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किताब से निकालकर मेज़ पर रख दिया।

 कल रात मैंने उसकी याद को किताब से निकालकर मेज़ पर रख दिया। सोचा, अब इससे कोई रिश्ता नहीं। सुबह देखा— याद वहीं थी, पर किताब चली गई थी। तब समझ में आया, कुछ लोग जीवन से नहीं जाते। वे बस उस जगह आकर बैठ जाते हैं जहाँ हम स्वयं को पढ़ते हैं। मुकेश ,,,,,,,,,

उसके जाने के बाद मैंने बहुत-सी नज़्में लिखीं।

 उसके जाने के बाद मैंने बहुत-सी नज़्में लिखीं। कुछ में उसका नाम नहीं था, कुछ में उसका ज़िक्र नहीं था, कुछ में प्रेम भी नहीं था। फिर भी हर नज़्म के अंत में एक कुर्सी खाली रह जाती थी। बहुत बाद में समझ आया मैं उसे नहीं लिख रहा था, मैं उस खाली कुर्सी को शब्द दे रहा था। मुकेश ,,,,,,,,,

उसने कभी मेरे हाथ नहीं थामे,

 उसने कभी मेरे हाथ नहीं थामे, फिर भी मेरी उँगलियों में उसकी अनुपस्थिति बसी रही। जैसे कोई अंगूठी उतार ली गई हो, पर उसकी गोलाई त्वचा पर बची रह जाए। वर्षों बाद भी जब मैं अकेला चलता हूँ, एक हाथ अनायास खाली हो जाता है। मुकेश ,,,,,,,,,

प्रेम की तरह नहीं आई थी।

 वह मेरे जीवन में प्रेम की तरह नहीं आई थी। वह एक प्रश्न की तरह आई थी। धीरे-धीरे मेरी सारी निश्चितताएँ उसके चारों ओर टूटती गईं। मैं उत्तर खोजता रहा, और वह हर बार नया प्रश्न बन गई। आज भी जब उसकी याद आती है, मुझे कोई चेहरा नहीं दिखता बस एक खुला हुआ प्रश्नचिह्न हवा में झूलता रहता है। मुकेश ,,,,,,,,,

कई नाम बचाकर रखे थे।

 मैंने उसके लिए कई नाम बचाकर रखे थे। कुछ फूलों से चुराए, कुछ बादलों से, कुछ उन रातों से जिनमें नींद नहीं आई। पर जब भी उसे पुकारना चाहा, वह मेरे सामने सिर्फ़ एक मुस्कान रख देती। नाम सारे बेकार हो गए। कुछ लोग किसी संबोधन में नहीं समाते। मुकेश ,,,,,,,,,

वह कभी मना भी नहीं करती थी,

 वह कभी मना भी नहीं करती थी, और हाँ भी नहीं कहती थी। उसके पास चुप्पियों की एक भाषा थी, जिसे मैं बरसों पढ़ता रहा। हर मुलाक़ात में एक शब्द कम रह जाता, हर विदाई में एक अर्थ अधिक। अब सोचता हूँ शायद हम प्रेम में नहीं थे, हम बस एक-दूसरे की अधूरी व्याख्याएँ थे। मुकेश ,,,,,,,,,

तूफ़ान के बाद की सुबह – ४

  तूफ़ान के बाद की सुबह – ४ सुबह धूप लेकर नहीं आई थी। सिर्फ़ उजाला था— ठंडा और बिना रंग का। सड़क सूखी थी, पर उसमें दरारें गहरी हो गई थीं। जैसे ज़मीन ने रात भर में कुछ ज़्यादा याद कर लिया हो। वह आदमी फिर उसी जगह था। अब वह लौटकर नहीं आया था, बस आकर रुक गया था। मकान के भीतर अब आवाज़ नहीं थी। दीवारें अपनी जगह पर थीं, पर उनमें कुछ ढीला पड़ गया था। उसने दरवाज़ा धक्का दिया। धीरे। दरवाज़ा मान गया। अंदर हवा नहीं थी। सिर्फ़ बासी समय था जो कोनों में बैठा था। फर्श पर कुछ काग़ज़ पड़े थे। गीले, और अधूरे शब्दों से भरे। उसने उन्हें उठाया नहीं। कुछ चीज़ें उठाने से और भारी हो जाती हैं। कमरे के बीच एक निशान था— जहाँ कभी कोई बैठता था। अब वहाँ सिर्फ़ खाली जगह थी, जो अपने होने को छुपा नहीं पा रही थी। वह आदमी वहीं खड़ा रहा। काफी देर। फिर उसने समझ लिया— तूफ़ान ने कुछ तोड़ नहीं दिया था। उसने सिर्फ़ दिखा दिया था कि चीज़ें पहले ही टूट चुकी थीं। वह बाहर आ गया। दरवाज़ा पीछे से धीरे बंद हो गया। सड़क अब शांत थी। बहुत शांत। और उस शांति में कोई लौटने का वादा नहीं था। मुकेश...