मौन - 2
मौन लोग समझते हैं मौन का अर्थ है कुछ न कहना। पर मैंने देखा है सबसे अधिक शोर अक्सर उन्हीं के भीतर होता है जो बहुत कम बोलते हैं। कोई अपनी अधूरी प्रेम-कथा दोहरा रहा है। कोई बीस वर्ष पुराना अपमान। कोई एक असफलता। कोई एक भय जो कभी घटित ही नहीं हुआ। बाहर से सब शांत दिखाई देते हैं। जैसे झील। जैसे संध्या। जैसे बंद खिड़की। पर भीतर विचारों की हवा चलती रहती है। स्मृतियों के पत्ते लगातार हिलते रहते हैं। और मनुष्य उसे जीवन समझ लेता है। शायद मौन चुप हो जाना नहीं है। शायद मौन वह क्षण है जब स्मृति भी विश्राम करे, कल्पना भी, भय भी, आशा भी— और जो शेष बचे वह केवल देखना हो। इस पुस्तक के सभी पात्र मौन की बात करेंगे। कुछ उसे खोजेंगे। कुछ उससे डरेंगे। कुछ उसे बीमारी समझेंगे। कुछ मुक्ति। पर अंततः उन्हें यह जानना होगा कि मौन कहीं बाहर नहीं रहता। वह उसी स्थान पर प्रतीक्षा करता है जहाँ मनुष्य पहली बार अपने भीतर के शोर को सुन लेता है। — मुकेश