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चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–10 : मनोविज्ञान, Neuroscience और Cognitive Science में अनुभव

  चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–10 : मनोविज्ञान, Neuroscience और Cognitive Science में अनुभव अनुभव का वैज्ञानिक अध्ययन : भीतर की दुनिया की खोज दर्शन ने सदियों से यह प्रश्न पूछा— "मनुष्य अनुभव कैसे करता है?" आधुनिक विज्ञान ने इसी प्रश्न को एक नए रूप में पूछा— "मस्तिष्क में ऐसी कौन-सी प्रक्रियाएँ होती हैं जिनसे अनुभव उत्पन्न होता है?" आज Neuroscience, Psychology और Cognitive Science अनुभव को समझने के लिए मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, व्यवहार और चेतना के सम्बन्धों का अध्ययन करते हैं। किन्तु यहाँ एक मूल समस्या बनी रहती है— मस्तिष्क की गतिविधियों को तो मापा जा सकता है, लेकिन— "लाल रंग देखने का अनुभव कैसा है?" "दुःख का अनुभव भीतर से कैसा महसूस होता है?" "प्रेम की अनुभूति का आन्तरिक स्वरूप क्या है?" इन प्रश्नों का पूरा उत्तर अभी भी विज्ञान के सामने एक चुनौती है। यही अनुभव का प्रसिद्ध Hard Problem of Consciousness है। Perception : अनुभव का पहला द्वार मनोविज्ञान के अनुसार अनुभव की शुरुआत अक्सर Perception (प्रत्यक्ष बोध) से होती है। हमार...

चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–9 : आधुनिक दर्शन और Phenomenology (अनुभव-दर्शन)

  चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–9 : आधुनिक दर्शन और Phenomenology (अनुभव-दर्शन) अनुभव की ओर आधुनिक दर्शन का मुड़ना पश्चिमी दर्शन के इतिहास में एक समय ऐसा था जब दर्शन का मुख्य प्रश्न था— "वास्तविकता क्या है?" "बाहरी संसार का स्वरूप क्या है?" "मनुष्य सत्य को कैसे जान सकता है?" किन्तु आधुनिक काल में धीरे-धीरे एक नया प्रश्न उभरा— "जिस संसार को हम जानते हैं, वह हमारे अनुभव में किस प्रकार उपस्थित होता है?" यही प्रश्न आधुनिक Phenomenology (अनुभव-दर्शन) का आधार बना। Phenomenology का मूल आग्रह यह है कि किसी वस्तु, विचार या संसार के बारे में सिद्धान्त बनाने से पहले यह समझा जाए कि वह हमारे अनुभव में किस प्रकार प्रकट होती है। अर्थात्— वस्तु क्या है? से पहले प्रश्न है— वस्तु हमें दिखाई कैसे देती है? क्योंकि मनुष्य संसार को सीधे नहीं, बल्कि अनुभव के माध्यम से जानता है। एक वृक्ष केवल बाहरी पदार्थ नहीं है। किसी व्यक्ति के लिए वह छाया है, किसी के लिए बचपन की स्मृति, किसी कलाकार के लिए सौन्दर्य, और किसी दार्शनिक के लिए अस्तित्व का प्रतीक। वस्तु एक हो ...

चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–8 : अनुभव, भाषा और स्मृति — क्या अनुभव भाषा से पहले होता है?

  चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–8 : अनुभव, भाषा और स्मृति — क्या अनुभव भाषा से पहले होता है? अब तक हमने अनुभव का अध्ययन भारतीय दार्शनिक परम्पराओं, चेतना और ज्ञान के सन्दर्भ में किया। किन्तु एक प्रश्न अभी भी शेष है, जो आधुनिक दर्शन, भाषाविज्ञान, मनोविज्ञान और Phenomenology का केन्द्रीय प्रश्न है— क्या अनुभव पहले होता है और भाषा बाद में आती है, या भाषा ही हमारे अनुभवों का निर्माण करती है? जब कोई शिशु जन्म लेता है, तब उसके पास कोई भाषा नहीं होती, फिर भी वह भूख, स्पर्श, ऊष्मा, भय और सुरक्षा का अनुभव करता है। दूसरी ओर, जैसे-जैसे वह भाषा सीखता है, उसके अनुभवों को पहचानने, व्यक्त करने और समझने की क्षमता भी विकसित होती है। इससे स्पष्ट है कि अनुभव और भाषा का सम्बन्ध अत्यन्त गहरा है, किन्तु दोनों एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। क्या अनुभव भाषा से पहले होता है? मनुष्य का पहला अनुभव भाषा से पहले घटित होता है। शिशु अपनी माँ की गोद में सुरक्षा का अनुभव करता है, किन्तु वह उसे "सुरक्षा" नहीं कह सकता। उसे पीड़ा होती है, पर वह "दर्द" शब्द नहीं जानता। उसे भूख लगती है, पर वह उस...

चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–7 : अनुभव और ज्ञान — क्या अनुभव ही ज्ञान है?

  चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–7 : अनुभव और ज्ञान — क्या अनुभव ही ज्ञान है? मनुष्य संसार को अनुभवों के माध्यम से जानता है। जन्म के बाद बालक पहले अनुभव करता है, फिर धीरे-धीरे उन अनुभवों से ज्ञान का निर्माण करता है। वह अग्नि को देखकर, छूकर और उससे उत्पन्न पीड़ा को अनुभव करके जानता है कि अग्नि जलाती है। वह भाषा सीखता है, सम्बन्धों को समझता है और संसार के नियमों का बोध अनुभवों के माध्यम से प्राप्त करता है। किन्तु दर्शन के सामने एक मूल प्रश्न खड़ा होता है—  क्या अनुभव ही ज्ञान है? यदि अनुभव ज्ञान का आधार है, तो क्या प्रत्येक अनुभव ज्ञान उत्पन्न करता है? यदि कोई भ्रम अनुभव में वास्तविक प्रतीत होता है, तो क्या वह भी ज्ञान कहलाएगा? यदि तर्क किसी ऐसी बात को सिद्ध करता है जिसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हुआ, तो क्या वह ज्ञान नहीं है? इन्हीं प्रश्नों के कारण अनुभव और ज्ञान का सम्बन्ध भारतीय तथा वैश्विक दर्शन का एक प्रमुख विषय रहा है। अनुभव और ज्ञान : सम्बन्ध और अन्तर सामान्य जीवन में हम अनुभव और ज्ञान को लगभग एक ही मान लेते हैं। हम कहते हैं— "मुझे आग का अनुभव है।" "मुझे गणित...

चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–7 : अनुभव और ज्ञान — क्या अनुभव ही ज्ञान है?

  चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–7 : अनुभव और ज्ञान — क्या अनुभव ही ज्ञान है? मनुष्य संसार को अनुभवों के माध्यम से जानता है। जन्म के बाद बालक पहले अनुभव करता है, फिर धीरे-धीरे उन अनुभवों से ज्ञान का निर्माण करता है। वह अग्नि को देखकर, छूकर और उससे उत्पन्न पीड़ा को अनुभव करके जानता है कि अग्नि जलाती है। वह भाषा सीखता है, सम्बन्धों को समझता है और संसार के नियमों का बोध अनुभवों के माध्यम से प्राप्त करता है। किन्तु दर्शन के सामने एक मूल प्रश्न खड़ा होता है—  क्या अनुभव ही ज्ञान है? यदि अनुभव ज्ञान का आधार है, तो क्या प्रत्येक अनुभव ज्ञान उत्पन्न करता है? यदि कोई भ्रम अनुभव में वास्तविक प्रतीत होता है, तो क्या वह भी ज्ञान कहलाएगा? यदि तर्क किसी ऐसी बात को सिद्ध करता है जिसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हुआ, तो क्या वह ज्ञान नहीं है? इन्हीं प्रश्नों के कारण अनुभव और ज्ञान का सम्बन्ध भारतीय तथा वैश्विक दर्शन का एक प्रमुख विषय रहा है। अनुभव और ज्ञान : सम्बन्ध और अन्तर सामान्य जीवन में हम अनुभव और ज्ञान को लगभग एक ही मान लेते हैं। हम कहते हैं— "मुझे आग का अनुभव है।" "मुझे गणित...

चिन्तन -आत्मावलोकन -मेरी झोली में रखा जीवन

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  आत्मावलोकन - मेरी झोली में रखा जीवन इससे "आत्मावलोकन" एक विधा (reflection) बन जाता है और "मेरी झोली में रखा जीवन" वास्तविक शीर्षक। यह पुस्तक या ब्लॉग—दोनों के लिए अधिक परिपक्व प्रस्तुति होगी। साथ ही, मैंने अंतिम अनुच्छेद को थोड़ा और संयत किया है। "प्रभु" शब्द की जगह "खेल पूरी ईमानदारी से खेला था" को अंतिम वाक्य रहने दिया है। इससे लेख किसी एक धार्मिक भाव के बजाय सार्वभौमिक मानवीय अनुभव पर समाप्त होता है, और उसका प्रभाव अधिक देर तक बना रहता है। आत्मावलोकन मेरी झोली में रखा जीवन जब कभी अपने बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि मैं किसी मदारी की तरह हूँ—सड़क के किनारे तमाशा दिखाने वाला एक साधारण-सा आदमी। जिसके पास न कोई स्थायी मंच है, न निश्चित दर्शक, न किसी एक कला का दावा। बस एक झोली है। हर तमाशे के बाद वह अपना सारा सामान उसमें समेटता है और अगले पड़ाव की ओर चल देता है। कभी-कभी सोचता हूँ, शायद मेरे जीवन की सबसे बड़ी कमी यही रही कि मैं कभी एक उद्देश्य लेकर नहीं चला। लोग पूरी उम्र एक ही वृक्ष की छाया में बैठे रहते हैं; मैं हर थोड़ी दूर पर पेड़ बदलता रहा।...

चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–6 : अनुभव, चेतना और साक्षी

  चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–6 : अनुभव, चेतना और साक्षी अब तक हमने अनुभव को विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं की दृष्टि से समझने का प्रयास किया। कहीं वह ज्ञान का आधार बना, कहीं साधना का, कहीं मुक्ति का और कहीं अस्तित्व की प्रत्यक्ष अनुभूति का। किन्तु इन सभी विचारों के बीच एक प्रश्न निरन्तर उपस्थित रहा, जिसका उत्तर दिए बिना अनुभव की कोई भी चर्चा पूर्ण नहीं हो सकती— अनुभव करता कौन है? जब हम कहते हैं—"मैंने देखा", "मैंने सुना", "मुझे दुःख हुआ", "मुझे आनन्द मिला", तब यह "मैं" कौन है? क्या आँख देखती है? क्या मस्तिष्क अनुभव करता है? क्या मन अनुभव करता है? क्या चेतना अनुभव करती है? या इन सबके पीछे कोई ऐसा साक्षी है जो सभी अनुभवों को प्रकाशित करता है, किन्तु स्वयं उनसे बँधता नहीं? यही प्रश्न भारतीय दर्शन के सबसे गहरे प्रश्नों में से एक है। क्या इन्द्रियाँ अनुभव करती हैं? पहली दृष्टि में उत्तर सरल प्रतीत होता है। हम आँखों से देखते हैं। कानों से सुनते हैं। त्वचा से स्पर्श का अनुभव करते हैं। किन्तु यदि ध्यान से विचार करें, तो स्पष्ट होता ह...