ईशावास्योपनिषद् षष्ठमन्त्र — शांकरभाष्य का प्रथम पद: सर्वात्मदर्शन का अद्वैत सिद्धान्त
मूल पदांश (संशोधित रूप में) (ईशावास्योपनिषद् षष्ठमन्त्र के शांकरभाष्य का प्रथम पद)
यः तु सर्वाणि भूतानि अव्यक्तादीनि स्थावरान्तानि आत्मन्येव अनुपश्यति,
आत्मव्यतिरिक्तानि न पश्यति।
जो पुरुष अव्यक्त (प्रकृति) से लेकर स्थावर (जड़ वस्तुओं) तक सभी भूतों को अपने ही आत्मा में देखता है, और आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं देखता—वही सच्चा ज्ञानी है।
यह पद ईशावास्योपनिषद् के षष्ठ मन्त्र के शांकरभाष्य का प्रारम्भिक अंश है, जिसमें अद्वैत वेदान्त का परम सिद्धान्त—सर्वात्मभाव—प्रतिपादित होता है। यहाँ शंकराचार्य उस ज्ञानी पुरुष की अवस्था का निरूपण करते हैं, जिसने आत्मा का यथार्थ साक्षात्कार कर लिया है।
“यः तु”—यहाँ “तु” शब्द विशेष अर्थ रखता है। यह पूर्व वर्णित अज्ञानी पुरुष से भिन्न एक विद्वान्, आत्मज्ञानी पुरुष की ओर संकेत करता है। यह वह साधक है जिसने अविद्या का अतिक्रमण कर लिया है।
“सर्वाणि भूतानि”—यहाँ ‘भूत’ शब्द का अर्थ केवल जीवधारी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि है
“अव्यक्तादीनि”—जो कारण रूप (मूल प्रकृति) में हैं
“स्थावरान्तानि”—जो स्थिर, जड़ रूप में हैं
अर्थात् सृष्टि का सम्पूर्ण विस्तार—सूक्ष्म से स्थूल तक—सब इसमें समाहित है।
“आत्मन्येव अनुपश्यति”—यहाँ “अनुपश्यति” का अर्थ है—साक्षात्कारपूर्वक देखना, केवल कल्पना या तर्क नहीं।
ज्ञानी पुरुष यह प्रत्यक्ष अनुभव करता है कि यह सम्पूर्ण जगत् उसके अपने आत्मा में ही स्थित है।
यह दृष्टि सामान्य नहीं, बल्कि अद्वैत अनुभूति है, जहाँ ज्ञाता और ज्ञेय का भेद मिट जाता है।
अब अगला भाग—“आत्मव्यतिरिक्तानि न पश्यति”
यहाँ शंकराचार्य अत्यंत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ज्ञानी को आत्मा से भिन्न कुछ भी प्रतीत नहीं होता।
यह “न देखना” अज्ञान के कारण नहीं, बल्कि पूर्ण ज्ञान के कारण है।
अज्ञानी भेद देखता है—मैं और तुम, यह और वह।
परंतु ज्ञानी के लिए सब कुछ एक ही आत्मा का विस्तार है।
यहाँ अद्वैत का मूल सिद्धांत स्पष्ट होता है
ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।
ज्ञानी के लिए संसार का अस्तित्व नष्ट नहीं होता, परंतु उसका स्वतंत्र सत्यत्व समाप्त हो जाता है।
वह जानता है कि यह सब आत्मा का ही प्रतिबिम्ब है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—
जैसे स्वर्ण से बने विभिन्न आभूषण—अंगूठी, कंगन, हार—नाम और रूप में भिन्न हैं, परंतु उनका सार तत्व एक ही है—स्वर्ण।
इसी प्रकार, यह सम्पूर्ण जगत् नाम-रूप में भिन्न प्रतीत होता है, परंतु उसका वास्तविक स्वरूप एक ही आत्मा है।
इस ज्ञान का व्यावहारिक प्रभाव भी अत्यंत गहरा होता है
जब साधक सबमें एक ही आत्मा का दर्शन करता है, तब,किसी से द्वेष नहीं रहता,किसी से भय नहीं रहता
अहंकार समाप्त हो जाता है,करुणा और समता का उदय होता है,यही अवस्था जीवन्मुक्ति की है।
इस पद में शंकराचार्य ने उस ज्ञानी पुरुष का स्वरूप बताया है, जो सम्पूर्ण सृष्टि को अपने ही आत्मा में देखता है और आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं मानता। यह अद्वैत वेदान्त की चरम अनुभूति है, जहाँ भेदभाव समाप्त होकर केवल एकत्व का अनुभव रह जाता है। यही ज्ञान मोक्ष का कारण है और जीवन में समता, शांति और करुणा का आधार बनता है।
मुकेश ,,,,,,,,