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महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 12

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 12 त्रिगुण — मनुष्य को चलाने वाली प्रकृति की तीन धाराएँ कर्मयोग के विवेचन में कृष्ण अर्जुन को एक ऐसे बिन्दु तक ले आते हैं जहाँ कर्म से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है— कर्म को चलाने वाली शक्ति । यदि मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है, लेकिन कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति के गुण ही कर्म कराते हैं, तो अगला प्रश्न अनिवार्य है— ये गुण क्या हैं?  गीता का उत्तर है—प्रकृति त्रिगुणात्मक है। सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। सत्त्व, रजस् और तमस्—ये तीनों प्रकृति से उत्पन्न गुण हैं। लेकिन यहाँ “गुण” शब्द को केवल अच्छे, बुरे और सामान्य स्वभाव के अर्थ में समझ लेना पर्याप्त नहीं है। गीता में गुण मनुष्य के अनुभव, विचार, इच्छा, कर्म और व्यवहार को प्रभावित करने वाली प्रकृति की मूल प्रवृत्तियाँ हैं। यहीं से गीता का दर्शन कर्मयोग से आगे बढ़कर मानव-स्वभाव के विज्ञान की ओर जाता है। गुणों का मूल स्वरूप  गीता में कहा गया है— सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥ सत्त्व सुख और प्रकाश की ओर ले जाता है। रजस् कर्म और सक्रियता से जोड़ता ...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 11 - कर्ता कौन? — प्रकृति, गुण और अहंकार

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 11 - कर्ता कौन? — प्रकृति, गुण और अहंकार भगवद्गीता के तृतीय अध्याय में कर्मयोग की चर्चा आगे बढ़ते-बढ़ते एक ऐसे प्रश्न तक पहुँचती है जो केवल अर्जुन के युद्ध-संकट का प्रश्न नहीं रह जाता। प्रश्न है—  मनुष्य कर्म करता कौन है? हम सामान्यतः कहते हैं— मैंने यह किया। मैंने यह निर्णय लिया। मैंने सफलता प्राप्त की। मैंने गलती की। लेकिन कृष्ण अर्जुन के सामने कर्म की जो दार्शनिक संरचना रखते हैं, उसमें यह “मैं” स्वयं जाँच का विषय बन जाता है। यदि कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा संचालित हैं, तो कर्तापन का अहंकार कहाँ से उत्पन्न होता है? और यदि मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है, तो क्या वह वास्तव में स्वतंत्र कर्ता है? यहीं गीता का कर्मयोग सांख्य-दर्शन के अत्यन्त निकट पहुँचता दिखाई देता है। मूल श्लोक - कृष्ण कहते हैं—  प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ अर्थात् प्रकृति के गुणों द्वारा सभी प्रकार के कर्म किये जाते हैं; परन्तु अहंकार से मोहित व्यक्ति सोचता है— “मैं कर्ता हूँ।” यह श्लोक गीता के कर्मदर्शन में अत्यन्त महत्व...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 10 - ज्ञान और कर्म — यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो कर्म क्यों?

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 10 - ज्ञान और कर्म — यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो कर्म क्यों? महाभारत के भीष्मपर्व में भगवद्गीता का आरम्भ अर्जुन के विषाद से होता है, लेकिन उसका वास्तविक दार्शनिक संघर्ष केवल युद्ध करने या न करने का प्रश्न नहीं है। अर्जुन के सामने उससे भी गहरा प्रश्न है— यदि आत्मा नित्य है, शरीर नश्वर है और ज्ञानी व्यक्ति मृत्यु को अंतिम सत्य नहीं मानता, तो फिर कर्म का क्या प्रयोजन है? द्वितीय अध्याय में कृष्ण अर्जुन को आत्मा की नित्यता समझाते हैं। वे शरीर की नश्वरता और आत्मा की अविनाशिता का विवेचन करते हैं। इसके बाद वे स्थितप्रज्ञ की अवस्था बताते हैं—वह व्यक्ति जिसकी बुद्धि स्थिर है, जो कामनाओं से ऊपर उठ चुका है और सुख-दुःख में सम रहता है। यहीं से अगला प्रश्न स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है— यदि स्थितप्रज्ञता और आत्मज्ञान ही सर्वोच्च अवस्था है, तो अर्जुन को युद्ध जैसे अत्यन्त सक्रिय कर्म में क्यों लगाया जाए? यही प्रश्न तृतीय अध्याय की भूमिका बनता है। मूल प्रश्न -  अर्जुन स्वयं इस द्वन्द्व को स्पष्ट रूप से सामने रखता है— ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं ...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 9 : कर्म से पलायन नहीं — लोकसंग्रह और कर्मयोग

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 9 : कर्म से पलायन नहीं — लोकसंग्रह और कर्मयोग अर्जुन का संकट अब केवल युद्ध करने या न करने का नहीं रह गया था। उसने पहले अपने सामने खड़े स्वजनों को देखा, फिर मृत्यु और आत्मा का प्रश्न उठाया, और उसके बाद स्थिर बुद्धि की खोज की। लेकिन यहाँ एक नया प्रश्न जन्म लेता है—यदि बुद्धि स्थिर हो जाए और मनुष्य को सत्य का बोध हो जाए, तो क्या उसके लिए कर्म आवश्यक रह जाता है? अर्जुन इसी द्वन्द्व को सामने रखता है— ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो मुझे इस घोर कर्म में क्यों लगाते हो? यहीं से गीता का कर्मयोग अपने अधिक स्पष्ट रूप में सामने आता है। कर्म का त्याग और कर्म से मुक्ति एक बात नहीं कृष्ण का उत्तर अत्यन्त महत्वपूर्ण है— न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥ कर्म को आरम्भ न करने मात्र से नैष्कर्म्य की अवस्था प्राप्त नहीं होती और केवल कर्मों का बाहरी त्याग कर देने से सिद्धि नहीं मिलती। यहाँ कृष्ण एक मूलभूत भ्रम को तोड़ते हैं। कर्म का अभाव और कर्मबंधन का ...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 8 : स्थितप्रज्ञ से कर्मयोग तक — स्थिर बुद्धि के बाद कर्म का प्रश्न

  महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 8 : स्थितप्रज्ञ से कर्मयोग तक — स्थिर बुद्धि के बाद कर्म का प्रश्न अर्जुन का प्रश्न अब केवल युद्ध का नहीं रह गया है। कृष्ण उसे आत्मा और देह का विवेक दे चुके हैं। स्वधर्म समझाया जा चुका है। सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय में समत्व रखने की शिक्षा दी जा चुकी है। इसके बाद अर्जुन एक स्वाभाविक प्रश्न पूछता है— स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥ “हे केशव! समाधि में स्थित स्थिरबुद्धि पुरुष की क्या पहचान है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?” यह प्रश्न गीता के दूसरे अध्याय को एक नए स्तर पर ले जाता है। अब अर्जुन यह नहीं पूछ रहा कि मुझे क्या करना चाहिए। वह पूछ रहा है— जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई है, उसका जीवन कैसा होता है? यही प्रश्न स्थितप्रज्ञ की संकल्पना को जन्म देता है। स्थितप्रज्ञ कौन है? कृष्ण उत्तर देते हैं— प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥ जब मनुष्य मन में उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को छोड़ देता है और आत्मा में ही आत्मा द्वारा संतुष्ट रहत...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 7 : स्थितप्रज्ञ — युद्धभूमि पर स्थिर बुद्धि की खोज

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 7 : स्थितप्रज्ञ — युद्धभूमि पर स्थिर बुद्धि की खोज कृष्ण अर्जुन को आत्मा, स्वधर्म और कर्मयोग के विषय में समझा चुके हैं। उन्होंने कहा—  समत्वं योग उच्यते। सफलता और असफलता के बीच समत्व ही योग है। लेकिन अब एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है—  जिस मनुष्य की बुद्धि परिणामों से विचलित न हो, वह वास्तव में कैसा होता है? अर्जुन यही पूछता है— स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥ “हे केशव! जिसकी प्रज्ञा स्थिर है और जो समाधि में स्थित है, उसकी पहचान क्या है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?” यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। अर्जुन अब केवल युद्ध का उत्तर नहीं चाहता। वह ऐसी चेतना की पहचान जानना चाहता है जो कठिन परिस्थिति में भी स्थिर रह सके। कृष्ण का उत्तर — इच्छा से आरम्भ कृष्ण कहते हैं— प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥ “हे पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सभी कामनाओं को छोड़ देता है और आत्मा में ही आत्मा से संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जा...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 6 : स्वधर्ममपि चावेक्ष्य — अर्जुन के कर्तव्य का प्रश्न

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 6 : स्वधर्ममपि चावेक्ष्य — अर्जुन के कर्तव्य का प्रश्न कृष्ण अब तक अर्जुन के शोक की पहली दार्शनिक परत खोल चुके हैं। देह बदलती है। आत्मा के विषय में उसका विनाश स्वीकार नहीं किया जाता। मृत्यु को केवल देह के अंत के रूप में देखना पूर्ण दृष्टि नहीं है। लेकिन यहाँ एक कठिन प्रश्न अभी भी सामने है— यदि आत्मा अविनाशी है, तो अर्जुन को युद्ध करना ही क्यों चाहिए? आत्मज्ञान अपने आप में युद्ध का आदेश नहीं बन जाता। इसलिए कृष्ण अब तर्क को दूसरी भूमि पर ले जाते हैं। वह कहते हैं— स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥ “अपने स्वधर्म को भी देखते हुए तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए; क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कोई अन्य श्रेयस्कर कर्तव्य नहीं है।” यहाँ गीता में पहली बार आत्मा के दार्शनिक प्रश्न से सामाजिक-कर्म के प्रश्न की ओर स्पष्ट संक्रमण होता है। स्वधर्म का अर्थ “स्वधर्म” शब्द को केवल इतना कह देना कि—  “अर्जुन क्षत्रिय है, इसलिए उसे युद्ध करना ही है” गीता के तर्क को छोटा कर देता है। अर्जुन कोई सामान्य परिस्थ...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 5 : अशोच्यानन्वशोचस्त्वं — शोक की पहली दार्शनिक परीक्षा

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 5 : अशोच्यानन्वशोचस्त्वं — शोक की पहली दार्शनिक परीक्षा अर्जुन ने अपना गाण्डीव रख दिया है। उसने युद्ध न करने का निर्णय घोषित कर दिया है और कृष्ण से कहा है— धर्मसम्मूढचेताः। शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥ “मेरा चित्त धर्म के विषय में मोहित है। मैं आपका शिष्य हूँ; मुझे शिक्षा दीजिए।” अब कृष्ण के सामने केवल एक योद्धा नहीं है। उनके सामने ऐसा मनुष्य है जो धर्म के दो परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले रूपों के बीच फँस गया है। एक ओर— गुरु, पितामह, भाई और स्वजन। दूसरी ओर— क्षत्रिय का युद्ध और न्याय की स्थापना। कृष्ण का उत्तर इसी मूल भ्रम को संबोधित करता है। “अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्” कृष्ण कहते हैं— श्रीभगवानुवाच। अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥ “तुम उन लोगों के लिए शोक कर रहे हो जिनके लिए शोक करना उचित नहीं, और बातें प्रज्ञावानों जैसी कर रहे हो। ज्ञानी जीवित और मृत—दोनों के लिए इस प्रकार शोक नहीं करते।” यह गीता का पहला दार्शनिक प्रहार है। लेकिन इसे समझने में सावधानी आवश्यक है। कृष्ण अर्जुन की करुणा का उपहास नहीं...