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भगवद्गीता प्रथम अध्याय, चतुर्दश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन

 भगवद्गीता प्रथम अध्याय, त्रयोदश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन मूल श्लोक -ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १.१३ ॥ अन्वय -ततः शङ्खाः च भेर्यः च पणव-आनक-गोमुखाः च सहसा एव अभ्यहन्यन्त, सः शब्दः तुमुलः अभवत्। सामान्य हिन्दी अर्थ इसके बाद शंख, भेरी, नगाड़े, ढोल और रणभेरियाँ एक साथ बज उठीं और उनका वह शब्द अत्यन्त भयंकर एवं कोलाहलपूर्ण हो गया। क्या यह केवल युद्ध का शोर है? पहली दृष्टि में यह श्लोक केवल युद्धभूमि के वाद्ययंत्रों का वर्णन प्रतीत होता है।,शंख बजे,नगाड़े बजे,भेरियाँ बजीं,गोमुख बजे।, और एक विशाल कोलाहल उत्पन्न हुआ। किन्तु व्यास यदि केवल शोर का वर्णन करना चाहते, तो एक वाक्य पर्याप्त था। फिर इतने वाद्यों का अलग-अलग उल्लेख क्यों? क्योंकि यहाँ केवल ध्वनि नहीं है। यह मानव-चेतना के भीतर उठने वाले मानसिक कोलाहल का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक चित्रण है। 1. "ततः" — एक ध्वनि दूसरी ध्वनि को जन्म देती है श्लोक आरम्भ होता है—  ततः  "उसके बाद" यह छोटा-सा शब्द बहुत बड़ा रहस्य छिपाए हुए है। भीष्म का शंख बजा। ...

तुम्हारी हँसी

  तुम्हारी हँसी तुम्हारी हँसी... जाने उसमें ऐसा क्या है, कि जब भी सुनता हूँ, दिन की सारी थकान बिना कुछ कहे उतर जाती है। तुम हँसती हो, तो लगता है जैसे किसी बंद कमरे की खिड़की अचानक खुल गई हो, और ताज़ा हवा अपने साथ थोड़ी-सी धूप भी ले आई हो। मैंने बहुत-सी आवाज़ें सुनी हैं— बारिश की, नदी की, पत्तों की सरसराहट की, मस्जिद की अज़ान की, मंदिर की घंटियों की... मगर तुम्हारी हँसी में इन सबका थोड़ा-थोड़ा हिस्सा बसा है। वह शोर नहीं करती, बस दिल में उतर जाती है। तुम्हें शायद ख़बर भी नहीं होगी कि जब तुम हँसती हो, तो तुम्हारी आँखें तुम्हारे होंठों से पहले मुस्कुराती हैं। और मैं... हर बार उन्हीं आँखों में ठहर जाता हूँ। अजीब बात है, इंसान किसी के चेहरे से नहीं, उसकी हँसी से मोहब्बत करने लगता है। क्योंकि चेहरा वक़्त के साथ बदल जाता है, लेकिन हँसी... अगर दिल से निकले, तो उम्र भर वैसी ही रहती है। कभी-कभी सोचता हूँ, अगर किसी दिन तुम अपनी हँसी भूल जाओ, तो मैं उसे अपनी यादों से निकालकर फिर तुम्हें लौटा दूँगा। क्योंकि कुछ चीज़ों पर सिर्फ़ उनका हक़ नहीं होता, जो उन्...

तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो... (दूसरा पड़ाव)

 तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो... (दूसरा पड़ाव) तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो, तो तुम्हारी आँखों में एक अजीब-सी शरारत उतर आती है। होंठ शिकायत करते हैं, मगर निगाहें मेरी तरफ़ ही ठहरी रहती हैं। जैसे उन्हें पूरा यक़ीन हो कि मैं तुम्हें मनाने ज़रूर आऊँगा। तुम्हारी नाराज़गी में भी एक नाज़ है... एक अदा है... और एक ख़ामोश-सी दावत, कि मैं तुम्हारे क़रीब आकर तुम्हारी ख़ामोशी का मतलब पढ़ूँ। तुम जानती हो, तुम्हारा "बात मत कीजिए मुझसे" दुनिया का सबसे झूठा जुमला है। क्योंकि उसके अगले ही पल तुम चुपके से देखती हो कि मैंने सचमुच बात करना छोड़ तो नहीं दिया। और मैं... मैं भी कहाँ इतना समझदार हूँ। हर बार तुम्हारी उसी बनावटी नाराज़गी में अपनी मुहब्बत का नया बहाना ढूँढ़ लेता हूँ। कभी तुम्हारा हाथ थामकर, कभी तुम्हारी ज़ुल्फ़ों को कानों के पीछे सरकाकर, कभी सिर्फ़ तुम्हारा नाम लेकर। अजीब है न... मुहब्बत में सबसे मीठे लम्हे इज़हार के नहीं, मनुहार के होते हैं। जहाँ कोई सचमुच रूठा नहीं होता, मगर दोनों चाहते हैं कि मनाने का सिलसिला थोड़ा और लंबा हो जाए। इसलिए... तुम्हार...
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  तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो... तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो, तो मुझे तुम्हारी आँखों से ज़्यादा तुम्हारी ख़ामोशी पर यक़ीन आता है। वह ख़ामोशी, जो हर शिकायत से पहले मुस्कुरा देती है। तुम्हारे होंठ रूठने की कोशिश करते हैं, मगर तुम्हारी नज़रें हर बार तुम्हारा साथ छोड़ देती हैं। वे चुपके से बता देती हैं कि नाराज़गी सिर्फ़ एक बहाना है, असल बात तो यह है कि तुम चाहती हो मैं तुम्हें थोड़ा और मनाऊँ। मैं जानता हूँ... तुम्हारे "जाइए, मुझे आपसे बात नहीं करनी..." में भी एक मासूम-सी इल्तिज़ा छिपी होती है— "ज़रा-सा और ठहरो..." तुम्हारा रूठना भी कितना अजीब है। उसमें ग़ुस्से से ज़्यादा मुहब्बत होती है, शिकायत से ज़्यादा अपनापन, और अल्फ़ाज़ से ज़्यादा इंतज़ार। मैं अक्सर सोचता हूँ, अगर तुम सचमुच कभी नाराज़ हो गईं, तो शायद इतनी ख़ामोश नहीं रहोगी। क्योंकि जो लोग दिल से दूर हो जाते हैं, वे शिकायत भी नहीं करते। वे बस चले जाते हैं। इसलिए तुम्हारा यूँ बेवजह रूठ जाना, मेरे लिए इस बात का सबसे ख़ूबसूरत सबूत है कि मेरे हिस्से की जगह अब भी तुम्हारे दिल में कहीं महफ़...

शब्दयात्री — जो नहीं हुआ

  शब्दयात्री — जो नहीं हुआ ज़िंदगी में कुछ दास्तानें ऐसी भी होती हैं जो कभी लिखी नहीं जातीं, लेकिन उम्र भर पढ़ी जाती रहती हैं। वे किसी किताब के सफ़्हों पर नहीं मिलतीं, न किसी तस्वीर में क़ैद होती हैं। उनका वजूद बस दिल के किसी ख़ामोश कोने में होता है, जहाँ वक़्त की धूल भी पहुँचकर उन्हें मिटा नहीं पाती। मेरे पास भी ऐसी ही एक दास्तान है। एक दास्तान जो कभी हुई नहीं। या यूँ कहूँ कि जो पूरी नहीं हुई। कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारी ज़िंदगी में कुछ लोग मिलने के लिए नहीं आते, सिर्फ़ याद बन जाने के लिए आते हैं। वे आते हैं, कुछ लम्हों के लिए हमारी रूह में ठहरते हैं, और फिर किसी अनजाने मौसम की तरह गुज़र जाते हैं। लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी आहट बरसों तक दिल के दरवाज़ों पर सुनाई देती रहती है। अजीब बात है— जो रिश्ते मुकम्मल हो जाते हैं, वे धीरे-धीरे ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। मगर जो मुकम्मल नहीं हो पाते, वे अफ़साना बन जाते हैं। मुझे याद नहीं कि वह आख़िरी मुलाक़ात थी या पहली जुदाई। बस इतना याद है कि उसकी आँखों में कुछ अनकहे अल्फ़ाज़ ठहरे हुए थे और मेरे होंठों पर कुछ अधूरे जुमले। हम दोनों ने...

भगवद्गीता प्रथम अध्याय, द्वादश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन

भगवद्गीता प्रथम अध्याय, द्वादश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन मूल श्लोक - तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १.१२ ॥ अन्वय - तस्य हर्षं सञ्जनयन् कुरुवृद्धः प्रतापवान् पितामहः भीष्मः उच्चैः सिंहनादं विनद्य शङ्खं दध्मौ। सामान्य हिन्दी अर्थ तब कुरुवंश के वृद्ध, प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हर्ष को बढ़ाते हुए सिंह के समान गर्जना करके ऊँचे स्वर से अपना शंख बजाया। महाभारत का पहला शंख किसने बजाया? सामान्यतः लोगों को लगता है कि गीता का प्रारम्भ श्रीकृष्ण के पंचजन्य शंख से हुआ होगा। किन्तु आश्चर्य की बात है कि गीता में सबसे पहला शंख श्रीकृष्ण नहीं, भीष्म बजाते हैं। यह कोई संयोग नहीं है। व्यास मानव-चेतना का एक गहरा नियम बता रहे हैं—  युद्ध का आरम्भ शस्त्रों से नहीं, ध्वनि से होता है। हर संघर्ष पहले विचार में जन्म लेता है। फिर शब्द बनता है। फिर कर्म बनता है। भीष्म का शंख उसी प्रथम कम्पन (First Vibration) का प्रतीक है। 1. "तस्य सञ्जनयन् हर्षम्" — भीष्म किसका उत्साह बढ़ा रहे हैं? यहाँ "तस्य" शब...

शब्दयात्री — जो नहीं हुआ -02

  शब्दयात्री — जो नहीं हुआ ज़िंदगी में कुछ दास्तानें ऐसी भी होती हैं जो कभी लिखी नहीं जातीं, लेकिन उम्र भर पढ़ी जाती रहती हैं। वे किसी किताब के सफ़्हों पर नहीं मिलतीं, न किसी तस्वीर में क़ैद होती हैं। उनका वजूद बस दिल के किसी ख़ामोश कोने में होता है, जहाँ वक़्त की धूल भी पहुँचकर उन्हें मिटा नहीं पाती। मेरे पास भी ऐसी ही एक दास्तान है। एक दास्तान जो कभी हुई नहीं। या यूँ कहूँ कि जो पूरी नहीं हुई। कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारी ज़िंदगी में कुछ लोग मिलने के लिए नहीं आते, सिर्फ़ याद बन जाने के लिए आते हैं। वे आते हैं, कुछ लम्हों के लिए हमारी रूह में ठहरते हैं, और फिर किसी अनजाने मौसम की तरह गुज़र जाते हैं। लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी आहट बरसों तक दिल के दरवाज़ों पर सुनाई देती रहती है। अजीब बात है— जो रिश्ते मुकम्मल हो जाते हैं, वे धीरे-धीरे ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। मगर जो मुकम्मल नहीं हो पाते, वे अफ़साना बन जाते हैं। मुझे याद नहीं कि वह आख़िरी मुलाक़ात थी या पहली जुदाई। बस इतना याद है कि उसकी आँखों में कुछ अनकहे अल्फ़ाज़ ठहरे हुए थे और मेरे होंठों पर कुछ अधूरे जुमले। हम दोनों ने...