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Sunday, 22 March 2026

सावन, झूला… और तुम

 

सावन, झूला… और तुम

सावन उतरा है

धीमे-धीमे, भीगा हुआ,

जैसे आसमान ने

अपने दिल की बात

धरती पर लिख दी हो…


और उस भीगी हुई ख़ामोशी में

तुम हो…


एक झूले पर बैठी,

पीपल की उस पुरानी शाख़ से बंधी

रस्सियों के सहारे

हवा से बातें करती हुई…


तुम्हारा लहँगा

भीगी पत्तियों-सा हरा,

और चुन्नी

जैसे बादलों की कोई नरम लहर

तुम्हारे कंधों पर ठहर गई हो…


मैं पास खड़ा हूँ

धोती-कुर्ता पहने,

भीगता हुआ…

पर भीगता नहीं…


क्योंकि जो भीग रहा है

वो बाहर नहीं,

अंदर है…



तुम झूलती हो

धीरे-धीरे,

फिर ज़रा तेज़…


और हर बार

जब तुम मेरी तरफ आती हो

तुम्हारी आँखों में

एक शरारत चमकती है…


जैसे पूछ रही हो

“पकड़ सकते हो मुझे?”


और मैं—

बस मुस्कुरा देता हूँ…


क्योंकि कुछ चीज़ें

पकड़ी नहीं जातीं

उन्हें बस

देखा जाता है,

महसूस किया जाता है…



बारिश की बूँदें

तुम्हारे बालों से फिसलकर

ज़मीन पर गिरती हैं…


और हर बूँद

जैसे कोई धड़कन हो

जो मेरे नाम से टकरा रही हो…



मैं झूले को

हल्का-सा धक्का देता हूँ

और तुम हवा में

थोड़ी और ऊपर उठ जाती हो…


जैसे इश्क़

अपने ही वज़न से

हल्का हो जाता है…



तुम हँसती हो

और तुम्हारी हँसी

सावन की पहली गूँज बन जाती है…


मैं उसे पकड़ना चाहता हूँ—

पर वो भी

बारिश की तरह

हथेलियों से फिसल जाती है…



उस पल

ना वक़्त है,

ना दुनिया…


बस एक झूला है

जो आगे-पीछे नहीं,

दो दिलों के बीच

झूल रहा है…



तुम अचानक

रुक जाती हो

और मुझे देखती हो…


गहरी,

ठहरी हुई नज़र से…


जैसे पूछ रही हो

“ये जो है…

ये कितना सच्चा है?”


मैं पास आता हूँ

भीगी मिट्टी की ख़ुशबू में लिपटा हुआ

और धीरे से कहता हूँ


“इतना…

कि ये सावन भी

एक दिन ख़त्म हो जाएगा

पर ये एहसास नहीं…”



और फिर

तुम फिर से झूलने लगती हो…


सावन फिर से बरसता है…


और मैं—

वहीं खड़ा—

तुम्हें देखता रहता हूँ…


जैसे हर बारिश

तुमसे ही शुरू होती हो…


मुकेश ,,,,

आईने में एक और चेहरा

 आईने में एक और चेहरा  (गद्य-काव्य आत्मयात्रा)


आज सुबह आईने में चेहरा थोड़ा अलग लगा।

बिलकुल वही आँखें थीं, वही होंठ, वही ललाट 

लेकिन कुछ था जो पहले नहीं था।

या शायद पहले भी था,

मगर देखने की फुर्सत कहाँ थी?

आईने में वो चेहरा कुछ कह रहा था,

पर आवाज़ नहीं आ रही थी।

केवल होंठ हिलते थे 

जैसे किसी बीते समय का दृश्य मूक चल रहा हो।

मैंने ज़रा गौर से देखा 

उस चेहरे में कोई पुरानी थकावट बसी थी,

वो थकावट जो केवल वे लोग लाते हैं

जो अक्सर मुस्कुराते हैं

मगर भीतर टूटते रहते हैं।

आईना चुप था

पर उसकी ख़ामोशी में एक पुकार थी।

कहता था 

"तेरा सच तुझसे बाहर नहीं,

तेरे भीतर है — पर तुझसे छिपा हुआ।

तेरे हर झूठ में भी एक सच्चाई दबी है

जो तुझसे मिलना चाहती है।"

मैंने अपने चेहरे को छुआ 

नर्म था, मगर ठंडा।

जैसे बरसों से किसी ने उसे छूआ ही न हो

सिर्फ़ माँ की हथेली ने कभी

इसे गर्म किया था।

आईने के पीछे

कोई बैठा था 

शायद वही बच्चा

जो अक्सर सपनों में आता था

और पूछता था,

"तू रोता क्यों नहीं अब?"

मैंने जवाब देना चाहा

मगर गला रुंध गया।

शायद सच यही था 

मैंने रोना भूल गया था।

या शायद, रोना अब भी भीतर ही भीतर

बर्फ़ की तरह जमा है।


शब्द अब भी रुके हैं,

पर आईना अब दोस्त बन गया है।

हर सुबह कुछ पूछता है,

और मैं हर रात कुछ खोता हूँ।


क्या आपने कभी आईने से बात की है?

उससे जो चुपचाप आपके सारे समय देखता है,

पर कभी कुछ कहता नहीं?

क्या आप भी उस चेहरे से मिले हैं

जो आपको देखता है 

पर पहचानता नहीं?


मुकेश ,,,,,,,,


रात की पलकों पर ठहरी हुई तुम


 रात की पलकों पर ठहरी हुई तुम


रात है

धीरे-धीरे उतरती हुई,

जैसे कोई ख़्वाब

आँखों की देहरी पर आकर ठहर गया हो।


और उस ठहराव में

तुम हो…


चुप,

मुलायम,

जैसे चाँदनी ने

खुद को तुम्हारे चेहरे पर सजा लिया हो।


मैं तुम्हें देखता हूँ

दूर से नहीं,

बहुत पास से भी नहीं…

बस उतना,

जहाँ नज़र और एहसास

एक हो जाते हैं।


तुम्हारी आँखें

रात का सबसे गहरा हिस्सा,

और उनमें चमकते छोटे-छोटे सितारे

जैसे मेरी हर अधूरी ख्वाहिश

तुममें पूरी हो रही हो।


“क्या देख रहे हो?”

तुम धीरे से पूछती हो


मैं मुस्कुरा देता हूँ

“रात को…

जो तुम्हारी पलकों पर ठहर गई है।”


तुम हल्के से शरमा जाती हो

और वो शरमाना

पूरी रात को और भी खूबसूरत बना देता है।


हवा थम-सी जाती है,

झरना भी जैसे

अपनी रफ्तार धीमी कर देता है…


क्योंकि उस पल

सब कुछ तुम्हारे इर्द-गिर्द घूम रहा होता है।


मैं हाथ बढ़ाता हूँ

तुम्हारे चेहरे के पास…

पर छूता नहीं


क्योंकि

कुछ चीज़ें सिर्फ़ महसूस करने के लिए होती हैं।


तुम मेरी तरफ देखती हो

गहराई से…

जैसे कोई सवाल पूछना चाहती हो

पर जवाब पहले ही जानती हो।



“अगर ये रात यहीं रुक जाए तो?”

मैं पूछता हूँ


तुम मुस्कुरा कर कहती हो

“तो हम भी यहीं रह जाएँगे…”


और फिर—

खामोशी दोनों के बीच

एक नई भाषा बन जाती है।


न कोई वादा,

न कोई इकरार

बस एक एहसास,

जो हर शब्द से परे है।



शायद प्रेम यही है

जब कोई

रात की पलकों पर ठहर जाए,

और फिर कभी

उतरने का मन न करे…


और तुम

ठीक वैसी ही हो…


रात की पलकों पर ठहरी हुई…


मुकेश ,

तुम्हें सोचते हुए

 तुम्हें सोचते हुए


जब

कभी तुम्हें सोचता हूँ,

तो यूँ लगता है

जैसे कोई इबादत

अपने आप हो रही हो।


तुम

कोई शख़्स नहीं लगती,

एक एहसास लगती हो

जो छूता नहीं,

फिर भी

हर जगह मौजूद रहता है।


तुम्हारी आँखें

जैसे किसी शांत झील पर

ठहरी हुई सुबह,

और होंठ

जैसे अधखिली दुआ

जो बस कहे जाने की प्रतीक्षा में हो।


तुम्हारा चेहरा…

कोई सूरत नहीं,

एक ठहराव है—

जहाँ दिल

थककर भी

रुकना चाहता है।


तुम्हें देखना

जैसे इश्क़ करना नहीं,

इश्क़ में उतरना है—

धीरे-धीरे,

बिना शोर,

बिना वजह।


और फिर

न जाने कब

ये चाहत

आदत बन जाती है

और आदत

इबादत।


जहाँ

न पाने की जल्दी रहती है,

न खोने का डर—

बस एक ख्वाहिश होती है,

कि तुम यूँ ही रहो…

मेरे ख्यालों में,

मेरी रूह के आसपास।


सच…

तुम्हें चाहना

कोई कोशिश नहीं,

मेरी फितरत हो गई है


बिलकुल वैसे ही,

जैसे सांस लेना—

बिना थके,

बिना रुके,

बिना सोचे…


हमेशा।


मुकेश इलाहाबादी,

प्रेम की वो भोली सी तस्वीर

 प्रेम की वो भोली सी तस्वीर

प्रेम की वो भोली सी तस्वीर
अब भी कहीं टंगी है
मेरे दिल की दीवार पर,
थोड़ी फीकी,
पर उतनी ही सच्ची।

उसमें तुम हो
हँसती हुई,
बिना किसी बनावट के,
जैसे सुबह की पहली रोशनी
धीरे से आँखों को छू जाए।

तुम्हारी आँखों में
कोई चालाकी नहीं थी,
बस एक सीधी-सी ज़िद थी
मुझे वैसे ही चाहने की
जैसा मैं था।

हम दोनों उस तस्वीर में
कुछ भी बनने की कोशिश में नहीं थे,
बस साथ होने की सादगी में
पूरा संसार जी रहे थे।

वक़्त ने उस तस्वीर पर
धूल ज़रूर बिठा दी है,
पर अजीब बात है
उसकी मासूमियत अब भी
मेरे भीतर चमकती है।

प्रेम की वो भोली सी तस्वीर
कभी-कभी यूँ ही
आँखों के सामने आ जाती है,
और मैं मुस्कुरा देता हूँ…
जैसे कोई पुराना सपना
फिर से सच हो गया हो।

— मुकेश इलाहाबादी 

कई बार तुम ख़ामोशी में भी शोर बन जाती हो—

 कई बार तुम ख़ामोशी में भी शोर बन जाती हो—

एक अनकही सी धुन,
जो मेरे भीतर देर तक बजती रहती है।

कई बार तुम सवालों में उलझी
एक मासूम पहेली लगती हो,
जिसे सुलझाने का मन नहीं करता,
बस निहारने का जी चाहता है।

तब तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो—
जब तुम तर्क से नहीं,
दिल से जीती हो हर लम्हा।

कभी रूठकर यूँ बैठ जाती हो
जैसे दुनिया से कोई रिश्ता ही नहीं,
और मैं सोचता रह जाता हूँ—
कि तुम्हारी उस खामोशी में
कितना कुछ कहा हुआ होता है।

कई बार तुम प्रेम में
बारिश की पहली बूँद बन जाती हो—
बेख़बर, बेकाबू,
और पूरी तरह सच्ची।

तब तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो…
जब तुम बस "तुम" होती हो।

— मुकेश इलाहाबादी 

Saturday, 21 March 2026

इत्र-सी बिखरी हुई तुम्हारी यादों का मौसम



 इत्र-सी बिखरी हुई तुम्हारी यादों का मौसम

इत्र-सी बिखरी हुई
तुम्हारी यादों का मौसम है,

हर साँस में
तेरा ही कोई अहसास ठहरा है।

हवा जब भी चलती है—
तेरी ख़ुशबू
दिल के दर खोल जाती है,

और मैं…
बेख़ुद-सा होकर
उसी महक में खो जाता हूँ।

ना तुम हो,
ना तुम्हारी आहट—
फिर भी हर तरफ़
तुम्हारी मौजूदगी का आलम है।

शायद…
यादें भी इत्र की तरह होती हैं—
एक बार लग जाएँ
तो उम्र भर साथ रहती हैं।