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Sunday, 5 April 2026

तुम्हारी याद और जामुन की कच्ची मिठास

 तुम्हारी याद और जामुन की कच्ची मिठास


तुम्हारी याद…

सीधी नहीं आती,

वो भीतर कहीं

धीरे-धीरे घुलती है

जैसे जामुन का पहला कौर

जिसमें मिठास से पहले

एक हल्की-सी कसक होती है।


वो कसक…

जो जीभ पर नहीं,

दिल के किसी कोने में उतरती है।


तुम्हें याद करना

कोई घटना नहीं है,

ये एक स्वाद है

जो अचानक

बिना बुलाए

मुंह में भर जाता है।


पहले हल्का-सा खट्टापन,

फिर

एक अधूरी-सी मिठास,

और उसके बाद

एक रंग—

जो देर तक

छूटता नहीं।


तुम्हारी याद में

कोई शोर नहीं है,

न कोई पुकार

बस एक धीमी-सी उपस्थिति,

जो हर चीज़ के किनारे

लगी रहती है।


जैसे गर्मी की दोपहर में

पेड़ के नीचे

गिरे हुए जामुन,

जिन्हें कोई उठा नहीं रहा,

पर उनकी गंध

हवा में बनी हुई है।


कभी-कभी

मैं खुद को रोकता हूँ

तुम्हें याद करने से

पर यादें

रोकने से नहीं रुकतीं,

वो तो बस

और गहरी हो जाती हैं।


जैसे जामुन का रंग

हाथों पर चढ़कर

धीरे-धीरे

त्वचा में उतरता है।


तुम्हारे जाने के बाद

कुछ भी पूरी तरह कड़वा नहीं रहा,

और कुछ भी

पूरी तरह मीठा भी नहीं।


हर चीज़ में

थोड़ी-सी तुम हो

और थोड़ी-सी

तुम्हारी कमी।


तुम्हारी याद…

अब कोई चेहरा नहीं रही,

न कोई आवाज़—


बस एक स्वाद है,

जो कभी खत्म नहीं होता,

बस बदलता रहता है

खट्टे से मीठे में,

मीठे से

फिर उस अजीब-सी कसैलापन में

जिसका कोई नाम नहीं।


और मैं…

हर बार

उसी स्वाद को चखता हूँ,

जैसे कोई

जान-बूझकर

कच्चा जामुन खा ले


ये जानते हुए भी

कि उसके बाद

प्यास और बढ़ेगी।


मुकेश ,,,,

तुम और नीम की छाँव में ठहरा हुआ वक़्त

 तुम और नीम की छाँव में ठहरा हुआ वक़्त


तुम…

ज़्यादा बोलती नहीं थीं,

पर जब भी होती थीं

लगता था

दिन थोड़ा धीमा हो गया है।


जैसे दोपहर

अचानक कहीं बैठ गई हो—

नीम के पेड़ के नीचे।


तुम्हारे मैसेज

बहुत छोटे होते थे

“आ गए?”

“खाना खाया?”

“गरमी बहुत है…”


बस इतना ही।


पर न जाने क्यों

इन तीन-चार शब्दों में

एक पूरा साया होता था,

जिसमें बैठ कर

थोड़ी देर

आराम किया जा सकता था।


तुम्हारी मौजूदगी…

नीम की छाँव जैसी थी


थोड़ी कड़वी,

थोड़ी सच्ची,

पर सुकून देती हुई।


तुम कभी मीठी बातें नहीं करती थीं,

न ही कोई बड़ी-बड़ी भावनाएँ

बस सीधे-सीधे

जैसा है वैसा।


एक दिन मैंने लिखा

“तुम बदल गई हो।”


तुमने जवाब दिया—

“नहीं, बस अब उतना रुकती नहीं…”


और उस “रुकती नहीं” में

कितना कुछ था

जो तुमने कहा नहीं।


धीरे-धीरे

तुम्हारे मैसेज कम हो गए।


नीम की छाँव

जैसे खिसकने लगी

दोपहर वही थी,

पर साया

अब कहीं और चला गया था।


मैं कभी-कभी

पुरानी चैट खोलकर बैठता हूँ,

जैसे कोई

पुराने पेड़ के नीचे

अपनी जगह ढूँढ रहा हो।


पर अब

वो सुकून नहीं मिलता

बस याद आती है 

कि कभी यहाँ

ठंडक थी।


तुम अब भी हो शायद,

कहीं न कहीं,

किसी और दोपहर में,

किसी और छाँव के साथ।


सोचता हूँ

मैसेज करूँ


“गरमी बहुत है…”


फिर लगता है

तुम जवाब दोगी—

“हम्म…”


और बात

वहीं खत्म हो जाएगी।


वैसे…

कुछ बातें

नीम की छाँव जैसी होती हैं

वक़्त के साथ

खुद ही आगे बढ़ जाती हैं,

और हम

वहीं बैठे रह जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,

उसकी चुप्पी और आम के बौर

 उसकी चुप्पी और आम के बौर


वो लड़की…

ज़्यादा कुछ नहीं कहती थी,

पर हर मौसम में

किसी न किसी तरह

मौजूद रहती थी।


फरवरी-मार्च के आसपास

उसकी याद

कुछ ज़्यादा आने लगती थी

शायद इसलिए कि

इन्हीं दिनों

आम के बौर आते हैं।


उसकी चुप्पी…

ठीक वैसी ही थी

जैसे आम के पेड़ पर

अचानक उग आए बौर,

बिना शोर,

बिना घोषणा।


दूर से देखो तो

कुछ खास नहीं,

पर पास जाओ

तो एक हल्की-सी गंध

पूरे मन में फैल जाती है।


वो ऑनलाइन रहती थी,

पर बात नहीं करती थी।


कभी-कभी

मेरे स्टेटस देख लेती थी

बस “seen”

और फिर

लंबी चुप्पी।


एक बार मैंने लिखा—

“तुम कुछ बोलती क्यों नहीं?”


उसने जवाब दिया

“सब कहना ज़रूरी नहीं होता…”


और उस दिन

मुझे पहली बार लगा

कि चुप रहना भी

एक तरह की भाषा है।


उसकी चुप्पी में

कोई नाराज़गी नहीं थी,

न ही कोई साफ़ इनकार

बस एक अधूरा-सा

ठहराव,

जैसे बौर में छुपा हुआ

अधपका आम।


धीरे-धीरे

मैंने उसकी चुप्पी को

समझना शुरू किया


वो हर बार

कुछ कहती नहीं थी,

पर हर बार

कुछ छोड़ जाती थी

एक हल्की-सी महक,

एक अधूरी-सी बात,

एक ऐसा एहसास

जिसका नाम नहीं होता।


फिर एक दिन

वो बिल्कुल चुप हो गई।


न “seen”,

न ऑनलाइन,

न कोई आहट।


अब कभी-कभी

जब हवा में

आम के बौर की खुशबू आती है,

तो लगता है

वो कहीं पास ही है,

बस बोल नहीं रही।


सोचता हूँ

मैसेज करूँ


फिर याद आता है

उसका कहा हुआ वाक्य

“सब कहना ज़रूरी नहीं होता…”


वैसे…

शायद ठीक ही है।


कुछ चुप्पियाँ

आम के बौर जैसी होती हैं

जितना कम छुओ,

उतनी देर तक महकती हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,

धीमे-धीमे गिरती तुम्हारी बातों की ओस

 धीमे-धीमे गिरती तुम्हारी बातों की ओस


वो लड़की…

बहुत ज़्यादा नहीं बोलती थी

पर जो भी कहती थी

पूरा नहीं होता था कभी

जैसे आधा वाक्य

और बाकी

मेरे लिए छोड़ देती थी।


मेरे इनबॉक्स में

उसके मैसेज

कभी अचानक आ जाते थे

“आज ठंड है…”

“चाय पी?”

“अजीब-सा लग रहा है…”


बस इतना ही।


उसकी बातें…

धीरे-धीरे गिरती थीं

जैसे ओस,

जिसे गिरते हुए

कोई देख नहीं पाता

पर सुबह

सब कुछ भीगा हुआ मिलता है।


एक बार उसने लिखा—

“तुम इतने चुप क्यों रहते हो?”


मैंने टाइप किया था बहुत कुछ,

डिलीट कर दिया।

फिर लिखा

“बस ऐसे ही…”


उसने रिप्लाई किया

“हम्म…”


और वहीं

पूरी बातचीत खत्म हो गई।


अजीब बात ये थी

कि उसकी छोटी-छोटी बातें

दिन भर साथ रहती थीं।


“खाना खा लिया?”

जैसा सवाल भी

किसी गहरी चिंता की तरह

दिल में टिक जाता था।


फिर एक दिन

उसने लिखना कम कर दिया।


मैसेज आते थे

पर और छोटे,

और हल्के,

जैसे ओस भी अब

ठहरने से डरती हो।


मैंने पूछा

“सब ठीक?”


उसने लिखा

“हाँ…”


और उस “हाँ” में

कुछ भी ठीक नहीं था।


धीरे-धीरे

उसकी बातें

गिरनी बंद हो गईं।


इनबॉक्स सूखा रहने लगा

जैसे कोई सुबह

ओस के बिना निकल आई हो।


अब कभी-कभी

पुराने चैट खोलता हूँ,

तो लगता है

किसी बीते मौसम की नमी

अब भी बची हुई है।


सोचता हूँ

फिर से लिखूँ—


“आज ठंड है…”


पर डर लगता है

कि कहीं जवाब में

सिर्फ़

“Seen”

न मिल जाए।


वैसे…

रहने ही देता हूँ।


ओस को

ज़बरदस्ती गिराया नहीं जाता।


मुकेश ,,,,,,,,

तुम्हारी आवाज़ और रातरानी की महक

 तुम्हारी आवाज़ और रातरानी की महक


वो लड़की…

ठीक-ठीक कवि नहीं थी

पर लिखती थी

और लिखती भी क्या—

बस स्टेटस,

दो-तीन लाइन,

कभी आधी रात को,

कभी बिना वजह।


मेरी वाल पर भी

आ ही जाती थी कभी-कभी,

कुछ नहीं कहती—

बस “🙂”

या “हम्म…”

या फिर

एक आधा-सा वाक्य

जिसमें पूरा मतलब नहीं होता था।


उसकी आवाज़…

पहली बार सुनी थी

किसी पुराने वॉइस नोट में—

बहुत धीमी,

जैसे खुद से भी छुपती हुई।


तब समझ नहीं आया था

पर अब लगता है

वो आवाज़

रातरानी की महक जैसी थी—


रात में आती,

चुपचाप,

और सुबह होते-होते

कहीं खो जाती।


एक दिन उसने लिखा था

“नींद नहीं आती आजकल”


बस इतना ही।

न कोई वजह,

न कोई विस्तार।


उस पोस्ट पर

52 कमेंट्स थे

और 200 के आसपास लाइक्स।


सबने वही कहा—

“सो जाओ…”

“म्यूज़िक सुनो…”

“सब ठीक हो जाएगा…”


मैंने कुछ नहीं लिखा।


धीरे-धीरे

उसके स्टेटस कम होते गए।


ऑनलाइन दिखती थी

पर जैसे कहीं और होती थी।


मैंने एक बार पूछा भी—

“आवाज़ क्यों नहीं भेजती अब?”


उसने रिप्लाई किया—

“मन नहीं करता।”


बस।


फिर एक दिन

अचानक एक वॉइस नोट आया।


सिर्फ़ 7 सेकंड का।


कुछ बोली नहीं वो—

बस हल्की-सी साँस थी,

और दूर कहीं

कोई दरवाज़ा बंद होने की आवाज़।


मैंने कई बार सुना उसे।


उसके बाद

वो बिल्कुल चुप हो गई।


न स्टेटस,

न इमोजी,

न “हम्म…”


सिर्फ़ प्रोफ़ाइल पिक्चर बची थी—

जिसमें चेहरा साफ़ नहीं दिखता था।


किसी ने बताया

शायद कहीं शिफ्ट हो गई है

या नंबर बदल लिया है

या…


ख़ैर,

पक्का किसी को कुछ नहीं पता।


अब कभी-कभी

रात में

अचानक

उसकी याद आती है।


जैसे

रातरानी की महक—

बिना वजह,

बिना आवाज़ के।


सोचता हूँ

मैसेज करूँ क्या?


फिर याद आता है—

आख़िरी बार

उसने जवाब नहीं दिया था।


वैसे…

अनफॉलो कर ही दूँ शायद।


इतनी भी खास नहीं थी उसकी आवाज़

कि हर रात

याद रखी जाए।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

तुम्हारी हँसी और महुए के फूल

 तुम्हारी हँसी और महुए के फूल


तुम्हारी हँसी...

महुए के फूलों-सी गिरती है

चुपचाप,

बिना किसी शोर के,

पर पूरी हवा को मीठा कर देती है।


जैसे किसी सूखी दोपहर में

अचानक उतर आए

एक देसी-सा बसंत,

जिसका रंग आँखों से नहीं,

दिल से दिखता है।


तुम हँसती हो तो

लगता है

ज़मीन पर कुछ बिखर रहा है,

नर्म, सुनहरा,

जिसे समेटने को

मन झुक-झुक जाता है।


महुए की तरह ही

तुम्हारी हँसी भी

धीरे-धीरे चढ़ती है

पहले हल्की-सी मिठास,

फिर एक गहरी तासीर,

जो देर तक उतरती नहीं।


उसमें

कोई शहर की बनावट नहीं,

कोई बनावटी खनक नहीं—

बस एक देहाती सादगी,

जो सीधे रगों में उतरती है।


कभी-कभी

तुम्हारी हँसी सुनकर

ऐसा लगता है

जैसे कोई पुरानी याद

खुद चलकर पास आ बैठी हो—

बिना बुलाए,

बिना वजह।


और मैं…

हर बार सोचता हूँ—

कितना आसान होता

अगर हँसी को भी

महुए के फूलों की तरह

चुन कर रख लिया जाता,

किसी टोकरी में,

अपने दिनों के लिए।


पर तुम्हारी हँसी—

वो तो बस गिरती है,

महकती है,

और फिर

किसी अनदेखे मौसम में

खो जाती है।


मुकेश ,,,,,,,

ख़ामोशी

 

ख़ामोशी 


मैंने चुप रहकर भी बहुत कुछ कह दिया,

वो सुन न सका तो कसूर किसका था


मेरी ख़ामोशी, मेरी ज़ुबान थी।


हर बार उसने पूछा, “क्या हुआ है तुम्हें?”,

मैंने मुस्कुराकर बात टाल दी


कुछ जवाब औरतें बचाकर रखती हैं।


मैं बोलती तो शायद हल्का हो जाती,

पर चुप रही तो और गहरी हो गई


औरतें दर्द नहीं, अर्थ सँभालती हैं।