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Thursday, 7 May 2026

उम्र ढलती गई तन्हा कई सहराओं में,

 बहर: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन)

रदीफ़: “में”
क़ाफ़िया: सहराओं / दरियाओं / सदाओं / हवाओं / वफ़ाओं / दुआओं


उम्र ढलती गई तन्हा कई सहराओं में,
हमने भी इक चाँद ढूँढ़ा कई दरियाओं में।

रात ख़ामोश थी, यादों का धुआँ था लेकिन,
तेरी आवाज़ रही गूँजती सदाओं में।

मैंने हर दर्द को चुपचाप ही ओढ़ा बरसों,
रूह जलती ही रही सर्द हवाओं में।

कोई अपना भी नहीं था मिरे हिस्से में मगर,
दिल ने ढूँढ़ी थीं कई शक्ल वफ़ाओं में।

तेरी आँखों की चमक आज भी बाक़ी है कहीं,
एक जुगनू-सा अभी मेरी दुआओं में।

वक़्त ने छीन लिए मुझसे कई रंग मगर,
एक ख़ुशबू-सी रही तेरी अदाओं में।

'मुकेश' इश्क़ का हासिल यही निकला आख़िर,
हम भी शामिल रहे दुनिया की सजाओं में।


मुकेश' 

दिल भटकता ही रहा याद पुरानी में कहीं,

 (बहर: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन)

रदीफ़: “में कहीं”
क़ाफ़िया: पुरानी / रवानी / कहानी / निशानी / जवानी / वीरानी / पानी


दिल भटकता ही रहा याद पुरानी में कहीं,
आग जलती ही रही आँख के पानी में कहीं।

रात ठहरी थी तेरे नाम की ख़ुशबू लेकर,
चाँद डूबा था किसी ख़्वाब-कहानी में कहीं।

तेरी आवाज़ का जादू भी अजब था जानाँ,
रूह बहती ही रही इश्क़-रवानी में कहीं।

मैंने हर दर्द को चुपचाप छुपाया दिल में,
ज़ख़्म पलते ही रहे अश्क के पानी में कहीं।

तेरे जाने से मिरी रूह बहुत वीराँ थी,
फिर भी इक नूर बचा तेरी निशानी में कहीं।

उम्र ढलती गई तन्हा कई सहराओं में,
दिल धड़कता ही रहा अपनी जवानी में कहीं।

हमने ख़ामोश मोहब्बत को इबादत समझा,
नाम तेरा ही रहा दिल की अज़ानी में कहीं।

'मुकेश' इश्क़ की राह में क्या-क्या न सहा है हमने,
रूह जलती ही रही दर्द की रवानी में कहीं।


मुकेश,,,,,,,,,,,

चाँद उतरा था तेरी आँख के पानी में कहीं,

 (बहर: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन)

रदीफ़: “में कहीं”
क़ाफ़िया: पानी / रवानी / कहानी / निशानी / जवानी / वीरानी


चाँद उतरा था तेरी आँख के पानी में कहीं,
रूह भीगती रही इश्क़ की रवानी में कहीं।

रात ख़ामोश थी, तारों की चमक थी लेकिन,
दिल भटकता रहा इक याद पुरानी में कहीं।

तेरी आवाज़ की ख़ुशबू भी महकती थी अभी,
कोई आहट थी छुपी रात सुहानी में कहीं।

मैंने हर दर्द को चुपचाप छुपाया दिल में,
आग जलती ही रही आँख के पानी में कहीं।

तेरे जाने से मिरी रूह बहुत वीराँ थी,
फिर भी इक नूर बचा तेरी निशानी में कहीं।

हमने तन्हाई को हमराज़ बना रक्खा था,
ज़िंदगी हँसती रही फिर भी उदासी में कहीं।

'मुकेश' इश्क़ की राह में क्या-क्या न गुज़रना पड़ा,
उम्र ढलती ही रही ख़्वाब जवानी में कहीं।


मुकेश,,,,,,,,,,,,,,

Wednesday, 6 May 2026

तेरी आवाज़ की ख़ुशबू भी अजब थी जानाँ,

 बहर: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन)

रदीफ़: “थी जानाँ”
क़ाफ़िया: अजब / शब / तलब / ग़ज़ब / सब / अदब


तेरी आवाज़ की ख़ुशबू भी अजब थी जानाँ,
देर तक रूह में बजती रही शब थी जानाँ।

तेरे मिलने की मेरे दिल को बहुत थी तलब,
मेरी साँसों में कोई जागती लब थी जानाँ।

चाँद उतरा था तेरी आँख के पानी में कहीं,
रात भीगी हुई इक ख़्वाब-ए-तरब थी जानाँ।

मैंने हर दर्द को चुपचाप छुपाया लेकिन,
तेरी ख़ामोश नज़र सबसे ग़ज़ब थी जानाँ।

तेरी यादों का धुआँ दिल से निकलता ही न था,
मेरे अंदर कोई जलती हुई शब थी जानाँ।

तेरे जाने से भी रिश्ता न मिरा टूट सका,
तेरी मौजूदगी हर मोड़ पे सब थी जानाँ।

'मुकेश' इश्क़ में हमने यही बात समझ ली आख़िर,
जो भी सच्ची थी मोहब्बत, वही रब थी जानाँ।

मुकेश,,,,,



रात गहरी थी बहुत, ख़ौफ़ भी था राहों में,

 बहर: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन)

रदीफ़: “राहों में”
क़ाफ़िया: ख़ौफ़ / चाँद / गर्द / दर्द / अश्क / गर्द की ध्वनि-संगति के साथ


रात गहरी थी बहुत, ख़ौफ़ भी था राहों में,
हमने इक चाँद को फिर भी रखा राहों में।

दूर तक कोई भी अपना न नज़र आया मगर,
जलते रहते थे कई ख़्वाब सदा राहों में।

धूल ऐसी थी कि चेहरों का पता खो जाए,
हमने फिर भी तिरे क़दमों को पढ़ा राहों में।

हर तरफ़ दर्द की दीवार खड़ी थी लेकिन,
ढूँढ़ ही ली कोई उम्मीद नई राहों में।

तेरी आवाज़ की ख़ुशबू भी अजब थी जानाँ,
देर तक गूँजती रहती थी हवा राहों में।

हमने तन्हाई को हमराज़ बना कर अक्सर,
अपने ही दिल का दिया ख़ुद ही रखा राहों में।

मक़ता:
'मुकेश' इतना अँधेरों से गुज़रना था कठिन,
फिर भी इक नूर-सा मिलता रहा राहों में।

मुकेश,,,,,,,,,,,,


उम्र भर दर्द की मिट्टी में गुज़र कर देखा,

 उम्र भर दर्द की मिट्टी में गुज़र कर देखा,

तब कहीं ख़ुद को अँधेरों से उभर कर देखा।


जो भी अपने थे वही दूर खड़े थे मुझसे,

मैंने हर रिश्ते को नज़दीक से कर देखा।


तेरी यादों की तपिश कम तो नहीं थी फिर भी,

दिल ने हर ज़ख़्म को चुपचाप ही भर कर देखा।


मैंने तन्हाई के जंगल में भटक कर अक्सर,

अपने साये को भी कुछ देर ठहर कर देखा।


वक़्त ने छीन लिए मुझसे कई रंग मगर,

मैंने हर दर्द को अशआर में ढल कर देखा।


रात गहरी थी बहुत, ख़ौफ़ भी था राहों में,

फिर भी उम्मीद का इक चाँद उतर कर देखा।


'मुकेश' अपने ही अंदर जो सफ़र था मुश्किल,

ख़ुद को हर मोड़ पे टूटे हुए सर कर देखा।


मुकेश ,,,,,,

धूप ने छीन लिया मुझसे मेरे ख़्वाबों का रंग,

 


धूप ने छीन लिया मुझसे मेरे ख़्वाबों का रंग,

अब तो बारिश भी लिए फिरती है तेज़ाबों का रंग।


वक़्त की धूल ने चेहरों को बदल डाला यूँ,

अब न आँखों में रहा पहले से अहबाबों का रंग।


तेरी यादों ने मेरी रात को ऐसा रंगा,

चाँद फीका लगे, गहरा हो तेरे ख़्वाबों का रंग।


मैंने सच बोल के रिश्तों को बचाना चाहा,

लोग समझे मिरे लहजे में है आदाबों का रंग।


उम्र भर दर्द की मिट्टी में गुज़र कर देखा,

तब कहीं आके मिला रूह को महताबों का रंग।


'मुकेश' अब भी मिरी रूह में ज़िंदा है कहीं,

धूप से जल के भी बाक़ी है कई ख़्वाबों का रंग।


मुकेश ,,,,,,,,