Posts

चिंतन - क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है?

  चिंतन -  क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है? ज्ञान मनुष्य को बहुत कुछ दे सकता है—तर्क, प्रमाण, विवेक, उपलब्धियाँ और प्रतिष्ठा। परंतु एक प्रश्न मेरे भीतर अक्सर देर तक ठहरा रहता है—यदि ज्ञान मनुष्य को अधिक विनम्र, अधिक सहृदय और अधिक मानवीय न बना सके, तो क्या वह वास्तव में ज्ञान है? यहीं से एक विचार जन्म लेता है— क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है? ज्ञान का पहला चरण जानना है। दूसरा समझना। और अंतिम—अनुभव करना। पर करुणा इन तीनों से भी आगे की अवस्था है। वहाँ हम केवल किसी का दुःख नहीं जानते, उसे समझते भी नहीं; हम उसे अपने भीतर महसूस करने लगते हैं। यही वह क्षण है जहाँ ज्ञान हृदय का रूप ले लेता है। सूखी धरती पर वर्षा का कोई सिद्धांत काम नहीं आता; वहाँ पानी चाहिए। उसी प्रकार जीवन में ऐसे अनेक क्षण आते हैं, जहाँ तर्क हार जाते हैं और करुणा जीत जाती है। किसी रोते हुए बच्चे को दर्शन नहीं चाहिए, माँ की गोद चाहिए। किसी शोकाकुल व्यक्ति को शास्त्रों के उद्धरण नहीं चाहिए, किसी का मौन स्पर्श चाहिए। किसी अकेले मनुष्य को सलाह नहीं चाहिए, साथ चाहिए। शायद इसी का नाम करुणा है। करुणा दया नह...

जेब

  जेब उसने पूछा तुम्हारी कमीज़ की जेब हमेशा खाली क्यों रहती है? मैंने कहा ज़रूरत पड़े तो भर लूँगा। वो बोली क्या? मैंने कहा जो मिल जाए। वो मुस्कुराकर बोली— नहीं... तुम्हारी जेब इसलिए खाली रहती है, क्योंकि तुम चीज़ें नहीं, लोग रखते हो। और लोग... जेब में नहीं, कमी छोड़ जाते हैं। — मुकेश

तकिया

  तकिया उसने पूछा तुम्हारा तकिया इतना दबा हुआ क्यों है? मैंने कहा सिर रखता हूँ उस पर। वो हँसी— सब रखते हैं। इतना तो किसी का नहीं दबता। मैंने कहा नींद से ज़्यादा ख़याल रखता हूँ। कुछ देर चुप रही। फिर बोली— अच्छा... इसलिए तुम्हारे ख़याल सुबह उठ जाते हैं, और तुम देर तक सोते रहते हो। — मुकेश

चिंतन - क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है?

  चिंतन -  क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है? मनुष्य का इतिहास यदि ध्यान से पढ़ा जाए, तो वह उत्तरों का इतिहास कम और प्रश्नों का इतिहास अधिक प्रतीत होता है। प्रत्येक युग ने अपने उत्तर गढ़े, और प्रत्येक अगला युग उन्हीं उत्तरों पर नए प्रश्न लेकर खड़ा हो गया। मानो सत्य कोई स्थिर शिला नहीं, बल्कि एक ऐसा क्षितिज है जो हर कदम पर थोड़ा और दूर चला जाता है। तब मन में एक विचार उठता है— क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है? उत्तर प्रायः समय के होते हैं, प्रश्न चेतना के। उत्तर परिस्थितियों के साथ बदल जाते हैं; प्रश्न युगों को पार कर जाते हैं। आज भी वही प्रश्न हमारे भीतर जीवित हैं जो हजारों वर्ष पहले किसी ऋषि, किसी दार्शनिक, किसी कवि या किसी साधारण मनुष्य के भीतर उठे होंगे— मैं कौन हूँ? सत्य क्या है? प्रेम क्यों है? दुःख का अर्थ क्या है? और सबसे बड़ा प्रश्न— मैं यहाँ क्यों हूँ? इन प्रश्नों का कोई अंतिम उत्तर आज तक नहीं मिला। फिर भी मनुष्य उन्हें छोड़ता नहीं। शायद इसलिए कि कुछ प्रश्न हल करने के लिए नहीं, मनुष्य को विकसित करने के लिए जन...

भगवद्गीता प्रथम अध्याय, पञ्चदश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन

 गवद्गीता प्रथम अध्याय, पञ्चदश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन मूल श्लोक - पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।-पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १.१५ ॥ हृषीकेशः पाञ्चजन्यं दध्मौ, धनञ्जयः देवदत्तं (शङ्खं दध्मौ), भीमकर्मा वृकोदरः महाशङ्खं पौण्ड्रं दध्मौ। सामान्य हिन्दी अर्थ हृषीकेश भगवान श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य शंख बजाया, धनंजय अर्जुन ने देवदत्त शंख बजाया और भयंकर कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने महाशंख पौण्ड्र बजाया। अब केवल शंख नहीं, व्यक्तित्व बोल रहे हैं पिछले श्लोक में व्यास ने कहा था कि कृष्ण और अर्जुन ने दिव्य शंख बजाए। अब वे उन शंखों के नाम बताते हैं। पहली दृष्टि में यह सामान्य विवरण लगता है। किन्तु प्रश्न उठता है— यदि केवल युद्ध का वर्णन करना होता, तो शंखों के नाम बताने की आवश्यकता क्या थी? क्योंकि भारतीय परम्परा में नाम केवल पहचान नहीं, स्वभाव का संकेत होता है। यहाँ शंख नहीं बज रहे। यहाँ तीन चेतनाएँ बोल रही हैं— कृष्ण की चेतना, अर्जुन की चेतना ,भीम की चेतना और आश्चर्य यह है कि तीनों के शंख उनके आन्तरिक स्वरूप का परिचय देते हैं...

चिंतन - क्या संदेह आत्मा की पहली सीढ़ी होता है?

  चिंतन -  क्या संदेह आत्मा की पहली सीढ़ी होता है? हमने बचपन से सीखा कि संदेह बुरा है। संदेह विश्वास को तोड़ देता है, संबंधों को कमज़ोर कर देता है, मन को अशांत कर देता है। इसलिए हमें विश्वास करना सिखाया गया, प्रश्न करना नहीं; स्वीकार करना सिखाया गया, परखना नहीं। परंतु कभी-कभी मैं सोचता हूँ—यदि संसार के हर सत्य को बिना संदेह के स्वीकार कर लिया जाता, तो क्या मनुष्य कभी सत्य तक पहुँच पाता? शायद नहीं। क्योंकि हर महान खोज की शुरुआत विश्वास से नहीं, संदेह से हुई है। संदेह का स्वभाव विचित्र है। वह नकार नहीं है; वह सत्य के प्रति ईमानदारी है। वह कहता है— "मैं मानने को तैयार हूँ, पर पहले जानना चाहता हूँ।" यही आग्रह मनुष्य को भीड़ से अलग करता है। भीड़ विश्वास करती है; साधक सत्यापित करता है। इसलिए संदेह को केवल संशय कहना उसके साथ अन्याय होगा। वह चेतना का जागरण भी है। एक शिशु जब पहली बार किसी वस्तु को हाथ में लेकर उसे उलट-पलट कर देखता है, तब वह केवल खेल नहीं रहा होता; वह संसार पर संदेह कर रहा होता है। वह यह स्वीकार नहीं करता कि जो दिखाई दे रहा है, वही उसका संपूर्ण स्वरूप है। उसकी जिज्ञास...

.चिंतन - क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है?

 . चिंतन -  क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है? मनुष्य ने प्रेम की अनेक परिभाषाएँ लिखीं, पर शायद उसकी सबसे सच्ची परिभाषा कभी शब्दों में नहीं आई। वह आई—प्रतीक्षा में। मैं अक्सर सोचता हूँ, प्रेम की पहचान मिलन से कम और प्रतीक्षा से अधिक क्यों होती है? जो सहज उपलब्ध है, वह मन को प्रिय हो सकता है; किंतु जो अनुपस्थित होकर भी भीतर उपस्थित रहे, वही शायद प्रेम है। इसलिए प्रश्न उठता है—क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है? प्रतीक्षा समय को केवल काटती नहीं, उसे अर्थ भी देती है। जिस समय में किसी की प्रतीक्षा न हो, वह केवल घड़ी की सूइयों का चलना है। किंतु जिस क्षण किसी के आने की संभावना मन में हो, वही क्षण अचानक जीवित हो उठता है। तब एक-एक पल अपनी अलग ध्वनि रखने लगता है। समय तब कैलेंडर नहीं रहता, धड़कन बन जाता है। ध्यान से देखिए, प्रकृति का अधिकांश सौंदर्य भी प्रतीक्षा में ही जन्म लेता है। बीज वर्षा की प्रतीक्षा करता है। धरती बादलों की। भोर सूर्य की। चकोर चंद्रमा की। और समुद्र उस नदी की, जो अंततः उसकी ओर लौटेगी। प्रकृति जानती है कि जो बिना प्रतीक्षा के मिल जाए, उसका मू...