चिंतन - क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं?
चिंतन - क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं? मनुष्य ने अपने हाथों की शक्ति बढ़ाने के लिए औज़ार बनाए। फिर उसने अपनी गति बढ़ाने के लिए वाहन बनाए। उसके बाद उसने अपनी स्मृति, गणना और विश्लेषण की क्षमता बढ़ाने के लिए यंत्रों का निर्माण किया। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऐसे कार्य कर रही है, जिनकी कभी कल्पना भी कठिन थी। पर तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं? बुद्धि जानती है। चेतना जागती है। बुद्धि तुलना करती है। चेतना साक्षी होती है। बुद्धि उत्तर खोजती है। चेतना प्रश्न के पीछे छिपे हुए स्वयं को खोजती है। यहीं से दोनों के बीच का अंतर स्पष्ट होने लगता है। यंत्र गणना कर सकते हैं। वे स्मृतियों का विशाल भंडार बन सकते हैं। वे भाषा रच सकते हैं। चित्र बना सकते हैं। संगीत की रचना भी कर सकते हैं। पर क्या वे किसी शिशु की मुस्कान देखकर भीतर उठने वाली करुणा का अनुभव कर सकते हैं? क्या वे किसी प्रियजन के वियोग में मौन हो जाने का अर्थ जी सकते हैं? क्या वे मृत्यु के सामने खड़े होकर अपने अस्तित्व पर प्रश्न कर सकते हैं? ...