“साया जो खो गया”
एक दिन
मेरा साया
मेरे साथ नहीं था।
धूप वैसी ही थी,
ज़मीन भी,
रास्ते भी
पर कुछ कमी थी
जो दिखाई नहीं देती थी।
मैंने पाँवों के पास देखा
खालीपन था,
जैसे कोई साथ
चुपचाप छूट गया हो।
पहले तो
हल्कापन लगा
न कोई पीछा,
न कोई ठहराव,
न कोई वह परिचित आकार
जो हर कदम पर
मुझे परिभाषित करता था।
पर धीरे-धीरे
एक अजीब बेचैनी उठी
जैसे मैं अधूरा हूँ,
जैसे मेरी कोई गवाही
मुझसे छिन गई हो।
मैंने दीवारों पर खोजा,
पानी में,
आँखों की परतों में
पर साया कहीं नहीं था।
तब पहली बार
मैंने खुद को देखा
बिना किसी प्रतिरूप के,
बिना किसी विस्तार के,
सिर्फ़ एक सीधा अस्तित्व।
अजीब डर था
क्योंकि साया
सिर्फ़ अंधेरा नहीं होता,
वह हमारे होने का
सबूत भी होता है।
शाम होते-होते
वह लौट आया
धीरे से,
मेरे पाँवों के पास
फिर से जुड़ गया।
मैंने राहत की साँस ली
पर इस बार
मैंने उसे अलग नज़र से देखा।
अब वह सिर्फ़
मेरे साथ चलने वाला अक्स नहीं था
वह वह खाली जगह भी था
जो उसके बिना
मेरे भीतर खुल गई थी।
और तब समझ में आया
कभी-कभी
साया खो जाना ज़रूरी होता है,
ताकि हम जान सकें
कि हम
उसके बिना भी
मौजूद हैं।
मुकेश --------