होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Friday, 17 April 2026

ईशावास्योपनिषद् षष्ठमन्त्र — शांकरभाष्य का प्रथम पद: सर्वात्मदर्शन का अद्वैत सिद्धान्त

 ईशावास्योपनिषद् षष्ठमन्त्र — शांकरभाष्य का प्रथम पद: सर्वात्मदर्शन का अद्वैत सिद्धान्त

मूल पदांश (संशोधित रूप में) (ईशावास्योपनिषद् षष्ठमन्त्र के शांकरभाष्य का प्रथम पद)

यः तु सर्वाणि भूतानि अव्यक्तादीनि स्थावरान्तानि आत्मन्येव अनुपश्यति,

आत्मव्यतिरिक्तानि न पश्यति।

जो पुरुष अव्यक्त (प्रकृति) से लेकर स्थावर (जड़ वस्तुओं) तक सभी भूतों को अपने ही आत्मा में देखता है, और आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं देखता—वही सच्चा ज्ञानी है।

यह पद ईशावास्योपनिषद् के षष्ठ मन्त्र के शांकरभाष्य का प्रारम्भिक अंश है, जिसमें अद्वैत वेदान्त का परम सिद्धान्त—सर्वात्मभाव—प्रतिपादित होता है। यहाँ शंकराचार्य उस ज्ञानी पुरुष की अवस्था का निरूपण करते हैं, जिसने आत्मा का यथार्थ साक्षात्कार कर लिया है।

“यः तु”—यहाँ “तु” शब्द विशेष अर्थ रखता है। यह पूर्व वर्णित अज्ञानी पुरुष से भिन्न एक विद्वान्, आत्मज्ञानी पुरुष की ओर संकेत करता है। यह वह साधक है जिसने अविद्या का अतिक्रमण कर लिया है।

“सर्वाणि भूतानि”—यहाँ ‘भूत’ शब्द का अर्थ केवल जीवधारी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि है

“अव्यक्तादीनि”—जो कारण रूप (मूल प्रकृति) में हैं

“स्थावरान्तानि”—जो स्थिर, जड़ रूप में हैं

अर्थात् सृष्टि का सम्पूर्ण विस्तार—सूक्ष्म से स्थूल तक—सब इसमें समाहित है।

“आत्मन्येव अनुपश्यति”—यहाँ “अनुपश्यति” का अर्थ है—साक्षात्कारपूर्वक देखना, केवल कल्पना या तर्क नहीं।

ज्ञानी पुरुष यह प्रत्यक्ष अनुभव करता है कि यह सम्पूर्ण जगत् उसके अपने आत्मा में ही स्थित है।

यह दृष्टि सामान्य नहीं, बल्कि अद्वैत अनुभूति है, जहाँ ज्ञाता और ज्ञेय का भेद मिट जाता है।

अब अगला भाग—“आत्मव्यतिरिक्तानि न पश्यति”

यहाँ शंकराचार्य अत्यंत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ज्ञानी को आत्मा से भिन्न कुछ भी प्रतीत नहीं होता।

यह “न देखना” अज्ञान के कारण नहीं, बल्कि पूर्ण ज्ञान के कारण है।

अज्ञानी भेद देखता है—मैं और तुम, यह और वह।

परंतु ज्ञानी के लिए सब कुछ एक ही आत्मा का विस्तार है।

यहाँ अद्वैत का मूल सिद्धांत स्पष्ट होता है

ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।

ज्ञानी के लिए संसार का अस्तित्व नष्ट नहीं होता, परंतु उसका स्वतंत्र सत्यत्व समाप्त हो जाता है।

वह जानता है कि यह सब आत्मा का ही प्रतिबिम्ब है।

एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—

जैसे स्वर्ण से बने विभिन्न आभूषण—अंगूठी, कंगन, हार—नाम और रूप में भिन्न हैं, परंतु उनका सार तत्व एक ही है—स्वर्ण।

इसी प्रकार, यह सम्पूर्ण जगत् नाम-रूप में भिन्न प्रतीत होता है, परंतु उसका वास्तविक स्वरूप एक ही आत्मा है।

इस ज्ञान का व्यावहारिक प्रभाव भी अत्यंत गहरा होता है

जब साधक सबमें एक ही आत्मा का दर्शन करता है, तब,किसी से द्वेष नहीं रहता,किसी से भय नहीं रहता

अहंकार समाप्त हो जाता है,करुणा और समता का उदय होता है,यही अवस्था जीवन्मुक्ति की है।

इस पद में शंकराचार्य ने उस ज्ञानी पुरुष का स्वरूप बताया है, जो सम्पूर्ण सृष्टि को अपने ही आत्मा में देखता है और आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं मानता। यह अद्वैत वेदान्त की चरम अनुभूति है, जहाँ भेदभाव समाप्त होकर केवल एकत्व का अनुभव रह जाता है। यही ज्ञान मोक्ष का कारण है और जीवन में समता, शांति और करुणा का आधार बनता है।

मुकेश ,,,,,,,,

तदेजति तन्नैजति…” — शांकरभाष्य-व्याख्या का समग्र सार

 तदेजति तन्नैजति…” — शांकरभाष्य-व्याख्या का समग्र सार

सरल समन्वित अर्थ (मन्त्र का भाव)

वह ब्रह्म चलता हुआ भी प्रतीत होता है और नहीं भी चलता; वह दूर भी है और अत्यन्त निकट भी; वह सबके भीतर भी है और बाहर भी। वह मन, इन्द्रियों आदि से परे, नित्य चैतन्यस्वरूप, सर्वव्यापक और अविकार है।

शांकरभाष्य के पदों का सार (संक्षिप्त विवेचन)

इस सम्पूर्ण भाष्य-चर्चा का केंद्रीय तत्त्व यह है कि ब्रह्म एक ही होते हुए भी विभिन्न दृष्टिकोणों से भिन्न-भिन्न प्रकार से अनुभूत होता है, और यही कारण है कि उपनिषद् में उसके लिए विरोधाभासी प्रतीत होने वाले वचन प्रयुक्त होते हैं।

शंकराचार्य का मुख्य प्रतिपादन यह है कि

ब्रह्म अपने निरुपाधिक स्वरूप में सदा अचल, अविकार, एकरस और नित्य चैतन्य है—वह कहीं नहीं जाता, न उसमें कोई क्रिया होती है।

किन्तु उपाधियों (शरीर, मन, इन्द्रियाँ, प्राण आदि) के कारण वही ब्रह्म चलता हुआ, क्रियाशील और अनेक रूपों में विभक्त प्रतीत होता है।

“मनसो जवीयः” आदि पदों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि ब्रह्म की “तीव्रता” वास्तव में उसकी सर्वव्यापकता है—मन जहाँ भी पहुँचता है, वहाँ ब्रह्म पहले से ही विद्यमान है। अतः वह मन से भी “अधिक तीव्र” कहा गया है।

इन्द्रियाँ (देव) उसे नहीं जान सकतीं, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है—जो सबको प्रकाशित करता है, वह स्वयं किसी अन्य साधन का विषय नहीं बन सकता। मन भी उसे केवल आभास रूप में ग्रहण करता है, वस्तु रूप में नहीं।

“तद् दूरे तद्वन्तिके”—इसका अर्थ है कि अज्ञानी के लिए ब्रह्म अत्यन्त दूर है, क्योंकि वह उसे बाह्य वस्तु के रूप में खोजता है; परन्तु ज्ञानी के लिए वही ब्रह्म अत्यन्त समीप—स्वयं के आत्मस्वरूप के रूप में—प्रकट होता है।

आगे यह प्रतिपादित हुआ कि ब्रह्म केवल दूर और निकट ही नहीं, बल्कि सर्वान्तर (भीतर) और सर्वव्यापक (बाहर) भी है—आकाश के समान।

यह सम्पूर्ण जगत्—जो नाम, रूप और क्रिया से युक्त है—उसी ब्रह्म में स्थित है और उसी पर आश्रित है।

“मातरिश्वा” (प्राणशक्ति) आदि के माध्यम से यह दिखाया गया कि समस्त क्रियाएँ—प्राणियों की चेष्टाएँ, अग्नि का दहन, सूर्य का प्रकाश, वर्षा आदि—सब उसी ब्रह्माधिष्ठान में घटित होती हैं, यद्यपि ब्रह्म स्वयं अविक्रिय रहता है।

अंततः ब्रह्म को “प्रज्ञानघन” कहा गया—अर्थात् वह शुद्ध, अखंड, निरंतर चैतन्य है, जिसमें कोई भेद या परिवर्तन नहीं है।

इस मन्त्र और उसके शांकरभाष्य का सार यह है कि ब्रह्म एकमात्र सत्य है—नित्य, सर्वव्यापक, अविकार और चैतन्यस्वरूप। संसार में जो गति, भेद और क्रिया दिखाई देती है, वह केवल उपाधि और अविद्या के कारण है। ज्ञानी इस भेद को समझकर ब्रह्म को अपने ही आत्मस्वरूप में अनुभव करता है, और यही अद्वैत वेदान्त का परम निष्कर्ष है।


मुकेश ,,,,

निरतिशय सूक्ष्मता और प्रज्ञानघन ब्रह्म — अन्तःस्थिति का अद्वैत प्रतिपादन

 निरतिशय सूक्ष्मता और प्रज्ञानघन ब्रह्म — अन्तःस्थिति का अद्वैत प्रतिपादन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

निरतिशय-क्षुद्रत्वात् अन्तः।

प्रज्ञानघन एव इति श्रुतेः, शाश्वतम् अनन्तरं च॥५॥

अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण वह (ब्रह्म) भीतर स्थित कहा जाता है।

श्रुति के अनुसार वह शुद्ध ज्ञान का घन (प्रज्ञानघन) है—निरंतर, अविभाज्य और अनन्त।

यह भाष्यांश ब्रह्म के सूक्ष्मतम स्वरूप तथा उसकी अन्तःस्थिति (inner presence) को स्पष्ट करता है। यहाँ शंकराचार्य यह बताते हैं कि ब्रह्म को “भीतर” क्यों कहा जाता है और उसका वास्तविक स्वरूप क्या है।

“निरतिशय-क्षुद्रत्वात्”—अर्थात् ब्रह्म अत्यंत सूक्ष्म है, उससे अधिक सूक्ष्म कुछ भी नहीं। यह सूक्ष्मता भौतिक नहीं, बल्कि दार्शनिक है। ब्रह्म इन्द्रियों के परे है, मन के परे है, और बुद्धि के भी परे है। इसीलिए उसे “अन्तः” कहा जाता है—वह हर वस्तु के भीतर, सबसे सूक्ष्म स्तर पर स्थित है।

परंतु यहाँ “भीतर” होने का अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म किसी सीमित स्थान में बंद है।

यह “अन्तःस्थिति” वास्तव में उसके सर्वान्तरत्व (innermost presence) का द्योतक है—वह प्रत्येक अनुभव, प्रत्येक ज्ञान, प्रत्येक चेतना के मूल में स्थित है।

अब “प्रज्ञानघन” शब्द का विशेष महत्व है।

श्रुति में ब्रह्म को “प्रज्ञानघन” कहा गया है—अर्थात् वह शुद्ध ज्ञान का ठोस, अखंड रूप है।

यहाँ “घन” का अर्थ है—जिसमें कोई विभाजन, कोई रिक्तता, कोई भिन्नता नहीं है।

अर्थात् ब्रह्म केवल “ज्ञाता” नहीं है, न ही केवल “ज्ञान का साधन” है—

वह स्वयं ज्ञानस्वरूप (pure consciousness) है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण अद्वैत सिद्धांत स्पष्ट होता है—

संसार में हम तीन तत्व देखते हैं—

ज्ञाता (knower)

ज्ञेय (object)

ज्ञान (process of knowing)

परंतु ब्रह्म इन तीनों से परे है। वह इनका आधार है, परंतु स्वयं इनमें विभक्त नहीं होता।

इसलिए उसे “प्रज्ञानघन” कहा गया है—एकरस, अखंड चैतन्य।

“शाश्वतम् अनन्तरम्”—अर्थात् वह नित्य है, और उसमें कोई अंतराल (gap) नहीं है।

वह निरंतर विद्यमान है—न उसमें आरम्भ है, न अंत, न ही कोई विराम।

शंकराचार्य का अभिप्राय यह है कि—

ब्रह्म कोई वस्तु नहीं है, जिसे बाहर खोजा जाए; वह तो स्वयं वह चेतना है, जिसके द्वारा हम सब कुछ जानते हैं।

एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—

जैसे दीपक का प्रकाश पूरे कमरे को प्रकाशित करता है, परंतु स्वयं प्रकाश को देखने के लिए किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती।

उसी प्रकार, आत्मा स्वयंप्रकाश है—वह सबको प्रकाशित करता है, परंतु स्वयं किसी अन्य साधन से प्रकाशित नहीं होता।

इस प्रकार, ब्रह्म की “अन्तःस्थिति” और “प्रज्ञानघनता” यह दर्शाती है कि वह हर अनुभव के मूल में स्थित, अखंड और निरंतर चैतन्य है।

इस भाष्यांश में ब्रह्म की अत्यंत सूक्ष्म, सर्वान्तर और प्रज्ञानघन स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है। वह प्रत्येक वस्तु के भीतर स्थित है, परंतु किसी सीमा में बंधा नहीं है। वह शुद्ध, अखंड और निरंतर चैतन्य है। इस ज्ञान से साधक समझता है कि ब्रह्म कोई बाह्य वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं उसका आत्मस्वरूप है—यही अद्वैत वेदान्त का परम निष्कर्ष है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

नाम–रूप–क्रियात्मक जगत् में ब्रह्म की व्यापकता — आकाशवत् अद्वैत स्वरूप

 नाम–रूप–क्रियात्मक जगत् में ब्रह्म की व्यापकता — आकाशवत् अद्वैत स्वरूप

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

अस्य सर्वस्य जगतः नाम-रूप-क्रियात्मकस्य तद् उ अपि बहिः च।

व्यापकत्वात् आकाशवत्।

यह सम्पूर्ण जगत्, जो नाम, रूप और क्रियाओं से युक्त है—उसके भीतर भी ब्रह्म है और बाहर भी।

क्योंकि वह आकाश के समान सर्वव्यापक है।

यह भाष्यांश अद्वैत वेदान्त के उस गूढ़ सिद्धांत को स्पष्ट करता है, जिसमें ब्रह्म की सर्वव्यापकता (all-pervasiveness) को नाम, रूप और क्रिया से युक्त जगत् के संदर्भ में समझाया गया है।

“अस्य सर्वस्य जगतः”—यहाँ सम्पूर्ण जगत् का उल्लेख है, जो नाम (नामकरण), रूप (आकार), और क्रिया (गतिविधि) से बना हुआ है। यही वह संसार है, जिसे हम प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करते हैं—विविध वस्तुएँ, प्राणी, घटनाएँ, और परिवर्तन।

शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि यह समस्त जगत्, चाहे वह कितना ही विविध और परिवर्तनशील क्यों न हो, उसका आधार और अधिष्ठान ब्रह्म ही है।

अब महत्वपूर्ण वाक्य है—“तद् उ अपि बहिः च”

अर्थात् ब्रह्म इस जगत् के भीतर भी है और बाहर भी।

यह कथन साधारण प्रतीत हो सकता है, परंतु इसमें गहन दार्शनिक अर्थ निहित है—

यदि ब्रह्म केवल “भीतर” होता, तो वह सीमित हो जाता।

यदि केवल “बाहर” होता, तो भी वह पूर्ण नहीं होता।

परंतु जब कहा जाता है कि वह भीतर और बाहर दोनों है, तब यह उसकी अनंतता (infinity) और अद्वैतता को प्रकट करता है।

यहाँ “आकाशवत्” दृष्टांत अत्यंत उपयुक्त है।

आकाश सभी वस्तुओं के भीतर भी है और बाहर भी।

घड़े के भीतर का आकाश और बाहर का आकाश अलग नहीं होते—विभाजन केवल घड़े की उपाधि के कारण प्रतीत होता है।

इसी प्रकार, शरीर, मन, और जगत् की विविध वस्तुएँ केवल उपाधियाँ (limiting adjuncts) हैं, जो ब्रह्म को सीमित करती हुई प्रतीत होती हैं।

परंतु वास्तव में ब्रह्म इन सभी उपाधियों से परे, एक ही, अखंड और सर्वव्यापक है।

यहाँ “नाम-रूप-क्रियात्मक” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है।

यह दर्शाता है कि संसार का समस्त अनुभव केवल नाम (label), रूप (appearance), और क्रिया (function) पर आधारित है।

परंतु इन सबका आधार जो है—वह चैतन्य, वह ब्रह्म—वह स्वयं इनसे परे है।

शंकराचार्य का अभिप्राय यह है कि

जगत् की विविधता वास्तविक नहीं, बल्कि ब्रह्म की एकता पर आरोपित (superimposed) है।

एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—

मिट्टी से बने विभिन्न पात्र—घड़ा, कटोरा, मूर्ति—नाम और रूप में भिन्न हैं, परंतु उनका सार तत्व एक ही है—मिट्टी।

इसी प्रकार, यह सम्पूर्ण जगत् नाम और रूप में भिन्न दिखाई देता है, परंतु उसका वास्तविक स्वरूप एक ही ब्रह्म है।

इस भाष्यांश में यह प्रतिपादित किया गया है कि नाम, रूप और क्रिया से युक्त सम्पूर्ण जगत् में ब्रह्म भीतर और बाहर दोनों रूपों में विद्यमान है। उसकी सर्वव्यापकता को आकाश के दृष्टांत से स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार, अद्वैत वेदान्त के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, और जगत् उसकी उपाधियों के कारण विविध रूप में प्रतीत होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

दूर–समीपातीत ब्रह्म — सर्वान्तरात्मा का अद्वैत प्रतिपादन

 दूर–समीपातीत ब्रह्म — सर्वान्तरात्मा का अद्वैत प्रतिपादन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

न केवलं दूरेऽन्तिके च; तद् अन्तः—अभ्यन्तरे अस्य सर्वस्य।

“य आत्मा सर्वान्तरः” इति श्रुतेः।

वह (ब्रह्म) केवल दूर और निकट ही नहीं है, बल्कि इस सम्पूर्ण जगत् के भीतर—सबके अंतर में स्थित है।

क्योंकि श्रुति कहती है—“वह आत्मा सबके भीतर रहने वाला है।”

यह भाष्यांश ब्रह्म के स्वरूप को और अधिक गहनता से उद्घाटित करता है। पहले यह बताया गया कि ब्रह्म “दूर” भी है और “समीप” भी। अब शंकराचार्य इस विचार को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि ब्रह्म केवल दूर और पास का विषय नहीं, बल्कि वह सर्वान्तरात्मा है—सभी के भीतर स्थित।

“न केवलं दूरेऽन्तिके च”—अर्थात् ब्रह्म को केवल दूरी और निकटता की श्रेणियों में बाँधना पर्याप्त नहीं है। ये दोनों ही सापेक्ष (relative) अवधारणाएँ हैं, जो स्थान और दृष्टिकोण पर आधारित हैं। परंतु ब्रह्म इन सबसे परे है।

“तदन्तः—अभ्यन्तरे अस्य सर्वस्य”—यहाँ यह प्रतिपादित किया गया है कि ब्रह्म प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक जीव, प्रत्येक अनुभव के भीतर स्थित है।

यह “भीतर होना” भी भौतिक अर्थ में नहीं है, जैसे कोई वस्तु किसी पात्र के भीतर हो।

यह “भीतर” होना है—अधिष्ठान रूप में, चैतन्य रूप में।

श्रुति का वचन—“य आत्मा सर्वान्तरः”—इस सत्य की पुष्टि करता है।

अर्थात् वह आत्मा जो सबके भीतर है, जो सबका अंतरतम है—वही ब्रह्म है।

यहाँ “सर्वान्तर” का अर्थ है

जो शरीर के भीतर है

जो मन के भीतर है

जो बुद्धि के भीतर है

और जो इन सबका भी साक्षी है

अर्थात् वह सबसे सूक्ष्म स्तर पर स्थित है—जहाँ कोई अन्य पहुँच नहीं सकता।

शंकराचार्य का अभिप्राय है कि

ब्रह्म न केवल सर्वव्यापक है (हर जगह है), बल्कि सर्वान्तर भी है (हर वस्तु के भीतर है)।

यहाँ एक सूक्ष्म बिंदु समझना आवश्यक है

यदि ब्रह्म केवल “बाहर” होता, तो वह सीमित होता।

यदि केवल “भीतर” होता, तो भी सीमित होता।

परंतु जब वह भीतर और बाहर दोनों है, तब वह वास्तव में असीम (infinite) सिद्ध होता है।

एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है

मिट्टी से बने घड़े के भीतर भी आकाश है और बाहर भी आकाश है।

घड़ा केवल एक उपाधि है, जो आकाश को सीमित करता हुआ प्रतीत होता है, परंतु वास्तव में आकाश न भीतर सीमित है, न बाहर—वह सर्वत्र है।

इसी प्रकार, शरीर और मन उपाधियाँ हैं, जो आत्मा को सीमित करती हुई प्रतीत होती हैं।

परंतु आत्मा वास्तव में न केवल उनके भीतर है, बल्कि उनसे परे भी है।


इस प्रकार, ब्रह्म को “दूर”, “समीप”, और “अन्तः”—इन तीनों रूपों में वर्णित करना केवल साधक को धीरे-धीरे उस सत्य की ओर ले जाने का उपाय है, जो अंततः सभी सीमाओं से परे है।

इस भाष्यांश में यह स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्म केवल दूर या निकट ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जगत् के भीतर स्थित सर्वान्तरात्मा है। श्रुति के प्रमाण से यह सिद्ध होता है कि आत्मा प्रत्येक जीव के अंतरतम में विद्यमान है। इस प्रकार, ब्रह्म की वास्तविकता सभी सीमाओं से परे, सर्वव्यापक और सर्वान्तर है—जिसका साक्षात्कार ही अद्वैत ज्ञान है।


मुकेश। .........

अविदुषां दूरता, विदुषां सन्निकटता — ब्रह्म के अनुभव का अद्वैत रहस्य

 अविदुषां दूरता, विदुषां सन्निकटता — ब्रह्म के अनुभव का अद्वैत रहस्य

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

तत् दूरे इव—वर्षकोटिभिः अपि अविदुषाम् अप्राप्यत्वात् दूरम् इव।

तद् उ अन्तिके इति छेदः—तत् अन्तिके, समीपे, अत्यन्तम् एव विदुषाम् आत्मत्वात्।

वह (ब्रह्म) दूर प्रतीत होता है, क्योंकि अज्ञानी लोगों के लिए वह करोड़ों वर्षों में भी प्राप्त नहीं होता।

और वही अत्यन्त निकट भी है—ज्ञानी पुरुषों के लिए वह उनके अपने ही आत्मस्वरूप के कारण अत्यन्त समीप है।

यह भाष्यांश उपनिषद् के अत्यंत प्रसिद्ध वाक्य—“तद् दूरे तद्वन्तिके”—का गूढ़ अर्थ स्पष्ट करता है। यहाँ शंकराचार्य ब्रह्म के दो प्रतीत होने वाले विरोधी स्वरूपों दूरता और निकटता—का अद्वैत दृष्टि से समन्वय करते हैं।

प्रथम भाग—“तत् दूरे इव”—यहाँ “इव” (मानो) शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। ब्रह्म वास्तव में दूर नहीं है, परंतु अज्ञानी (अविद्वान्) के लिए वह दूर प्रतीत होता है।

क्यों?—क्योंकि वह उसे बाह्य वस्तु की तरह खोजता है।

अविद्वान व्यक्ति ब्रह्म को किसी विशेष स्थान, काल या वस्तु में ढूँढता है—जैसे स्वर्ग में, किसी तीर्थ में, या किसी बाह्य साधन में। इस प्रकार की खोज अनंत काल तक भी उसे ब्रह्म तक नहीं पहुँचा सकती—“वर्षकोटिभिः अपि अप्राप्यत्वात्”।

इसलिए ब्रह्म उसके लिए अत्यंत दूर प्रतीत होता है।

यहाँ शंकराचार्य का संकेत यह है कि

ब्रह्म कोई बाह्य वस्तु नहीं है, जिसे प्राप्त किया जाए; वह तो स्वयं का ही स्वरूप है।

अब दूसरा भाग—“तद् उ अन्तिके”—यहाँ ब्रह्म की निकटता का वर्णन है।

ज्ञानी (विद्वान्) के लिए ब्रह्म अत्यंत समीप है—क्योंकि वह उसे अपने ही आत्मस्वरूप के रूप में जानता है।

यहाँ “अन्तिके” का अर्थ केवल “पास” नहीं, बल्कि अत्यन्त निकट—स्वयं के समान है।

जब साधक यह जान लेता है कि “अहं ब्रह्मास्मि”—मैं ही वह ब्रह्म हूँ—तब उसके लिए ब्रह्म से अधिक निकट कुछ भी नहीं रह जाता।

इस प्रकार, दूरी और निकटता दोनों ही दृष्टिकोण (ज्ञान और अज्ञान) पर निर्भर हैं

अविद्या (अज्ञान) के कारण ब्रह्म दूर प्रतीत होता है।

विद्या (ज्ञान) के कारण वही ब्रह्म अत्यन्त निकट—स्वयं के रूप में—प्रकट होता है।

एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है

कोई व्यक्ति अपने गले में पहनी हुई माला को भूलकर उसे हर जगह खोजता है। उसके लिए वह माला बहुत दूर है, क्योंकि वह उसे नहीं पा रहा।

परंतु जैसे ही उसे ज्ञात होता है कि माला तो उसके गले में ही है, वह तत्काल “समीप” हो जाती है—वास्तव में वह कभी दूर थी ही नहीं।

इसी प्रकार, ब्रह्म कभी दूर नहीं है—वह सदा आत्मस्वरूप में ही स्थित है।

अज्ञान के कारण वह दूर प्रतीत होता है, और ज्ञान के कारण वही अत्यन्त निकट अनुभव होता है।

इस भाष्यांश में ब्रह्म की दूरता और निकटता का अद्वैत समन्वय प्रस्तुत किया गया है। अज्ञानी के लिए वह अनंत काल तक भी अप्राप्य होने के कारण दूर प्रतीत होता है, जबकि ज्ञानी के लिए वह अपने ही आत्मस्वरूप के कारण अत्यन्त समीप होता है। इस प्रकार, दूरी और निकटता का भेद केवल ज्ञान और अज्ञान पर आधारित है, न कि ब्रह्म की वास्तविक स्थिति पर।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

तदेजति तन्नैजति” — विरोधाभास का अद्वैत समन्वय (पंचम मन्त्र की भूमिका)

 “तदेजति तन्नैजति” — विरोधाभास का अद्वैत समन्वय (पंचम मन्त्र की भूमिका)

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

न मन्त्राणां जामिता अस्ति इति पूर्वमन्त्र उक्तम्;

अथ पुनः “तदेजति” इति।

तत् आत्मतत्त्वं यत् उक्तं—तद् एजति, चरति; तदेव च न एजति, स्वतो न एव चरति।

स्वतः अचरम् एव सत्, चरति इव इत्यर्थः।


पूर्व मन्त्र में कहा गया था कि इन मन्त्रों में कोई विरोध नहीं है। अब पुनः कहा जाता है—“वह चलता है”।

जो आत्मतत्त्व पहले बताया गया है, वही चलता हुआ प्रतीत होता है, और वही नहीं चलता।

वास्तव में वह अपने स्वरूप से कभी नहीं चलता, परंतु चलता हुआ-सा प्रतीत होता है।


यह अंश ईशावास्योपनिषद् के पंचम मन्त्र — “तदेजति तन्नैजति” — की भूमिका के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ शंकराचार्य उस सम्भावित शंका का समाधान करते हैं जो साधक के मन में उत्पन्न होती है—क्या उपनिषद् स्वयं विरोधाभासी कथन कर रहा है?


पूर्व मन्त्रों में आत्मा को अचल, अविकार, एकरस बताया गया है। अब अचानक कहा जाता है—“तदेजति” (वह चलता है)। यह सुनकर जिज्ञासु के मन में भ्रम होना स्वाभाविक है कि यदि आत्मा नित्य अचल है, तो उसमें गति कैसे संभव है?

इसी शंका के समाधान के लिए शंकराचार्य कहते हैं

“न मन्त्राणां जामिता अस्ति”—मन्त्रों में कोई विरोध नहीं है।

विरोध केवल दृष्टिकोण (standpoint) का है, न कि तत्त्व का।

यहाँ “तद् आत्मतत्त्वम्”—जिस आत्मा का वर्णन पहले किया गया है, वही यहाँ विषय है। उस आत्मा के विषय में दो प्रकार के वचन दिए गए हैं—

“एजति” (चलता है)

“न एजति” (नहीं चलता)

इन दोनों को समझने के लिए अद्वैत वेदान्त का मूल सिद्धांत—उपाधि और निरुपाधि का भेद—जानना आवश्यक है।

वास्तव में आत्मा स्वतः अचरम् है—वह कभी नहीं चलता, क्योंकि वह सर्वव्यापक है। जहाँ सर्वत्र उपस्थित है, उसे कहीं जाने की आवश्यकता ही नहीं। अतः उसके लिए “गति” का कोई अर्थ नहीं है।

परंतु जब वही आत्मा शरीर, मन और इन्द्रियों के साथ तादात्म्य (अभिन्नता का अनुभव) कर लेता है, तब वह चलता हुआ प्रतीत होता है।

यही कारण है कि कहा गया—“चरति इव”—मानो चलता है।


यहाँ “इव” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सूचित करता है कि यह गति वास्तविक नहीं, बल्कि केवल आभास (appearance) है।


शंकराचार्य का अभिप्राय यह है कि,

आत्मा स्वयं अचल है, परंतु उपाधियों के कारण उसमें गति का आभास होता है।


एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है,

जब हम किसी चलती हुई रेलगाड़ी में बैठकर बाहर देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि पेड़-पौधे पीछे की ओर जा रहे हैं। परंतु वास्तव में वे स्थिर हैं; गति केवल हमारी है।

इसी प्रकार, आत्मा स्थिर है, परंतु शरीर और मन की गति के कारण उसमें गति का आभास होता है।

यह भूमिका साधक को यह समझाने के लिए है कि,

उपनिषद् के वचनों को सामंजस्यपूर्ण दृष्टि से देखना चाहिए।

जहाँ आत्मा को अचल कहा गया है, वहाँ उसका पारमार्थिक स्वरूप बताया गया है।

और जहाँ उसे गतिशील कहा गया है, वहाँ उसका उपाधि-सापेक्ष व्यवहारिक स्वरूप वर्णित है।

इस भूमिका में शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि “तदेजति तन्नैजति” जैसे वचनों में कोई वास्तविक विरोध नहीं है। आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में अचल है, परंतु उपाधियों के कारण गतिशील प्रतीत होती है। यह भेद समझने से साधक उपनिषद् के गूढ़ अर्थ को ग्रहण कर सकता है और अद्वैत सत्य के निकट पहुँचता है।


मुकेश ,,,,,,