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हरिवंशपुराण — भाग ३५ - बाणासुर-संग्राम का परिणाम

 हरिवंशपुराण — भाग ३५ - बाणासुर-संग्राम का परिणाम : अनिरुद्ध की मुक्ति और उषा का भविष्य कथा, पाठ-संदर्भ और आलोचनात्मक समीक्षा युद्ध के बाद की स्थिति बाणासुर और श्रीकृष्ण के बीच हुए भीषण संघर्ष का निर्णायक मोड़ तब आया, जब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से बाणासुर की अनेक भुजाओं का छेदन किया। बाणासुर की शक्ति क्षीण हो गई, किंतु भगवान शिव की प्रार्थना के कारण श्रीकृष्ण ने उसका वध नहीं किया। इस प्रकार युद्ध का परिणाम केवल एक योद्धा की पराजय तक सीमित नहीं रहा; बाणासुर के जीवन की रक्षा भी कथा का महत्त्वपूर्ण पक्ष बनी। यहाँ ध्यान देने योग्य है कि बाणासुर का पराभव उसके संपूर्ण अस्तित्व का निषेध नहीं है। उसकी युद्ध-शक्ति और अहंकार को नियंत्रित किया गया, लेकिन उसके जीवन को समाप्त नहीं किया गया। कथा में दंड और संरक्षण का यह सह-अस्तित्व संघर्ष के समाधान को विशेष अर्थ देता है। भगवान शिव की भूमिका भी इसी संदर्भ में समझनी चाहिए। वे अपने भक्त की रक्षा के लिए उपस्थित हुए थे। श्रीकृष्ण द्वारा बाणासुर को जीवित छोड़ना शिव के प्रति सम्मान और बाणासुर के लिए एक नई स्थिति—दोनों को स्थान देता है। इस प्रसंग को द...

हरिवंशपुराण — भाग ३४ -बाणासुर-संग्राम : सहस्र भुजाओं का अभिमान

 हरिवंशपुराण — भाग ३४ -बाणासुर-संग्राम : सहस्र भुजाओं का अभिमान शक्ति, मर्यादा और भक्तिरक्षा का निर्णायक प्रसंग श्रीकृष्ण और बाणासुर की सेनाओं के बीच युद्ध तीव्र हो उठा। बाणासुर को अपनी सहस्र भुजाओं और युद्ध-कौशल पर गर्व था। भगवान शिव उसकी रक्षा के लिए उपस्थित थे, जबकि श्रीकृष्ण अनिरुद्ध को मुक्त कराने के उद्देश्य से युद्ध कर रहे थे। इस संघर्ष में दोनों पक्षों की शक्ति का प्रदर्शन हुआ। बाणासुर ने अपनी सामर्थ्य के बल पर यादव सेना को चुनौती दी, लेकिन श्रीकृष्ण ने धैर्य और युद्ध-कौशल से उसका सामना किया। कथा का केंद्र केवल युद्ध की विजय नहीं, बल्कि बाणासुर के उस अभिमान का परिणाम भी है जिसने उषा और अनिरुद्ध के संबंध को समझने के बजाय उसे बलपूर्वक रोकना चाहा। उसकी विशाल शक्ति समस्या का समाधान नहीं कर सकी; उलटे उसी ने संकट को व्यापक बना दिया। सहस्र भुजाओं का छेदन बाणासुर ने श्रीकृष्ण को युद्ध की चुनौती दी। श्रीकृष्ण ने उसके अस्त्रों का सामना करते हुए उसका रथ और युद्ध-सामर्थ्य नष्ट कर दिया। फिर उन्होंने सुदर्शन चक्र उठाया और बाणासुर की सहस्र भुजाओं को काटना आरंभ किया। बाणासुर की दशा देखकर भ...

हरिवंशपुराण — भाग ३३ - बाणासुर-संग्राम : श्रीकृष्ण का शोनितपुर आगमन और शिव-हरि का आमना-सामना

 हरिवंशपुराण — भाग ३३ - बाणासुर-संग्राम : श्रीकृष्ण का शोनितपुर आगमन और शिव-हरि का आमना-सामना भाग ३२ में उषा और अनिरुद्ध के प्रेम का प्रसंग राजकीय संघर्ष में बदल गया था। अनिरुद्ध को बाणासुर ने शोनितपुर में बंदी बना लिया। अब कथा उस निर्णायक मोड़ पर पहुँचती है, जहाँ एक ओर अपने पौत्र की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण आगे बढ़ते हैं और दूसरी ओर बाणासुर की रक्षा के लिए भगवान शिव युद्धभूमि में उपस्थित होते हैं। द्वारका में अनिरुद्ध के बंदी होने का समाचार देवर्षि नारद ने जब द्वारका पहुँचकर अनिरुद्ध के बंदी बनाए जाने का समाचार दिया, तब यादवों के बीच चिंता व्याप्त हो गई। अनिरुद्ध केवल श्रीकृष्ण के पौत्र नहीं थे; वे प्रद्युम्न के पुत्र और यादववंश की अगली पीढ़ी के प्रतिनिधि भी थे। शोनितपुर में उनके साथ जो हुआ था, वह अब केवल उषा के प्रेम और बाणासुर के पारिवारिक अधिकार का प्रश्न नहीं रह गया था। अनिरुद्ध को नागपाश में बाँधकर बंदी बना लिया गया था। इस समाचार ने श्रीकृष्ण को तत्काल कार्रवाई के लिए प्रेरित किया। श्रीकृष्ण ने परिस्थिति को समझते हुए अपने परिजनों और प्रमुख योद्धाओं के साथ शोनितपुर की ओर प्रस्था...

हरिवंश पुराण - भाग ३२ — अनिरुद्ध और बाणासुर : प्रेम से संघर्ष तक

 भाग ३२ — अनिरुद्ध और बाणासुर : प्रेम से संघर्ष तक उषा और अनिरुद्ध का गुप्त मिलन तब संकट में बदल जाता है, जब शोनितपुर के राजमहल में एक अपरिचित युवक की उपस्थिति का रहस्य खुलता है। यह प्रसंग व्यक्तिगत सम्बन्ध, राजकीय अधिकार और वीरता के टकराव को सामने लाता है। गुप्त मिलन का रहस्य खुलना चित्रलेखा अनिरुद्ध को द्वारका से शोनितपुर ले आती है। उषा और अनिरुद्ध का मिलन होता है और दोनों कुछ समय तक राजमहल के अन्तःपुर में साथ रहते हैं। लेकिन बाणासुर का महल केवल निजी जीवन का स्थान नहीं, राजकीय अनुशासन और सुरक्षा से घिरा हुआ परिसर भी है। वहाँ किसी अपरिचित पुरुष की उपस्थिति अधिक समय तक छिपी नहीं रह सकती। जब अनिरुद्ध के विषय में जानकारी बाणासुर तक पहुँचती है, तो यह केवल उसकी पुत्री के प्रेम का प्रश्न नहीं रह जाता। बाणासुर की दृष्टि में उसके अधिकार-क्षेत्र में एक अनजान युवक का प्रवेश और उसका सैनिकों के सामने न झुकना चुनौती बन जाता है। हरिवंश के विष्णुपर्व में इस प्रसंग का वर्णन उषा-अनिरुद्ध कथा के उसी विस्तृत क्रम में आता है, जिसमें चित्रलेखा द्वारा अनिरुद्ध को लाना, उसका बाणासुर के सैनिकों से संघर्ष...

हरिवंश पुराण - भाग ३१ — उषा का स्वप्न और चित्रलेखा : प्रेम, कल्पना तथा सखी की भूमिका

  भाग ३१ — उषा का स्वप्न और चित्रलेखा : प्रेम, कल्पना तथा सखी की भूमिका कथा का आरम्भ : स्वप्न में देखा हुआ पुरुष बाणासुर की पुत्री उषा शोनितपुर में रहती थी। राजमहल की सुरक्षा और राजकीय मर्यादाओं के बीच उसका जीवन बीत रहा था। एक रात उसने स्वप्न में एक ऐसे युवक को देखा, जिससे उसका मन गहरे रूप से जुड़ गया। स्वप्न समाप्त हुआ तो वह युवक उसके सामने नहीं था, लेकिन उसकी स्मृति उषा के मन में रह गई। वह व्याकुल होकर उसे खोजने लगी। हरिवंश के विष्णुपर्व में उषा के स्वप्न और उसके बाद की घटनाओं का वर्णन बाणासुर-प्रसंग के अंतर्गत मिलता है। इस कथा का अगला महत्त्वपूर्ण पात्र है—चित्रलेखा, जो उषा की सखी होने के साथ-साथ चित्र बनाने की कुशलता और असाधारण सामर्थ्य से संपन्न है। उषा की बेचैनी देखकर चित्रलेखा उससे पूछती है कि वह किसे खोज रही है। उषा अपने स्वप्न में देखे युवक का रूप बताती है। वह उसे पहचानना चाहती है, लेकिन उसके पास न नाम है, न कुल का परिचय और न कोई ऐसा बाहरी संकेत जिससे उसकी खोज की जा सके। उसके पास केवल स्वप्न की स्मृति और उस स्मृति से जुड़ा आकर्षण है। यहीं से कथा में चित्रलेखा की भूमिका आरम...

हरिवंश पुराण - भाग ३० — बाणासुर :

भाग ३० — बाणासुर : शिवभक्ति, सहस्र भुजाएँ और युद्ध की आकांक्षा हरिवंश के विष्णुपर्व में बाणासुर का प्रसंग कृष्ण-कथा को एक नए संघर्ष की ओर ले जाता है। बाणासुर प्रह्लाद की दैत्य-परंपरा से संबंधित, महाबलि का पुत्र और शोणितपुर का शासक है। उसकी पहचान उसकी सहस्र भुजाओं तथा भगवान शिव के प्रति अनन्य भक्ति से जुड़ी है। किंतु कथा का विशेष पक्ष यह है कि असाधारण शक्ति प्राप्त होने पर भी वह संतुष्ट नहीं है। अपनी सामर्थ्य के योग्य प्रतिद्वंद्वी न मिलने से उसके भीतर युद्ध की आकांक्षा उत्पन्न होती है। शिवभक्ति और शक्ति का वरदान बाणासुर भगवान शिव की आराधना करता है। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव उसे वरदान देते हैं। सहस्र भुजाओं वाला बाणासुर अपनी शक्ति पर गर्व करता है, लेकिन उसके लिए यह सामर्थ्य तभी सार्थक प्रतीत होती है जब कोई उसका सामना कर सके। यहीं उसके चरित्र का अंतर्विरोध सामने आता है। शिव के प्रति उसकी निष्ठा उसे आध्यात्मिक प्रतिष्ठा देती है, जबकि अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की इच्छा उसे संघर्ष की ओर ले जाती है। कथा इस विरोधाभास को किसी दार्शनिक सूत्र के रूप में नहीं, बल्कि बाणासुर की मनःस्थिति और...

हरिवंश पुराण - भाग २९ — अक्रूर, शतधन्वा और स्यमन्तक मणि

 हरिवंश पुराण  - भाग २९ — अक्रूर, शतधन्वा और स्यमन्तक मणि : लोभ, विश्वासघात तथा यादवों का आंतरिक संकट कथा की पृष्ठभूमि : पुराना विवाद फिर उभरता है स्यमन्तक मणि की पहली कथा में कृष्ण पर चोरी और हत्या का संदेह किया गया था। उन्होंने प्रसेन की मृत्यु का वास्तविक कारण खोजकर मणि प्राप्त की और उसे सत्राजित को लौटा दिया। सत्राजित ने अपनी भूल स्वीकार की और अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह कृष्ण से किया। ऐसा प्रतीत होता था कि विवाद समाप्त हो गया है। किंतु हरिवंश का अगला प्रसंग दिखाता है कि किसी विवाद का बाहरी समाधान उसके पीछे सक्रिय ईर्ष्या, स्वार्थ और प्रतिष्ठा-संघर्ष को अनिवार्य रूप से समाप्त नहीं करता। इस बार संकट का केंद्र सत्राजित की हत्या है। कथा में शतधन्वा, अक्रूर और कृतवर्मा के नाम सामने आते हैं। सत्यभामा से विवाह और मणि के स्वामित्व को लेकर कुछ लोगों की आकांक्षाएँ अधूरी रह गई थीं। कृष्ण की अनुपस्थिति में यह असंतोष हिंसक घटना का रूप लेता है। हरिवंश के अक्रूर-चरित में इस प्रसंग का विस्तार मिलता है।  शतधन्वा द्वारा सत्राजित की हत्या कथा के अनुसार, शतधन्वा ने रात में सत्राजित की...

हरिवंश पुराण -भाग २८ — स्यमन्तक मणि

 हरिवंश पुराण  -भाग २८ — स्यमन्तक मणि : आरोप, अन्वेषण और प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना कथा का आरम्भ : सूर्य का उपहार द्वारका में यादवों के बीच सत्राजित नामक एक व्यक्ति रहता था, जो सूर्य का उपासक था। हरिवंश के आख्यान के अनुसार, उसकी उपासना से प्रसन्न होकर सूर्य ने उसे स्यमन्तक मणि प्रदान की। यह मणि साधारण रत्न नहीं थी। उसके विषय में कहा गया है कि वह प्रतिदिन स्वर्ण उत्पन्न करती थी और यादवों के निवास में समय पर वर्षा तथा रोगों से सुरक्षा जैसी समृद्धि के संकेतों से जुड़ी थी। मणि का वैभव इतना विलक्षण था कि उसे धारण करके नगर में प्रवेश करने पर लोग सत्राजित को ही सूर्य समझ बैठे। सत्राजित ने बाद में यह मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी। कृष्ण ने भी इस मणि में रुचि दिखाई थी। हरिवंश के पाठ में यह बात महत्त्वपूर्ण है कि कृष्ण उसे प्राप्त करना चाहते थे, किंतु इच्छा होने के बावजूद उन्होंने उसे बलपूर्वक नहीं लिया। इसके बाद घटनाओं की शृंखला आरम्भ होती है, जिसमें एक वस्तु के प्रति इच्छा आगे चलकर संदेह और आरोप का कारण बनती है।  प्रसेन की मृत्यु और कृष्ण पर संदेह एक दिन प्रसेन स्यमन्तक मणि धारण कर...

हरिवंश पुराण - भाग २७ — द्वारका में कृष्ण

  भाग २७ — द्वारका में कृष्ण : राजसत्ता, लोकजीवन और आदर्श शासक की अवधारणा नगर में प्रवेश : एक कथा का प्रसंग हरिवंश के विष्णुपर्व में द्वारका के निर्माण और उसके वैभव-वर्णन के बाद कृष्ण के नगर में प्रवेश तथा उनके स्वागत का प्रसंग आता है। मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह प्रसंग अध्याय १०० के अंतर्गत दिया गया है। नगर को देखकर कृष्ण अपने निवास और उसकी समृद्धि का अवलोकन करते हैं। यह केवल किसी विजेता अथवा नगर-स्वामी की अपने वैभव से भेंट नहीं है; इस प्रसंग में कृष्ण और यादव समुदाय के बीच स्थापित संबंधों की भी झलक मिलती है। महाभारत का खिलभाग और कृष्ण-कथा से संबंधित संस्कृत में कृष्ण का व्यक्तित्व केवल असाधारण पराक्रम करने वाले नायक का नहीं, बल्कि अपने समुदाय के साथ रहने वाले नेतृत्वकर्ता का भी है।  यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है। कृष्ण के नगर-प्रवेश का वर्णन अपने आप में किसी सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था का पूरा विवरण नहीं देता। इसलिए इससे सीधे कर-व्यवस्था, न्याय-प्रणाली अथवा शासन-संस्थाओं के निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। फिर भी कथा में उपस्थित सामाजिक व्यवहार, सम्...

हरिवंश पुराण - तृतीय खंड — भाग 26 - द्वारका का विस्तार

हरिवंश पुराण - तृतीय खंड — भाग 26 - द्वारका का विस्तार — नगर, समुद्र और राजनीतिक भूगोल मथुरा से पश्चिम की यात्रा हरिवंश के विष्णुपर्व में द्वारका की स्थापना का प्रसंग यादवों की यात्रा से आरम्भ होता है। जरासंध के निरंतर विरोध और मथुरा पर संकट की पृष्ठभूमि में कृष्ण यादवों को पश्चिम दिशा की ओर ले जाते हैं। यात्रा के बाद वे समुद्र के निकट पहुँचते हैं। वहाँ का तटीय प्रदेश, वनस्पति, समुद्री हवा और विस्तृत भूमि कथा में नए नगर के चयन की पृष्ठभूमि बनते हैं। इसके बाद कृष्ण समुद्र के किनारे एक ऐसे भूभाग को देखते हैं जहाँ नगर बसाया जा सकता है। आख्यान में भूमि की प्रकृति, नगर के लिए उसकी उपयुक्तता और समुद्र से उसकी निकटता का वर्णन मिलता है। इस प्रकार द्वारका का जन्म केवल किसी चमत्कारिक नगरी की कल्पना के रूप में नहीं, बल्कि एक स्थान के चयन और वहाँ बसावट की कथा के रूप में भी सामने आता है। इस प्रसंग का पहला महत्त्व भौगोलिक है। कृष्ण-कथा में स्थान परिवर्तन का कारण राजनीतिक संकट है, लेकिन समाधान के लिए चुना गया स्थान अपने प्राकृतिक परिवेश के कारण भी महत्त्वपूर्ण है। समुद्र यहाँ केवल कथा की पृष्ठभूमि नह...