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अब जब उसकी याद आती है,

 अब जब उसकी याद आती है, मैं दुखी नहीं होता। बस थोड़ी देर के लिए समय धीमा पड़ जाता है। चाय ठंडी होने लगती है। खिड़की के बाहर का पेड़ स्थिर दिखाई देता है। और भीतर कोई पुराना कमरा खुल जाता है। मैं वहाँ जाता नहीं। सिर्फ़ दरवाज़े पर खड़ा रहता हूँ। कुछ स्मृतियाँ मिलने के लिए नहीं, बस यह जानने के लिए होती हैं कि वे अभी भी जीवित हैं। मुकेश ,,,,,,

वह मेरी कहानी में

 वह मेरी कहानी में नायिका बनकर नहीं आई थी। वह एक अल्पविराम थी। छोटी-सी। लगभग अदृश्य। पर जब वह हट गई, पूरा वाक्य अपना अर्थ खो बैठा। तब जाना कभी-कभी जीवन को महाकाव्य नहीं बदलते, एक अल्पविराम बदल देता है। मुकेश ,,,,,,

मैंने उससे प्रेम किया

 मैंने उससे प्रेम किया या नहीं, अब यह प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि उसके बाद मैं पहले जैसा नहीं रहा। जैसे नदी से एक नाव गुज़र जाए और पानी फिर शांत हो जाए। दूर से देखने पर सब वैसा ही लगता है। पर नदी जानती है कि उसकी गहराई में कुछ देर तक लहरें बची रहती हैं। मुकेश ,,,,,,

उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती

 उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती उसका चेहरा नहीं था। वह यह थी कि उसके जाने के बाद भी दुनिया वैसी नहीं रही। कुछ रास्ते थोड़े अधिक लम्बे हो गए। कुछ गीत बीच में टूटने लगे। कुछ मौसम बिना वजह उदास लगने लगे। एक आदमी के जीवन में किसी की उपस्थिति का यही सबसे सटीक प्रमाण है। मुकेश ,,,,,,

मैंने उसे खोया नहीं।

 मैंने उसे खोया नहीं। खोने के लिए किसी चीज़ का अपना होना ज़रूरी है। वह तो आकाश में दिखने वाले उस तारे जैसी थी जिसकी रोशनी आप तक पहुँचती है, पर तारा कब का जा चुका होता है। मैं वर्षों तक उस रोशनी के साथ रहा। अब अँधेरा है। और अँधेरे में पहली बार चीज़ें साफ़ दिखाई देती हैं। मुकेश ,,,,,,

उसने मुझे कभी छोड़ा नहीं,

 उसने मुझे कभी छोड़ा नहीं, क्योंकि उसने मुझे कभी पाया ही नहीं था। मैं ही था जो उसके आसपास एक घर बनाता रहा। वह आती, कुछ देर बैठती, खिड़की से बाहर देखती, और चली जाती। मैं हर बार एक और कमरा जोड़ देता। आज पूरा मकान खड़ा है। बस उसमें कोई रहता नहीं। एक दिन उसने पूछा था, "तुम इतना याद क्यों रखते हो?" मैं हँस दिया। कैसे बताता, मेरे भीतर भूलने की कोई जगह ही नहीं थी। जो लोग चले गए, वे भी वहीं रहे। जो बातें नहीं हुईं, वे भी। जो प्रेम कभी हुआ ही नहीं, वह तो सबसे अधिक जगह घेरता रहा। मुकेश ,,,,,,

मैंने उसकी याद को किताब से निकालकर

 कल रात मैंने उसकी याद को किताब से निकालकर मेज़ पर रख दिया। सोचा, अब इससे कोई रिश्ता नहीं। सुबह देखा— याद वहीं थी, पर किताब चली गई थी। तब समझ में आया, कुछ लोग जीवन से नहीं जाते। वे बस उस जगह आकर बैठ जाते हैं जहाँ हम स्वयं को पढ़ते हैं। मुकेश ,,,,,,