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Thursday, 28 May 2026

ज़िंदगी ने काफ़ी अरसे से आवाज़ करना छोड़ दिया है।

 दोपहरें

अब मेरे कमरे में ऐसे उतरती हैं

जैसे किसी पुराने ख़त से

पीला पड़ चुका इत्र झर रहा हो।


हवा में धूप नहीं होती,

बस एक धीमी-सी गरम गंध होती है 

पुरानी लकड़ी, बंद दराज़ों

और बहुत दिनों से न खोले गए सपनों की।


मैं कभी-कभी

अपनी उँगलियों को देर तक देखता हूँ।

अजीब लगता है —

इन्हीं हाथों ने

कितने लोगों को छुआ होगा,

कितनी चीज़ों को आख़िरी बार पकड़ा होगा

बिना जाने।


अब रिश्ते भी

मोबाइल में बचे पुराने नंबरों जैसे लगते हैं।

डिलीट नहीं करते,

मगर कभी मिलाते भी नहीं।


रात में

फ़्रिज की हल्की-सी आवाज़

पूरे घर में घूमती रहती है,

जैसे कोई अदृश्य नदी

अँधेरे के नीचे बह रही हो।


और मैं सोचता हूँ —

हर घर के भीतर

एक ऐसी आवाज़ होती है

जो उसके अकेलेपन को ज़िंदा रखती है।


कभी-कभी

मैं जानबूझकर कोई चीज़ गिरा देता हूँ 

चम्मच, किताब, या खाली गिलास।


सिर्फ़ यह सुनने के लिए

कि इस कमरे में

अब भी कुछ टूट सकता है।


वरना तो

ज़िंदगी ने

काफ़ी अरसे से

आवाज़ करना छोड़ दिया है।


मुकेश ,,,,,,,,,

रात अब मेरे कमरे में दरवाज़े से नहीं आती,

 रात अब

मेरे कमरे में दरवाज़े से नहीं आती,

वह धीरे-धीरे

किताबों के बीच उगती है।


पहले मेज़ पर रखे गिलास में उतरती है,

फिर परदों पर फैल जाती है

जैसे किसी बूढ़े चित्रकार ने

काले रंग में थोड़ा-सा धुआँ मिला दिया हो।


मैं देर तक

दीवार पर चलती पंखे की परछाइयाँ देखता रहता हूँ।

वे हर रात

एक जैसी लगती हैं,

फिर भी कभी वैसी नहीं होतीं।


अब उदासी भी

सीधे दिल में नहीं उतरती।

वह पहले

जूते के पास पड़ी धूल बनती है,

फिर धीरे-धीरे

आवाज़ में आकर बस जाती है।


कभी कोई पुरानी याद

अचानक नहीं आती 

वह खिड़की की सलाखों पर

बारिश की पहली बूंद की तरह ठहरती है,

और फिर पूरी रात

टपकती रहती है भीतर।


मैंने कई दिनों से

घड़ी की टिक-टिक को गौर से सुना है।

उसमें वक़्त कम,

किसी अदृश्य दर्ज़ी की कैंची ज़्यादा सुनाई देती है 

जो हर सेकंड

ज़िंदगी से थोड़ा-थोड़ा कपड़ा काटती रहती है।


और हम सब,

अपनी-अपनी देह पहने,

धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं।


कभी सुबह

अलमारी खोलते हुए लगता है

कपड़ों में नहीं,

पुराने मौसमों में हाथ डाल रहा हूँ।


एक कमीज़ से

किसी भूली हुई सड़क की धूप गिरती है,

दूसरी से

किसी के बालों में लगी बारिश की गंध।


शायद इंसान

यादों से नहीं बना होता,

बल्कि उन चीज़ों से बना होता है

जिन्हें वह फेंक नहीं पाता।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

कभी-कभी लगता है मैं अपनी ज़िंदगी नहीं जी रहा,

 कभी-कभी लगता है

मैं अपनी ज़िंदगी नहीं जी रहा,

बस उसे होते हुए देख रहा हूँ।


जैसे किसी पुराने सिनेमाघर में

धुँधली-सी फ़िल्म चल रही हो,

और मैं आख़िरी सीट पर बैठा

बिना किसी दिलचस्पी के

उसे अंत तक देखता रहूँ।


अब न किरदारों से लगाव होता है,

न कहानी से शिकायत।


जो चला गया,

वह भी ठीक।

जो बचा हुआ है,

वह भी ठीक।


मैंने अब

“क्यों” पूछना छोड़ दिया है।


कुछ चीज़ें

बिना वजह टूटती हैं,

बिना वजह मिलती हैं,

और बिना वजह

सारी उम्र साथ चलती रहती हैं।


अजीब है 

पहले मैं ख़ुद को ढूँढता था,

अब ख़ुद से बचकर निकल जाता हूँ।


आईने में चेहरा

पहचान में तो आता है,

मगर अपना नहीं लगता।


जैसे कोई पुराना शहर

जहाँ कभी रहा था आदमी,

मगर अब लौटे

तो रास्ते भी अजनबी लगें।


फिर भी

सब कुछ बुरा नहीं है।


चाँद अब भी निकलता है,

पेड़ों पर हवा अब भी उतरती है,

और देर रात

किसी दूर जाती ट्रेन की आवाज़

अब भी दिल को

थोड़ी देर के लिए रोक देती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

अब मैं रास्तों से उनकी मंज़िल नहीं पूछता।

 अब मैं रास्तों से

उनकी मंज़िल नहीं पूछता।


कुछ रास्ते

सिर्फ़ इस लिए सुंदर होते हैं

कि वे कहीं नहीं पहुँचते।


जैसे शाम का धुँधलका 

न पूरा दिन,

न पूरी रात।


बस दोनों के बीच

ठहरा हुआ एक मुलायम रंग।


मैंने अब लोगों को भी

समझना छोड़ दिया है।

हर आदमी के भीतर

एक बंद कमरा होता है

जहाँ वह ख़ुद भी

बहुत कम जाता है।


कभी-कभी

पूरी रात नींद नहीं आती,

मगर कोई बेचैनी भी नहीं होती।


मैं अँधेरे में लेटा

छत को देखता रहता हूँ,

जैसे कोई पुराना मुसाफ़िर

रेलवे स्टेशन पर

बिना ट्रेन का इंतज़ार किए बैठा हो।


अब यादें भी

पहले जैसी नहीं रहीं।

वे चुभती नहीं,

बस धीरे-धीरे

आकर पास बैठ जाती हैं।


और फिर

कुछ देर बाद

बिना आवाज़ किए चली जाती हैं।


शायद उम्र

इंसान को समझदार नहीं बनाती,

बस उसकी तकलीफ़ों की आवाज़ धीमी कर देती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

जब मैं हर चीज़ को नाम देना चाहता था

 एक वक़्त था

जब मैं हर चीज़ को नाम देना चाहता था 

मोहब्बत, दूरी, इंतज़ार, तन्हाई।


अब लगता है

नाम रख देने से

चीज़ें छोटी हो जाती हैं।


इसलिए अब

जो महसूस होता है,

उसे बस महसूस होने देता हूँ।


कभी पूरा दिन

एक बंद किताब की तरह पड़ा रहता है।

मैं उसके पास बैठा रहता हूँ,

मगर कोई सफ़ा नहीं खोलता।


अजीब बात है 

अब ख़ालीपन भी

ख़ाली नहीं लगता।


उसमें

पुरानी आवाज़ों की धूल है,

कुछ अधूरे ख़्वाबों की गंध,

और बहुत-सी बीती हुई शामें।


मैंने सीखा है

कि हर दर्द रोता नहीं,

और हर सुकून मुस्कुराता भी नहीं।


कुछ एहसास

बस कमरे में रखी उस कुर्सी की तरह होते हैं

जिस पर वर्षों से

कोई बैठा नहीं,

फिर भी वह

अपनी जगह से हटती नहीं।


अब जीवन से

कोई बहस नहीं होती।


वह जैसा है,

वैसा ही सामने बैठा रहता है 

और मैं

उसकी आँखों में देखे बिना

उसके साथ चाय पी लेता हूँ।


मुकेश ,,,,,

अब भीतर कोई तूफ़ान नहीं उठता।

 अब भीतर

कोई तूफ़ान नहीं उठता।


समंदर जैसे

अपनी सारी बेचैन लहरें

किसी बहुत दूर रात में छोड़ आया हो।


दिन गुज़र जाते हैं

बिना किसी निशान के।

मैं उन्हें गिनता भी नहीं।


कभी बालकनी में खड़े होकर

लोगों को लौटते देखता हूँ —

थके हुए, जल्दी में,

अपनी-अपनी ज़रूरतों के साथ।


और मुझे लगता है,

हर आदमी

किसी अदृश्य चीज़ का पीछा कर रहा है।


मैंने शायद

बहुत पहले रुककर

उस पीछा करने की आदत छोड़ दी थी।


अब अगर कोई पूछे

क्या चाहिए 

तो जवाब सोचने में भी वक़्त लगता है।


क्योंकि चाहतें

धीरे-धीरे शरीर से ऐसे उतर जाती हैं

जैसे बारिश के बाद

दीवारों से नमी उतरती है।


न कोई बड़ी तकलीफ़ है,

न कोई ख़ास राहत।


बस एक साधारण-सा दिन है

जो हर रोज़

थोड़ा-थोड़ा दोहराया जाता है।


और मैं

उस दोहराव में भी

कोई अर्थ ढूँढने की कोशिश नहीं करता।


शायद यही वजह है

कि अब थकान भी

सुकून जैसी लगने लगी है।


मुकेश ,,,,,,,,

दिल ने किसी चीज़ का नाम लेना छोड़ दिया है

 कई दिनों से

दिल ने किसी चीज़ का नाम लेना छोड़ दिया है।


न इंतज़ार,

न शिकायत,

न किसी आने वाले कल की फ़िक्र।


सुबह जब खिड़की खुलती है,

तो धूप कमरे में वैसे ही चली आती है

जैसे उसे मालूम हो

यहाँ अब कोई सवाल नहीं पूछे जाते।


मैं देर तक

कप में ठंडी होती चाय देखता रहता हूँ,

और बाहर पेड़ों पर बैठी हवा को।


अब चीज़ें

अच्छी या बुरी नहीं लगतीं 

बस होती हैं।


बारिश हो

तो उसकी आवाज़ सुन लेता हूँ,

धूप हो

तो थोड़ा-सा उजाला कमरे में रहने देता हूँ।


लोग मिलते हैं,

अपनी बातों, अपने दुखों, अपनी खुशियों के साथ।

मैं उन्हें ध्यान से सुनता हूँ,

जैसे कोई

दूर बहती नदी की आवाज़ सुनता है।


मगर भीतर

कोई लहर नहीं उठती।


शायद यह उदासी भी नहीं,

और सुकून भी नहीं।


बस एक जगह है

जहाँ एहसास

बहुत धीमी चाल से चलते हैं।


जहाँ कुछ भी टूटता नहीं,

और कुछ भी बनता भी नहीं।


कभी-कभी सोचता हूँ

इंसान का आख़िरी ठिकाना

शायद यही होता होगा 


एक ऐसी ख़ामोशी,

जहाँ दिल

धड़कता तो है,

मगर किसी के लिए नहीं।


मुकेश ,,,,,,