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Saturday, 28 February 2026

न बना सका तुम्हारा मौसम

 न बना सका तुम्हारा मौसम

(बिमल कुमार की कविता से प्रेरित )


चाहा था

तुम्हें अपना सूरज बना लूँ

थोड़ी-सी धूप रख लूँ जेब में,

ठंडे दिनों में

खोलकर पहन लूँ।

पर तुम

मेरी हथेली पर ठहरी ही नहीं।


सोचा था

तुम्हें एक रास्ता बना लूँ,

चलता रहता उम्र भर

तुम्हारी दिशा में।

पर तुमने अपने नक़्शे

किसी और शहर में रख छोड़े थे।


मैंने चाहा

तुम मेरी आवाज़ बन जाओ

जब गला भर आए

तो तुम बोलो मेरी जगह।

पर तुमने

मेरी ख़ामोशी भी

अपने पास नहीं रखी।


मैंने सोचा

तुम्हें एक सपना बना लूँ,

जिसे हर रात देख सकूँ।

पर तुम नींद की तरह थीं

आती थीं,

और बिना वजह टूट जाती थीं।


मैं तुम्हें

अपना मौसम भी न बना सका

न बारिश,

न धूप,

न हवा का एक छोटा-सा झोंका।


दुख इस बात का कम है

कि तुम मेरी नहीं बनीं,

दुख यह है

कि मैं भी तुम्हारा

कोई रूप न ले सका

न दीवार,

जिससे टिककर तुम रो सको,

न आईना,

जिसमें तुम खुद को पहचान सको।


मैं तैयार था

तुम्हारे लिए

छाया बनने को,

धूल बनने को,

यहाँ तक कि

एक साधारण-सी पगडंडी बनने को भी


पर तुमने

मेरे होने को

कोई नाम नहीं दिया।


मैं आज भी खड़ा हूँ

तुम्हारी राह के किनारे—

पेड़ नहीं बना,

फूल नहीं बना,

काँटा भी नहीं—


बस एक इंतज़ार बना हूँ,

जो हर गुजरते मौसम में

तुम्हारा होना

सीखता रहता है।


— मुकेश

सफ़्हे की नसों में बचा हुआ नाम

 सफ़्हे की नसों में बचा हुआ नाम


तुमने कहा

मैंने तुम्हें मिटा दिया है।


मैं मुस्कुराया।

क्योंकि मुझे पता था,

स्याही सिर्फ़ ऊपर से जाती है,

काग़ज़ की नसों में

वो धीरे-धीरे उतर जाती है।


तुमने हर्फ़ काटे,

लाइनें सीधी कीं,

नई कहानी लिख दी—

पर जहाँ-जहाँ मेरा नाम था,

वहाँ काग़ज़ थोड़ा-सा धड़कता रहा।


तुम्हारी उँगलियाँ

जब उस पन्ने पर ठहरती हैं,

तुम्हें कुछ महसूस होता है

एक हल्की-सी खुरदुराहट,

जैसे कोई अक्षर

अभी भी भीतर साँस ले रहा हो।


मैं अब शब्द नहीं हूँ,

न वाक्य,

न कोई पूरा अध्याय—

बस एक महीन-सी रग हूँ

जो उस सफ़्हे के जिस्म में

धीमे-धीमे चलती है।


तुम पढ़ती रहो

नई किताब,

नया नाम

पर एक दिन

अचानक किसी सन्नाटे में

जब उँगली उस जगह से गुज़रेगी,


तुम्हें लगेगा

किसी ने भीतर से

धीरे से पुकारा है।


वो मैं नहीं,

वो तुम्हारा अपना दिल होगा

जो उस सफ़्हे की नसों में

बचा हुआ मेरा नाम

फिर से पढ़ लेगा।


— मुकेश

मिटा दो मुझे

 मिटा दो मुझे

तुम मुझे
अपनी किताब से
मिटा दो हर्फ़ दर हर्फ़—
जैसे कोई पंक्ति
गलती से लिखी गई हो
और अब सही कर दी गई हो।

मेरे नाम पर
उँगलियों की स्याही फेर दो,
मेरी याद के कोनों को
रबर से घिस दो
इतना कि काग़ज़ पतला पड़ जाए।

ताकि
कभी दिल भी करे
तो तुम मुझे
याद न कर सको—
न मेरी आवाज़,
न मेरी आँखों का ठहराव,
न वो अधूरी बातें
जो हमने पूरी करने से पहले ही छोड़ दीं।

पर सुनो—
किताबें अक्सर
मिटाए गए शब्दों की छाप
सहेज लेती हैं।

सफ़्हा चाहे सफ़ेद दिखे,
अंदर कहीं
दबा हुआ अक्षर
अपना निशान छोड़ जाता है।

अगर सच में मिटाना हो,
तो मुझे अपने दिल से मिटाना—
क्योंकि काग़ज़ से नाम मिटते हैं,
याद से नहीं।

— मुकेश

लौटना, बिना वजह

 लौटना, बिना वजह

कभी-कभी
हम लौटते हैं—
न किसी वादे की खींच से,
न किसी शिकायत की आग में,
बस यूँ ही…
जैसे हवा पुरानी गली पहचान लेती हो।

मैं भी लौटा था एक दिन
बिना वजह,
बिना इरादे के शोर के।
दरवाज़े वही थे,
दीवारों पर वही धूप,
सिर्फ़ हमारे बीच की दूरी
कुछ और पुरानी हो गई थी।

तुमने पूछा भी नहीं—क्यों?
मैंने बताया भी नहीं—कहाँ से?
हम दोनों जानते थे
कि वजहें अक्सर बहाने होती हैं,
और कुछ रिश्ते
कारणों से नहीं,
आदतों से बँधे रहते हैं।

लौटना, बिना वजह
शायद स्वीकार करना है
कि कुछ जगहें, कुछ लोग,
हमारे भीतर से कभी जाते ही नहीं।

और मैं
उसी अनकहे को थामे
फिर से चला आया था
तुम्हारी ख़ामोशी में
अपना नाम सुनने।

— मुकेश

दरवाज़े पर एक साया

 दरवाज़े पर एक साया

शाम ढल रही थी,
कमरे में रोशनी और अँधेरे की बराबर हिस्सेदारी थी,
और तभी
दरवाज़े पर एक साया ठहर गया।

न दस्तक,
न नाम,
बस मौजूदगी—
जैसे कोई बीता हुआ वक़्त
अपनी आहट खुद लेकर आया हो।

मैंने परदे की ओट से देखा—
चेहरा बदला हुआ था,
आँखें नहीं।
उनमें अब भी वही अधूरा सवाल था
जिसका जवाब हमने कभी पूरा नहीं दिया।

साया भीतर नहीं आया,
बस चौखट पर खड़ा रहा—
जैसे इंतज़ार कर रहा हो
कि मैं उसे पहचानूँ
या फिर अनदेखा कर दूँ।

मैंने दरवाज़ा खोला नहीं,
पर दिल की कुंडी
हल्की-सी हिल गई।

शायद वह तुम थे,
शायद मेरी अपनी ही याद—
जो इतने बरस बाद
दरवाज़े पर साया बनकर लौट आई थी।

— मुकेश

अगर मैं वैसा न रहूँ

 अगर मैं वैसा न रहूँ

मान लो
किसी सांझ
जब धूप आख़िरी बार
दीवारों को छूकर लौट रही हो,
और तुम अपने कमरे की खामोशी में
धीरे-धीरे घुल रही हो,

मैं आ जाऊँ
बिना दस्तक,
बिना किसी पुराने वादे की गूँज के।

चेहरे पर समय की हल्की-सी रेखाएँ हों,
आँखों में अब आग्रह नहीं,
सिर्फ़ ठहरा हुआ पानी हो।
बातें कम,
सुनना ज़्यादा,
और उम्मीदें लगभग शून्य।

मैं तुम्हें समझाने न आऊँ,
न मनाने,
न ही बीते दिनों की राख कुरेदने
बस चुपचाप बैठ जाऊँ
तुम्हारे सामने
जैसे कोई पुराना दरख़्त
आँधी के बाद भी खड़ा रहता है।

अगर मैं
प्रेम का इज़हार छोड़ चुका होऊँ,
और सिर्फ़ उपस्थिति बची हो,

तो क्या तुम
मेरी बदली हुई चाल में
वही पुराना नाम सुन पाओगी?

क्या तुम्हारी स्मृतियों की धूल
मेरे चेहरे से हटकर
फिर से मुझे पहचान लेगी?

जिसे तुम भुलाना भी चाहती हो,
और पूरी तरह खोना भी नहीं
क्या वो अब भी
मैं हूँ?

बताओ
अगर मैं कम हो जाऊँ
अपने ही भीतर,
तो क्या तुम्हारे दिल में
मेरी जगह
अब भी पूरी रहेगी?

— मुकेश

क्या तुम पहचानोगी?

 क्या तुम पहचानोगी?

मान लो
गर्मी की एक उनींदी दोपहर में
ए.सी. की ठंडी साँसों के बीच
तुम किसी मीठे ख़्वाब में डूबी हो,
और मैं अचानक दरवाज़े पर आ खड़ा होऊँ।

फ्रेंच-कट दाढ़ी अब न हो,
बालों की बनावट बदल गई हो,
बातों का शोर छूट गया हो पीछे,
और मैं पहले से कम बोलने वाला,
ज़्यादा सुनने वाला हो गया होऊँ।

न कोई सलाह,
न कोई शिकवा,
न प्रेम का दावा
बस स्थिर-सी नज़रें
और थोड़े बेतरतीब कपड़े,
जैसे भीतर का मौसम
बाहर उतर आया हो।

मान लो
मैं “मैं” कम रह गया होऊँ,
और एक ख़ामोश आईना ज़्यादा।

तो क्या तुम
मेरी आवाज़ के बिना
मेरी ख़ामोशी से मुझे पहचानोगी?

क्या तुम्हारी पलकों पर
अब भी मेरा नाम
हल्की-सी थरथराहट बनकर उतरता है?

जिससे तुम पीछा छुड़ाना भी चाहती हो,
और पूरी तरह छोड़ भी नहीं पाती
क्या वो अब भी मैं हूँ?

बोलो
अगर मैं बदल जाऊँ इतना
कि पहचान में न आऊँ,
तो क्या तुम्हारा दिल
मुझे फिर भी
मुकेश कहेगा?

— मुकेश