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हरिवंश पुराण - भाग ३० — बाणासुर :

भाग ३० — बाणासुर : शिवभक्ति, सहस्र भुजाएँ और युद्ध की आकांक्षा हरिवंश के विष्णुपर्व में बाणासुर का प्रसंग कृष्ण-कथा को एक नए संघर्ष की ओर ले जाता है। बाणासुर प्रह्लाद की दैत्य-परंपरा से संबंधित, महाबलि का पुत्र और शोणितपुर का शासक है। उसकी पहचान उसकी सहस्र भुजाओं तथा भगवान शिव के प्रति अनन्य भक्ति से जुड़ी है। किंतु कथा का विशेष पक्ष यह है कि असाधारण शक्ति प्राप्त होने पर भी वह संतुष्ट नहीं है। अपनी सामर्थ्य के योग्य प्रतिद्वंद्वी न मिलने से उसके भीतर युद्ध की आकांक्षा उत्पन्न होती है। शिवभक्ति और शक्ति का वरदान बाणासुर भगवान शिव की आराधना करता है। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव उसे वरदान देते हैं। सहस्र भुजाओं वाला बाणासुर अपनी शक्ति पर गर्व करता है, लेकिन उसके लिए यह सामर्थ्य तभी सार्थक प्रतीत होती है जब कोई उसका सामना कर सके। यहीं उसके चरित्र का अंतर्विरोध सामने आता है। शिव के प्रति उसकी निष्ठा उसे आध्यात्मिक प्रतिष्ठा देती है, जबकि अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की इच्छा उसे संघर्ष की ओर ले जाती है। कथा इस विरोधाभास को किसी दार्शनिक सूत्र के रूप में नहीं, बल्कि बाणासुर की मनःस्थिति और...

हरिवंश पुराण - भाग २९ — अक्रूर, शतधन्वा और स्यमन्तक मणि

 हरिवंश पुराण  - भाग २९ — अक्रूर, शतधन्वा और स्यमन्तक मणि : लोभ, विश्वासघात तथा यादवों का आंतरिक संकट कथा की पृष्ठभूमि : पुराना विवाद फिर उभरता है स्यमन्तक मणि की पहली कथा में कृष्ण पर चोरी और हत्या का संदेह किया गया था। उन्होंने प्रसेन की मृत्यु का वास्तविक कारण खोजकर मणि प्राप्त की और उसे सत्राजित को लौटा दिया। सत्राजित ने अपनी भूल स्वीकार की और अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह कृष्ण से किया। ऐसा प्रतीत होता था कि विवाद समाप्त हो गया है। किंतु हरिवंश का अगला प्रसंग दिखाता है कि किसी विवाद का बाहरी समाधान उसके पीछे सक्रिय ईर्ष्या, स्वार्थ और प्रतिष्ठा-संघर्ष को अनिवार्य रूप से समाप्त नहीं करता। इस बार संकट का केंद्र सत्राजित की हत्या है। कथा में शतधन्वा, अक्रूर और कृतवर्मा के नाम सामने आते हैं। सत्यभामा से विवाह और मणि के स्वामित्व को लेकर कुछ लोगों की आकांक्षाएँ अधूरी रह गई थीं। कृष्ण की अनुपस्थिति में यह असंतोष हिंसक घटना का रूप लेता है। हरिवंश के अक्रूर-चरित में इस प्रसंग का विस्तार मिलता है।  शतधन्वा द्वारा सत्राजित की हत्या कथा के अनुसार, शतधन्वा ने रात में सत्राजित की...

हरिवंश पुराण -भाग २८ — स्यमन्तक मणि

 हरिवंश पुराण  -भाग २८ — स्यमन्तक मणि : आरोप, अन्वेषण और प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना कथा का आरम्भ : सूर्य का उपहार द्वारका में यादवों के बीच सत्राजित नामक एक व्यक्ति रहता था, जो सूर्य का उपासक था। हरिवंश के आख्यान के अनुसार, उसकी उपासना से प्रसन्न होकर सूर्य ने उसे स्यमन्तक मणि प्रदान की। यह मणि साधारण रत्न नहीं थी। उसके विषय में कहा गया है कि वह प्रतिदिन स्वर्ण उत्पन्न करती थी और यादवों के निवास में समय पर वर्षा तथा रोगों से सुरक्षा जैसी समृद्धि के संकेतों से जुड़ी थी। मणि का वैभव इतना विलक्षण था कि उसे धारण करके नगर में प्रवेश करने पर लोग सत्राजित को ही सूर्य समझ बैठे। सत्राजित ने बाद में यह मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी। कृष्ण ने भी इस मणि में रुचि दिखाई थी। हरिवंश के पाठ में यह बात महत्त्वपूर्ण है कि कृष्ण उसे प्राप्त करना चाहते थे, किंतु इच्छा होने के बावजूद उन्होंने उसे बलपूर्वक नहीं लिया। इसके बाद घटनाओं की शृंखला आरम्भ होती है, जिसमें एक वस्तु के प्रति इच्छा आगे चलकर संदेह और आरोप का कारण बनती है।  प्रसेन की मृत्यु और कृष्ण पर संदेह एक दिन प्रसेन स्यमन्तक मणि धारण कर...

हरिवंश पुराण - भाग २७ — द्वारका में कृष्ण

  भाग २७ — द्वारका में कृष्ण : राजसत्ता, लोकजीवन और आदर्श शासक की अवधारणा नगर में प्रवेश : एक कथा का प्रसंग हरिवंश के विष्णुपर्व में द्वारका के निर्माण और उसके वैभव-वर्णन के बाद कृष्ण के नगर में प्रवेश तथा उनके स्वागत का प्रसंग आता है। मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह प्रसंग अध्याय १०० के अंतर्गत दिया गया है। नगर को देखकर कृष्ण अपने निवास और उसकी समृद्धि का अवलोकन करते हैं। यह केवल किसी विजेता अथवा नगर-स्वामी की अपने वैभव से भेंट नहीं है; इस प्रसंग में कृष्ण और यादव समुदाय के बीच स्थापित संबंधों की भी झलक मिलती है। महाभारत का खिलभाग और कृष्ण-कथा से संबंधित संस्कृत में कृष्ण का व्यक्तित्व केवल असाधारण पराक्रम करने वाले नायक का नहीं, बल्कि अपने समुदाय के साथ रहने वाले नेतृत्वकर्ता का भी है।  यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है। कृष्ण के नगर-प्रवेश का वर्णन अपने आप में किसी सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था का पूरा विवरण नहीं देता। इसलिए इससे सीधे कर-व्यवस्था, न्याय-प्रणाली अथवा शासन-संस्थाओं के निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। फिर भी कथा में उपस्थित सामाजिक व्यवहार, सम्...

हरिवंश पुराण - तृतीय खंड — भाग 26 - द्वारका का विस्तार

हरिवंश पुराण - तृतीय खंड — भाग 26 - द्वारका का विस्तार — नगर, समुद्र और राजनीतिक भूगोल मथुरा से पश्चिम की यात्रा हरिवंश के विष्णुपर्व में द्वारका की स्थापना का प्रसंग यादवों की यात्रा से आरम्भ होता है। जरासंध के निरंतर विरोध और मथुरा पर संकट की पृष्ठभूमि में कृष्ण यादवों को पश्चिम दिशा की ओर ले जाते हैं। यात्रा के बाद वे समुद्र के निकट पहुँचते हैं। वहाँ का तटीय प्रदेश, वनस्पति, समुद्री हवा और विस्तृत भूमि कथा में नए नगर के चयन की पृष्ठभूमि बनते हैं। इसके बाद कृष्ण समुद्र के किनारे एक ऐसे भूभाग को देखते हैं जहाँ नगर बसाया जा सकता है। आख्यान में भूमि की प्रकृति, नगर के लिए उसकी उपयुक्तता और समुद्र से उसकी निकटता का वर्णन मिलता है। इस प्रकार द्वारका का जन्म केवल किसी चमत्कारिक नगरी की कल्पना के रूप में नहीं, बल्कि एक स्थान के चयन और वहाँ बसावट की कथा के रूप में भी सामने आता है। इस प्रसंग का पहला महत्त्व भौगोलिक है। कृष्ण-कथा में स्थान परिवर्तन का कारण राजनीतिक संकट है, लेकिन समाधान के लिए चुना गया स्थान अपने प्राकृतिक परिवेश के कारण भी महत्त्वपूर्ण है। समुद्र यहाँ केवल कथा की पृष्ठभूमि नह...

तृतीय खंड — भाग 25 - यादव-संघ की आंतरिक राजनीति

तृतीय खंड — भाग 25 - यादव-संघ की आंतरिक राजनीति — कुल, नेतृत्व और सामूहिक निर्णय द्वारका : केवल एक राजधानी नहीं, अनेक शक्तियों का केंद्र मथुरा से द्वारका की ओर यादवों का प्रस्थान केवल एक नगर से दूसरे नगर तक का स्थानांतरण नहीं था। हरिवंश के कृष्ण-कथा संबंधी आख्यान में यह प्रसंग उस राजनीतिक परिस्थिति से जुड़ा है जिसमें बाहरी शत्रुओं का दबाव यादवों के अस्तित्व के लिए चुनौती बन गया था। मथुरा की रक्षा और वहाँ के निवासियों की सुरक्षा के प्रश्न ने कृष्ण को ऐसी रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया जिसमें संघर्ष का अर्थ केवल शत्रु को पराजित करना नहीं, बल्कि अपने समुदाय को सुरक्षित भविष्य देना भी था। द्वारका इस परिवर्तन का परिणाम बनी। किंतु किसी नए नगर की स्थापना से राजनीतिक समस्याएँ समाप्त नहीं हो जातीं। बाहरी संकट के सामने एकजुट हुआ समुदाय, संकट घटने के बाद अपने भीतर अनेक प्रश्नों का सामना करता है—निर्णय कौन लेगा, अधिकार किसके पास होगा, विभिन्न कुलों के हितों में टकराव होने पर समाधान कैसे निकलेगा और किसी एक प्रभावशाली व्यक्ति की प्रतिष्ठा को सामूहिक व्यवस्था के साथ किस प्रकार जोड़ा जाएगा? यादव-सं...

तृतीय खंड — भाग 24 - कृष्ण का राजवंशीय संसार

  तृतीय खंड — भाग 24 - कृष्ण का राजवंशीय संसार — विवाह, संबंध और द्वारका की राजनीति परिवार, उत्तराधिकार और यादवों के विस्तृत सामाजिक संसार का अध्ययन द्वारका : जहाँ कृष्ण का निजी परिवार एक व्यापक वंश-परंपरा बनता है कृष्ण की कथा में द्वारका केवल एक नगर या युद्धों के बीच सुरक्षित आश्रय नहीं है। विष्णुपर्व में आगे बढ़ते हुए यह एक ऐसे राजवंशीय संसार के रूप में सामने आती है जिसमें अनेक विवाह, विभिन्न कुलों से आए संबंधी, अनेक संताने और उत्तराधिकार की परंपराएँ सम्मिलित हैं। कृष्ण का जीवन अब केवल कंस-वध या जरासंध से संघर्ष तक सीमित नहीं रहता; उनके परिवार का विस्तार स्वयं कथा का विषय बन जाता है। हरिवंश के विष्णुपर्व में कृष्ण की प्रमुख रानियों और उनकी संतानों का उल्लेख मिलता है। एक अध्याय में जनमेजय, वैशम्पायन से कृष्ण की संतानों का विवरण पूछते हैं। उत्तर में प्रमुख रानियों के नाम, उनके पुत्रों और वंशजों का वर्णन किया जाता है। रुक्मिणी से प्रद्युम्न, प्रद्युम्न से अनिरुद्ध और आगे वज्र तक पहुँचने वाली वंश-परंपरा इस विवरण का विशेष हिस्सा है। इस प्रसंग की विशेषता यह है कि कथा कुछ प्रमुख घटनाओं ...

तृतीय खंड — भाग 23 - रुक्मी और विदर्भ — विवाह, प्रतिष्ठा और राजनीतिक संबंधों का द्वंद्व

 तृतीय खंड — भाग 23 - रुक्मी और विदर्भ — विवाह, प्रतिष्ठा और राजनीतिक संबंधों का द्वंद्व एक पारिवारिक निर्णय से उत्पन्न संघर्ष और उसके दूरगामी परिणाम रुक्मिणी-विवाह : जहाँ निजी इच्छा राजकीय प्रश्न बन गई विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी का विवाह कृष्ण से होने का प्रसंग कृष्ण-कथा के महत्त्वपूर्ण मोड़ों में है। इस कथा में रुक्मिणी कृष्ण को अपना पति चुनना चाहती हैं, जबकि उनके भाई रुक्मी का झुकाव शिशुपाल के साथ विवाह-संबंध स्थापित करने की ओर है। यह विरोध केवल भाई और बहन के मतभेद का परिणाम नहीं था। विवाह के माध्यम से विदर्भ का संबंध किस राजवंश से बनेगा, यह भी इससे जुड़ा हुआ था। रुक्मिणी कृष्ण को संदेश भेजती हैं और उनसे आग्रह करती हैं कि वे विवाह की निर्धारित व्यवस्था से पहले आकर उन्हें अपने साथ ले जाएँ। कृष्ण विदर्भ पहुँचते हैं और रुक्मिणी को अपने साथ ले जाते हैं। रुक्मी इस घटना को अपनी प्रतिष्ठा और अपने निर्णय की पराजय के रूप में देखता है। वह कृष्ण का पीछा करता है और उनसे युद्ध करता है। युद्ध में रुक्मी पराजित होता है, किंतु कृष्ण उसका वध नहीं करते। इस प्रसंग में बलराम की भूमिका...

हरिवंश पुराण -तृतीय खंड — भाग 21 - जरासंध : कृष्ण का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी

 तृतीय खंड — भाग 21 - जरासंध : कृष्ण का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मगध की शक्ति, यादवों का अस्तित्व और दीर्घकालीन संघर्ष का विश्लेषण कंस-वध के बाद : एक मृत्यु से जन्मा व्यापक संघर्ष हरिवंश के विष्णुपर्व में कृष्ण और जरासंध का संघर्ष कंस-वध के बाद एक नए रूप में सामने आता है। कंस की पत्नी अस्ति और प्राप्ति, मगध के राजा जरासंध की पुत्रियाँ थीं। कंस की मृत्यु का समाचार मिलने पर जरासंध केवल अपने दामाद की मृत्यु से दुःखी नहीं होता; वह इसे अपने राजवंश के अपमान और अपने राजनीतिक प्रभाव को चुनौती के रूप में भी देखता है। वह यादवों के विरुद्ध सेना लेकर मथुरा की ओर बढ़ता है। हरिवंश के विष्णुपर्व के आरंभिक युद्ध-प्रसंगों में इस अभियान, दोनों पक्षों की तैयारियों और संघर्ष का विस्तार मिलता है।  यहाँ कथा का महत्त्व इस बात में है कि कंस का वध एक स्थानीय सत्ता-परिवर्तन भर नहीं रह जाता। उससे जुड़े वैवाहिक और राजनीतिक संबंध मगध को भी संघर्ष में खींच लाते हैं। कृष्ण ने मथुरा में कंस की सत्ता समाप्त की थी, लेकिन उस परिवर्तन के परिणाम अब मथुरा की सीमाओं से बाहर फैल चुके थे। जरासंध का विरोध इस प...

हरिवंश पुराण -तृतीय खंड — भाग 20 -कृष्ण का राजनय — युद्ध के बाहर की राजनीति

  तृतीय खंड — भाग 20 -कृष्ण का राजनय — युद्ध के बाहर की राजनीति सामूहिक सुरक्षा, रणनीतिक निर्णय और राजवंशीय संबंधों का अध्ययन भूमिका : राजनीति का अर्थ केवल युद्ध नहीं कृष्ण के व्यक्तित्व को प्रायः दो रूपों में देखा जाता है—एक ओर वे असाधारण युद्धकौशल वाले वीर हैं, दूसरी ओर धर्म और नीति के ज्ञाता। किंतु हरिवंश में उनके राजनीतिक व्यवहार को ध्यान से देखने पर एक तीसरा पक्ष भी उभरता है: वे परिस्थितियों को केवल युद्धभूमि पर नहीं, बल्कि युद्ध से पहले और युद्ध के बाद भी प्रभावित करते हैं। वे शत्रु की शक्ति पहचानते हैं, अपने समुदाय की सीमाओं को समझते हैं, समय के अनुसार स्थान बदलने का निर्णय लेते हैं और पारिवारिक संबंधों को व्यापक राजनीतिक समीकरणों से जुड़ने देते हैं। यहाँ राजनय का अर्थ आधुनिक अर्थों में स्थापित दूतावासों या लिखित अंतरराष्ट्रीय संधियों की व्यवस्था नहीं है। इसका आशय है—राजाओं और कुलों के बीच संबंध बनाना, संघर्ष की संभावनाओं को समझना, सहयोग प्राप्त करना, विरोधी पक्षों की शक्ति का आकलन करना और अपने समुदाय के हित में निर्णय लेना। कृष्ण के राजनय को समझने के लिए तीन परस्पर जुड़े प्...