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चिंतन - क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है?

  चिंतन -  क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है? मनुष्य ने बोलना बहुत पहले सीख लिया था, पर मौन को पढ़ना आज तक नहीं सीख पाया। शब्दों का अपना व्याकरण है, अपना कोश है, अपना इतिहास है; किंतु मौन का कोई शब्दकोश नहीं। उसे किसी भाषा में नहीं बाँधा जा सकता। वह लिखा कम जाता है, जिया अधिक जाता है। शायद इसीलिए मैं कभी-कभी सोचता हूँ—क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है? ऐसा शास्त्र, जिसे पढ़ने के लिए आँखों से अधिक अंतःकरण की आवश्यकता होती है। हमने ज्ञान को प्रायः शब्दों में खोजा है। ग्रंथ लिखे, भाष्य रचे, वाद-विवाद किए। किंतु क्या यह विचित्र नहीं कि सबसे बड़ी अनुभूतियाँ शब्दों के समाप्त होने पर ही घटित होती हैं? प्रेम अपने चरम पर पहुँचकर चुप हो जाता है। शोक अपनी गहराई में पहुँचकर रोना भी छोड़ देता है। प्रार्थना अपने शुद्धतम रूप में शब्दों की याचना नहीं रहती, केवल एक मौन उपस्थिति बन जाती है। मानो शब्द यात्रा हों और मौन गंतव्य। मौन को अक्सर लोग अनुपस्थिति समझ लेते हैं। जैसे कुछ न कहना, कुछ न होना। परंतु मौन रिक्तता नहीं, परिपूर्णता भी हो सकता है। जिस प्रकार आकाश खाली दिखाई देता है, जबकि उसी ...

चिंतन - क्या स्मृतियाँ समय की सबसे धीमी नदी हैं?

  चिंतन -  क्या स्मृतियाँ समय की सबसे धीमी नदी हैं? नदियाँ केवल पृथ्वी पर नहीं बहतीं। कुछ नदियाँ मनुष्य के भीतर भी बहती हैं। बाहर की नदियाँ समुद्र तक पहुँच जाती हैं, भीतर की नदियाँ कभी किसी किनारे तक नहीं पहुँचतीं। वे जीवन भर बहती रहती हैं—कभी दिखाई देती हुई, कभी भूमिगत होकर। उनका नाम है— स्मृति। मैं अक्सर सोचता हूँ कि समय को यदि किसी रूपक में बाँधना हो, तो वह घड़ी नहीं होगी, कैलेंडर भी नहीं। समय शायद एक नदी होगा। और यदि स्मृति को किसी रूपक में समझना हो, तो वह उस नदी का सबसे धीमा प्रवाह होगी। धीमी इसलिए कि वह कभी सचमुच बीतती नहीं। हम मान लेते हैं कि घटनाएँ पीछे छूट गईं। लोग चले गए। घर बदल गए। शहर बदल गए। ऋतुएँ बदल गईं। लेकिन स्मृति का जल किसी अदृश्य घाट पर ठहरा रहता है। वर्षों बाद भी कोई गंध, कोई धुन, कोई शब्द, कोई स्पर्श उस जल में हल्की-सी कंकड़ी फेंक देता है, और सतह पर फिर वही पुरानी लहरें उठने लगती हैं। समय आगे बढ़ जाता है; स्मृति पीछे नहीं रहती। वह भीतर समानांतर बहती रहती है। यही कारण है कि वृद्ध व्यक्ति अपने बचपन को वर्तमान काल में सुनाने लगता है। वह नहीं कहता—"वहाँ एक पे...

चिंतन - क्या प्रश्न भी चेतना के कठफोड़वे होते हैं?

  चिंतन -  क्या प्रश्न भी चेतना के कठफोड़वे होते हैं? कुछ प्रश्न उत्तर पाने के लिए नहीं जन्म लेते; वे भीतर सोई हुई किसी लकड़ी पर लगातार चोंच मारने के लिए आते हैं। मैंने कई बार सोचा है कि प्रश्न आखिर होते क्या हैं? क्या वे केवल भाषा के व्याकरण हैं? केवल जिज्ञासा की आकृतियाँ? या वे हमारी चेतना के ऐसे कठफोड़वे हैं, जो मन के वृक्ष पर तब तक चोंच मारते रहते हैं, जब तक भीतर छिपा हुआ कोई जीवित रस बाहर न आ जाए? वन में कठफोड़वा किसी वृक्ष को नष्ट करने नहीं आता। वह उसकी छाल पर प्रहार करता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि उस कठोर सतह के नीचे जीवन की कोई हलचल है। यदि वृक्ष बिल्कुल मृत हो, तो वह वहाँ अधिक देर नहीं ठहरता। उसके प्रहार में हिंसा नहीं, खोज होती है। प्रश्न भी शायद ऐसे ही होते हैं। वे हमारी निश्चितताओं की छाल पर चोट करते हैं। वे विश्वासों के तनों पर अपनी नुकीली चोंच टिकाकर पूछते हैं—"क्या सचमुच यही सत्य है?" और जब तक भीतर से कोई उत्तर, कोई संशय, कोई नई संभावना बाहर नहीं आती, वे रुकते नहीं। मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं कि उसके पास उत्तर नहीं हैं। उसका सबसे बड़ा दुर्भाग्...

मुहब्बत का तरीक़ा

  मुहब्बत का तरीक़ा मैंने तुम्हें कभी बाँधने की कोशिश नहीं की। जो परिंदे दिल में घर बना लेते हैं, उन्हें पिंजरों की ज़रूरत नहीं होती। मुकेश ,,,,,,,,,,

मुलाक़ात

  मुलाक़ात तुमसे हर बार मिलकर ऐसा नहीं लगता कि तुमसे मिला हूँ। लगता है, अपने ही किसी बिछड़े हुए हिस्से से वापस मिल आया हूँ। मुकेश ,,,,,,,,,,

तुमसे पहले

  तुमसे पहले तुमसे पहले भी ज़िंदगी थी। दिन निकलते थे, शामें उतरती थीं, बारिशें होती थीं। मगर... उनमें कोई मेरा इंतज़ार नहीं करता था। मुकेश ,,,,,,,,,,

इत्तिफ़ाक़

  इत्तिफ़ाक़ आज फिर तुम्हारा ज़िक्र नहीं हुआ। फिर भी, पूरी शाम तुम्हारे साथ गुज़र गई। मुकेश ,,,,,,,,,,