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महाभारत — विराटपर्व — भाग 8 : कीचक-वध की खबर और दुर्योधन की खोज

  महाभारत — विराटपर्व — भाग 8 : कीचक-वध की खबर और दुर्योधन की खोज — पहचान के निकट पहुँचता शत्रु कीचक और उसके 105 सम्बन्धियों के वध के बाद विराटनगर में एक विचित्र स्थिति उत्पन्न होती है। पाण्डवों की पहचान अभी भी सुरक्षित है। किन्तु उनकी उपस्थिति अब पूरी तरह अदृश्य भी नहीं रही। लोगों ने देखा है कि— एक अत्यन्त शक्तिशाली सेनापति कीचक मारा गया। उसके बाद उसके 105 सम्बन्धी भी मारे गए। और दोनों घटनाओं में हत्यारा दिखाई नहीं दिया। नगर में एक ही कथा फैलती है—  सैरन्ध्री के गन्धर्व पति हैं। इसी समय एक दूसरी दिशा में एक दूसरी घटना घट रही है। दुर्योधन के गुप्तचर अपनी खोज पूरी करके लौटते हैं। और यहीं विराटपर्व निजी संकट से पुनः राजनीतिक शतरंज में प्रवेश करता है। TEXT — मूल महाभारत-पाठ महाभारत बताता है कि दुर्योधन द्वारा विभिन्न दिशाओं में भेजे गए गुप्तचर लौटकर कहते हैं कि उन्होंने बहुत खोज की, किन्तु पाण्डवों का कोई निश्चित पता नहीं लगा सके। वे कहते हैं कि उन्होंने अनेक नगरों, ग्रामों और राज्यों में खोज की। रथियों और सारथियों के मार्ग तक का अनुसरण किया। लेकिन अन्ततः—  न च ते पाण्डवाः ...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 7 : उपकीचक और द्रौपदी — जब अन्याय सामूहिक हिंसा बन जाता है

  महाभारत — विराटपर्व — भाग 7 : उपकीचक और द्रौपदी — जब अन्याय सामूहिक हिंसा बन जाता है कीचक के वध के बाद पहली दृष्टि में लगता है कि संकट समाप्त हो गया। वह व्यक्ति जो विराटराज की सत्ता के भीतर अपनी शक्ति के बल पर द्रौपदी का अपमान कर रहा था, भीम के हाथों मारा जा चुका है। किन्तु महाभारत यहीं कथा समाप्त नहीं करता। क्योंकि प्रश्न केवल यह नहीं था कि कीचक दोषी था या नहीं । बड़ा प्रश्न यह था— क्या कीचक के मर जाने से उस व्यवस्था का अधर्म भी समाप्त हो गया, जिसने उसे इतना शक्तिशाली बना दिया था? विराटपर्व का अगला प्रसंग इसका उत्तर अत्यन्त कठोर रूप में देता है। TEXT — मूल महाभारत-पाठ कीचक के भाई और उसके सम्बन्धी उसके मृत शरीर को देखते हैं। उनके भीतर शोक के साथ प्रतिशोध उत्पन्न होता है। और उनका लक्ष्य कीचक का हत्यारा भीम नहीं, बल्कि द्रौपदी बनती है। महाभारत में उनका विचार है कि इस स्त्री के कारण कीचक मारा गया है और इसलिए इसे भी कीचक के साथ जला दिया जाए। द्रौपदी को पकड़ लिया जाता है और उसे कीचक के शव के साथ बाँध दिया जाता है। यहाँ कथा अचानक अत्यन्त भयावह हो जाती है। जिस स्त्री के साथ अपराध हुआ थ...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 5 : कीचक की दृष्टि — अज्ञातवास की पहली बड़ी दरार

  महाभारत — विराटपर्व — भाग 5 : कीचक की दृष्टि — अज्ञातवास की पहली बड़ी दरार TEXT — मूल महाभारत-पाठ  विराटनगर में पाण्डवों का अज्ञातवास धीरे-धीरे सामान्य जीवन का रूप लेने लगता है। युधिष्ठिर कंक के रूप में विराट की सभा में हैं। भीम वल्लव बनकर राजकीय पाकशाला में है। अर्जुन बृहन्नला बनकर राजकुमारी उत्तर को नृत्य-संगीत सिखा रहा है। नकुल अश्वशाला में है। सहदेव गौशाला में है। और द्रौपदी सैरन्ध्री बनकर रानी सुदेष्णा की सेवा कर रही है। महाभारत अचानक समय को आगे बढ़ाता है— वसमानेषु पार्थेषु मत्स्यस्य नगरे तदा। महारथेषु च्छन्नेषु मासा दश समाययुः॥ “जब पाण्डव मत्स्यराज के नगर में छिपकर रह रहे थे, तब दस महीने बीत गए।” इसके बाद एक निर्णायक घटना आती है— तस्मिन्वर्षे गतप्राये कीचकस्तु महाबलः। सेनापतिर्विराटस्य ददर्श द्रुपदात्मजाम्॥ “वर्ष का अधिकांश भाग बीत जाने पर विराट का महाबली सेनापति कीचक द्रुपद की पुत्री द्रौपदी को देखता है।” यह केवल एक पुरुष द्वारा एक स्त्री को देखने का प्रसंग नहीं है। कथा यहीं से अज्ञातवास के बाहरी खतरे से आन्तरिक सामाजिक खतरे में प्रवेश करती है। कीचक की पहली दृष्टि मह...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 6 : कीचक-वध — क्रोध, धर्म और गुप्त न्याय

 महाभारत — विराटपर्व — भाग 6 : कीचक-वध — क्रोध, धर्म और गुप्त न्याय TEXT — मूल महाभारत-पाठ कीचक ने राजसभा में द्रौपदी को सबके सामने लात मारी। द्रौपदी के पाँचों पति उसी सभा में उपस्थित थे—लेकिन अपने वास्तविक रूप में नहीं। युधिष्ठिर कंक हैं। भीम वल्लव हैं। अर्जुन बृहन्नला है। नकुल और सहदेव अपने छद्म में हैं। यह विराटपर्व का शायद सबसे असह्य दृश्य है। महाभारत कहता है— तां कीचकः प्रधावन्तीं केशपक्षे परामृशत्। पातयित्वा तु तां भूमौ सूतपुत्रः पदाऽवधीत्॥ कीचक ने भागती हुई द्रौपदी के केश पकड़ लिए, उसे भूमि पर गिराया और पैर से मारा। और यह सब हुआ— सभायां पश्यतो राज्ञो विराटस्य महात्मनः। ब्राह्मणानां च वृद्धानां क्षत्रियाणां च पश्यताम्॥ विराट, वृद्ध ब्राह्मणों और क्षत्रियों के सामने। यहाँ महाभारत घटना को केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं रहने देता। यह राजसभा के सामने हुआ अन्याय है। द्रौपदी की पुकार द्रौपदी सभा में उपस्थित लोगों को संबोधित करती है। उसका प्रश्न केवल विराट से नहीं है। वह उस पूरी व्यवस्था से प्रश्न करती है जो अन्याय को देख रही है। न राजन्राजवत्किंचित्समाचरसि कीचके। दस्यूनामिव ते धर्मो न स...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 4 : विराटनगर में प्रवेश — पाठ, दुर्गास्तव और पहचान की पहली परीक्षा

  महाभारत — विराटपर्व — भाग 4 : विराटनगर में प्रवेश — पाठ, दुर्गास्तव और पहचान की पहली परीक्षा TEXT — मूल महाभारत-पाठ शमी-वृक्ष पर अपने अस्त्रों को छिपाने और अपने-अपने छद्म रूप निर्धारित करने के बाद पाण्डव विराटनगर की ओर बढ़ते हैं। यहाँ कथा का एक महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है। अब तक वे वन से बाहर निकलने वाले निर्वासित थे। अब वे दूसरे राजा के राज्य में प्रवेश करने वाले अज्ञात व्यक्ति हैं। विराटपर्व के पाण्डवप्रवेश प्रसंग में युधिष्ठिर सबसे पहले नगर में प्रवेश करते हैं। मूल पाठ में उनका रूप अत्यन्त रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। वे हाथ में पासे लिए हुए हैं और अपने लिए कंक नाम का परिचय देते हैं। उनका उद्देश्य विराट की सभा में एक ऐसे व्यक्ति के रूप में उपस्थित होना है जो द्यूत-क्रीड़ा जानता है और राजा का मनोरंजन कर सकता है। विराट उन्हें देखकर प्रभावित होता है। यहाँ महाभारत एक अत्यन्त सूक्ष्म दृश्य रचता है—  एक राजा दूसरे राजा को पहचान नहीं पाता। विराट के सामने खड़ा व्यक्ति वास्तव में हस्तिनापुर का निर्वासित सम्राट है; लेकिन विराट उसे एक साधारण द्यूतज्ञ के रूप में देख रहा है। य...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 3 : छद्मवेश नहीं, व्यक्तित्व का पुनर्संयोजन

  महाभारत — विराटपर्व — भाग 3 : छद्मवेश नहीं, व्यक्तित्व का पुनर्संयोजन TEXT — मूल महाभारत-पाठ शमी-वृक्ष पर अस्त्रों को सुरक्षित रख देने के बाद अब सबसे कठिन प्रश्न सामने है— पाँचों पाण्डव और द्रौपदी विराट के राज्य में किस रूप में प्रवेश करेंगे? यह प्रश्न केवल भेष का नहीं है। यदि वे ऐसा काम चुनते हैं जो उनकी प्रकृति और पूर्व जीवन से बिल्कुल असंगत हो, तो संदेह उत्पन्न हो सकता है। इसलिए उनके द्वारा चुनी गयी भूमिकाओं पर ध्यान देना आवश्यक है। महाभारत के मूल पाठ में प्रत्येक पाण्डव स्वयं अपनी भूमिका प्रस्तावित करता है। भीम — वल्लव, रसोइया और मल्ल युधिष्ठिर को चिंता है कि भीम जैसा अत्यन्त बलशाली और क्रोधी व्यक्ति विराट के राज्य में किस प्रकार छिपेगा। भीम उत्तर देता है— सूदोऽहं वललो नाम्ना सूपकारो नराधिप। उपस्थास्यामि राजानं विराटमिति रोचये॥ “मैं वल्लव नाम का सूद/रसोइया बनकर राजा विराट की सेवा करूँगा।” वह केवल भोजन बनाने की बात नहीं करता। वह कहता है कि वह विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बना सकता है और विराट के रसोइयों से भी बेहतर भोजन तैयार करेगा। साथ ही वह राजा के मल्लों से कुश्ती करेग...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 2 : शमी वृक्ष पर अस्त्र — शक्ति का स्वैच्छिक विसर्जन

महाभारत — विराटपर्व — भाग 2 : शमी वृक्ष पर अस्त्र — शक्ति का स्वैच्छिक विसर्जन TEXT — मूल महाभारत-पाठ वनवास के बारह वर्ष पूरे हो चुके हैं। तेरहवाँ वर्ष सामने है और अब समस्या केवल यह नहीं कि पाण्डव स्वयं को कैसे छिपाएँगे, बल्कि यह भी है कि उनके अस्त्र उन्हें पहचान नवा दें। युधिष्ठिर अर्जुन से पूछते हैं— इमानि पुरुषव्याघ्र आयुधानि परंतप। कस्मिन्न्यासयितव्यानि गुप्तिश्चैषां कथं भवेत्॥ “हे पुरुषश्रेष्ठ! इन अस्त्रों को कहाँ रखा जाए और इनकी रक्षा किस प्रकार हो?” युधिष्ठिर स्वयं समस्या की गंभीरता बताते हैं— गाण्डीवं हि नरव्याघ्र त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्। कथं नाविष्कृताः स्यामो धार्तराष्ट्रस्य मारिष॥ गाण्डीव तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। यदि वह दिखाई दे गया तो पाण्डवों की पहचान छिपी नहीं रह सकती। इतना ही नहीं— एकस्मिन्नपि विज्ञाते समयं नो व्यतीत्य च। भूयो द्वादशवर्षाणि प्रविशेम वनं वयम्॥ यदि केवल एक व्यक्ति भी पहचान लिया गया और तेरहवें वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले उनका भेद खुल गया, तो उन्हें फिर बारह वर्ष वन में जाना पड़ सकता है। अर्थात् समस्या साधारण नहीं थी। अस्त्रों को छिपाना वास्तव में अपन...