तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 15 : यादव-संघ और आंतरिक राजनीति
तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 15 : यादव-संघ और आंतरिक राजनीति — कृष्ण का नेतृत्व कृष्ण की राजनीतिक शक्ति को केवल कंस और जरासंध जैसे बाहरी शत्रुओं के संदर्भ में समझना अधूरा है। द्वारका पहुँचने के बाद एक दूसरी चुनौती सामने आती है— यादवों के भीतर अनेक कुलों, शाखाओं और नेतृत्व-केंद्रों को एक साथ बनाए रखना। हरिवंश में यादव कोई एकरूप राजवंश नहीं दिखाई देते। वृष्णि, अन्धक, भोज और अन्य संबद्ध कुलों की स्मृतियाँ इस व्यापक यादव संसार का हिस्सा हैं। यही विविधता उसकी शक्ति भी है और संभावित कमजोरी भी। यादवों का व्यापक संसार यादव पहचान को केवल एक व्यक्ति की वंशावली समझना उचित नहीं। यदु से जुड़ी अनेक शाखाएँ समय के साथ अलग-अलग नामों और राजनीतिक इकाइयों के रूप में सामने आती हैं। कृष्ण की अपनी पहचान भी एक से अधिक स्तरों पर बनती है—वे यदुवंशी हैं, वृष्णि परंपरा से जुड़े हैं और वसुदेव के पुत्र हैं। इसलिए जब हम ‘यादव’ कहते हैं तो उसके पीछे एक विस्तृत सामाजिक-राजनीतिक समूह की कल्पना करनी चाहिए, न कि आधुनिक अर्थ में एक केंद्रीकृत राज्य की। नेतृत्व की समस्या द्वारका में कृष्ण की प्रतिष्ठा...