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Friday, 3 April 2026

धर्म और मोबाइल का संवाद

 धर्म और मोबाइल का संवाद


मोबाइल!

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

तुम बुरा मत मानना

क्योंकि आजकल

तुम ही सबसे बड़े पुजारी बन बैठे हो…


मोबाइल (हँसकर):


धर्म जी!

समय बदल गया है

अब लोग

मंदिर कम

मुझे ज़्यादा खोलते हैं…


धर्म:


पहले लोग

सुबह उठकर

मेरा नाम लेते थे


अब उठते ही

तुम्हारा पासवर्ड डालते हैं…


मोबाइल:


क्या करूँ?

मैं हमेशा साथ रहता हूँ

आप तो

कभी-कभी ही याद आते हैं…


धर्म (थोड़ा उदास):


पहले लोग

मेरे लिए उपवास रखते थे

मन को साफ़ करते थे


अब

तुम्हारे लिए

नेट पैक रिचार्ज करते हैं…


मोबाइल (मुस्कुराकर):


लेकिन देखिए

मैंने आपको खत्म नहीं किया


मैंने आपको

HD में ला दिया

4K में दिखा दिया

लाइव कर दिया…


धर्म:


हाँ…

तस्वीर साफ़ हो गई है

लेकिन नीयत

थोड़ी धुंधली हो गई है…


मोबाइल:


अब लोग

आपको सुनते हैं

वीडियो में

रील्स में

शॉर्ट्स में


कम समय में

ज़्यादा ज्ञान…


धर्म:


ज्ञान छोटा नहीं होता

समझ छोटी हो जाती है…


मोबाइल (थोड़ा चुप):


लोग अब

आपके लिए लड़ते भी हैं

मेरे प्लेटफॉर्म पर


कमेंट्स में

गालियाँ देते हैं

आपके नाम पर…


धर्म (गहरी सांस लेकर):


पहले

लोग मुझे जीते थे

अब

लोग मुझे साबित करते हैं…


मोबाइल:


तो क्या करूँ मैं?

मैं तो सिर्फ

दिखाता हूँ

जो लोग देखना चाहते हैं…


धर्म:


और मैं

वो दिखाता हूँ

जो लोग देखना नहीं चाहते…


मोबाइल:


तो फिर

हम दोनों में फर्क क्या है?


धर्म:


तुम

बाहर की दुनिया हो

मैं

अंदर की…


तुम

ध्यान भटकाते हो

मैं

ध्यान लगाता हूँ…


मोबाइल (धीरे से):


क्या हम

साथ नहीं रह सकते?


धर्म (मुस्कुराकर):


रह सकते हैं…


अगर तुम

शोर कम कर दो

और मैं

अहंकार…


धर्म और मोबाइल


दोनों साथ हों

तो इंसान

जुड़ा हुआ भी रहेगा

और जगा हुआ भी…


मुकेश ,,,,,,,,

डिजिटल युग में धर्म

डिजिटल युग में धर्म


धर्म!

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

और जो कहना चाहता हूँ

उसे शास्त्रों में नहीं

स्क्रीन पर लिख देना चाहता हूँ…


धर्म!


पहले तुम

मंदिर की घंटियों में थे

मस्जिद की अज़ानों में

गुरुद्वारे की सेवा में


अब तुम

नोटिफिकेशन में हो

ट्रेंडिंग हैशटैग में हो

और वायरल वीडियो में हो…


धर्म!


पहले लोग

तुम तक चलकर आते थे

नंगे पाँव

झुकी हुई आँखों के साथ


अब तुम

उँगलियों के एक स्वाइप में मिल जाते हो

और शायद

उतनी ही जल्दी छूट भी जाते हो…


धर्म!


अब प्रवचन लाइव होते हैं

आरती ऑनलाइन होती है

दान QR कोड से होता है


सब कुछ आसान हो गया है


लेकिन पता नहीं क्यों

मन उतना शांत नहीं होता

जितना कभी

एक छोटे से मंदिर में

दीया जलाने से होता था…


धर्म!


तुम अब

बहस बन गए हो

कमेंट सेक्शन में


लोग तुम्हें समझते कम हैं

लड़ते ज़्यादा हैं

तुम्हारे नाम पर

अपने-अपने सच साबित करते हैं…


धर्म!


अब हर कोई

तुम्हारा ज्ञाता है

हर कोई गुरु है

हर कोई उपदेशक है


लेकिन शिष्य

कम होते जा रहे हैं…


धर्म!


तुम्हारी तस्वीरें

अब DP में हैं

तुम्हारे श्लोक

स्टेटस में हैं


लेकिन दिल में

कितनी जगह बची है तुम्हारे लिए

ये कोई नहीं देखता…


धर्म!


तुम पहले

अंदर की यात्रा थे

अब बाहर की पहचान बन गए हो


पहले तुमसे

इंसान बेहतर होता था

अब तुम्हारे नाम पर

इंसान दूसरों को छोटा करने लगा है…


धर्म!


मैं तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता

क्योंकि तुममें

सदियों की सच्चाई है


लेकिन मैं तुम्हें

इस शोर में खोते हुए भी नहीं देख सकता…


धर्म!


एक दिन

शायद हम फिर लौटेंगे

तुम्हारी असली जगह पर


जहाँ

न नेटवर्क होगा

न स्क्रीन होगी


सिर्फ

एक शांत मन होगा

और तुम…


डिजिटल युग में धर्म


यह बदलाव है

या भटकाव


ये तय करना है हमें…


क्योंकि धर्म

अब भी वहीं है

बस

हम बदल गए हैं…


मुकेश ,,,,,,,,,,,,


आस्था बनाम आधुनिकता

 आस्था बनाम आधुनिकता


आस्था!

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

और जो कहना चाहता हूँ

उसे मंदिरों में नहीं

लोगों के दिलों में रख देना चाहता हूँ…


आस्था!


तुम हमेशा से थी

धीरे-धीरे

दीये की लौ की तरह


और अब

आधुनिकता आ गई है

LED की तेज़ रोशनी लेकर


दोनों ही रोशनी हैं

लेकिन फर्क इतना है

कि तुम सुकून देती हो

वो दिखावा ज़्यादा करती है…


आधुनिकता!


मैं तुमसे भी कुछ कहना चाहता हूँ

तुम बुरी नहीं हो


तुमने हमें उड़ना सिखाया

दुनिया को छोटा कर दिया

सोच को खोल दिया


लेकिन कभी-कभी

तुमने दिल को

थोड़ा छोटा भी कर दिया…


आस्था!


तुम मंदिर में थी

मस्जिद में थी

गुरुद्वारे में थी


अब तुम

मोबाइल के वॉलपेपर में भी हो

और स्टेटस में भी


लेकिन पता नहीं क्यों

पहले जितनी गहरी थी

अब उतनी दिखती नहीं…


आधुनिकता!


तुमने सवाल करना सिखाया

हर चीज़ को तौलना सिखाया

“क्यों” पूछना सिखाया


और यह अच्छा है


लेकिन हर “क्यों” के बाद

अगर “विश्वास” मर जाए

तो फिर

इंसान सिर्फ मशीन रह जाता है…


आस्था!


तुम अंधी भी होती हो कभी-कभी

लोग तुम्हारे नाम पर

डर फैलाते हैं

नफ़रत फैलाते हैं


और तब

तुम आस्था नहीं रहती

सिर्फ आदत बन जाती हो…


आधुनिकता!


तुम तेज़ हो

बहुत तेज़


इतनी तेज़

कि कई बार

इंसान खुद से आगे निकल जाता है


और फिर

पीछे मुड़कर देखता है

तो पाता है

कि आत्मा कहीं छूट गई है…


आस्था!


मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता

क्योंकि तुममें

मेरा बचपन है

मेरी माँ की प्रार्थनाएँ हैं

मेरे पिता का विश्वास है…


आधुनिकता!


मैं तुम्हें भी छोड़ नहीं सकता

क्योंकि तुममें

मेरा आज है

मेरे सपने हैं

मेरी उड़ान है…


आस्था और आधुनिकता!


तुम दोनों से कहना है

लड़ो मत


एक साथ रहो

जैसे आँख और दिमाग

जैसे दिल और दिमाग


क्योंकि

आस्था बिना आधुनिकता

अंधविश्वास बन जाती है


और आधुनिकता बिना आस्था

अंदर से खाली…


आस्था बनाम आधुनिकता


यह लड़ाई नहीं है

यह संतुलन है


और शायद

सबसे बड़ा इंसान वही है

जो दोनों को साथ लेकर चलता है…


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

प्रेम के बाद का अकेलापन

 प्रेम के बाद का अकेलापन


अकेलापन!

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

लेकिन तुम तो सब जानते हो

तुम तो वहीं से शुरू होते हो

जहाँ प्रेम खत्म होता है…


अकेलापन!


जब वो थी

तो तुम कहीं नहीं थे


या शायद थे भी

तो इतने हल्के

कि महसूस ही नहीं हुए


अब तुम इतने गहरे हो

कि हर सांस में उतर आते हो…


अकेलापन!


उसके जाने के बाद

कमरा वही है

बिस्तर वही है

तकिया वही है


बस

नींद नहीं है…


अकेलापन!


पहले फोन बजता था

उसका नाम आता था

दिल मुस्कुरा देता था


अब फोन बजता है

तो बस

आवाज़ आती है…

कोई नहीं आता…


अकेलापन!


उसकी हँसी

अब भी याद है

उसकी बातें

अब भी कानों में हैं


लेकिन अब

ये सब यादें

तुम्हारी तरफ से आती हैं

जैसे कोई धीरे-धीरे

जख्म कुरेद रहा हो…


अकेलापन!


पहले मैं उससे बात करता था

अब खुद से करता हूँ


और कई बार

खुद ही जवाब देता हूँ

जैसे वो अब भी

मेरे अंदर कहीं रह गई हो…


अकेलापन!


उसके बाद

कई लोग मिले

कई चेहरे

कई आवाज़ें


लेकिन कोई भी

उस “जगह” तक नहीं पहुँचा

जहाँ वो थी…


अकेलापन!


मैंने उसकी चीज़ें हटाईं

उसके मैसेज डिलीट किए

उसकी तस्वीरें छुपा दीं


लेकिन तुम

किसी फाइल में नहीं थे

तुम तो

सीधे दिल में सेव थे…


अकेलापन!


लोग कहते हैं

समय सब ठीक कर देता है


शायद कर भी देता हो

लेकिन कुछ खाली जगहें

ठीक नहीं होतीं

बस

आदत बन जाती हैं…


अकेलापन!


अब मैं तुम्हारे साथ जीना सीख रहा हूँ

जैसे किसी अधूरी कहानी के साथ

जिसका अंत नहीं होता


और शायद

हर प्रेम के बाद

यही सबसे सच्चा रिश्ता होता है —

तुम और मैं…


अकेलापन!


एक बात बताऊँ?


अगर वो कभी लौट भी आए

तो शायद

मैं पहले जैसा न रहूँ


क्योंकि तुमने

मुझे बदल दिया है…


मुकेश ,,,,,,,

अकेलापन! मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

 अकेलापन!

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

और जो कहना चाहता हूँ

उसे भीड़ में नहीं

तन्हा कमरों की दीवारों पर लिख देना चाहता हूँ…


अकेलापन!


लोग कहते हैं

तुम बुरी चीज़ हो

तुम आदमी को खा जाते हो


लेकिन सच कहूँ

तो कई बार

तुम ही सबसे सच्चे लगते हो…


अकेलापन!


जब सब साथ होते हैं

तब भी तुम आ जाते हो

धीरे से

बिना दरवाज़ा खटखटाए


और मैं

हँसते हुए चेहरों के बीच

अचानक

चुप हो जाता हूँ…


अकेलापन!


पहले मैं तुमसे भागता था

दोस्तों में

शराब में

बातों में

शोर में


लेकिन तुम

हर जगह पहुँच जाते थे

जैसे मेरा पीछा करते हो…


अकेलापन!


अब मैंने

तुमसे भागना छोड़ दिया है

अब तुमसे बात करता हूँ

जैसे किसी पुराने दोस्त से


तुम सुनते हो

बिना टोके

बिना जज किए

बिना सलाह दिए…


अकेलापन!


तुमने ही सिखाया

कि खुद के साथ बैठना क्या होता है

खामोशी को सुनना क्या होता है

और अपने भीतर

कितना कुछ भरा होता है…


अकेलापन!


लेकिन कभी-कभी

तुम भारी हो जाते हो

इतने भारी

कि साँस लेना मुश्किल हो जाता है


तब मन करता है

कोई हो

जो बस कह दे —

“मैं हूँ…”


अकेलापन!


फोन भरा रहता है

नोटिफिकेशन आते रहते हैं

लोग ऑनलाइन दिखते हैं


फिर भी

दिल ऑफलाइन रहता है

और तुम

फुल नेटवर्क के साथ

मेरे पास बैठे रहते हो…


अकेलापन!


तुम बुरे नहीं हो

बस

तुम्हारी आदत नहीं है हमें


हम डरते हैं

खुद से मिलने से

इसलिए तुम्हें

नाम दे देते हैं — “अकेलापन”…


अकेलापन!


एक दिन

शायद मैं इतना मजबूत हो जाऊँ

कि तुम्हारे साथ भी

मुस्कुरा सकूँ


और कह सकूँ —

“चलो, आज फिर

थोड़ा-सा खुद को जीते हैं…”


मुकेश ,,,,,,,,,

पिता की चुप्पी

 पिता की चुप्पी


पिता!

मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ

लेकिन आपकी चुप्पी

हर बार

मेरे शब्दों से पहले

आकर खड़ी हो जाती है…


पिता!


आप बहुत कम बोलते हैं

इतना कम

कि कई बार लगता है

जैसे आप कुछ छुपा रहे हैं


लेकिन अब समझ आता है

आप कुछ छुपाते नहीं

आप बहुत कुछ सहते हैं…


पिता!


जब घर में शोर होता था

आप चुप रहते थे

जब सब अपनी-अपनी बात कह रहे होते थे

आप बस सुनते रहते थे


तब लगता था

आपको कोई फर्क नहीं पड़ता


अब समझ आया

सबसे ज़्यादा फर्क

आपको ही पड़ता था…


पिता!


आपने कभी नहीं बताया

कि थक जाते हैं आप

कि डरते भी हैं कभी-कभी

कि रोने का मन भी करता है


आपने बस

अपने हिस्से का आसमान

अंदर ही अंदर

समेट कर रख लिया…


पिता!


आपकी चुप्पी में

कितनी आवाज़ें हैं


अधूरी इच्छाओं की

टूटे हुए सपनों की

दबी हुई तकलीफों की


लेकिन बाहर से

वो बस एक साधारण

“ठीक हूँ” बनकर रह जाती है…


पिता!


जब मैंने गलती की

आप चिल्लाए नहीं

बस चुप हो गए


और आपकी वो चुप्पी

मेरी सबसे बड़ी सज़ा बन गई…


पिता!


आपकी चुप्पी

कभी दीवार लगती है

कभी छाँव


कभी दूरी बना देती है

कभी संभाल लेती है


मैं आज तक नहीं समझ पाया

कि आपकी चुप्पी

मुझसे दूर है

या मेरे सबसे पास…


पिता!


अब जब मैं बड़ा हो रहा हूँ

तो खुद को

थोड़ा-थोड़ा

आप जैसा पाता हूँ


बातें कम हो गई हैं

चुप्पियाँ बढ़ गई हैं


और डर लगता है

कि कहीं मैं भी

आपकी तरह

सब कुछ भीतर ही न रख लूँ…


पिता!


एक दिन

अगर आपकी चुप्पी

हमेशा के लिए चली गई

तो शायद


मैं सबसे ज़्यादा

उसी को मिस करूँगा

जिसे मैं कभी समझ नहीं पाया…


पिता!


आप बोलते नहीं

लेकिन आपकी चुप्पी

हर रोज़ मुझसे कहती है —


“मैं हूँ…”


और शायद

कभी-कभी

“मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ…”


मुकेश ,,,,,,,,,,,

बूढ़ा होता हुआ पिता

 बूढ़ा होता हुआ पिता


पिता!

मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ

लेकिन डरता हूँ

कि कहीं आप हँस न दें

या फिर हमेशा की तरह

चुप न हो जाएँ…


पिता!


धीरे-धीरे

आप बूढ़े हो रहे हैं


जैसे दीवार पर टंगी घड़ी

अब भी चल तो रही है

लेकिन उसकी टिक-टिक में

पहले जैसा भरोसा नहीं रहा…


पिता!


आपके बाल

जो कभी काले थे

अब सफ़ेद नहीं

बल्कि कुछ-कुछ गायब हो रहे हैं


और मैं

हर बार बाल कटवाते हुए सोचता हूँ

कि उम्र

कितनी चुपचाप अपना काम करती है!


पिता!


आपकी चाल

जो कभी तेज़ थी

अब ठहर-ठहर कर चलती है


सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त

आप दीवार पकड़ लेते हैं

और मैं

दूसरी तरफ़ देखकर

अपनी आँखें छुपा लेता हूँ…


पिता!


आप अब कम बोलते हैं

जैसे शब्द भी

आपके साथ थक गए हों


पहले आप समझाते थे

अब बस देखते हैं

और मैं समझ जाता हूँ

कि चुप्पी भी

एक तरह की सीख होती है!


पिता!


आपके हाथ

जो कभी मज़बूत थे

अब हल्के-हल्के काँपते हैं


उन्हीं हाथों से

आपने मेरा हाथ थामा था

जब मैं चलना सीख रहा था


और अब

मन करता है

कि मैं आपका हाथ पकड़ लूँ…


पिता!


आप अब

बार-बार एक ही बात पूछते हैं

एक ही किस्सा सुनाते हैं


और मैं

पहले चिढ़ जाता था


अब मुस्कुरा कर सुनता हूँ

जैसे पहली बार सुन रहा हूँ…


पिता!


आपके चश्मे का नंबर

हर साल बढ़ जाता है


लेकिन मुझे लगता है

आपकी नज़र

अब भी उतनी ही साफ़ है

क्योंकि आप

आज भी मुझे

मेरे भीतर तक देख लेते हैं!


पिता!


डर लगता है

कि एक दिन

आपकी वो कुर्सी खाली रह जाएगी

जहाँ आप हर शाम बैठते हैं


और घर में

सब कुछ होते हुए भी

कुछ बहुत ज़रूरी

ग़ायब हो जाएगा…


पिता!


लोग कहते हैं

समय सब सिखा देता है


लेकिन समय

एक चीज़ कभी नहीं सिखाता —

पिता के बिना जीना…


पिता!


अगर कभी

मैं कुछ कह न पाऊँ

तो समझ लीजिएगा


कि मैं आपसे

बहुत प्यार करता हूँ

बस

आपकी तरह

कह नहीं पाता…


मुकेश ,,,,,,,,,,,