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महाभारत — द्रोणपर्व — भाग ४९ चौदहवें दिन का युद्ध : सूर्यास्त से पहले जयद्रथ तक

महाभारत — द्रोणपर्व — भाग ४९  चौदहवें दिन का युद्ध : सूर्यास्त से पहले जयद्रथ तक अभिमन्यु की मृत्यु के बाद महाभारत का चौदहवाँ दिन केवल एक नया युद्ध-दिन नहीं था। यह एक समयबद्ध युद्ध था। अर्जुन ने प्रतिज्ञा कर ली थी— सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध। और यदि वह ऐसा न कर सके तो अग्नि में प्रवेश करने का संकल्प। अब दोनों सेनाओं की रणनीति इसी एक प्रतिज्ञा के इर्द-गिर्द घूमने लगी। कौरवों के सामने लक्ष्य स्पष्ट था—  जयद्रथ को सूर्यास्त तक बचाए रखना। पाण्डवों के सामने लक्ष्य उससे भी स्पष्ट था—  अर्जुन को जयद्रथ तक पहुँचाना। इसलिए चौदहवें दिन का युद्ध केवल शस्त्रों का संघर्ष नहीं था। यह था—  गति बनाम अवरोध।  समय बनाम रणनीति।  प्रतिज्ञा बनाम रक्षा। जयद्रथ की रक्षा क्यों? जयद्रथ स्वयं उस समय कौरव सेना का सबसे शक्तिशाली योद्धा नहीं था। उसकी रक्षा के लिए इतने बड़े सैन्य आयोजन का कारण उसकी व्यक्तिगत युद्धक्षमता नहीं थी। कारण था—  अर्जुन की प्रतिज्ञा। यदि जयद्रथ सूर्यास्त तक सुरक्षित रहता, तो अर्जुन की प्रतिज्ञा विफल होती। इसलिए कौरवों के लिए जयद्रथ अब केवल एक योद्धा नह...

महाभारत — द्रोणपर्व — भाग ४८ अभिमन्यु के बाद : शोक से प्रतिज्ञा तक

 महाभारत — द्रोणपर्व — भाग ४८ - अभिमन्यु के बाद : शोक से प्रतिज्ञा तक अभिमन्यु गिर चुका था। तेरहवें दिन का सूर्य अस्त होने की ओर बढ़ रहा था। चक्रव्यूह टूट चुका था, लेकिन उसके भीतर जो हुआ था, उसने पाण्डव-शिविर को भीतर तक हिला दिया था। यह केवल एक योद्धा की मृत्यु नहीं थी। अभिमन्यु अर्जुन का पुत्र था।सुभद्रा का पुत्र था। कृष्ण का भानजा था। और पाण्डवों की अगली पीढ़ी की सबसे उज्ज्वल आशा था। लेकिन महाभारत इस शोक को केवल व्यक्तिगत दुःख के रूप में नहीं रखता। अभिमन्यु की मृत्यु के बाद युद्ध का स्वर ही बदल जाता है। अब प्रश्न यह नहीं था कि— कौन युद्ध जीतेगा? प्रश्न बन गया—  अभिमन्यु के साथ जो हुआ, उसका उत्तर क्या होगा? अर्जुन को अभी कुछ पता नहीं था अर्जुन उस समय संशप्तकों से युद्ध कर रहा था। त्रिगर्तों और अन्य योद्धाओं ने उसे मुख्य युद्धभूमि से दूर बाँध रखा था। यह व्यवस्था आकस्मिक नहीं थी। द्रोण की योजना ही ऐसी थी कि अर्जुन को अलग रखा जाए और युधिष्ठिर को पकड़ने का अवसर प्राप्त हो। लेकिन इस योजना की एक दूसरी परिणति हुई— अर्जुन अपने पुत्र की रक्षा के लिए उपस्थित नहीं था। यही महाभारत क...

महाभारत — द्रोणपर्व — भाग ४७ अभिमन्यु का अंतिम संघर्ष : जब युद्ध ने अपने ही नियमों को तोड़ दिया

 महाभारत — द्रोणपर्व — भाग ४७ अभिमन्यु का अंतिम संघर्ष : जब युद्ध ने अपने ही नियमों को तोड़ दिया तेरहवें दिन का युद्ध अब उस बिन्दु पर पहुँच चुका था जहाँ वीरता और युद्धनीति के बीच का अंतर लगभग समाप्त हो गया था। अभिमन्यु का धनुष काट दिया गया। उसका रथ नष्ट हो चुका था। घोड़े और सारथि मारे जा चुके थे। तलवार और ढाल भी नष्ट हो चुके थे। और उसके हाथ में बचा था—एक रथ का पहिया। भाग ४६ में हमने देखा कि यह पहिया केवल एक टूटा हुआ रथचक्र नहीं था। वह उस क्षण एक योद्धा के पास बची हुई अंतिम प्रतिरोध-शक्ति था। अब प्रश्न यह था—  क्या निहत्थे हो चुके अभिमन्यु को युद्धभूमि में एक योद्धा की तरह लड़ने दिया जाएगा? यहीं से द्रोणपर्व की कथा केवल अभिमन्यु-वध की कथा नहीं रह जाती। यह युद्ध के धर्म की परीक्षा बन जाती है। रथचक्र हाथ में लेकर अभिमन्यु अभिमन्यु ने रथ का पहिया उठा लिया और द्रोण की ओर बढ़ा। यह दृश्य महाभारत की युद्ध-कथा के सबसे प्रभावशाली दृश्यों में से एक है। बाद की परम्परा ने इसे लगभग प्रतीक बना दिया—एक ऐसा योद्धा जिसके पास अब कोई व्यवस्थित शस्त्र नहीं था, फिर भी वह पीछे हटने के लिए...

महाभारत — द्रोणपर्व — भाग 46 : अभिमन्यु का रथ-विनाश — युद्धनीति की निर्णायक परीक्षा

  महाभारत — द्रोणपर्व — भाग 46 : अभिमन्यु का रथ-विनाश — युद्धनीति की निर्णायक परीक्षा तेरहवें दिन का युद्ध अब उस सीमा पर पहुँच चुका था जहाँ अभिमन्यु का पराक्रम केवल व्यक्तिगत वीरता का विषय नहीं रह गया था। वह चक्रव्यूह के भीतर कौरव सेना की एक के बाद एक परतों को भेदता हुआ आगे बढ़ रहा था। दुर्योधन का पुत्र लक्ष्मण उसके हाथों मारा जा चुका था और उसके बाद द्रोण, कृप, कर्ण, अश्वत्थामा, बृहद्बल और कृतवर्मा जैसे महारथियों ने उसे घेरने का प्रयास किया था। लेकिन अभिमन्यु अभी भी युद्ध कर रहा था। यहीं से महाभारत का यह प्रसंग केवल वीरता की कथा नहीं रह जाता; यह युद्ध में नियम, रणनीति और सामूहिक शक्ति के प्रश्न को सामने लाता है। अभिमन्यु को रोकना क्यों कठिन था? अभिमन्यु के पास उस समय पूर्ण सैन्यदल नहीं था। उसके पीछे पाण्डवों की पूरी सेना नहीं थी। फिर भी वह लगातार आगे बढ़ रहा था। उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी— गति और आक्रमण की निरन्तरता। वह किसी एक महारथी से लम्बे समय तक उलझकर अपनी गति समाप्त नहीं करता। वह एक लक्ष्य को भेदता, दूसरे की ओर बढ़ता और कौरवों की आन्तरिक व्यवस्था में नया छेद पैदा कर देता। द्रो...

महाभारत — द्रोणपर्व — भाग 45 : चौदहवाँ दिन — समय के विरुद्ध युद्ध, जयद्रथ और सूर्यास्त की रणनीति

  महाभारत — द्रोणपर्व — भाग 45 : चौदहवाँ दिन — समय के विरुद्ध युद्ध, जयद्रथ और सूर्यास्त की रणनीति तेरहवें दिन अभिमन्यु की मृत्यु ने युद्ध का स्वरूप फिर बदल दिया। अब अर्जुन के सामने एक स्पष्ट प्रतिज्ञा थी— सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध। यह प्रतिज्ञा भावनात्मक प्रतिक्रिया थी, लेकिन चौदहवें दिन उसका प्रभाव पूरी तरह रणनीतिक हो गया। अब दोनों सेनाओं के पास एक निश्चित लक्ष्य था। पाण्डवों को जयद्रथ तक पहुँचना था। कौरवों को जयद्रथ को सूर्यास्त तक सुरक्षित रखना था। इसलिए पहली बार युद्ध की सफलता केवल शौर्य से नहीं, समय की गति से भी मापी जाने वाली थी। जयद्रथ ही क्यों? तेरहवें दिन अभिमन्यु चक्रव्यूह के भीतर प्रवेश कर चुका था। उसके पीछे पाण्डव योद्धा भी आगे बढ़ना चाहते थे, लेकिन जयद्रथ ने उन्हें रोक दिया। इसलिए अर्जुन के लिए अभिमन्यु की मृत्यु का एक प्रमुख कारण जयद्रथ बना। महाभारत की कथा में जयद्रथ का यह कार्य आकस्मिक नहीं था। उसे एक विशेष वर प्राप्त था कि वह एक दिन के लिए अर्जुन को छोड़कर शेष पाण्डवों को रोकने में समर्थ होगा। इसी वर का उपयोग तेरहवें दिन हुआ। अतः चौदहवें दिन अर्जुन का लक्ष्य ...

महाभारत — द्रोणपर्व — भाग 44 : तेरहवाँ दिन — चक्रव्यूह, अभिमन्यु और युद्धनीति की निर्णायक परीक्षा

  महाभारत — द्रोणपर्व — भाग 44 : तेरहवाँ दिन — चक्रव्यूह, अभिमन्यु और युद्धनीति की निर्णायक परीक्षा भीष्म के पतन के बाद द्रोणाचार्य के सेनापतित्व में युद्ध का स्वरूप बदल चुका था। अब युद्ध केवल दो विशाल सेनाओं का प्रत्यक्ष संघर्ष नहीं था। सेनापति किसी विशिष्ट लक्ष्य को सामने रखकर पूरी सेना की गति को नियंत्रित कर रहा था। वह लक्ष्य था— युधिष्ठिर को जीवित पकड़ना। ग्यारहवें और बारहवें दिन अर्जुन को संशप्तकों के माध्यम से मुख्य युद्धक्षेत्र से दूर रखने की रणनीति अपनाई गई। बारहवें दिन द्रोण ने गरुड़-व्यूह जैसी संगठित रचना के माध्यम से युधिष्ठिर तक पहुँचने का प्रयास किया, लेकिन अर्जुन की उपस्थिति और पाण्डवों की रक्षा-व्यवस्था के कारण सफलता नहीं मिली। अगले दिन रणनीति और कठोर हुई। तेरहवाँ दिन इसलिए केवल अभिमन्यु-वध का दिन नहीं है। यह उस प्रश्न की परीक्षा है कि— जब किसी सेना के मुख्य रक्षक को उसके केन्द्र से अलग कर दिया जाए, तब उसकी रक्षा-व्यवस्था कितनी देर तक टिक सकती है? अर्जुन को युद्ध के दूसरे छोर पर ले जाना तेरहवें दिन फिर संशप्तकों ने अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारा। अर्जुन उनके पीछे दक्ष...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 43 : द्रोणाचार्य का सेनापतित्व — युद्ध की नई रणनीति

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 43 : द्रोणाचार्य का सेनापतित्व — युद्ध की नई रणनीति भीष्म के शरशय्या पर गिरते ही कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल एक महान योद्धा के पतन का साक्षी नहीं बना, बल्कि उसकी पूरी रणनीतिक संरचना बदल गई। दस दिनों तक कौरव सेना का नेतृत्व भीष्म के हाथ में था। वे युद्ध को केवल विजय की दृष्टि से नहीं देखते थे। उनके लिए हस्तिनापुर की रक्षा, अपने राजधर्म का निर्वाह और युद्ध में अपनी मर्यादा भी महत्त्वपूर्ण थी। लेकिन अब सेनापति बदल चुका था। द्रोणाचार्य के सेनापति बनने के साथ युद्ध का चरित्र अधिक लक्ष्य-केंद्रित हो गया। अब प्रश्न केवल यह नहीं था कि पाण्डवों की सेना को कितना क्षति पहुँचाई जाए। प्रश्न था—  युधिष्ठिर को कैसे पकड़ा जाए? और यही परिवर्तन आगे के दिनों की युद्धनीति को समझने की कुंजी है। भीष्म के बाद द्रोण क्यों? भीष्म के पतन के बाद कौरवों के सामने स्वाभाविक प्रश्न था—सेनापति कौन हो? द्रोणाचार्य के पास युद्धकौशल, अस्त्रविद्या, विशाल युद्ध-अनुभव और दोनों पक्षों के प्रमुख योद्धाओं का गहरा ज्ञान था। वे अर्जुन के गुरु थे। वे कौरव राजकुमारों के भी गुरु थे। अर्थात् वे केवल युद्...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 42 : कृष्ण का हस्तक्षेप

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 42 : कृष्ण का हस्तक्षेप बिना शस्त्र उठाए कृष्ण ने युद्ध की दिशा कैसे बदली? भीष्म के पतन के बाद महाभारत के युद्ध को केवल सेनाओं और महारथियों के संघर्ष के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि कुरुक्षेत्र में एक ऐसा व्यक्ति भी है जिसने स्वयं शस्त्र न उठाने का संकल्प लिया है, फिर भी युद्ध की दिशा पर उसका प्रभाव लगातार दिखाई देता है। वह है—कृष्ण। कृष्ण की भूमिका को यदि केवल “भगवान ने पाण्डवों की सहायता की” कहकर समाप्त कर दिया जाए तो महाभारत के एक अत्यन्त सूक्ष्म पक्ष को हम खो देंगे। और यदि उन्हें केवल एक आधुनिक अर्थ में “रणनीतिक सलाहकार” मान लिया जाए तो भी उनके चरित्र का आधा ही अर्थ समझ में आएगा। कृष्ण की भूमिका तीन स्तरों पर चलती है— सारथी के रूप में प्रत्यक्ष उपस्थिति, सलाहकार के रूप में निर्णयों पर प्रभाव और साक्षी के रूप में पूरे संघर्ष की दिशा को समझने वाली चेतना। यही त्रिस्तरीय भूमिका इस प्रसंग को असाधारण बनाती है। पाठ : कृष्ण ने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा क्यों की? कृष्ण ने युद्ध में अपनी सेना और स्वयं के बीच चुनाव का अवसर दिया था। एक ओर उनकी विशाल ...

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 41 : छठे से दसवें दिन तक

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 41 : छठे से दसवें दिन तक व्यूहों का परिवर्तन, भीष्म का प्रचण्ड युद्ध और शरशय्या की ओर बढ़ता कुरुक्षेत्र पहले पाँच दिनों तक दोनों सेनाएँ एक-दूसरे की शक्ति को परख चुकी थीं। अब युद्ध केवल प्रारम्भिक संघर्ष नहीं रह गया था। भीष्म का अनुभव, पाण्डवों के महारथियों की क्षमता, कृष्ण की रणनीतिक दृष्टि और दोनों सेनाओं की विशालता—इन सबका वास्तविक परीक्षण हो रहा था। छठे से दसवें दिन तक की कथा इसलिए विशेष महत्त्व रखती है कि इसी अवधि में एक प्रश्न धीरे-धीरे निर्णायक बनता है— भीष्म को युद्धभूमि से हटाए बिना क्या पाण्डव सेना आगे बढ़ सकती है? छठा दिन : युद्ध की तीव्रता छठे दिन तक दोनों पक्षों को एक-दूसरे की युद्ध-क्षमता का पर्याप्त अनुभव हो चुका था। अब आक्रमण अधिक योजनाबद्ध होते हैं। भीष्म का लक्ष्य पाण्डव सेना की संरचना को तोड़ना है, जबकि पाण्डव पक्ष का उद्देश्य उनके आक्रमण को रोकते हुए अपनी सेना को सुरक्षित रखना है। महाभारत के युद्ध-वर्णन में इस समय रथ, गज, अश्व और पदाति—सभी के सम्मिलित संघर्ष दिखाई देते हैं। यहाँ व्यूह का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। यदि सेना केवल भीड़ ...