गर्भोपनिषद्
: स्वरूप, मन्त्र-संख्या, विषयवस्तु और दार्शनिक महत्त्व
गर्भोपनिषद्
108 उपनिषदों में सम्मिलित एक
अत्यन्त विशिष्ट उपनिषद् है। जहाँ अधिकांश
उपनिषद् आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष और अद्वैत ज्ञान
का प्रतिपादन करते हैं, वहीं
गर्भोपनिषद् मानव-शरीर, गर्भ-विज्ञान, भ्रूण-विकास, जन्म, जीवात्मा के शरीर में
प्रवेश तथा संसार-बन्धन
की प्रक्रिया का अद्भुत विवेचन
प्रस्तुत करती है। इस
दृष्टि से यह उपनिषद्
भारतीय आयुर्वेद, दर्शन और अध्यात्म का
एक अनोखा संगम है।
गर्भोपनिषद्
का विशेष महत्त्व इस बात में
है कि यह मनुष्य
के शारीरिक विकास को केवल जैविक
घटना नहीं मानती, बल्कि
उसे कर्म, जीव और आत्मा
की आध्यात्मिक यात्रा के रूप में
देखती है। इसी कारण
यह उपनिषद् चिकित्सा-विज्ञान, आयुर्वेद, योग और वेदान्त—सभी क्षेत्रों के
विद्वानों के लिए अध्ययन
का विषय रही है।
गर्भोपनिषद्
का सम्बन्ध कृष्ण यजुर्वेद से माना जाता
है। यह लघु उपनिषदों
में गिनी जाती है
और मुक्तिकोपनिषद् की 108 उपनिषदों की सूची में
इसका उल्लेख मिलता है।
गर्भोपनिषद्
में एक ही अध्याय है।
विभिन्न
संस्करणों में मन्त्रों की
संख्या में थोड़ा अन्तर
मिलता है, किन्तु सामान्यतः
इसमें लगभग 17 मन्त्र (या गद्य-खण्ड) माने जाते हैं।
कुछ
प्रकाशनों में इसे 16, 17 अथवा
18 अनुच्छेदों में विभाजित किया
गया है, परन्तु प्रचलित
पाठ में लगभग 17 मन्त्र
स्वीकार किए जाते हैं।
अतः इसकी संरचना
इस प्रकार समझी जा सकती
है— अध्याय – 1 ,मन्त्र/गद्यखण्ड – लगभग 17
उपनिषद्
का विषय-विन्यास
गर्भोपनिषद्
की विषयवस्तु को मोटे रूप
से निम्न भागों में विभाजित किया
जा सकता है—
- मानव
शरीर की संरचना
- पंचमहाभूतों
का शरीर में योगदान
- सप्तधातुओं
का वर्णन
- गर्भ
की उत्पत्ति
- भ्रूण
का मासानुसार विकास
- गर्भस्थ
जीव की चेतना
- जन्म
और माया
- मोक्ष
की सम्भावना
उपनिषद्
प्रारम्भ में मानव शरीर
की संरचना का वर्णन करती
है।
यह बताती है
कि शरीर पंचमहाभूतों से
निर्मित है— पृथ्वी
,जल ,अग्नि ,वायु ,आकाश इन्हीं
तत्वों के विविध संयोजन
से शरीर का निर्माण
होता है।
उपनिषद्
शरीर को आत्मा का
वास्तविक स्वरूप नहीं मानती, बल्कि
उसे कर्मफल भोगने का उपकरण बताती
है।
गर्भोपनिषद् आयुर्वेद की भाँति शरीर
की सात धातुओं का
उल्लेख करती है— रस
,रक्त ,मांस ,मेद ,अस्थि ,मज्जा
,शुक्र - इन
धातुओं के संतुलन से
शरीर स्वस्थ रहता है।
यह
उल्लेख दर्शाता है कि उपनिषद्
की रचना ऐसे काल
में हुई जब आयुर्वेदिक
चिकित्सा-विज्ञान पर्याप्त विकसित हो चुका था।
गर्भोपनिषद्
के अनुसार गर्भ की उत्पत्ति
माता और पिता के
संयोग से होती है।पिता
के शुक्र और माता के
रज के संयोग से
भ्रूण का निर्माण प्रारम्भ
होता है।उपनिषद् बताती है कि जीवात्मा
अपने पूर्वकर्मों के अनुसार किसी
विशिष्ट गर्भ में प्रवेश
करती है।
इस
प्रकार जन्म केवल जैविक
प्रक्रिया नहीं, बल्कि कर्म-सिद्धान्त से
संचालित आध्यात्मिक प्रक्रिया भी है।
भ्रूण-विकास का वर्णन -गर्भोपनिषद् की सबसे
प्रसिद्ध विशेषता भ्रूण-विज्ञान का वर्णन है।
उपनिषद्
के अनुसार—
- प्रथम
रात्रि में गर्भ द्रव रूप में रहता है।
- सात
दिनों में वह बुलबुले जैसा बनता है।
- पन्द्रह
दिनों में पिण्डाकार हो जाता है।
- एक
मास में कठोरता आने लगती है।
- दूसरे
मास में सिर का विकास होता है।
- तीसरे
मास में हाथ-पैर बनने लगते हैं।
- चौथे
मास में अंगों की स्पष्टता आती है।
- पाँचवें
मास में चेतना का विकास होता है।
- छठे
मास में बुद्धि का विकास आरम्भ होता है।
- सातवें
मास में जीव अधिक सचेत हो जाता है।
- आठवें
और नवें मास में जन्म की तैयारी होती है।
यद्यपि
आधुनिक भ्रूण-विज्ञान की दृष्टि से
इन विवरणों का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक
है, फिर भी प्राचीन
भारतीय चिन्तन में यह अत्यन्त
उन्नत अवलोकन माना जाता है।
गर्भोपनिषद्
का सबसे मार्मिक भाग
वह है जिसमें गर्भस्थ
जीव की चेतना का
वर्णन मिलता है।
उपनिषद्
कहती है कि गर्भ
में स्थित जीव अपने पूर्वजन्मों
को स्मरण करता है। वह अपने
पूर्वकृत कर्मों पर पश्चात्ताप करता
है और संकल्प करता
है— “इस बार जन्म
लेकर मैं ब्रह्मज्ञान प्राप्त
करूँगा।”“मैं पुनः संसार-मोह में नहीं
फँसूंगा।”यह विचार आगे
चलकर भागवत, योगवासिष्ठ और अन्य ग्रन्थों
में भी मिलता है।
उपनिषद्
के अनुसार जन्म के समय
जीव पर माया का
प्रभाव पड़ता है।जन्म लेते ही वह
अपने पूर्वजन्मों की स्मृति खो
देता है।माता-पिता, परिवार, शरीर और संसार
को ही अपना स्वरूप
मानने लगता है।यहीं से
पुनः कर्मचक्र रम्भ हो जाता
है। इस प्रकार गर्भ में प्राप्त
वैराग्य जन्म के बाद
प्रायः समाप्त हो जाता है।
गर्भोपनिषद्
का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त
यह है कि शरीर
और आत्मा भिन्न हैं। शरीर परिवर्तनशील है।आत्मा अपरिवर्तनशील है।शरीर जन्म लेता है
और नष्ट होता है।आत्मा
न जन्म लेती है,
न मरती है।
यह
सिद्धान्त कठोपनिषद्, भगवद्गीता और वेदान्त-दर्शन
से पूर्णतः संगत है।
गर्भोपनिषद्
का आयुर्वेद से गहरा सम्बन्ध
है।
विशेष रूप से— पंचमहाभूत
सिद्धान्त ,सप्तधातु सिद्धान्त ,गर्भोत्पत्ति ,भ्रूण-विकास
इन
विषयों में इसकी सामग्री
आयुर्वेदिक ग्रन्थों जैसे चरक संहिता
और सुश्रुत संहिता की परम्परा से
साम्य रखती है।
इसी
कारण कुछ विद्वान इसे
उपनिषद् और आयुर्वेद के
बीच सेतु के रूप
में देखते हैं।
भाष्य-परम्परा
गर्भोपनिषद्
पर आदि शंकराचार्य का
कोई भाष्य उपलब्ध नहीं है।
किन्तु
बाद की परम्परा में
निम्न विद्वानों ने इसके पाठ
और व्याख्या को संरक्षित किया—
- उपनिषद्-ब्रह्मयोगिन्
- नारायण-परम्परा के दक्षिण भारतीय टीकाकार
- आधुनिक
वेदान्ताचार्य
- आयुर्वेदिक
व्याख्याकार
उपनिषद्-ब्रह्मयोगिन् की टीका आज
भी इस उपनिषद् की
सबसे महत्त्वपूर्ण व्याख्याओं में गिनी जाती
है।
उपलब्ध
संस्करण
गर्भोपनिषद्
निम्न प्रमुख प्रकाशनों में उपलब्ध है—
- Motilal
Banarsidass
- Chowkhamba Sanskrit Series
- Adyar Library and Research Centre
- Internet Archive
गर्भोपनिषद्
एक अध्याय और लगभग 17 मन्त्रों
वाला लघु किन्तु अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण उपनिषद् है। यह केवल
भ्रूण-विज्ञान का ग्रन्थ नहीं,
बल्कि जीवात्मा की संसार-यात्रा
का आध्यात्मिक विवेचन भी है। इसमें
शरीर की संरचना, गर्भोत्पत्ति,
भ्रूण-विकास, गर्भस्थ जीव की चेतना,
कर्म-सिद्धान्त, माया और मोक्ष
की सम्भावना का अद्भुत समन्वय
मिलता है। इस प्रकार
गर्भोपनिषद् भारतीय अध्यात्म, आयुर्वेद और दर्शन की
संयुक्त विरासत का एक अनुपम
दस्तावेज़ है, जो यह
स्मरण कराती है कि मनुष्य
का जीवन जन्म से
नहीं, बल्कि गर्भ में ही
आध्यात्मिक यात्रा के रूप में
आरम्भ हो जाता है।