बार पीछे देखती थी

शायद

किसी को ढूँढ रही थी

या

खुद को छोड़ आई थी कहीं।


6.

अब

वो गली तो है,

पर

वो आधी धूप नहीं

शायद

इमारतों ने

उसे बाँट लिया है।


7.

कभी-कभी

शाम के वक़्त

मैं उसी रास्ते से गुज़रता हूँ

और मन में पूछता हूँ

क्या

वो लड़कियाँ

अब भी

किसी धूप में

आधी ही हँसती होंगी?


मुकेश ,,,,,,

सहेलियों की दुनिया, जहाँ कोई जजमेंट नहीं था

 सहेलियों की दुनिया, जहाँ कोई जजमेंट नहीं था

(एक पुरुष की नज़र से)


1.

वे

एक साथ बैठती थीं—

जमीन पर,

चौखट पर,

सीढ़ियों पर

और

दुनिया को

अपने घेरे से बाहर रख देती थीं।


2.

मैं

थोड़ी दूरी पर रहता था

जैसे

उस दुनिया में

मेरी इजाज़त नहीं थी

और सच कहूँ,

शायद

ज़रूरत भी नहीं।


3.

उनकी हँसी

बिना वजह होती थी—

और

उसी में

सारे जवाब छुपे होते थे

बिना किसी सवाल के।


4.

कोई किसी को

टोकता नहीं था

ना कपड़ों पर,

ना शक्ल पर,

ना सपनों पर

बस

होने दिया जाता था।


5.

एक लड़की

अपनी बात अधूरी छोड़ देती

दूसरी

उसे पूरा कर देती—

जैसे

उनके बीच

शब्द नहीं,

समझ बहती थी।


6.

मैंने

कई बार देखा

वे

एक-दूसरे की

कमज़ोरियाँ जानती थीं

पर

उन्हें हथियार नहीं बनाती थीं।


7.

उनके बीच

ना कोई जज था,

ना कोई अदालत

बस

कुछ दिल थे

जो एक-दूसरे को

बरी कर देते थे।


8.

आज

वो लड़कियाँ

औरतें हो गई होंगी

शायद

अब

उन्हें भी

जज किया जाता होगा।


9.

उनकी वो दुनिया

बहुत छोटी थी—

पर

उसमें

किसी को

छोटा नहीं किया जाता था।


10.

मैंने

कभी हिस्सा नहीं लिया

पर

आज समझता हूँ

वो

सबसे सुरक्षित जगह थी

इस दुनिया की।


11.

काश

हम मर्द भी

सीख पाते—

बिना जज किए

सिर्फ़ साथ होना—


तो

शायद

हमारी दुनिया भी

थोड़ी कम कठोर होती।


मुकेश ,,,,,

कूदती रस्सी और अटकी हुई साँसें

 कूदती रस्सी और अटकी हुई साँसें

(एक आदमी की यादों से)


1.

अब

कहीं नहीं दिखतीं

दो चोटी वाली लड़कियाँ

जो

आँगन में

रस्सी की टप-टप पर

दुनिया भुला देती थीं।


2.

मैं खड़ा रहता था

थोड़ा दूर

और देखता था

उनकी गिनती

“एक… दो… तीन…”

जैसे

वक़्त भी

उनके साथ कूद रहा हो।


3.

एक लड़की थी

जो हर बार

हँसते-हँसते

रस्सी में उलझ जाती थी

आज

वही

ज़िन्दगी में

कहीं उलझ गई होगी।


4.

अब

ना वो आँगन है,

ना वो रस्सी,

ना वो हँसी

बस

यादों की धूल में

कुछ आवाज़ें पड़ी हैं।


5.

कूदने से पहले

वे

एक-दूसरे को देखती थीं

जैसे पूछ रही हों

“तैयार?”

और फिर

बिना जवाब के

उड़ जाती थीं।


6.

मैंने

कई बार सोचा

उनसे कहूँ

मुझे भी सिखा दो

पर

लड़के

उस खेल में

शामिल नहीं होते थे।


7.

अब

लड़कियाँ दिखती हैं

मोबाइल में झुकी हुई,

रील्स में कूदती हुई

पर

वो असली साँसें

अब कहीं अटक गई हैं।


8.

हर बार

जब रस्सी ज़मीन से टकराती थी

एक लय बनती थी

अब

शहर में

बस शोर है,

कोई लय नहीं।


9.

ज़िन्दगी

शायद वही रस्सी थी

जो

हम सबके बीच

घूम रही थी

हमने ही

उसे छोड़ दिया।


10.

ऐसा नहीं है

कि लड़कियाँ अब नहीं हँसतीं

पर

वैसी बेफ़िक्र हँसी

अब

किसी को नहीं आती।


11.

कभी-कभी

मन करता है

एक रस्सी खरीद लाऊँ

और

किसी गली में खड़ा होकर पूछूँ—

“कोई है

जो कूदना जानता हो?”


पर

डर लगता है

कहीं

कोई जवाब ना दे।


मुकेश ,,,,