हरिवंशपुराण — द्वितीय खंड - भाग 2 : आलोचनात्मक संस्करण — Critical Edition और उसका महत्त्व
हरिवंशपुराण — द्वितीय खंड - भाग 2 : आलोचनात्मक संस्करण — Critical Edition और उसका महत्त्व हरिवंश के शोधपूर्ण अध्ययन में आलोचनात्मक संस्करण का स्थान आधारशिला के समान है। किसी प्राचीन ग्रंथ को पढ़ते समय सामान्य पाठक प्रायः उस संस्करण को स्वीकार कर लेता है जो उसके सामने उपलब्ध है; लेकिन शोधकर्ता के लिए पहला प्रश्न यह होता है कि यह पाठ किस आधार पर तैयार हुआ है? हरिवंश के संबंध में यह प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसकी पाठ-परंपरा एकरूप नहीं रही। अलग-अलग पांडुलिपियों और मुद्रित परंपराओं में पाठ के स्वरूप, अध्याय-विन्यास और कहीं-कहीं सामग्री में अंतर दिखाई देता है। अतः शोध के लिए केवल एक लोकप्रिय संस्करण पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। Critical Edition क्या है? ‘Critical Edition’ का सामान्य अर्थ ऐसा संस्करण है जिसे उपलब्ध पांडुलिपियों और अन्य पाठ-साक्ष्यों की तुलनात्मक जाँच के बाद संपादित किया गया हो। यह किसी एक पांडुलिपि की प्रतिलिपि नहीं होता। संपादक अनेक पांडुलिपियों में उपलब्ध पाठ को सामने रखता है। जहाँ पाठ समान है, वहाँ समानता दर्ज होती है; जहाँ भिन्नता है, ...