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दर्शन — न्याय दर्शन भाग–५ : उपमान और शब्द — भाषा, तुलना और ज्ञान का प्रमाण

  दर्शन — न्याय दर्शन भाग – ५ : उपमान और शब्द — भाषा , तुलना और ज्ञान का प्रमाण “ क्या किसी दूसरी वस्तु से तुलना या किसी विश्वसनीय व्यक्ति के कथन से हमें वास्तविक ज्ञान मिल सकता है ?” न्याय दर्शन की प्रमाण - यात्रा अब एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर पहुँचती है। प्रत्यक्ष ने दिखाया कि इन्द्रिय और वस्तु के उचित सम्बन्ध से यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो सकता है। अनुमान ने यह स्पष्ट किया कि प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध न होने वाली वस्तु का ज्ञान भी स्थापित व्याप्ति के आधार पर सम्भव है। लेकिन मानव - ज्ञान की दुनिया इससे भी बड़ी है। हम ऐसी वस्तुओं को पहचानते हैं जिन्हें पहले कभी नहीं देखा। हम ऐसे स्थानों , घटनाओं और वस्तुओं के विषय में जानते हैं जहाँ हम स्वयं उपस्थित नहीं थे। हम इतिहास जानते हैं , भूगोल जानते हैं , किसी विशेषज्ञ की बात पर विश्वास करते हैं और भाषा के माध्यम से ऐसी असंख्य बातें सीखते हैं जिन्हें स्वयं अनुभव करना सम्भव नहीं। यहीं न्याय के...