गुमसुम धड़कनों का सफ़र

 गुमसुम धड़कनों का सफ़र

किसी सुनसान राह-सा है 

न कोई शोर,

न कोई हमसफ़र,

बस दिल की धीमी-सी दस्तक

जो खुद से ही बातें करती है।


हर धड़कन

एक ख़ामोश पैग़ाम लेकर चलती है,

मगर होंठों तक आते-आते

लफ़्ज़ बिखर जाते हैं।


तेरा नाम

अब भी इन धड़कनों के बीच

धीमे-धीमे गुज़रता है,

जैसे धुंध में कोई कारवाँ

बिना आहट आगे बढ़ जाए।


कभी ये सफ़र

थका हुआ लगता है,

कभी अजीब-सी लज़्ज़त से भरा 

जैसे दर्द ही

रास्ते का उजाला हो।


मैंने कोशिश की थी

कि दिल को समझा दूँ,

मगर ये गुमसुम धड़कनें

अपनी ही ज़िद पर अड़ी रहीं।


अब मैं बस साथ चलता हूँ,

इनकी ख़ामोशी ओढ़े,

कि शायद किसी मोड़ पर

ये सफ़र

तेरी आहट से

फिर आबाद हो जाए।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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