दशोपनिषद् : स्वरूप, दार्शनिक प्रतिपादन एवं परस्पर तुलनात्मक अध्ययन
दशोपनिषद् : स्वरूप, दार्शनिक प्रतिपादन एवं परस्पर तुलनात्मक अध्ययन उपनिषद्-साहित्य भारतीय दर्शन की उस परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें मनुष्य ने पहली बार अपने अस्तित्व, चेतना, जगत्, मृत्यु और परम सत्य के सम्बन्ध में अत्यन्त गम्भीर प्रश्न उठाए। वैदिक साहित्य के कर्मकाण्डीय पक्ष से आगे बढ़कर उपनिषदों में ज्ञान, आत्मानुभूति और तत्त्वचिन्तन को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ। इसी कारण इन्हें वेदान्त का आधार माना जाता है। उपनिषदों की विस्तृत परम्परा में दस उपनिषद् विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं, जिन्हें सामान्यतः दशोपनिषद् कहा जाता है। ईशावास्योपनिषद्, केनोपनिषद्, कठोपनिषद्, प्रश्नोपनिषद्, मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक्योपनिषद्, तैत्तिरीयोपनिषद्, ऐतरेयोपनिषद्, छान्दोग्योपनिषद् तथा बृहदारण्यकोपनिषद् इस समूह में सम्मिलित हैं। इन दस उपनिषदों का महत्त्व केवल उनकी प्राचीनता अथवा धार्मिक प्रतिष्ठा में नहीं है। इनमें सत्य की खोज के अनेक मार्ग दिखाई देते हैं। कहीं गुरु और शिष्य का संवाद है, कहीं मृत्यु के सम्मुख खड़े मनुष्य का प्रश्न है, कहीं चेतना की अवस्थाओं का विश्लेषण है, कहीं सृष्टि की उत्पत्ति का अन...