मैंने प्रेम को उत्तर से मुक्त कर दिया
एक बोर आदमी का रोजनामचा
Tuesday, 17 February 2026
मैंने प्रेम को उत्तर से मुक्त कर दिया
तुम, मैं और देह में ठहरती ऋतु
कल जब तुमसे मिलूँगा,
तो शायद
(तू) — कोष्ठक में रखा हुआ प्रेम
मैंने तुझे
रात के दरवेश और भटकी रूह
रात के दरवेश
काले चोग़े में नहीं,
सितारों की चादर ओढ़े आते हैं
धीमे,
बिना पाँवों की आहट के।
वे शहर की बुझी हुई गलियों में
ज़िक्र करते हैं ख़ामोशी का,
और चाँद को
एक जलता हुआ तस्बीह बना लेते हैं।
उसी वक़्त
एक भटकी रूह
अपने ही सवालों की धुंध में
रास्ता टटोलती है।
न घर पहचान में आता है,
न मंज़िल।
रूह पूछती है,
“क्या कोई नक़्शा है
जिस पर मेरा नाम लिखा हो?”
दरवेश मुस्कुराते हैं,
उनकी मुस्कान में
पुरानी इबादतों की रोशनी है।
वे कहते नहीं,
बस हाथ उठाकर
आसमान की तरफ़ इशारा करते हैं,
जहाँ हर तारा
एक अधूरी दुआ की तरह चमक रहा है।
रात के दरवेश
सिखाते हैं—
भटकन भी एक सफ़र है,
और सफ़र भी एक सजदा।
रूह को रास्ता नहीं,
यक़ीन चाहिए।
धीरे-धीरे
भटकी रूह
अपने ही सीने की धड़कन सुनती है,
वहीं एक किब्ला छुपा था,
वहीं एक रौशनी।
सुबह होने तक
दरवेश ओझल हो जाते हैं,
पर रूह
अब भटकी नहीं रहती
क्योंकि उसने जान लिया,
कि रात अँधेरा नहीं,
एक दरवेश है
जो हर खोई हुई रूह को
उसके भीतर की सुबह तक ले जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
ख़ामोशी के कंधे पर सिर रखे सपने
ख़ामोशी के कंधे पर
सिर रखे सपने
धीरे-धीरे साँस लेते हैं
जैसे रात की नब्ज़
चाँदनी में धड़क रही हो।
कोई शोर नहीं,
कोई दावा नहीं,
बस पलकों के भीतर
हल्की-सी रौशनी का कंपन।
ये सपने बोलते नहीं,
पर सुनते बहुत हैं—
दिल की दरारों में छुपी
अनकही बातों को,
थके हुए यक़ीन को,
और उम्मीद की अंतिम लौ को।
ख़ामोशी उन्हें सहलाती है,
जैसे माँ
बच्चे के माथे पर हाथ रखे—
बिना प्रश्न,
बिना शर्त।
कभी-कभी
इन सपनों की पलकों से
एक आह टपक जाती है,
और रात उसे
ओस बनाकर
सुबह की घास पर सजा देती है।
ख़ामोशी के कंधे पर
सिर रखे सपने
हकीकत से भागते नहीं,
बस थोड़ा ठहरते हैं
ताकि टूटने से पहले
खुद को समेट सकें।
और जब सुबह आती है,
वे उठते हैं
थोड़े नम,
थोड़े मजबूत,
और थोड़ा-सा यक़ीन लेकर
कि हर शोर के पार
एक ऐसी जगह है
जहाँ उन्हें
आराम मिल सकता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
शून्य की गोद में स्वर