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Thursday, 16 April 2026

आत्माश्रित जगत् और मातरिश्वा का क्रियात्मक विधान — ब्रह्माधिष्ठान की अद्वैत दृष्टि

 आत्माश्रित जगत् और मातरिश्वा का क्रियात्मक विधान — ब्रह्माधिष्ठान की अद्वैत दृष्टि

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

तस्मिन् आत्मतत्त्वे सति नित्यचैतन्यस्वभावे,

मातरिश्वा—मातरि अन्तरिक्षे धावति गच्छति इति—वायुः, सर्वप्राणभृत् क्रियात्मकः,

यदाश्रयाणि काय-करण-जातानि, यस्मिन् ओतानि प्रोतानि च।

यत् सूत्रसंज्ञकं सर्वस्य जगतः विधारयितृ, स मातरिश्वा अपः कर्माणि प्राणिनां चेष्टालक्षणानि,

अग्नि-आदित्य-पर्जन्यादीनां ज्वलन-दहन-प्रकाश-अभिवर्षणादि-लक्षणानि विभजति इत्यर्थः।

धारयति वा।


उस नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मा में स्थित होकर, “मातरिश्वा” (वायु) — जो अंतरिक्ष में गति करता है और सभी प्राणियों को धारण करने वाली क्रियाशक्ति है —

सभी शरीर और इन्द्रियाँ उसी पर आश्रित हैं और उसी में गुंथे हुए हैं।

वह (वायु) “सूत्र” (धागे) के समान सम्पूर्ण जगत को धारण करता है।

वही प्राणियों की सभी क्रियाओं तथा अग्नि, सूर्य, वर्षा आदि की ज्वलन, प्रकाश और वर्षण जैसी शक्तियों का संचालन करता है।

अर्थात् वह सबको धारण और व्यवस्थित करता है।

यह भाष्यांश अद्वैत वेदान्त में ब्रह्माधिष्ठान (ब्रह्म के आधारत्व) तथा जगत् के क्रियात्मक संचालन के गूढ़ संबंध को स्पष्ट करता है। यहाँ शंकराचार्य यह दिखाते हैं कि सम्पूर्ण जगत् की विविध क्रियाएँ, यद्यपि विविध रूप में दिखाई देती हैं, किन्तु उनका मूलाधार एक ही नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मा है।

प्रथम वाक्य—“तस्मिन् आत्मतत्त्वे सति नित्यचैतन्यस्वभावे”—यह स्पष्ट करता है कि आत्मा नित्य, शुद्ध और चैतन्यमय है। वह किसी भी प्रकार की क्रिया या परिवर्तन से रहित है, परंतु उसी के अधिष्ठान में समस्त क्रियाएँ घटित होती हैं। यह अद्वैत का मूल सिद्धांत है—ब्रह्म स्वयं अकर्ता होते हुए भी समस्त क्रियाओं का आधार है।

अब “मातरिश्वा” शब्द की व्याख्या की गई है। “मातरि अन्तरिक्षे श्वयति (गच्छति)”—जो अंतरिक्ष में गति करता है, वह वायु है। परंतु यहाँ वायु केवल भौतिक तत्व नहीं, बल्कि सर्वप्राणभृत् क्रियाशक्ति का प्रतीक है। यह वह शक्ति है जो सभी प्राणियों में प्राणरूप से कार्य करती है।

“यदाश्रयाणि काय-करण-जातानि”—सभी शरीर (काय) और इन्द्रियाँ (करण) उसी पर आश्रित हैं।

“यस्मिन् ओतानि प्रोतानि च”—वे उसी में गुंथे हुए हैं, जैसे मणियाँ धागे में पिरोई जाती हैं। यह अत्यंत सुंदर दृष्टांत है, जो यह दर्शाता है कि समस्त जगत् एक अदृश्य सत्ता (सूत्र) पर आधारित है।

यहाँ “सूत्रसंज्ञक” शब्द विशेष महत्वपूर्ण है। यह “सूत्रात्मा” या “हिरण्यगर्भ” की ओर संकेत करता है—जो समस्त जगत् को एक सूत्र में बाँधकर धारण करता है। यह सृष्टि के व्यवहारिक स्तर (व्यवहारिक सत्य) पर कार्य करता है।

अब शंकराचार्य बताते हैं कि यह मातरिश्वा (वायु या प्राणशक्ति) विभिन्न प्रकार की क्रियाओं का विभाजन करता है—

प्राणियों की चेष्टाएँ (चलना, बोलना, सोचना आदि)

अग्नि का दहन

सूर्य का प्रकाश

पर्जन्य (वर्षा) का वर्षण

यह सब विविध क्रियाएँ उसी एक शक्ति के विभिन्न रूप हैं।

परंतु यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु है—

यद्यपि यह सब क्रियाएँ मातरिश्वा के माध्यम से होती हैं, परंतु उनका अंतिम आधार आत्मा (ब्रह्म) ही है, जो स्वयं निरुपाधिक और अविक्रिय है।

इस प्रकार, शंकराचार्य दो स्तरों को स्पष्ट करते हैं—

निरुपाधिक ब्रह्म — जो नित्य, अचल और अकर्ता है।

उपाधियुक्त ब्रह्म (मातरिश्वा/प्राण) — जो सृष्टि की विविध क्रियाओं का संचालन करता है।

एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है

जैसे बिजली स्वयं निराकार और निष्क्रिय होती है, परंतु विभिन्न उपकरणों (पंखा, बल्ब, हीटर) के माध्यम से विभिन्न कार्य करती हुई प्रतीत होती है, वैसे ही आत्मा स्वयं अकर्ता होते हुए भी प्राणशक्ति (मातरिश्वा) के माध्यम से विविध क्रियाओं का आधार बनती है।

इस भाष्यांश में यह प्रतिपादित किया गया है कि नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मा के अधिष्ठान में मातरिश्वा (प्राणशक्ति) समस्त जगत् की क्रियाओं का संचालन करती है। शरीर, इन्द्रियाँ और प्राकृतिक शक्तियाँ उसी पर आश्रित हैं। फिर भी आत्मा स्वयं अविक्रिय और निरुपाधिक रहती है। इस प्रकार, अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म ही समस्त जगत् का आधार है, जबकि क्रियाएँ केवल उपाधि के स्तर पर घटित होती हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

अविक्रिय ब्रह्म में क्रियाभास — अविद्या की दृष्टि से गतिशीलता का मिथ्यात्व

 अविक्रिय ब्रह्म में क्रियाभास — अविद्या की दृष्टि से गतिशीलता का मिथ्यात्व

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

क्रिया अज्ञानवती इव अविवेकिनां मूढानाम् अनेकम् इव च प्रतिभासते इति एतत् आह।

तत् धावतः द्रुतं गच्छतः अन्यान् आत्मविलक्षणान् मनो-वाक्-इन्द्रिय-प्रभृतिन् अतीत्य गच्छति इव।

अथ स्वयम् एव वदति—तिष्ठत् इति।

स्वयम् अविक्रियम् एव सत् इत्यर्थः।


अज्ञानयुक्त, अविवेकी और मूर्ख लोगों को ब्रह्म में क्रिया (गति) और अनेकता का आभास होता है।

वास्तव में वह (ब्रह्म) मन, वाणी और इन्द्रियों आदि से भी अधिक तीव्र होकर उन्हें पार करता हुआ प्रतीत होता है।

परंतु वास्तव में वह स्वयं स्थिर ही है—“तिष्ठत्”।

अर्थात् वह स्वयं सदा अविकार और अचल है।


यह भाष्यांश अद्वैत वेदान्त के एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत को स्पष्ट करता है—ब्रह्म में जो क्रिया (गति) और अनेकता दिखाई देती है, वह वास्तविक नहीं, बल्कि अज्ञानजन्य आभास है।

शंकराचार्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म स्वभावतः अविक्रिय (निष्क्रिय) और एकमेव है। उसमें न कोई गति है, न कोई परिवर्तन, न ही कोई भेद। फिर भी संसार में हम विविधता, क्रिया और परिवर्तन का अनुभव करते हैं। यह विरोधाभास कैसे समझा जाए?

इसका उत्तर है—अविद्या (अज्ञान)।

“अविवेकिनां मूढानाम्”—जो लोग विवेक (सत्य और असत्य का भेद) नहीं कर पाते, वे ब्रह्म में भी संसार के गुण आरोपित कर देते हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रह्म चलता है, कार्य करता है, और अनेक रूपों में विभक्त है। परंतु यह केवल प्रतिभास (appearance) है, न कि वास्तविकता।

जब कहा जाता है—“तद् धावतो द्रुतं गच्छतः अन्यान् अतीत्य”—तो इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म वास्तव में दौड़ रहा है या कहीं जा रहा है। इसका अभिप्राय यह है कि मन, वाणी और इन्द्रियाँ—जो स्वयं अत्यंत तीव्र मानी जाती हैं—वे भी ब्रह्म को नहीं पकड़ सकतीं। ऐसा प्रतीत होता है मानो ब्रह्म उनसे आगे निकल गया हो।

यहाँ “इव” (मानो) शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि यह केवल उपचारात्मक कथन है, वास्तविक गति का संकेत नहीं। ब्रह्म कहीं नहीं जाता—वह तो पहले से ही सर्वत्र विद्यमान है।

फिर शंकराचार्य स्वयं ही इस भ्रम को दूर करते हैं—

“तिष्ठत् इति”—वह स्थिर है।

यहाँ “तिष्ठत्” का अर्थ है—नित्य, अचल, अविकार।

अतः जो पहले “गति” का वर्णन किया गया, वह केवल उपाधि-जन्य आभास है। वास्तव में ब्रह्म अपने निरुपाधिक स्वरूप में सदा एकरस, अचल और अविक्रिय है।

एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—

नदी के किनारे खड़े होकर यदि कोई व्यक्ति पानी में चंद्रमा का प्रतिबिंब देखे, तो उसे लगेगा कि चंद्रमा हिल रहा है। परंतु वास्तव में चंद्रमा स्थिर है; जल की गति के कारण यह भ्रम उत्पन्न होता है।

इसी प्रकार, ब्रह्म में कोई क्रिया नहीं, परंतु मन और इन्द्रियों की गतिविधियों के कारण उसमें क्रिया का आभास होता है।

यहाँ शंकराचार्य का मुख्य उद्देश्य यह बताना है कि—

संसार का समस्त क्रियात्मक रूप ब्रह्म का नहीं, बल्कि अविद्या का परिणाम है।

जो साधक इस तथ्य को जान लेता है, वह ब्रह्म की नित्य शुद्ध, बुद्ध और मुक्त अवस्था का अनुभव करता है।

इस भाष्यांश में यह प्रतिपादित किया गया है कि ब्रह्म में जो गति और अनेकता का आभास होता है, वह अज्ञान के कारण है। वास्तव में ब्रह्म सदा अविकार, अचल और एक है। “गति” का वर्णन केवल उपाधि के कारण प्रतीत होता है। इस प्रकार, जो साधक इस मिथ्यात्व को समझ लेता है, वह ब्रह्म की वास्तविक, निश्चल और अद्वैत सत्ता का साक्षात्कार करता है—यही मोक्ष का सार है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

इन्द्रियों की अगोचरता और ब्रह्म की सर्वव्यापकता — ‘मनसो जवीयः’ का गहन अद्वैतार्थ

 इन्द्रियों की अगोचरता और ब्रह्म की सर्वव्यापकता — ‘मनसो जवीयः’ का गहन अद्वैतार्थ

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

न एनत् देवा द्योतनात् (द्योतनशीलाः) देवाः, अश्नुवन्—न प्राप्नुवन्ति।

तेभ्यः मनः जवीयः।

मनोव्यापार-व्यवहितत्वात् आभासमात्रम् अपि आत्मनः न एव देवानां विषयः भवति।

यस्मात् जवनात् मनसः अपि पूर्वम् एव गतं।

धूमवत् व्याप्तित्वात्।

सर्वव्यापि तत् आत्मतत्त्वं सर्वसंसारधर्मवर्जितं, स्वेन निरुपाधिकेन स्वरूपेण अविक्रियम् एव सत् उपविष्टम्।

यह आत्मा इन्द्रियों (देवों) द्वारा ज्ञात नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे केवल बाह्य वस्तुओं को प्रकाशित करने वाले हैं।

उनसे भी मन अधिक तीव्र है।

फिर भी मन के व्यापार के कारण आत्मा केवल आभास मात्र भी इन्द्रियों का विषय नहीं बनता।

क्योंकि आत्मा मन से भी पहले ही सर्वत्र विद्यमान है।

धुएँ के समान सर्वत्र व्याप्त होने के कारण वह सबमें फैला हुआ है।

वह आत्मतत्त्व सर्वव्यापक है, संसार के सभी धर्मों से रहित है, और अपने निरुपाधिक स्वरूप में सदा अविकार रूप से स्थित है।

यह भाष्यांश ब्रह्म की अगोचरता (इन्द्रियों से परे होना) और उसकी सर्वव्यापकता को अत्यंत सूक्ष्म ढंग से स्पष्ट करता है। यहाँ शंकराचार्य बताते हैं कि क्यों आत्मा को न तो इन्द्रियाँ जान सकती हैं और न ही मन उसे पूर्णतः पकड़ सकता है।

सबसे पहले “देवाः” शब्द का अर्थ है—इन्द्रियाँ, जो “द्योतन” अर्थात् प्रकाशन का कार्य करती हैं। ये इन्द्रियाँ बाह्य वस्तुओं—रूप, रस, गंध आदि—को जानने में समर्थ हैं, परंतु आत्मा इनका विषय नहीं बन सकता। कारण यह है कि आत्मा स्वयं प्रकाशस्वरूप (चैतन्य) है, और जो स्वयं प्रकाश है, उसे किसी अन्य साधन से प्रकाशित नहीं किया जा सकता। जैसे दीपक स्वयं को प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य दीपक की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही आत्मा स्वयंप्रकाश है।

अतः कहा गया—“न एनत् देवा अश्नुवन्”—इन्द्रियाँ इसे प्राप्त नहीं कर सकतीं।

अब प्रश्न उठता है—जब इन्द्रियाँ नहीं जान सकतीं, तो क्या मन जान सकता है?

मन इन्द्रियों से सूक्ष्म और अधिक तीव्र है—“तेभ्यः मनः जवीयः”। मन संकल्प-विकल्प के द्वारा सूक्ष्मतम विषयों का भी चिंतन कर सकता है। परंतु शंकराचार्य यहाँ एक महत्वपूर्ण सीमा बताते हैं—

“मनोव्यापार-व्यवहितत्वात्”—मन के अपने ही व्यापार (संकल्प-विकल्प) के कारण आत्मा उसमें प्रत्यक्ष नहीं होता।

मन वस्तुओं का विचार करता है, परंतु आत्मा कोई “वस्तु” नहीं है। वह तो स्वयं उस विचार-प्रक्रिया का साक्षी है। इसीलिए आत्मा मन के लिए भी “विषय” नहीं बन सकता—वह केवल आभासमात्र रूप में प्रतीत होता है।

अब “मनसो जवीयः” का गहन अर्थ स्पष्ट किया गया है—

आत्मा मन से भी पहले ही सर्वत्र विद्यमान है—“मनसः अपि पूर्वम् एव गतम्”।

अर्थात् मन जहाँ भी पहुँचता है, वहाँ आत्मा पहले से ही उपस्थित है। इस प्रकार आत्मा की “तीव्रता” वास्तव में उसकी सर्वव्यापकता का सूचक है, न कि किसी प्रकार की गति।

“धूमवत् व्याप्तित्वात्”—यहाँ एक सुंदर दृष्टांत दिया गया है। जैसे धुआँ पूरे वातावरण में फैल जाता है और सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मा भी सर्वत्र व्याप्त है। हालाँकि यह दृष्टांत पूर्ण नहीं, क्योंकि धुआँ वास्तव में गतिशील है, जबकि आत्मा नित्य अचल है—फिर भी यह उसकी व्यापकता को समझाने के लिए उपयुक्त है।

अंततः शंकराचार्य निष्कर्ष देते हैं

यह आत्मा सर्वव्यापी, संसारधर्मवर्जित (जन्म, मृत्यु, सुख-दुःख आदि से रहित), और निरुपाधिक स्वरूप में अविकार है।

वह न कर्ता है, न भोक्ता; वह केवल साक्षी है—सदा एकरस, शुद्ध चैतन्य।

इस भाष्यांश में स्पष्ट किया गया है कि आत्मा इन्द्रियों और मन दोनों से परे है, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है। उसकी “तीव्रता” उसकी सर्वव्यापकता में निहित है, न कि गति में। वह सर्वत्र विद्यमान होकर भी अविकार और निरुपाधिक है। इस ज्ञान से साधक समझता है कि आत्मा कोई ज्ञेय वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं ज्ञान का आधार है—यही अद्वैत का परम निष्कर्ष है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

मन (Mind) : वैज्ञानिक और वेदान्तिक दृष्टि से एक शोधात्मक विवेचन

 मन (Mind) : वैज्ञानिक और वेदान्तिक दृष्टि से एक शोधात्मक विवेचन

मनुष्य के अनुभव का सबसे जटिल और रहस्यमय केंद्र “मन” है। यह न केवल हमारी अनुभूति, स्मृति, कल्पना और निर्णय का आधार है, बल्कि आध्यात्मिक साधना में भी यह केंद्रीय भूमिका निभाता है। विज्ञान और वेदान्त — दोनों ही मन को समझने का प्रयास करते हैं, पर उनकी पद्धति और निष्कर्ष भिन्न होते हुए भी कई स्थानों पर आश्चर्यजनक रूप से मिलते हैं।

1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मन (Mind as Brain Function)

आधुनिक विज्ञान, विशेषतः न्यूरोसाइंस (Neuroscience) और कॉग्निटिव साइंस (Cognitive Science), मन को मस्तिष्क (Brain) की क्रियाओं का परिणाम मानता है।

(क) मन = मस्तिष्क की क्रियाएँ

मस्तिष्क के लगभग 86 अरब न्यूरॉन्स (neurons) आपस में विद्युत-रासायनिक संकेतों द्वारा संवाद करते हैं।

यही नेटवर्क विचार (thought), भावना (emotion), और स्मृति (memory) उत्पन्न करता है।

उदाहरण: जब हम कोई दृश्य देखते हैं, तो visual cortex सक्रिय होता है; जब भावनाएँ आती हैं, तो amygdala और limbic system कार्य करते हैं।

(ख) मन की गति (Speed of Mind)

न्यूरॉन्स में संकेत लगभग 1 m/s से 120 m/s तक गति करते हैं।

परंतु विचारों की “अनुभवगत गति” इससे कहीं अधिक प्रतीत होती है — हम एक क्षण में अतीत और भविष्य दोनों में जा सकते हैं।

(ग) मन की अस्थिरता

विज्ञान कहता है कि मन निरंतर बदलता है — इसे neuroplasticity कहते हैं।

ध्यान (meditation) से मस्तिष्क की संरचना भी बदल सकती है — यह आधुनिक शोध से सिद्ध हुआ है।

विज्ञान के अनुसार मन भौतिक है, परिवर्तनशील है, और मस्तिष्क पर निर्भर है।

2. वेदान्तिक दृष्टिकोण से मन

वेदान्त, विशेषतः अद्वैत वेदान्त, मन को “अन्तःकरण” का एक अंग मानता है, जिसमें चार भाग होते हैं:

मन (संकल्प-विकल्प)

बुद्धि (निर्णय)

चित्त (स्मृति)

अहंकार (मैं-भाव)

(क) मन की प्रकृति

मन जड़ (inert) है, परन्तु चैतन्य (आत्मा) के संपर्क से सक्रिय होता है।

यह “संकल्प-विकल्पात्मक” है — यानी यह विकल्पों में घूमता रहता है।

(ख) मन की गति

वेदान्त कहता है:

“मनः कल्पनात्मकं, अतिवेगवान्”

मन की गति प्रकाश से भी तेज मानी गई है, क्योंकि यह एक क्षण में ब्रह्मांड के किसी भी कोने में कल्पना कर सकता है।

(ग) मन की सीमा

मन इन्द्रियों और बुद्धि तक सीमित है।

यह आत्मा (आत्मन्) को जानने का साधन नहीं बन सकता — बल्कि स्वयं बाधा भी बन सकता है।

वेदान्त के अनुसार मन सूक्ष्म है, अत्यंत गतिशील है, परन्तु आत्मा से निम्न स्तर का है।

3. शंकराचार्य का दृष्टिकोण: “आत्मा मन से भी सूक्ष्म, गतिवान और स्थिर”

आदि शंकराचार्य ने उपनिषदों की व्याख्या करते हुए आत्मा (आत्मन्) के बारे में एक अत्यंत गूढ़ बात कही है:

“आत्मा मन से भी अधिक गतिवान, सूक्ष्म और स्थिर है।”

यह कथन विशेष रूप से ईशावास्य उपनिषद् के मंत्र से संबंधित है:

“अनेजदेकं मनसो जवीयो…”

(वह एक है, अचल है, और मन से भी तेज है)

4. इस कथन का गहन विश्लेषण

(क) “मन से भी अधिक गतिवान” — कैसे?

मन की गति कल्पना की गति है — वह कहीं भी “सोच” सकता है।

परन्तु आत्मा “साक्षी” है — वह हर जगह पहले से उपस्थित है।

गति वहाँ होती है जहाँ दूरी हो; आत्मा सर्वव्यापी है, इसलिए उसे “जाने” की आवश्यकता नहीं।

वैज्ञानिक समानता:

जैसे quantum field हर जगह मौजूद होता है, वैसे ही आत्मा सर्वव्यापी मानी गई है।

(ख) “सूक्ष्म” — क्यों?

मन सूक्ष्म है, परन्तु वह भी एक “वृत्ति” (modification) है।

आत्मा तो निराकार, निर्विकारी है — इसलिए वह सबसे सूक्ष्म है।

उदाहरण:

जैसे हवा दिखाई नहीं देती, परन्तु फिर भी उसका अस्तित्व है;

आत्मा उससे भी अधिक सूक्ष्म है — अनुभव में आती है, पर दिखाई नहीं देती।

(ग) “स्थिर” — कैसे संभव है जबकि वह गतिवान भी है?

यहाँ शंकराचार्य का अद्वैत का रहस्य प्रकट होता है:

आत्मा स्वयं नहीं चलती (स्थिर है)

परन्तु सब गति उसी के कारण संभव है

जैसे:

स्क्रीन स्थिर रहती है, पर उस पर फिल्म चलती है

सूर्य स्थिर है, पर पृथ्वी के घूमने से दिन-रात होते हैं

वैज्ञानिक समानता:

space-time स्वयं स्थिर framework है, पर उसमें सारी गति होती है।

5. विज्ञान और वेदान्त का संगम

विषय विज्ञान वेदान्त

मन की प्रकृति मस्तिष्क की क्रिया सूक्ष्म उपकरण

गति न्यूरॉन संकेत असीम कल्पना

स्थिरता नहीं (परिवर्तनशील) आत्मा में स्थिरता

अंतिम सत्य भौतिक चैतन्य (आत्मा)

संगम बिंदु:

ध्यान (meditation) दोनों में महत्वपूर्ण है

मन को नियंत्रित करने से अनुभव बदलता है

6. निष्कर्ष: मन से परे की यात्रा

मन एक अद्भुत साधन है — यह हमें संसार में अनुभव कराता है, परन्तु यही बंधन का कारण भी बन सकता है।

आदि शंकराचार्य का संदेश स्पष्ट है:

मन को समझो, पर उससे चिपको मत

आत्मा को पहचानो — जो मन से परे है

“मन ही बंधन है, और मन ही मुक्ति का साधन है”

जब मन शांत होता है, तब आत्मा का अनुभव होता है —

और तब ज्ञात होता है कि जो सबसे तेज है, वही सबसे स्थिर भी है।


मुकेश ,,,,,,,

मन की तीव्रता और ब्रह्म की सर्वव्यापकता — ‘मनसो जवीयः’ का शांकरार्थ

मन की तीव्रता और ब्रह्म की सर्वव्यापकता — ‘मनसो जवीयः’ का शांकरार्थ


मनसः अन्तःकरणस्य संकल्प-लक्षणस्य उपाधेः अनुवर्तनात्,
इदं देहस्थस्य मनसः ब्रह्मलोकादि-दूरस्थ-संकल्पनं क्षणमात्रात् भवति;
अतः मनसः जविष्ठत्वं लोके प्रसिद्धम्।
तस्मिन् मनसि ब्रह्म लोकादीन् द्रुतं गच्छति सति, प्रथमं प्राप्त इव आत्मचैतन्याभासः गृह्यते;
अतः ‘मनसो जवीयः’ इत्याह।


मन, जो संकल्प करने वाला अन्तःकरण है, उसकी विशेषता यह है कि वह शरीर में स्थित होते हुए भी दूरस्थ लोकों (जैसे ब्रह्मलोक आदि) का चिंतन एक क्षण में कर सकता है।
इस कारण मन की तीव्र गति लोक में प्रसिद्ध है।
परंतु जब मन किसी दूर स्थान पर पहुँचता है, तब वहाँ ब्रह्म पहले से ही विद्यमान होता है, और आत्मचैतन्य का प्रकाश पहले ही उपलब्ध होता है।
इसीलिए कहा गया है कि ब्रह्म मन से भी अधिक तीव्र है।

यह भाष्यांश उपनिषद् के “मनसो जवीयः” पद के गूढ़ अर्थ को स्पष्ट करता है। यहाँ शंकराचार्य मन और ब्रह्म के बीच एक सूक्ष्म तुलना प्रस्तुत करते हैं, जिससे साधक को यह समझ में आता है कि ब्रह्म की "तीव्रता" वास्तव में क्या है।

मन, जिसे अन्तःकरण कहा जाता है, संकल्प-विकल्प का केंद्र है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है—क्षणिक गति। मन शरीर में स्थित रहते हुए भी दूरस्थ स्थानों—जैसे ब्रह्मलोक, स्वर्ग, अतीत या भविष्य—का विचार तुरंत कर सकता है। इस कारण से लोक में मन को अत्यंत तीव्रगामी (जविष्ठ) माना गया है।

परंतु शंकराचार्य यहाँ एक गहन बिंदु प्रस्तुत करते हैं—
जब मन किसी स्थान की कल्पना करता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह वहाँ "पहुँच गया"। परंतु वास्तव में, उस स्थान पर जो चैतन्य (ब्रह्म) है, वह पहले से ही वहाँ विद्यमान है। मन वहाँ पहुँचता नहीं, बल्कि वहाँ स्थित चैतन्य के साथ तादात्म्य का अनुभव करता है।

यहाँ "आत्मचैतन्याभास" का अर्थ है—आत्मा का प्रकाश, जो हर स्थान पर पहले से ही विद्यमान है। मन केवल उस प्रकाश को "ग्रहण" करता है, न कि उसे उत्पन्न करता है।

इस प्रकार, जब कहा जाता है कि ब्रह्म "मन से भी अधिक तीव्र" है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म किसी दिशा में दौड़ता है या गति करता है। बल्कि इसका अभिप्राय है कि—
जहाँ भी मन पहुँच सकता है, वहाँ ब्रह्म पहले से ही उपस्थित है।

इससे स्पष्ट होता है कि ब्रह्म की "तीव्रता" वास्तव में उसकी सर्वव्यापकता (Omnipresence) का द्योतक है, न कि भौतिक गति का।

यहाँ एक महत्वपूर्ण अद्वैत सिद्धांत निहित है—
मन एक उपाधि है, जो चैतन्य को सीमित रूप में प्रकट करता है। जब मन किसी विषय की ओर जाता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि चैतन्य वहाँ गया है। परंतु वास्तव में चैतन्य सर्वत्र है; वह न कहीं जाता है, न कहीं से आता है।

एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—
सूर्य का प्रकाश सर्वत्र फैला हुआ है। यदि कोई व्यक्ति किसी वस्तु की ओर दृष्टि डालता है, तो ऐसा लगता है कि प्रकाश वहाँ पहुँचा। परंतु वास्तव में प्रकाश पहले से ही वहाँ था; दृष्टि केवल उसे प्रकट करती है।

इसी प्रकार, मन जहाँ भी संकल्प करता है, वहाँ ब्रह्म पहले से ही विद्यमान होता है। अतः वह मन से भी अधिक "तीव्र" है।


इस भाष्यांश में शंकराचार्य ने मन की तीव्र गति और ब्रह्म की सर्वव्यापकता के बीच सूक्ष्म भेद को स्पष्ट किया है। मन क्षण में कहीं भी पहुँच सकता है, परंतु ब्रह्म वहाँ पहले से ही विद्यमान होता है। अतः ब्रह्म की तीव्रता भौतिक गति नहीं, बल्कि उसकी सर्वव्यापकता का द्योतक है। इस ज्ञान से साधक समझता है कि आत्मा न कहीं जाती है, न कहीं से आती है—वह सदा सर्वत्र विद्यमान है। यही अद्वैत का परम सत्य है। 

मुकेश ,,,,,,,,,,,


निर्उपाधिक ब्रह्म की निश्चलता और उपाधि-सापेक्ष गतिशीलता — प्रतीतिविरोध का शांकर समाधान

 निर्उपाधिक ब्रह्म की निश्चलता और उपाधि-सापेक्ष गतिशीलता — प्रतीतिविरोध का शांकर समाधान


मूल पदांश (संशोधित रूप में)

मनसः संकल्पादि-लक्षणात् जवीयः, जववत्तरम्।
कथं विरुद्धम् उच्यते—ध्रुवं निश्चलम् इदं, मनसो जवीयः इति च?
न एष दोषः; निरुपाधि-उपाधि-भेदेन अस्य उपपत्तेः।
तत्र निरुपाधिकेन स्वेन स्वरूपेण उच्यते—अनेजद् एकम् इति।


मन, जो संकल्प आदि के कारण अत्यंत तीव्र गति वाला है, उससे भी यह (ब्रह्म) अधिक तीव्र कहा गया है।

तो यह विरोध कैसे कहा जाए कि यह ब्रह्म निश्चल भी है और मन से भी अधिक तीव्र है?
यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यह निरुपाधि और उपाधि के भेद से समझ में आता है।
निरुपाधि (अपने शुद्ध स्वरूप) में यह अचल और एक है—“अनेजद् एकम्”।

यह भाष्यांश अद्वैत वेदान्त के एक अत्यंत सूक्ष्म और बौद्धिक रूप से चुनौतीपूर्ण प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करता है—क्या ब्रह्म स्थिर है या गतिशील? उपनिषद् एक ओर कहता है—“अनेजद् एकम्” (वह अचल है), और दूसरी ओर—“मनसो जवीयः” (मन से भी अधिक तीव्र है)। प्रथम दृष्टि में यह स्पष्ट विरोधाभास प्रतीत होता है।

शंकराचार्य इस विरोध को नकारते हुए कहते हैं—“न एष दोषः”—यह कोई दोष नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का भेद है।

मन को शास्त्रों में अत्यंत तीव्रगामी कहा गया है। वह क्षणभर में दूरस्थ विषयों तक पहुँच जाता है—भूत, भविष्य, दूरस्थ लोक—सबका संकल्प कर सकता है। इस दृष्टि से मन गति का प्रतीक है। परंतु जब उपनिषद् कहता है कि ब्रह्म मन से भी अधिक तीव्र है, तो उसका अभिप्राय भौतिक गति नहीं है, बल्कि सर्वव्यापकता और तत्क्षण उपलब्धता है।

ब्रह्म को कहीं जाने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह पहले से ही सर्वत्र विद्यमान है। अतः मन जहाँ भी पहुँचता है, वहाँ ब्रह्म पहले से उपस्थित है। इस अर्थ में वह “मनसो जवीयः” है—मन से भी अधिक शीघ्र।

अब दूसरी ओर—“ध्रुवं निश्चलम्”—ब्रह्म अचल है, इसमें कोई गति नहीं। यह कथन उसके निरुपाधिक स्वरूप के संदर्भ में है। निरुपाधि ब्रह्म—जो किसी भी शरीर, मन या नाम-रूप से रहित है—वह नित्य, अविकार और अचल है।

यहाँ शंकराचार्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं—
उपाधि और निरुपाधि का भेद।

  • निरुपाधिक ब्रह्म — शुद्ध चैतन्य, जिसमें कोई गति, परिवर्तन या क्रिया नहीं।
  • उपाधियुक्त ब्रह्म (जीव या ईश्वर रूप) — जहाँ ब्रह्म शरीर, मन आदि से सम्बद्ध प्रतीत होता है, और वहाँ गति, क्रिया, परिवर्तन आदि का अनुभव होता है।

इसी भेद के कारण उपनिषद् में दोनों प्रकार के वचन आते हैं—कभी ब्रह्म को अचल कहा जाता है, और कभी गतिशील।

एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—
आकाश स्वयं निश्चल है, परंतु जब वह घट (घड़ा) में सीमित प्रतीत होता है, तब घट के चलने से आकाश भी चलता हुआ प्रतीत होता है। वास्तव में आकाश में कोई गति नहीं होती, परंतु उपाधि (घट) के कारण गति का आभास होता है।

इसी प्रकार, ब्रह्म अपने शुद्ध स्वरूप में निश्चल है—“अनेजद् एकम्”; परंतु जब वही ब्रह्म मन और शरीर के साथ जुड़ा हुआ प्रतीत होता है, तब उसमें गति का अनुभव होता है—“मनसो जवीयः”।

अतः यह विरोध नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो भिन्न दृष्टिकोण हैं—एक पारमार्थिक, दूसरा व्यवहारिक।

इस भाष्यांश में शंकराचार्य ने ब्रह्म की निश्चलता और गतिशीलता के प्रतीत होने वाले विरोध को उपाधि-निरुपाधि के भेद से सुलझाया है। ब्रह्म अपने शुद्ध स्वरूप में अचल और अविकार है, परंतु उपाधियों के कारण वह गतिशील प्रतीत होता है। इस प्रकार उपनिषद् के वचनों में कोई विरोध नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक संगति है। जो साधक इस भेद को समझ लेता है, वह अद्वैत सत्य के निकट पहुँच जाता है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,

अपरिवर्तनशील ब्रह्म और प्रपंच में एकत्व — शंकरमत का सूक्ष्म निरूपण

 अपरिवर्तनशील ब्रह्म और प्रपंच में एकत्व — शंकरमत का सूक्ष्म निरूपण


मूल पदांश (संशोधित रूप में)

प्रच्युतिः तद् रहितं सदा एकरूपम् इत्येव।
तच्च एकं सर्वभूतेषु।

ब्रह्म में किसी प्रकार का परिवर्तन (प्रच्युतिः) नहीं होता; वह सदैव एकरस और एक ही स्वरूप वाला है।

और वही एक ब्रह्म सभी प्राणियों में स्थित है।

इस भाष्यांश में आदि शंकराचार्य ब्रह्म के नित्य, निर्विकार और सर्वव्यापक स्वरूप का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन करते हैं। यहाँ दो मुख्य तत्त्व प्रतिपादित किए गए हैं—

(1) ब्रह्म की अपरिवर्तनशीलता (अविकारिता)
(2) ब्रह्म की सर्वभूतात्मकता (सर्वत्र एकत्व)

प्रथम पद “प्रच्युतिः” का आशय है—स्वरूप से विचलन या परिवर्तन। संसार की सभी वस्तुएँ परिवर्तनशील हैं—वे जन्म लेती हैं, बढ़ती हैं, और अंततः नष्ट हो जाती हैं। परंतु ब्रह्म ऐसा नहीं है। वह नित्य है, अविनाशी है, और उसमें किसी प्रकार का विकार नहीं होता। इसीलिए कहा गया—“तद् रहितं”—अर्थात् वह किसी भी प्रकार की प्रच्युति (परिवर्तन) से रहित है।

शंकराचार्य का यह सिद्धांत अद्वैत वेदान्त का आधार है—जो वस्तु बदलती है, वह नित्य सत्य नहीं हो सकती। अतः ब्रह्म, जो परम सत्य है, उसमें कोई परिवर्तन संभव नहीं। यदि उसमें परिवर्तन मान लिया जाए, तो वह भी संसार की वस्तुओं की तरह अनित्य हो जाएगा, जो कि शास्त्रसम्मत नहीं है।

“सदा एकरूपम्”—यहाँ ब्रह्म की अखंडता और समरूपता का प्रतिपादन है। ब्रह्म में कोई भेद नहीं—न तो आंतरिक (स्वगत भेद), न ही बाह्य (सजातीय या विजातीय भेद)। वह सर्वथा अद्वैत, एकरस चैतन्य है। जैसे समुद्र का जल सर्वत्र एक ही स्वाद का होता है, वैसे ही ब्रह्म सर्वत्र एक ही स्वरूप में विद्यमान है।

अब प्रश्न उठता है—यदि ब्रह्म एक और अपरिवर्तनशील है, तो यह विविध संसार कैसे प्रतीत होता है? इसका उत्तर शंकराचार्य अविद्या (माया) के माध्यम से देते हैं। यह विविधता वास्तविक नहीं, बल्कि प्रतीतिमात्र है। जैसे एक ही सूर्य अनेक जलाशयों में अनेक रूपों में प्रतिबिंबित होता है, वैसे ही एक ही ब्रह्म अनेक जीवों के रूप में दिखाई देता है।

“तच्च एकं सर्वभूतेषु”—यह वाक्य ब्रह्म की सर्वव्यापकता को दर्शाता है। वही एक आत्मा सभी प्राणियों में स्थित है। भिन्न-भिन्न शरीर, मन और बुद्धि के कारण हमें भेद दिखाई देता है, परंतु आत्मा के स्तर पर कोई भेद नहीं है। यही अद्वैत का मूल सिद्धांत है—“एकमेवाद्वितीयम्”


मुकेश ,,,,,,,,,,,