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Thursday, 14 May 2026

सातवाँ तमाशा

 सातवाँ तमाशा

मृत्यु का तमाशा

अब मृत्यु भी

शांत घटना नहीं रही।


वह भी

धीरे-धीरे

एक सार्वजनिक दृश्य में बदल गई है।


किसी के मरते ही

सबसे पहले

फोन निकाला जाता है।


फिर खबर लिखी जाती है—

“बहुत दुखद…”

और उसके नीचे

उदास चेहरे वाला इमोजी लगा दिया जाता है।


जैसे दुख नहीं,

उसकी औपचारिकता निभाई जा रही हो।


श्मशान में

लकड़ियाँ जल रही होती हैं,

और थोड़ी दूर

कोई आदमी

धीरे-धीरे मोबाइल स्क्रॉल कर रहा होता है।


एक समय था

जब मृत्यु

मनुष्य को भीतर तक हिला देती थी।


अब लोग

अंतिम यात्रा में भी

स्टेटस अपडेट कर लेते हैं।


“Life is unpredictable…”


और फिर

कुछ देर बाद

उसी उँगली से

कोई मज़ाकिया वीडियो देखने लगते हैं।


मृत्यु अब

दर्शन नहीं रही,

एक क्षणिक कंटेंट बनती जा रही है।


किसी प्रसिद्ध आदमी की मौत हो

तो लोग

शोक कम,

अपनी उपस्थिति ज़्यादा दर्ज कराते हैं।


हर कोई लिखना चाहता है—

“मैं बहुत दुखी हूँ…”


मगर सच यह है

कि हम

दूसरों की मृत्यु में भी

धीरे-धीरे

अपने प्रदर्शन का अवसर खोज लेते हैं।


और सबसे अजीब बात—

हम मृत्यु से दुखी कम,

डरे ज़्यादा होते हैं।


क्योंकि

किसी और की चिता में

हमें

अपना भविष्य जलता हुआ दिखाई देता है।


इसलिए हम

जल्दी से लौट आते हैं

फिर उसी शोर,

उसी बाज़ार,

उसी भागमभाग में।


जैसे कुछ हुआ ही न हो।


मगर मृत्यु

इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ती।


वह

कभी किसी पुराने कपड़े की गंध में,

कभी किसी ख़ाली कमरे में,

कभी किसी अचानक याद आ गए नाम में

फिर लौट आती है।


और तब समझ आता है

कि मृत्यु

सिर्फ़ शरीर का अंत नहीं,

बल्कि

समय की सबसे गहरी फुसफुसाहट है।


वह हर दिन

धीरे से कहती रहती है

कि जो कुछ तुम पकड़कर बैठे हो,

वह टिकने वाला नहीं।


न यह शरीर,

न यह प्रसिद्धि,

न यह क्रोध,

न यह संग्रह।


फिर भी

मनुष्य

ऐसे जीता है

जैसे उसे कभी मरना ही नहीं।


शायद

यही सबसे बड़ा भ्रम है।


और इसी भ्रम के सहारे

सभ्यताएँ खड़ी होती हैं,

युद्ध होते हैं,

प्रेम जन्म लेते हैं,

कविताएँ लिखी जाती हैं।


मृत्यु

सब जानती है।


वह जल्दी में नहीं है।


वह बस

भीड़ के किनारे खड़ी

शांत आँखों से देख रही है


कि मनुष्य

अपनी नश्वरता को भूलने के लिए

कैसे-कैसे तमाशे रचता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

छठा तमाशा

 छठा तमाशा

आध्यात्मिक बाज़ार का तमाशा


इन दिनों

मोक्ष भी

ईएमआई पर मिलने लगा है।


हर गली में

एक नया गुरु है,

हर स्क्रीन पर

एक नया ज्ञान।


कहीं

तीन दिन में कुंडलिनी जागृत करने का दावा है,

कहीं

सात मिनट में तीसरी आँख खोलने का।


आध्यात्म अब

धीरे-धीरे

एक सुव्यवस्थित उद्योग बन गया है।


ध्यान भी पैकेज में है,

मौन भी शुल्क लेकर मिलता है।


लोग

भीतर की शांति खोजने निकलते हैं,

और लौटते समय

एक महँगी माला,

कुछ मोटिवेशनल वाक्य

और गुरुजी के साथ खिंचवाई हुई तस्वीर लेकर लौटते हैं।


अजीब समय है

जहाँ

अहंकार भी

आध्यात्मिक भाषा बोलने लगा है।


कोई कहता है—

“मैं बहुत जाग्रत आत्मा हूँ…”

कोई लिखता है—

“मैं अब 5D consciousness में जी रहा हूँ…”


और यह सब कहते हुए भी

उन्हें

थोड़ी-सी आलोचना सहन नहीं होती।


पहले साधु

जंगलों में खो जाते थे,

अब

एल्गोरिद्म में मिलते हैं।


उनके प्रवचन से ज़्यादा

उनकी वीडियो एडिटिंग चमकती है।


भक्ति भी अब

कैमरे का एंगल माँगती है।


किसी आश्रम में

हज़ारों लोग बैठे हैं,

मगर

बहुत कम लोग

सचमुच अपने भीतर बैठे हैं।


सबको अनुभव चाहिए,

पर साधना नहीं।

सबको शांति चाहिए,

पर अपने भ्रम छोड़ने की तैयारी नहीं।


और बाज़ार

मनुष्य की इसी अधीरता को बेच रहा है।


“Instant enlightenment…”

“Cosmic energy activation…”

“Manifest your destiny…”


जैसे आत्मा नहीं,

कोई मोबाइल ऐप अपडेट हो रहा हो।


मैं यह सब देखता हूँ

तो कभी-कभी

पुराने ऋषियों की याद आती है।


वे

कम बोलते थे,

धीरे चलते थे,

और अपने ज्ञान को

घोषणा की तरह नहीं,

साँस की तरह जीते थे।


उन्हें

अनुयायियों की संख्या से नहीं,

अपने भीतर के मौन से मतलब था।


मगर आज

मौन भी

माइक्रोफोन पर बोला जा रहा है।


और सबसे बड़ा दुख यह नहीं

कि बाज़ार आध्यात्म बेच रहा है


बल्कि यह है

कि थका हुआ मनुष्य

सचमुच शांति चाहता है,

और उसकी इसी प्यास को

तमाशे में बदला जा रहा है।


शायद

आध्यात्म का पहला कदम

किसी गुरु तक पहुँचना नहीं,

बल्कि

अपने भीतर के शोर को पहचानना था।


मगर अब

लोग भीतर उतरने से पहले ही

अपनी “स्पिरिचुअल सेल्फी” पोस्ट कर देते हैं।


और इस युग में

जहाँ साधना से ज़्यादा

उसकी ब्रांडिंग चमक रही है


आध्यात्म भी

धीरे-धीरे

एक विशाल तमाशा बनता जा रहा है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

पाँचवाँ तमाशा

पाँचवाँ तमाशा

प्रेम का तमाशा

अब प्रेम भी
धीरे-धीरे
एक सार्वजनिक प्रदर्शन में बदल गया है।

लोग प्रेम कम करते हैं,
उसकी घोषणा ज़्यादा करते हैं।

हर मुस्कुराहट के पीछे
एक कैमरा छिपा है,
हर आलिंगन के पीछे
एक पोस्ट का मसौदा।

दो लोग
समुद्र किनारे बैठे हैं
मगर लहरों को नहीं,
अपने-अपने फ़ोन के फ्रंट कैमरे को देख रहे हैं।

कैप्शन लिखा जा रहा है—
“Forever ❤️”

और उसी रात
दोनों अलग-अलग कमरों में
चुप्पी से लड़ रहे होते हैं।

प्रेम अब
धीरे-धीरे
अनुभव से ज़्यादा
प्रदर्शन बनता जा रहा है।

पहले लोग
प्रेमपत्र छुपाते थे,
अब चैट्स लीक करते हैं।

पहले किसी का नाम
दिल में रखा जाता था,
अब “स्टेटस” में रखा जाता है।

और अजीब बात यह है
कि जितना ज़्यादा प्रेम दिखता है,
कई बार
उतना ही कम बचा होता है।

मैंने एक लड़के को देखा
जो हर रोज़ अपनी प्रेमिका की तस्वीर डालता था,
मगर जब वह रो रही थी
तो उसके पास
समय नहीं था।

मैंने एक लड़की को देखा
जो दुनिया को बताती थी
“वह मेरी पूरी दुनिया है…”
मगर भीतर ही भीतर
वह खुद को
धीरे-धीरे खोती जा रही थी।

अब प्रेम में
इंतज़ार कम,
घबराहट ज़्यादा है।

“Last seen”
ने धैर्य मार दिया।
“Typing…”
ने बेचैनी बढ़ा दी।

और “Seen”
कई रिश्तों का
सबसे बड़ा श्मशान बन गया।

लोग अब
एक-दूसरे को पढ़ते नहीं,
बस
एक-दूसरे की ऑनलाइन उपस्थिति नापते हैं।

कभी-कभी लगता है
हम प्रेम में नहीं,
अपनी-अपनी असुरक्षाओं में गिरते हैं।

और फिर
उसे ही प्रेम का नाम दे देते हैं।

सच तो यह है
कि प्रेम हमेशा से
थोड़ा मौन था।

वह भीड़ में नहीं,
दो लोगों के बीच की
अनकही जगहों में रहता था।

मगर अब
हर चीज़ को साबित करना पड़ता है।

यहाँ तक कि प्रेम को भी।

और इस पूरी दुनिया में
जहाँ लोग
दिल टूटने से ज़्यादा
अनफॉलो होने से डरते हैं

मैं सोचता हूँ
प्रेम शायद
धीरे-धीरे
तमाशा बनता जा रहा है।

चौथा तमाशा

 चौथा तमाशा


अब

सबसे बड़ा तमाशा

मनुष्य का अकेलापन है।


भीड़ पहले भी थी,

मगर इतना सन्नाटा

शायद पहले कभी नहीं था।


हर आदमी

किसी-न-किसी स्क्रीन पर मौजूद है,

पर अपने भीतर से

धीरे-धीरे ग़ायब होता जा रहा है।


लोग घंटों बात करते हैं,

मगर संवाद कहीं नहीं होता।

हज़ारों “फॉलोअर्स” हैं,

मगर

रात के दो बजे

किसे फ़ोन किया जाए

यह सवाल अब भी अनाथ पड़ा है।


एक लड़का

रोज़ अपनी मुस्कुराती तस्वीरें डालता है,

और हर रात

नींद की गोलियों के बीच

अपनी चुप्पी गिनता है।


एक लड़की

हर पोस्ट पर लिखती है

“Living my best life…”

मगर

उसकी आँखों के नीचे

थकान का एक पुराना दरिया बहता है।


हमने

अपने दुखों को

फ़िल्टर लगाना सिखा दिया है।


अब आँसू भी

पोस्ट होने के बाद ही

सच्चे माने जाते हैं।


कोई ध्यान नहीं देता

कि इस समय

सबसे ज़्यादा मर रही चीज़

मनुष्य की भीतर की शांति है।


हर कोई

कुछ बनना चाहता है,

कुछ दिखना चाहता है,

कुछ साबित करना चाहता है।


और इस भागमभाग में

आदमी

अपने ही भीतर पीछे छूटता जा रहा है।


ध्यान से देखो—

मेट्रो में बैठे लोग

यात्रा नहीं कर रहे,

वे

अपने-अपने डिजिटल कुओं में झाँक रहे हैं।


किसी के कानों में संगीत है,

किसी की उँगलियों में स्क्रॉलिंग,

किसी की आँखों में थकान।


मगर

बहुत कम लोग हैं

जो सचमुच इस क्षण में मौजूद हैं।


शायद

इसीलिए ऋषि

जंगलों में चले जाते थे।


उन्हें पेड़ों से प्रेम कम,

मनुष्य के शोर से थकान ज़्यादा रही होगी।


और मैं

जब यह सब देखता हूँ

तो लगता है

सभ्यता जितनी आगे बढ़ी है,

मनुष्य उतना ही

अपने हृदय से दूर होता गया है।


हमने

दुनिया से जुड़ने के

हज़ार तरीक़े खोज लिए,

मगर

अपने आप से मिलने का रास्ता

धीरे-धीरे भूल गए।


यही चौथा तमाशा है


कि इस पूरी दुनिया में

सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं,

फिर भी

हर आदमी

अपने भीतर

अकेला बैठा है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

पहला तमाशा

 पहला तमाशा

शायद

इस पूरी दुनिया का पहला तमाशा

ईश्वर खुद है।


वही

जो दिखाई नहीं देता,

फिर भी

हर जगह मौजूद बताया जाता है।


जिसके नाम पर

सदियों से

युद्ध भी हुए,

मंदिर भी बने,

और अकेले आदमी ने

अँधेरे कमरों में

रो-रोकर प्रार्थनाएँ भी कीं।


वह चुपचाप देखता रहा

राजाओं को मरते हुए,

सभ्यताओं को मिट्टी बनते हुए,

प्रेम को नफ़रत में बदलते हुए।


कभी-कभी लगता है

ईश्वर कोई सत्ता नहीं,

बल्कि

एक विराट दर्शक है

जो इस पूरे ब्रह्मांड को

एक अनंत नाटक की तरह देख रहा है।


हम जन्म लेते हैं,

भागते हैं,

लड़ते हैं,

कमाते हैं,

प्रेम करते हैं,

घृणा करते हैं,

और फिर

धीरे-धीरे मिट्टी में बदल जाते हैं।


मगर

उसकी आँखों में

शायद कोई हैरानी नहीं होती।


क्योंकि

जिसे हम त्रासदी कहते हैं,

वह शायद

उसकी दृष्टि में

सिर्फ़ एक क्षण हो।


हम मंदिरों में

घंटियाँ बजाकर

उसे जगाना चाहते हैं,

जबकि संभव है

वह कभी सोया ही न हो।


या शायद

वह हमारी तरह

किसी पक्ष में नहीं है।


न अच्छे के,

न बुरे के।


वह बस देख रहा है

कि मनुष्य

अपनी इच्छाओं,

अपने भय,

अपने अहंकार

और अपने अकेलेपन से

कैसे-कैसे संसार बना लेता है।


आज के समय में तो

ईश्वर भी अजीब दुविधा में होगा।


लोग

प्रार्थना कम,

प्रदर्शन ज़्यादा करते हैं।


भक्ति भी अब

रील्स में संपादित होकर आती है।

धर्म भी

हैशटैग लेकर चलता है।


हर आदमी

अपने ईश्वर को

दूसरे के ईश्वर से बड़ा साबित करने में लगा है।


और ईश्वर

शायद मुस्कराकर देख रहा है

कि जिन्हें मैंने

प्रेम सिखाने भेजा था,

वे मेरे नाम पर

घृणा का व्यापार कर रहे हैं।


कभी-कभी मैं सोचता हूँ

यदि ईश्वर सचमुच है,

तो वह सबसे ज़्यादा

मंदिरों में नहीं,

बल्कि

उन क्षणों में होगा

जहाँ कोई आदमी

बिना कैमरे के

किसी रोते हुए आदमी का हाथ पकड़ता है।


बाक़ी सब

बहुत संभव है

सिर्फ़ मंच-सज्जा हो।


और इस विराट रंगमंच पर

जहाँ ग्रह, नक्षत्र, युद्ध, प्रेम, राजनीति,

सभ्यताएँ और स्क्रीनें

सब अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभा रही हैं


ईश्वर

शायद

पहला तमाशा है।


मुकेश ,,,,,,,

दूसरा तमाशा

 दूसरा तमाशा

मैं भीड़ से थोड़ा दूर खड़ा था,

जैसे हमेशा खड़ा रहता हूँ।

न पूरी तरह शामिल,

न पूरी तरह अलग।


लोग चीख रहे थे,

बहस कर रहे थे,

देश बचा रहे थे,

धर्म बचा रहे थे,

अपनी-अपनी स्क्रीन पर

क्रांति का लाइव प्रसारण कर रहे थे।


और मैं

बस देख रहा था।


पहले मुझे लगता था

कि दुनिया बदल रही है।

अब लगता है

दुनिया सिर्फ़ अपना मंच बदल रही है।


पहले चौपालों में तमाशे होते थे,

अब टाइमलाइन पर होते हैं।

पहले लोग आँखों से देखते थे,

अब नोटिफ़िकेशन से देखते हैं।


हर आदमी

अपने भीतर एक छोटा-सा चैनल लिए घूम रहा है,

जहाँ

वह खुद ही एंकर है,

खुद ही दर्शक,

और खुद ही

अपनी राय का भक्त।


किसी की मौत

“ट्रेंड” बन जाती है,

किसी की बर्बादी

“कंटेंट”।


रोते हुए आदमी के सामने भी

लोग पहले कैमरा सीधा करते हैं,

फिर संवेदना।


मैं यह सब देखता हूँ

तो कभी-कभी लगता है—

असल तमाशा

घटनाएँ नहीं हैं,

हम हैं।


हमारी बेचैनियाँ हैं,

हमारी भूख है

हर चीज़ को

तुरंत अर्थ,

तुरंत प्रतिक्रिया

और तुरंत मनोरंजन में बदल देने की।


हम अब जीते कम हैं,

रिकॉर्ड ज़्यादा करते हैं।


किसी पहाड़ पर जाकर भी

पहाड़ नहीं देखते,

बस यह सोचते हैं

कि कौन-सा एंगल

ज़्यादा ‘एस्थेटिक’ लगेगा।


प्रेम भी अब

कहानियों से ज़्यादा

स्टेटस अपडेट में मिलता है।

दुख भी

पोस्ट होने के बाद ही

सच माना जाता है।


और इन सबके बीच

मैं अपने भीतर

एक अजीब-सा सन्नाटा लिए खड़ा हूँ।


कभी-कभी लगता है

मैं भी कोई इंसान नहीं,

बस एक दूसरा तमाशा हूँ


जो दुनिया को

थोड़ी दूरी से देख रहा है,

जैसे नदी किनारे बैठा कोई साधु

बहते हुए शवों और फूलों को

एक ही शांति से देखता हो।


मुझे अब

बहुत-सी बातों पर क्रोध नहीं आता।

सिर्फ़ विस्मय होता है।


कि मनुष्य

इतना बुद्धिमान होकर भी

अपने ही बनाए हुए शोर में

धीरे-धीरे डूबता जा रहा है।


और शायद

साक्षी भाव का अर्थ यही है—

कि तुम दुनिया से भागो नहीं,

मगर

उसके हर उन्माद में

अपना होश भी मत खो दो।


इसलिए

मैं भीड़ में रहकर भी

थोड़ा किनारे खड़ा रहता हूँ।


लोग समझते हैं

मैं उदास हूँ।

नहीं

मैं बस

दूसरा तमाशा हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,

तीसरा तमाशा

 


तीसरा तमाशा

मुहल्ले के नुक्कड़ पर

आज फिर भीड़ जमा थी।

कोई बूढ़ा आदमी

अपनी दवाइयों की पर्ची लिए

बहुत देर से खड़ा था,

और लोग

उसकी साँसों से ज़्यादा

उसकी बेबसी का हाल पूछ रहे थे।


एक आदमी ने धीरे से कहा

“सुना है बेटों ने घर से निकाल दिया…”

दूसरे ने चाय की चुस्की लेकर जवाब दिया

“अरे, पूरा किस्सा पता करो…

ऐसी कहानियाँ रोज़ कहाँ मिलती हैं!”


फिर देखते ही देखते

उस बूढ़े की ज़िन्दगी

मुहल्ले की सबसे ताज़ा ख़बर बन गई।


कोई उसकी मदद नहीं कर रहा था,

बस उसके दुख को

अपने-अपने अंदाज़ में सजाकर

आगे पहुँचा रहा था।


एक औरत ने अफ़सोस जताया,

मगर आँखों में हल्की-सी चमक थी

जैसे किसी और का उजड़ना

उसे अपने घर की सलामती का सबूत दे रहा हो।


हम अजीब दौर में जी रहे हैं—

जहाँ लोग

रिश्तों की राख पर हाथ सेंकते हैं।


किसी की नौकरी चली जाए,

तो हम कहते हैं

“अरे! आजकल तो बहुत बुरा समय है…”

मगर भीतर कहीं

एक धीमी राहत भी पलती है

कि अच्छा हुआ

यह हादसा हमारे साथ नहीं हुआ।


किसी की शादी टूटे,

तो सहानुभूति कम

जिज्ञासा ज़्यादा जागती है।


हम पूछते नहीं

“तुम ठीक हो?”

हम पूछते हैं

“असल वजह क्या थी?”


दर्द अब दर्द नहीं रहा,

एक दिलचस्प सामग्री बन गया है।


हमारे भीतर

एक अदृश्य दर्शक बैठा है

जो हर टूटते हुए आदमी को

एक एपिसोड की तरह देखता है।


और सबसे भयावह बात यह है

हमें अब अपने इस पतन पर

शर्म भी नहीं आती।


हम बस इंतज़ार करते हैं

कि अगला तमाशा कहाँ होगा,

किसके घर का सन्नाटा

कल की बातचीत बनेगा।


क्योंकि

इस समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं

कि लोग दुखी हैं

बल्कि यह है

कि लोग

दूसरों के दुख से मनोरंजन करने लगे हैं।


मुकेश ,,,,,,