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Monday, 4 May 2026

मैं तन्हा हूँ मगर हालात से डरता नहीं हूँ,

 मैं तन्हा हूँ मगर हालात से डरता नहीं हूँ,

अँधेरों में भी अपने हौसले खोता नहीं हूँ।

मैं अपने उसूलों पे ही क़ायम रहा हरदम,
किसी के सामने यूँ बेवजह झुकता नहीं हूँ।

ये दुनिया लाख कोशिश कर ले मोड़ें मेरे रस्ते,
मैं अपने रास्तों से इस तरह हटता नहीं हूँ।

ख़रीदेंगे मुझे क्या ये जहाँ के लोग आख़िर,
मैं अपने ज़मीरों को कभी बेचता नहीं हूँ।

जो दिल में है वही लफ़्ज़ों में ढालूँ मैं हमेशा,
मैं अपने दर्द को दुनिया से छुपता नहीं हूँ।

कभी थक जाऊँ तो ठहर जाऊँ ये मुमकिन है,
मगर मैं हार कर रस्ते में रुकता नहीं हूँ।


'मुकेश' ये तन्हाई भी अब साथ निभाती है,
मैं अपने आप से इस मोड़ पर टूटता नहीं हूँ।


मुकेश' ,,,,,,,,,,,,,,

अजीब तरह से एक-दूसरे की ख़बर रखते हैं,

 अजीब तरह से एक-दूसरे की ख़बर रखते हैं,

हम दूर रहकर भी दिल में तेरा असर रखते हैं।


न मिल सके तो ये मतलब नहीं कि भूल गए,

हम अपनी रूह में तेरी ही इक नज़र रखते हैं।


कभी जो याद की बारिश दिलों पे होती है,

हम अपने सीने में भीगा-सा एक सफ़र रखते हैं।


ख़ामोश लब हैं मगर दिल में शोर रहता है,

हम अपने अंदर कई किस्म का हुनर रखते हैं।


तेरे ख़याल से रौशन है ज़िंदगी अपनी,

हम इस उजाले में हर लम्हा एक पहर रखते हैं।


ये लोग कहते हैं कमज़ोर है तअल्लुक़ ये,

उन्हें क्या ख़बर कि हम कितना असर रखते हैं।


'मुकेश' इस रिश्ते को लफ़्ज़ों में बाँधना मुश्किल,

हम अपने दिल में इसे उम्र भर रखते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,

रिश्ता जो टूटा नहीं

 रिश्ता जो टूटा नहीं”

छूटकर भी वो रिश्ता तो टूटा नहीं,

बस हाथों की गर्माहट उँगलियों से उतरकर

याद की रगों में बस गई है।

अब हम साथ नहीं चलते,

मगर रास्ते

अजीब तरह से एक-दूसरे की ख़बर रखते हैं।

मैं जिस मोड़ से गुज़रता हूँ,

वहाँ तेरे क़दमों की आहट पहले से रखी मिलती है।

छूटकर भी वो रिश्ता तो टूटा नहीं,

वो बस नाम बदलकर

“ख़ामोशी” हो गया है

और ख़ामोशी, तुम जानती हो,

सबसे ऊँची आवाज़ होती है।

हमने जो बातें कभी पूरी नहीं कीं,

वो अब हवा में तैरती हैं—

जैसे शाम के धुंधलके में

कोई अधूरी रौशनी,

जो बुझती भी नहीं,

जलती भी नहीं

बस रहती है।

कभी-कभी

मैं आईने में ख़ुद को देखता हूँ,

तो लगता है

तुम्हारी नज़र

अब भी मेरी आँखों के पीछे कहीं ठहरी है।

छूटकर भी वो रिश्ता तो टूटा नहीं,

वो बस ज़िम्मेदारियों की भीड़ में

अपनी जगह बदल गया है

दिल के किसी कोने में

जहाँ अब कोई दावा नहीं,

सिर्फ़ एक सच्चाई है।

न कोई शिकवा,

न कोई गिला

बस एक सलीक़ा है जीने का,

जिसमें तुम शामिल हो

बिना साथ हुए भी।

और शायद

यही उस रिश्ते की असली उम्र है

जो ख़त्म नहीं होता,

बस अपने होने का ढंग बदलता रहता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

तुझसे बिछड़ के दिल को करार कम न हुआ,


 तुझसे बिछड़ के दिल को करार कम न हुआ,

खामोशियों में तेरी ही आवाज़ बढ़ गई।

छूटे जो हाथ, रिश्ता कहीं टूटा ही नहीं,
दूरी मिली तो चाहत की ज़ात बढ़ गई।

तन्हा हुए तो खुद से मुलाक़ात हो गई,
तेरे बिना भी जीने की औक़ात बढ़ गई।

माना कि अब वो साथ का मौसम नहीं रहा,
पर याद की हर एक बरसात बढ़ गई।

आज़ाद कर दिया तुझे दिल की कैद से,
फिर भी तेरी ही चाह में जज़्बात बढ़ गई।

जो लफ़्ज़ों में ढलना था, ढल न पाया,

 जो लफ़्ज़ों में ढलना था, ढल न पाया,

वो एहसास दिल में ठहर-सा गया है।

मेरे ख़्वाब का हर रंग फीका पड़ा है,

मेरे सामने सब बिखर-सा गया है।


तेरी याद की धूप में जलते-जलते,

मेरा साया मुझसे सिहर-सा गया है।

कभी जो था दिल में उजालों का मौसम,

वही आज भीतर उभर-सा गया है।

मैं ख़ामोश रहकर भी कहता रहा हूँ,

मगर हर इशारा ही गुज़र-सा गया है।

ये दुनिया, ये रिश्ते, ये चेहरे सभी कुछ,

मेरी आँख में बस निखर-सा गया है।

'मुकेश' अपने दिल की कहानी अजब है,

कहते-कहते भी बिखर-सा गया है।

मुकेश ,,,,,,,

Sunday, 3 May 2026

तन्हा सा दिल अब थकन से भरा है,

 तन्हा सा दिल अब थकन से भरा है,

राह को देखता हूँ तो अँधेरा घना है।


मेरे हर ख़्वाब पर धूल-सी जम गई है,

कोई अरमान भीतर ही भीतर मरा है।


तेरी यादों का मौसम ठहर-सा गया है,

जैसे वीरान जंगल में सन्नाटा धरा है।


मैंने हर मोड़ पर तुझको ढूँढा बहुत है,

पर हर इक रास्ता मुझसे जैसे खफ़ा है।


मेरे लफ़्ज़ों में दर्द की बूंदें हैं शामिल,

जैसे हर शेर आँखों से गिरता हुआ है।


ये जो चुप हूँ तो मतलब ये हरगिज़ नहीं है,

मेरे अंदर कोई शोर टूटा पड़ा है।


'मुकेश' इस दिल-ए-तन्हा का आलम न पूछो,

ये हँसता हुआ चेहरा अंदर से जला है।


मुकेश ,,,,,

दिल में जो शोर है, वो सुनता नहीं है,

 दिल में जो शोर है, वो सुनता नहीं है,

ये कैसा सन्नाटा है, मिटता नहीं है।


तेरी याद का सिलसिला चल रहा है,

कोई वक़्त इसको भी रोकता नहीं है।


मेरी आँख में एक दरिया छुपा है,

मगर ये किसी से भी बहता नहीं है।


तेरी बेरुख़ी ने ये हाल कर दिया है,

कोई ज़ख़्म अब दिल में पलता नहीं है।


मैं लफ़्ज़ों में ढालूँ भी तो क्या लिखूँ मैं,

जो सच है वही मुझसे लिखता नहीं है।


ये तन्हा सा दिल अब थकन से भरा है,

मगर ख़ुद से मिलने को रुकता नहीं है।


'मुकेश' हाल-ए-दिल अब किसे मैं सुनाऊँ,

कोई अपना इस दर्द को समझता नहीं है


मुकेश ,,,,,,,,,