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तृतीय खंड - हरिवंशपर्व : वंश से कृष्ण के राजनीतिक उदय तक - भाग 19 द्वारका की शासन-व्यवस्था

  तृतीय खंड - हरिवंशपर्व : वंश से कृष्ण के राजनीतिक उदय तक - भाग 19 द्वारका की शासन-व्यवस्था — राजा, संघ और कृष्ण का नेतृत्व द्वारका बस जाने के बाद कृष्ण की कथा में एक नया प्रश्न सामने आता है। नगर बन गया, यादव सुरक्षित हो गए, लेकिन राज्य चलता कैसे था? किसके पास अंतिम अधिकार था? राजा कौन था? कृष्ण की स्थिति क्या थी? बलराम, उग्रसेन, अक्रूर और दूसरे यादव प्रमुखों की भूमिका क्या थी? इन प्रश्नों का उत्तर आधुनिक राजतंत्र की सरल धारणा से नहीं मिलता। हरिवंश और उससे जुड़ी महाभारतीय परंपरा में द्वारका का राजनीतिक संसार अनेक प्रभावशाली व्यक्तियों और कुलों से निर्मित दिखाई देता है। यही उसकी विशेषता है। उग्रसेन का पुनर्स्थापन कंस-वध के बाद कृष्ण स्वयं सिंहासन पर नहीं बैठते। उग्रसेन को पुनः राजपद प्राप्त होता है। यह छोटी-सी बात कृष्ण की राजनीतिक भूमिका समझने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। यदि कृष्ण की इच्छा व्यक्तिगत राजसत्ता प्राप्त करना होती, तो कंस को हटाने के बाद उनके सामने सत्ता ग्रहण करने का अवसर था। लेकिन कथा उन्हें ऐसा करते हुए नहीं दिखाती। इसके स्थान पर वे उस राजवंशीय व्यवस्था को पुनर्स्थ...

तृतीय खंड - हरिवंशपर्व : वंश से कृष्ण के राजनीतिक उदय तक -भाग 18 हरिवंशपर्व से विष्णुपर्व की ओर

 तृतीय खंड - हरिवंशपर्व : वंश से कृष्ण के राजनीतिक उदय तक -भाग 18 हरिवंशपर्व से विष्णुपर्व की ओर — कृष्ण-कथा का नया विस्तार हरिवंश का एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक गुण उसकी गति में दिखाई देता है। आरम्भ में पाठक सृष्टि, प्रजापतियों, वंशों और राजवंशों के विस्तृत संसार में प्रवेश करता है। फिर कथा धीरे-धीरे यदुवंश की ओर आती है और अंततः कृष्ण उसके केंद्र में स्थापित हो जाते हैं। लेकिन कृष्ण की कथा यहीं समाप्त नहीं होती। हरिवंशपर्व ने जिस कृष्ण के लिए भूमि तैयार की थी, विष्णुपर्व उसी कृष्ण को विस्तृत आख्यान के केंद्र में ले आता है। यही संक्रमण हरिवंश की रचना-प्रकृति को समझने की कुंजी है। वंश से व्यक्ति तक हरिवंशपर्व की आरम्भिक गति को देखें तो उसका दृष्टिकोण व्यापक है। सृष्टि से प्रजा, प्रजा से वंश, वंश से राजा और राजाओं से विशिष्ट कुलों की ओर कथा आती है। व्यक्ति इस विशाल वंश-परंपरा के भीतर अपना स्थान प्राप्त करता है। कृष्ण के आते-आते यह प्रक्रिया उलटने लगती है। अब वंश कृष्ण को समझाने का साधन बनता है और कृष्ण स्वयं कथा का केंद्र बन जाते हैं। यह साहित्यिक परिवर्तन बहुत महत्त्वपूर्ण है। आरम्भिक...

तृतीय खंड -हरिवंशपर्व : वंश से कृष्ण के राजनीतिक उदय तक भाग 17 द्वारका का विस्तार

 तृतीय खंड -हरिवंशपर्व : वंश से कृष्ण के राजनीतिक उदय तक भाग 17 द्वारका का विस्तार — नगर, समुद्र और राजनीतिक भूगोल मथुरा छोड़ने का निर्णय कृष्ण-कथा में केवल एक नगर बदलने की घटना नहीं है। इसके बाद कथा का भूगोल ही बदल जाता है। अब कृष्ण का संसार यमुना के मैदानों से निकलकर पश्चिमी समुद्र की ओर जाता है। एक ओर मथुरा की स्थलीय राजनीति थी, दूसरी ओर समुद्र से घिरी नई नगरी— द्वारका । यहीं से कृष्ण की कथा में एक नया आयाम जुड़ता है— नगर-निर्माण और राजनीतिक भूगोल। मथुरा से पश्चिम की ओर हरिवंश में यादवों पर होने वाले निरंतर आक्रमणों की पृष्ठभूमि में एक ऐसी स्थिति बनती है जिसमें मथुरा में रहना निरंतर युद्ध का कारण बन जाता है। कृष्ण और बलराम के सामने प्रश्न केवल शत्रु को हराने का नहीं, बल्कि अपने समुदाय को ऐसी जगह बसाने का था जहाँ वह अपेक्षाकृत सुरक्षित होकर अपनी राजनीतिक शक्ति को व्यवस्थित कर सके। इसी क्रम में समुद्र के निकट नई नगरी की कल्पना सामने आती है। हरिवंश के वर्णन में द्वारका कोई साधारण बस्ती नहीं है। उसका निर्माण अत्यंत योजनाबद्ध और वैभवशाली रूप में प्रस्तुत किया गया है। नगर में मार्ग, भ...

तृतीय खंड - हरिवंशपर्व : वंश से कृष्ण के राजनीतिक उदय तक भाग 16 यादवों के भीतर संघर्ष

  तृतीय खंड - हरिवंशपर्व : वंश से कृष्ण के राजनीतिक उदय तक भाग 16 यादवों के भीतर संघर्ष — सत्ता, अहं और विघटन की आरंभिक छाया कृष्ण के मथुरा आगमन, कंस-वध और यादवों के पुनर्गठन के बाद कथा का एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। अब संघर्ष केवल बाहर से आने वाले शत्रुओं से नहीं है। यादव-संसार स्वयं अनेक कुलों, परिवारों, वरिष्ठों, योद्धाओं और प्रभावशाली व्यक्तियों से मिलकर बना हुआ है। कृष्ण की शक्ति बढ़ती है, द्वारका एक संगठित राजनीतिक केंद्र बनती है और अनेक यादव-पुरुष उसके साथ खड़े दिखाई देते हैं; लेकिन किसी भी बड़े संघ या राजवंश की तरह यहाँ भी प्रतिष्ठा, संबंध, अधिकार और नेतृत्व के प्रश्न धीरे-धीरे महत्त्व ग्रहण करते हैं। यहीं से कृष्ण के नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा आरम्भ होती है। कथा की पृष्ठभूमि हरिवंश में यादवों की चर्चा किसी एक छोटे परिवार तक सीमित नहीं है। वृष्णि, अन्धक, भोज और उनसे जुड़े अनेक कुलों की उपस्थिति इस संसार को बहुस्तरीय बनाती है। कृष्ण स्वयं इस व्यापक यादव-संसार के भीतर एक प्रमुख व्यक्तित्व हैं, लेकिन उनके आसपास बलराम, उग्रसेन, अक्रूर, सात्यकि, कृतवर्मा, प्रद्युम्...

तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 15 : यादव-संघ और आंतरिक राजनीति

 तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 15 : यादव-संघ और आंतरिक राजनीति — कृष्ण का नेतृत्व कृष्ण की राजनीतिक शक्ति को केवल कंस और जरासंध जैसे बाहरी शत्रुओं के संदर्भ में समझना अधूरा है। द्वारका पहुँचने के बाद एक दूसरी चुनौती सामने आती है— यादवों के भीतर अनेक कुलों, शाखाओं और नेतृत्व-केंद्रों को एक साथ बनाए रखना। हरिवंश में यादव कोई एकरूप राजवंश नहीं दिखाई देते। वृष्णि, अन्धक, भोज और अन्य संबद्ध कुलों की स्मृतियाँ इस व्यापक यादव संसार का हिस्सा हैं। यही विविधता उसकी शक्ति भी है और संभावित कमजोरी भी। यादवों का व्यापक संसार यादव पहचान को केवल एक व्यक्ति की वंशावली समझना उचित नहीं। यदु से जुड़ी अनेक शाखाएँ समय के साथ अलग-अलग नामों और राजनीतिक इकाइयों के रूप में सामने आती हैं। कृष्ण की अपनी पहचान भी एक से अधिक स्तरों पर बनती है—वे यदुवंशी हैं, वृष्णि परंपरा से जुड़े हैं और वसुदेव के पुत्र हैं। इसलिए जब हम ‘यादव’ कहते हैं तो उसके पीछे एक विस्तृत सामाजिक-राजनीतिक समूह की कल्पना करनी चाहिए, न कि आधुनिक अर्थ में एक केंद्रीकृत राज्य की। नेतृत्व की समस्या द्वारका में कृष्ण की प्रतिष्ठा...

तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 14 :विवाह, संबंध और द्वारका की राजनीति

तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 14 : कृष्ण का राजवंशीय संसार — विवाह, संबंध और द्वारका की राजनीति रुक्मिणी के साथ विवाह के बाद कृष्ण का जीवन केवल व्यक्तिगत दांपत्य तक सीमित नहीं रहता। द्वारका के विकसित होते राजनीतिक संसार में विवाह विभिन्न राजवंशों और शक्तियों के बीच संबंधों का माध्यम भी बनते हैं। इसलिए कृष्ण की पत्नियों का उल्लेख केवल पारिवारिक प्रसंग के रूप में पढ़ना हरिवंश के व्यापक राजनीतिक संदर्भ को छोटा कर देता है। यहाँ एक बात आरंभ में स्पष्ट रखना आवश्यक है—कृष्ण के विवाहों की विस्तृत सूची और उनके सभी प्रसंग अलग-अलग ग्रंथों में समान रूप से नहीं मिलते। बाद की पुराणीय परंपरा ने इन कथाओं का बहुत विस्तार किया। इसलिए हरिवंश, विष्णु पुराण और भागवत पुराण के विवरणों को एक ही पाठ मान लेना उचित नहीं होगा। द्वारका का बदलता स्वरूप मथुरा के संकट के बाद द्वारका यादवों के लिए सुरक्षित राजनीतिक केंद्र के रूप में उभरती है। लेकिन किसी नगर की स्थिरता केवल दुर्ग और सेना से नहीं होती। उसे व्यापार, संबंध, सहयोगी राजवंश और राजनीतिक प्रतिष्ठा की भी आवश्यकता होती है। कृष्ण के विवाहों को इसी...

तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा

 तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 13 : रुक्मिणी-हरण और कृष्ण-विवाह — प्रेम, स्वेच्छा और राजनीति मथुरा से द्वारका की ओर यादवों के जीवन का नया अध्याय आरंभ हो चुका था। इसी राजनीतिक परिवेश में कृष्ण के जीवन से जुड़ी एक ऐसी कथा आती है जिसमें व्यक्तिगत इच्छा, राजवंशीय राजनीति और विवाह-संस्था तीनों एक साथ दिखाई देते हैं— विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी और कृष्ण का विवाह। यह कथा केवल प्रेमकथा के रूप में पढ़ने पर अपने व्यापक संदर्भ का एक बड़ा हिस्सा खो देती है। रुक्मिणी कौन थीं? विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी का उल्लेख कृष्ण-कथा की प्रमुख स्त्री-पात्रों में होता है। उनके भाई रुक्मी का राजनीतिक झुकाव कृष्ण के पक्ष में नहीं था। रुक्मी चाहता था कि रुक्मिणी का विवाह चेदिराज शिशुपाल से हो। यहाँ से कथा व्यक्तिगत विवाह-निर्णय से राजनीतिक गठबंधन में बदल जाती है। रुक्मिणी कृष्ण के गुण और पराक्रम के विषय में सुन चुकी थीं और उन्हें अपना पति मान चुकी थीं। किंतु परिवार की राजनीतिक इच्छा उनके चयन के विरुद्ध थी। विवाह की तैयारी शिशुपाल के साथ होने लगी। रुक्मिणी के सामने अब समय बहुत कम ...

तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 12 : जरासंध के आक्रमण और द्वारका की स्थापना

 तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 12 : जरासंध के आक्रमण और द्वारका की स्थापना — युद्ध से रणनीति तक कंस-वध के बाद नया संकट कंस के वध के बाद मथुरा में उग्रसेन को पुनः राजसत्ता प्राप्त होती है। कृष्ण और बलराम अपने माता-पिता से मिलते हैं और यादवों के जीवन में एक नया अध्याय आरंभ होता है। देखने में लगता है कि कंस के अत्याचार का अंत हो गया और संकट समाप्त हो गया; किंतु कथा शीघ्र ही बताती है कि एक अत्याचारी शासक को हटाने से राजनीतिक संघर्ष समाप्त नहीं होता। कंस की पत्नियाँ अस्ति और प्राप्ति मगध के राजा जरासंध की पुत्रियाँ थीं। पति की मृत्यु के बाद वे अपने पिता के पास जाती हैं। जरासंध इस घटना को केवल पारिवारिक शोक के रूप में नहीं देखता; वह इसे अपने परिवार के अपमान और राजनीतिक चुनौती के रूप में ग्रहण करता है। वह यादवों के विरुद्ध सैन्य अभियान आरंभ करता है। हरिवंश के विष्णुपर्व में कंस-वध के बाद जरासंध के आक्रमणों का यह क्रम कृष्ण की कथा को नए संघर्ष की ओर ले जाता है। <Cite refs={["turn965923search3","turn965923search11"]}/> यहाँ से कथा का प्रश्न बदल जाता है।...

तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा-भाग 11 : गोकुल से मथुरा —

 तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 11 : गोकुल से मथुरा — बालकृष्ण का राजनीतिक प्रवेश कृष्ण-कथा में गोकुल से मथुरा की यात्रा केवल स्थान-परिवर्तन नहीं है। यह उनके जीवन के दो भिन्न चरणों के बीच निर्णायक संक्रमण है। अब तक कृष्ण का संसार परिवार, गोप-समुदाय और ग्रामीण जीवन से जुड़ा था; मथुरा पहुँचते ही कथा सत्ता, संघर्ष और राजनीतिक उत्तरदायित्व के क्षेत्र में प्रवेश करती है। इसी परिवर्तन को समझे बिना कंस-वध को केवल एक दैत्य-वध की कथा के रूप में पढ़ना हरिवंश की राजनीतिक संरचना को अधूरा छोड़ देता है। अक्रूर का आगमन : कथा में सत्ता की वापसी कृष्ण को मथुरा ले जाने के लिए अक्रूर का आगमन कथा की दिशा बदल देता है। अब तक जिस बालक को मथुरा की सत्ता से दूर रखकर सुरक्षित किया गया था, वही सत्ता अब उसे अपने केंद्र की ओर बुला रही है। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण विरोध दिखाई देता है— गोकुल में कृष्ण की पहचान समुदाय से बनती है; मथुरा में उनकी पहचान सत्ता के सामने बनती है। अक्रूर स्वयं यादव राजनीतिक संसार से जुड़े व्यक्ति हैं। इसलिए उनका आगमन केवल संदेशवाहक का आगमन नहीं, बल्कि गोकुल और मथुरा के बीच रा...

तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 10 : कृष्ण और प्रकृति —

  तृतीय खंड : हरिवंश की संरचना और कृष्ण-कथा भाग 10 : कृष्ण और प्रकृति — यमुना, वन और गोवर्धन की सांस्कृतिक स्मृति कृष्ण-कथा का गोकुल-परिवेश केवल ग्रामीण जीवन की पृष्ठभूमि नहीं है। उसके साथ एक ऐसा प्राकृतिक संसार जुड़ा है जिसमें नदी, वन, पर्वत, पशु और ऋतु-चक्र मनुष्य के जीवन से अलग नहीं दिखाई देते। आगे की कृष्ण-परंपरा ने इस प्राकृतिक संसार को अत्यंत समृद्ध प्रतीकों में बदल दिया, किंतु उनके अध्ययन में यह देखना आवश्यक है कि कौन-सा तत्व हरिवंश में है, कौन बाद की पुराणीय परंपरा में विकसित हुआ और कौन लोकभक्ति ने विस्तार दिया। यमुना : नदी से सांस्कृतिक प्रतीक तक कृष्ण के जीवन में यमुना का स्थान केवल एक नदी का नहीं है। मथुरा और ब्रज क्षेत्र की भौगोलिक-सांस्कृतिक संरचना में नदी जीवन का आधार रही होगी। जल, कृषि, पशुपालन और आवागमन—इन सभी से नदी का संबंध स्वाभाविक था। कृष्ण-कथा में यमुना का बार-बार उपस्थित होना इसलिए केवल धार्मिक प्रतीक मान लेना पर्याप्त नहीं। इसके पीछे एक वास्तविक भौगोलिक संसार भी है। बाद की भक्ति-परंपरा ने यमुना को कृष्ण-प्रेम की साक्षी, पवित्र तीर्थ और भावात्मक प्रतीक के रूप...