घर लौटना
उम्र के एक पड़ाव पर
सफ़र ख़त्म नहीं होते,
बस बदल जाते हैं।
फिर आदमी
दुनिया देखने नहीं,
अपने भीतर लौटने निकलता है।
— मुकेश
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
घर लौटना
उम्र के एक पड़ाव पर
सफ़र ख़त्म नहीं होते,
बस बदल जाते हैं।
फिर आदमी
दुनिया देखने नहीं,
अपने भीतर लौटने निकलता है।
— मुकेश
बारिश
बारिश हर साल आती है।
बदलते हैं तो सिर्फ़ लोग।
किसी उम्र में
हम उसमें भीगते हैं,
किसी उम्र में
खिड़की से देखते हैं।
— मुकेश
पेन्सिल
बचपन में
पेन्सिल छोटी होती जाती थी
और ज्ञान बढ़ता जाता था।
अब उम्र बढ़ती जाती है,
और लगता है
हम कितना कम जानते हैं।
— मुकेश
दरवाज़ा
कुछ दरवाज़े
लकड़ी के नहीं होते।
वे लोगों के भीतर होते हैं।
खटखटाओ तो खुल जाते हैं,
अनदेखा करो तो
हमेशा के लिए बंद।
— मुकेश
घड़ी
दीवार पर टँगी घड़ी
सालों से चल रही है।
बदल गए घर,
बदल गए लोग,
बदल गईं आदतें।
पर उसे क्या पता
वह समय नहीं,
हमको गुज़रते देख रही है।
— मुकेश
स्मृति
समय ने पूछा
"क्या बचाकर रखा है?"
मैंने कहा
कुछ चेहरे,
कुछ आवाज़ें,
और कुछ ऐसे दिन,
जो उस समय
साधारण थे,
पर अब
अनमोल हैं।
— मुकेश
आख़िरी बार
जीवन की सबसे गहरी उदासी
किसी के जाने में नहीं होती।
वह उस क्षण में होती है
जब वर्षों बाद याद आता है—
जिस दिन हम हँसकर अलग हुए थे,
वही हमारी
आख़िरी मुलाक़ात थी।
— मुकेश