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Sunday, 29 March 2026

“मैं ख़ामोशी लिखता हूँ, तुम उसे अर्थ दे देती हो…”

 “मैं ख़ामोशी लिखता हूँ,

तुम उसे अर्थ दे देती हो…”


मेरे पास शब्द नहीं होते

सिर्फ़ ठहराव होता है,

एक अधूरा सा कंपन,

जो किसी नाम की तलाश में भटकता है।


और तुम…

बिना कुछ कहे,

उस भटकन को दिशा दे देती हो,

जैसे हवा

बिन दिखे भी

दीपक की लौ को समझा देती है

कि उसे किस ओर झुकना है।


मैं जो चुप रहता हूँ,

वो भी एक भाषा है—

पर अधूरी,

जब तक तुम

उसे अपने स्पर्श से

पूरा न कर दो।


तुम्हारे होने से

मेरी हर खामोशी

कहानी बन जाती है,

और मैं

बस एक लेखक नहीं,

तुम्हारी उपस्थिति का

साक्षी बन जाता हूँ।


शायद इसी लिए

मैं लिखता नहीं,

तुमसे लिखवाता हूँ…

क्योंकि अर्थ हमेशा

शब्दों में नहीं,

किसी ‘तुम’ में छुपा होता है।


मुकेश ,

तुम वह मौन हो, जिसमें मेरा हर शब्द जन्म लेता है…

 तुम वह मौन हो,

जिसमें मेरा हर शब्द जन्म लेता है…”


तुम

सिर्फ़ खामोशी नहीं,

वो गर्भ हो

जहाँ अर्थ पलते हैं।


मैं जो भी कहता हूँ,

वो पहले तुम्हारे भीतर

अनकहा ठहरता है,

फिर लफ़्ज़ बनकर

मेरी ज़ुबान तक आता है।


तुम्हारे बिना

मेरे शब्द अधूरे नहीं

निर्जीव हैं,

जैसे धड़कन बिना स्वर के।


तुम वह शून्य हो,

जिसमें मेरी सारी आवाज़ें

अपना आकार पाती हैं।


और मैं…

बस एक माध्यम हूँ,

जिससे होकर

तुम्हारी निस्तब्धता

स्वर बन जाती है।


शायद इसी लिए—

मैं तुम्हें सुनता नहीं,

तुममें खुद को सुनता हूँ।


मुकेश ,,,,,

तुमसे मिलकर जाना— प्रेम भी एक दर्पण है…”

 तुमसे मिलकर जाना—

प्रेम भी एक दर्पण है…”

तुमसे मिलना
किसी और को पाना नहीं था,
बल्कि खुद से पहली बार
सच में मिलना था।

तुम्हारी आँखों में
जो चमकती थी—
वो तुम्हारी नहीं,
मेरी ही कोई अधूरी पहचान थी।

तुम्हारी मुस्कान में
जो सुकून था,
वो मेरे भीतर छुपे
अधूरे उत्तरों की गूँज थी।

मैंने तुम्हें चाहा—
और जाना कि
मैं खुद को ही पुकार रहा था
किसी और के नाम से।

प्रेम ने मुझे तुम तक नहीं,
मुझ तक पहुँचा दिया।

और तब समझ आया—
दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता,
वो बस वही दिखाता है
जो हम देखने से डरते हैं।

तुमसे मिलकर जाना—
प्रेम कोई रिश्ता नहीं,
एक उद्घाटन है…
जहाँ परदे हटते हैं,
और आत्मा
अपने ही सत्य से
नज़रें मिलाती है।

तुम और मैं दो नहीं,

 तुम और मैं

दो नहीं,

एक ही अनुभूति के दो भ्रम हैं।”


तुम

जैसे श्वास का पहला स्पर्श,

और मैं

उसका अनसुना कंपन।


हम अलग कहाँ हैं…

बस दृष्टि का एक धोखा है,

जहाँ आत्मा

अपने ही प्रतिबिंब को

‘तुम’ कहकर पुकारती है।


जब तुम पास होती हो,

तो कोई दूरी नहीं मिटती—

क्योंकि कभी थी ही नहीं।


और जब तुम दूर जाती हो,

तो कुछ खोता भी नहीं—

क्योंकि जो सत्य है,

वह न मिलने से बनता है,

न बिछड़ने से टूटता है।


तुम और मैं

दो किनारे नहीं,

एक ही सागर की

अलग-अलग लहरों का अहसास हैं।


और शायद…

प्रेम वही क्षण है,

जब यह भ्रम टूटता है—

और हम याद करते हैं,

कि हम कभी

अलग थे ही नहीं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

डूबने की आदत और तैरने का भ्रम

 डूबने की आदत और तैरने का भ्रम”

मैं डूबता रहा

इतनी बार
कि डूबना
मेरी प्रकृति बन गया।

और हर बार
जब मैं ऊपर आया,
मैंने खुद से कहा
“देखो, मैं तैर रहा हूँ।”

पर यह तैरना नहीं था,
यह केवल
डूबने के बीच
एक छोटा-सा विराम था।

जल
शांत दिखता है,
पर उसकी गहराई में
एक अनकही खींच है,

जो हर उस चीज़ को
अपने भीतर समा लेना चाहती है
जो स्वयं को
स्थिर मान बैठती है।

मैंने जीवन को
एक सतह समझा,
जहाँ संतुलन बनाकर
रहा जा सकता है,

पर जीवन
सतह नहीं,
एक गहराई है,

जहाँ हर प्रयास
या तो डूबता है,
या डूबने से
क्षण भर बचता है।

मैंने हाथ-पैर मारे,
तकनीक सीखी,
दूसरों को देखा

वे भी
ठीक मेरी तरह
डूबते-उतराते थे,

पर उनके चेहरों पर
एक अजीब-सा विश्वास था,
जैसे वे सच में
तैरना जानते हों।

और मैं
उनकी नकल करता रहा,

अपने भीतर की सच्चाई को
अनदेखा करते हुए।

धीरे-धीरे
मुझे महसूस हुआ

कि यह सारा संघर्ष
जल से नहीं,
मेरी धारणा से है।

मैं मान बैठा था
कि मुझे तैरना है,
मुझे बचना है,
मुझे ऊपर रहना है

और यही चाह
मुझे
बार-बार नीचे खींचती रही।

एक दिन
मैं थक गया।

इतना थक गया
कि मैंने
संघर्ष करना छोड़ दिया।

मैंने
अपने हाथ-पैर रोक लिए,
और पहली बार
डूबने को
पूरा होने दिया।

वह अंत नहीं था

वह एक अजीब-सी
शांति थी,

जैसे जल ने
मुझे अपने भीतर
समेट लिया हो,

बिना किसी विरोध के।

और उसी क्षण
कुछ टूटा,

वह भ्रम
कि मैं कभी
तैर रहा था।

मैंने देखा

न मैं डूब रहा था,
न तैर रहा था,

मैं बस
उस अनुभव का हिस्सा था,

जिसे मैं
समझ नहीं पा रहा था।

जल
अब शत्रु नहीं था,
और मैं
अब उससे अलग नहीं था।

डूबने की आदत
धीरे-धीरे
घुलने लगी,

क्योंकि
अब कोई प्रयास नहीं था
जिसे बचाना हो।

और तैरने का भ्रम
वह तो
पहले ही
बिखर चुका था।

अब न ऊपर का डर,
न नीचे का मोह

बस
एक स्वीकार,
एक मौन,
एक सहज बहाव।

शायद यही
जीवन का वह बिंदु है,

जहाँ हम समझते हैं
कि संघर्ष ही
डूबना था,

और समर्पण
कोई तैरना नहीं,

बल्कि
उस जल के साथ
एक हो जाना है
जिसे हम
अब तक
जीवन कहते आए थे।


मुकेश ,,,,,

एक अधूरा चक्र, जो पूरा होना नहीं चाहता”

 एक अधूरा चक्र, जो पूरा होना नहीं चाहता”

यह चक्र

किसी ज्यामिति का नहीं,

किसी रेखा का भी नहीं,

यह बना है

उन यात्राओं से

जो कभी पूरी नहीं हुईं।


यह घूमता है—

पर पूरा नहीं होता,

जैसे किसी ने

उसकी परिधि से

एक बिंदु चुरा लिया हो।


लोग कहते हैं—

“हर चक्र का एक अंत होता है,”

पर यह—

उस नियम से

इनकार करता है।


यह आधा नहीं,

अधूरा है

और अधूरापन

इसकी कमी नहीं,

इसका स्वभाव है।


मैंने इसे कई बार

पूरा करने की कोशिश की—


हर बार

एक नया प्रयास,

एक नई शुरुआत,

एक नई उम्मीद—


पर हर बार

वही बिंदु

मुझसे छूट जाता है,


जैसे वह बिंदु

कभी था ही नहीं,

या शायद

मैं ही उसे पकड़ने के योग्य नहीं था।


धीरे-धीरे

मुझे समझ आया


यह चक्र

पूरा होना ही नहीं चाहता,


क्योंकि

पूरा होते ही

यह समाप्त हो जाएगा।


और इसका अस्तित्व

इसके अधूरेपन में ही है।


यह वही है—

जिसे हम जीवन कहते हैं,

जहाँ हर उपलब्धि के बाद

एक नई इच्छा जन्म लेती है,


और हर अंत के बाद

एक नया प्रारंभ।


यह चक्र

न रुकता है,

न थकता है


बस

खुद को दोहराता है,

नए रूपों में,

नए नामों से।


मैंने देखा—

कि मैं भी

इस चक्र का हिस्सा हूँ,


मैं ही

उसकी गति हूँ,

और मैं ही

उसका अधूरापन।


जब मैं

कुछ पाने के पीछे भागता हूँ,

चक्र तेज़ हो जाता है,


और जब मैं

रुकता हूँ,

वह भी

धीमा पड़ जाता है।


पर वह रुकता नहीं

क्योंकि उसका उद्देश्य

रुकना नहीं,

चलते रहना है।


एक दिन

मैंने उससे पूछा—


“तू पूरा क्यों नहीं होता?”


उसने कोई उत्तर नहीं दिया,

बस

मुझे एक दर्पण दिखा दिया।


उस दर्पण में

मैं ही था

अधूरा,

खोज में,

एक ऐसे अंत की तलाश में

जो कभी नहीं आएगा।


और तभी

मुझे समझ आया

चक्र अधूरा नहीं है,

मैं अधूरा हूँ,


और मेरी ही अधूरी समझ

उसे अधूरा बना देती है।


जैसे ही

मैंने इस खोज को

छोड़ना शुरू किया,


चक्र ने

अपनी गति बदल दी


वह अब भी घूम रहा था,

पर उसमें

कोई बेचैनी नहीं थी।


वह पूरा नहीं हुआ,

पर अब

उसका अधूरापन

मुझे चुभता नहीं था।


शायद यही

उसका रहस्य है,


कि वह पूरा होने के लिए नहीं,

समझे जाने के लिए है।


और जब हम

उसे समझ लेते हैं,


तो वह

पूरा हो या न हो


हम

पूर्ण हो जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

Saturday, 28 March 2026

शून्य की सीढ़ियों पर बैठा हुआ समय

 शून्य की सीढ़ियों पर बैठा हुआ समय


वहाँ

जहाँ कुछ भी नहीं है,

न शुरुआत,

न अंत,

न दिशा,

न कोई नाम


वहीं

कुछ सीढ़ियाँ उभरती हैं,

शून्य की…


न ऊपर जाती हुई,

न नीचे उतरती हुई,

बस

अस्तित्व के बीच

ठहरी हुई।


और उन पर

समय बैठा है,

थका हुआ,

जैसे अनंत यात्राओं के बाद

उसे पहली बार

कहीं रुकने का अवसर मिला हो।


समय

जो कभी रुकता नहीं,

जो सबको आगे धकेलता है,

आज

स्वयं

ठहर गया है।


मैं उसे देखता हूँ


उसकी आँखों में

कोई घड़ी नहीं,

कोई टिक-टिक नहीं,

बस

एक गहरी खामोशी,

जिसमें

सभी क्षण

घुल चुके हैं।


वह कहता नहीं,

पर उसकी चुप्पी

कुछ पूछती है


“जब कुछ भी नहीं है,

तो मैं क्यों हूँ?”


मैं उत्तर खोजता हूँ,

पर उत्तर भी

यहाँ आकर

अपना अर्थ खो देते हैं।


शून्य

कोई रिक्तता नहीं,

बल्कि

संभावनाओं का अनंत गर्भ है,


जहाँ हर घटना

जन्म लेने से पहले

एक विचार बनकर

रुक जाती है।


और समय

वहीं बैठा हुआ

उन विचारों को देखता है,


जैसे कोई वृद्ध

अपने ही अतीत को

दूर से निहार रहा हो।


वह जानता है

कि जो घटेगा,

वह पहले ही

शून्य में बीज बन चुका है।


फिर भी

वह चलता है,

क्योंकि चलना

उसकी प्रकृति है।


पर इस क्षण

वह नहीं चल रहा,

वह बस

बैठा है,


जैसे उसने

अपने ही नियमों को

क्षण भर के लिए

भूल दिया हो।


मैं उसके पास बैठता हूँ


और पहली बार

महसूस करता हूँ

कि समय

कोई बाहरी शक्ति नहीं,


वह

मेरे ही अनुभवों का

एक क्रम है।


जब मैं भागता हूँ,

वह दौड़ता है।

जब मैं रुकता हूँ,

वह ठहर जाता है।


और जब मैं

पूरी तरह

शून्य में उतर जाता हूँ


वह

अपना अस्तित्व

खो देता है।


सीढ़ियाँ अब

सीढ़ियाँ नहीं रहीं,

वे

एक ही बिंदु में

सिमट गई हैं।


जहाँ न ऊपर है,

न नीचे

सिर्फ़

होना है।


और समय

जो अभी तक

उन पर बैठा था,


धीरे-धीरे

उस शून्य में

विलीन हो जाता है।


अब न प्रतीक्षा है,

न स्मृति,

न कोई अगला क्षण


बस

एक निरंतर

अदृश्य वर्तमान।


शायद यही

समय का अंतिम सत्य है,


कि वह

स्वयं भी

शून्य की सीढ़ियों पर

क्षण भर का यात्री है।


और शून्य

वह कहीं नहीं जाता,

वह तो सदा

वहीं रहता है


जहाँ सब कुछ

आकर

अपने अर्थ छोड़ देता है।


मुकेश ,,,,,,