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Wednesday, 18 March 2026

ज़िन्दगी की शाम, तन्हाई और तेरी यादें

 
ज़िन्दगी की शाम, तन्हाई और तेरी यादें


शाम ढलती है

तो लगता है जैसे

ज़िन्दगी अपनी आख़िरी आयत पढ़ रही हो…


जंगल की इस सुनसान पुलिया पर बैठा मैं

अपने ही वजूद का मुसाफ़िर हूँ

न कोई मंज़िल, न कोई हमसफ़र,

बस धुएँ में घुलती हुई कुछ अधूरी दुआएँ…


ये जो हर कश में उठता है धुआँ,

ये तंबाकू नहीं

ये मेरी रूह के जले हुए हरफ़ हैं,

जो तेरे नाम से उठते हैं

और ख़ुदा तक पहुँचने से पहले

हवा में ही बिखर जाते हैं…


कभी तू थी

तो हर मना करना भी इबादत लगता था,

तेरी झुंझलाहट में भी रहमत थी,

और तेरे लफ़्ज़

मेरे गुनाहों का वुज़ू बन जाते थे…


अब तू नहीं है

तो हर इजाज़त भी सज़ा बन गई है,

कोई रोकने वाला नहीं

कोई टोकने वाला नहीं,

और मैं…

मैं अपनी ही ख़ामोशी का मुरीद हो गया हूँ।


डूबता हुआ ये सूरज

मेरी रगों में उतरता जाता है,

जैसे वक्त कह रहा हो

"हर रौशनी का अंजाम

आख़िरकार तन्हाई ही है…"


सूखे पत्तों की सरसराहट में

मैं तेरी आवाज़ तलाशता हूँ,

हर गिरता हुआ पत्ता

जैसे कोई वादा हो

जो निभ नहीं पाया…


तेरी याद—

अब कोई शख़्स नहीं,

एक सिलसिला है…

जो रुकता नहीं,

जो थमता नहीं,

जो हर रात मेरी रूह पर उतर आता है

सजदे की तरह…


मैंने अब मोहब्बत को

इश्क़ नहीं, फ़ना समझ लिया है

जहाँ कोई बचता नहीं,

बस एक नाम रह जाता है

जो हर साँस के साथ

धीरे-धीरे जलता है…


ये जो ज़िन्दगी की शाम है

ये सिर्फ़ वक़्त नहीं,

ये एक हक़ीक़त है…

जहाँ इंसान समझता है

कि सबसे गहरा रिश्ता

किसी और से नहीं,

अपनी तन्हाई से होता है…


और मैं…

अब उसी तन्हाई का दरवेश हूँ

जो तेरी यादों की चादर ओढ़े

हर रात

ख़ुद से मिलने निकल पड़ता है…


मुकेश ,

प्रेम नहीं लौटता (दो)

 प्रेम नहीं लौटता (दो)


वह

धूप की तरह आता है,

छूकर चला जाता है

और फिर

स्मृति की दीवारों पर

एक हल्की गरमाहट छोड़ जाता है।


तुम सोचते हो

वह फिर से आएगा

उसी राह, उसी आवाज़ में,

पर प्रेम

कभी दोहराया नहीं जाता।


वह बस

एक बार घटित होता है,

और फिर

हम उम्र भर

उसके होने की रोशनी में

थोड़ा-थोड़ा जीते रहते हैं।


मुकेश ,,,,

कई बार प्रेम नहीं लौटता,

 सच है

कई बार प्रेम नहीं लौटता,

जैसे आवाज़

बीहड़ों में गूँजकर

खुद ही खो जाती है।


कई बार

हम जिसे पुकारते हैं,

वो नाम

हवा के साथ बह जाता है

और हाथ में

सिर्फ़ एक अधूरी-सी खामोशी रह जाती है।


प्रेम हमेशा

मंज़िल तक पहुँचे,

यह ज़रूरी नहीं होता

कभी-कभी वो

रास्ते में ही थककर

किसी मोड़ पर बैठ जाता है,

और फिर

वापस मुड़कर नहीं आता।


पर जो नहीं लौटता,

वो भी कहीं खत्म नहीं होता

वो बदल जाता है

याद में,

एक आदत में,

या फिर

एक ऐसी ख़ामोश ताक़त में

जो हमें अंदर से थोड़ा और गहरा बना देती है।


कई बार

प्रेम का न लौटना ही

उसकी आख़िरी सच्चाई होता है

क्योंकि हर कहानी का अंत

मिलन नहीं,

समझ भी हो सकता है।


मुकेश ,,,,

ज़िन्दगी की शाम, तन्हाई और तेरी यादें

 ज़िन्दगी की शाम, तन्हाई और तेरी यादें

शाम ढलती है

तो लगता है जैसे


ज़िन्दगी अपनी आख़िरी आयत पढ़ रही हो…


जंगल की इस सुनसान पुलिया पर बैठा मैं

अपने ही वजूद का मुसाफ़िर हूँ

न कोई मंज़िल, न कोई हमसफ़र,

बस धुएँ में घुलती हुई कुछ अधूरी दुआएँ…


ये जो हर कश में उठता है धुआँ,

ये तंबाकू नहीं

ये मेरी रूह के जले हुए हरफ़ हैं,

जो तेरे नाम से उठते हैं

और ख़ुदा तक पहुँचने से पहले

हवा में ही बिखर जाते हैं…


कभी तू थी

तो हर मना करना भी इबादत लगता था,

तेरी झुंझलाहट में भी रहमत थी,

और तेरे लफ़्ज़

मेरे गुनाहों का वुज़ू बन जाते थे…


अब तू नहीं है

तो हर इजाज़त भी सज़ा बन गई है,

कोई रोकने वाला नहीं

कोई टोकने वाला नहीं,

और मैं…

मैं अपनी ही ख़ामोशी का मुरीद हो गया हूँ।


डूबता हुआ ये सूरज

मेरी रगों में उतरता जाता है,

जैसे वक्त कह रहा हो

"हर रौशनी का अंजाम

आख़िरकार तन्हाई ही है…"


सूखे पत्तों की सरसराहट में

मैं तेरी आवाज़ तलाशता हूँ,

हर गिरता हुआ पत्ता

जैसे कोई वादा हो

जो निभ नहीं पाया…


तेरी याद

अब कोई शख़्स नहीं,

एक सिलसिला है…

जो रुकता नहीं,

जो थमता नहीं,

जो हर रात मेरी रूह पर उतर आता है

सजदे की तरह…


मैंने अब मोहब्बत को

इश्क़ नहीं, फ़ना समझ लिया है

जहाँ कोई बचता नहीं,

बस एक नाम रह जाता है

जो हर साँस के साथ

धीरे-धीरे जलता है…


ये जो ज़िन्दगी की शाम है

ये सिर्फ़ वक़्त नहीं,

ये एक हक़ीक़त है…

जहाँ इंसान समझता है

कि सबसे गहरा रिश्ता

किसी और से नहीं,

अपनी तन्हाई से होता है…


और मैं…

अब उसी तन्हाई का दरवेश हूँ

जो तेरी यादों की चादर ओढ़े

हर रात

ख़ुद से मिलने निकल पड़ता है…


मुकेश ,,,,,,,,,

मैं, मोहब्बत और एक तन्हा रात

 मैं, मोहब्बत और एक तन्हा रात


मैं हरी फसल नहीं था,

बस उस ज़मीन की तरह था

जिस पर किसी ने वक़्त ही नहीं दिया

बस उम्मीदें बोईं और छोड़ दिया...


मैं ख्वाब नहीं देखता था,

ख्वाब खुद मेरी आंखों में उतर आते थे

और तुम...

हर ख्वाब में वही थी

जैसे रौशनी में लिपटी एक छलावा —

साया भी तेरा, धोखा भी।


जब सड़कें पार करता था

तू ज़िंदगी की मीठी बातें करती थी

मैं तुझे सुनता था

तेरी आँखों में कोई घर ढूंढता था

तू आगे देखती थी

मैं सिर्फ़ तुझे देखता रहा।


तेरी हँसी में जो सुकून था

वो अब बेरोज़गारी के कोलाहल में गुम है

अब न निवाले हैं, न आग़ोश

बस कुछ लम्बी रातें हैं

जिनमें ठंडी दीवारें और तेरी यादें हैं।


तू मुझे चादर ओढ़ा कर

किसी और ख्वाब में चली गई

और मैं?

मैं उसी चादर को आँखों तक खींचे

तेरी गैरमौजूदगी की ठंड से काँपता रहा।


अब मुझे अंधेरे से डर नहीं लगता

अब तो रौशनी से डर लगता है

कहीं फिर तू ना दिख जाए

एक और मुस्कान के पीछे छुपी बेवफाई बनकर।


अब मोहब्बत नहीं करता

किसी से भी नहीं

क्योंकि अब भरोसा नहीं

किसी आवाज़ पर, किसी हाथ पर

किसी कसम पर...


मैं अब मिट्टी भी नहीं

मैं अब राख हूँ

जिसमें कोई फूल नहीं उगता

बस कुछ जले हुए लफ़्ज़

जो हर रात तेरे नाम से जलते हैं...


मुकेश ,,,,,,

जब याद की महक लौटती है

 जब याद की महक लौटती है


कुछ यादें

कभी पूरी तरह नहीं जातीं।


वे बस

किसी कोने में छिप जाती हैं।


फिर अचानक

किसी दिन

कोई खुशबू आती है—


और

वे सब

एक साथ लौट आती हैं।


जैसे

समय ने

अचानक

पीछे मुड़कर देख लिया हो।


मुकेश ,,

ख़ुशबू का अदृश्य पत्र

ख़ुशबू का अदृश्य पत्र


कभी-कभी

कोई ख़त

लिखा तो जाता है

पर भेजा नहीं जाता।


वह

साँसों की महक बनकर

हवा में उड़ता रहता है।


जिसे

कोई डाकिया नहीं लाता,


पर दिल

उसे फिर भी पढ़ लेता है।


मुकेश ,,,,,,