हरिवंशपुराण — भाग ४७ - नारायण का स्वरूप : सृष्टि, काल और चेतना के मूल तत्त्व की खोज
हरिवंशपुराण — भाग ४७ - नारायण का स्वरूप : सृष्टि, काल और चेतना के मूल तत्त्व की खोज जनमेजय की कथा से आगे भविष्यपर्व अब एक व्यापक दार्शनिक प्रश्न उठाता है—जिस सत्ता से समस्त जगत् उत्पन्न होता है, उसका स्वरूप क्या है? क्या उसे केवल सृष्टिकर्ता के रूप में समझा जा सकता है, या वह काल, ज्ञान, कर्म और समस्त प्राणियों के अस्तित्व से भी जुड़ी हुई है? जनमेजय की जिज्ञासा : प्रलय के बाद कौन शेष रहता है? जनमेजय अब नारायण की महिमा और सृष्टि के आरंभ से संबंधित रहस्यों को जानना चाहते हैं। वे वैशम्पायन से पूछते हैं कि जब चर और अचर जगत्, देवता, असुर, नाग, राक्षस तथा पृथ्वी, आकाश, अग्नि और वायु जैसी सृष्टि की शक्तियाँ प्रलय में लीन हो जाती हैं, तब कमलनाभ भगवान किस अवस्था में रहते हैं। वे यह भी जानना चाहते हैं कि नारायण कब तक क्षीरसागर में योगनिद्रा में स्थित रहते हैं, फिर किस प्रकार जाग्रत होकर जगत् की रचना करते हैं और सृष्टि के प्रारंभ में प्रजापतियों तथा अन्य सत्ताओं की उत्पत्ति कैसे होती है। जनमेजय का प्रश्न केवल सृष्टि की घटनाओं का क्रम जानने तक सीमित नहीं है। वे उस मूल कारण को समझना चाहते हैं जिसके ...