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महाभारत — विराटपर्व — समेकित शोध-निष्कर्ष : पहचान से पुनर्स्थापना तक

 महाभारत — विराटपर्व — समेकित शोध-निष्कर्ष : पहचान से पुनर्स्थापना तक विराटपर्व महाभारत का चौथा पर्व है। कथा की दृष्टि से यह वनपर्व के बाद आने वाला अपेक्षाकृत छोटा पर्व है, किन्तु महाभारत की सम्पूर्ण संरचना में इसका स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यहाँ पाण्डवों के जीवन में एक ऐसी अवस्था आती है जिसमें उनसे उनका राज्य पहले ही छिन चुका है, वनवास समाप्त हो चुका है और अब उन्हें अपने अस्तित्व को ही एक वर्ष के लिए सार्वजनिक संसार से छिपाना है। इसीलिए विराटपर्व को केवल अज्ञातवास का पर्व कहना पर्याप्त नहीं है। यह वास्तव में पहचान, शक्ति, संयम, मर्यादा और राजनीतिक पुनर्स्थापना का पर्व है। वनपर्व ने पाण्डवों को बाहरी सत्ता से दूर करके उनके व्यक्तित्व का पुनर्निर्माण किया था। विराटपर्व में उसी व्यक्तित्व की परीक्षा होती है—क्या राज्य, राजसी वस्त्र, अस्त्र और नाम के बिना भी व्यक्ति वही रहता है? महाभारत का उत्तर स्पष्ट है—हाँ। युधिष्ठिर कंक बन जाते हैं, भीम वल्लभ, अर्जुन बृहन्नला, नकुल अश्वपाल, सहदेव गोपाल और द्रौपदी सैरन्ध्री। उनके नाम बदल जाते हैं, उनके कार्य बदल जाते हैं, उनका सामाजिक स्थान ...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 14 : अभिमन्यु–उत्तरा विवाह से उपप्लव्य तक — विराटपर्व का राजनीतिक अर्थ

महाभारत — विराटपर्व — भाग 14 : अभिमन्यु–उत्तरा विवाह से उपप्लव्य तक — विराटपर्व का राजनीतिक अर्थ विराटपर्व की कथा यदि केवल अज्ञातवास की समाप्ति पर रोक दी जाए, तो उसका सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक पक्ष छूट जाएगा। पाण्डवों की पहचान खुल चुकी है। विराट को अब पता है कि उसके यहाँ रहने वाले लोग साधारण सेवक नहीं, कुरुवंश के निर्वासित राजकुमार थे। अर्जुन ने उत्तरा को अपनी पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करने का निर्णय लिया है और अभिमन्यु उसका वर बनने वाला है। अब प्रश्न बदल जाता है।  पाण्डवों ने तेरह वर्ष पूरे कर लिए—अब आगे क्या? महाभारत का उत्तर है—  उपप्लव्य। यहीं से विराटपर्व निजी संकट से निकलकर सार्वजनिक राजनीति में प्रवेश करता है। TEXT — विवाह से राजनीतिक सभा तक विराट अर्जुन के प्रस्ताव को स्वीकार करता है। युधिष्ठिर भी इस सम्बन्ध को अपनी स्वीकृति देते हैं। इसके बाद महाभारत बताता है कि पाण्डवों की ओर से वासुदेव कृष्ण तथा उनके मित्रों और सम्बन्धियों को निमन्त्रण भेजे गए और विराट ने भी अपने सम्बन्धियों को आमन्त्रित किया। तेरहवाँ वर्ष पूरा होने के बाद पाण्डव उपप्लव्य नामक विराट के नगर में र...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 13 : उत्तरा–अर्जुन प्रसंग — विवाह से इनकार क्यों?

  महाभारत — विराटपर्व — भाग 13 : उत्तरा–अर्जुन प्रसंग — विवाह से इनकार क्यों? विराट के सामने पाण्डवों की पहचान खुल चुकी है। राजा को यह जानकर अत्यन्त प्रसन्नता होती है कि जिन लोगों को उसने अपने राज्य में सामान्य सेवक समझकर रखा था, वे वास्तव में युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी हैं। विराट पाण्डवों से अपने अज्ञान में हुई भूलों के लिए क्षमा चाहता है और उनके साथ मैत्री का प्रस्ताव रखता है। वह अपना राज्य और सम्पत्ति तक पाण्डवों को देने की इच्छा प्रकट करता है। इसी क्रम में वह अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन से करने का प्रस्ताव रखता है। यहीं विराटपर्व का एक अत्यन्त सूक्ष्म प्रसंग सामने आता है। अर्जुन उस विवाह को स्वीकार नहीं करता। लेकिन उसका उत्तर केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं है। इसमें गुरु-शिष्य सम्बन्ध, स्त्री की प्रतिष्ठा, सामाजिक धारणा, आत्मसंयम और राजनीतिक सम्बन्ध—सभी एक साथ उपस्थित हैं। TEXT — मूल पाठ : विराट का प्रस्ताव विराट अर्जुन के सामने अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह प्रस्ताव रखता है। अर्जुन उत्तर देता है—  उत्तरा मम पुत्रवधू भवतु। विस्तृत पाठ में उसका तर्क और ...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 12 : पाण्डवों की पहचान का उद्घाटन — विराट के सामने खुलता हुआ अज्ञातवास

  महाभारत — विराटपर्व — भाग 12 : पाण्डवों की पहचान का उद्घाटन — विराट के सामने खुलता हुआ अज्ञातवास विराटपर्व का आरम्भ जिस प्रश्न से हुआ था, उसका उत्तर अब मिलने वाला है। पाण्डवों ने अपना राज्य खोया था, वन में बारह वर्ष बिताए थे और तेरहवें वर्ष में ऐसी शर्त के भीतर प्रवेश किया था जिसमें उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा उनकी अपनी पहचान को छिपाए रखना थी। उन्होंने राजा होकर सभासद का जीवन जिया, महाबली होकर रसोइए का काम किया, महारथी होकर नर्तक-शिक्षक का रूप धारण किया, राजकुमार होकर घोड़ों और गौओं की सेवा की और द्रौपदी जैसी महारानी ने सैरन्ध्री बनकर पराई स्त्रियों की सेवा की। अब वही लोग फिर राजसी वस्त्रों में विराट के सामने बैठने वाले हैं। इसलिए यह केवल पहचान का उद्घाटन नहीं है। यह उस प्रयोग का परिणाम है जिसमें महाभारत ने पूछा था— क्या पद छिन जाने से व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप भी छिन जाता है? TEXT — मूल पाठ : विजय किसकी थी? कौरवों को पराजित करके अर्जुन विराट की गौ-सम्पत्ति वापस ले आते हैं। लेकिन नगर में प्रवेश करने से पहले वे उत्तर को एक असाधारण निर्देश देते हैं। अर्जुन कहता है कि पाण्डवों के जीवित...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 11 : अर्जुन और कौरव सेना — शक्ति का प्रदर्शन नहीं, उद्देश्य का अनुशासन

  महाभारत — विराटपर्व — भाग 11 : अर्जुन और कौरव सेना — शक्ति का प्रदर्शन नहीं, उद्देश्य का अनुशासन शमी-वृक्ष से गाण्डीव निकल चुका है। बृहन्नला अब अर्जुन है। उत्तर उसका सारथि है। सामने कौरवों की विशाल सेना है—भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, अश्वत्थामा, दुर्योधन और अनेक महारथी। दूसरी ओर केवल अर्जुन है। लेकिन यह केवल संख्या का अन्तर नहीं है। यह उस एक वर्ष के संयम और अर्जित शक्ति के बीच का निर्णायक क्षण है। एक वर्ष पहले अर्जुन ने अपने अस्त्र छिपाए थे। अब वही अस्त्र उसके हाथ में हैं। और प्रश्न यह है— क्या अर्जुन अपनी सम्पूर्ण शक्ति का प्रयोग करेगा? महाभारत का उत्तर अत्यन्त रोचक है— नहीं। वह युद्ध करेगा, विजय प्राप्त करेगा, कौरवों को परास्त करेगा; लेकिन उसका लक्ष्य दुर्योधन की हत्या या कौरवों का विनाश नहीं है। उसका लक्ष्य है— विराट का गौधन वापस लाना और अपने अज्ञातवास की मर्यादा पूरी करना। यहीं से अर्जुन के चरित्र में शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण गुण सामने आता है— उद्देश्य का अनुशासन। TEXT — युद्धभूमि में अर्जुन अर्जुन शमी की प्रदक्षिणा करके सभी अस्त्र ग्रहण करता है और उत्तर को सारथि बनाकर युद्धभूम...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 10 : शमी वृक्ष से गाण्डीव तक — बृहन्नला का अर्जुन में पुनर्जन्म

महाभारत — विराटपर्व — भाग 10 : शमी वृक्ष से गाण्डीव तक — बृहन्नला का अर्जुन में पुनर्जन्म त्रिगर्तों से युद्ध करके विराट दक्षिण दिशा में चला गया है। उसी समय कौरवों ने दूसरी ओर से मत्स्यराज के गौधन पर आक्रमण कर दिया है। राजधानी में विराट का पुत्र उत्तर है। उसके पास उत्साह है, राजकुमार होने का गर्व है, लेकिन युद्ध का वास्तविक अनुभव नहीं। और उसके साथ सारथि के रूप में कौन है? बृहन्नला। राजमहल की स्त्रियों को नृत्य और संगीत सिखाने वाली एक तथाकथित नपुंसक नर्तकी। किन्तु पाठक जानता है— वह बृहन्नला नहीं, अर्जुन है। अब वह क्षण आ गया है जब एक वर्ष से छिपी हुई शक्ति को फिर से अपने वास्तविक रूप में लौटना है। TEXT — शमी वृक्ष की ओर उत्तर और बृहन्नला कौरव सेना की ओर बढ़ते हैं। दूर से कौरवों की विशाल सेना दिखाई देती है। भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, दुर्योधन और अनेक महारथी वहाँ उपस्थित हैं। उत्तर का आत्मविश्वास टूट जाता है। वह युद्धभूमि से भागना चाहता है। यही वह क्षण है जहाँ बृहन्नला उसे रोकती है। अर्जुन उसे उस शमी-वृक्ष की ओर ले जाता है जहाँ एक वर्ष पूर्व पाण्डवों ने अपने अस्त्र छिपाए थे। उत्तर उस वृक्ष प...

महाभारत — विराटपर्व — भाग 9 : त्रिगर्तों का आक्रमण —

  महाभारत — विराटपर्व — भाग 9 : त्रिगर्तों का आक्रमण — जब अज्ञातवास की शक्ति पहली बार युद्धभूमि में उतरती है कीचक के वध के बाद विराटपर्व का केन्द्र फिर बदलता है। अब तक संघर्ष मुख्यतः विराटनगर के भीतर था—द्रौपदी, कीचक और पाण्डवों की छिपी हुई शक्ति के बीच। अब संघर्ष राज्य की सीमा के बाहर पहुँचता है। त्रिगर्तराज सुशर्मा विराट के राज्य पर आक्रमण करता है और गौधन हरण करने लगता है। यह केवल पशुधन की चोरी नहीं है। यह विराट की राजकीय प्रतिष्ठा, आर्थिक शक्ति और सैन्य सामर्थ्य पर सीधा आघात है। और इसी आक्रमण के कारण पहली बार पाण्डवों को अपने छद्मवेश के भीतर रहते हुए युद्ध करना पड़ता है। यहीं विराटपर्व का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है— जिस शक्ति को छिपाने के लिए पाण्डवों ने अज्ञातवास स्वीकार किया था, उसी शक्ति से अब उन्हें अपने आश्रयदाता की रक्षा करनी है। TEXT — मूल महाभारत-पाठ महाभारत के पाठक्रम में दुर्योधन की सभा में पहले गुप्तचरों की सूचना आती है। उसके बाद कौरव पक्ष में यह विचार होता है कि विराट की स्थिति का लाभ उठाया जा सकता है। त्रिगर्तराज सुशर्मा पहले से विराट से वैर रखता था। कीचक की ...