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चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–6 : बौद्ध और जैन दृष्टि में मोक्ष

 चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–6 : बौद्ध और जैन दृष्टि में मोक्ष पिछले भाग में हमने देखा कि आस्तिक भारतीय दर्शनों में मोक्ष की अनेक व्याख्याएँ हैं। अब हम भारतीय दर्शन की दो ऐसी महान परम्पराओं की ओर बढ़ते हैं, जिन्होंने मोक्ष की अवधारणा को एक नई दिशा दी— बौद्ध दर्शन और जैन दर्शन । दोनों का जन्म लगभग एक ही ऐतिहासिक काल में हुआ। दोनों ने वैदिक कर्मकाण्ड की आलोचना की। दोनों ने साधना, नैतिकता और आत्मानुशासन पर बल दिया। किन्तु जब हम उनके मोक्ष-दर्शन का अध्ययन करते हैं, तो स्पष्ट होता है कि उनके आधारभूत सिद्धान्त एक-दूसरे से भी भिन्न हैं। इसीलिए उनका तुलनात्मक अध्ययन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। बौद्ध दर्शन : निर्वाण बौद्ध दर्शन में "मोक्ष" की अपेक्षा निर्वाण शब्द अधिक प्रचलित है। "निर्वाण" का शाब्दिक अर्थ है— शान्त हो जाना। जैसे दीपक की लौ बुझ जाती है, वैसे ही तृष्णा, द्वेष और अविद्या की अग्नि का शांत हो जाना। किन्तु यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। निर्वाण का अर्थ अस्तित्व का विनाश नहीं है। बुद्ध ने मुख्यतः दुःख, उसके कारण, उसके नि...

चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–5 : भारतीय दर्शनों में मोक्ष

 चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–5 : भारतीय दर्शनों में मोक्ष पिछले भाग में हमने देखा कि उपनिषदों ने मोक्ष को आत्मबोध और ब्रह्मविद्या के साथ जोड़ा। परन्तु भारतीय दर्शन एकरूप नहीं है। उपनिषदों के बाद विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं ने मनुष्य, जगत, आत्मा और बन्धन की अलग-अलग व्याख्याएँ कीं। स्वाभाविक रूप से मोक्ष की उनकी अवधारणाएँ भी भिन्न हो गईं। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझनी आवश्यक है— भारतीय दर्शन में मोक्ष का लक्ष्य लगभग सभी आस्तिक दर्शनों में स्वीकार किया गया है, किन्तु मोक्ष का स्वरूप और साधन सभी में समान नहीं हैं। इसी विविधता ने भारतीय दर्शन को समृद्ध बनाया है। सांख्य दर्शन : कैवल्य सांख्य दर्शन के अनुसार संसार का मूल कारण प्रकृति है और चेतन सत्ता पुरुष है। बन्धन का कारण यह नहीं कि पुरुष वास्तव में बँधा हुआ है, बल्कि यह कि वह स्वयं को प्रकृति के साथ अभिन्न मान बैठता है। जब विवेक उत्पन्न होता है और पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकृति से भिन्न पहचान लेता है, तब कैवल्य की अवस्था प्राप्त होती है। यहाँ मोक्ष का अर्थ किसी स्थान पर पहुँचना नहीं, बल्कि भ्रम का अन्त ...

चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–4 : उपनिषदों का मोक्ष — आत्मबोध या ब्रह्मानुभूति?

 चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–4 : उपनिषदों का मोक्ष — आत्मबोध या ब्रह्मानुभूति? पिछले भाग में हमने देखा कि वेदों में मोक्ष का बीज रूप मिलता है, किन्तु उसका पूर्ण दार्शनिक विकास उपनिषदों में दिखाई देता है। यहीं भारतीय दर्शन एक निर्णायक मोड़ लेता है। प्रश्न अब केवल यह नहीं रह जाता कि मनुष्य दुःख से कैसे मुक्त हो। प्रश्न यह बन जाता है— "मैं कौन हूँ?" उपनिषदों के अनुसार जब तक इस प्रश्न का समाधान नहीं होता, तब तक मोक्ष का प्रश्न भी अधूरा रहता है। अतः उपनिषदों में मोक्ष किसी स्थान की प्राप्ति नहीं, बल्कि स्वरूप की पहचान है। उपनिषदों में मोक्ष का मूल प्रश्न उपनिषद बार-बार मनुष्य को बाहरी संसार से हटाकर स्वयं की ओर ले जाते हैं। वे पूछते हैं— जो देख रहा है, वह कौन है? जो सोच रहा है, वह कौन है? जो सुख-दुःख का अनुभव कर रहा है, वह कौन है? यदि मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानता है, तो वह परिवर्तन के साथ बदलता रहेगा। यदि वह स्वयं को केवल मन मानता है, तो विचारों के साथ बदलता रहेगा। किन्तु क्या मनुष्य में कोई ऐसी सत्ता भी है जो इन परिवर्तनों की साक्षी है? यही उपनिष...

चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–3 : वैदिक दृष्टि में मोक्ष

  चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–3 : वैदिक दृष्टि में मोक्ष पिछले भाग में हमने देखा कि "मोक्ष" शब्द और उसकी अवधारणा भारतीय दर्शन में अनेक रूपों में विकसित हुई। अब प्रश्न यह है— क्या वेदों में भी मोक्ष की स्पष्ट अवधारणा मिलती है? इस प्रश्न का उत्तर सावधानी से देना आवश्यक है। यदि हम बाद के वेदान्त, योग या भक्ति-परम्पराओं में विकसित "मोक्ष" की पूर्ण अवधारणा को सीधे ऋग्वेद पर आरोपित कर दें, तो यह ऐतिहासिक और दार्शनिक दोनों दृष्टियों से उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, यदि यह कहा जाए कि वेदों में मोक्ष का कोई संकेत ही नहीं है, तो यह भी अधूरा निष्कर्ष होगा। अतः हमें यह समझना होगा कि वेदों में मोक्ष का बीज है, जबकि उसका व्यवस्थित दार्शनिक विकास उपनिषदों और बाद के दर्शनों में दिखाई देता है। क्या वेदों में "मोक्ष" शब्द मिलता है? ऋग्वेद में "मोक्ष" शब्द उस विकसित दार्शनिक अर्थ में प्रायः नहीं मिलता, जैसा बाद के वेदान्त में मिलता है। किन्तु इसके स्थान पर कुछ ऐसे विचार मिलते हैं, जो आगे चलकर मोक्ष-दर्शन की आधारभूमि बने— अमृतत्व (अमरत्व) ऋत (ब्...

चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–2 : मोक्ष क्या है? — अर्थ, परिभाषा और स्वरूप

 चिंतन — अध्याय–20 : मोक्ष क्या है? — भाग–2 : मोक्ष क्या है? — अर्थ, परिभाषा और स्वरूप पहले भाग में हमने देखा कि मोक्ष का प्रश्न मनुष्य की स्वतंत्रता, दुःख, जिज्ञासा और आत्मबोध से जुड़ा है। अब अगला प्रश्न स्वाभाविक है— "मोक्ष वास्तव में है क्या?" यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही जटिल है। क्योंकि भारतीय दर्शन में "मोक्ष" एक ही अर्थ वाला शब्द नहीं है। विभिन्न परम्पराओं ने इसे अलग-अलग दृष्टियों से समझा है। कहीं यह बन्धन से मुक्ति है, कहीं आत्मसाक्षात्कार , कहीं कैवल्य , कहीं निर्वाण , कहीं अपवर्ग , और भक्ति परम्पराओं में ईश्वर की निकटता या एकत्व के रूप में भी इसकी व्याख्या हुई है। इसलिए मोक्ष को समझने का पहला चरण है—उसके अर्थ को स्पष्ट करना। "मोक्ष" शब्द की व्युत्पत्ति "मोक्ष" शब्द संस्कृत धातु "मुच्" से बना है। "मुच्" का अर्थ है— छोड़ना, मुक्त करना, बन्धन से छुड़ाना। इसी धातु से "मोक्ष", "मोचन", "मुक्ति" आदि शब्द बने हैं। इस व्युत्पत्तिगत अर्थ से इतना स्पष्ट होता है कि मोक्ष क...

चिंतन — अध्याय–19 : मृत्यु क्या है? — भाग–15 : मृत्यु — समन्वित निष्कर्ष

 चिंतन — अध्याय–19 : मृत्यु क्या है? — भाग–15 : मृत्यु — समन्वित निष्कर्ष इस अध्याय की शुरुआत एक प्रश्न से हुई थी— “मृत्यु क्या है?” पहली दृष्टि में यह प्रश्न सरल प्रतीत होता है। हर मनुष्य जानता है कि मृत्यु होती है। हर समाज उसके लिए शब्द, संस्कार और विश्वास विकसित करता है। हर सभ्यता ने उसे समझाने का प्रयास किया है। किन्तु जैसे-जैसे हमने इस प्रश्न की परतें खोलीं, यह स्पष्ट होता गया कि मृत्यु कोई एक विषय नहीं है। वह एक साथ— जैविक घटना भी है। दार्शनिक प्रश्न भी। मनोवैज्ञानिक अनुभव भी। आध्यात्मिक खोज भी। और अस्तित्व की सबसे बड़ी सीमा भी। यही कारण है कि मृत्यु को किसी एक परिभाषा में बाँधना सम्भव नहीं। मृत्यु—एक घटना नहीं, अनेक स्तरों की वास्तविकता शरीर के स्तर पर मृत्यु एक निरीक्षणीय जैविक प्रक्रिया है। चिकित्सा-विज्ञान इसके लक्षणों, अवस्थाओं और कारणों का अध्ययन कर सकता है। यहाँ ज्ञान लगातार विकसित हो रहा है। किन्तु जैसे ही प्रश्न चेतना, आत्मा, व्यक्तिगत पहचान या मृत्यु के बाद की सम्भावनाओं की ओर बढ़ता है, चर्चा का स्वरूप बदल जाता है। यहाँ विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म...

चिंतन — अध्याय–19 : मृत्यु क्या है? — भाग–14 : मृत्यु पर समन्वित दृष्टि

 चिंतन — अध्याय–19 : मृत्यु क्या है? — भाग–14 : मृत्यु पर समन्वित दृष्टि इस अध्याय की यात्रा में हमने मृत्यु को अनेक दृष्टियों से देखा। जैविक विज्ञान ने उसे शरीर की जीवन-प्रक्रियाओं के अन्त के रूप में समझाया। वैदिक साहित्य ने मृत्यु को केवल भय नहीं, बल्कि ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के एक अंग के रूप में भी देखा। उपनिषदों ने मृत्यु के प्रश्न को आत्मबोध की दिशा में मोड़ दिया। भारतीय दर्शनों ने शरीर, जीव, आत्मा और चेतना के विविध मॉडल प्रस्तुत किए। बौद्ध दर्शन ने अनित्य और क्षणभंगुरता पर बल दिया। जैन दर्शन ने जीव और शरीर के भेद की चर्चा की। मनोविज्ञान ने मृत्यु-भय और अर्थ-बोध का अध्ययन किया। अस्तित्ववाद ने मृत्यु को मनुष्य की सीमितता का दर्पण माना। अब प्रश्न यह है— इन सबमें कौन सही है? इस प्रश्न का सरल उत्तर सम्भव नहीं। क्योंकि ये सभी परम्पराएँ एक ही प्रकार के प्रश्न नहीं पूछतीं। और न ही एक ही प्रकार के प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। वैदिक दृष्टि वैदिक साहित्य में मृत्यु केवल जैविक घटना नहीं है। वह ऋत—अर्थात् ब्रह्माण्डीय व्यवस्था—के भीतर समझी जाती है। यम का स्वरूप मृत्यु के अरा...