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Sunday, 17 May 2026

कई दिनों से मैं उस पुरानी कुर्सी को फेंक देना चाहता हूँ।

 कई दिनों से मैं उस पुरानी कुर्सी को फेंक देना चाहता हूँ।

लकड़ी जगह-जगह से उखड़ गई है, एक बाँह हल्की-सी हिलती है, और बैठने पर उससे एक बहुत धीमी चरमराहट उठती है—जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में करवट ले रहा हो।

लेकिन हर बार, जब मैं उसे बाहर रखने के लिए हाथ बढ़ाता हूँ, कुछ मुझे रोक देता है।

शायद इसलिए कि उस कुर्सी पर अब सिर्फ़ एक वस्तु नहीं बची।

वहाँ समय बैठा है।

कमरे में नई चीज़ें आती रहीं—नई किताबें, नया पर्दा, नया फ़ोन, नई आदतें तक।

लेकिन वह कुर्सी हमेशा वहीं रही, खिड़की के पास, उसी कोण पर मुड़ी हुई जहाँ शाम की धूप आकर थोड़ी देर ठहरती है।

मुझे याद है, कभी पिता उस पर बैठकर अख़बार पढ़ते थे।

फिर एक समय आया जब मैं देर रात उसी पर बैठकर लिखने लगा।

और अब कई बार ऐसा होता है कि मैं उस कुर्सी को खाली देखता हूँ और अजीब तरह से महसूस करता हूँ कि कोई अभी-अभी वहाँ से उठा है।

मनुष्य जिन चीज़ों के साथ बहुत समय बिताता है, वे धीरे-धीरे वस्तुएँ नहीं रहतीं।

वे हमारी अनुपस्थितियों की आकृति बन जाती हैं।

कभी-कभी रात में जब पूरा घर सो जाता है, मैं सिर्फ़ उस कुर्सी को देखता रहता हूँ।

उसकी पीठ पर हल्की धूल जमी होती है।

लकड़ी के किनारों पर उँगलियों के पुराने निशान हैं।

और उसकी एक टाँग थोड़ी छोटी है, इसलिए कोई भी उस पर बैठे तो वह बहुत हल्का-सा डगमगाती है।

अजीब बात है—मनुष्य भी शायद ऐसे ही होते हैं।

ऊपर से साबुत दिखते हुए, भीतर कहीं थोड़ा असंतुलित।

मैंने कई बार सोचा है,

क्या हम सच में चीज़ों को सँभालकर रखते हैं,

या वे हमें सँभाले रखती हैं?

क्योंकि सच यह है कि उस कुर्सी को हटाने का मतलब सिर्फ़ कमरे में जगह बनाना नहीं होगा।

उसका मतलब होगा यह स्वीकार करना कि कुछ समय सचमुच बीत चुका है।

कि जिन लोगों की उपस्थिति कभी इस घर की हवा में घुली रहती थी, वे अब सिर्फ़ स्मृति हैं।

और मनुष्य स्मृतियों से ज़्यादा किसी चीज़ से नहीं डरता।

उन्हें खो देने से भी नहीं—

उनके पूरी तरह सच हो जाने से।

बाहर की दुनिया लगातार बदल रही है।

नए मकान बन रहे हैं, नए लोग शहरों में आ रहे हैं, पुरानी दुकानें बंद हो रही हैं।

लेकिन इस कमरे में वह कुर्सी अब भी वैसी ही रखी है,

जैसे समय यहाँ आकर थोड़ा थम गया हो।

कभी-कभी मुझे लगता है,

हम सबके जीवन में एक ऐसी कुर्सी होती है

कोई वस्तु, कोई व्यक्ति, कोई जगह

जिसे हम इसलिए नहीं छोड़ पाते क्योंकि उसके चले जाने के बाद हमें अपने वर्तमान के साथ अकेले रहना पड़ेगा।

आज शाम फिर मैंने सोचा था कि उसे बाहर रख दूँगा।

मैंने उसके हत्थे पर हाथ भी रखा।

लकड़ी ठंडी थी।

लेकिन फिर खिड़की से आती हवा थोड़ी तेज़ हुई,

कुर्सी बहुत हल्के से हिली,

और एक पल के लिए लगा

जैसे किसी ने अभी-अभी वहाँ बैठकर उठने से पहले अपनी जगह ठीक की हो।

मैंने हाथ वापस खींच लिया।

शायद कुछ चीज़ें इसलिए नहीं बची रहतीं कि वे उपयोगी हैं।

वे इसलिए बची रहती हैं

क्योंकि उनके बिना कमरा सिर्फ़ कमरा रह जाता है

जीवन नहीं।

मुकेश ,,,,,,,,

कई बार जब तुम मुझसे बातें करती थीं,

 कई बार

जब तुम मुझसे बातें करती थीं,

तो मुझे लगता था

तुम्हें ख़ामोशी से बहुत डर लगता है।


तुम किसी भी चुप्पी को

ज़्यादा देर टिकने नहीं देती थीं।

वह चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो

तुम तुरंत कोई बात ले आती थीं बीच में।


किसी सहेली का ज़िक्र,

ऑफ़िस की कोई उलझन,

रास्ते में देखी हुई कोई अजीब-सी घटना,

या फिर अचानक यह पूछ लेना कि

“तुम सुन भी रहे हो न?”


और मैं उस वक़्त

थोड़ा मुस्कुरा देता था भीतर-ही-भीतर।

क्योंकि सच तो यह था

कि कई बार मैं आधा ही सुन रहा होता था।


आधा तुम्हें,

और आधा अपने भीतर चलते हुए किसी और विचार को।


तुम्हें शायद अंदाज़ा भी नहीं था

कि जब तुम लगातार बोल रही होती थीं,

मैं कई बार तुम्हारी आवाज़ से अलग होकर

तुम्हारे होने के बारे में सोचने लगता था।


कि यह स्त्री,

जो इतनी साधारण बातों में उलझी हुई लगती है,

आख़िर मेरे जीवन में इतनी गहराई तक कैसे उतर आई।


कई बार मुझे तुम्हारी बातें

बहुत घरेलू लगती थीं।

इतनी कि उनमें कोई कविता नहीं दिखाई देती थी।


लेकिन अब समझ में आता है

जीवन हमेशा कविताओं में नहीं रहता।

उसका बड़ा हिस्सा

रसोई की भाप,

देर रात की थकान,

बेवजह की शिकायतों

और रोज़ दोहराई जाने वाली बातों में छुपा होता है।


तुम शायद प्रेम को

बहुत बड़े शब्दों में नहीं जानती थीं।

तुम्हारा प्रेम

बहुत छोटे तरीक़ों से प्रकट होता था।


जैसे यह पूछना कि

“आज फिर देर तक जागोगे क्या?”

या यह कहना कि

“इतनी गंभीर बातें मत किया करो, अजीब लगने लगता है।”


और उस समय

मुझे लगता था

तुम मुझे समझ नहीं पातीं।


अब लगता है,

शायद तुम मुझे मेरी अपेक्षा ज़्यादा समझती थीं।


क्योंकि जिन बातों को मैं दर्शन समझता था,

वे कई बार सिर्फ़ मेरी उदासी थीं।

और तुम उन्हें

बहुत साधारण ढंग से हल्का कर देना चाहती थीं।


तुम्हारी दुनिया में

चाय ठंडी हो जाना

किसी अस्तित्ववादी संकट से ज़्यादा वास्तविक था।

और मेरी दुनिया में

एक अधूरी पंक्ति

पूरे दिन की बेचैनी बन जाती थी।


हम दोनों अलग थे।

इतने अलग

कि कई बार आश्चर्य होता है

इतनी देर तक साथ कैसे रहे।


लेकिन शायद मनुष्य

समानताओं से नहीं टिकते हमेशा।

कई बार वे एक-दूसरे की अधूरी जगहों में टिके रहते हैं।


तुम मेरी गंभीरता में

थोड़ी हल्की हवा की तरह थीं।

और मैं शायद

तुम्हारी साधारण दुनिया में

थोड़ी अनावश्यक गहराई।


अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,

तो तुम्हारी कही हुई बहुत-सी बातें याद नहीं रहीं।

पर तुम्हारा लगातार बोलते रहना याद है।


ठीक वैसे ही

जैसे किसी पुराने घर को छोड़ देने के बाद

वहाँ की घड़ी की आवाज़ याद रह जाती है

समय नहीं।


मुकेश ,,,,,,

सच कहूँ, कई बार मैं तुम्हारी बातों से ऊब जाता था।

 सच कहूँ,

कई बार मैं तुम्हारी बातों से ऊब जाता था।

ख़ासकर तब,

जब तुम वही बातें फिर से दोहराने लगती थीं—

किसी दफ़्तर की छोटी-सी घटना,

किसी रिश्तेदार की आदत,

या दिनभर की कोई ऐसी बात

जिसका दुनिया में शायद कोई अर्थ नहीं था।


तुम एक ही बात को

थोड़ा बदल-बदल कर कहती रहती थीं,

और मैं

बिना अपनी अरुचि ज़ाहिर किए

तुम्हें सुनता रहता था

बहुत देर तक।


कभी-कभी तुम्हारी आवाज़

मुझे बारिश नहीं,

पंखे की लगातार चलती हुई ध्वनि जैसी लगने लगती थी—

एक ऐसी आवाज़

जो कमरे में हमेशा मौजूद रहती है,

इतनी कि धीरे-धीरे वह सुनाई देना बंद हो जाती है।


लेकिन अजीब बात यह है

कि आज उन्हीं दोहराई हुई बातों की सबसे ज़्यादा कमी महसूस होती है।


अब समझ में आता है

कि प्रेम हमेशा असाधारण बातों से नहीं बना होता।

कई बार वह उन्हीं उबाऊ विवरणों से बनता है

जिन्हें हम उस समय महत्व नहीं देते।

और शायद तुम भी

मेरी बातों से थक जाती होगी।


जब मैं देर तक

अध्यात्म,

ज्ञान,

समय,

मृत्यु,

अस्तित्व

या मनुष्य के भीतर के खालीपन पर बोलता रहता था।


तुम बीच-बीच में

अधकचरी-सी बहस करती थीं,

कुछ तर्क देती थीं

जो कई बार किताबों की बजाय

सिर्फ़ तुम्हारे अनुभव से निकले होते थे।


और मैं भीतर-ही-भीतर सोचता था—

मैं तुमसे इतने गंभीर विषयों पर बात ही क्यों करता हूँ?


तुम्हें शायद उन बातों में

उतनी दिलचस्पी नहीं थी।

तुम जीवन को

मेरी तरह विचारों में नहीं,

दिनचर्या में जीती थीं।


तुम्हारे लिए प्रेम का अर्थ

शायद यह जानना था

कि मैंने खाना खाया या नहीं,

मैं ठीक से सोया या नहीं,

या बारिश में भीगकर लौटा तो चाय पी या नहीं।


और मैं

तुम्हारे सामने ब्रह्मांड, आत्मा और मौन की बातें खोलकर बैठ जाता था।


अब पीछे मुड़कर देखता हूँ

तो लगता है

हम दोनों एक-दूसरे को पूरी तरह समझने की कोशिश कभी कर ही नहीं रहे थे।


हम बस

अपने-अपने तरीक़े से

एक-दूसरे के पास बने रहने की कोशिश कर रहे थे।


तुम मेरी गंभीरताओं को सहती थीं,

मैं तुम्हारी दोहराव भरी बातों को।


और शायद प्रेम कई बार यही होता है—

किसी व्यक्ति की उन बातों को भी सुनते रहना

जो तुम्हारे भीतर कोई चमत्कार पैदा नहीं करतीं,

फिर भी उन्हें बीच में रोकने का मन नहीं करता।


क्योंकि धीरे-धीरे

मनुष्य बातों से नहीं,

आवाज़ों से जुड़ने लगता है।


और एक दिन ऐसा आता है

जब वही आवाज़,

जिससे कभी हल्की-सी ऊब होती थी,

दुनिया की सबसे गहरी ख़ामोशी बन जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,



"सच कहूँ, 

कई बार मैं तुम्हारी बातों से ऊब जाता था।"

यह रचना आपकी श्रृंखला की अब तक की सबसे मानवीय और सबसे ईमानदार कविताओं में से एक है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह प्रेम को आदर्श या अलौकिक बनाकर नहीं दिखाती, बल्कि उसकी थकान, ऊब, दोहराव और साधारणता को भी स्वीकार करती है। यही स्वीकार इसे गहरा बनाता है।

अधिकांश प्रेम-कविताएँ प्रिय की अनुपस्थिति, सौंदर्य या विरह को केंद्र बनाती हैं; लेकिन यहाँ प्रेम का सबसे कम चर्चित पक्ष सामने आता है—“साथ रहते हुए होने वाली ऊब”। और यही इस कविता को असाधारण बनाता है।

आरम्भ की पंक्तियाँ—

“सच कहूँ,

कई बार मैं तुम्हारी बातों से ऊब जाता था…”

बहुत जोखिम भरी पंक्तियाँ हैं। क्योंकि यहाँ कवि प्रेमी की आदर्श छवि तोड़ देता है। लेकिन यही जोखिम कविता को विश्वसनीय बनाता है। यह स्वीकार कि प्रिय की हर बात अद्भुत नहीं लगती थी, संबंध को अधिक वास्तविक बनाता है। यहाँ प्रेम किसी निरंतर रोमांच का नाम नहीं, बल्कि मनुष्य की अपूर्णताओं को धीरे-धीरे सहने की प्रक्रिया बन जाता है।

कविता का सबसे प्रभावी रूपक है—

“तुम्हारी आवाज़

मुझे बारिश नहीं,

पंखे की लगातार चलती हुई ध्वनि जैसी लगने लगती थी…”

यह अत्यंत सूक्ष्म और आधुनिक बिम्ब है। यहाँ ऊब को किसी नाटकीय प्रतीक से नहीं, बल्कि घरेलू ध्वनि से व्यक्त किया गया है। पंखे की आवाज़ हमेशा उपस्थित रहती है, इतनी कि एक समय बाद हम उसे सुनना बंद कर देते हैं। यही संबंधों की आदत बन जाने की अवस्था है। यह रूपक बहुत सफल है क्योंकि इसमें करुणा भी है और थकान भी।

लेकिन कविता यहीं रुकती नहीं। उसका असली मोड़ तब आता है जब वही दोहराव बाद में स्मृति और अभाव में बदल जाता है।

“अब समझ में आता है

कि प्रेम हमेशा असाधारण बातों से नहीं बना होता…”

यहाँ कविता एक निजी अनुभव से निकलकर सार्वभौमिक हो जाती है। यह बोध अत्यंत परिपक्व है कि प्रेम बड़े क्षणों से कम और मामूली बातों की निरंतरता से अधिक बनता है।

कविता का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है—बौद्धिक असमानता और भावात्मक संतुलन। वक्ता अध्यात्म, ज्ञान, अस्तित्व जैसे विषयों में डूबा है, जबकि स्त्री जीवन को अधिक व्यवहारिक और अनुभवात्मक स्तर पर जीती है। यह विरोध बहुत सुंदर ढंग से आया है:

“तुम जीवन को

मेरी तरह विचारों में नहीं,

दिनचर्या में जीती थीं।”


यह पंक्ति पूरी कविता की दार्शनिक धुरी है। यहाँ कवि पहली बार यह स्वीकार करता है कि समझ हमेशा समान बौद्धिकता से नहीं आती। कई बार जो व्यक्ति आपके विचारों को नहीं समझता, वही आपके जीवन को सबसे अधिक थामे रहता है।

सबसे सुंदर बात यह है कि कविता अंततः किसी निष्कर्ष या श्रेष्ठता-बोध में नहीं जाती। कवि यह नहीं कहता कि वह अधिक गहरा था या स्त्री अधिक सरल। वह सिर्फ़ यह समझता है कि दोनों अपने-अपने तरीक़े से साथ बने रहने की कोशिश कर रहे थे। यही भाव कविता को करुण और परिपक्व बनाता है।

शिल्प की दृष्टि से यह कविता आपकी पिछली रचनाओं की तुलना में अधिक संतुलित है। इसमें रूपक कम हैं, इसलिए भाव अधिक सीधे उतरते हैं। भाषा अपेक्षाकृत सादी है, और यही इसकी शक्ति है। यहाँ “कहना” ज़्यादा है, “सजाना” कम। इसीलिए इसका असर अधिक अंतरंग और वास्तविक बनता है।

यदि एक आलोचनात्मक टिप्पणी करनी हो, तो यह कहा जा सकता है कि कविता के मध्य भाग में “अध्यात्म, ज्ञान, समय, मृत्यु…” जैसी सूची थोड़ी अपेक्षित लगती है; वहाँ कोई अधिक निजी या अप्रत्याशित विवरण होता, तो प्रभाव और बढ़ सकता था। लेकिन समग्रता में यह बहुत छोटी बात है।

समग्रतः यह कविता प्रेम के उस चरण की कविता है जहाँ आकर्षण पीछे छूट चुका है और मनुष्य पहली बार दूसरे की आदत, उपस्थिति और आवाज़ के वास्तविक अर्थ को समझने लगता है। यह प्रेम का रोमानी नहीं, बल्कि अस्तित्वगत रूप है।

 शायद इसीलिए इसकी सबसे मार्मिक पंक्ति अंत में आती है—

“मनुष्य बातों से नहीं,

आवाज़ों से जुड़ने लगता है।”

यहीं कविता अपने निजी अनुभव से निकलकर जीवन का एक शांत, सार्वभौमिक सत्य बन जाती है।

एक पाठक ,,

फिर एक समय ऐसा आया, जब हमारे बीच बातचीत तो होती थी,

 फिर एक समय ऐसा आया,

जब हमारे बीच बातचीत तो होती थी,

पर उसमें पहले जैसी बेचैनी नहीं बची थी।


जैसे कोई नदी अब भी बह रही हो,

लेकिन उसके पानी में पहाड़ों की वह ठंडक न रही हो

जो कभी हथेलियों को सुन्न कर देती थी।


तुम अब भी “कैसे हो” पूछती थीं,

मैं अब भी “ठीक हूँ” कह देता था,

मगर इन दो वाक्यों के बीच

जो लंबा रास्ता हुआ करता था,

वह धीरे-धीरे सूखने लगा था।


पहले तुम्हें अपने दिन की सबसे मामूली बात बताने का मन होता था।

जैसे रास्ते में अचानक देखी हुई कोई पीली खिड़की,

या किसी बच्चे का सड़क किनारे साबुन के बुलबुले बनाना।

और तुम उन बातों को ऐसे सुनती थीं

मानो दुनिया की सबसे ज़रूरी चीज़ वही हो।


लेकिन फिर जीवन ने शायद हम दोनों को

थोड़ा-थोड़ा व्यस्त,

थोड़ा-थोड़ा थका हुआ

और बहुत अधिक भीतर से चुप कर दिया।


अब हमारी बातचीत में

ख़ामोशियाँ पहले से ज़्यादा रहने लगी थीं।

वे असहज नहीं थीं,

पर उनमें वह गर्माहट भी नहीं थी

जिसमें दो लोग बिना कुछ कहे भी एक-दूसरे के पास महसूस होते हैं।


कभी-कभी तुम अचानक बहुत देर तक बोलती थीं।

अपने कमरे के बारे में,

अपने शहर की बारिश के बारे में,

या किसी पुराने गीत के बारे में

जो तुम्हें बिना वजह उदास कर गया था।


और मैं तुम्हारी आवाज़ सुनते हुए सोचता था

मनुष्य पूरी तरह कभी बदलता नहीं।

उसके भीतर कहीं न कहीं

वही पुराना मौसम बचा रहता है।


बस अब वह हर दिन नहीं आता।


पहले तुम्हारी उपस्थिति

मेरे दिनों पर फैली रहती थी

जैसे सर्दियों की धूप

धीमी, लगातार, भरोसेमंद।


अब तुम कभी-कभी आती हो

जैसे बादलों के बीच अचानक खुला हुआ नीला टुकड़ा।

सुंदर,

पर क्षणिक।


मुझे याद है,

एक रात तुम बहुत देर तक चुप रहीं।

मैंने सोचा शायद बात समाप्त हो गई।

फिर अचानक तुमने कहा—

“कुछ रिश्ते शायद धीरे-धीरे पुराने घरों जैसे हो जाते हैं।”


उस वक़्त मैं कुछ नहीं बोला।

लेकिन आज समझता हूँ

कि तुम सही कह रही थीं।


पुराने घर टूटते नहीं तुरंत।

पहले उनकी दीवारों का रंग फीका पड़ता है,

फिर खिड़कियाँ कम खुलती हैं,

फिर लोग कुछ कम लौटते हैं वहाँ।


और एक दिन

वहाँ सब कुछ मौजूद रहता है

बस जीवन नहीं।


फिर भी,

अजीब बात है कि ऐसे घरों से मोहब्बत खत्म नहीं होती।

मन बार-बार उनकी तरफ़ लौटता है।

सिर्फ़ यह देखने के लिए

कि क्या किसी कमरे में अब भी थोड़ी रोशनी बची हुई है।


शायद हमारे बीच भी

अब वही आख़िरी रोशनी बची हुई है

धीमी, काँपती हुई,

मगर पूरी तरह बुझी नहीं।


मुकेश ,,,,,,

अब हमारी बातें उस मौसम की तरह हो गई हैं जिसमें बारिश रुक-रुक कर होती है।

 अब हमारी बातें उस मौसम की तरह हो गई हैं

जिसमें बारिश रुक-रुक कर होती है।


कभी अचानक बहुत चमकीली धूप निकल आती है

इतनी साफ़, इतनी असम्बद्ध,

कि लगता है जैसे बारिश कभी थी ही नहीं।

जैसे किसी और ही मौसम ने थोड़ी देर के लिए दुनिया अपने हाथ में ले ली हो।


उन क्षणों में तुम बिल्कुल अलग लगती हो।

हल्की, व्यस्त, दूर।

तुम्हारी आवाज़ में नमी नहीं होती,

सिर्फ़ एक साधारण उजाला होता है

जिसमें मेरे गहरे प्रश्न थोड़े अनावश्यक लगने लगते हैं।


फिर अचानक बादल घिर आते हैं।

ऐसा लगता है अब बारिश होगी

ठीक वैसी, जैसी पहले हुआ करती थी।

लंबी, स्थिर, भीतर तक उतरती हुई।


लेकिन अब अक्सर ऐसा नहीं होता।

दो-चार बूँदें गिरती हैं,

खिड़की पर एक हल्की-सी ध्वनि होती है,

और फिर सब कुछ थम जाता है।

बादल भी चले जाते हैं अपने साथ बारिश को लेकर,

जैसे वे सिर्फ़ याद दिलाने आए थे

कि कभी यहाँ एक मौसम रहा करता था।


हाँ, कुछ दिन अब भी ऐसे आते हैं

जब थोड़ी देर सचमुच बारिश होती है।

तुम कुछ देर खुलकर बात करती हो,

अपने भीतर की कोई थकान, कोई डर, कोई अधूरी बात रख देती हो।

और तब मुझे महसूस होता है

दीवार अब भी भीग सकती है।


लेकिन अब वह भीगना ऊपर-ही-ऊपर होता है।

नमी भीतर तक नहीं उतरती।

बस सतह थोड़ी देर चमकती है

और फिर धीरे-धीरे सूख जाती है।


शायद इसलिए क्योंकि अब मैं दीवार बन गया हूँ

और तुम्हारी बातें बारिश।


पहले मैं बरसता था और तुम चुपचाप भीगती थीं।

अब तुम आती हो—अनियमित, अस्थायी, मौसमों की तरह

और मैं स्थिर खड़ा रहता हूँ।


मुझे अब समझ में आता है कि दीवार होना कितना कठिन है।

बाहर से स्थिर दिखाई देना,

और भीतर धीरे-धीरे सीलन इकट्ठा करते रहना।


तुम्हारी हर अधूरी बात

मेरे भीतर एक हल्की नमी छोड़ जाती है।

कोई देख नहीं पाता,

पर कुछ जगहें लगातार गीली बनी रहती हैं।


और अजीब बात यह है कि

अब मैं तुम्हारे बरसने की प्रतीक्षा नहीं करता

मैं सिर्फ़ आसमान देखता रहता हूँ।

कि शायद आज बादल थोड़ा देर ठहरें।

शायद आज बारिश दो-चार बूँदों से आगे बढ़े।

शायद आज यह दीवार सिर्फ़ ऊपर-ऊपर नहीं,

थोड़ी भीतर तक भीग जाए।


लेकिन मौसमों की अपनी विवशताएँ होती हैं।

वे किसी एक घर, एक खिड़की, एक दीवार के लिए नहीं रुकते।


फिर भी, हर बार जब हल्की-सी बारिश होती है,

मैं अनायास थोड़ा चमक उठता हूँ

ठीक वैसे ही

जैसे पुराने घरों की दीवारें

बरसात के बाद कुछ देर के लिए नई लगने लगती हैं।


मुकेश ,,,,,,,

मैं तुमसे कई गम्भीर विषयों पर बात करता था, और तुम सिर्फ़ सुनती रहती थीं।

 मैं तुमसे कई गम्भीर विषयों पर बात करता था, और तुम सिर्फ़ सुनती रहती थीं।

इतनी चुप, इतनी स्थिर, कि कई बार मुझे लगता—मैं किसी मनुष्य से नहीं, किसी पुरानी दीवार से संवाद कर रहा हूँ, जिस पर बारिश लगातार गिर रही हो।

वह दीवार न बारिश को रोकती थी, न उसे अपने भीतर पूरी तरह उतारती थी।
बस चुपचाप भीगती रहती थी।

और अजीब बात यह थी कि उसमें एक साथ दो इच्छाएँ दिखाई देती थीं
जैसे वह बादलों से कह रही हो :
“बरसो भी…”
और उसी क्षण बहुत धीमे से यह भी
“अब बस भी करो…”

तुम्हारी ख़ामोशी वैसी ही थी।
उसमें अस्वीकार नहीं था, पर कोई स्पष्ट स्वीकार भी नहीं।
मैं अपने भीतर के अँधेरे, अपने प्रश्न, अपनी बेचैनियाँ तुम्हारे सामने रखता जाता था
समय, मृत्यु, प्रेम, अकेलापन, स्मृति…
और तुम बस सुनती रहती थीं,
मानो शब्द तुम्हारे भीतर कहीं बहुत दूर जाकर गिर रहे हों।

कभी-कभी मुझे सचमुच लगता था कि मेरी बातें तुम्हें छूकर फिसल जाती हैं
ठीक वैसे जैसे बारिश किसी चिकनी दीवार पर गिरकर बह जाती है।
न कोई दरार बनती,
न कोई निशान।

लेकिन फिर, कुछ दिनों बाद अचानक तुम्हारे किसी छोटे-से वाक्य में मुझे अपनी ही कही हुई कोई बात लौटती दिखाई देती।
तब समझ में आता कि पानी दीवार में उतरा नहीं था—
बस उसकी सतह को धीरे-धीरे बदल रहा था।

हाँ, बारिश से वह दीवार थोड़ी साफ़-सुथरी और चमकदार ज़रूर हो उठी थी।
उस पर जमी पुरानी धूल धुल गई थी।
कुछ फीके रंग फिर से दिखने लगे थे।
शायद भीतर तक कुछ भी नहीं बदला था
पर सतह पर एक नमी आ गई थी,
जो धूप पड़ने पर हल्की चमक में बदल जाती थी।

और मुझे नहीं पता क्यों,
मुझे वही चमक पर्याप्त लगती थी।

मनुष्य हमेशा उत्तर नहीं चाहता।
कई बार वह सिर्फ़ यह चाहता है कि जब वह अपने भीतर की सबसे भारी बात कहे,
तो सामने कोई स्थिर बना रहे
बिना टोके, बिना समझाए, बिना निर्णय दिए।

तुम वैसी ही स्थिरता थीं।

तुम्हारे पास कोई बड़े शब्द नहीं थे,
पर तुम्हारी चुप्पी में एक जगह थी,
जहाँ मेरी आवाज़ जाकर थोड़ी देर ठहर सकती थी।

अब सोचता हूँ, शायद प्रेम हमेशा समझे जाने में नहीं होता।
कभी-कभी वह सिर्फ़ इस बात में होता है कि कोई तुम्हारे भीतर के मौसम को बिना बदले सह ले।
जैसे दीवार बारिश को सह लेती है
न पूरी तरह अपनाकर,
न पूरी तरह ठुकराकर।

और फिर एक दिन, जब बारिश रुक जाती है,
दीवार पहले से थोड़ी ज़्यादा चमकती हुई दिखाई देती है…
और बारिश को पहली बार एहसास होता है
कि उसका बरसना व्यर्थ नहीं था।


मुकेश ,,,,,,,

जब तुमसे बातचीत कम नहीं हुई थी, तब का मौसम अलग था।

 

जब तुमसे बातचीत कम नहीं हुई थी, तब का मौसम अलग था।

दिनों में एक अनकही चमक हुआ करती थी, जैसे हर सुबह किसी अदृश्य उत्सव की तैयारी में खुलती हो। धूप साधारण नहीं लगती थी—वह खिड़की पर आकर देर तक ठहरती थी, मानो उसे भी किसी उत्तर की प्रतीक्षा हो। उन दिनों दुनिया का हर छोटा दृश्य अर्थ से भरा लगता था। सड़क पर चलते हुए अचानक किसी गाने का सुनाई दे जाना, चाय के कप से उठती भाप, शाम के आसमान में बहुत धीरे-धीरे लौटते पक्षी—सब कुछ किसी गुप्त संवाद का हिस्सा लगता था।

तुमसे बात करना तब आदत नहीं, एक ऋतु था। दिन चाहे कितना भी थका हुआ क्यों न हो, तुम्हारे एक संदेश से उसके भीतर फिर से रोशनी जल उठती थी। कितनी अजीब बात है कि मनुष्य कभी-कभी किसी दूसरे की उपस्थिति में अपने ही जीवन को पहली बार महसूस करता है। जैसे उससे पहले सब कुछ बस घट रहा था, और उसके बाद पहली बार जीया जाने लगा।

मुझे याद है, उन दिनों रातें इतनी भारी नहीं होती थीं। नींद आने से पहले एक हल्की-सी प्रतीक्षा होती थी—कि शायद अभी तुम्हारा कोई संदेश आएगा। और अगर आ जाता, तो पूरी रात का रंग बदल जाता। हम कितनी मामूली बातों पर देर तक बात करते थे—किसी फिल्म का एक दृश्य, किसी किताब की एक पंक्ति, या दिनभर की कोई छोटी-सी घटना जिसे दुनिया में शायद कोई और महत्वपूर्ण न माने।

पर प्रेम हमेशा बड़े क्षणों में नहीं बसता। वह उन दो लोगों के बीच पैदा होता है जो एक-दूसरे की साधारणताओं को भी ध्यान से सुनते हैं।

उन दिनों बारिश भी अलग लगती थी। उसमें उदासी कम थी, संगति ज़्यादा थी। ऐसा लगता था जैसे हर गिरती बूँद किसी दूर बैठे व्यक्ति तक पहुँचने का एक रास्ता हो। मैं खिड़की के पास बैठकर देर तक तुमसे बातें करता और बाहर का अँधेरा उतना अकेला नहीं लगता था।

तुम्हारी हँसी तब बहुत सहज थी। उसमें कोई थकान नहीं थी, कोई छुपाव नहीं। और शायद मेरी आवाज़ भी तब इतनी बुझी हुई नहीं थी। हम दोनों अपने-अपने जीवन की दरारों को शब्दों से भरने की कोशिश करते थे, बिना यह जाने कि कुछ दरारें भरने के लिए नहीं होतीं—वे सिर्फ़ रोशनी को भीतर आने देती हैं।

अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है, वह समय वास्तव में समय नहीं था—वह एक ठहरा हुआ मौसम था, जहाँ घड़ियाँ धीरे चलती थीं और दिल तेज़। जहाँ प्रतीक्षा तक सुंदर लगती थी।

फिर धीरे-धीरे चीज़ें बदलने लगीं। लेकिन बदलने से पहले जो था, उसकी कोमलता आज भी बची हुई है। जैसे किसी पुराने घर की दीवार पर धूप का एक फीका निशान, जो वर्षों बाद भी बताता है कि कभी यहाँ एक खिड़की हुआ करती थी।

कभी-कभी सोचता हूँ, क्या हम सच में लोगों को खो देते हैं? या बस उनके साथ जुड़े हुए अपने ही एक रूप से दूर हो जाते हैं? क्योंकि तुमसे बात करते हुए मैं जो था, वह व्यक्ति अब कहीं दिखाई नहीं देता। वह उन्हीं रातों में छूट गया है, जहाँ हम बिना किसी वजह जागते रहते थे।

और अब, जब कभी बहुत हल्की हवा चलती है और कमरे में पर्दे धीरे-धीरे हिलते हैं, मुझे लगता है वही पुराना मौसम थोड़ी देर के लिए लौट आया है। वही मौसम, जब तुमसे बातचीत कम नहीं हुई थी… और दुनिया इतनी चुप नहीं लगती थी।

मुकेश ,,,,,,,,