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घंघोल

 घंघोल प्रेम व्यक्तित्वों को नहीं जोड़ता। वह उन्हें घंघोल देता है। सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं। पहचानें मिल जाती हैं और खो भी जाती हैं। कभी प्रेमी कवि जैसा बोलने लगता है। कभी कवि पागल की तरह देखता है। और पागल प्रेमी की तरह प्रतीक्षा करता है। इस घोल में तीनों का अंतर मिट जाता है और बचता है केवल एक बात कि मनुष्य अब भी पूरी तरह गणनीय नहीं हुआ है।

समाज की गणना

 समाज की गणना समाज के पास हर चीज़ का हिसाब है कितना काम, कितना लाभ, कितनी उपयोगिता। लेकिन प्रेम इस सूची में कहीं नहीं आता। इसलिए वह संदिग्ध माना जाता है। प्रेमी को अनुत्पादक कहा जाता है। कवि को अव्यावहारिक। पागल को असामान्य। पर शायद वे तीनों एक ही सत्य के अलग नाम हैं— जो अभी तक गणित में शामिल नहीं हुआ।

असम्भव का अभ्यास

असम्भव का अभ्यास प्रेम असम्भव को मानने से शुरू नहीं होता। वह उसे अस्वीकार भी नहीं करता। वह बस उसके साथ रहने लगता है। जैसे कोई नदी पत्थरों से बहस नहीं करती। वे उसे रोकते हैं, वह उन्हें आकार देती है। प्रेम भी असम्भवता से टकराकर नहीं टूटता। वह उसके भीतर नई दिशा खोज लेता है। मुकेश ,,,,

पागलपन की परिभाषा

 पागलपन की परिभाषा एक ही शहर में तीन लोग चलते हैं प्रेमी, पागल, और कवि। लोग कहते हैं तीनों अलग हैं। लेकिन उनके भीतर एक ही अस्थिर रोशनी जलती है। वे चीज़ों को वैसे नहीं देखते जैसा बताया गया है। वे उन्हें वैसे देखते हैं जैसा वे हो सकती थीं। यही कारण है कि व्यवस्था उन्हें थोड़ा असहज मानती है। मुकेश ,,,,

गणना के बाहर

 गणना के बाहर प्रेम किसी जोड़-घटाव का परिणाम नहीं होता। वह आता है और सारे उत्तर बदल देता है। समाज उसे मापना चाहता है आय, योग्यता, उपयोगिता में। पर प्रेम इन सब इकाइयों से बाहर खड़ा रहता है। वह न लाभ है न हानि। वह बस एक ऐसी उपस्थिति है जिसे समझाने के लिए शब्द हमेशा कम पड़ जाते हैं। मुकेश ,,,,

भैरव-संग्राम

    भैरव-संग्राम वे समुद्र में नहीं जाते शांति के लिए, न ही मृत्यु की पर्ची लेने; वे आते हैं लड़ने। उनका प्रेम तलवार जैसा तेज़, लेकिन कंधे पर शिखा है, नाचते हुए काटते हैं, और काटते हुए सुलझाते हैं। तूफ़ान उनके नाम से मिलते हैं, जहाज़ उनके कदमों के निशान छोड़ जाते हैं, और गहरे पानी में उनका ग़ुस्सा गीत बनकर तैरता है। वे गीत नहीं गुनगुनाते — गीत उनके से पूछते हैं, और जब गीत टूटते हैं, वे अपनी हँसी में उनका पुनर्निर्माण करते हैं। यह प्रेम जीतने का खेल नहीं, यह युद्ध का अनुष्ठान है, पर एक ऐसे युद्ध का जहाँ दोनों साथी खड़े होकर झुकते हैं। वे चल पड़े—न कि मौत को झेलने के लिए; बल्कि जीवन को जाल में पकड़कर, उसे आग में नाचने के लिए। मुकेश ,,,,

गहराई का ठहराव

गहराई का ठहराव वे उतरते हैं बिना किसी तारीख के, हाथों में कोई रोशनी नहीं, सिर्फ़ ठीक करना। समुद्र के भीतर उनके सवाल गूंजते हैं, कभी उत्तर बनकर, कभी सिर्फ़ थपकियाँ बनकर। तट पीछे हटते हैं जैसे व्रत का समय, और लहरें उनके कानों में नाम थोड़ा-सा लुका देती हैं। उनका प्रेम रिश्ता नहीं किसी सुरक्षा से, बल्कि वह ठहराव है जहाँ सब प्रवाह अपनी उपस्थिति भूल जाते हैं। वह जानते हैं—हर डुबकी एक किताब है, कुछ पन्नों पर मोती हैं, कुछ पर सिर्फ़ मिट्टी। और वे पढ़ते हैं, बिना छलकाए, बिना अफ़सोस के, क्योंकि पढ़ना भी उनकी पूजा है, और डूबना भी उनकी आराधना। मुकेश ,,,,