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Monday, 2 March 2026

खिड़की, हवा और आधा सा मन

 खिड़की, हवा और आधा सा मन


खिड़की आधी खुली है,

जैसे कोई फैसला अभी बाकी हो।

हवा आती है धीरे-धीरे,

पर भीतर तक नहीं उतरती।


परदे काँपते हैं हल्के से,

जैसे किसी नाम की आहट हो,

मैं उठकर देखता हूँ हर बार —

पर सामने सिर्फ़ रात होती है।


मेरा मन भी कुछ ऐसा ही है,

आधा तुम्हारी याद में भीगा,

आधा अपने ही संकोच में सूखा।


कितनी बार चाहा

पूरी तरह खोल दूँ खिड़की,

कि हवा बेधड़क आए

और जो बचा है उसे भी उड़ा ले जाए।


पर जाने क्यों

एक कोना थामे रहता हूँ 

शायद उम्मीद की तरह,

शायद डर की तरह।


खिड़की खुली है,

हवा आती-जाती है,

और मेरा आधा सा मन

तुम्हारे पूरे होने की प्रतीक्षा में

धीरे-धीरे सांस लेता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

महकती रात में थका हुआ दिल

 महकती रात में थका हुआ दिल


महकती रात थी 

चमेली की खुशबू आहिस्ता-आहिस्ता

खिड़की से उतरकर

मेरे तकिये तक आ पहुँची थी।


चाँद ने जैसे

आसमान की पेशानी सहलाई,

और सितारे

दूर कहीं धीमे-धीमे बातें करते रहे।


पर इन सबके बीच

मेरा दिल —

दिन भर की थकान ओढ़े

चुप पड़ा था।


कितने चेहरों से गुज़रा था आज,

कितनी मुस्कानों में शामिल हुआ,

पर जो एक नाम भीतर था

वही पुकारना

रह गया।


रात ने पूछा 

“इतनी ख़ुशबू में भी उदासी क्यों?”

मैंने हँसकर टाल दिया,

कि कुछ इंतज़ार

नींद से बड़े होते हैं।


महकती रात

अपनी बाहों में जग को सुलाती रही,

और मेरा थका हुआ दिल

बस एक सच्चे स्पर्श की कल्पना में

धीरे-धीरे धड़कता रहा।


मुकेश ,,,,,,,,

कमरे, दर्द और एक बेआवाज़ महक

कमरे, दर्द और एक बेआवाज़ महक


कमरा बंद था,

पर भीतर जाने कितनी आवाज़ें थीं

दीवारों पर टिके हुए दिन,

छत से उलझी हुई रातें।


खिड़की के पास रखी कुर्सी

अब भी तुम्हारा इंतज़ार करती है,

उस पर धूप आती है रोज़,

पर बैठने की आहट

कहीं खो गई है।


दर्द यहाँ दिखाई नहीं देता,

बस हवा में घुला रहता है—

जैसे किसी पुराने ख़त की स्याही,

जो पढ़ी न जाए

फिर भी महकती रहे।


मैंने कई बार चाहा

कि इस कमरे को खाली कर दूँ,

यादों की अलमारी बंद कर दूँ,

पर हर बार

एक बेआवाज़ महक

मेरे हाथ थाम लेती है।


वो कहती नहीं कुछ भी,

पर समझाती है

प्रेम कभी पूरी तरह जाता नहीं,

वह बस रूप बदल लेता है,

और कमरे की ख़ामोशी में

धीरे-धीरे

साँस लेता रहता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

सन्नाटे में सफ़ेद फूल

 सन्नाटे में सफ़ेद फूल


सन्नाटा उतरा था आहिस्ता-आहिस्ता,

दीवारों पर टिककर बैठ गया था समय,

हवा भी जैसे पाँव दबाकर चलती थी 

कहीं ख़्वाबों की नींद न टूट जाए।


उसी ठहरे हुए पल में

एक सफ़ेद फूल चुपचाप खिला,

न उसने रंग माँगा,

न किसी नज़र की तस्दीक़।


उसकी पंखुड़ियों पर

रात की ओस ठहरी थी,

जैसे किसी अनकहे प्रेम की

आख़िरी पारदर्शी दलील।


मैं देर तक उसे देखता रहा 

वह कुछ नहीं बोलता था,

फिर भी उसके आसपास

एक गहरा संवाद बहता था।


सन्नाटे के बीच

वह सफ़ेद फूल

किसी पवित्र स्वीकार-सा लगा 

कि शोर के बिना भी

प्रेम खिल सकता है,

और बिना कहे भी

कोई पूरी तरह सुना जा सकता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

महकती रात में थका हुआ दिल

 महकती रात में थका हुआ दिल


महकती रात थी —

रातरानी की खुशबू से भीगी हुई,

चाँद खिड़की पर ठहरा था

जैसे कोई पुराना ख़त पढ़ रहा हो।


और इस सारी रौशनी के बीच

मेरा दिल

थका हुआ बैठा था चुपचाप।


दिन भर की मुस्कानों का बोझ,

अनकहे शब्दों की धूल,

कुछ अधूरे सपनों की किरचें

धड़कनों में अटकी थीं।


हवा आई तो लगा

कोई नाम लेकर पुकार गया,

मैंने आँखें मूँद लीं 

कहीं उम्मीद फिर से न जाग उठे।


महकती रात पूछती रही

किस बात का ग़म है तुम्हें?

मैं क्या कहता —

इश्क़ का सफ़र लंबा था,

बस साथ थोड़ा कम था।


चाँद अब भी ठहरा है,

रात अब भी महक रही है,

पर मेरा थका हुआ दिल

किसी सच्चे स्पर्श की

नींद तलाश रहा है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

बाकी रह गया

 बाकी रह गया

सब कुछ था 

एक साथ चलती धूप,

बरामदे में रखी दो कुर्सियाँ,

और शाम का धीमे-धीमे उतरना।


फिर भी जाने क्यों

कुछ बाकी रह गया।


तुम्हारी हँसी में शामिल था मैं,

पर उसकी वजह बनना

बाकी रह गया।


तुमने थामा था मेरा हाथ,

पर अपनी थकान का बोझ

मुझ पर रखना

बाकी रह गया।


हमने कितनी बातें कीं,

दिन, मौसम, दुनिया,

पर दिल के सबसे भीतर का कमरा

खोलना

बाकी रह गया।


तुम गए तो लगा —

विछोह नहीं,

एक अधूरा अध्याय चुभ रहा है।


प्रेम कम न था,

बस उसे पूरा जी लेना

बाकी रह गया।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,


शहर के भीतर एक ख़ाली कमरा

 शहर के भीतर एक ख़ाली कमरा

शहर के भीतर

एक ख़ाली कमरा है—

भीड़ से घिरा हुआ,

मगर

आवाज़ों से आज़ाद।

खिड़की से

ट्रैफ़िक का शोर आता है,

लोगों की ज़िंदगियाँ

तेज़ी से गुज़रती हैं,

और कमरे के भीतर

वक़्त

धीरे-धीरे

बैठ जाता है।

इस कमरे में

कुर्सी है,

मेज़ है,

दीवारों पर

कुछ भी नहीं—

जैसे

यादों ने भी

यहाँ से

हिजरत कर ली हो।

मैं जब

यहाँ आता हूँ,

तो

शहर मुझसे

बाहर रह जाता है,

और मैं

अपने भीतर।

यह कमरा

उदासी का नहीं,

बस

ख़ाली होने का है—

जहाँ

कोई इंतज़ार नहीं,

कोई शिकायत नहीं,

सिर्फ़

थोड़ी-सी

साँस लेने की जगह है।

कभी-कभी

मुझे लगता है,

पूरा शहर

इसी कमरे को

ढूँढ रहा है—

मगर

किसी के पास

इतना वक़्त नहीं

कि

दरवाज़ा

खोल सके।

और मैं

दरवाज़ा बंद करके

यहाँ बैठा रहता हूँ,

क्योंकि

शहर के भीतर

एक ख़ाली कमरा

अब भी

मेरा है।

मुकेश्,,,