हरिवंशपुराण — भाग ५१ - प्रलय के बाद कमल की उत्पत्ति
हरिवंशपुराण — भाग ५१ - प्रलय के बाद कमल की उत्पत्ति : सृष्टि-संकल्प का आरम्भ पिछले प्रसंग में प्रलय के पश्चात् नारायण की सत्ता और महर्षि मार्कण्डेय के अद्भुत अनुभव का वर्णन आया था। अब कथा का केन्द्र बदलता है। प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि प्रलय में जगत् कहाँ स्थित होता है; प्रश्न यह है कि उस अव्यक्त अवस्था से सृष्टि की प्रक्रिया फिर किस प्रकार आरम्भ होती है। भविष्यपर्व के इस प्रसंग में सृष्टि का आरम्भ एक नए संकल्प, तप और महत्तत्त्वों की रचना से जुड़ता है। यहाँ प्रलय और सृष्टि दो बिल्कुल असम्बद्ध घटनाएँ नहीं हैं। एक ओर व्यक्त जगत् का लय होता है, दूसरी ओर सृजन की सम्भावना पुनः सक्रिय होती है। पुराण की दृष्टि में यह परिवर्तन केवल बाहरी पदार्थों का परिवर्तन नहीं, बल्कि उस व्यापक सत्ता की सृजनात्मक शक्ति का पुनः प्रवर्तन भी है। आपव वसिष्ठ और सृष्टि का तप वैशम्पायन के कथन के अनुसार, इस सृष्टि-वर्णन में भगवान् का सम्बन्ध आपव वसिष्ठ नाम से भी जोड़ा गया है। अनुवाद में यह प्रसंग कुछ जटिल रूप में आया है; इसलिए इसे सामान्य वसिष्ठ-चरित का प्रसंग मानकर नहीं पढ़ना चाहिए। यहाँ कथा का मुख्य प्रयो...