दिन अब किसी क्रम का हिस्सा नहीं रहा।
न सुबह, न दोपहर, न रात
केवल एक फैलाव, जिसमें समय अपनी पहचान छोड़कर कहीं पीछे रह गया है।
तुम ठहरे नहीं,
पर चलना भी अब किसी क्रिया की तरह नहीं बचा।
जैसे गति और विराम ने अपने-अपने नाम बदल लिए हों।
तुम्हारे सामने कुछ नहीं है
और यह “कुछ नहीं”
पहले की तरह खाली नहीं लगता।
यह एक ऐसा स्थान है
जहाँ कोई प्रश्न प्रवेश नहीं करता,
और उत्तर की आवश्यकता भी नहीं उठती।
तुमने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अब देखने के लिए कुछ बचा भी नहीं है
न स्मृति का आग्रह, न अनुभव का बोझ।
तुम्हारे भीतर जो कभी द्वंद्व था,
वह अब किसी निष्कर्ष में नहीं बदला
वह बस अपनी तीव्रता खोकर
एक सामान्य-सी उपस्थिति में बदल गया है।
तुम्हें यह भी महसूस नहीं होता
कि तुम किसी परिवर्तन से गुज़रे हो।
क्योंकि जहाँ परिवर्तन होता है,
वहाँ तुलना होती है
और यहाँ तुलना के लिए कुछ नहीं है।
“क्या यही अंत है?”
यदि कोई पूछे
तो यह प्रश्न भी यहीं ठहर जाएगा,
बिना उत्तर के।
क्योंकि अंत वहाँ होता है
जहाँ कोई कथा समाप्त होती है।
और यहाँ
कथा अपने आप छूट गई है।
तुम खड़े हो
या शायद खड़े होने का भी बोध नहीं रहा।
न कोई साक्षी,
न कोई अनुभवकर्ता,
न ही कोई अनुभव।
केवल यह
जो कहा नहीं जा सकता,
और न ही जिसे अनकहा रहने देना कोई चुनाव है।
और इसी में
बिना किसी घोषणा के,
बिना किसी निष्कर्ष के
सब कुछ
जैसा है
वैसा ही
रह जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,