महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 5 : वनाग्नि और अंतिम यात्रा
महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 5 : वनाग्नि और अंतिम यात्रा समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती अब वन के जीवन में पूरी तरह स्थिर हो चुके थे। राजसी जीवन की स्मृतियाँ धीरे-धीरे दूर होती जा रही थीं। तप, संयम और साधना ही उनके जीवन का आधार बन गए थे। उधर हस्तिनापुर में युधिष्ठिर समय-समय पर वन में जाकर उनका समाचार लेते रहते थे। एक बार जब पाण्डव उनसे मिलने पहुँचे, तब धृतराष्ट्र ने उन्हें बताया कि अब उनका शरीर अत्यन्त वृद्ध हो चुका है और जीवन का अंतिम चरण निकट है। उन्होंने युधिष्ठिर से आग्रह किया कि वे उनके प्रति किसी प्रकार का मोह या अपराधबोध न रखें। धृतराष्ट्र का मन अब अपने पुत्रों की मृत्यु पर विलाप करने के स्थान पर जीवन के अंतिम सत्य को स्वीकार करने की ओर बढ़ चुका था। कुछ समय बाद पाण्डवों ने उनसे विदा ली और हस्तिनापुर लौट आए। इसके बाद वन में तीनों वृद्ध अपने तप में लगे रहे। फिर एक दिन प्रकृति ने स्वयं उस अंतिम यात्रा का द्वार खोल दिया। वन में भयंकर आग फैल उठी। सूखी लकड़ियों और पत्तों से भरे वन में अग्नि तेजी से फैलने लगी। चारों ओर धुआँ उठने लगा और अग्नि ने उनके ...