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नदी का अकेलापन

 नदी का अकेलापन नदी हमेशा चलती हुई लगती है पर असल में वह सबसे अकेली होती है। वह हर चीज़ को छूती है पर किसी को रोक नहीं पाती। प्रेम भी इसी तरह का बहाव है। वह सबको महसूस करता है पर किसी को पकड़ नहीं पाता। और जो पकड़ लेता है वह बहाव नहीं रहता सिर्फ़ ठहराव बन जाता है। इसलिए प्रेम हमेशा चलते रहने में ही अपनी पूरी सच्चाई पाता है। — Mukesh

अधूरी वापसी

 अधूरी वापसी प्रेम से लौटना पूरी तरह लौटना नहीं होता। कुछ हिस्सा वहीं रह जाता है जहाँ पहली बार तुम चुप हुए थे। लोग समझते हैं तुम वापस आ गए। पर तुम जानते हो कि तुम सिर्फ़ शरीर लेकर लौटे हो बाक़ी तुम किसी और की प्रतीक्षा में अब भी खड़े हो। — Mukesh

दर्पण के पीछे

 दर्पण के पीछे हर प्रेम एक दर्पण नहीं होता कुछ दर्पण तुम्हें दिखाते नहीं तुम्हें खींच लेते हैं। तुम देख रहे होते हो और अचानक तुम्हारा प्रतिबिंब तुमसे पहले किसी और के पास पहुँच जाता है। फिर तुम अपनी ही छवि का पीछा करते हो जैसे कोई अपने ही कदमों की आवाज़ दूर होती सुनता रहे। — Mukesh

अनुपस्थिति का पानी

 अनुपस्थिति का पानी प्रेम वहाँ भी बहता है जहाँ कोई नदी नहीं होती। एक सूखी ज़मीन पर तुम्हें अचानक ठंडक महसूस होती है। वही अनुपस्थिति का पानी है। जिसे न छुआ जा सकता है न रोका जा सकता है। वह बस किसी के चले जाने के बाद रह जाता है और धीरे-धीरे पूरे अस्तित्व को सींच देता है। — Mukesh

उलटी दिशा

 उलटी दिशा प्रेम में दिशाएँ सीधी नहीं होतीं। जो उत्तर दिखता है वह भीतर से दक्षिण हो जाता है। जो पास लगता है वह पहले ही बहुत दूर जा चुका होता है। लोग कहते हैं— रास्ता चुनो। पर प्रेम रास्ते नहीं देता वह सिर्फ़ चलने की आदत दे देता है। और चलना कभी लौटना नहीं होता। — Mukesh

भगवद्गीता प्रथम अध्याय, पञ्चम श्लोक : एक शोधपूर्ण, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक एवं चेतनात्मक विवेचन

  भगवद्गीता प्रथम अध्याय , पञ्चम श्लोक : एक शोधपूर्ण , वैज्ञानिक , आध्यात्मिक एवं चेतनात्मक विवेचन मूल श्लोक धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥ १ . ५ ॥ अन्वय धृष्टकेतुः च , चेकितानः च , वीर्यवान् काशिराजः च , पुरुजित् च , कुन्तिभोजः च , नरपुङ्गवः शैब्यः च ( अत्र सन्ति ) । सामान्य हिन्दी अर्थ इस सेना में धृष्टकेतु , चेकितान , पराक्रमी काशिराज , पुरुजित , कुन्तिभोज तथा पुरुषों में श्रेष्ठ शैब्य भी उपस्थित हैं। पिछले श्लोक में दुर्योधन ने कुछ प्रमुख महारथियों का उल्लेख किया था। अब वह उन योद्धाओं का वर्णन कर रहा है जो प्रथम दृष्टि में गौण प्रतीत होते हैं। किन्तु महाभारत और गीता का एक गहरा सिद्धान्त है — धर्म की विजय केवल महान नायकों से नहीं होती , बल्कि अनेक छोटे - छोटे गुणों के संयुक्त योगदान से होती है। यदि भीम और अर्जुन धर्मरूपी भवन के स्तम्भ हैं , तो धृष्टकेतु , चेकितान , काशिराज , पुरुजित , कुन्तिभोज और शैब्य ...

भगवद्गीता प्रथम अध्याय, चतुर्थ श्लोक : एक शोधपूर्ण, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विवेचन

  भगवद्गीता प्रथम अध्याय , चतुर्थ श्लोक : एक शोधपूर्ण , वैज्ञानिक , आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विवेचन मूल श्लोक अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।  युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥ १ . ४ ॥ अन्वय अत्र युधि भीमार्जुनसमाः महेष्वासाः शूराः युयुधानः विराटः च द्रुपदः च महारथः सन्ति। सामान्य हिन्दी अर्थ इस सेना में युद्ध में भीम और अर्जुन के समान पराक्रमी , महान धनुर्धर शूरवीर — सात्यकि ( युयुधान ), विराट तथा महारथी द्रुपद उपस्थित हैं। प्रथम दृष्टि में यह श्लोक केवल योद्धाओं की सूची जैसा प्रतीत होता है। किन्तु यदि व्यास की शैली को समझा जाए , तो यहाँ केवल व्यक्तियों का परिचय नहीं दिया जा रहा , बल्कि उन मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का परिचय कराया जा रहा है जो धर्म के पक्ष में खड़ी हैं। गीता का यह श्लोक हमें एक अत्यन्त गहन सत्य सिखाता है — धर्म कभी अकेला नहीं लड़ता ; उसके पीछे अनेक आन्तरिक शक्तियाँ खड़ी होती हैं। दुर्योधन पाण्डव सेना को देख र...