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Friday, 1 May 2026

तेज़ हवा के हस्ताक्षर

 तेज़ हवा के हस्ताक्षर

तेज़ हवा आई

जैसे किसी अधीर कवि की साँस,

जिसे शब्दों का इंतज़ार नहीं,

बस उफनता हुआ कथन चाहिए।

उसने समय की स्लेट पर

धीरे नहीं लिखा,

रेखाएँ खींच दीं

तिरछी, टूटी, बेबाक।

पेड़ों की शाखों को

काग़ज़ बना लिया,

पत्तों को अक्षर,

और आसमान को

एक फटा हुआ पन्ना।

ये हस्ताक्षर

नाज़ुक नहीं होते

इनमें शोर होता है,

एक बेचैन सच्चाई,

जो टिकती नहीं,

पर मिटती भी नहीं।

मैंने उन्हें थामना चाहा,

पर वो मुट्ठी में नहीं आए—

बस एक कंपन छोड़ गए,

जिससे दिल देर तक

धड़कता रहा।

तेज़ हवा के हस्ताक्षर

कहते हैं—

जो स्थिर है,

वो जीवित नहीं।

और जो बिखर रहा है,

वही

अपनी उपस्थिति का

सबसे गहरा प्रमाण है।

मुकेश्,,,,, 

समय की स्लेट पे हवा के हस्ताक्षर

 समय की स्लेट पे हवा के हस्ताक्षर

समय की स्लेट पे

किसने लिखे ये हल्के, मिटते हुए अक्षर

जैसे किसी ने छूकर भी

छुआ न हो।

हवा आई थी अभी-अभी,

अपने अदृश्य उँगलियों से

कुछ लिखकर चली गई

कोई नाम नहीं,

कोई दावा नहीं।

मैंने पढ़ना चाहा,

तो शब्द बिखर गए,

जैसे यादों का धुंधलका

आँखों से पहले ही थक जाए।

ये जो लकीरें हैं—

न पूरी रेखाएँ, न अधूरी,

बस संकेत हैं

कि कुछ था…

और अब नहीं है।

हवा के ये हस्ताक्षर

किसी दस्तावेज़ पर नहीं,

बस उस क्षण पर हैं

जो बीतते ही

अपना अर्थ खो देता है।

और समय—

वो तो बस एक चुपचाप अध्यापक है,

जो हर दिन

नई स्लेट देता है,

पर कभी नहीं बताता

कि पिछली लिखावट का क्या हुआ।

शायद जीवन भी

इन्हीं अदृश्य हस्ताक्षरों का संग्रह है

जहाँ हम सोचते हैं

कि हम लिख रहे हैं,

पर असल में

हवा ही हमें लिख रही होती है।

मुकेश्,,, 

“दरवाज़े” — एक काव्य-चक्र की प्रस्तावना

 “दरवाज़े” — एक काव्य-चक्र की प्रस्तावना

मनुष्य का जीवन
शायद दरवाज़ों की एक लंबी श्रृंखला है
जहाँ हर मोड़ पर
कुछ खुलता है,
कुछ बंद होता है,
और कुछ ऐसा भी होता है
जिसके होने का अहसास तो है,
पर जिसे कभी छुआ नहीं गया।

“दरवाज़े” केवल स्थापत्य का हिस्सा नहीं,
वे मनोभूमि के प्रतीक हैं
सीमाओं और संभावनाओं के बीच खिंची हुई
एक अदृश्य रेखा,
जहाँ निर्णय जन्म लेते हैं
और संकोच अपना घर बनाते हैं।

इस काव्य-श्रृंखला में
दरवाज़े वस्तु नहीं, अनुभव हैं
कभी जंग लगे हुए,
कभी भीतर से बंद,
कभी बिना कुंडी के खुले,
तो कभी ऐसे
जो कभी खुलते ही नहीं।

हर दरवाज़ा
एक अलग मनःस्थिति का रूपक है
भय, स्मृति, विश्वास, थकान,
आकांक्षा और अंततः
आत्मबोध का।

यह श्रृंखला
बाहर की दुनिया से भीतर की यात्रा है
एक क्रमिक अवतरण,
जहाँ आरंभ में हम
दीवारों और कुंडियों को देखते हैं,
पर अंत तक पहुँचते-पहुँचते
समझ जाते हैं
कि असली दरवाज़े
कहीं और हैं।

यहाँ
खोलना केवल एक क्रिया नहीं,
एक स्वीकृति है—
और बंद होना
सिर्फ़ रुकना नहीं,
कभी-कभी स्वयं को बचा लेना भी।

“आख़िरी दरवाज़ा”
इस यात्रा का अंत नहीं,
उस बिंदु का संकेत है
जहाँ दरवाज़ों की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है
जहाँ विभाजन मिटते हैं,
और अनुभव एकरूप हो जाता है।

इस काव्य-चक्र को पढ़ते हुए
पाठक से अपेक्षा नहीं कि वह
हर दरवाज़े को खोले
बल्कि यह कि वह
उनके सामने ठहरे,
उनकी सतह को छुए,
और यह महसूस करे
कि कौन-सा दरवाज़ा
उसके भीतर पहले से मौजूद है।

क्योंकि अंततः
हर दरवाज़ा बाहर नहीं होता,
और हर यात्रा
कहीं जाने के लिए नहीं होती।


मुकेश ,,,,,,,,,,

आख़िरी दरवाज़ा

 आख़िरी दरवाज़ा

आख़िर में
जब सारे दरवाज़े देख लिए जाते हैं
बंद, खुले, जंग लगे,
भीतर से बंद,
और वे भी
जो सिर्फ़ भीतर खुलते हैं

तब एक दरवाज़ा बचता है।

वह किसी दीवार पर नहीं होता,
न किसी घर में,
न किसी स्मृति में पूरी तरह
वह बस होता है,
जैसे अंतिम प्रश्न
जिसका उत्तर टलता रहा हो।

उसके सामने
कोई दस्तक नहीं दी जाती,
कोई आवाज़ नहीं लगाई जाती
क्योंकि यहाँ
कोई “दूसरा” नहीं होता।

मैं उसके पास गया
न डर था, न उत्सुकता,
बस एक अजीब-सी स्वीकृति,
जैसे लंबी यात्रा के बाद
पैर खुद रुक जाएँ।

वह दरवाज़ा
न पूरी तरह बंद था,
न खुला
बस प्रतीक्षा में था,
या शायद
मैं ही प्रतीक्षा में था।

कहते हैं,
आख़िरी दरवाज़ा
खोला नहीं जाता
उसमें प्रवेश किया जाता है।

और जब मैंने
अपना हाथ बढ़ाया,
तो पाया
कि वहाँ कोई हैंडल नहीं था
सिर्फ़ एक हल्की-सी पारदर्शिता,
जैसे दरवाज़ा नहीं,
एक सीमा हो।

मैंने उसे धकेला नहीं
बस आगे बढ़ा,
और वह अपने-आप
मुझमें से गुजर गया।

उसके पार
कुछ भी नहीं था
जिसे शब्दों में रखा जा सके
न कोई कमरा,
न कोई रोशनी,
न अँधेरा भी।

बस एक ऐसा होना
जहाँ “मैं”
धीरे-धीरे
अपनी पकड़ ढीली करता है।

और तभी समझ में आता है
आख़िरी दरवाज़ा
किसी जगह का नहीं,
एक अवस्था का नाम है।

जहाँ पहुँचकर
दरवाज़े भी समाप्त हो जाते हैं,
और यात्राएँ भी।

शायद
यही वह क्षण है
जहाँ
खोलने वाला,
दरवाज़ा,
और पार जाने वाला
तीनों
एक ही हो जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,

दरवाज़ा जो भीतर ही खुलता है

दरवाज़ा जो भीतर ही खुलता है

वह दरवाज़ा
दीवार पर नहीं था
न उसके कोई पल्ले थे,
न कुंडी, न ताला।

पहले-पहल लगा
कि यह दरवाज़ा है ही नहीं,
सिर्फ़ एक खाली जगह है
जहाँ से न कोई आता है,
न कोई जाता है।

फिर धीरे-धीरे समझ में आया
यह बाहर नहीं,
भीतर खुलता है।

मैंने उसे धक्का नहीं दिया,
बस आँखें बंद कीं
और वह खुल गया,
बिना आवाज़,
बिना किसी प्रतिरोध के।

उसके पार
कोई कमरा नहीं था,
न कोई आँगन,
न कोई दूसरा दरवाज़ा

सिर्फ़ मैं था,
थोड़ा और गहरा,
थोड़ा और स्पष्ट।

वहाँ कोई और नहीं था
जिससे छुपाना पड़े,
न कोई चेहरा
जिसे पहनना पड़े।

यह दरवाज़ा
हर बार बाहर नहीं ले जाता,
कभी-कभी
वह हमें
हमारे ही भीतर छोड़ देता है
जहाँ सवाल भी अपने होते हैं,
और उत्तर भी।

अजीब है
इतने सारे दरवाज़े खोलने के बाद
आख़िर में यही समझ आता है
कि सबसे कठिन दरवाज़ा
वह है
जो बाहर नहीं,
भीतर खुलता है।

और जब वह खुलता है,
तो कोई आवाज़ नहीं होती,
कोई आहट नहीं
बस एक हल्की-सी शांति
धीरे-धीरे फैलती है
जैसे किसी ने
भीतर की खिड़की खोल दी हो।

शायद
यही वह दरवाज़ा है
जिसे खोलने के बाद
किसी और दरवाज़े की
ज़रूरत नहीं रह जाती।

मुकेश ,,,,,,,,,,

अंदर से बंद दरवाज़ा

 अंदर से बंद दरवाज़ा

वह दरवाज़ा
बाहर से साधारण लगता था—
लकड़ी, कुंडी, एक पुराना-सा हैंडल,
जैसे किसी भी घर का हो।

पर फर्क इतना था
कि वह भीतर से बंद था।

मैंने दस्तक दी—
धीरे, फिर ज़ोर से,
फिर इंतज़ार किया
कि कोई आकर खोलेगा।

अंदर से
कोई आवाज़ नहीं आई।

कभी-कभी लगा
शायद कोई है ही नहीं,
फिर लगा
शायद कोई है—
जो खुलना नहीं चाहता।

अंदर से बंद दरवाज़े
हमेशा ताले से नहीं बंद होते,
वे बंद होते हैं
विश्वास के टूटने से,
थकान से,
या उस एक क्षण से
जब किसी ने तय किया
कि अब और नहीं।

मैंने कान लगाकर सुना—
अंदर हल्की-सी हरकत थी,
जैसे कोई
अपनी ही चुप्पी में चलता हो।

पर उसने दरवाज़ा नहीं खोला।

शायद
हर अंदर से बंद दरवाज़े के पीछे
कोई कैद नहीं होता,
कभी-कभी
वह किसी का
आख़िरी बचा हुआ सुकून होता है।

और बाहर खड़ा व्यक्ति—
वह सिर्फ़ इंतज़ार कर सकता है,
या लौट सकता है
अपने ही भीतर।

क्योंकि
कुछ दरवाज़े
ज़बरदस्ती नहीं खुलते—
वे खुलते हैं
जब भीतर वाला
फिर से भरोसा करना सीख ले।

शायद
दरवाज़े का खुलना
हाथ की ताक़त से नहीं,
मन की अनुमति से होता है।

दरवाज़ा जो कभी खुला ही नहीं

 दरवाज़ा जो कभी खुला ही नहीं

वह दरवाज़ा
हमेशा से वहीं था
दीवार में जड़ा हुआ,
ठीक आँखों के सामने,
पर जैसे किसी ने
उसे होने भर की अनुमति दी हो,
खुलने की नहीं।

उस पर धूल नहीं जमी,
क्योंकि किसी ने उसे छुआ ही नहीं,
उस पर जंग नहीं चढ़ी,
क्योंकि उसने मौसमों को
अपने भीतर आने ही नहीं दिया।

कभी-कभी
कुछ दरवाज़े इसलिए नहीं खुलते
कि वे बंद हैं,
बल्कि इसलिए
कि उन्हें खोलने का विचार
कभी जन्म ही नहीं लेता।

मैंने कई बार
उसके सामने खड़े होकर सोचा
क्या इसके पार भी
कोई कमरा है?
या यह सिर्फ़ एक भ्रम है,
एक नक़्शा
जिसे दीवार ने ओढ़ लिया है।

उस पर कोई कुंडी नहीं,
कोई ताला भी नहीं
बस एक चुप्पी है,
इतनी गहरी
कि आवाज़ भी
उससे टकराकर लौट आती है।

कहते हैं,
कुछ दरवाज़े उम्र भर बंद रहते हैं,
क्योंकि हम उन्हें खोलने से नहीं,
उनके खुल जाने से डरते हैं।

क्योंकि अगर वह खुल गया,
तो शायद
हम वह नहीं रहेंगे
जो अब तक थे।

और अगर वह कभी खुला ही नहीं,
तो एक संभावना
हमेशा जीवित रहेगी
कि उसके पीछे
कुछ असाधारण था।

शायद
हर जीवन में
एक ऐसा दरवाज़ा होता है
जो कभी खुलता नहीं,
पर हमें
हमारी सीमाओं का
अहसास कराता रहता है।

मुकेश ,,,,,,,,,,