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दर्शन - पाणिनीय दर्शन भाग–३ शब्द की रचना — प्रकृति, प्रत्यय और पाणिनीय शब्दमीमांसा

  पाणिनीय दर्शन भाग–३ शब्द की रचना — प्रकृति, प्रत्यय और पाणिनीय शब्दमीमांसा क्या शब्द पहले से विद्यमान है, या व्याकरणीय प्रक्रिया से उसका रूप प्रकट होता है? पिछले भाग में हमने अष्टाध्यायी की बाहरी नहीं, बल्कि उसकी आन्तरिक स्थापत्य-व्यवस्था को समझने का प्रयास किया था। वहाँ संज्ञा, अधिकार, अनुवृत्ति, परिभाषात्मक व्यवस्था और नियमों के पारस्परिक सम्बन्ध के माध्यम से यह स्पष्ट हुआ कि पाणिनीय व्याकरण अलग-अलग सूत्रों का संग्रह नहीं, बल्कि एक कार्यशील नियम-तन्त्र है। अब उसी व्यवस्था के भीतर प्रवेश करते हुए प्रश्न बदलता है। यदि भाषा नियमों से व्यवस्थित है, तो— शब्द बनता कैसे है? हम “शब्द” को सामान्यतः एक तैयार वस्तु की तरह देखते हैं। “पठति”, “गच्छति”, “रामः”, “ग्रामम्”—ये सब हमें पूर्ण शब्द दिखाई देते हैं। लेकिन पाणिनीय दृष्टि इस तैयार रूप के पीछे की प्रक्रिया को देखने लगती है। किसी रूप में— धातु है, प्रकृति है, प्रत्यय है, विभक्ति है, और अनेक स्थितियों में ध्वनि तथा रूप-परिवर्तन की प्रक्रियाएँ हैं। इसलिए इस भाग का मूल प्रश्न केवल व्याकरणिक नहीं, दार्शनिक भी है— क्या शब्द एक पूर्वस्थित सत...

दर्शन -पाणिनीय दर्शन भाग–२ अष्टाध्यायी की संरचना —

  पाणिनीय दर्शन भाग – २  अष्टाध्यायी की संरचना — भाषा को नियमों में बाँधने की पाणिनीय क्रान्ति सूत्र से प्रणाली तक — पाणिनीय व्याकरण की स्थापत्य - कला पिछले भाग में हमारा मूल प्रश्न था — क्या व्याकरण भी दर्शन हो सकता है ? हमने वहाँ यह सावधानीपूर्वक देखा कि पाणिनि को बिना परीक्षा के किसी स्वतंत्र दार्शनिक मत का संस्थापक घोषित करना उचित नहीं है। लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ कि अष्टाध्यायी भाषा को केवल शब्दों के संग्रह के रूप में नहीं , बल्कि नियमबद्ध व्यवस्था के रूप में ग्रहण करती है। अब स्वाभाविक अगला प्रश्न है — वह व्यवस्था बनी कैसे है ? यदि पाणिनीय व्याकरण को केवल हजारों सूत्रों का संग्रह मान लिया जाए , तो उसकी वास्तविक प्रतिभा दिखाई नहीं देती। अष्टाध्यायी की शक्ति उसके सूत्रों की संख्या में नहीं , बल्कि उन सूत्रों के बीच स्थापित व्यवस्थात्मक सम्बन्ध में है। पाणिनि का आश्चर्य केवल यह नहीं कि उन्होंने बहुत कुछ कहा ; बल्कि यह है कि उन्हो...