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Showing posts from February, 2026

सुनहरा पृष्ठ

 सुनहरा पृष्ठ तुम समय की पुरानी डायरी से गिरा हुआ एक सुनहरा पृष्ठ हो जिस पर स्याही नहीं, साँसें लिखी हैं। तुम्हारे किनारों पर हल्की-सी झुर्रियाँ हैं, जैसे सदियों ने उँगलियों से छूकर तुम्हें पढ़ा हो। जब तुम्हें खोलता हूँ, बीते मौसमों की खुशबू आती है— बरसात की पहली बूँद, धूप का फीका पड़ता आलिंगन, और किसी प्रतीक्षा का लंबा विराम। तुममें तारीख़ें नहीं, क्षण दर्ज हैं वे जो कहे नहीं गए, पर जी लिए गए। कभी-कभी तुम्हारी सतह पर एक हल्की-सी चमक उभरती है, मानो अतीत फिर से वर्तमान होना चाहता हो। तुम सुनहरा पृष्ठ हो जिसे समय ने संभाल कर रखा, फिर अचानक मेरे जीवन की किताब में सरका दिया। और अब मैं हर दिन तुम्हें पढ़ता नहीं— बस महसूस करता हूँ। मुकेश ,,,,,,,,,,,

धूप के दरवाज़े

 धूप के दरवाज़े तुम हँसती हो तो धूप में छोटे-छोटे दरवाज़े खुलते हैं जैसे सुबह ने अपने गुप्त कमरे एक-एक कर खोल दिए हों। उन दरवाज़ों से गिरती है रोशनी की महीन धूल, जो थके चेहरों पर धीरे से बैठ जाती है। तुम्हारी हँसी सिर्फ़ आवाज़ नहीं, एक चाबी है जो बंद पड़ी दोपहरों को फिर से चलना सिखाती है। जब तुम मुस्कराती हो, दीवारों की सख़्ती पिघलती है, और हवा थोड़ी कम अकेली लगती है। तुम हँसती हो तो लगता है दुनिया ने अपने भीतर एक और खिड़की खोज ली है, जहाँ से उम्मीद बिना दस्तक के अंदर चली आती है। मुकेश ,,,,,,,

नीले की तहों में

 नीले की तहों में तुम्हारी आँखों में नीले आसमान की तहें हैं जैसे किसी अनंत चादर को सावधानी से मोड़ कर रख दिया गया हो। उन तहों के बीच उड़ते हैं अधूरे पंछी, जो दिशा नहीं, बस विस्तार खोजते हैं। कभी-कभी एक बादल ठहर जाता है वहाँ थोड़ी-सी नमी छोड़कर, थोड़ी-सी उदासी। मैं जब झाँकता हूँ, तो दिखता है एक पूरा मौसम पलकों के भीतर धूप का धीमा कंपन, हवा का अदृश्य स्पर्श। तुम्हारी आँखें सिर्फ़ रंग नहीं हैं, वे आकाश का वह हिस्सा हैं जहाँ क्षितिज अपने ही भीतर मुड़ जाता है। और मैं हर बार लौटकर उसी नीले में खो जाना चाहता हूँ। मुकेश ,,,,,,,,

आख़िरी सीढ़ी

 आख़िरी सीढ़ी शायद तुम अधूरे स्वप्न की आख़िरी सीढ़ी से उतरी हो जहाँ नींद और जाग एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े रहते हैं। वहाँ, जहाँ इच्छाएँ आधी खुली आँखों में धीमे-धीमे साँस लेती हैं, और स्मृतियाँ अपने ही धुंध में लिपटी रहती हैं। तुम उसी धुंध से निकली लगती हो पाँवों में बादल की थरथराहट, आँखों में अनकहे वादों की नमी। जब तुम पास आती हो, मेरे भीतर कोई पुराना सपना अपनी राख झाड़ता है। तुम्हारी आहट से नींद की सीढ़ियाँ फिर बनती हैं एक-एक पायदान रोशनी से तराशा हुआ। शायद तुम वही हो जिसे स्वप्न ने पूरा होने से पहले धरती पर भेज दिया कि कोई उसे जागती आँखों से भी देख सके। मुकेश ,,,,,,,,,

तुम परियों के देश से आई हो

तुम परियों के देश से आई हो या शायद किसी अधूरे स्वप्न की आख़िरी सीढ़ी से उतरी हो। तुम्हारी आँखों में नीले आसमान की तहें हैं, जिनमें बादल चुपचाप अपने राज़ रखते हैं। तुम जब बोलती हो, हवा अपनी चाल बदल लेती है, जैसे उसे याद आ गया हो कोई पुराना गीत। तुम्हारे पाँव धरती पर हैं, पर छाया थोड़ी-सी ऊपर चलती है मानो गुरुत्व भी तुम्हें पूरी तरह बाँध नहीं पाता। तुम हँसती हो तो धूप में छोटे-छोटे दरवाज़े खुलते हैं, जहाँ से उम्मीद धीरे-धीरे बाहर आती है। किस लोक से लाई हो ये उजली सादगी? ये अनकही करुणा? तुम परियों के देश से आई हो या फिर इस दुनिया ने पहली बार अपना ही बेहतर रूप तुममें देख लिया है। मुकेश ,,,,,,

सफ़ेद की साज़िश

 सफ़ेद की साज़िश” बस बर्फ़ थी पर इस बार वो चुप नहीं थी। वो उतरती नहीं, रेंगती थी आसमान से जैसे किसी बूढ़े देवता की सफ़ेद दाढ़ी टूट-टूट कर धरती पर बिखर रही हो। उसके हाथ में कोई कटार नहीं, उसकी उँगलियाँ ही धार थीं जो हवा की गर्दन पर धीरे-धीरे फिरती रहीं। रात ने जब आँखें मूँदीं, उसने पलकों पर ठंड की मुहर लगा दी। ख़्वाबों के दरवाज़े भीतर से जम गए। पेड़ों की नसों में हरकत बंद हो गई, नदियाँ अपने ही शब्द निगल कर सो गईं। बर्फ़ सफ़ेद अँधेरा नहीं, एक ऐसी रोशनी थी जो सब रंगों को अपने भीतर दफ़्न कर लेती है। वो चमगादड़ों-सी नहीं, गिरजाघरों की खामोश घंटियों-सी थी— जो बजती नहीं, बस समय को ठंडा कर देती हैं। सुबह जब आई, धरती कफ़न में नहीं थी वो तपस्या में बैठी थी। बर्फ़ थी पर मृत्यु नहीं, एक लंबा, निर्वाक् विराम जिसमें जीवन अपनी अगली धड़कन सुनने की प्रतीक्षा करता है। मुकेश ,,,,,,,,,

तुम्हारी यादें ओस पर ठहरी धूप हैं

 तुम्हारी यादें ओस पर ठहरी धूप हैं तुम्हारी यादें ओस पर ठहरी धूप हैं नर्म, क्षणभंगुर, पर भीतर तक उतर जाने वाली। सुबह जब घास की पत्तियों पर पारदर्शी बूँदें काँपती हैं, उसी हल्की-सी चमक में तुम्हारा नाम जगमगाता है। धूप उन्हें छूती है तो वे सोना नहीं बनतीं, बस थोड़ी-सी रोशनी आसपास बाँट देती हैं। तुम्हारी यादें भी ऐसी ही हैं— पल भर की, पर उतनी ही पर्याप्त कि दिन की शुरुआत मुस्कान से हो सके। मैं झुककर देखता हूँ तो अपना चेहरा उन बूँदों में धुँधला-सा दिखता है जैसे तुम्हारी स्मृति मुझे ही साफ़ कर रही हो। कुछ देर बाद ओस सूख जाती है, धूप आगे बढ़ जाती है पर जो चमक क्षण भर को पत्तियों पर थी, वह भीतर रह जाती है। तुम्हारी यादें ओस पर ठहरी धूप हैं— न ठहरने का दावा, न खो जाने का डर। बस एक हल्की उजास, जो हर सुबह मुझे फिर से जीवित कर देती है। मुकेश ,,,,,,,,,

तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं

 तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं जो हर संध्या मेरी छत से उठती हैं और नीले में अपना घर खोजती हैं डोर मेरे हाथ में रहती है पर उसकी दिशा तुम्हारी ओर झुकी होती है जैसे हवा भी जानती हो किसका नाम पुकारना है कभी वे तेज़ झोंकों में बेहद ऊँची चली जाती हैं इतनी कि आँखों में पानी भर आए कभी धीमे-धीमे डोलती हैं मानो ठहर कर मुझे ही देख रही हों इन पतंगों पर लिखे नहीं होते शब्द पर हर रंग एक अधूरी बातचीत है हर कंपन एक अनकहा स्पर्श मैं डोर को ढीला भी छोड़ता हूँ कभी कसकर थामता भी हूँ पर सच यह है कि उड़ान मेरी नहीं उनकी है अगर किसी दिन डोर सचमुच कट भी जाए तो भी वे गिरेंगी नहीं किसी और आकाश में अपना रास्ता बना लेंगी तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं और मैं अब भी आसमान की ओर देखना नहीं छोड़ पाया हूँ मुकेश ,,,,,,

तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं

 तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं जो मेरी छत से उड़ती हैं पर आसमान तुम्हारा नापती हैं डोर मेरे हाथ में है पर खिंचाव तुम्हारी ओर है हर झोंका तुम्हारा नाम लेकर आता है कभी वे बहुत ऊपर चली जाती हैं इतनी कि आँखें चुँधिया जाएँ कभी अचानक नीचे झुकती हैं जैसे पुकार रही हों इन पतंगों पर कोई रंग स्थिर नहीं कभी सावन का हरा कभी संध्या का केसरिया कभी चाँदनी का फीका सफेद मैं डोर थामे खड़ा रहता हूँ छत पर अकेला पर आसमान भरा रहता है तुम्हारी हल्की उपस्थिति से डर भी लगता है कि कहीं डोर कट न जाए पर फिर सोचता हूँ कुछ यादें उड़ने के लिए ही होती हैं अगर वे लौट आएँ तो हथेली पर रख लूँगा अगर दूर चली जाएँ तो भी उन्हें देखता रहूँगा तुम्हारी यादें हवा में बँधी पतंगें हैं और मैं अब भी उसी खुले आकाश के नीचे खड़ा हूँ मुकेश ,,,,,,,,,,,,

तुम्हारी यादें बारिश की खुली खिड़कियाँ हैं

 तुम्हारी यादें बारिश की खुली खिड़कियाँ हैं तुम्हारी यादें बारिश की खुली खिड़कियाँ हैं जहाँ से भीगती हुई हवा सीधे दिल तक आती है। जब बादल बिना दस्तक दिए आकाश पर छा जाते हैं, वहीं से तुम्हारी आवाज़ बूँदों में घुलकर उतरती है। खिड़की खुली रहती है न पर्दा, न रोक। बस पानी की महीन लकीरें और काँच पर फिसलती हुई स्मृतियों की धुन। तुम्हारी हँसी जैसे टीन की छत पर बरसती बारिश एक साथ शोर भी, एक साथ सुकून भी। भीतर की सूखी दीवारें धीरे-धीरे नम हो जाती हैं, और मन की धूल बहने लगती है। कभी-कभी मैं उस खिड़की के पास बैठा हथेली बाहर कर देता हूँ कि कुछ बूँदें मेरे हिस्से भी आएँ। तुम्हारी यादें सिर्फ़ भीगना नहीं सिखातीं, वे सिखाती हैं भीगकर हल्का होना। और जब बारिश थमती है, खिड़की के चौखट पर एक ताज़ी गंध रह जाती है मिट्टी की, नई शुरुआत की। तुम्हारी यादें बारिश की खुली खिड़कियाँ हैं जिन्हें मैं कभी बंद नहीं करता। मुकेश ,,,,,,,,,,,,

तुम्हारी यादें चाँद की पगडंडियाँ हैं

 तुम्हारी यादें चाँद की पगडंडियाँ हैं तुम्हारी यादें चाँद की पगडंडियाँ हैं रात के सुनसान में धीरे-धीरे उतरती हुई। जब अँधेरा अपने सबसे गहरे रंग में होता है, वही पतली-सी उजली राह मुझे तुम्हारी ओर ले चलती है। कोई शोर नहीं, कोई भीड़ नहीं बस चाँदनी की हल्की परत और कदमों की आहट। इन पगडंडियों पर चलते हुए समय धीमा हो जाता है, साँसें भी थोड़ी सँभलकर चलती हैं। कभी-कभी बादल आकर रास्ता ढँक लेते हैं, पर मैं जानता हूँ चाँद कहीं गया नहीं, बस परदे के पीछे है। तुम्हारी यादें मुझे गिरने नहीं देतीं, वे अँधेरे में भी एक सफ़ेद रेखा खींच देती हैं। मैं उन्हीं पर चलता हुआ अपनी थकान उतार देता हूँ, और रात कम अकेली लगने लगती है। तुम्हारी यादें चाँद की पगडंडियाँ हैं जहाँ पहुँचकर मैं हर बार थोड़ा-सा उजाला अपने भीतर ले आता हूँ। मुकेश ,,,,,,,,

तुम्हारी यादें धूप की सीढ़ियाँ हैं

 तुम्हारी यादें धूप की सीढ़ियाँ हैं तुम्हारी यादें धूप की सीढ़ियाँ हैं जिन पर चढ़ते हुए मैं अँधेरे से बाहर आता हूँ। हर पायदान पर एक मुस्कान रखी है तुमने, एक अधूरा वाक्य, एक छूटी हुई हँसी। जब मन बहुत नीचे गिरता है, मैं उन्हीं सीढ़ियों पर धीरे-धीरे पाँव रखता हूँ और रोशनी मेरे कंधों तक भरने लगती है। तुम्हारी आवाज़ जैसे दोपहर की गर्माहट, जो ठिठुरते भीतर को संभाल लेती है। कभी-कभी कोई बादल आ जाता है, सीढ़ियाँ धुँधली हो जाती हैं पर धूप कहीं जाती नहीं, बस थोड़ा ठहर जाती है। तुम्हारी यादें सिर्फ़ स्मृतियाँ नहीं, वे रास्ता हैं— जो ऊपर ले जाता है, जहाँ आसमान थोड़ा और पास लगता है। मैं जानता हूँ, हर सीढ़ी पर तुम्हारा स्पर्श नहीं मिलेगा पर जो उजाला है, वही काफी है। तुम्हारी यादें धूप की सीढ़ियाँ हैं— और मैं अब भी चढ़ रहा हूँ। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

तुम्हारा ओस में धुला हुआ चेहरा

तुम्हारा ओस में धुला हुआ चेहरा सुबह बहुत धीरे आई थी उस दिन जैसे किसी ने नींद की चादर आहिस्ता से सरकाई हो। घास पर झुकी ओस अब भी काँप रही थी, और उसी पारदर्शी थरथराहट में मैंने देखा तुम्हारा चेहरा। न कोई श्रृंगार, न कोई आडंबर बस भोर की ताज़गी जो पलकों पर ठहरी हुई थी। तुम्हारी मुस्कान जैसे पहली धूप, जो बिना पूछे देह पर उतर आती है। ओस की हर बूँद तुम्हारे गालों से धीरे-धीरे फिसलती हुई कह रही थी— “निर्मल होना ही सुंदर होना है।” मैंने हाथ बढ़ाया, पर छूने की हिम्मत नहीं हुई डर था कि कहीं यह दृश्य सिर्फ़ एक क्षण का न हो। तुम्हारा ओस में धुला हुआ चेहरा समय से बाहर था जैसे कोई प्रार्थना जो शब्दों से नहीं, साँसों से कही जाती है। और जब सूरज थोड़ा ऊपर आया, ओस बिखर गई पर वह ताज़गी अब भी मेरे भीतर है। तुम्हारा चेहरा अब स्मृति में नहीं, एक उजाले में बसता है जहाँ हर सुबह फिर से जन्म लेती है। मुकेश ,,,,,,,,, 

रूह में रखोगे तो ठहर जाऊँगा

  रूह में रखोगे तो ठहर जाऊँगा मुझे हथेलियों पर मत रखो पसीना मुझे बहा ले जाएगा। जेब में भी मत रखना, सिक्कों की खनक में मैं खो जाऊँगा। नाम की तरह मत पुकारो, लोगों के बीच हर आवाज़ घुल जाती है। अगर रखना ही है— तो रूह में रखना। जहाँ साँसें जन्म लेती हैं, जहाँ धड़कनों का कोई धर्म नहीं, जहाँ यादें खून की तरह बहती हैं बिना शोर किए। मैं वहाँ एक हल्की-सी गर्मी बनकर ठहर जाऊँगा, न दिखूँगा, न छूटूँगा। तुम्हारी उदासी के पीछे एक उजली परछाई-सा, तुम्हारी हँसी में अनसुना-सा स्वर बनकर। रूह में रखोगे तो मुझे बचाना नहीं पड़ेगा— मैं खुद तुम्हें बचाता रहूँगा भीतर की खाली जगहों से। और जब कभी तुम अकेली पड़ जाओगी, अपने ही सन्नाटे से डरकर— मैं वहीं मिलूँगा, ठहरा हुआ, जैसे कभी गया ही न था। — मुकेश

नदी की मटकी में भरा समय

 नदी की मटकी में भरा समय हमने एक दिन नदी से कहा ज़रा ठहरो, तुम्हारी बहती हुई उम्र हथेलियों से फिसल जाती है। नदी मुस्कुराई, और अपनी लहरों में से एक मटकी गढ़ दी मिट्टी की, जिसमें धड़कन की गूँज थी। हमने उसमें थोड़ा-सा समय भर लिया, जैसे कोई बरसात का पानी सहेजता है आने वाली प्यास के लिए। उस मटकी में बचपन की किलकारियाँ थीं, युवावस्था की अधीरता, और बुज़ुर्ग दिनों की धीमी, लंबी साँसें। जब भी जीवन बहुत तेज़ भागने लगता, हम मटकी का ढक्कन खोलते और भीतर से नदी की ठंडी आवाज़ निकलती, कहती “सब कुछ बह रहा है, पर सब कुछ मिटता नहीं।” धूप उसे छूती तो समय चमक उठता, रात उसे सहलाती तो उसमें तारों की परछाईं उतर आती। एक दिन मटकी ज़रा-सी चटक गई और समय की कुछ बूँदें फर्श पर गिर पड़ीं। हम घबराए नहीं। हमने देखा वहीं से नई कोंपल फूट आई थी। तब समझ आया नदी की मटकी में भरा समय रखा नहीं जाता, वह सींचा जाता है। और जो सींचा जाए, वह कभी समाप्त नहीं होता— बस रूप बदलकर फिर बहने लगता है। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

आँगन जितना अनंत

 आँगन जितना अनंत हमारे घर का आँगन माप से बाहर है नापने बैठो तो दिशाएँ थक जाती हैं। वहाँ तुलसी के पास सुबह की पहली किरण धीरे से पाँव धोती है, और शाम दीये की लौ में अपना चेहरा देखती है। उस आँगन में बच्चों की हँसी चिड़ियों-सी उड़ती है, और बुज़ुर्गों की चुप्पी बरगद की जड़-सी गहरी उतरती जाती है। हमने वहीं रखा है अपना दुःख भी— कि खुले में रहे, साँस ले सके, सूख सके धूप में। सपने वहीं रस्सी पर सूखते हैं, बारिश के बाद और चमकीले होकर। कोई दीवार उस आँगन को बाँध नहीं पाती क्योंकि वह मिट्टी से नहीं, मन से बना है। कभी-कभी रात गहरी होती है तो आकाश धीरे से उतर आता है और उसी आँगन में तारे बिखेर देता है जैसे किसी ने अनंत को मुट्ठी में भरकर ज़मीन पर रख दिया हो। हम वहीं बैठकर समय से बातें करते हैं, और वह बिना जल्दी किए हमारी गोद में कुछ पल छोड़ जाता है। आँगन जितना अनंत और अनंत जितना अपना यही हमारा विस्तार है, यही हमारी परिधि, यही वह जगह जहाँ सीमाएँ चुपचाप घुल जाती हैं। मुकेश ,,,,,,,,,

धरती पर रखा एक आलिंगन

 धरती पर रखा एक आलिंगन हमने अपने हाथों की ऊष्मा से एक आलिंगन गढ़ा और उसे धीरे से धरती पर रख दिया। वह कोई मूर्ति नहीं था, न किसी पर्व का अनुष्ठान बस दो थकी हुई देहों के बीच एक विश्वास की पुलिया। धरती ने उसे चुपचाप स्वीकार लिया, जैसे माँ बच्चे की पहली हिचकी सहेज लेती है। घास ने उस आलिंगन के चारों ओर हरा घेरा बना दिया, कि कोई कठोर कदम उसे ठेस न पहुँचा सके। बारिश आई तो बूंदें उसकी पीठ सहलाने लगीं, और धूप ने उसमें थोड़ी-सी उजास भर दी। वह आलिंगन अब भी वहीं रखा है हर उस जगह जहाँ मनुष्य थककर बैठ जाता है और सिर झुका देता है। जब कोई अपना दुःख धरती पर रखता है, वही आलिंगन धीरे से उसे ढँक लेता है। क्योंकि प्रेम कभी हवा में ही नहीं रहता, वह मिट्टी में भी अपना ताप छोड़ जाता है। और हम बस उसके साक्षी हैं, जो जानते हैं कि धरती पर रखा एक आलिंगन आकाश तक पहुँच जाता है। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

खुली हवा में दर्ज नाम

 खुली हवा में दर्ज नाम हमने अपना नाम किसी पत्थर पर नहीं लिखा, न ही धातु की पट्टिकाओं पर हमने उसे छोड़ दिया खुली हवा में। हवा जानती है किसे कहाँ ले जाना है। वह हमारे अक्षरों को पेड़ों की फुनगियों तक पहुँचाती है, जहाँ पत्तियाँ धीरे-धीरे उन्हें पढ़ती हैं। नदी भी जानती है वह बहते हुए हमारे नाम का स्वाद पानी में घोल देती है, ताकि जो पिए उसे एक अनकहा परिचय मिले। हमने अपने नाम धूप की सीढ़ियों पर रखे, कि हर सुबह वे चमक उठें बिना किसी दावा-हक़ के। कोई शिला-लेख नहीं, कोई इतिहास की मुहर नहीं बस एक हल्की-सी ध्वनि, जो सन्नाटे में भी सुनाई देती रहे। कभी-कभी जब हवा अचानक चेहरे को छू जाती है, लगता है जैसे किसी ने पुकारा हो। शायद वही हमारा नाम है, जो अब भी खुले आकाश में तैर रहा है बिना बंधन, बिना भय, बिना सीमा। और यदि समय की आँधी सब कुछ मिटा भी दे, तो भी हवा में दर्ज नाम मिटते नहीं वे बस रूप बदल लेते हैं, और फिर किसी नई सुबह किसी और की साँसों में जन्म ले लेते हैं। मुकेश ,,,,,,,,,,

बिना दीवारों का सपना

 बिना दीवारों का सपना मैंने एक सपना देखा  जिसमें घर था, पर कोई दीवार नहीं। हवा भीतर आती थी जैसे कोई अपना, और जाती थी बिना अलविदा कहे। उस घर में राज़ नहीं छुपाए जाते थे, वे धूप की तरह खुले फर्श पर पसरे रहते थे। रात आती तो चाँद चुपचाप आकर आँगन में बैठ जाता, और सितारे बच्चों-से इधर-उधर दौड़ते। कोई कोना नहीं था जहाँ भय टिक सके, कोई छाया नहीं जहाँ संदेह पल सके। हमने वहाँ सिर्फ़ विश्वास बोया था  और हर सुबह वह नई कोंपल की तरह फूट पड़ता। बारिश होती तो छत नहीं टपकती, क्योंकि छत थी ही नहीं  भीगना ही उस घर की आदत थी। हमारे आँसू वहीं सूखते थे पेड़ों की पत्तियों पर, और हँसी खुले आकाश में घंटी-सी बजती रहती। उस सपने में ताले नहीं थे, क्योंकि कुछ भी किसी का अकेले का नहीं था। सुबह जब आँख खुली, तो दीवारें फिर से खड़ी थीं  पर भीतर कहीं अब भी बचा है वह बिना दीवारों का सपना, जहाँ प्रेम किसी सीमा में नहीं रहता, और घर सिर्फ़ एक-दूसरे की धड़कनों से बनता है। मुकेश ,,,,,,,,,,,

जहाँ आसमान हमारा पता है

 जहाँ आसमान हमारा पता है, वहाँ डाकिया बादल होता है और चिट्ठियाँ हवा की जेब में रखी मिलती हैं। वहाँ किसी नक़्शे पर खिंची नहीं होती सीमाएँ, सिर्फ़ पगडंडियाँ होती हैं जो कदमों की नीयत से बनती हैं। हमने वहीं रखा है अपना छोटा-सा संसार एक चटाई धूप की, एक तकिया चाँद का, और कुछ सपने जो हर रात रंग बदल लेते हैं। वहाँ दरवाज़ा नहीं, बस खुलापन है— जिससे जो आए अपना दुःख उतार सके। पेड़ों से सीखते हैं हम झुककर ऊँचा होना, नदियों से बहकर ठहरना। हमारी रसोई में आग नहीं, आशा जलती है। हमारी थाली में रोटी नहीं, परिश्रम की महक होती है। और जब कभी थकान बहुत गहरी हो जाती है, हम पीठ टिकाकर आसमान को देखते हैं वही हमारा स्थायी पता है, वही हमारी छत, वही हमारी पहचान। अगर कोई पूछे “तुम कहाँ रहते हो?” हम मुस्कुरा कर कहते हैं— जहाँ सीमाएँ ख़त्म होती हैं, और मन अपना नाम खुले नीले में लिख देता है। वहीं। मुकेश ,,,,,,,,,

उधर चलो

उधर चलो, जहाँ ज़मीन अभी तक किसी नक़्शे में दर्ज नहीं हुई। वहाँ हम रख देंगे अपने नामों की जगह बस साँसों की आहट। कोई दीवार नहीं होगी  हवा ही सहारा बनेगी, और खुलापन ही हमारा आँगन। रात जब थकेगी तो सितारे उतर आएँगे चारपाई बनकर। सुबह ओस की बूँदों में हम अपना चेहरा धोएँगे। पेड़ों की शाखों पर टाँग देंगे दिन भर की चिंताएँ, और पत्तों से छनकर धूप सिखाएगी सहन करना। हम बीज नहीं, इरादे बोएँगे  और फसल में विश्वास काटेंगे। नदी को नहीं बाँधेंगे, बस उसकी आवाज़ घड़े में भर लेंगे प्यास लगने पर सुनने के लिए। पहाड़ों से कहेंगे थोड़ा धैर्य उधार दो, मैदानों से थोड़ी सरलता। और जब कभी सन्नाटा बहुत गहरा हो जाएगा, हम उसी में अपनी धड़कनों की हल्की-सी चहल-पहल ढूँढ़ लेंगे। बस एक काम रहेगा  कुछ पन्ने संभाल कर रखना, जिन पर लिखा होगा हमने कैसे खुली हवा में एक घर बसाया था। अगर कोई बरसों बाद उन पन्नों को खोले, तो उसे महसूस हो  घर ईंटों से नहीं, एक-दूसरे की अनकही सहमति से बनता है। उधर चलो  वहीं रहते हैं हम जैसे जो भीड़ में नहीं, खुले आसमान में अपना नाम पुकारते हैं। मुकेश ,

न बना सका तुम्हारा मौसम

 न बना सका तुम्हारा मौसम (बिमल कुमार की कविता से प्रेरित ) चाहा था तुम्हें अपना सूरज बना लूँ थोड़ी-सी धूप रख लूँ जेब में, ठंडे दिनों में खोलकर पहन लूँ। पर तुम मेरी हथेली पर ठहरी ही नहीं। सोचा था तुम्हें एक रास्ता बना लूँ, चलता रहता उम्र भर तुम्हारी दिशा में। पर तुमने अपने नक़्शे किसी और शहर में रख छोड़े थे। मैंने चाहा तुम मेरी आवाज़ बन जाओ जब गला भर आए तो तुम बोलो मेरी जगह। पर तुमने मेरी ख़ामोशी भी अपने पास नहीं रखी। मैंने सोचा तुम्हें एक सपना बना लूँ, जिसे हर रात देख सकूँ। पर तुम नींद की तरह थीं आती थीं, और बिना वजह टूट जाती थीं। मैं तुम्हें अपना मौसम भी न बना सका न बारिश, न धूप, न हवा का एक छोटा-सा झोंका। दुख इस बात का कम है कि तुम मेरी नहीं बनीं, दुख यह है कि मैं भी तुम्हारा कोई रूप न ले सका न दीवार, जिससे टिककर तुम रो सको, न आईना, जिसमें तुम खुद को पहचान सको। मैं तैयार था तुम्हारे लिए छाया बनने को, धूल बनने को, यहाँ तक कि एक साधारण-सी पगडंडी बनने को भी पर तुमने मेरे होने को कोई नाम नहीं दिया। मैं आज भी खड़ा हूँ तुम्हारी राह के किनारे— पेड़ नहीं बना, फूल नहीं बना, काँटा भी नहीं—...

सफ़्हे की नसों में बचा हुआ नाम

 सफ़्हे की नसों में बचा हुआ नाम तुमने कहा मैंने तुम्हें मिटा दिया है। मैं मुस्कुराया। क्योंकि मुझे पता था, स्याही सिर्फ़ ऊपर से जाती है, काग़ज़ की नसों में वो धीरे-धीरे उतर जाती है। तुमने हर्फ़ काटे, लाइनें सीधी कीं, नई कहानी लिख दी— पर जहाँ-जहाँ मेरा नाम था, वहाँ काग़ज़ थोड़ा-सा धड़कता रहा। तुम्हारी उँगलियाँ जब उस पन्ने पर ठहरती हैं, तुम्हें कुछ महसूस होता है एक हल्की-सी खुरदुराहट, जैसे कोई अक्षर अभी भी भीतर साँस ले रहा हो। मैं अब शब्द नहीं हूँ, न वाक्य, न कोई पूरा अध्याय— बस एक महीन-सी रग हूँ जो उस सफ़्हे के जिस्म में धीमे-धीमे चलती है। तुम पढ़ती रहो नई किताब, नया नाम पर एक दिन अचानक किसी सन्नाटे में जब उँगली उस जगह से गुज़रेगी, तुम्हें लगेगा किसी ने भीतर से धीरे से पुकारा है। वो मैं नहीं, वो तुम्हारा अपना दिल होगा जो उस सफ़्हे की नसों में बचा हुआ मेरा नाम फिर से पढ़ लेगा। — मुकेश

मिटा दो मुझे

  मिटा दो मुझे तुम मुझे अपनी किताब से मिटा दो हर्फ़ दर हर्फ़— जैसे कोई पंक्ति गलती से लिखी गई हो और अब सही कर दी गई हो। मेरे नाम पर उँगलियों की स्याही फेर दो, मेरी याद के कोनों को रबर से घिस दो इतना कि काग़ज़ पतला पड़ जाए। ताकि कभी दिल भी करे तो तुम मुझे याद न कर सको— न मेरी आवाज़, न मेरी आँखों का ठहराव, न वो अधूरी बातें जो हमने पूरी करने से पहले ही छोड़ दीं। पर सुनो— किताबें अक्सर मिटाए गए शब्दों की छाप सहेज लेती हैं। सफ़्हा चाहे सफ़ेद दिखे, अंदर कहीं दबा हुआ अक्षर अपना निशान छोड़ जाता है। अगर सच में मिटाना हो, तो मुझे अपने दिल से मिटाना— क्योंकि काग़ज़ से नाम मिटते हैं, याद से नहीं। — मुकेश

लौटना, बिना वजह

  लौटना, बिना वजह कभी-कभी हम लौटते हैं— न किसी वादे की खींच से, न किसी शिकायत की आग में, बस यूँ ही… जैसे हवा पुरानी गली पहचान लेती हो। मैं भी लौटा था एक दिन बिना वजह, बिना इरादे के शोर के। दरवाज़े वही थे, दीवारों पर वही धूप, सिर्फ़ हमारे बीच की दूरी कुछ और पुरानी हो गई थी। तुमने पूछा भी नहीं—क्यों? मैंने बताया भी नहीं—कहाँ से? हम दोनों जानते थे कि वजहें अक्सर बहाने होती हैं, और कुछ रिश्ते कारणों से नहीं, आदतों से बँधे रहते हैं। लौटना, बिना वजह शायद स्वीकार करना है कि कुछ जगहें, कुछ लोग, हमारे भीतर से कभी जाते ही नहीं। और मैं उसी अनकहे को थामे फिर से चला आया था तुम्हारी ख़ामोशी में अपना नाम सुनने। — मुकेश

दरवाज़े पर एक साया

  दरवाज़े पर एक साया शाम ढल रही थी, कमरे में रोशनी और अँधेरे की बराबर हिस्सेदारी थी, और तभी दरवाज़े पर एक साया ठहर गया। न दस्तक, न नाम, बस मौजूदगी— जैसे कोई बीता हुआ वक़्त अपनी आहट खुद लेकर आया हो। मैंने परदे की ओट से देखा— चेहरा बदला हुआ था, आँखें नहीं। उनमें अब भी वही अधूरा सवाल था जिसका जवाब हमने कभी पूरा नहीं दिया। साया भीतर नहीं आया, बस चौखट पर खड़ा रहा— जैसे इंतज़ार कर रहा हो कि मैं उसे पहचानूँ या फिर अनदेखा कर दूँ। मैंने दरवाज़ा खोला नहीं, पर दिल की कुंडी हल्की-सी हिल गई। शायद वह तुम थे, शायद मेरी अपनी ही याद— जो इतने बरस बाद दरवाज़े पर साया बनकर लौट आई थी। — मुकेश

अगर मैं वैसा न रहूँ

  अगर मैं वैसा न रहूँ मान लो किसी सांझ जब धूप आख़िरी बार दीवारों को छूकर लौट रही हो, और तुम अपने कमरे की खामोशी में धीरे-धीरे घुल रही हो, मैं आ जाऊँ बिना दस्तक, बिना किसी पुराने वादे की गूँज के। चेहरे पर समय की हल्की-सी रेखाएँ हों, आँखों में अब आग्रह नहीं, सिर्फ़ ठहरा हुआ पानी हो। बातें कम, सुनना ज़्यादा, और उम्मीदें लगभग शून्य। मैं तुम्हें समझाने न आऊँ, न मनाने, न ही बीते दिनों की राख कुरेदने बस चुपचाप बैठ जाऊँ तुम्हारे सामने जैसे कोई पुराना दरख़्त आँधी के बाद भी खड़ा रहता है। अगर मैं प्रेम का इज़हार छोड़ चुका होऊँ, और सिर्फ़ उपस्थिति बची हो, तो क्या तुम मेरी बदली हुई चाल में वही पुराना नाम सुन पाओगी? क्या तुम्हारी स्मृतियों की धूल मेरे चेहरे से हटकर फिर से मुझे पहचान लेगी? जिसे तुम भुलाना भी चाहती हो, और पूरी तरह खोना भी नहीं क्या वो अब भी मैं हूँ? बताओ अगर मैं कम हो जाऊँ अपने ही भीतर, तो क्या तुम्हारे दिल में मेरी जगह अब भी पूरी रहेगी? — मुकेश

क्या तुम पहचानोगी?

  क्या तुम पहचानोगी? मान लो गर्मी की एक उनींदी दोपहर में ए.सी. की ठंडी साँसों के बीच तुम किसी मीठे ख़्वाब में डूबी हो, और मैं अचानक दरवाज़े पर आ खड़ा होऊँ। फ्रेंच-कट दाढ़ी अब न हो, बालों की बनावट बदल गई हो, बातों का शोर छूट गया हो पीछे, और मैं पहले से कम बोलने वाला, ज़्यादा सुनने वाला हो गया होऊँ। न कोई सलाह, न कोई शिकवा, न प्रेम का दावा बस स्थिर-सी नज़रें और थोड़े बेतरतीब कपड़े, जैसे भीतर का मौसम बाहर उतर आया हो। मान लो मैं “मैं” कम रह गया होऊँ, और एक ख़ामोश आईना ज़्यादा। तो क्या तुम मेरी आवाज़ के बिना मेरी ख़ामोशी से मुझे पहचानोगी? क्या तुम्हारी पलकों पर अब भी मेरा नाम हल्की-सी थरथराहट बनकर उतरता है? जिससे तुम पीछा छुड़ाना भी चाहती हो, और पूरी तरह छोड़ भी नहीं पाती क्या वो अब भी मैं हूँ? बोलो अगर मैं बदल जाऊँ इतना कि पहचान में न आऊँ, तो क्या तुम्हारा दिल मुझे फिर भी मुकेश कहेगा? — मुकेश

ग़ैरज़रूरी बातें

 ग़ैरज़रूरी बातें मुझे तुम्हारे बारे में बहुत-सी ग़ैरज़रूरी बातें मालूम हैं— तुम चाय में कितनी शक्कर डालती हो, बरसात में बाल खुला रखना क्यों पसंद है, और किताब के पन्ने मोड़ने से क्यों चिढ़ जाती हो। मुझे पता है तुम किस रास्ते से रोज़ लौटती हो, किस मोड़ पर रुककर साँस लेती हो, और किस दुकान की बत्तियाँ तुम्हें बेवजह उदास कर देती हैं। ये भी जानता हूँ कि तुम हँसते हुए अक्सर आँखें क्यों चुरा लेती हो, और ख़ामोशी में किसका नाम सबसे पहले टूटता है। ये सारी बातें तुम्हारे काम की नहीं, मेरे भी किसी काम की नहीं— बस इतनी-सी अहमियत है कि इनके बिना मैं तुम्हें थोड़ा-सा भी पूरा नहीं समझ पाता। और शायद इसीलिए ये सारी बातें ग़ैरज़रूरी होकर भी मेरे लिए सबसे ज़रूरी हैं (अंचित् की कविता से प्रेरित हो के)  मुकेश्,,,

इंतज़ार की ऋतुएँ

 इंतज़ार की ऋतुएँ तुम जनवरी में नहीं आईं, फरवरी भी खामोशी में बीती। मार्च ने अपना उजाला फैला दिया, और उम्मीद अब भी धड़कती है— तुम आओगी, जैसे फागुन हर साल आता है, बिना शोर, बिना आग्रह, बस अपनी मधुरता के साथ। मुकेश ,,

ओस और खामोशी

 ओस और खामोशी जब जनवरी की आख़िरी हवा में चाँद ने अपना सफ़ेद दर्पण फैलाया, मैं जमीन की तरह शांत पड़ा था, तुमने धीरे-धीरे मुझे अपनी छाया में रखा, जैसे कोई फूल अपने पंखुड़ियों को ओस में भीगा रहा हो। उस ठंडी नमी में छुपी तुम्हारी खुशबू मेरी नसों में उतर गई, मेरे अंदर के उन अनकहे हिस्सों तक, जहाँ शब्द भी डरते हैं जाने से। मैं कैसे भूल सकता हूँ उस रात की हर मुस्कान को, हर धीमे स्पर्श को, जो ओस की तरह मेरे भीतर घुल गया था। और आज भी, जब चाँद हवा में झिलमिलाता है, मैं सिर्फ खामोश बैठा हूँ तुम्हारे बिना भी तुम्हें महसूस करते हुए। मुकेश ,,,,,,,,,,,,

फरवरी की बेरुखी

 फरवरी की बेरुखी फरवरी का महीना हल्की होती ठंड, धूप की झिलमिलाहट, और तुम्हारी वही बेरुखी, जो सर्दी के मौसम में भी मेरे भीतर गूँजती थी। हवा के झोंके मुझे तुम्हारी याद दिलाते हैं, हर पत्ता, हर सर्द कुहासा, एक अधूरी बातें, एक अधूरी मुस्कान को छूता है। मैं देखता हूँ तुम्हें, तुम्हारी चुप्पी में, तुम्हारे नजरों की दूरी में, और समझता हूँ सर्दियों की ठंड नहीं, तुम्हारी बेरुखी ही मेरे भीतर का सन्नाटा है। फरवरी की हल्की ठंड में, तुम्हारे बिना, मैं सिर्फ खामोशियों का एक राहगीर हूँ, जो हर कदम पर तुम्हें ढूँढता है, हर सांस में तुम्हें महसूस करता है। मुकेश ,,,,,,,,

सन्नाटे के फूल

 सन्नाटे के फूल सन्नाटे के फूल खड़े हैं, जहाँ हवा भी धीरे-धीरे बहती है। उनकी पंखुड़ियाँ सुनती हैं हर अनकही कहानी, हर दबे कदम की गूँज। कोई हाथ उन्हें नहीं छूता, कोई नजर उन्हें नहीं देखती फिर भी, वे खिले हैं, अपनी चुप्पी में, अपने रहस्य में। हर फूल की गंध में छुपा है एक सवाल, हर रंग में एक अधूरी उम्मीद। जो भी गुजरता है, उसकी आँखों से छूता नहीं, पर उसकी आत्मा के भीतर हलचल पैदा करता है। सन्नाटे के फूल वे हमें याद दिलाते हैं कि मौन भी बोलता है, और अकेलापन भी सिखाता है। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

सब फूल झुके हुए

 सब फूल झुके हुए मैं तन्हाई में खड़ा हूँ, जहाँ आवाज़ें मुझ तक नहीं पहुँचतीं। हर खामोशी, हर खालीपन की परत मेरी आत्मा को धीरे-धीरे खोलती है। मैं चलता हूँ भले ही कदम केवल वहीं ठहरते हों, जहाँ उम्मीद की रौशनी झिलमिलाती है, और अतीत की छाया मुझसे टकराती है। सत्य कोई चीज़ नहीं, केवल अनुभव का रूप है, केवल उस दर्द और प्रेम का प्रतिबिंब है जिसे मैं स्वयं में रखता हूँ। हर फूल, हर घूँट हवा का, मुझसे पूछता है “क्या तुमने अपने भीतर के भूखे हिस्सों को भी देखा?” मैं झुकता हूँ, सिर्फ बाहरी दुनिया के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर की उन अनकही कहानियों के लिए, जो केवल मेरी आत्मा जानती है। और तभी, झुकते हुए, मैं खड़ा हूँ एक ही समय में टूटकर और सशक्त होकर। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

कम खूबसूरत लड़की

कम खूबसूरत लड़की,  आँखों में कहानियाँ लिए, चुपचाप बैठी है,  जहाँ दुनिया की रौनक नहीं पहुँचती। उसके भीतर तूफ़ान हैं, शब्दों के बिना, दिल की गहराई में गूँजते। हर मुस्कान के पीछे दर्द छुपा है, हर हँसी के किनारे पर एक अनकहा सवाल। वो अपनी आवाज़ को दबा लेती है, क्योंकि लोग उसकी कहानी सुनना नहीं चाहते। पर कभी-कभी, जब कोई उसकी आँखों में देखता है, तो उसे महसूस होता है  उसकी आत्मा अभी भी चमक रही है। कम खूबसूरत लड़की—तुम केवल रंग नहीं, तुम वह कहानी हो, जो अपने दर्द से धीरे-धीरे सशक्त बनकर सामने आती है। मुकेश ,,,,,,

अनकहा हिस्सा उसकी ज़िंदगी का

 अनकहा हिस्सा उसकी ज़िंदगी का उसकी ज़िंदगी में एक हिस्सा है, जिसके बारे में वो कभी खुलकर नहीं बताती। ना नाम, ना हक़, ना कोई दावा — फिर भी उस हिस्से की मौजूदगी हर पल महसूस होती है। वो हिस्सा जो चुप्पी में बोलता है, जो उसकी मुस्कान में छुपा है, जो उसकी खामोशी में गूँजता है। पति की याद में, प्रेमी की ख़्वाहिश में, फिर भी वो हिस्सा सिर्फ उसकी है। मैं हूँ वह अनकहा, जो उसे सुनता, समझता, सहता है, पर कभी अपनापन मांग नहीं सकता। गैरज़रूरी होने के बावजूद, ज़रूरी है वह हिस्सा, जिससे उसकी ज़िंदगी पूरी होती है और मैं… बस वहीं हूँ — अनकहा, पर हमेशा उसके पास। मुकेश ,,,,,,,,,,,

तीसरा आदमी

 तीसरा आदमी पति — उसकी ज़िंदगी में, एक ऐसा आदमी, जिसके लिए व्रत रखती है, सुबह, शाम, रात टहलती है, उसकी जली-कटी सुनकर भी, लात-घूँसा सहकर भी, पर हर बात वही करती है, उसकी हर आहट पे सजग रहती है, उसका हर शब्द, उसके लिए आदेश है। प्रेमी — उसकी ज़िंदगी में, एक दूसरा आदमी भी है, जो उसके ख्वाबों में बसा है, सबकी नज़रों से जुदा है, जो सुखी रगों में बहता है। साँसें भले पहले वाले के नाम से चलें, पर खुशबू उसके नाम की महकती है, जो सिर्फ उसे ही पता है। और — तीसरा आदमी भी है, जिससे वो जब चाहे, फ़ोन लगा लेती है, अपने सुख-दुख सुना आती है, लड़ भी लेती है, रो भी लेती है। पर जब मर्ज़ी हो तब ही बात करती है। अगर ये तीसरा आदमी कहे "फ़ोन करो", तो झट से भेजेगी "नहीं", या देख कर अनदेखा कर देगी, या मेसेज डिलीट कर देगी। उसके पास कोई अधिकार नहीं, ना फोटो मांगने का, ना मुलाकात का, ना लंबी बात का, ना प्यार का। फिर भी — यह तीसरा आदमी, ज़रूरी हो के भी गैर-ज़रूरी है। उसके लिए कोई नाम नहीं। जानते हो… यही तीसरा आदमी — मैं हूँ, और हर दूसरा आदमी भी  तीसरा आदमी है है  मुकेश।,,,,,,,,,,,,,,,,,

वन की साँवली दास्तान

 वन की साँवली दास्तान वो आई तो लगा जैसे धूप ने साल के जंगल में अपना काला-सुनहरा साया टाँक दिया हो। उसका रंग  भीगी हुई ज़मीन पर पड़ी बरसों पुरानी धूप-सा, गहरा, महकता, आँखों को ठहर जाने पर मजबूर करता हुआ। कसा-गठा बदन मानो किसी सख़्त तने ने अपनी पूरी ताक़त एक देह में उतार दी हो; चलती है तो बाँसों की लचक उसके क़दमों में उतर आती है। उरोज  दो जंगली आमों की तरह भरपूर और बेक़ल, जिनमें मौसम का रस ठहरा हुआ हो। नितम्बों की मृदुल गोलाई धरती के उभार-सी, जहाँ बीज भरो तो फ़सलें मुस्कुराने लगें; सघन जाँघें वनपथ की दो पुख़्ता धाराएँ  हर चाल में विश्वास की ठोस थाप। उसकी कजरारी आँखें घने सख़ुआ वन की सांझ हैं, जहाँ दाख़िल हो जाओ तो रोशनी भी इज़ाज़त लेकर चलती है। चेहरा  नदी के स्वच्छ पानी-सा निष्छल, जिसमें कोई छलावा नहीं, सिर्फ़ साफ़ प्रतिबिंब। और जब वो जंगली फूलों का गजरा बाँधती है, पलाश की आग, महुए की मस्ती, कुसुम की लाली उसकी चोटी में बस जाती है  मानो पूरा जंगल उसके इर्द-गिर्द सज्दा कर रहा हो। वो हँसती है तो पत्तों की सरसराहट में एक नई रवानी घुल जाती है; वो चुप होती है तो लग...

धरती की कोख से जन्मा अनुराग

 धरती की कोख से जन्मा अनुराग बीज की तरह चुप रहता है पहले, अँधेरे में पलता है, फिर एक दिन रोशनी को चीरकर बाहर आ जाता है। उसका प्रेम आसमान से उतरा हुआ चमत्कार नहीं, वो खेत की नमी है, हल की धार के बाद उठती हुई सोंधी साँस। वो जब मुस्कराती है, तो लगता है जैसे नई कोंपल फूटी हो  संकोची, पर अडिग। उसकी आँखों में दूर पहाड़ियों की शांति है, और शब्दों में बरसों की तपती धूप का धैर्य। वो प्रेम को काँच की तरह नहीं संभालती, उसे मिट्टी में गूँथती है  चूल्हे की आँच पर पकाती है, पसीने की गंध से सींचती है। धरती की कोख सब कुछ सह लेती है  गर्मी, सर्दी, बरसात  और फिर भी अन्न उगाती है। वैसा ही उसका अनुराग है  सहनशील, उर्वर, और जीवनदायी। जो उसके साथ चलता है, वो जानता है  यह प्रेम क्षणिक लहर नहीं, यह तो वह धरा है जिस पर घर बसाए जाते हैं। मुकेश ,,,,,,,,,,,,

पत्तों की सरसराहट में छुपा इकरार

 पत्तों की सरसराहट में छुपा इकरार कभी सीधे शब्दों में नहीं उतरता, वो हवा के कंधे पर बैठकर धीरे-धीरे दिल तक पहुँचता है। साँझ ढलती है, वन के ऊपर धुँधली सुनहरी चादर तनी है, और पेड़ों की चोटियों पर आख़िरी रोशनी काँप रही है। उसी वक़्त वो खड़ी होती है चुप — आँचल में जंगली फूल, पलकों पर अनकहा भरोसा। कोई प्रतिज्ञा नहीं, कोई ऊँची आवाज़ नहीं  बस पास से गुज़रती हवा जब पत्तों को छूकर बोलती है, तो लगता है जैसे जंगल ने उसकी ओर से “हाँ” कह दिया हो। उसका प्रेम घोषणा नहीं करता, वो संकेत देता है  टहनी के हल्के झुकाव में, सूखी घास की महक में, धड़कन की अनसुनी लय में। जो सुनना जानता है, वो उस सरसराहट में अपना नाम पहचान लेता है। और जो नहीं सुन पाता, उसके लिए वो बस हवा है  पर उसके लिए वही इकरार जीवन भर की गूँज बन जाता है। मुकेश ,,,,,,,,,

आग और बारिश के बीच उसका प्रेम

 आग और बारिश के बीच उसका प्रेम ठीक उस धुएँ की तरह था जो भीगकर भी बुझता नहीं, जलकर भी राख नहीं होता। दिन में वो धूप-सी तेज़, सख़्त चट्टानों पर नंगे पाँव चलती हुई  हथेलियों में श्रम की तपिश। रात को बरसात उतरती उसके कंधों पर, और वो भीगती रहती चुपचाप  जैसे हर बूँद उसके भीतर की ज्वाला को संतुलित कर रही हो। उसका प्रेम न सिर्फ़ तपता है, न सिर्फ़ बरसता है  वो दोनों के बीच एक अदृश्य सेतु है। जब वो रूठती है, तो हवा में सूखी पत्तियों-सी खनक होती है; जब वो मानती है, तो मिट्टी से भाप उठती है  गरम, सुगंधित, जीवित। उसने सीखा है कि आग रास्ता बनाती है, और बारिश उसे बचाए रखती है। इसीलिए उसका प्रेम न बेकाबू लपट है, न अंतहीन बाढ़  वो संतुलन है, जहाँ ज्वाला भी जगह पाए और मेघ भी। जो इस प्रेम को समझ ले, वो जान लेता है  सच्चा अनुराग या तो जला देता है, या सींच देता है; और कभी-कभी दोनों एक साथ करता है। मुकेश ,,,,,,,,,

जंगल की देहरी पर रखा दिल

 जंगल की देहरी पर रखा दिल  जैसे किसी ने धरती की चौखट पर अपनी धड़कन उतार दी हो। सामने साल और सखुआ के ऊँचे तन, उनकी छाल पर समय की झुर्रियाँ, बीच-बीच में महुए की गंध हवा में घुलती हुई  मीठी, हल्की, मदहोश। पगडंडी काई से भीगी, जहाँ हर क़दम नरम मिट्टी में हल्का-सा निशान छोड़ता है। झाड़ियों के पीछे जंगली जामुन की बैंगनी चमक, और कहीं दूर एक झरना पत्थरों से टकराकर अपना राग साधता हुआ। सुबह धूप पत्तों के जाल से छनकर सोने के सिक्कों-सी बिखरती है, शाम को धुआँ उठता है कुटियों से और आकाश अँगारों-सा सुर्ख हो जाता है। इसी देहरी पर उसने अपना दिल रखा  न किसी दावे के साथ, न किसी भय के साथ। उसका प्रेम जंगल की तरह है  ऊपर से अनगढ़, भीतर से व्यवस्थित। जहाँ हर बेल किसी तने का सहारा लेती है, और हर पेड़ अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है। अगर तुम उस देहरी पर आओ, तो कदम हल्के रखना  यहाँ पत्तों की सरसराहट भी वचन मानी जाती है, और दिल एक बार रख दिया जाए तो वापस नहीं उठाया जाता। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

बाँसों की छाँव में लिया गया वचन

बाँसों की छाँव में लिया गया वचन हवा की सरसराहट पर नहीं टिका, वो धरती की भीतरी नमी में धीरे-धीरे जम गया। उसने शब्द कम कहे, पर उसकी आँखों में सूरज डूबते वक़्त की लालिमा ठहरी रही  गहरी और सच्ची। पास ही सूखे पत्तों पर गिरती रोशनी टूटे हुए सोने-सी बिखर रही थी, और दूर कहीं कोयल की आवाज़ संध्या का दीप जला रही थी। उसने कलाई से उतारकर लाल धागे का छोटा-सा टुकड़ा उसके हाथ में रख दिया  बस इतना ही था उसका प्रण। न साक्षी कोई शिला, न कोई लिखित शपथ  सिर्फ़ दो धड़कनों के बीच ठहरा हुआ भरोसा। बाँसों की लचक उसे याद दिलाती रही — झुकना हार नहीं होता, साथ बने रहना ही सच्चा साहस है। और उस दिन से हर हवा का झोंका उन्हीं बाँसों से टकराकर एक ही बात दोहराता है  कुछ वचन आवाज़ से नहीं, आभा से निभाए जाते हैं। मुकेश ,,,,,,,,,,,

मिट्टी, ढोल और दिल की थाप

  मिट्टी, ढोल और दिल की थाप — यही उसका गीत है, यही उसका इज़हार। वो जब खेत की मेड़ों पर चलती है, तो पाँव से उठती धूल मानो उसके प्रेम का संदेश हो। उसकी हथेलियों में बीजों की गर्माहट है, और आँखों में दूर तक फैले आकाश का भरोसा। रात ढले जब ढोल की थाप गूँजती है, उसका दिल भी उसी लय में धड़कता है — धीमा नहीं, संकोच से परे। वो प्रेम को शब्दों में नहीं तौलती, न कसमों में बाँधती है — बस नृत्य की गोलाई में किसी के साथ कदम मिला दे, तो वही उसका स्वीकार है। मिट्टी की सोंधी गंध उसके आँचल में बसती है, और ढोल की थाप उसकी छाती में। उसका प्रेम नदी के मोड़-सा सहज है — बिना घोषणा, बिना प्रदर्शन, सिर्फ़ साथ की धड़कन। और जो उस थाप को सुन ले, वो जान जाए — उसने दिल का दरवाज़ा धीरे से खोल दिया है।

झरनों के बीच पनपा प्रेम

 झरनों के बीच पनपा प्रेम शोर में भी अपना गीत पहचान लेता है, पत्थरों से टकराकर भी मीठी धुन में ढल जाता है। वो स्त्री जिसकी हँसी पानी की फुहार-सी हल्की है, जब प्रेम करती है तो पूरे वन को अपने साथ बहा ले जाती है। उसकी पायल किसी बाज़ार की नहीं, भीगे कंकड़ों की खनक है  नंगे पाँव चलती हुई धरती से बातें करती है। झरने के पास वो अक्सर चुप बैठती है, और पानी की लहरों में अपना अक्स नहीं, किसी का नाम ढूँढती है। उसका इकरार लंबे ख़तों में नहीं आता, बस एक दिन वो कंधे से कंधा मिलाकर पत्थरों पर उतर जाएगी  फिसलन से बेख़ौफ़। क्योंकि उसका प्रेम बहते पानी-सा है  रोकने से नहीं रुकता, और जो साथ चल पड़े, उसे अपने संग दूर तक ले जाता है। मुकेश ,,,,,,,,,,

साल वन की बेटी का प्रण

साल वन की बेटी का प्रण हवा में नहीं बिखरता, वो जड़ों में उतरता है और धरती की नब्ज़ में बस जाता है। उसकी देह पर धूप का रंग है, आँखों में नदी की अडिग चमक। वो जब कहती है “साथ”, तो उसका अर्थ मौसम भर का नहीं होता  वो बरसों की पगडंडी है, जिस पर काँटे भी हों तो कदम नहीं लौटते। उसकी हँसी वनपाखी की पुकार है, और उसका क्रोध अचानक उठती आँधी। वो प्रेम को चाँदी की थाली में नहीं सजाती, वो उसे साल के पेड़-सा रोप देती है  धीरे-धीरे बढ़ता, मगर एक दिन आकाश छू लेता है। उसका प्रण नदी की धारा-सा है  रोक दो, मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

महुए की गंध में बसा इश्क़

 महुए की गंध में बसा इश्क़ धीरे-धीरे उतरता है साँसों में, जैसे जंगल ने किसी राज़ को फूलों की शक्ल में खोल दिया हो। वो स्त्री जब प्रेम करती है, तो शब्दों से नहीं  मिट्टी की सोंधी चुप्पी से करती है। उसके बालों में वन की हवा उलझी रहती है, और हथेलियों में दिन भर की मेहनत की तपिश। रात को जब ढोल की थाप दूर कहीं गूँजती है, उसकी आँखों में चाँद की परछाई नहीं, आग की लौ झिलमिलाती है। वो महुए के फूल सिर्फ़ बटोरती नहीं  उनमें अपने सपने चुनती है, और जिस दिन किसी के हाथ में अपना चुना हुआ फूल रख दे, समझो वो अपना दिल दे चुकी। उसका इश्क़ शहरों की तरह सजावटी नहीं, न ही वादों से भरा  वो बस साथ चलने का सीधा-सा यक़ीन है। महुए की गंध सुबह तक भी रहती है, और उसका प्रेम बरसों तक  धीमा, गहरा, और मिट्टी से जुड़ा हुआ। मुकेश ,,,,,,,,,,,,

एक आदिवासी स्त्री का प्रेम

 एक आदिवासी स्त्री का प्रेम उसका प्रेम जंगल की तरह होता है  बिना नक़्शे का, और अपने नियमों से भरा हुआ। वो जब प्यार करती है, तो साल के पेड़ों की तरह अडिग रहती है, और महुए की तरह मीठी-सी ख़ुशबू छोड़ जाती है हवा में। उसकी हँसी झरने की छलकन है, उसकी चुप्पी घने बाँसों का सन्नाटा। वो कंगन नहीं खनकाती, उसकी चूड़ियाँ लकड़ी की होती हैं  मगर दिल की धड़कन ढोल की थाप-सी गूंजती है। वो इज़हार नहीं करती शब्दों में, बस किसी दिन तेरे कंधे पर अपना सिर रख देगी  और वही उसका वचन होगा। उसके प्रेम में ज़मीन की सोंधी गंध है, आग की तपिश, नदी की अडिग रवानी। वो शहर की तरह बदलती नहीं हर मौसम में, उसका प्रेम पर्वत-सा धैर्य रखता है  चुप, मगर अटल। और अगर तुमने उसके विश्वास को तोड़ा, तो याद रखना  जंगल माफ़ कर देता है, भूलता नहीं। मुकेश ,,,,,,,,,,,

ओस में नहीं, आँसुओं से भीगी है ये रात

 ओस में नहीं, आँसुओं से भीगी है ये रात  आसमान की पलकों पर कोई गहरा ख़्वाब टूट गया है। चाँद भी आज कुछ धुँधला-सा है, जैसे उसने भी किसी याद को छुपा कर रखा हो। हवा की सरगोशियों में नमी कुछ ज़्यादा है, ये सिर्फ़ मौसम का असर नहीं  किसी दिल की ख़ामोश सज़ा है। तारों की चमक किसी भीगी दुआ-सी काँप रही है, और सन्नाटा लंबी सिसकी बन कर रात के सीने में अटका है। मैं खिड़की पर टिक कर सोचता हूँ  कितनी आँखें रोई होंगी तब जाकर इतनी नम हुई है ये फिज़ा। ओस तो सुबह तक सूख जाती है, मगर ये जो भीगन है वो रूह तक उतरती है  कहती है कि कुछ रातें मौसम से नहीं, मोहब्बत से भीगती हैं। मुकेश ,,,,,,,,,,

आँसुओं की तह में रखे अल्फ़ाज़

 आँसुओं की तह में रखे अल्फ़ाज़ यूँ ही नहीं मिलते, उन्हें ढूँढना पड़ता है दिल की भीगी दराज़ों में। हर आँसू सिर्फ़ पानी नहीं होता, उसमें कोई अधूरा वाक्य घुला हुआ रहता है, कोई नाम जो होंठों तक आकर लौट गया। मैंने कई बार इन हरफ़ों को सुखाने की कोशिश की, मगर सूखते ही इनकी चमक कम हो जाती है। भीगे रहें तो ज़्यादा सच्चे लगते हैं। काग़ज़ पर उतरते हैं तो हल्की-सी सिलवट छोड़ जाते हैं, जैसे रूह ने अपनी उँगली से निशान बना दिया हो। ये अल्फ़ाज़ किसी महफ़िल के लिए नहीं, किसी तालियों के लिए नहीं  ये तो बस उन लम्हों की अमानत हैं जो रोते हुए गुज़रे। और जब कोई उन्हें पढ़ते-पढ़ते ठहर जाता है, तो समझ जाता है  कि आँसुओं की तह में जो रखा जाता है, वो कभी झूठ नहीं होता। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

महकता हुआ चाँद और बहकते हुए बादल

 महकता हुआ चाँद और बहकते हुए बादल महकता हुआ चाँद आज कुछ ज़्यादा क़रीब लगता है, जैसे उसने तेरी ज़ुल्फ़ों की ख़ुशबू उधार ले ली हो। और ये बहकते हुए बादल  किसी आशिक़ की तरह उसके आस-पास मंडरा रहे हैं, कभी छू लेने की ख़्वाहिश में, कभी ख़ुद ही बिखर जाने की हद तक। रात की पेशानी पर रौशनी का नरम टीका है, हवा में कोई अनकहा पैग़ाम, जो दिल तक आते-आते मधुर सरगोशी बन जाता है। चाँद की चुप मुस्कान में एक मीठी-सी तन्हाई है, और बादलों की आवारगी में बेक़रार मोहब्बत। कभी वो उसे ढँक लेते हैं, कभी फिर रास्ता दे देते हैं  जैसे इश्क़ में रुसवाई और रहमत साथ-साथ चलती हों। मैं खिड़की से टिक कर ये मंज़र देखता हूँ, और सोचता हूँ  अगर चाँद महक सकता है तो मोहब्बत भी आसमान भर फैल सकती है। मुकेश ,,,,,,,,,,,,

लरज़ते लफ़्ज़ों की ओट

 लरज़ते लफ़्ज़ों की ओट में मैंने अपना दिल छुपा लिया है, कि सीधी बात कहने की हिम्मत अब आवाज़ में बाकी नहीं। ये जो हरफ़ काँपते हुए उतरते हैं, इनके पीछे एक तूफ़ान है  मगर काग़ज़ पर आते-आते वो बस नमी बन कर रह जाता है। कभी तेरी याद उँगलियों को थरथरा देती है, कभी कोई अधूरा वाक्य सीने में अटक जाता है। मैं खुल कर रो भी नहीं सकता, खुल कर हँस भी नहीं सकता — इसलिए मैंने इन लरज़ते लफ़्ज़ों की ओट चुन ली है। यहाँ दर्द भी पर्दे में रहता है, और मोहब्बत भी बेआवाज़, बस हल्की-सी कंपन हर पंक्ति के किनारे थिरकती है। जो समझने वाले हैं, वो इस ओट के पार देख लेते हैं  उन्हें मालूम है कि हर काँपता हुआ शब्द किसी गहरी सच्चाई का सबूत होता है। और मैं… अब इसी ओट में महफ़ूज़ हूँ, जहाँ दिल टूटता भी है तो आवाज़ नहीं करता। मुकेश ,,,,,,,,,

मेरी शायरी तेरी यादों की दरगाह है

 मेरी शायरी तेरी यादों की दरगाह है मेरी शायरी तेरी यादों की दरगाह है, जहाँ इश्क़ के चाहने वाले चुपचाप सज्दा करने आते हैं। यहाँ कोई शोर नहीं होता, बस धड़कनों की धीमी अज़ान और लफ़्ज़ों की महकती चादर मज़ार पर बिछी रहती है। हर शेर एक जलता हुआ चिराग़ है, जिसमें तेरी याद का तेल धीरे-धीरे जलता रहता है। जो भी थका-मांदा आशिक़ अपना दिल थामे आता है, उसे यहाँ अपने दर्द का हमसफ़र मिल जाता है। मेरी ग़ज़लों की सीढ़ियों पर आँसुओं के निशान हैं, और हर मतले में तेरे नाम की फुसफुसाहट। ये दरगाह किसी शहर में नहीं, मेरे सीने के अंदर है  जहाँ तेरी याद का परचम आज भी हवा में लहराता है। और मैं… बस एक ख़ादिम हूँ इस मुक़ाम का, जो हर नए ज़ख़्म को तेरे नाम की चादर ओढ़ा देता है। मुकेश ,,,,,,,,,,

दर्द की लिखी हुई पनाहगाह

दर्द की लिखी हुई पनाहगाह में मैंने अपना नाम दर्ज नहीं किया, बस कुछ भीगे हुए हरफ़ छोड़ दिए हैं जो मेरी जगह गवाही देते हैं। ये दीवारें ईंटों की नहीं  आहों की हैं, इनकी छत पर तन्हाई की धुंध जमी रहती है। जब भी कोई ज़ख़्म बहुत ज़्यादा बोलने लगता है, मैं उसे यहाँ ले आता हूँ, स्याही की चादर ओढ़ा देता हूँ, ताकि वो चीख़ शेर बन जाए। अजीब है ये पनाहगाह  यहाँ रोना कमज़ोरी नहीं, इबादत लगता है; यहाँ टूटना बिखरना नहीं, एक नई तामीर की शुरुआत है। हर दाग़ को मैंने अल्फ़ाज़ की शक्ल दी, हर दरार को मतला बना दिया, कि दर्द बदनाम न रहे  दास्तान बन जाए। और अब जो भी मेरे काग़ज़ पलटता है, उसे सिर्फ़ शायरी नहीं मिलती  उसे एक ठिकाना मिलता है, जहाँ उसका अपना दर्द भी चुपचाप बैठ सकता है। मुकेश ,,,,,,,,,,

गुमसुम धड़कनों का सफ़र

 गुमसुम धड़कनों का सफ़र किसी सुनसान राह-सा है  न कोई शोर, न कोई हमसफ़र, बस दिल की धीमी-सी दस्तक जो खुद से ही बातें करती है। हर धड़कन एक ख़ामोश पैग़ाम लेकर चलती है, मगर होंठों तक आते-आते लफ़्ज़ बिखर जाते हैं। तेरा नाम अब भी इन धड़कनों के बीच धीमे-धीमे गुज़रता है, जैसे धुंध में कोई कारवाँ बिना आहट आगे बढ़ जाए। कभी ये सफ़र थका हुआ लगता है, कभी अजीब-सी लज़्ज़त से भरा  जैसे दर्द ही रास्ते का उजाला हो। मैंने कोशिश की थी कि दिल को समझा दूँ, मगर ये गुमसुम धड़कनें अपनी ही ज़िद पर अड़ी रहीं। अब मैं बस साथ चलता हूँ, इनकी ख़ामोशी ओढ़े, कि शायद किसी मोड़ पर ये सफ़र तेरी आहट से फिर आबाद हो जाए। मुकेश ,,,,,,,,,,,,

रूह पर ठहरे हुए मौसम

रूह पर ठहरे हुए मौसम कभी जाते ही नहीं, बस चुपचाप अपनी धुंध फैलाए रहते हैं। किसी को क्या ख़बर कि भीतर कितनी बारिशें हैं, कितनी पतझड़ें अब तक पत्तों-सी झरती रहती हैं। तेरी जुदाई का सर्द झोंका आज भी कहीं जमा है सीने में, और तेरी याद की धूप कभी-कभी हल्की-सी पिघला देती है उस जमी हुई ख़ामोशी को। ये मौसम अजीब हैं  न पूरी तरह बदलते हैं, न पूरी तरह रुकते हैं; बस एक अधूरी शाम की तरह लंबे होते जाते हैं। मैंने सीखा है इन ठहरे हुए लम्हों के साथ जीना, इनकी ठंडक में एक नर्म-सी तपिश ढूँढ लेना। अब रूह का आसमान बादलों से खाली भी हो जाए तो भी उनकी छाया कहीं रह जाती है। शायद इश्क़ का असर ही यही है  मौसम गुज़र जाते हैं, पर उनकी आहट रूह पर हमेशा ठहरी रहती है। मुकेश ,,,,,,,,,

निर्गुण नृत्य — नाम की चदरिया

 निर्गुण नृत्य — नाम की चदरिया दोहा नाम चदरिया ओढ़ि के, नाचउँ दिन अरु रैन। सत रज तम तिन रंग सों, रंगि गयो सब भैन॥ चौपाई सत सुधा सम उजियारो होई। रज चंचल चित गति सब खोई॥ तम अँधियार गहन संसारा। नाम दीप उर बीच उजारा॥ त्वचा रक्त अरु मांस पचारा। मेद अस्थि मज्जा आधाराँ॥ शुक्र बिंदु जीवन के धामा। सात धातु तन तासु ही नामा॥ दोहा पृथिवी जल अनल पवन, गगन विशाल अपार। पंच तत्व मिलि देह यह, कीन्ही रूप विस्तार॥ चौपाई मूलाधार धरनि सम ठाढ़ा। स्वाधिष्ठान रस सिन्धु अगाढ़ा॥ मणिपुर अनल जठर प्रगासा। अनाहत प्रेम सुधा निवासा॥ विशुद्धि बाजे शब्द निराला। आज्ञा दीपक ज्ञान उजाला॥ सहस्रार कमल जब फूला। अमिय बरसि मिटि गयो सब सूला॥ दोहा बहत्तर सहस नाड़ियाँ, देह जाल विस्तार। इड़ा पिंगला सुषुम्ना, नामहि आधार॥ चौपाई वाक् हस्त पद पायु उपस्था। पाँच कर्म रत हरि पर आस्था॥ नयन श्रवन घ्राण रसना। त्वचा जानै लीला सपना॥ शब्द स्पर्श अरु रूप रस गंधा। पाँच तन्मात्रा जग के बंधा॥ मन महत अहंकार समेता। प्रकृति मूल रचे सब खेता॥ दोहा चौबीस तत्त्वन नाचते, लीला अपरम्पार। जब तिनु गुण सब सम भए, रह्यो नाम आधार॥ चौपाई (समापन) छूटि गए देहिक स...

तुम्हारे नाम से

 तुम्हारे नाम से इतनी नज़्में लिख जाऊँगा कि हर सफ़्हा तुम्हारी सदा से महक उठेगा, ज़माना जब मिसाल ढूँढेगा इश्क़ की  तो मेरी तहरीरों का हवाला देगा। मैं हर हरफ़ में तुम्हारी आहट रख दूँगा, हर मिसरे में तुम्हारी रूह की लरज़िश, कि पढ़ने वाला भी अपने दिल की गिरहें टटोलने लगे। तुम्हारा नाम मेरे लिए सिर्फ़ नाम नहीं — एक रौशन धागा है, जिससे मैं ख़्वाब, दर्द, ख़ामोशी सब पिरोता चला जाता हूँ। देखना, जब लफ़्ज़ थक जाएँगे और स्याही सूखने लगेगी, तब भी तुम्हारा ज़िक्र मेरी रगों में रवाँ रहेगा। और लोग कहेंगे  किसी ने मोहब्बत को इतनी शिद्दत से जिया था कि उसका नाम नज़्मों की दुनिया में एक दास्तान बन गया। मुकेश ,,,,,,,,,,,,

महफ़ूज़ ज़ख़्मों की रवानी

  महफ़ूज़ ज़ख़्मों की रवानी कुछ ज़ख़्म ऐसे भी होते हैं जिन्हें हम भरने नहीं देते, उन्हें सीने के तहख़ाने में नर्मी से सजा कर रखते हैं। महफ़ूज़ ज़ख़्मों की ये रवानी अजीब कैफ़ियत रखती है — न वो पूरी तरह दर्द बनते हैं, न पूरी तरह दवा। हर धड़कन के साथ उनकी हल्की-सी लहर उठती है, जैसे किसी पुरानी धुन की मद्धम गूँज। तेरी जुदाई का निशाँ भी कुछ ऐसा ही है — नासूर नहीं, मगर मिटता भी नहीं; बस एक ख़ुशबू-ए-ग़म की तरह रगों में बहता रहता है। मैंने इन्हें छुपा कर रखा है दुनिया की नज़रों से, कि ये ज़ख़्म मेरी पहचान भी हैं और मेरी पनाह भी। अजीब बात है — इनकी रवानी में ही दिल को सुकून मिलता है, जैसे दर्द ने ही मोहब्बत का सबक आहिस्ता-आहिस्ता समझाया हो।

सिसकियों के रेशमी धागे

 सिसकियों के रेशमी धागे सिसकियों के रेशमी धागे मैंने रात की उँगलियों में थमा दिए हैं, कि वो चाँदनी की ओट में मेरे दिल का फटा हुआ किनारा सी दे। हर आह को नर्मी से कात कर धागा बनाया है, हर आँसू को मोती समझ कर पिरोया है मैंने। ये जो लिबास-ए-ख़ामोशी है, बाहर से कितना सादा दिखता है, मगर भीतर सिसकियों की कढ़ाई चलती रहती है। कभी तेरी याद हल्की-सी सिलवट बन जाती है, कभी तेरी जुदाई पूरा सीना उधेड़ देती है। मैंने चाहा था कि दर्द को अलमारी में बंद कर दूँ, मगर वो हर बार रेशमी धागा बनकर निकल आता है, और दिल के दामन से लिपट जाता है। अब हाल ये है कि हर सिसकी में एक लुत्फ़-ए-ग़म है, हर टूटन में तेरी नर्मी की छाप  मैं रोता भी हूँ तो यूँ लगता है जैसे कोई नाज़ुक दस्तकार मेरी रूह पर मोहब्बत की बारीक सिलाई कर रहा हो। मुकेश ,,,,,,,,,,,

उधड़ी हुई रूह का लिबास

 उधड़ी हुई रूह का लिबास उधड़ी हुई रूह का लिबास मैंने बरसों से ओढ़ रखा है, हर दरार में कोई ख़ामोश चीख़, हर सिलवट में कोई बुझी हुई लौ। ये कपड़ा कभी नूर से बुना था, तेरी मोहब्बत की नरम किरनों से; मगर वक़्त की बेरहम उँगलियों ने इसे आहिस्ता-आहिस्ता उधेड़ दिया। अब हाल ये है कि जहाँ सीता हूँ, वहीं से खुल जाता है, हर टाँका एक नई टीस को जन्म देता है, हर गिरह में एक अधूरा ख़्वाब अटका है। कभी तेरी याद रेशमी पैबंद बनकर उतरती है, तो कुछ पल को लगता है कि ये लिबास फिर से मुकम्मल हो जाएगा; मगर अगली ही साँस में कोई पुराना ज़ख़्म मुस्कुरा उठता है। मैं इस उधड़े हुए वजूद को छुपाता भी नहीं अब — कि इसकी बेतरतीबी में ही इश्क़ की सच्चाई चमकती है। अगर कोई पूछे कि क्यों नहीं उतार फेंकता ये फटा हुआ पैरहन, तो क्या कहूँ  ये लिबास भले ही चाक-चाक हो, मगर इसकी हर रग में तेरा नाम सिला हुआ है, और मेरी रूह अब किसी और कपड़े में ढल नहीं सकती। मुकेश ,,,,,,,,,,

तेरे नाम के धागे से

 तेरे नाम के धागे से ही पिरोया है दामन-ए-दिल अपना, वरना ये चीरा-चीरा लिबास कब का बिखर गया होता। हर टाँका तेरी सदा से रोशन है, हर गिरह में तेरी याद की महक, मैंने तो बस उँगलियों को थामा है  सिलाई तो तेरी मोहब्बत ने की है। जब-जब ज़ख़्म उधड़ने लगे, तेरा नाम सुई बनकर उतर आया, और टूटती हुई सांसों के बीच एक नया सहारा दे गया। ये दामन अब भी सलामत है तो सिर्फ़ इस करम से  कि तेरे नाम का धागा अब तक टूटा नहीं। मैं जानता हूँ, एक दिन ये कपड़ा भी थक जाएगा, मगर जब तक तेरे हरफ़ की नर्मी साथ है, दामन-ए-दिल यूं ही पिरोया रहेगा। मुकेश ,,,,,,,,,,,,

दामन-ए-दिल की आख़िरी सिलाई

 दामन-ए-दिल की आख़िरी सिलाई हर सिलाई में थोड़ी-सी रौशनी थी, थोड़ा-सा धुआँ  मैंने ही तो सहेज कर रखा था इस लिबास-ए-दिल को। रफ़ू करते-करते उँगलियाँ लहूलुहान भी हुईं, मगर इश्क़ की नर्मी ने दर्द को भी लज़्ज़त बना दिया। ये आख़िरी सिलाई है शायद  सुई काँप रही है, धागा भी कुछ कमज़ोर-सा है, और साँसों में तेरा नाम धीमे-धीमे घुल रहा है। अगर ये टाँका भी खुल गया तो दामन बिखर जाएगा, मगर अजीब बात है — मुझे इस बिखराव से भी एक मीठी-सी उदासी मिलती है। सोचता हूँ कि छोड़ दूँ सब यूँ ही, हवा के हवाले कर दूँ इस थके हुए कपड़े को  पर फिर तेरी याद की नर्म आह मेरी उँगलियों को थाम लेती है, और मैं दामन-ए-दिल की आख़िरी सिलाई भी मोहब्बत से भर देता हूँ। मुकेश ,,,,,,,

एक ख़ामोश सिसकी

 हर सिलाई में एक ख़ामोश सिसकी पिरोई है मैंने, हर धागे में एक अधूरी दुआ बाँधी है। तब जा के  दिल के दामन को रफ़ू कर-कर के बचाए रक्खा है, वरना ये दामन-ए-इश्क़ कब का हवा की ठोकर से तार-तार हो चुका होता। ये जो उधड़ती हुई सिलवटें हैं  इनमें तेरी याद की गर्द बसी है, हर टाँका किसी बीती शाम का मातमी अफ़साना कहता है। कभी कोई ख़याल सुई बनकर चुभ जाता है, कभी तेरी आहट रेशमी धागे-सी उँगलियों में उलझ जाती है। मैंने चाहा था कि इस लिबास-ए-मोहब्बत को तह कर के रख दूँ किसी वीरान संदूक में, मगर हर बार तेरी ख़ुशबू की रवानी उसे फिर से ओढ़ा देती है। अब ये आलम है  रफ़ू भी जारी है, ज़ख़्म भी बाक़ी हैं; उदासी की लज़्ज़त से भीगा हुआ ये दिल अब भी तेरा नाम धीमे से दोहराता है। और मैं… हर सिलाई में एक नई सिसकी पिरोता हूँ, कि दामन-ए-इश्क़ आख़िरी साँस तक महफ़ूज़ रहे। मुकेश ,,,,,,,

तेरी मौजूदगी ही काफ़ी है

 “तेरी मौजूदगी ही काफ़ी है” तेरी मौजूदगी ही काफ़ी है, कि दिल को किसी सबूत की ज़रूरत नहीं रहती। तू पास हो तो ख़ामोशी भी बोलने लगती है। ना लफ़्ज़ चाहिए, ना वादे, बस तेरी साँसों की आहट, जो मेरे वजूद में उतरती रहे। तेरी आँखों का सुकून मेरी बेचैन रूह का मरहम है। तू बैठा रहे सामने यूँ ही, तो वक़्त भी सजदे में चला जाए। तेरी मौजूदगी ही काफ़ी है, कि हर कमी मुकम्मल लगे, हर तन्हाई आबाद हो जाए, और मैं  ख़ुद को तेरे नूर में पाता रहूँ। मुकेश ,,,,,,,

जैसे कोई ख़ामोश मिसरा

 जैसे कोई ख़ामोश मिसरा" जैसे कोई ख़ामोश मिसरा, जो लफ़्ज़ बनने से पहले ही इश्क़ में पिघल गया, साँसों की रूह में उतरकर, एक नज़्म की तरह धड़कता रह गया। वक़्त ठहरा उसकी पलकों पर, और ख़्वाबों ने उस ठहराव को चूमा, रात की तहों में उसने कुछ कहा नहीं, बस ख़ामोशी से मेरा नाम लिया। मैंने उस ख़ामोशी को सुना  वो आहट थी या इबादत, कोई नहीं जानता, पर दिल ने सज्दा कर दिया। उसकी नज़र — एक आयत थी, जो हर्फ़ नहीं, असर बनकर उतरी, हर बार जब वो मुस्कुराई, लफ़्ज़ों की दुनियाँ में नूर उतर आया। जैसे कोई ख़ामोश मिसरा, जो ख़ुद में पूरा एक क़ुरान हो, हर हरफ़ में एक क़ायनात, हर ठहराव में एक सदी की रूह हो। मैं उसके होंठों की ख़ुशबू से आयतें लिखता हूँ, उसके बालों की गिरती लट में दुआ ढूँढता हूँ, उसकी मुस्कान में खुदा का नूर छुपा है, और उसकी चुप्पी में मेरा जवाब। कभी वो कहती नहीं, फिर भी हर बार सुनाई देती है  उसकी साँसों में राग, उसकी ख़ामोशी में साज़। वो चलती है जैसे वक़्त बहता हो, हर कदम में एक नयी तहकीक़, हर करवट में एक नई सृष्टि जन्म लेती है, और मैं बस दर्शक बना, ख़ुद को खो देता हूँ। जैसे कोई ख़ामोश मि...

नदी की आत्मकथा

 नदी की आत्मकथा (मुक्त छंद में) मैं — एक नदी हूँ। पहाड़ की गोद से जन्मी, बर्फ़ की कोख से निकली, पहली बार जब बहना शुरू किया, तो लगा जैसे मैं कोई गीत हूँ — जिसे स्वयं पृथ्वी गुनगुना रही हो। मैं पत्थरों से टकराई, कभी फूटी, कभी टूटी, पर हर टकराव ने मेरे संगीत को और गहरा किया। मैंने सीखा — रुकना मृत्यु है, बहना ही जीवन। पहाड़ों से उतरते हुए मैंने देखा — कैसे मनुष्य अपने छोटे-छोटे बाँधों से मुझे रोकने की कोशिश करता है, जैसे वह समय को बाँध सकता हो। पर मैं जानती हूँ — रोक ली गई नदी या तो सूख जाती है, या फट पड़ती है। मैं खेतों को सींचती हूँ, लोगों को जीवन देती हूँ, पर जब वे मेरे जल में ज़हर घोलते हैं, तो मेरी आँखें जल उठती हैं। मैं फिर भी बहती रहती हूँ — क्योंकि मेरा धर्म देना है, लेना नहीं। कभी मैं पवित्र गंगा कहलाती हूँ, कभी नर्मदा, कभी ब्रह्मपुत्र, कभी केवल एक नाली। नाम बदलते हैं, पर प्रवाह वही रहता है। मैं वही हूँ — जो बादलों में भाप बन जाती है, और फिर बूंद बनकर लौट आती है। मैंने सभ्यताएँ जन्मते देखी हैं — घाटों पर हवन, नावों में प्रेम, किनारों पर वचन। और देखा है, कैसे लोग मरने से पहले ...

पत्थर की आत्मकथा

 पत्थर की आत्मकथा मैं — एक पत्थर हूँ। हाँ, वही जिसे तुम अक्सर ठोकर मार देते हो, कभी मंदिर की दीवार में जड़ देते हो, और कभी किसी नदी के किनारे लात मार कर आगे बढ़ जाते हो। पर मेरे भीतर भी एक कहानी है — समय से भी पुरानी, धरती की नाड़ियों में बहते अग्नि और जल की साक्षी। मेरा जन्म तब हुआ जब पृथ्वी ने पहली बार साँस ली थी। लावा के गर्भ से मैं फूटा, धीरे-धीरे ठंडा पड़ा, और धरती की गोद में जम गया — एक गवाही बनकर, उस पहले कंपन की, जब ब्रह्मांड ने “ओंकार” का उच्चारण किया था। युगों तक मैं पर्वत के रूप में खड़ा रहा। मेरी चोटियों पर ऋषियों ने ध्यान लगाया, मेरी दरारों में नदियाँ फूटीं, मेरी चट्टानों पर सभ्यताएँ बसीं। मैंने मनुष्य को पत्थर से औज़ार बनाते देखा, फिर मूर्तियाँ गढ़ते हुए, मुझमें देवत्व खोजते हुए देखा। कभी मैं शिवलिंग बना, कभी बुद्ध की मूर्ति, कभी मसीह की समाधि — और कभी युद्ध में फेंका गया एक पत्थर मात्र। लोगों ने मुझे पूजा भी, और मुझसे नफ़रत भी की। मैं मौन हूँ, पर देखता सब कुछ हूँ। राज्य उठे, राज्य मिटे — पर मैं वही रहा। वक़्त के थपेड़े मेरे चेहरे पर झुर्रियाँ छोड़ गए, पर मैं अब भी खड...

रात नदी देर तक मुझसे बतियाती रही

 रात नदी देर तक मुझसे बतियाती रही रात नदी देर तक मुझसे बतियाती रही उसकी आवाज़ में गीली रेत की नरमी थी, और बहते पानी की आहिस्ता-सी रवानी। मैं किनारे बैठा था, अपने ही ख़यालों की गठरी खोले, और वो हर लहर के साथ मेरा नाम दोहराती रही। कहती थी— “तुम भी मेरी तरह हो, ऊपर से ख़ामोश, भीतर से मुसलसल सफ़र में।” मैंने पूछा— “तेरी थकान कहाँ जाती है?” वो हँसी— जैसे चाँदनी पानी पर टूट कर बिखर जाए— “मैं थमती नहीं, बस बहने को ही अपना सुकून मानती हूँ।” रात गहराती गई, सितारे उसकी सतह पर छोटे-छोटे दीयों-से काँपते रहे। उसने अपनी ठंडी लहर मेरे पाँवों को छूकर कहा— “जो बात किसी से न कह सको, मुझमें बहा दो। मैं राज़ रखने में समंदर से कम नहीं।” मैं देर तक सुनता रहा, और मेरे भीतर जमी कई बरसों की चुप्पियाँ धीरे-धीरे पिघलती रहीं। जब भोर की पहली लकीर आसमान पर खिंची, नदी ने आख़िरी बार फुसफुसाया “रातें सिर्फ़ अँधेरा नहीं लातीं, कभी-कभी खुद से मुलाक़ात भी कराती हैं।” और मैं अपने ही बहाव में थोड़ा-सा हल्का होकर वापस लौट आया। मुकेश ,,,,,,,,,,,

परदे की सिलवटों में रात

  परदे की सिलवटों में रात परदे की सिलवटों में रात धीरे-धीरे उतर आई है, जैसे कोई बात अभी कही न गई हो। चाँदनी कपड़े की लकीरों में रुक-रुक कर चलती है, और कमरा अपनी साँसें हल्की कर लेता है। बाहर शहर जाग रहा होगा, मगर यहाँ हर आवाज़ मौन में घुल गई है। परदे हिलते हैं, तो लगता है रात कुछ कहना चाहती है फिर ख़ामोश हो जाती है। मैं उसी ख़ामोशी में थोड़ी देर ठहर जाता हूँ, जैसे परदे की सिलवटों में सिर्फ़ रात नहीं, मेरा भी कोई अधूरा ख़याल छुपा हो। मुकेश ,,,,

मैं और इलाहाबाद / प्रयागराज

 मैं और इलाहाबाद / प्रयागराज मुझमें और इलाहाबाद में कई समानताएँ हैं, कई विषमताएँ मगर अब उसे पुकारता हूँ तो ज़ुबान पर “प्रयागराज” उतर आता है, जैसे इतिहास ने अपना असली नाम फिर से पहन लिया हो। वो पहले भी संगम था, आज भी संगम है— बस समय की धारा अपना वेश बदलती रही। मैं सोचता हूँ— इस शहर की रगों में सनातन का ज्ञान वैसा ही बहता है जैसे भोर की आरती में उठता धुआँ। घंटियों की टंकार में वेदों की परछाइयाँ हैं, घाटों की सीढ़ियों पर ऋषियों के पदचिह्न अब भी गर्म हैं। प्रयागराज कहना सिर्फ़ नाम बदलना नहीं, जैसे स्मृति का द्वार खुलना हो— जहाँ हर कण में एक आदिम श्लोक गूँजता है। मेरे भीतर भी कुछ वैसा ही सनातन अंश है— जो तर्क से परे, समय से परे चुपचाप ज्योति-सा जलता रहता है। मगर कहानी यहीं पूरी नहीं होती। इस मिट्टी ने मध्यकाल की नवाबी आहट भी सुनी है। अवध की नफ़ासत, लहजे की मिठास, अदब की तहज़ीब— वो सब हवा में घुला है। किसी पुरानी हवेली की खिड़की से अब भी उर्दू का कोई मिसरा धीरे से झाँक लेता है। मैं जब बोलता हूँ, तो मेरे शब्दों में कभी संस्कृत की गंभीरता होती है, कभी नवाबी लचक— जैसे यह शहर मेरी ज़ुबान में...

जिससे बिछड़ना था

 जिससे बिछड़ना था जिससे बिछड़ना था मैं उसी के शहर में था। वही सड़कें, वही शामें, वही हवा— सब कुछ जाना-पहचाना, बस हम अजनबी थे। मैं उसके शहर में उसकी तरह चलता रहा, कॉफ़ी उसी तरह पी, शामें उसी तरह काटीं मगर उसके बिना। सबसे अजीब बात ये थी कि दूरी कहीं नहीं थी, फिर भी मुलाक़ात नामुमकिन थी। कुछ बिछड़न यात्रा नहीं माँगती, बस एक फ़ैसला काफ़ी होता है। और मैं उसी शहर में रहकर सीख रहा था कि सबसे गहरा बिछड़ना क़रीब रहकर होता है। मुकेश ,,,,,,,,,

दीवार पर फिसलती चाँदनी

 दीवार पर फिसलती चाँदनी दीवार पर फिसलती चाँदनी आज कुछ कहती हुई-सी आई, जैसे ख़ामोश लबों पर रुकी हुई कोई दुआ उतर आई। मैंने हथेली बढ़ाकर उसकी ठंडी रौशनी छू ली वो रेशम-सी लरज़ी, फिर आहिस्ता मेरे कमरे में फैल गई। इस उजाले में कोई साया भी नरम पड़ जाता है, कोई दर्द भी अपना लहजा बदल लेता है। चाँदनी दीवार से सरकती हुई मेरे दिल तक आ पहुँची, और वहाँ एक पुराना ख़त खोल कर बैठ गई। मैं देर तक उसे पढ़ता रहा हर हरफ़ में तेरी आहट की महक थी, हर सतर में एक नर्म-सी तस्लीम। जब रात और गहरी हुई, चाँदनी ने धीरे से कहा “मैं ठहरती नहीं, बस याद दिलाने आती हूँ कि उजाला हमेशा किसी न किसी कोने में ज़िंदा रहता है।” और फिर दीवार पर फिसलती हुई वो वापस आसमान की ओर लौट गई। मुकेश ,,,,,,,

खिड़की पे टंगा चाँद

 खिड़की पे टंगा चाँद (नज़्मों की एक श्रृंखला — एक कवि की नज़र से) १. उदासी का चेहरा खिड़की पे टंगा चाँद आज कुछ बुझा-बुझा-सा है, जैसे किसी औरत की आँखों में रात भर का नमक उतर आया हो। मैं उसे देखता हूँ और सोचता हूँ किस उदासी ने उसकी पेशानी पर यह फीकी रौशनी रख दी? क्या वह भी किसी खामोश कमरे में बैठी अपने हिस्से का आसमान तह कर रही है? चाँद ठहरा है, मगर उसकी ठहरन में एक गहरी थकान है ठीक वैसी जैसी एक स्त्री अपनी मुस्कान के पीछे छुपा लेती है। मैं लिखता हूँ उदासी दरअसल रोती नहीं, बस चाँद की तरह खिड़की पर टंग जाती है। २. इंतज़ार की रौशनी आज वही चाँद कुछ ज़्यादा उजला है। मैंने गौर से देखा उसकी किरनों में एक बेचैन लय है, मानो वह भी किसी के आने की आहट पर साँस रोके खड़ा हो। मैं सोचता हूँ इंतज़ार शायद रौशनी का सबसे नाज़ुक रूप है। वह औरत जो दरवाज़े की कुंडी पर उँगलियाँ फिराती रहती है, क्या उसके दिल में भी ऐसी ही चमक काँपती होगी? चाँद की चुप्पी में मैंने एक दुआ सुनी धीमी, मगर अटल। मैंने लिखा इंतज़ार इश्क़ की सज़ा नहीं, उसकी सबसे पाक तसदीक़ है। ३. यूँ ही वक़्त कटी आज चाँद कुछ शरारती मालूम हुआ। खिड़क...

सुबह का पहला, नींद से पहले का आख़िरी ख़याल सुबह

 सुबह का पहला, नींद से पहले का आख़िरी ख़याल सुबह जब आँख खुलती है, तो कोई नाम बिना पुकारे मन में उतर आता है और रात जब थककर नींद की तरफ़ झुकती है, तो वही नाम आहिस्ता से ठहर जाता है। दिन इन दोनों के बीच जैसे एक औपचारिकता है न पूरी तरह मेरा, न बिल्कुल तुम्हारा। मैं जानता हूँ तुम मेरी आदत नहीं, मेरी ज़रूरत भी नहीं— फिर भी मेरे वजूद की सबसे सच्ची सच्चाई हो। सुबह का पहला और नींद से पहले का आख़िरी ख़याल इतना काफ़ी है एक उम्र के लिए मोहब्बत कहलाने को मुकेश्,,

तुम्हारी आँखों के इंद्रधनु

 मैं तुम्हारी आँखों के इंद्रधनुष में नहीं हूँ, ये बात मैं जानता हूँ। फिर भी हर बारिश के बाद मैं तुम्हारी आँखों में झाँक लेता हूँ— शायद इस उम्मीद में कि किसी रंग की ओट में मेरा नाम थोड़ी देर ठहर गया हो। मुकेश,,, 

नींद और ख़याल के दरमियान

 नींद और ख़याल के दरमियान एक लम्हा ठहर जाता है, जहाँ आँखें बंद होती हैं मगर दिल जागता रहता है। वहीं तुम बिना आवाज़ मेरे पास आ बैठते हो— न सपना बनकर, न हक़ीक़त होकर। बस एक एहसास की तरह, जो कहता कुछ नहीं, और फिर भी सब कुछ कह जाता है। नींद मुझे खींचती है अपनी तरफ़, ख़याल तुम्हारी तरफ़ और मैं दोनों के बीच थोड़ी देर ज़िन्दा रहता हूँ। मुकेश,, 

आधी रात की हवा और तुम्हारा ख़याल

 आधी रात की हवा और तुम्हारा ख़याल आधी रात की हवा जब चलती है, तो तुम्हारा ख़याल बिना इजाज़त दिल में उतर आता है। न आवाज़ देता है, न सवाल करता है— बस थोड़ी देर सुकून बनकर ठहर जाता है। मुकेश,, 

चाँदनी, ख़ामोशी और तुम चाँदनी

 चाँदनी, ख़ामोशी और तुम चाँदनी आहिस्ता-आहिस्ता मेरे कमरे में उतर आई है, और तुम्हारी ख़ामोशी उससे भी ज़्यादा रौशन है। तुम कुछ कहते नहीं, फिर भी दिल सब समझ लेता है। इस रात में न सवाल हैं, न जवाब बस चाँदनी है, ख़ामोशी है, और तुम। इतना काफ़ी है। मुकेश,,, 

गेंदा का एक छोटा-सा सूरज

गेंदा का एक छोटा-सा सूरज आँगन की धूल में गेंदा चुपचाप खिलता है  न किसी शान से, न किसी अभिमान से। उसकी गोल पंखुड़ियाँ जैसे एक छोटा-सा सूरज हों, जो अपनी सीमित रोशनी में भी पूरा दिन भर देता है। मंदिर की सीढ़ियों पर, त्योहार की थाली में, या किसी सूने दरवाज़े के पास  वह हर जगह थोड़ी-सी चमक रख आता है। गेंदा बताता है  रोशनी बड़ी नहीं होती, बस सच्ची होती है। आम ज़िंदगी की थकी दोपहर में वह मुस्कुरा कर कहता है, “छोटा होना भी पर्याप्त है, यदि तुम किसी के दिन में थोड़ी-सी धूप जोड़ सको।” मुकेश ,,,,,,,,,,,,

तुलसी के पत्तों में प्रार्थना

 तुलसी के पत्तों में प्रार्थना आँगन के एक कोने में तुलसी चुपचाप खड़ी है  जैसे घर की धड़कन मिट्टी में रोपी गई हो। उसके पत्तों पर सुबह की ओस ठहरती है, मानो रात भर की चिंताएँ धीरे से धुल गई हों। हर संध्या दीये की लौ जब उसे छूती है, हवा में घुल जाती है एक धीमी-सी प्रार्थना  जिसमें शब्द कम, विश्वास अधिक होता है। तुलसी के पत्तों में घर का सुकून बसता है, माँ की आवाज़, पिता की चुप चिंता, और बच्चों की अधूरी हँसी। वह कहती नहीं कुछ भी  बस महकती है, जैसे आस्था अब भी जीवित है इस थके हुए समय में। मुकेश ,,,,,,

पलाश का जलता जंगल

 पलाश का जलता जंगल दूर तक फैला है पलाश का जलता जंगल — जैसे धरती ने अपनी छाती पर आग सजा ली हो। ये लपटें विनाश की नहीं, संघर्ष की हैं  हर लाल फूल एक अनकही जिद है जीवित रहने की। धूप जब उन पर गिरती है, तो रंग और गहरा हो जाता है, मानो प्रेम ने दर्द को भी स्वीकार लिया हो। इस अग्नि में कोई राख नहीं, सिर्फ़ अस्तित्व की चमक है  जो कहती है, “मैं जलता हूँ, इसलिए हूँ।” पलाश का यह जंगल डराता नहीं, सिखाता है  कि जीवन कभी-कभी फूल बनकर भी आग ही होता है। मुकेश ,,,,,,,,,,

नीम के साये में समय

 नीम के साये में समय धीरे-धीरे बैठ जाता है  किसी बूढ़े साधु की तरह, जिसे जल्दी कहीं पहुँचना नहीं। उसकी कड़वी गंध में जीवन का सच घुला है, मीठे भ्रमों से दूर एक सादा-सा स्वीकार। पत्तों की हल्की सरसराहट में बरसों की कथाएँ हैं  धूप, आँधी, और प्रतीक्षा की। मैं उस छाँव में ठहरता हूँ, तो लगता है घड़ी की सुइयाँ थक गई हैं, और समय ने अपना बोझ उतार दिया है। नीम के साये में वक़्त सिखाता है  कड़वाहट भी औषधि है, यदि उसे धैर्य से जिया जाए। मुकेश ,,,,,,,,,,,

जैस्मिन की साँस में तुम्हारा नाम

 जैस्मिन की साँस में तुम्हारा नाम रात की नर्म देहरी पर जैस्मिन चुपचाप खिलती है, सफेद पंखुड़ियों में एक अनकहा उजाला लिए। उसकी हर साँस में कोई धीमा कंपन है  जैसे हवा ने तुम्हारा नाम सीख लिया हो। मैं पास से गुज़रता हूँ, तो महक अचानक गहरी हो जाती है, मानो स्मृति ने फिर से दरवाज़ा खोला हो। न तुम हो, न तुम्हारी आहट  फिर भी यह सुगंध मेरे चारों ओर तुम्हारा एक अदृश्य घेरा खींच देती है। जैस्मिन की साँस में तुम्हारा नाम यूँ घुला है, जैसे प्रेम कभी जाता नहीं  बस खुशबू बनकर रात भर साथ रहता है। मुकेश ,,,,,,

गंध, जो प्रेम से नहीं, संकोच से उपजी थी

  “गंध, जो प्रेम से नहीं, संकोच से उपजी थी” गंध थी वहाँ, पर वो चंपा की तरह न थी — वो गंध भय की थी, भीतर पिघलते निर्णय की, जिसे कभी किसी ने चूमा नहीं था। वो स्पर्श नहीं था, वो एक छाया थी जो शरीर की देहरेखाओं से कभी टकराई, कभी लौट गई। वो गंध प्रेम की नहीं, संकोच की एक भाप थी — जो कपड़ों में क़ैद रही, आत्मा से नहीं निकली। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

और वो लड़की...

 और वो लड़की... और वो लड़की जो अपनी हँसी में अक्सर कुछ छुपा लेती थी, कभी पलकों की कोरों पर टंगी रहती थी किसी अधूरे ख्वाब की तरह, तो कभी किसी पुराने मौसम की धीमी परछाईं बन जाती थी। वो अक्सर चाय को देर तक ठंडा होने देती थी  शायद किसी की याद को ज़रा और देर तक अपने पास रखने के लिए। वो लड़की अब आईने से कम बात करती है, कभी अपने बालों को बाँधते हुए खुद को समझाने लगती है कि अब रोना वक़्त की बर्बादी है। उसकी डायरी के पन्नों में अब भी वो नाम लिखा नहीं गया, मगर हर पन्ना उसके होने की गवाही देता है  हर वाक्य, हर विराम, हर ख़ामोशी। कभी जब बारिश होती है, तो वो खिड़की के पास नहीं जाती, बस खुद को याद दिलाती है कि अब भीगने से कुछ नहीं बदलता। वो लड़की अब किसी की मोहब्बत नहीं चाहती, वो अब खुद को सँवारने लगी है जैसे कोई मंदिर की मूर्ति अपने ही भीतर से पूजा जाने लगी हो। और मैं... अब भी वही हूँ  जो उसकी चुप्पियों को पढ़ने की कोशिश करता है, जो हर नज़्म में उसे छुपाकर लिखता है, जैसे कोई राज किसी मज़ार की माटी में दफ्न हो और फिर भी हर ज़िंदा दिल में धड़कता हो। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

लड़कियाँ मोहब्बत यूँ भी करती हैं…

 लड़कियाँ मोहब्बत यूँ भी करती हैं… लड़कियाँ मोहब्बत करती हैं जैसे कोई दीया धीमी हवा में जलता हो — न टिक कर, न बुझ कर, बस रोशनी दे कर। वे तुम्हारे नाम को कभी ज़ोर से नहीं बोलतीं, मगर जब भी कोई पूछता है "ख्वाहिश क्या है?" तो सबसे पहले तुम्हारा चेहरा ज़हन में आता है। वे तुम्हारी पसंद की चाय बनाना सीख लेती हैं, भले ही खुद को कॉफ़ी की आदत हो, और कप पर तुम्हारा होंठों का निशान उन्हें तावीज़ जैसा लगता है। लड़कियाँ मोहब्बत में खुद से कम सवाल करती हैं, और तुम्हारे हर जवाब को तसल्ली बना लेती हैं। तुम्हारे एक "ठीक हूँ" में वो पूरी रात जाग जाती हैं, सोचती हैं  "क्या सच में ठीक है, या फिर कह नहीं पाया?" वो तुम्हारे घर का रास्ता नहीं पूछतीं, मगर हर मोड़ याद रखती हैं जहाँ से तुमने कभी उन्हें बताया था "यहाँ से सीधा जाता हूँ मैं रोज़।" लड़कियाँ मोहब्बत में कभी अपनी तस्वीर नहीं भेजतीं, मगर तुम्हारी भेजी एक मुस्कुराहट सालों तक अपने फोन की गैलरी में संभालती हैं। उनके पास "आई लव यू" कहने के हज़ार मौके होते हैं, मगर वे अक्सर कहती हैं — "खाना खाया?"...