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Friday, 13 March 2026

अध्याय – 21 : एक अधूरी मुलाक़ात

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 21 : एक अधूरी मुलाक़ात


शाम का समय था।


शहर की सड़कें

धीरे-धीरे भीड़ से भर रही थीं।


मैं

बहुत दिनों बाद

कमरे से बाहर निकला था।


किसी विशेष कारण से नहीं।


बस

चलने का मन हुआ था।


कभी-कभी

मनुष्य

बिना कारण भी

चल पड़ता है।


शायद

अंदर कुछ बदलने लगता है।


मैं

पार्क के पास पहुँचा।


वहाँ

एक पुराना पीपल का पेड़ था।


मैं

कुछ देर वहीं

खड़ा रहा।


हवा

धीरे-धीरे चल रही थी।


उसी समय

मोबाइल में

एक संदेश आया।


साक्षी का।


“अस्तित्व…”


“आप अभी कहाँ हैं?”


मैंने लिखा—


“बस

एक पार्क के पास।”


कुछ क्षण बाद

उसका उत्तर आया—


“अजीब बात है।”


“मैं भी

अभी एक पार्क में हूँ।”


मैं

हल्के से मुस्कुराया।


शहर बड़ा था।


संयोग

इतनी आसानी से नहीं होते।


मैंने

मोबाइल जेब में रखा।


पेड़ की ओर देखा।


पत्तियाँ

हवा में हिल रही थीं।


उसी समय

दूर

पार्क के रास्ते पर

एक स्त्री चलती हुई दिखाई दी।


वह

धीरे-धीरे

पेड़ के पास से गुज़री।


हमारी नज़र

एक क्षण के लिए मिली।


फिर

वह आगे बढ़ गई।


मैं

कुछ क्षण

उसे देखता रहा।


फिर

धीरे से मुस्कुरा दिया।


शायद

वह साक्षी नहीं थी।


और शायद


कभी-कभी

मुलाक़ातें


बस

इतनी ही होती हैं—


एक क्षण की।


मोबाइल

फिर चमका।


साक्षी का संदेश था—


“अस्तित्व…”


“कभी न कभी

हम मिलेंगे।”


मैंने

धीरे से उत्तर लिखा—


“हाँ।”


“कभी न कभी।”


आकाश में

शाम गहराने लगी थी।


और मुझे लगा—


कहानी

यहाँ समाप्त नहीं हुई।


वह

बस

एक नए आरंभ के सामने

ठहर गई है।


मुकेश ,,,,,

अध्याय – 20 : प्रस्ताव

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 20 : प्रस्ताव


सुबह

धीरे-धीरे

गली में उतर रही थी।


दूधवाले की साइकिल

फिर एक बार

दरवाज़ों के सामने रुक रही थी।


ट्रिन… ट्रिन…


मैं

खिड़की के पास बैठा

चाय पी रहा था।


मोबाइल

मेज़ पर पड़ा था।


रात की बातचीत

अब भी

मन में हल्के-हल्के घूम रही थी।


तभी

मोबाइल चमका।


साक्षी का संदेश था।


“अस्तित्व…”


“अगर मैं एक अजीब बात कहूँ

तो बुरा तो नहीं मानेंगे?”


मैंने लिखा—


“कहिए।”


कुछ क्षण

चुप्पी रही।


फिर

उसका संदेश आया—


“कभी मिलना चाहिए।”


मैं

कुछ देर

स्क्रीन को देखता रहा।


इतने वर्षों की दूरी


और अब

एक छोटा-सा प्रस्ताव।


मैंने

चाय का कप मेज़ पर रखा।


खिड़की से बाहर देखा।


गली में

एक बच्चा

स्कूल के लिए भाग रहा था।


जीवन

अपनी सामान्य गति से

चल रहा था।


पर भीतर

कुछ हल्का-सा बदल गया था।


मैंने

धीरे-धीरे लिखा—


“मिलना

कभी भी हो सकता है।”


“बस

समय को

उसका क्षण चुनने दीजिए।”


कुछ देर बाद

उसका उत्तर आया—


“तो

कभी अचानक मिलते हैं।”


मैं

उस वाक्य को पढ़कर

कुछ देर चुप रहा।


अचानक मिलना।


जीवन

शायद

हमेशा इसी तरह

मिलवाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

अध्याय – 19 : उत्तर

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 19 : उत्तर


कमरे में

अब रात उतर आई थी।


लैम्प की पीली रोशनी

मेज़ पर फैले काग़ज़ों को

धीरे-धीरे उजाला दे रही थी।


मकान मालिक

अभी भी सामने बैठे थे।


उनका प्रश्न

अब भी हवा में था—


“अस्तित्व जी…

अकेलापन नहीं लगता?”


और उसी समय

मोबाइल की स्क्रीन पर

साक्षी का प्रश्न भी चमक रहा था—


“आपने कभी

किसी से प्रेम किया है?”


दो प्रश्न।


दो दिशाएँ।


पर शायद

दोनों का उत्तर

एक ही जगह छुपा था।


मैंने

कुछ क्षण आँखें बंद कर लीं।


फिर धीरे से कहा—


“अकेलापन

हमेशा बुरा नहीं होता।”


मकान मालिक

मुझे देखने लगे।


मैंने कहा—


“कभी-कभी

अकेलापन

हमें अपने भीतर ले जाता है।”


वे

चुपचाप सुनते रहे।


मैंने

धीरे से जोड़ा—


“और जहाँ मनुष्य

अपने भीतर पहुँचता है

वहीं

वह पहली बार

प्रेम को भी समझता है।”


वे

कुछ देर तक

मुझे देखते रहे।


फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोले—


“आपकी बातें

मेरी समझ से थोड़ी ऊपर हैं।”


हम दोनों

हँस पड़े।


वे उठे

और जाते-जाते बोले—


“अच्छा…

रात ज़्यादा मत जागिए।”


दरवाज़ा बंद हो गया।


कमरे में

फिर वही शांति फैल गई।


मैंने

मोबाइल उठाया।


साक्षी का प्रश्न

अब भी सामने था।


मैंने

धीरे-धीरे लिखा—


“हाँ।”


“शायद

कभी प्रेम हुआ था।”


कुछ क्षण

मैंने संदेश को देखा।


फिर

एक और पंक्ति जोड़ दी—


“पर वह

किसी व्यक्ति से ज़्यादा

एक अनुभव था।”


संदेश भेज दिया।


कमरे में

घड़ी की टिक-टिक

धीरे-धीरे सुनाई दे रही थी।


कुछ देर बाद

मोबाइल फिर चमका।


साक्षी ने लिखा—


“अनुभव?”


“प्रेम

अनुभव कैसे हो सकता है?”


मैंने

खिड़की के बाहर देखा।


आकाश में

कुछ तारे दिखाई दे रहे थे।


फिर लिखा—


“जैसे

कभी अचानक

हवा चलती है।”


“और हमें

पता भी नहीं चलता

कि वह कहाँ से आई।”


“बस

उसके स्पर्श से

मन बदल जाता है।”


कुछ क्षण

कोई उत्तर नहीं आया।


फिर

एक छोटा-सा संदेश आया—


“अस्तित्व…”


“आप

अभी भी

उतना ही अजीब बोलते हैं।”


मैं

हल्के से मुस्कुरा दिया।


मुकेश ,,,,,,,,,

अध्याय – 18 : दरवाज़े पर दस्तक

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 18 : दरवाज़े पर दस्तक


शाम

धीरे-धीरे

कमरे में उतर रही थी।


आकाश का रंग

नीले से धूसर हो चुका था।


खिड़की के बाहर

पेड़ की शाखाएँ

हवा के साथ

हल्के-हल्के हिल रही थीं।


मैं

मेज़ पर झुका

कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था।


काग़ज़ पर

कुछ शब्द थे

पर वे अभी

वाक्य नहीं बने थे।


शायद

हर विचार को

शब्द बनने से पहले

थोड़ा समय चाहिए होता है।


कमरे में

घड़ी की टिक-टिक

धीरे-धीरे सुनाई दे रही थी।


तभी

मोबाइल की स्क्रीन

हल्के से चमकी।


साक्षी का संदेश था।


“अस्तित्व…

अगर आप बुरा न मानें

तो एक बात पूछूँ?”


मैं

स्क्रीन को देखता रहा।


अभी कुछ ही देर पहले

मैंने उसे

“पूछिए” लिखा था।


पर

उसके बाद

वह कुछ देर तक चुप रही।


जैसे

प्रश्न पूछने से पहले

वह भी

अपने शब्द चुन रही हो।


मैं

उत्तर पढ़ ही रहा था

कि अचानक


दरवाज़े पर

हल्की-सी दस्तक हुई।


ठक… ठक…


मैंने

कलम रख दी।


दरवाज़ा खोला।


सामने

मकान मालिक खड़े थे।


उनके हाथ में

पुराना-सा अख़बार था।


“अस्तित्व जी,”

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

“थोड़ी देर बैठ सकते हैं?”


मैंने

दरवाज़ा खोल दिया।


वे अंदर आए।


कमरे को

धीरे-धीरे देखने लगे।


किताबें

मेज़

काग़ज़

खिड़की।


“आपका कमरा

हर बार

वैसा ही लगता है,”

उन्होंने कहा।


“शांत।”


मैं

हल्के से मुस्कुरा दिया।


वे

कुर्सी पर बैठ गए।


कुछ क्षण

चुप्पी रही।


फिर उन्होंने

अख़बार मोड़ते हुए कहा—


“आप

सारा दिन पढ़ते-लिखते रहते हैं न?”


मैंने सिर हिलाया।


“हाँ

कुछ वैसा ही।”


वे

कुछ देर सोचते रहे।


फिर बोले—


“अजीब बात है।”


“लोग

पूरी उम्र भागते रहते हैं

कुछ पाने के लिए।”


“और आप

एक कमरे में बैठकर

शायद

कुछ समझने की कोशिश करते हैं।”


मैंने

उत्तर नहीं दिया।


क्योंकि

उनकी बात में

थोड़ी सच्चाई थी।


उसी समय

मेज़ पर रखा मोबाइल

फिर चमका।


मैंने

अनायास उसकी ओर देखा।


साक्षी का नया संदेश था।


मकान मालिक

अभी भी बोल रहे थे—


“आप बुरा न मानें

तो एक बात पूछूँ?”


मैं

अचानक मुस्कुरा दिया।


आज

लगता था

हर कोई

मुझसे

कुछ पूछना चाहता था।


“पूछिए,”

मैंने कहा।


वे बोले—


“आप

अकेले रहते हैं…”


“कभी

अकेलापन नहीं लगता?”


कमरे में

कुछ क्षण

खामोशी फैल गई।


खिड़की से

हवा का एक झोंका आया।


मेज़ पर रखे काग़ज़

हल्के-से हिल गए।


मैंने

मोबाइल की स्क्रीन फिर देखी।


साक्षी का प्रश्न

अब पूरा लिखा था—


“अस्तित्व…

आपने कभी

किसी से प्रेम किया है?”


मैं

कुछ क्षण

बिलकुल शांत बैठा रहा।


एक तरफ

मकान मालिक का प्रश्न—


अकेलापन।


दूसरी तरफ

साक्षी का प्रश्न—


प्रेम।


जीवन

कभी-कभी

अजीब ढंग से

प्रश्न पूछता है।


मैंने

खिड़की के बाहर देखा।


पेड़ की शाखाएँ

अब भी हवा में हिल रही थीं।


और अचानक

मुझे लगा—


शायद

मनुष्य के जीवन में

दो ही प्रश्न

सचमुच महत्वपूर्ण होते हैं—


क्या वह अकेला है?


और


क्या उसने

कभी प्रेम किया है?


मैंने

धीरे से

साँस ली।


मकान मालिक

अब भी

मेरे उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे।


मोबाइल

अब भी

मेज़ पर चमक रहा था।


और मुझे लगा—


कहानी

अब

अपने सबसे गहरे मोड़ के पास

आ खड़ी हुई है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

अध्याय – 17 : स्मृति का एक दरवाज़ा

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 17 : स्मृति का एक दरवाज़ा


शाम

धीरे-धीरे

गली में उतर रही थी।


दिन की धूप

अब दीवारों से उतरकर

कहीं और जा चुकी थी।


कमरे में

एक हल्की धुंधलकी रोशनी रह गई थी।


मैंने

मेज़ पर रखा छोटा-सा लैम्प जला दिया।


पीली रोशनी

किताबों पर फैल गई।


मोबाइल

अब भी मेज़ पर रखा था।


कुछ देर पहले

साक्षी का संदेश आया था—


“अस्तित्व…”


मैंने

वह शब्द फिर पढ़ा।


कभी-कभी

किसी का

हमारा नाम लेना भी

एक तरह की स्मृति का द्वार खोल देता है।


और सचमुच

उस क्षण

मेरे भीतर

एक पुराना दृश्य धीरे-धीरे जागने लगा।


कॉलेज की लाइब्रेरी।


लंबा-सा हॉल।


ऊँची खिड़कियाँ।


और खिड़की के पास

एक लकड़ी की मेज़।


वही मेज़

जहाँ मैं

अक्सर बैठा करता था।


किताब सामने होती थी

पर मन

कई बार शब्दों से दूर चला जाता था।


उसी समय

लाइब्रेरी के बाहर की सीढ़ियों पर

हँसी की एक आवाज़ आती थी।


हल्की

पर साफ़।


वही हँसी

जिसे सुनकर

कई बार मैं

अनायास खिड़की की ओर देखता था।


वहाँ

कुछ लड़कियाँ खड़ी होती थीं।


और उनके बीच

एक चेहरा


जो

बाकियों से अलग

शांत दिखाई देता था।


शायद वही

साक्षी थी।


मैं

उस समय

कभी उनसे मिला नहीं।


न कोई परिचय हुआ।


बस

कभी-कभी

नज़रें मिलीं।


और फिर

दोनों अपनी-अपनी दुनिया में लौट गए।


जीवन

अक्सर

इसी तरह आगे बढ़ जाता है।


हम सोचते हैं

कुछ हुआ ही नहीं।


पर कहीं

भीतर


एक हल्की-सी रेखा

फिर भी खिंच जाती है।


मैं

इन्हीं विचारों में था


कि तभी


मोबाइल

फिर चमका।


साक्षी का नया संदेश था।


“आपको याद है

लाइब्रेरी की वह खिड़की?”


मैं

कुछ क्षण

स्क्रीन को देखता रहा।


जैसे

किसी ने

मेरे मन की स्मृति पढ़ ली हो।


मैंने

धीरे-धीरे लिखा


“हाँ

वही खिड़की

जहाँ से पेड़ दिखाई देता था।”


कुछ क्षण बाद

उसका उत्तर आया—


“और बारिश में

उस पेड़ की पत्तियाँ

बहुत सुंदर लगती थीं।”


मैं

अनायास मुस्कुरा दिया।


इतने वर्षों बाद भी

हम दोनों की स्मृति

उसी दृश्य पर जाकर ठहर गई थी।


मैंने

खिड़की के बाहर देखा।


यहाँ भी

एक पेड़ था।


उसकी शाखाएँ

हवा में हिल रही थीं।


मैंने सोचा


स्मृतियाँ

शायद पेड़ों की तरह होती हैं।


वे

एक ही जगह खड़ी रहती हैं


पर समय

उनके चारों ओर

घूमता रहता है।


मोबाइल फिर चमका।


साक्षी ने लिखा


“अजीब बात है

न?”


“हमने कभी

ढंग से बात भी नहीं की थी।”


“फिर भी

मुझे लगता था

आप हमेशा

कुछ सोचते रहते थे।”


मैं

कुछ क्षण

उस वाक्य को पढ़ता रहा।


फिर लिखा


“शायद

मैं सचमुच

सोचता रहता था।”


“और शायद

आप

हमेशा हँसती रहती थीं।”


कुछ क्षण

कोई उत्तर नहीं आया।


कमरे में

सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक थी।


और बाहर

शाम की हवा।


मैंने

माण्डूक्य उपनिषद का पन्ना फिर खोला।


वहाँ लिखा था


जो देखता है

और जो देखा जाता है

उनके बीच

एक तीसरा भी होता है।


साक्षी।


मैंने

धीरे से आँखें बंद कर लीं।


और अचानक

मुझे लगा


कहानी

अब

सिर्फ़ स्मृति नहीं रही।


वह

धीरे-धीरे

वर्तमान में उतर रही है।


मोबाइल

फिर चमका।


साक्षी का संदेश था


“अस्तित्व…”


“अगर आप बुरा न मानें

तो एक बात पूछूँ?”


मैंने

स्क्रीन को देखा।


और उस क्षण

मुझे लगा


कहानी का

एक नया दरवाज़ा


अब खुलने वाला है।


मैंने

उत्तर लिखा


“पूछिए।”


कमरे में

फिर वही शांति फैल गई।


पर इस बार

उस शांति में


एक हल्की-सी

संभावना थी


मुकेश ,,,,,,,,,,

अध्याय – 16 : एक साधारण प्रश्न

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 16 : एक साधारण प्रश्न


दोपहर

धीरे-धीरे

कमरे में उतर रही थी।


खिड़की से आती धूप

अब मेज़ के आधे हिस्से पर फैल गई थी।

किताबों के किनारे

हल्की सुनहरी रेखाओं की तरह चमक रहे थे।


कमरा

हमेशा की तरह

शांत था।


कभी-कभी

मुझे लगता था

यह कमरा भी

मेरी तरह

बात कम करता है।


मैं

कुर्सी पर बैठा

एक किताब के पन्ने पलट रहा था।


मेज़ पर

किताबों का वही छोटा-सा संसार था


कुछ उपनिषद

कुछ डायरी

कुछ अधूरी पांडुलिपियाँ।


उसी समय

मोबाइल की स्क्रीन

हल्के से चमकी।


मैंने

धीरे से उसे उठाया।


संदेश था।


साक्षी का।


कुछ क्षण

मैंने स्क्रीन को देखा

जैसे शब्दों को पढ़ने से पहले

उनकी धड़कन सुनना चाहता हूँ।


संदेश छोटा था


“आप आजकल करते क्या हैं?”


बस

इतना ही।


पर

कभी-कभी

सबसे साधारण प्रश्न

सबसे गहरे उत्तर माँग लेते हैं।


मैंने

मोबाइल मेज़ पर रख दिया।


खिड़की के पास गया।


गली में

दूधवाला अपनी साइकिल

धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहा था।


उसकी घंटी

फिर एक बार बजी


ट्रिन… ट्रिन…


जीवन

कभी-कभी

इतना साधारण होता है

कि हम

उसकी सुंदरता देख ही नहीं पाते।


मैं वापस

कुर्सी पर बैठ गया।


कुछ क्षण

सोचा।


फिर

मोबाइल उठाया।


उत्तर लिखने लगा


“कुछ खास नहीं।

पढ़ता हूँ…

थोड़ा लिखता हूँ…

और लोगों की कहानियाँ समझने की कोशिश करता हूँ।”


मैंने

संदेश पढ़ा।


फिर

भेज दिया।


कुछ देर तक

कोई उत्तर नहीं आया।


मैंने

माण्डूक्य उपनिषद का पन्ना खोला।


वहाँ लिखा था


मनुष्य

सिर्फ़ अपने काम से नहीं

अपनी चेतना से पहचाना जाता है।


मैं

उस वाक्य को

धीरे-धीरे पढ़ता रहा।


तभी

मोबाइल फिर चमका।


साक्षी का उत्तर था


“तो आप अभी भी लिखते हैं?”


मैं

हल्के से मुस्कुराया।


शायद

कुछ चीज़ें

लोग बहुत जल्दी पहचान लेते हैं।


मैंने लिखा


“हाँ

शायद लिखना

मेरी आदत है।”


कुछ क्षण बाद

उसका अगला संदेश आया


“और आपका नाम…

अगर मुझे ठीक याद है

तो…”


मैं

स्क्रीन को देखता रहा।


संदेश अधूरा था।


फिर

अगली पंक्ति आई—


“अस्तित्व था न?”


मैं

कुछ देर तक

मोबाइल हाथ में लिए बैठा रहा।


खिड़की से आती हवा

धीरे-धीरे

काग़ज़ों को हिला रही थी।


कमरे में

एक हल्की-सी मुस्कान फैल गई।


इतने वर्षों बाद

किसी ने

मेरा नाम

इतनी सहजता से याद किया था।


मैंने

उत्तर लिखा


“हाँ

अस्तित्व ही हूँ।”


संदेश भेज दिया।


कमरे में

फिर वही शांति लौट आई।


मैंने

धीरे से सोचा


अजीब बात है।


मनुष्य

पूरी उम्र

अपने अस्तित्व को समझने की कोशिश करता है।


और कभी-कभी

कोई दूसरा व्यक्ति

उसे

एक शब्द में पहचान लेता है।


खिड़की के बाहर

शाम उतरने लगी थी।


गली में

बच्चे खेल रहे थे।


दूर कहीं

चाय वाले की आवाज़ आ रही थी।


मैंने

मोबाइल मेज़ पर रखा।


और उसी क्षण

मुझे लगा


कहानी

अब सिर्फ़ एक संवाद नहीं रही।


यह

धीरे-धीरे

दो चेतनाओं के बीच

खुलने वाली यात्रा बन रही है।


और शायद

साक्षी

सिर्फ़ एक नाम नहीं है।


क्योंकि

साक्षी


अंततः

अस्तित्व के प्रति ही हो सकती है।


मैं

कुछ देर

खिड़की के पास खड़ा रहा।


शाम की हवा

धीरे-धीरे कमरे में भर रही थी।


और मुझे लगा


कहानी का अगला अध्याय


शायद


अब

सिर्फ़ स्मृति का नहीं

मुलाक़ात की संभावना का होगा।


मुकेश ,,,,

अध्याय – 15 : पहला संदेश

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 15 : पहला संदेश


दोपहर

धीरे-धीरे

कमरे में उतर रही थी।


खिड़की से आती धूप

अब मेज़ के एक कोने पर टिक गई थी।


कमरे में

एक हल्की-सी गर्मी भरने लगी थी।


मैं

कुर्सी पर बैठा

कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था।


काग़ज़ सामने था

कलम हाथ में थी

पर शब्द

जैसे कहीं और भटक रहे थे।


ऐसा नहीं था कि मन पूरी तरह बेचैन था।


पर भीतर

एक हल्की-सी प्रतीक्षा

अब भी थी।


कभी-कभी

मन

अनजाने में

मोबाइल की ओर चला जाता।


फिर

मैं खुद ही मुस्कुरा देता।


यही तो

मन की पुरानी आदत है—


जो चीज़

थोड़ी-सी खुशी दे सकती है

उसे बार-बार देखना।


तभी

गली से

एक आवाज़ आई—


“भैया… दूध का बर्तन बाहर रख दीजिए।”


दूधवाला

शायद आज थोड़ा देर से आया था।


मैंने

दरवाज़ा खोला।


बर्तन आगे बढ़ाया।


वह

दूध डालते हुए बोला—


“आज बहुत गर्मी है।”


मैंने सिर हिलाया।


जीवन की

सबसे सच्ची बातचीतें

अक्सर

इन्हीं छोटे वाक्यों में होती हैं।


वह चला गया।


मैं वापस कमरे में आया।


मेज़ पर बैठा।


माण्डूक्य उपनिषद

अब भी वहीं पड़ा था।


मैंने

उसका एक पन्ना फिर खोला।


वहाँ लिखा था—


जाग्रत में

हम संसार देखते हैं।


स्वप्न में

हम अपने भीतर का संसार देखते हैं।


सुषुप्ति में

दोनों शांत हो जाते हैं।


और तुरीय—


वह

जो इन तीनों को देखता है।


मैंने

कुछ क्षण

उस वाक्य को पढ़ा।


और अचानक

मुझे लगा—


आजकल

मेरा मन

जाग्रत और स्वप्न के बीच

कहीं चल रहा है।


जाग्रत में

मैं इस कमरे में हूँ।


इस मेज़ पर।


इन किताबों के बीच।


और स्वप्न में—


कभी-कभी

उसकी मुस्कान

अचानक सामने आ जाती है।


मैं

यही सोच रहा था


कि तभी


मेज़ पर रखा

मोबाइल

हल्का-सा चमका।


एक छोटी-सी ध्वनि हुई।


मैंने

धीरे से

स्क्रीन की ओर देखा।


एक नया नोटिफिकेशन था।


Message from Sakshi


दिल

एक क्षण के लिए

थोड़ा तेज़ धड़कने लगा।


मैंने

मोबाइल उठाया।


संदेश खोला।


वहाँ

सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—


“आप शायद वही हैं

जो कॉलेज की लाइब्रेरी में

हमेशा खिड़की के पास बैठते थे?”


मैं

कुछ क्षण

स्क्रीन को देखता रहा।


एक हल्की-सी हँसी

अपने-आप

चेहरे पर आ गई।


इतने सालों बाद

किसी ने

मुझे

मेरी एक पुरानी आदत से पहचान लिया था।


मैंने

खिड़की की ओर देखा।


सचमुच

मैं आज भी

खिड़की के पास ही बैठा था।


शायद

मनुष्य

इतना भी नहीं बदलता।


मैंने

धीरे-धीरे

संदेश टाइप करना शुरू किया।


“हाँ

शायद वही हूँ।


और आप

शायद वही हैं

जो लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर

दोस्तों के साथ बहुत हँसती थीं।”


कुछ क्षण

मैंने संदेश को देखा।


फिर

भेज दिया।


कमरे में

फिर वही शांति लौट आई।


पर अब

उस शांति में

एक नई लहर थी।


मैंने

कुर्सी से उठकर

खिड़की के बाहर देखा।


गली में

एक बच्चा

साइकिल चलाना सीख रहा था।


उसके पिता

पीछे से सीट पकड़े हुए थे।


बच्चा

डर भी रहा था

और खुश भी था।


मुझे लगा—


शायद प्रेम भी

कुछ ऐसा ही होता है।


हम

थोड़ा डरते हुए

थोड़ा मुस्कुराते हुए

उसकी ओर बढ़ते हैं।


और धीरे-धीरे

एक दिन

हमें पता चलता है—


हम

चलना सीख चुके हैं।


मैं

फिर कुर्सी पर बैठ गया।


माण्डूक्य उपनिषद

अब भी खुला था।


मैंने

धीरे से सोचा—


शायद

जीवन का सबसे सुंदर संतुलन

यही है—


एक तरफ

आत्मा की शांति


और दूसरी तरफ

किसी के साथ

शब्दों का एक छोटा-सा संवाद।


दोनों के बीच

अगर साक्षी भाव बना रहे


तो शायद


प्रेम भी

एक ध्यान बन सकता है।


मोबाइल

फिर मेज़ पर शांत पड़ा था।


पर इस बार

मुझे पता था—


कहानी अब

धीरे-धीरे

अपने सबसे रोचक मोड़ की ओर

बढ़ रही है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,