चिंतन — अध्याय–19 : मृत्यु क्या है? — भाग–10 : मृत्यु और अस्तित्ववाद
चिंतन — अध्याय–19 : मृत्यु क्या है? — भाग–10 : मृत्यु और अस्तित्ववाद मृत्यु का भय मनोविज्ञान का विषय हो सकता है। लेकिन मृत्यु का प्रश्न केवल भय का प्रश्न नहीं है। कभी-कभी मनुष्य मृत्यु के बारे में सोचते हुए अचानक अपने पूरे जीवन को अलग दृष्टि से देखने लगता है। जो कल अत्यन्त महत्वपूर्ण था, वह छोटा लगने लगता है। जो वर्षों से टाला जा रहा था, वह अचानक आवश्यक हो जाता है। और कभी— जीवन का कोई निश्चित अर्थ ही दिखाई नहीं देता। यहीं से मृत्यु अस्तित्ववाद के केन्द्र में प्रवेश करती है। मनुष्य—अपनी मृत्यु की ओर बढ़ता हुआ अस्तित्व हाइडेगर ने मनुष्य को केवल जीवित प्राणी के रूप में नहीं देखा। उसके लिए मनुष्य ऐसा अस्तित्व है, जो अपने होने के प्रश्न से परिचित हो सकता है। मनुष्य यह जानता है कि वह है। और वह यह भी जानता है कि उसका होना अनन्त नहीं है। हाइडेगर के चिन्तन में मृत्यु मनुष्य के अस्तित्व से बाहर की कोई घटना नहीं। मृत्यु मनुष्य की सम्भावना के भीतर ही उपस्थित है। मनुष्य अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में उस सीमा की ओर बढ़ रहा है, जहाँ उसकी सम्भावनाएँ समाप्त हो जाती हैं। इसीलिए मृत...