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Monday, 25 May 2026

पुराने स्वेटर की ऊष्मा

पुराने स्वेटर की ऊष्मा

सर्दियाँ अब वैसी नहीं रहीं
जैसी पहले हुआ करती थीं।

अब धूप में
वह पुरानी आलस्य भरी गर्मी नहीं उतरती,
और रातें भी
इतनी चुप नहीं होतीं।

फिर भी
हर वर्ष दिसंबर आते ही
मैं अलमारी के सबसे नीचे रखे
उस पुराने स्वेटर को निकाल लेता हूँ।

उसका रंग
अब ठीक-ठीक याद नहीं आता।

शायद कभी नीला था।
या धूसर।

समय ने
रंगों को भी धीरे-धीरे
स्मृति में बदल दिया है।

उसकी बाँहें
हल्की ढीली पड़ चुकी हैं,
ऊन कई जगह से उभर आई है,
और गर्दन के पास
एक छोटा-सा धागा
अब भी बाहर निकला हुआ है।

उसे पहनते ही
हर बार
एक अजीब-सी अनुभूति होती है।

जैसे शरीर नहीं,
कोई पुराना समय
फिर से मुझे ढँक रहा हो।

मुझे हमेशा लगता है —

कपड़े सिर्फ़ कपड़े नहीं होते।

वे अपने भीतर
मनुष्यों की ऋतुएँ बचाकर रखते हैं।

इस स्वेटर ने
कितनी सर्दियाँ देखी होंगी।

रेलवे प्लेटफ़ॉर्म की ठंडी सुबहें,
कोहरे में खोई सड़कें,
छत पर बैठकर पी गई चाय,
देर रात तक पढ़ी गई किताबें,
और वे चुप शामें
जब जीवन
बिना किसी स्पष्ट कारण के
बहुत उदास लगने लगता था।

कभी-कभी
मुझे लगता है
उसकी ऊन में
अब भी कुछ आवाज़ें अटकी हुई हैं।

किसी का कहना —
“इतनी ठंड में बाहर मत जाइए…”

किसी का
हँसते हुए बाँह खींच लेना।

किसी का
बहुत पास आकर
धीरे से पूछना —
“आप हमेशा इतने चुप क्यों रहते हैं?”

और मैं सोचता हूँ —

मनुष्य
सबसे ज़्यादा उन्हीं चीज़ों से जुड़ता है
जो धीरे-धीरे पुरानी होती जाती हैं।

नई वस्तुओं में
चमक होती है,
लेकिन पुरानी चीज़ों में
जीवन जमा रहता है।

मैंने स्वेटर की बाँह पर
हाथ फेरा।

ऊन ठंडी थी,
लेकिन उसके भीतर
एक बहुत हल्की ऊष्मा बची हुई थी।

जैसे कोई अनुपस्थित व्यक्ति
अब भी
पूरी तरह गया न हो।

बाहर शाम उतर रही थी।

पड़ोस में
किसी ने पानी गरम करने की मशीन चलाई,
दूर मंदिर से घंटी की आवाज़ आई,
और आकाश में
धुँध धीरे-धीरे भरने लगी।

मैं कुर्सी पर बैठा रहा।

कमरे में
धीरे-धीरे अँधेरा बढ़ता गया,
लेकिन उस पुराने स्वेटर के भीतर
अब भी
किसी बीती हुई सर्दी की धड़कन बची हुई थी।

और मुझे लगा —

कुछ वस्तुएँ
समय को रोक नहीं पातीं,
लेकिन उसके चले जाने के बाद भी
उसकी थोड़ी-सी गर्मी बचाकर रख लेती हैं।

— मुकेश

सड़क किनारे बैठा आदमी

 सड़क किनारे बैठा आदमी

(अल्बेर कामू की शैली से प्रेरित)

दोपहर बहुत गर्म थी।
सड़क धूप में सफ़ेद चमक रही थी और लोग जल्दी-जल्दी अपने कामों में लगे हुए थे।

एक आदमी सड़क किनारे पत्थर पर बैठा था।

वह कोई भिखारी नहीं था। उसके कपड़े साफ़ थे। चेहरा साधारण था। लेकिन उसके बैठने के ढंग में कुछ ऐसा था जैसे वह कहीं जाने की जल्दी में नहीं है।

लोग उसके पास से गुजरते रहे।

कुछ देर बाद एक लड़का उसके सामने रुका और बोला,
“आप यहाँ क्यों बैठे हैं?”

आदमी ने थोड़ी देर उसे देखा। फिर कहा,
“थक गया हूँ।”

लड़के ने सहजता से पूछा,
“काम से?”

आदमी हल्का-सा मुस्कुराया।

“नहीं। अर्थ ढूँढने से।”

लड़का उसकी बात नहीं समझा। वह चला गया।

दोपहर और गर्म हो गई।

आदमी ने सड़क को देखा।
हर कोई कहीं पहुँचने की जल्दी में था।
और अचानक उसे लगा कि शायद पूरी दुनिया लगातार चल रही है ताकि उसे रुककर सोचना न पड़े।

उसने आँखें बंद कर लीं।

उसे याद आया — कभी उसे विश्वास था कि जीवन का कोई स्पष्ट उद्देश्य होगा। फिर धीरे-धीरे उद्देश्य टूटते गए। पहले धर्म में, फिर प्रेम में, फिर काम में।

अब सिर्फ़ दिन बचे थे — आते हुए, जाते हुए।

लेकिन अजीब बात यह थी कि इस सबके बावजूद वह जीवित था।

एक हवा का झोंका आया।

उसने पहली बार महसूस किया कि शायद जीवन का अर्थ “मिलना” आवश्यक नहीं है।
शायद जीना ही पर्याप्त है — बिना अंतिम उत्तर के भी।

वह पत्थर से उठा।

सड़क अब भी वैसी ही थी। धूप भी।

लेकिन उसके भीतर कुछ हल्का हो गया था।

जैसे उसने जीवन को समझा नहीं,
सिर्फ़ स्वीकार कर लिया हो।


अल्बेर कामू का संक्षिप्त परिचय

अल्बेर कामू फ्रांसीसी-अल्जीरियाई लेखक, दार्शनिक और पत्रकार थे। उनका जन्म 1913 में अल्जीरिया में हुआ, जो उस समय फ्रांस के अधीन था।

कामू “Absurdism” यानी जीवन की निरर्थकता और मनुष्य की अर्थ-खोज के संघर्ष के दार्शनिक विचार के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका मानना था कि जीवन में कोई अंतिम, निश्चित अर्थ नहीं है, फिर भी मनुष्य को ईमानदारी और साहस के साथ जीते रहना चाहिए।

उनकी प्रमुख कृतियों में The Stranger, The Myth of Sisyphus और The Plague शामिल हैं।

1957 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। उनकी लेखन-शैली सरल, शांत और गहरे अस्तित्वगत प्रश्नों से भरी हुई मानी जाती है।


Mukesh,,,,

भीगी हुई शाम का चेहरा

भीगी हुई शाम का चेहरा

रात, ख़ुशबू और अधूरी बात

 रात, ख़ुशबू और अधूरी बात

(फ़िराक़ गोरखपुरी की शैली से प्रेरित एक नज़्म)

रात चुप थी,
मगर हवाओं में
तेरी याद की हल्की-सी आहट थी।

जैसे किसी पुराने बाग़ में
देर तक ठहरी हुई
रात-रानी की ख़ुशबू।

मैं बहुत देर
यूँ ही खिड़की पर बैठा रहा।

शहर सो गया था,
लेकिन कुछ रिश्ते
नींद के बाद भी जागते रहते हैं।

तुम्हारा ख़याल
आज फिर
बिना आवाज़ आए कमरे में उतर आया —
धीरे से,
जैसे चाँदनी
पुरानी किताबों पर गिरती है।

मैंने सोचा,
मोहब्बत शायद मिलना नहीं होती,
वह किसी की अनुपस्थिति को
धीरे-धीरे अपने भीतर बसाना होती है।

दूर कहीं
कोई ट्रेन गुज़री।

और उस आवाज़ में
मुझे अपनी उम्र का एक हिस्सा
धीरे-धीरे जाता हुआ लगा।

रात और गहरी हो गई।

मगर तेरी याद —
वह अब भी
हवा में ऐसे तैर रही थी
जैसे कोई अधूरी बात
जिसे समय भी पूरा नहीं कर पाया।


फ़िराक़ गोरखपुरी का संक्षिप्त परिचय

फ़िराक़ गोरखपुरी उर्दू के महान शायरों में गिने जाते हैं। उनका वास्तविक नाम रघुपति सहाय था। उनका जन्म 1896 में गोरखपुर, भारत में हुआ और 1982 में उनका निधन हुआ।

फ़िराक़ की शायरी में प्रेम, अकेलापन, स्मृति, सौंदर्य और मानवीय संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी भाषा अत्यंत कोमल, संगीतात्मक और भावनात्मक गहराई से भरी होती है।

उन्होंने उर्दू ग़ज़ल और नज़्म को आधुनिक संवेदनाओं से जोड़ा। उनकी प्रमुख कृतियों में गुले-नग़्मा, रूह-ए-कायनात और शबनमिस्तान शामिल हैं।

1969 में उन्हें गुले-नग़्मा के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। फ़िराक़ की कविता में प्रेम केवल रोमांटिक अनुभव नहीं, बल्कि जीवन की गहरी उदासी और सौंदर्य का अनुभव बन जाता है।


Mukesh ,,,,,,,,,,,

समुद्र के किनारे शाम

 समुद्र के किनारे शाम

(अर्नेस्ट हेमिंग्वे की शैली से प्रेरित एक नज़्म)

शाम धीरे-धीरे
समुद्र पर उतर रही थी।

एक बूढ़ा आदमी
किनारे बैठा
पानी को देख रहा था।

लहरें आती थीं,
फिर लौट जाती थीं।

बहुत-सी चीज़ें
ऐसी ही होती हैं।

उसके पास
एक पुरानी टोपी थी,
एक खाली बोतल,
और कुछ यादें
जिन्हें अब वह नाम नहीं देता था।

दूर कुछ लड़के
हँसते हुए भागे।

वह उन्हें देखता रहा।

उसे याद नहीं आया
कि वह भी कभी ऐसा था या नहीं।

हवा में नमक था।

उसने जेब से
मुड़ी हुई तस्वीर निकाली।
कुछ देर देखी।
फिर वापस रख ली।

समुद्र के सामने
आदमी अक्सर कम बोलता है।

क्योंकि वहाँ
हर सवाल
बहुत छोटा लगने लगता है।

अँधेरा थोड़ा और बढ़ा।

बूढ़ा आदमी उठा,
धीरे-धीरे चला
और पीछे मुड़कर नहीं देखा।

समुद्र अब भी वहीं था।

जैसे कुछ चीज़ें
हमारे चले जाने के बाद भी
बिना दुख के बनी रहती हैं।


अर्नेस्ट हेमिंग्वे का संक्षिप्त परिचय

अर्नेस्ट हेमिंग्वे विश्व साहित्य के अत्यंत प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक थे। उनका जन्म 1899 में अमेरिका में हुआ और 1961 में उनका निधन हुआ।

हेमिंग्वे अपनी संक्षिप्त, सीधी और प्रभावशाली लेखन-शैली के लिए जाने जाते हैं। उनकी रचनाओं में कम शब्दों में गहरी भावनाएँ और मनोवैज्ञानिक तनाव व्यक्त होता है। इसे “Iceberg Theory” कहा जाता है — जहाँ कहानी का अधिकांश अर्थ सतह के नीचे छिपा रहता है।

उनकी प्रमुख कृतियों में The Old Man and the Sea, A Farewell to Arms, For Whom the Bell Tolls और The Sun Also Rises शामिल हैं।

1954 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। उनकी रचनाओं में अकेलापन, साहस, असफलता, युद्ध और मनुष्य की आंतरिक दृढ़ता बार-बार दिखाई देती है।

धुएँ में बची हुई आवाज़

 धुएँ में बची हुई आवाज़

(फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शैली से प्रेरित एक नज़्म)

रात यूँ थी
जैसे किसी पुराने ख़त पर
धीरे-धीरे धूल उतरती हो।

शहर सो चुका था,
मगर कुछ खिड़कियों में
अब भी उदासी जल रही थी।

मैंने सोचा,
मोहब्बत शायद वही चीज़ है
जो ख़त्म होने के बाद भी
आदमी के लहजे में बची रहती है।

तुम्हारा नाम
अब भी कमरे की हवा में
बहुत हल्के से तैरता है —
जैसे धुएँ में कोई भूली हुई आवाज़।

मैंने कई बार चाहा
कि तुम्हें
एक साधारण स्मृति की तरह भूल जाऊँ,
मगर कुछ रिश्ते
भुलाए नहीं जाते,
वे बस
धीरे-धीरे ख़ामोश हो जाते हैं।

बाहर सन्नाटा था।

दूर कहीं
रेल गुज़री।

और मुझे लगा —
ज़िंदगी भी शायद
ऐसी ही कोई चीज़ है,
जो रुकती कहीं नहीं,
लेकिन अपने पीछे
एक लंबी उदासी छोड़ जाती है।


फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का संक्षिप्त परिचय

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू के विश्वप्रसिद्ध शायर थे। उनका जन्म 1911 में ब्रिटिश भारत (अब पाकिस्तान) में हुआ और 1984 में उनका निधन हुआ।

फ़ैज़ की शायरी में प्रेम, विरह, क्रांति, सामाजिक न्याय और मानवीय करुणा का अद्भुत मेल मिलता है। उनकी भाषा बेहद मुलायम, संगीतात्मक और भावनात्मक गहराई से भरी होती है।

उनकी प्रसिद्ध कृतियों में नक़्श-ए-फ़रियादी, दस्त-ए-सबा, ज़िंदाननामा और सर-ए-वादी-ए-सीना शामिल हैं।

फ़ैज़ की कविता में व्यक्तिगत प्रेम अक्सर सामाजिक संवेदना और इंसानी दर्द से जुड़ जाता है, इसलिए उनकी नज़्में केवल प्रेम की नहीं, बल्कि पूरे मनुष्य की तकलीफ़ की आवाज़ बन जाती हैं।

रात की आख़िरी चाय

रात की आख़िरी चाय
(हेमिंग्वे की शैली से प्रेरित)

ढाबा लगभग खाली था।
रात बहुत आगे बढ़ चुकी थी।

एक आदमी
खिड़की के पास बैठा
धीरे-धीरे चाय पी रहा था।

चाय अब ठंडी हो गई थी,
लेकिन वह फिर भी कप हाथ में लिए रहा 
जैसे कुछ चीज़ें
स्वाद के लिए नहीं,
साथ के लिए पकड़ी जाती हैं।

बाहर हाईवे पर
ट्रकों की रोशनियाँ
कभी-कभी अँधेरे को काटती हुई निकल जातीं।

उसने जेब से पुरानी रसीद निकाली।
पीछे किसी का नंबर लिखा था।

स्याही हल्की पड़ चुकी थी।

उसने कुछ क्षण उसे देखा,
फिर मोड़कर वापस रख लिया।

ढाबे वाला ऊँघ रहा था।

रात में जागते हुए लोग
अक्सर एक-दूसरे से सवाल नहीं पूछते।

आदमी ने आख़िरी घूँट पिया।

उसे अचानक लगा —
ज़िंदगी में बहुत-सी चीज़ें
समाप्त नहीं होतीं,
वे बस
धीरे-धीरे उपयोग में आना बंद हो जाती हैं।

जैसे पुराने नंबर।
पुरानी जगहें।
पुराने वादे।

उसने पैसे मेज़ पर रखे
और बाहर आ गया।

हवा ठंडी थी।

सड़क लंबी थी
और लगभग खाली।

वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा,
फिर बिना किसी जल्दी के
चलने लगा।

जैसे उसे कहीं पहुँचना नहीं था 
सिर्फ़ चलते रहना था।