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दर्शन — प्रत्यभिज्ञा दर्शन भाग–10 — तीन मल : आणव, मायीय और कार्म — बन्धन की आन्तरिक संरचना

  दर्शन — प्रत्यभिज्ञा दर्शन भाग –10 — तीन मल : आणव , मायीय और कार्म — बन्धन की आन्तरिक संरचना भाग –9 में हमने देखा कि माया और पाँच कञ्चुक अनन्त चेतना के अनुभव को सीमित बनाते हैं। लेकिन वहाँ एक प्रश्न शेष रह गया था — सीमितता केवल एक तत्त्वगत व्यवस्था है , या जीव उसके भीतर स्वयं को सचमुच अपूर्ण , कर्ता और भोक्ता मानने भी लगता है ? यहीं से मल - सिद्धान्त सामने आता है। प्रत्यभिज्ञा और व्यापक त्रिक शैव परम्परा में मल का अर्थ केवल कोई नैतिक दोष या पाप नहीं है। यहाँ मल वह आवरणकारी संकुचन है जिसके कारण चेतना अपने पूर्ण स्वरूप को पहचान नहीं पाती। तीन प्रमुख मल हैं — आणव मल — मायीय मल — कार्म मल। इन तीनों को समझे बिना प्रत्यभिज्ञा का बन्धन और मोक्ष - सिद्धान्त अधूरा रहेगा।   मल का मूल अर्थ “ मल ” शब्द का सामान्य अर्थ है — मलिनता , अशुद्धि या आवरण। लेकिन दार्शनिक अर्थ में इसका संकेत अधिक सूक्ष्म है। चेतना स्वयं अशुद्ध नहीं होती। यदि चेतना ...