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Friday, 27 March 2026

मैं रास्ता था और तुम सफ़र बन गए

 मैं रास्ता था और तुम सफ़र बन गए


मैं रास्ता था

सीधा, सादा,

किसी मंज़िल की ओर बढ़ता हुआ,

जिसे बस चलना आता था,

रुकना नहीं।


और तुम

एक अनजानी सी आहट बनकर आए,

जैसे किसी मोड़ पर

अचानक

ज़िंदगी खड़ी मिल जाए।


मैं रास्ता था

जिस पर लोग गुज़रते थे,

अपने-अपने क़दमों की धूल छोड़कर,

और आगे बढ़ जाते थे

बिना पीछे देखे।


मगर तुम

तुम ठहरे,

तुमने मेरी ख़ामोशी को सुना,

मेरी ख़ालीपन को पढ़ा,

और फिर…


तुम सफ़र बन गए।


अब हर क़दम

सिर्फ़ चलना नहीं रहा,

एक एहसास बन गया

जिसमें तुम्हारी आहट,

तुम्हारी मुस्कान,

तुम्हारी ख़ामोशी भी शामिल थी।


मैं रास्ता था

जिसे अपनी दिशा का इल्म था,

मगर तुमने आकर

हर मोड़ को सवाल बना दिया।


अब हर दिशा

तुम्हारी तरफ़ जाती थी,

और हर मंज़िल

तुम्हारे नाम से शुरू होती थी।


तुम सफ़र बन गए

और मैं

खुद को भूलने लगा,


क्योंकि अब

चलना सिर्फ़ चलना नहीं था,

तुम्हारे साथ होना था।


वक़्त भी बदल गया

पहले वो बस गुजरता था,

अब वो ठहर-ठहर कर

हमारे लम्हों को

महसूस करने लगा।


मैं रास्ता था

जो कभी थकता नहीं था,

मगर अब

हर थकान में

तुम्हारी तलाश होने लगी।


तुम सफ़र बन गए

तो हर दूरी

क़रीब लगने लगी,

हर तन्हाई

आधी रह गई।


मगर सफ़र…

हमेशा साथ नहीं चलता,

कभी-कभी

वो किसी मोड़ पर

खामोशी से उतर जाता है।


और वही हुआ


एक दिन

तुम चुपचाप

किसी और दिशा में मुड़ गए,

बिना कुछ कहे,

बिना कोई निशान छोड़े।


और मैं

फिर वही रास्ता बन गया,


मगर अब

पहले जैसा नहीं था।


अब हर क़दम में

तुम्हारी याद की हलचल थी,

हर मोड़ पर

तुम्हारी कमी का सन्नाटा।


मैं रास्ता था

और तुम सफ़र बन गए,


फिर तुम

कहीं गुम हो गए,


मगर अजीब बात ये है


कि अब भी

जब कोई मुझ पर चलता है,

तो उसे

मेरे भीतर

तुम्हारा एहसास मिलता है।


जैसे तुम

कभी गए ही नहीं,

बस

मेरी रूह में उतर गए हो।


मैं रास्ता था

और तुम सफ़र बन गए…


और अब

मैं सिर्फ़ रास्ता नहीं रहा,


मैं एक कहानी हूँ

जिसे हर मुसाफ़िर

चलते-चलते महसूस करता है,


मगर समझ

बहुत कम लोग पाते हैं।


मुकेश ,,,,,,

तुम थे या बस एहसास की कोई चाल थी

 तुम थे या बस एहसास की कोई चाल थी


तुम थे

या बस एहसास की कोई चाल थी,

जो दिल ने खुद ही चली

और फिर

खुद ही उसमें उलझता रहा?


कभी लगता है

तुम सच में थे

किसी सुबह की नर्म धूप की तरह,

जो बिना आवाज़ के

आँगन में उतर आती है,


और कभी…

यक़ीन नहीं होता

कि तुम कभी थे भी।


तुम्हारी याद

कोई साफ़ तस्वीर नहीं,

एक धुंधला सा अहसास है—

जैसे आईने पर जमी भाप

जिसमें चेहरा दिखता तो है,

मगर पहचान में नहीं आता।


तुम थे

या बस मेरी तन्हाई

ने तुम्हारा ख़्याल गढ़ लिया था,

जैसे कोई बच्चा

अँधेरे में

अपने ही साए से खेलता है।


मैंने तुम्हें

हर उस लम्हे में ढूँढा

जहाँ दिल थोड़ा ज़्यादा धड़कता था,

हर उस खामोशी में

जहाँ आवाज़ होने की गुंजाइश थी।


मगर तुम

हर बार

थोड़ा और धुँधले हो जाते,

थोड़ा और दूर।


तुम्हारी हँसी…

क्या सच में सुनी थी मैंने,

या वो भी

मेरे ख़्याल की कोई गूँज थी?


तुम्हारी आँखें…

क्या सच में मिली थीं मेरी आँखों से,

या वो भी

एक ख़्वाब की परत थी

जो जागते ही उतर गई?


तुम थे—

या बस एहसास की कोई चाल थी,

जो दिल ने

अपने ही ख़िलाफ़ चली?


कभी-कभी

मैं खुद से पूछता हूँ

अगर तुम सच में थे,

तो अब क्यों नहीं हो?


और अगर तुम कभी थे ही नहीं—

तो फिर

ये दर्द कहाँ से आया?


ये जो सीने में

एक खाली जगह है,

जो हर साँस के साथ

भरती भी है,

और खाली भी रहती है


ये किसकी निशानी है?


तुम थे

या बस एक लम्हा,

जो गुज़रते हुए

अपने होने का यक़ीन दिला गया,

और जाते हुए

सब कुछ साथ ले गया।


शायद तुम

कोई शख़्स नहीं थे,

बस एक एहसास थे—

जो मेरे अंदर ही पैदा हुआ,

और मेरे अंदर ही खो गया।


या शायद…

तुम सच में थे,

मगर वक़्त ने

तुम्हें इतनी सफ़ाई से मिटाया

कि अब

बस तुम्हारा एहसास रह गया है।


तुम थे

या बस एहसास की कोई चाल थी…


इस सवाल का जवाब

शायद कभी नहीं मिलेगा,

क्योंकि कुछ सच

पूरे नहीं होते


और कुछ झूठ

इतने ख़ूबसूरत होते हैं

कि दिल उन्हें

सच मान लेना चाहता है।


और मैं…

अब भी वहीं खड़ा हूँ,

उसी सवाल के साथ—


तुम थे…

या बस

मेरी रूह की

एक ख़ामोश चाल थी?


मुकेश ,,,,

बारिश, चाय और एक अनकहा रिश्ता

 बारिश, चाय और एक अनकहा रिश्ता


बारिश हो रही थी

धीरे-धीरे,

जैसे आसमान

अपने ही ख़्यालों में भीग रहा हो।


खिड़की के शीशे पर

बूँदें दस्तक दे रही थीं,

और अंदर

चाय की भाप

ख़ामोशी को गर्म कर रही थी।


मैं बैठा था

एक अधूरी सी शाम के साथ,

हाथ में चाय का प्याला,

और दिल में

तुम्हारा एक नाम…

जो आज भी

लफ़्ज़ नहीं बन पाया।


तुम सामने थीं

या शायद नहीं भी,

क्योंकि तुम्हारी मौजूदगी

हमेशा इस तरह होती है

दिखती कम,

महसूस ज़्यादा।


बारिश की हर बूँद

जैसे कुछ कहती थी,

और हम

उसे सुनने की कोशिश में

और भी ख़ामोश हो जाते थे।


चाय ठंडी हो रही थी,

मगर हमारी उंगलियाँ

अब भी उसके किनारों को थामे थीं,

जैसे उस गर्मी में

कोई रिश्ता तलाश रही हों।


वो रिश्ता

जिसका कोई नाम नहीं,

कोई इज़हार नहीं,

बस एक एहसास है…

जो हर बार

बिना बोले ही

सब कुछ कह जाता है।


तुमने कुछ कहा नहीं,

मैंने भी कुछ पूछा नहीं

मगर उस खामोशी में

इतनी बातें थीं

कि अगर लफ़्ज़ होते

तो शायद

रिश्ता टूट जाता।


बारिश तेज़ हो गई थी,

जैसे आसमान

अपना दिल हल्का कर रहा हो,

और हम

अपनी-अपनी चुप्पियों में

भरे हुए थे।


तुम्हारी आँखों में

कुछ था

शायद एक सवाल,

या शायद एक जवाब,

जो दोनों ही

बयान होने से डर रहे थे।


मैंने चाय का आख़िरी घूँट लिया,

और उस गर्मी में

तुम्हारी नज़दीकी महसूस की

जैसे कोई एहसास

हाथों से होकर

सीधे दिल तक पहुँच गया हो।


बारिश, चाय…

और ये अनकहा रिश्ता


तीनों में

एक अजीब सी समानता थी,

तीनों ही

लम्हों के लिए आते हैं,

मगर अपने पीछे

एक गहरी याद छोड़ जाते हैं।


तुम उठीं

जैसे कोई ख़्वाब

धीरे-धीरे आँखों से उतरता है,

और मैं…

उसी कुर्सी पर बैठा रहा,

हाथ में खाली प्याला,

और दिल में

वही भरी हुई खामोशी।


बारिश रुक गई थी,

मगर उसकी महक

अब भी हवा में थी


जैसे तुम चली गई हो,

मगर तुम्हारा एहसास

अब भी यहीं कहीं ठहरा हो।


और मैं समझ गया


कि कुछ रिश्ते

बनते नहीं,

कहे नहीं जाते,

बस…


बारिश की तरह आते हैं,

चाय की तरह ठहरते हैं,

और यादों की तरह

हमेशा के लिए

दिल में बस जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,

I Am Silence… and You Are Its Voice

 I Am Silence… and You Are Its Voice


I am silence…

a still, unmoving lake,

where stones of words

sink deep—

yet raise no ripples.


And you—

the first drop

falling upon its surface,

turning stillness

into a melody.


I am that emptiness

resting quietly

in some corner of the heart,

where even echoes

fear to arrive.


And you—

that gentle knock,

which never touches the door,

yet finds its way within.


I am silence…

that has witnessed so much,

yet spoken nothing,

burying every question

within itself.


And you—

the answer

that never reaches the lips,

yet is heard

in every heartbeat.


Sometimes,

when I listen to myself,

I find only quiet—

like a deserted city

lost in its own echo.


But when you

come close to me,

that same silence

slowly begins

to take shape as words.


I am silence…

one that asks for time,

for patience,

and a little solitude

to be understood.


And you—

the voice

that reaches the heart

without waiting at all.


Your presence

is not noise,

not a disturbance—

but a soft rhythm

resonating

within my silence.


I never called you,

for I feared

that giving you a name

might make me lose you.


And yet,

you kept flowing into me,

like a melody

that settles in the heart

on its own.


I am silence…

not incomplete without you,

but lifeless, perhaps.


And you—

a voice without me,

yet maybe

even you need someone

to truly hear you.


We are

two halves

of the same story—

I, the stillness,

and you, the flow.


I am silence…

and you are its voice.


Together,

we become a raga—

not something heard,

but something deeply felt.


And perhaps…

this is what we are:


You teach me

how to speak,

and I give you

your depth.


I am silence…

and you are its voice—


two sensations

of the same soul,

never truly separate,

even in distance.


mukesh,,,,

मैं ख़ामोशी और तुम उसकी आवाज़

 मैं ख़ामोशी और तुम उसकी आवाज़


मैं ख़ामोशी…

एक ठहरी हुई झील,

जिसमें लफ़्ज़ों के पत्थर

डूबकर भी

कोई लहर नहीं उठाते।


और तुम

उस झील पर गिरती

पहली बूंद की आहट,

जो सन्नाटे को

राग में बदल देती है।


मैं वो खालीपन

जो दिल के किसी कोने में

बिना वजह ठहरा रहता है,

जहाँ आवाज़ें

आने से डरती हैं।


और तुम

वही नर्म सी दस्तक,

जो दरवाज़ा खटखटाए बिना ही

अंदर चली आती है।


मैं ख़ामोशी…

जिसने बहुत कुछ देखा है,

मगर कहा कुछ भी नहीं,

जिसने हर सवाल को

अपने भीतर दफ़्न किया है।


और तुम

वही जवाब,

जो लबों तक नहीं आता,

मगर हर धड़कन में

सुनाई देता है।


कभी-कभी

मैं खुद को सुनता हूँ

तो सिर्फ़ सन्नाटा मिलता है,

जैसे कोई वीरान शहर

अपनी ही गूँज में खो गया हो।


मगर जब तुम

मेरे क़रीब होती हो

तो वही सन्नाटा

धीरे-धीरे

अल्फ़ाज़ में ढलने लगता है।


मैं ख़ामोशी…

जिसे समझने के लिए

वक़्त चाहिए,

सब्र चाहिए,

और थोड़ी सी तन्हाई भी।


और तुम

वो आवाज़,

जो बिना किसी सब्र के

सीधे दिल तक पहुँच जाती है।


तुम्हारी मौजूदगी

कोई शोर नहीं है,

कोई हंगामा नहीं


वो तो बस

एक धीमी-सी लय है,

जो मेरी ख़ामोशी के अंदर

कहीं गूंजती रहती है।


मैंने तुम्हें

कभी पुकारा नहीं,

क्योंकि मुझे डर था

कि कहीं आवाज़ देकर

मैं तुम्हें खो न दूँ।


और तुम

बिना पुकारे ही

मेरे भीतर उतरती रहीं,

जैसे कोई धुन

जो खुद-ब-खुद

दिल में बस जाती है।


मैं ख़ामोशी…

तुम्हारे बिना

अधूरी नहीं,

मगर बेजान ज़रूर हूँ।


और तुम

मेरे बिना

आवाज़ तो हो,

मगर शायद

तुम्हें भी कोई सुनने वाला चाहिए।


हम दोनों

एक ही कहानी के

दो पहलू हैं,

जहाँ मैं ठहराव हूँ,

और तुम बहाव।


मैं ख़ामोशी…

और तुम उसकी आवाज़


दोनों मिल जाएँ

तो एक राग बनता है,

जो सुना नहीं जाता,

महसूस किया जाता है।


और शायद…

यही हमारा रिश्ता है—


तुम मुझे बोलना सिखाती हो,

और मैं तुम्हें

गहराई देता हूँ।


मैं ख़ामोशी…

और तुम उसकी आवाज़


एक ही रूह के

दो अलग-अलग अहसास,

जो जुदा होकर भी

कभी जुदा नहीं होते।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

तुम ख़्वाब नहीं — एक अधूरी ताबीर हो

 

तुम ख़्वाब नहीं — एक अधूरी ताबीर हो



तुम ख़्वाब नहीं

एक अधूरी ताबीर हो,

जिसे नींद ने तो देखा

मगर सुबह ने समझा नहीं।


तुम वो लम्हा हो

जो पलकों पर ठहरता तो है,

मगर अल्फ़ाज़ की सरहद तक आते-आते

ख़ुद में सिमट जाता है।


मैंने तुम्हें

हर रात की तह में खोजा है—

जहाँ ख़ामोशी

अपनी सबसे गहरी आवाज़ में बोलती है,

और दिल

बिना किसी वजह के धड़कता है।


तुम वहीं थीं—

एक धुँधली सी रौशनी बनकर,

जो दिखाई तो देती थी,

मगर पकड़ में नहीं आती थी।


तुम ख़्वाब नहीं

क्योंकि ख़्वाब तो टूट जाते हैं,

और तुम…

हर टूटन के बाद भी

किसी और शक्ल में लौट आती हो।


कभी एक आह बनकर,

कभी एक मुस्कान के कोने में,

कभी किसी पुराने गीत की

भूली हुई धुन में…


तुम हर जगह हो,

मगर कहीं भी मुकम्मल नहीं।


मैंने तुम्हें

वक़्त की सिलवटों में भी देखा है

जहाँ बीते हुए कल

आज के कंधे पर सिर रखकर सो जाते हैं,

और आने वाला कल

एक मासूम सवाल बनकर खड़ा रहता है।


तुम वहाँ भी थीं

जैसे जवाब,

जिसे किसी ने पूछा ही नहीं।


तुम ताबीर हो

मगर अधूरी,

जैसे किसी किताब का आख़िरी सफ़ा

हवा ने उड़ा दिया हो,

या जैसे किसी दुआ का “आमीन”

लबों तक आकर रुक गया हो।


मैंने चाहा

कि तुम्हें पूरा कर दूँ

अपने लफ़्ज़ों से,

अपने एहसास से,

अपने वजूद की हर दरार से…


मगर हर बार

तुम मेरी पकड़ से

ठीक उसी तरह फिसल गईं

जैसे रेत

हथेलियों के बीच से निकल जाती है।


शायद तुम पूरी होने के लिए नहीं बनीं,

शायद तुम्हारा अधूरापन ही

तुम्हारी असलियत है।


क्योंकि

जो मुकम्मल हो जाए

वो कहानी नहीं रहता,

और जो अधूरा रह जाए

वही रूह में बसता है।


तुम ख़्वाब नहीं

एक अधूरी ताबीर हो,

जिसे समझने के लिए

नींद नहीं,

जागना पड़ता है।


और मैं…

अब भी जाग रहा हूँ,

उसी ताबीर की तलाश में

जो शायद कभी पूरी न हो


मगर फिर भी

मेरी हर रात को

एक वजह दे जाती है।


मुकेश ,,,,,,,

All This Is Worn by the One

 All This Is Worn by the One

(Essence of the first mantra of the Isha Upanishad, from the Shukla Yajurveda)


All this

whatever moves

in this moving world

is clothed

in the unseen.


Not owned,

not held,

not gathered into names

but quietly worn

by something

that cannot be possessed.


We arrive

with open hands,

yet spend a lifetime

learning to close them.


We say mine

to dust,

to breath,

to fleeting arrangements of light

forgetting

the sky never belonged

to the bird.


Enjoy, then

but lightly.

Taste the sweetness

without swallowing the world.


Let each moment

pass through you

like wind through a window

felt,

but not captured.


For the more you grasp,

the less remains—

and the less you claim,

the more reveals itself.


Desire is a quiet thief—

it names what was free

and calls it possession.


But nothing here

was ever yours to take

not even the self

you protect so carefully.


So walk gently

among borrowed forms,

through borrowed time.


Delight in what appears,

but do not cling

for even joy

is not meant to be stored.


All this

already whole,

already given—

asks only this:


to be seen

without hunger,

to be lived

without ownership,

to be loved

without the weight of mine.


mukesh,,,,,,,