आत्माश्रित जगत् और मातरिश्वा का क्रियात्मक विधान — ब्रह्माधिष्ठान की अद्वैत दृष्टि
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
तस्मिन् आत्मतत्त्वे सति नित्यचैतन्यस्वभावे,
मातरिश्वा—मातरि अन्तरिक्षे धावति गच्छति इति—वायुः, सर्वप्राणभृत् क्रियात्मकः,
यदाश्रयाणि काय-करण-जातानि, यस्मिन् ओतानि प्रोतानि च।
यत् सूत्रसंज्ञकं सर्वस्य जगतः विधारयितृ, स मातरिश्वा अपः कर्माणि प्राणिनां चेष्टालक्षणानि,
अग्नि-आदित्य-पर्जन्यादीनां ज्वलन-दहन-प्रकाश-अभिवर्षणादि-लक्षणानि विभजति इत्यर्थः।
धारयति वा।
उस नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मा में स्थित होकर, “मातरिश्वा” (वायु) — जो अंतरिक्ष में गति करता है और सभी प्राणियों को धारण करने वाली क्रियाशक्ति है —
सभी शरीर और इन्द्रियाँ उसी पर आश्रित हैं और उसी में गुंथे हुए हैं।
वह (वायु) “सूत्र” (धागे) के समान सम्पूर्ण जगत को धारण करता है।
वही प्राणियों की सभी क्रियाओं तथा अग्नि, सूर्य, वर्षा आदि की ज्वलन, प्रकाश और वर्षण जैसी शक्तियों का संचालन करता है।
अर्थात् वह सबको धारण और व्यवस्थित करता है।
यह भाष्यांश अद्वैत वेदान्त में ब्रह्माधिष्ठान (ब्रह्म के आधारत्व) तथा जगत् के क्रियात्मक संचालन के गूढ़ संबंध को स्पष्ट करता है। यहाँ शंकराचार्य यह दिखाते हैं कि सम्पूर्ण जगत् की विविध क्रियाएँ, यद्यपि विविध रूप में दिखाई देती हैं, किन्तु उनका मूलाधार एक ही नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मा है।
प्रथम वाक्य—“तस्मिन् आत्मतत्त्वे सति नित्यचैतन्यस्वभावे”—यह स्पष्ट करता है कि आत्मा नित्य, शुद्ध और चैतन्यमय है। वह किसी भी प्रकार की क्रिया या परिवर्तन से रहित है, परंतु उसी के अधिष्ठान में समस्त क्रियाएँ घटित होती हैं। यह अद्वैत का मूल सिद्धांत है—ब्रह्म स्वयं अकर्ता होते हुए भी समस्त क्रियाओं का आधार है।
अब “मातरिश्वा” शब्द की व्याख्या की गई है। “मातरि अन्तरिक्षे श्वयति (गच्छति)”—जो अंतरिक्ष में गति करता है, वह वायु है। परंतु यहाँ वायु केवल भौतिक तत्व नहीं, बल्कि सर्वप्राणभृत् क्रियाशक्ति का प्रतीक है। यह वह शक्ति है जो सभी प्राणियों में प्राणरूप से कार्य करती है।
“यदाश्रयाणि काय-करण-जातानि”—सभी शरीर (काय) और इन्द्रियाँ (करण) उसी पर आश्रित हैं।
“यस्मिन् ओतानि प्रोतानि च”—वे उसी में गुंथे हुए हैं, जैसे मणियाँ धागे में पिरोई जाती हैं। यह अत्यंत सुंदर दृष्टांत है, जो यह दर्शाता है कि समस्त जगत् एक अदृश्य सत्ता (सूत्र) पर आधारित है।
यहाँ “सूत्रसंज्ञक” शब्द विशेष महत्वपूर्ण है। यह “सूत्रात्मा” या “हिरण्यगर्भ” की ओर संकेत करता है—जो समस्त जगत् को एक सूत्र में बाँधकर धारण करता है। यह सृष्टि के व्यवहारिक स्तर (व्यवहारिक सत्य) पर कार्य करता है।
अब शंकराचार्य बताते हैं कि यह मातरिश्वा (वायु या प्राणशक्ति) विभिन्न प्रकार की क्रियाओं का विभाजन करता है—
प्राणियों की चेष्टाएँ (चलना, बोलना, सोचना आदि)
अग्नि का दहन
सूर्य का प्रकाश
पर्जन्य (वर्षा) का वर्षण
यह सब विविध क्रियाएँ उसी एक शक्ति के विभिन्न रूप हैं।
परंतु यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु है—
यद्यपि यह सब क्रियाएँ मातरिश्वा के माध्यम से होती हैं, परंतु उनका अंतिम आधार आत्मा (ब्रह्म) ही है, जो स्वयं निरुपाधिक और अविक्रिय है।
इस प्रकार, शंकराचार्य दो स्तरों को स्पष्ट करते हैं—
निरुपाधिक ब्रह्म — जो नित्य, अचल और अकर्ता है।
उपाधियुक्त ब्रह्म (मातरिश्वा/प्राण) — जो सृष्टि की विविध क्रियाओं का संचालन करता है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है
जैसे बिजली स्वयं निराकार और निष्क्रिय होती है, परंतु विभिन्न उपकरणों (पंखा, बल्ब, हीटर) के माध्यम से विभिन्न कार्य करती हुई प्रतीत होती है, वैसे ही आत्मा स्वयं अकर्ता होते हुए भी प्राणशक्ति (मातरिश्वा) के माध्यम से विविध क्रियाओं का आधार बनती है।
इस भाष्यांश में यह प्रतिपादित किया गया है कि नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मा के अधिष्ठान में मातरिश्वा (प्राणशक्ति) समस्त जगत् की क्रियाओं का संचालन करती है। शरीर, इन्द्रियाँ और प्राकृतिक शक्तियाँ उसी पर आश्रित हैं। फिर भी आत्मा स्वयं अविक्रिय और निरुपाधिक रहती है। इस प्रकार, अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म ही समस्त जगत् का आधार है, जबकि क्रियाएँ केवल उपाधि के स्तर पर घटित होती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,