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Showing posts from April, 2026

मृत्यु की प्रतीक्षा में ‘मैं’ का विघटन: Malone Dies का दार्शनिक अध्ययन

  मृत्यु की प्रतीक्षा में ‘मैं’ का विघटन: Malone Dies का दार्शनिक अध्ययन सैमुअल बेकट 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली आधुनिकतावादी (modernist) और उत्तर-आधुनिक (postmodern) लेखकों में गिने जाते हैं। उनका जन्म 1906 में आयरलैंड में हुआ और उन्होंने मुख्यतः अंग्रेज़ी तथा फ़्रेंच दोनों भाषाओं में लेखन किया। वे अपने नाटक Waiting for Godot के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हुए, जिसमें “प्रतीक्षा” को जीवन का रूपक बना दिया गया। 1969 में उन्हें Nobel Prize in Literature मिला। उनकी रचनाओं की विशेषता है— न्यूनतम भाषा (minimalism) अस्तित्व की निरर्थकता मौन, शून्यता और विखंडन Malone Dies : संक्षिप्त सार यह उपन्यास एक बूढ़े व्यक्ति मैलोन के अंतिम समय का आंतरिक वृत्तांत है। वह बिस्तर पर पड़ा है और मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है। बाहरी दुनिया लगभग समाप्त हो चुकी है—अब केवल उसकी चेतना बची है। समय बिताने के लिए वह कहानियाँ गढ़ता है— कुछ पात्रों (जैसे सैपो या मैक्मैन) के माध्यम से, पर ये कहानियाँ कभी पूर्ण नहीं होतीं। धीरे-धीरे: उसकी स्मृति टूटती है भाषा बिखरती है “मैं” (self) अस्थिर हो जाता है अंत में, उपन्यास क...

नीरस स्त्री — कुछ और छोटी आदतें”

 नीरस स्त्री — कुछ और छोटी आदतें” वो चाय धीरे-धीरे पीती है, जैसे हर घूँट में किसी अनकहे दिन को घोल रही हो। वो मोबाइल पर कम बोलती है, “हूँ”, “ठीक है”, “देखते हैं”— इन्हीं तीन शब्दों में पूरा संवाद समेट लेती है। तुम घंटों लिखते हो उसे, वो जवाब में बस एक पंक्ति भेजती है— और वही सबसे ज़्यादा देर तक टिकती है। वो भीड़ में कभी आगे नहीं चलती, हमेशा आधा कदम पीछे— जैसे दुनिया को थोड़ी दूरी से समझना चाहती हो। वो तस्वीरें कम खिंचवाती है, और जब खिंचवाती है, तो मुस्कान भी पूरी नहीं देती— जैसे कुछ अपने लिए बचा लेती हो। वो अचानक से बात बंद कर देती है, बिना कारण बताए— और तुम कारण ढूँढते रहते हो, अपने भीतर। वो “मिस यू” नहीं कहती, पर अगली मुलाक़ात में तुम्हारी पसंद की किताब चुपचाप साथ ले आती है। वो तारीफ़ से बचती है, और आलोचना पर कुछ नहीं कहती— बस थोड़ा और शांत हो जाती है। वो रात को जल्दी सो जाती है, और तुम्हारे देर तक जागने पर कोई सवाल नहीं करती— जैसे हर किसी को अपने अँधेरे का अधिकार हो। वो “हम” कम बोलती है, “मैं” भी नहीं— बस वाक्य अधूरे छोड़ देती है, ताकि तुम खुद भर सको उन्हें। और तुम सोचते हो— नीर...

प्रेम : नीरस स्त्री बनाम चंचल स्त्री

 प्रेम : नीरस स्त्री बनाम चंचल स्त्री अगर आपको प्रेम में झरने सा उछलना और बह जाना पसंद है तो नीरस स्त्री से प्रेम न करें। अगर आपको लंबे आलिंगन और ठहरते हुए चुंबन चाहिए— तो नीरस स्त्री से प्रेम न करें। अगर आपको हर दिन “मिस यू” और “लव यू” सुनना जरूरी लगता है— तो नीरस स्त्री से प्रेम न करें। अगर आपको भावनाओं का खुला प्रदर्शन, भीड़ में हाथ थाम लेना अच्छा लगता है— तो नीरस स्त्री से प्रेम न करें। अगर आपको तुरंत जवाब, तुरंत प्रतिक्रिया चाहिए— तो नीरस स्त्री से प्रेम न करें। अगर आपको प्रेम में उत्सव, शोर और आवेग चाहिए— तो नीरस स्त्री से प्रेम न करें। क्योंकि नीरस स्त्री— प्रेम को बहाती नहीं, संभाल कर रखती है… और वहाँ उत्साह कम, गहराई ज़्यादा होती है। मुकेश ,,,,,,,,,,,,

उपहार और उसका संतुलन

 “उपहार और उसका संतुलन” नीरस स्त्रियाँ उपहार नहीं माँगतीं— जैसे चाहना उनके स्वभाव का हिस्सा ही न हो, या शायद वो चाह को भी अनुशासन में रखती हों। तुम देते हो कुछ— एक किताब, एक दुपट्टा, या बस अपनी पसंद का कोई छोटा-सा संकेत— वो ले लेती है, बेहद शालीनता से, जैसे स्वीकार करना उसकी संस्कृति का हिस्सा हो, पर उसमें कोई उत्सव नहीं होता। न कोई चमकती आँखें, न अतिरिक्त मुस्कान— बस एक साधारण-सा “धन्यवाद”, जो तुम्हारी अपेक्षाओं से काफी छोटा पड़ जाता है। तुम ठिठक जाते हो— क्या उसे सच में अच्छा लगा? या वो सिर्फ़ विनम्र हो रही है? पर उसके भीतर एक अलग ही गणित चलता है— जहाँ उपहार भाव का प्रमाण नहीं, एक संभावित बोझ भी हो सकता है। इसलिए वो और सतर्क हो जाती है, जैसे हर चीज़ किसी अदृश्य संतुलन को बिगाड़ सकती हो। उस दिन भी वो वही रहती है— न ज़्यादा पास, न ज़्यादा खुली, न ज़्यादा अभिव्यक्त— बल्कि थोड़ी और संयत, थोड़ी और अपने भीतर सिमटी हुई। जैसे उसने तुम्हारे दिए हुए वस्तु को नहीं, तुम्हारी भावना को धीरे से तह करके रख दिया हो, कहीं भीतर— जहाँ वो बिना प्रदर्शन के सुरक्षित रहे। नीरस स्त्रियाँ उपहारों से नहीं ...

दायरे के भीतर प्रेम

 “दायरे के भीतर प्रेम” नीरस स्त्री से प्रेम हो जाए तो तुम्हें सबसे पहले अपने ही आग्रहों की आवाज़ कम करनी पड़ती है। क्योंकि उसके भीतर रोमांस कोई उत्सव नहीं— एक नियंत्रित ऊर्जा है, जिसे वह बहुत सावधानी से खर्च करती है। वो तुम्हें पास आने देती है, पर उतना ही जितना उसके भीतर की व्यवस्था बिखरे नहीं। उसके लिए स्पर्श सिर्फ़ स्पर्श नहीं— एक मनोवैज्ञानिक प्रवेश है, जहाँ हर इंच के साथ उसका विश्वास भी दाँव पर होता है। इसलिए वो हर क्षण को नापती है— तुम्हारी नज़र, तुम्हारी आवाज़, तुम्हारे शब्दों की तह तक जाती है, जैसे प्रेम नहीं, कोई परीक्षण चल रहा हो। तुम्हें लगेगा— वो कंजूस है भावों में, पर सच यह है— वो अपव्यय से डरती है। वो जानती है कि एक बार बहा दिया गया भाव वापस नहीं आता, और जो लौटता है— वो अक्सर पछतावा होता है। कभी-कभी वो मान भी जाती है— तुम्हारे करीब, तुम्हारे इतने पास कि तुम्हारी साँसें उसकी त्वचा को छूने लगें— पर ठीक उसी क्षण वो एक अदृश्य रेखा खींच देती है, और तुम अपने ही अधूरेपन में रुक जाते हो। जैसे होंठों तक आया प्याला अचानक ठहर जाए— और प्यास तुम्हारी समझ में बदलने लगे। वो तुम्हें र...

नीरस स्त्री से प्रेम

 नीरस स्त्री से प्रेम  एक नीरस स्त्री से प्रेम करना सचमुच बेहद कठिन होता है क्योंकि वह तुम्हारे शब्दों से नहीं, तुम्हारी चुप्पियों से बात करती है। वह हँसती भी है तो जैसे कोई ऋतु बिना शोर बदले, धीरे से— तुम्हें बताए बिना। तुम पूछते हो— “क्या तुम मुझसे प्रेम करती हो?” और वह मुस्कान में उत्तर टाल देती है, जैसे प्रेम कोई घोषणा नहीं, एक निजी साधना हो। उसके पास न शिकायतों की सूची है, न इच्छाओं का बाज़ार— वह तुम्हें तुम्हारे ही भीतर छोड़ देती है, जहाँ तुम अपने प्रश्नों से जूझते हो। वह दूरी बनाकर बैठती है, जैसे प्रेम में भी मर्यादा का एक व्रत हो, और तुम उस दूरी को अपनी अस्वीकृति समझ बैठते हो। पर सच तो यह है वह तुम्हें तुमसे बचा रही होती है। उसकी नाराज़गी भी कोई तूफ़ान नहीं, बस एक लंबा मौन है— जिसमें तुम्हारे शब्द खुद से टकराकर वापस लौट आते हैं। एक नीरस स्त्री से प्रेम करना दरअसल खुद से प्रेम करना सीखना है बिना शोर, बिना प्रमाण, बिना किसी उत्तर की उम्मीद के। और शायद यही सबसे कठिन है कि जहाँ प्रेम प्रदर्शन नहीं, धैर्य बन जाता है। मुकेश ,,,,,,,,,,,,

उदासी — एक विलंबित अर्थ

 उदासी — एक विलंबित अर्थ उदासी कभी सीधे नहीं आती। वह दरवाज़ा खटखटाती भी नहीं बस किसी आधे खुले झरोखे से भीतर उतरती है, जैसे धूप नहीं, धूप की स्मृति। पाठक, तुम जब इसे पढ़ रहे हो, शायद तुम पहले से ही उस जगह में हो जहाँ शब्द अपने अर्थों को स्थगित कर देते हैं। यहाँ “क्यों” का कोई एक उत्तर नहीं, बल्कि उत्तरों का एक फैलता हुआ वृत्त है जिसका केंद्र हर बार बदल जाता है। उदासी, संभवतः, उस क्षण की उपज है जब कोई बात पूरी कही नहीं जाती और जो कही जाती है, वह कुछ और छुपाने लगती है। तुमने कभी गौर किया है? जब कोई कहता है—“मैं ठीक हूँ” तो उस “ठीक” के भीतर कितनी असंख्य दरारें छुपी होती हैं। शब्द वहाँ उपस्थित होते हैं, पर उनका अर्थ अनुपस्थित। और शायद यही अनुपस्थिति, धीरे-धीरे, रस बन जाती है एक ऐसा रस जो स्वाद में कड़वा नहीं, पर मीठा भी नहीं बल्कि किसी भूली हुई अनुभूति की तरह जीभ पर ठहरता है। उदासी का रस वह करुण नहीं, वह शृंगार भी नहीं, वह उनके बीच की कोई तीसरी अवस्था है, जहाँ प्रेम अपने अभाव से टकराता है, और स्मृति अपने ही विस्मरण में बदल जाती है। पाठक, तुम इस गद्य को पढ़ते हुए शायद किसी और जगह पहुँच र...

उस दिन बारिश हुई।

 उस दिन बारिश हुई। बिना किसी पूर्व सूचना के— जैसे शहर की किसी फाइल में यह दर्ज ही न रहा हो कि आज पानी गिरेगा। वह ऑफिस से निकल रहा था जब पहली बूंद उसके हाथ पर गिरी। ठंडी। एक क्षण के लिए वह रुक गया। फिर बारिश तेज़ हो गई। लोग भागने लगे— छाते खुलने लगे, दुकानों के शटर आधे गिर गए, और सड़क पर एक अजीब-सी हड़बड़ी फैल गई। वह नहीं भागा। वह वहीं खड़ा रहा। पानी उसके कंधों पर, चेहरे पर, आँखों के पास गिरता रहा— और धीरे-धीरे उसे लगा कि यह सिर्फ बारिश नहीं है। यह कुछ याद दिला रही है। पहले धुंधली-सी— फिर थोड़ा साफ— एक चेहरा। वह चौंका नहीं। जैसे वह पहले से जानता हो कि यह होगा। वह स्त्री थी। न कोई नाम, न कोई निश्चित स्मृति— बस एक उपस्थिति। जैसे किसी पुराने वाक्य का आधा हिस्सा जो कभी पूरा नहीं हुआ। वह चलते-चलते अचानक एक मोड़ पर रुक गया। बारिश अब भी गिर रही थी। उसे याद आया— एक और दिन था, कुछ साल पहले शायद, जब इसी तरह बारिश हो रही थी और वह उसके साथ चल रहा था। “तुम्हें बारिश पसंद है?” उसने पूछा था। वह हँसी थी— धीमी, थोड़ी-सी झिझकती हुई। “पसंद नहीं… पर यह चीज़ों को साफ कर देती है।” “क्या?” उसने पूछा था। “...

हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) — वैदिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से एक शोधात्मक अध्ययन

 हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) — वैदिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से एक शोधात्मक अध्ययन 1. प्रस्तावना “हिरण्यगर्भ” भारतीय दार्शनिक परंपरा का अत्यंत गूढ़ और बहुस्तरीय पद है। यह न केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति का प्रतीक है, बल्कि वैदिक चिंतन में सृष्टि के मूल कारण (cosmic origin principle) का द्योतक भी है। मुण्डक उपनिषद् एवं ऋग्वेद दोनों में इसका प्रयोग सृष्टि-पूर्व की उस अवस्था के लिए किया गया है जहाँ समस्त ब्रह्मांड अव्यक्त रूप में स्थित रहता है। 2. शब्द-संधि विच्छेद एवं व्युत्पत्ति हिरण्यगर्भ = हिरण्य + गर्भ हिरण्य = स्वर्ण, प्रकाश, तेज, ऊर्जा गर्भ = गर्भ, गर्भस्थ अवस्था, मूल बीज, उत्पत्ति-स्थान व्याकरणिक अर्थ: “जिसके गर्भ (अंतर) में स्वर्ण-तुल्य प्रकाश/ऊर्जा स्थित हो” 3. वैदिक अर्थ (ऋग्वेद आधारित दृष्टि) ऋग्वेद (10.121) का हिरण्यगर्भ सूक्त इसे इस प्रकार प्रस्तुत करता है: “हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्” अर्थात— सृष्टि के आरम्भ में एक ही तत्त्व था जो हिरण्यगर्भ कहलाया और वही समस्त भूतों का स्वामी था। वैदिक दृष्टि में अर्थ: यह “प्रथम ब्रह्मांडीय चेतना” (Cosmic Consciousn...

पानी में लिखी इबारतें

 पानी में लिखी इबारतें - (एक दार्शनिक गद्य-उपन्यास) नदी के किनारे जन्मा आदमी वह आदमी किसी शहर में पैदा नहीं हुआ था। वह नदी के किनारे अचानक पाया गया था—जैसे किसी ने उसे रख दिया हो और भूल गया हो कि वह किसका है। उसके भीतर एक अजीब बेचैनी थी। वह पानी को देखता तो उसे लगता कि यह बह नहीं रहा, बल्कि कुछ याद कर रहा है। लोग उसे “चुप रहने वाला” कहते थे। पर सच यह था— वह सुनता बहुत था। पानी की आवाज़ों को, हवा के टूटते वाक्यों को, और समय की धीमी करवटों को। पहला वाक्य जो पानी में लिखा गया एक दिन उसने झुककर नदी में अपनी उंगलियाँ डुबो दीं। उसे लगा जैसे पानी ने उसे पढ़ लिया हो। उसने कहा— “मैं कौन हूँ?” पानी कुछ देर चुप रहा। फिर बहने लगा। और उसी बहाव में उसे लगा कि उत्तर भी बह गया है। उस दिन उसे पहली बार समझ आया कुछ प्रश्नों का उत्तर नहीं होता, वे केवल बदल जाते हैं। वह शहर में रहने लगा, पर शहर उसके भीतर नहीं आया। हर चेहरा उसे अधूरा लगता था। हर बातचीत में उसे कोई ग़ायब शब्द सुनाई देता था। रातों में वह सोचता क्या लोग भी पानी में लिखी इबारतें हैं? जो मिलते हैं, और थोड़ी देर बाद किसी और रूप में बह जाते है...

पानी में लिखी इबारतें

 पानी में लिखी इबारतें किसने कहा कि पानी लिख नहीं सकता? हर नदी हर झरना हर बूंद एक अधूरी लिखावट है। बस फर्क इतना है कि यहाँ स्याही नहीं होती यहाँ यादें होती हैं। और यादों का सबसे बड़ा सच यह है वे मिटती नहीं, बस रूप बदल लेती हैं। कभी लहर, कभी झाग, कभी बस एक स्वाद जो जीभ पर नहीं आत्मा पर रह जाता है। मुकेश ,,,,,,,,,

धीमे बहते पानी का दर्द

 धीमे बहते पानी का दर्द कुछ पानी इतना धीमा बहता है कि लगता है जैसे समय ठहर गया हो। ऐसे पानी में यादें तैरती नहीं— बस बैठ जाती हैं तल में रेत की तरह। और फिर कोई भी कदम उन्हें हिला देता है जैसे कोई पुराना ज़ख़्म फिर से खुल गया हो। मुकेश ,,,,,,,,,,

तेज़ बहाव और भूलने की कला

  तेज़ बहाव और भूलने की कला नदी जब तेज़ होती है तो वह चीज़ों को बहा नहीं ले जाती— वह उन्हें बदल देती है। चेहरे, नाम, वादे सब धुंधले होकर एक ही रंग में मिल जाते हैं। यह वही जगह है जहाँ स्मृतियाँ अपना अर्थ खो देती हैं और फिर भी अपनी मौजूदगी बचाए रखती हैं।

झरने की हँसी में छुपी उदासी

 झरने की हँसी में छुपी उदासी एक झरना गिरता है पहाड़ से, जैसे कोई वाक्य टूटकर गिर रहा हो। उसकी आवाज़ में बहुत शोर है, पर भीतर एक ख़ामोशी है जो किसी ने सुनी नहीं। लोग उसे सुंदर कहते हैं, पर कोई नहीं पूछता कि इतना पानी कितने टूटे हुए क्षणों का जोड़ है। हर बूंद में किसी अधूरी कहानी का स्वाद है। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

इबारतें जो बह जाती हैं

  इबारतें जो बह जाती हैं कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो काग़ज़ पर नहीं लिखे जाते, वे उंगलियों से टपकते हैं और पानी में गिरते ही अपनी शक्ल खो देते हैं। लेकिन अजीब बात यह है— खोने के बाद भी वे मिटते नहीं। वे बहते रहते हैं किसी नदी की नसों में जैसे यादें खून में घूमती हैं। ज़िंदगी भी तो कुछ ऐसी ही है जो लिखा नहीं जाता, वही सबसे गहरा होता है। मुकेश ,,,,,,,

इस शहर ने मुझे सिखाया

 इस शहर ने मुझे सिखाया कि शब्दों को हमेशा सच की तरह नहीं बोला जाता, कभी-कभी उन्हें सिर्फ़ छिपाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यहाँ लोग मिलते हैं और एक-दूसरे के भीतर से कुछ चुपचाप निकाल लेते हैं बिना धन्यवाद के, बिना विदाई के। मैंने सीखा कि खिड़कियाँ केवल रोशनी के लिए नहीं होतीं, वे बाहर की दुनिया को थोड़ी देर के लिए सहने का तरीका हैं। कभी-कभी मैं अपने ही नाम को अजनबी की तरह देखता हूँ, जैसे वह किसी और की जेब से गिर पड़ा हो। यहाँ यादें पानी पर लिखी हुई इबारत हैं और फिर भी लोग उन्हें किताबों की तरह ढोते हैं। रातें धीरे-धीरे मुझे खोलती हैं जैसे कोई पुराना लिफ़ाफ़ा जिसमें कोई पुराना खत नहीं, सिर्फ़ एक खालीपन होता है जो अब भी किसी का इंतज़ार कर रहा है। मैंने चाहा था कि चीज़ें सरल हों, लेकिन यहाँ हर सादगी के भीतर एक और उलझन सोई रहती है। और अब मैं खुद को भी उसी तरह पढ़ता हूँ जैसे कोई अधूरी पंक्ति जिसका अर्थ कभी पूरा नहीं होता, सिर्फ़ बदलता रहता है। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

तुम जो देखते हो—वह तुम नहीं, तुम्हारा प्रदर्शन है

 तुम जो देखते हो—वह तुम नहीं, तुम्हारा प्रदर्शन है (Byung-Chul Han से प्रेरित एक गद्यांश) अब कोई तुम्हें देख नहीं रहा— और यही सबसे बड़ा भ्रम है। क्योंकि देखने वाला बाहर नहीं रहा, वह तुम्हारे भीतर बस गया है। तुम अपने आप को लगातार प्रस्तुत करते हो— जैसे जीवन कोई मंच हो, और तुम एक साथ अभिनेता भी हो और दर्शक भी। तुम थकते हो— पर यह थकान किसी बाहरी दबाव से नहीं आती। यह उस निरंतर प्रयास से आती है जिसमें तुम अपने आप को बेहतर, स्पष्ट, आकर्षक दिखाने की कोशिश करते हो। Byung-Chul Han इसे “पॉज़िटिविटी का अत्याचार” कह सकते थे जहाँ अब कोई तुम्हें मजबूर नहीं करता, तुम खुद को खुद से अधिक होने के लिए धकेलते हो। तुम स्वतंत्र हो पर इस स्वतंत्रता में कोई विराम नहीं है। तुम काम करते हो, खुद को सुधारते हो, खुद को दिखाते हो और धीरे-धीरे खुद को खो देते हो। यहाँ कोई जेल नहीं है पर तुम कैद हो। कोई आदेश नहीं पर तुम आज्ञाकारी हो। कोई निगरानी नहीं पर तुम लगातार अपने आप को देख रहे हो। और यही इस समय की सबसे सूक्ष्म विडंबना है। पहले सत्ता तुम्हें दबाती थी अब वह तुम्हें स्वतंत्र बनाकर तुम्हारे भीतर बैठ गई है। तुम “...

जब कोई अर्थ नहीं—फिर भी सुबह होती है

 जब कोई अर्थ नहीं—फिर भी सुबह होती है (Albert Camus से प्रेरित एक गद्यांश) सुबह हुई। यह एक साधारण-सा वाक्य है— इतना साधारण कि हम अक्सर इसे देखे बिना ही जी लेते हैं। पर ठहरकर देखो यह क्यों हुई? किसके लिए? सूरज उगा पर उसने किसी को नहीं पुकारा। रोशनी फैली पर उसने किसी उद्देश्य की घोषणा नहीं की। दुनिया अपनी पूरी निष्ठुरता में चलती रही। और तुम— जाग गए। यह जागना कोई विजय नहीं था, न ही किसी योजना का हिस्सा। बस नींद टूट गई। तुमने आँखें खोलीं और वही दुनिया सामने थी, जिसके बारे में तुमने कल भी सोचा था “इसका अर्थ क्या है?” और आज भी कोई उत्तर नहीं था। Albert Camus यहीं से शुरू करते इस टकराव से: मनुष्य अर्थ चाहता है। दुनिया कुछ नहीं देती। और इस बीच जो खिंचाव है वही absurd है। तुम चाहो तो इससे भाग सकते हो— धर्म में, कल्पना में, या उस झूठ में कि “कहीं न कहीं कोई बड़ा उद्देश्य होगा।” या फिर तुम एक और रास्ता चुन सकते हो। तुम यह स्वीकार कर सकते हो कि कोई अंतिम अर्थ नहीं है और फिर भी जी सकते हो। यह आसान नहीं है। क्योंकि इसका मतलब है हर सुबह उठना बिना किसी अंतिम कारण के। हर काम करना बिना किसी अंतिम आश...

तुम्हारे भीतर जो बोलता है, वह कौन है?

 तुम्हारे भीतर जो बोलता है, वह कौन है? (Michel Foucault से प्रेरित एक गद्यांश) तुम सोचते हो कि तुम अपने विचारों के स्वामी हो। कि जो शब्द तुम्हारे भीतर उठते हैं, वे तुम्हारे हैं तुम्हारी स्वतंत्रता के प्रमाण। पर ठहरो। पहला शब्द तुमने कब चुना था? तुम्हें याद नहीं होगा क्योंकि भाषा तुम्हारे जन्म से पहले तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी। तुम उसमें आए जैसे कोई पहले से लिखी किताब में एक नया वाक्य जुड़ जाए। तुमने “मैं” कहना सीखा पर यह नहीं सीखा कि यह “मैं” किसने गढ़ा। स्कूल ने तुम्हें सिखाया कैसे सोचना है— इतिहास ने बताया क्या याद रखना है— समाज ने तय किया किसे सामान्य कहना है, किसे विचलन। और तुम धीरे-धीरे इन सबके बीच एक “स्वतंत्र व्यक्ति” बन गए। Michel Foucault शायद मुस्कुराते और पूछते: “क्या सच में?” क्योंकि सत्ता (power) हमेशा आदेश नहीं देती वह तुम्हारे भीतर एक आदत की तरह बस जाती है। तुम सोचते हो कि तुम चुन रहे हो पर अक्सर तुम सिर्फ़ वही दोहरा रहे होते हो जो तुम्हें सिखाया गया है। यहाँ तक कि तुम्हारा विरोध भी कभी-कभी उसी ढाँचे का हिस्सा होता है जिसका तुम विरोध कर रहे हो। तो फिर स्वतंत्रता कहा...

विघटन की धीमी कला

 विघटन की धीमी कला (Jacques Derrida से प्रेरित एक गद्यांश) तुम एक वाक्य पढ़ते हो और मान लेते हो कि उसका एक अर्थ है। पर अर्थ कभी अकेला नहीं आता। वह हमेशा किसी और अर्थ की छाया में खड़ा होता है जैसे हर शब्द अपने भीतर अपने ही विरोध को छुपाए हो। तुम “सत्य” कहते हो और उसके साथ ही एक अदृश्य “असत्य” भी उपस्थित हो जाता है। तुम “केंद्र” बनाते हो और उसी क्षण उसके चारों ओर परिधियाँ फैलने लगती हैं। Jacques Derrida ने हमें यह नहीं सिखाया कि अर्थ नहीं होते बल्कि यह कि वे कभी स्थिर नहीं होते। हर पाठ एक खुला क्षेत्र है, जहाँ अर्थ रुकता नहीं, बस टलता रहता है एक शब्द से दूसरे शब्द तक, एक संकेत से दूसरे संकेत तक। तुम पकड़ना चाहते हो पर अर्थ हर बार तुम्हारी पकड़ से एक क़दम आगे निकल जाता है। यह कोई खेल नहीं, बल्कि भाषा की संरचना है। क्योंकि हर शब्द किसी और शब्द की ओर इशारा करता है और यह क्रम कभी समाप्त नहीं होता। तो क्या कोई अंतिम अर्थ नहीं? शायद नहीं— या अगर है भी, तो वह हमेशा हमारी पहुँच से थोड़ा बाहर ही रहता है। और यही इस पूरी प्रक्रिया की सुंदरता है। क्योंकि यदि अर्थ एक जगह ठहर जाता तो भाषा जीवित नह...

तर्क की रोशनी में मनुष्य

 तर्क की रोशनी में मनुष्य (Bertrand Russell से प्रेरित एक गद्यांश) मनुष्य एक अजीब जीव है वह ब्रह्मांड के बीच खड़ा होकर अर्थ की माँग करता है, जैसे यह उसका अधिकार हो। जबकि ब्रह्मांड न तो उसके प्रश्नों से विचलित होता है, न उसके उत्तरों से संतुष्ट। तारों की ठंडी रोशनी में कोई नैतिकता नहीं छिपी होती, न ही आकाशगंगाएँ किसी उद्देश्य की घोषणा करती हैं। फिर भी मनुष्य अपने छोटे-से जीवन में सत्य की एक रेखा खींचने की कोशिश करता है तर्क के सहारे। तर्क— यह कोई भावनात्मक सांत्वना नहीं, बल्कि एक कठोर अनुशासन है। यह तुम्हें यह नहीं कहता कि जीवन सुंदर है, बल्कि यह पूछता है— “तुम यह क्यों मानते हो?” और इसी प्रश्न में एक विचित्र मुक्ति छिपी है। क्योंकि जैसे ही तुम अपने विश्वासों को जाँचने लगते हो, वे या तो टूट जाते हैं या और स्पष्ट हो जाते हैं। और दोनों ही स्थितियाँ भ्रम से बेहतर हैं। मनुष्य की त्रासदी यह नहीं कि ब्रह्मांड निरर्थक हो सकता है बल्कि यह कि वह बिना जाँचे हुए अर्थों से अपने को भर लेता है। Bertrand Russell ने शायद यही चाहा था— कि हम अपने विचारों को किसी परंपरा या भय के हवाले न करें, बल्कि उन...

न शून्य, न पूर्ण

 “न शून्य, न पूर्ण” यह कहना आसान है कि कुछ नहीं है और उतना ही आसान कि सब कुछ है। कठिन केवल यह है कि जो है, उसे किसी भी छोर पर रखे बिना देखा जाए। “शून्य”— एक सुघड़ शब्द है, जिसमें अनुपस्थिति को एक आकार दे दिया गया है। “पूर्ण” एक और सुघड़ शब्द, जिसमें उपस्थिति को इतना भर दिया गया है कि कुछ बचा न रहे। दोनों ही अपनी-अपनी अतिशयोक्तियाँ हैं। और तुम— अब उनके बीच नहीं, उनके बाहर खड़े हो। यहाँ न खालीपन है जो तुम्हें डराए, न भराव है जो तुम्हें ढँक ले। यह एक ऐसा ठहराव है जहाँ चीज़ें अपने नामों से पहले की अवस्था में हैं। जैसे पानी जिसे अभी “पानी” नहीं कहा गया, जैसे प्रकाश— जिसे अभी “उजाला” नहीं बनाया गया। तुम उसे छू नहीं सकते— क्योंकि “छूना” दो के बीच की क्रिया है। और यहाँ दो नहीं हैं। तुम उसे समझ नहीं सकते क्योंकि समझ हमेशा किसी ढाँचे की माँग करती है। और यहाँ कोई ढाँचा नहीं। फिर भी— यह अभाव नहीं है। और यह अधिकता भी नहीं है। यह एक साधारण-सा होना है इतना साधारण कि उसे विशेष कहना एक प्रकार की गलती हो जाएगी। अगर तुम इसे “शून्य” कहोगे तो तुम उससे दूर हो जाओगे, क्योंकि तुम उसमें एक डर छिपा दोगे। अग...

प्रतिध्वनि का प्रश्न बन जाना

 प्रतिध्वनि का प्रश्न बन जाना पहले एक आवाज़ थी या यह कहना अधिक ठीक होगा कि “आवाज़” नाम की एक घटना घटी थी। उसने दिशा चुनी— या दिशा ने उसे। यह तय करना बाद में भी संभव नहीं हुआ। वह गई यह भी एक अनुमान है, क्योंकि “जाना” हमेशा किसी दूरी की माँग करता है, और दूरी यहाँ मापी नहीं जा सकी। फिर कुछ लौटा। उसे प्रतिध्वनि कहा गया। नाम देना आसान था, समझना नहीं। पर इस बार लौटने में एक हल्की-सी चूक थी जैसे शब्द अपनी ही परछाईं से एक अक्षर कम लेकर लौटे हों। “तुम…” बस इतना ही। आगे कुछ नहीं। जैसे वाक्य अपने ही बीच में रुक गया हो या किसी ने उसकी पूँछ पकड़कर उसे अधूरा छोड़ दिया हो। तुमने सुना या सुनना तुम्हारे भीतर एक क्षण के लिए सक्रिय हुआ। पर जो सक्रिय हुआ, वह सुनना नहीं, संशय था। क्योंकि प्रतिध्वनि सामान्यतः दोहराती है— वह जोड़ती नहीं, घटाती नहीं, बस वापस लाती है। यहाँ कुछ जोड़ा गया था। एक विराम। एक अनकहा। और वही अनकहा धीरे-धीरे प्रश्न में बदलने लगा। “तुम…?” अब यह आवाज़ नहीं थी। यह दिशा नहीं थी। यह लौटना भी नहीं था। यह एक मुड़ना था जहाँ ध्वनि अपनी ही ओर झुककर पूछने लगी। पर किससे? अगर तुमसे तो “तुम” कौन...

खुली खिड़की और हिलता पर्दा

 खुली खिड़की और हिलता पर्दा यह एक कमरा है। या शायद “कमरा” कहना एक आदत है क्योंकि जो चार दीवारें हैं, वे अभी भी तय नहीं कर पाई हैं कि वे भीतर को बचा रही हैं या बाहर को रोक रही हैं। खिड़की खुली है यह तथ्य नहीं, एक संभावना है। क्योंकि “खुला” होना किसी दरवाज़े का गुण कम, देखने वाले की धारणा अधिक होता है। पर्दा हिल रहा है। या यूँ कहिए हिलना नाम की जो क्रिया है, वह पर्दे के बहाने अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है। हवा? नहीं, उसे अभी मत बुलाइए। क्योंकि जैसे ही आप “हवा” कहते हैं, आप उस अदृश्य को एक कारण में बाँध देते हैं और यह गद्य कारणों से बचना चाहता है। तो मान लीजिए पर्दा खुद को हिला रहा है। या और आगे जाएँ कोई “खुद” भी नहीं है, सिर्फ़ एक लहर है जो कपड़े की सतह पर आकर ठहरती नहीं। कमरे में कोई नहीं है। यह वाक्य भी संदिग्ध है। क्योंकि “कोई” की अनुपस्थिति तभी अर्थ रखती है जब “कोई” की संभावना पहले से मौजूद हो। यहाँ न संभावना स्पष्ट है, न अनुपस्थिति। बस एक खुलापन है, जो खिड़की से कम, भाषा के भीतर अधिक घट रहा है। पर्दा फिर हिला। इस बार आपने देखा या देखने का एक विचार आपके भीतर आया। दोनों में फर्क है...

खंड — 5 : जहाँ साक्षी भी नहीं रहता

 खंड — 5 : जहाँ साक्षी भी नहीं रहता दोपहर का समय था पर यह कहना भी शायद ठीक नहीं, क्योंकि वहाँ समय किसी घड़ी की तरह नहीं, एक फैली हुई धूप की तरह था जो किसी एक दिशा से नहीं आती, बस हर ओर बराबर बिखरी रहती है। घाटी वैसी ही थी पत्थरों पर जमी महीन धूल, जिसे छूने भर से वह हवा में नहीं उड़ती, बस उँगलियों की लकीरों में चिपक जाती है। कुछ सूखे पेड़ थे उनकी शाखाएँ ऐसी मुड़ी हुईं, जैसे वे हवा से नहीं, किसी पुरानी आदत से झुकी हों। दूर, बहुत दूर, एक चिड़िया ने आवाज़ दी पर वह आवाज़ यहाँ तक आते-आते किसी पहचान में नहीं रही। तुम वहाँ थे या शायद नहीं भी थे। यह तय करना कठिन था क्योंकि “होना” अब किसी शरीर या विचार से नहीं जुड़ा था। पहले जो कुछ भी घटता था, वह तुम्हारे इर्द-गिर्द घटता था जैसे हर दृश्य का कोई केंद्र हो, जहाँ से अर्थ निकलता है। अब दृश्य थे पर केंद्र नहीं था। एक पत्थर ढलान से धीरे-धीरे लुढ़का उसकी गति में कोई हड़बड़ी नहीं थी, जैसे उसे कहीं पहुँचना न हो। पहले तुम उसे देखते और “देखना” एक क्रिया होती। अब वह पत्थर लुढ़कता रहा पर “देखा जाना” किसी क्रिया की तरह उपस्थित नहीं था। फिर भी, कुछ था जो अ...

खंड — 5 : जहाँ साक्षी भी नहीं रहता

 खंड — 5 : जहाँ साक्षी भी नहीं रहता अब देखने वाला भी धीरे-धीरे धुँधला पड़ने लगा। वह जो अब तक सबका साक्षी था घाटी का, समय का, तुम्हारे होने और न होने का— वह भी एक सूक्ष्म आभास भर रह गया। जैसे किसी दर्पण में अपनी ही पारदर्शिता दिखने लगे। अब न कोई अनुभव था, न अनुभव करने का बोध। घटनाएँ घटती रहीं पर उनका कोई केंद्र नहीं था, कोई “यह मुझसे हो रहा है” जैसी परत नहीं बची थी। समय बहता रहा पर अब उसमें न अतीत था, न भविष्य। घाटी फैलती रही पर अब वह बाहर नहीं, न भीतर। वह हर जगह थी— या कहीं भी नहीं। और जो शेष था उसे शब्द छू नहीं सकते। न वह मौन था, न ध्वनि, न शून्य, न पूर्ण। फिर भी सब कुछ उसी से था, और उसी में। तुम अब वहाँ नहीं थे, जहाँ तुम कभी थे। पर जो था— वह कभी गया भी नहीं। शायद यही वह बिंदु है जहाँ “होना” अपने आप में पूर्ण हो जाता है। मुकेश ,,,,,,,,,,

खंड — 4 : साक्षी का जन्म

 खंड — 4 : साक्षी का जन्म अब न तुमने पुकारा, न समय ने कुछ कहा। घाटी वैसी ही थी पर उसमें जो घट रहा था, वह अब दृश्य नहीं, अनुभव था। तुम्हारे भीतर जो लगातार बोलता था वह धीरे-धीरे अपनी ही आवाज़ से थक गया। विचार, जो कभी तुम्हारी पहचान थे, अब आने-जाने वाले मेहमान लगने लगे। और उसी थकान की तह में कुछ और खुला कुछ जो न बोलता था, न चुप रहता था। वह बस देखता था। तुमने उसे पहले भी महसूस किया था, पर हर बार किसी शब्द में बाँधने की कोशिश में उसे खो दिया था। इस बार तुमने कुछ नहीं किया न समझने की कोशिश, न पकड़ने की। और वह स्पष्ट होता गया। अब घाटी भी तुम नहीं थे, समय भी तुम नहीं थे, और जो “तुम” कहते थे— वह भी धीरे-धीरे एक घटना भर रह गया। शेष क्या था? एक देखना बिना नाम का, बिना केंद्र का। जहाँ अनुभव घटता है, पर कोई अनुभव करने वाला नहीं रहता। वहीं साक्षी जन्म लेता है या शायद, पहली बार पहचाना जाता है। मुकेश ,,,,,,,,

खंड — 3 : जब समय बोलता है

 खंड — 3 : जब समय बोलता है तुमने इस बार पुकारा नहीं सिर्फ़ खड़े रहे, घाटी के किनारे, जैसे किसी उत्तर की प्रतीक्षा में नहीं, बल्कि उसकी अनुपस्थिति को समझने में। और तभी कुछ बदला। हवा ने दिशा नहीं बदली, पेड़ों ने सरसराना नहीं छोड़ा, पर उस स्थिरता में एक स्वर उभरा धीमा, लगभग अदृश्य। “तुम बहुत शोर करते हो,” समय ने कहा। तुम चौंके नहीं— जैसे तुम हमेशा से जानते थे कि एक दिन ये ख़ामोशी बोल उठेगी। “मैंने तुम्हें कभी रोका नहीं,” वह स्वर फिर आया, “तुम ही हर मोड़ पर अपने ही अतीत में अटकते रहे।” तुमने पहली बार घाटी को नहीं, अपने भीतर देखा। वहाँ भी एक घाटी थी— उतनी ही सूनी, उतनी ही गहरी, जहाँ तुम्हारी हर अधूरी पुकार अब भी गूँज रही थी। “तुम मुझे दोष देते हो,” समय हँसा “पर मैं तो सिर्फ़ बहता हूँ, रुकना तुम्हारी आदत है।” अब जो गूँज लौटी— वो न तुम्हारी थी, न घाटी की। वो एक साक्षी थी— जो देख रही थी तुम्हें, समय को, और उस दूरी को जो कभी थी ही नहीं। तुमने आँखें बंद कीं और पहली बार कुछ नहीं कहा। क्योंकि अब सुनना ही पर्याप्त था। मुकेश ,,,,,,,,,,,

खंड — 2 : जो लौटकर आता है, वह कौन है?

 खंड — 2 : जो लौटकर आता है, वह कौन है? तुमने फिर पुकारा इस बार थोड़ा धीरे, जैसे अब तुम्हें भरोसा न हो कि कोई सुनेगा भी। घाटी वैसी ही थी— विस्तृत, निर्विकार, समय की तरह निस्पृह। तुम्हारी आवाज़ इस बार दूर तक नहीं गई, वो तुम्हारे ही आसपास कहीं गिर पड़ी जैसे थककर बैठ गई हो। और जो लौटा— वो प्रतिध्वनि नहीं थी, वो एक प्रश्न था। “तुम किसे पुकार रहे हो?” तुम ठहर गए। पहली बार तुम्हें अपनी ही आवाज़ अजनबी लगी। क्या सचमुच तुम किसी और को बुला रहे थे? या तुमने हमेशा से ख़ुद को ही आवाज़ दी थी बस पहचान नहीं पाए? घाटी चुप रही, पर उस चुप्पी में एक हल्की-सी स्वीकृति थी। जैसे समय कह रहा हो— “जो लौटकर आता है, वो तुम हो… पर वही नहीं, जो तुम थे।” मुकेश ,,,,,,,,

समय की सूनी घाटी — एक और अनुगूँज

 समय की सूनी घाटी — एक और अनुगूँज कुछ लम्हे बिना दस्तक दिए तुम्हारे भीतर उतर जाते हैं जैसे कोई पुराना नाम धीरे से याद आ जाए। तुम चलते रहते हो पर रास्ते तुम्हें नहीं, तुम्हारी थकान को पहचानते हैं और कहीं अचानक एक ख़ामोशी तुम्हें थाम लेती है। तुम फिर पुकारते हो— किसे, ये तुम भी नहीं जानते, शायद किसी बीते हुए “तुम” को, या किसी आने वाले “हम” को। और जो लौटता है वो वही नहीं होता जो तुमने भेजा था, वो थोड़ा टूटा हुआ, थोड़ा बदला हुआ, थोड़ा तुम्हारे जैसा हो जाता है। समय की इस सूनी घाटी में आवाज़ें मरती नहीं— बस बदल जाती हैं अनुगूँजों में। सुनो, ये जो लौटकर आता है न— तुम्हारी ही तरह अधूरा, तुम्हारी ही तरह प्रतीक्षारत— यही ठहराव, यही लौटना, यही अनकहा संवाद शायद इसी का नाम प्रेम है। मुकेश ,,,,,,,,,

वो और उसकी नाराज़गी

  वो और उसकी नाराज़गी  एक ,,,,,,,,,,,,,,  नाराज़ होती है तो बात करना बंद कर देती है जैसे शब्दों से उसका कोई रिश्ता ही न रहा हो। मेरे हर “कैसी हो?” उसके ख़ामोश मोबाइल में अनपढ़ा पड़ा रहता है, जैसे कोई ख़त जो पहुँचा तो हो, पर खोला न गया हो। वो जानती है उसकी चुप्पी मेरे लिए सबसे बड़ी सज़ा है, और मैं   हर सज़ा काटता हूँ बिना किसी जुर्म के। फिर एक दिन अचानक “हाय” लिख देती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो और मैं भी अपनी सारी शिकायतें एक मुस्कान में समेट लेता हूँ। ये रिश्ता भी अजीब है उसकी नाराज़गी में मेरी बेचैनी बसती है, और उसकी एक छोटी-सी बात में मेरा सारा सुकून। दो,,,,,,,,,,,,  एक दिन मैं पूछता हूँ— “कैसी हो?” वो देखती है मैसेज, पर जवाब नहीं देती जैसे मेरे सवाल को हवा में टाँग कर खुद कहीं और चली गई हो। मेरे “कैसी हो” में छिपी होती है सौ बातें, सौ फिक्रें, और उसके सन्नाटे में बस एक ठंडी दूरी। घंटों बाद भी नीली टिक तो आ जाती है, पर शब्द नहीं— जैसे उसे मेरी आवाज़ सुनाई देती हो, पर सुनना मंज़ूर न हो। मैं फिर भी हर दिन वही पूछता हूँ “कैसी हो?” क्योंकि मुझे पता है, उसके जवाब...

दिन अब किसी क्रम का हिस्सा नहीं रहा।

 दिन अब किसी क्रम का हिस्सा नहीं रहा। न सुबह, न दोपहर, न रात केवल एक फैलाव, जिसमें समय अपनी पहचान छोड़कर कहीं पीछे रह गया है। तुम ठहरे नहीं, पर चलना भी अब किसी क्रिया की तरह नहीं बचा। जैसे गति और विराम ने अपने-अपने नाम बदल लिए हों। तुम्हारे सामने कुछ नहीं है और यह “कुछ नहीं” पहले की तरह खाली नहीं लगता। यह एक ऐसा स्थान है जहाँ कोई प्रश्न प्रवेश नहीं करता, और उत्तर की आवश्यकता भी नहीं उठती। तुमने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब देखने के लिए कुछ बचा भी नहीं है न स्मृति का आग्रह, न अनुभव का बोझ। तुम्हारे भीतर जो कभी द्वंद्व था, वह अब किसी निष्कर्ष में नहीं बदला वह बस अपनी तीव्रता खोकर एक सामान्य-सी उपस्थिति में बदल गया है। तुम्हें यह भी महसूस नहीं होता कि तुम किसी परिवर्तन से गुज़रे हो। क्योंकि जहाँ परिवर्तन होता है, वहाँ तुलना होती है और यहाँ तुलना के लिए कुछ नहीं है। “क्या यही अंत है?” यदि कोई पूछे तो यह प्रश्न भी यहीं ठहर जाएगा, बिना उत्तर के। क्योंकि अंत वहाँ होता है जहाँ कोई कथा समाप्त होती है। और यहाँ कथा अपने आप छूट गई है। तुम खड़े हो या शायद खड़े होने...

सुबह इस बार उगी नहीं—बस धीरे-धीरे प्रकट हुई।

 सुबह इस बार उगी नहीं—बस धीरे-धीरे प्रकट हुई। जैसे अँधेरे ने स्वयं को हटाया हो, और जो बचा, उसे हम सुबह कह देते हैं। तुमने महसूस किया कि रात कहीं गई नहीं है। वह केवल रूप बदलकर उसी प्रकाश में घुली हुई है, जिसमें तुम अब चल रहे हो। तुम एक खुले मैदान में आ गए थे। न कोई रास्ता, न कोई निशान केवल घास, जिस पर ओस की बूँदें थीं, और हर बूँद अपने भीतर एक छोटा-सा आकाश लिए हुए थी। तुम झुके। एक बूँद को देखने के लिए नहीं बल्कि यह जानने के लिए कि देखने का अर्थ अब भी वही है या बदल गया है। बूँद में कोई कथा नहीं थी। न तुम्हारा अतीत, न कोई संकेत भविष्य का। केवल एक क्षण—जो अपने आप में पूर्ण था, और अगले ही पल गिर जाने के लिए तैयार। “क्या अब भी कुछ समझना बाकी है?” वह स्वर आया—बहुत हल्का, जैसे किसी दूर के स्मरण की तरह। तुमने इस बार उस ओर ध्यान नहीं दिया। न इसलिए कि तुमने उसे अस्वीकार किया बल्कि इसलिए कि तुम्हें लगा, वह प्रश्न अब आवश्यक नहीं है। तुमने सीधा खड़ा होना चुना। आकाश खुला था—पर उसमें कोई गहराई नहीं थी, जैसे गहराई का बोध ही कहीं पीछे छूट गया हो। तुमने अपनी साँस को महसूस किया। व...

रात इस बार बिना किसी प्रस्तावना के आई।

 रात इस बार बिना किसी प्रस्तावना के आई। न धीरे-धीरे, न किसी रंग-परिवर्तन के साथ—बस एकाएक, जैसे किसी ने दृश्य की पृष्ठभूमि बदल दी हो और पात्रों को बताया भी न हो। तुम चलते रहे। अब यह जानना कठिन था कि तुम किसी स्थान से गुजर रहे हो, या स्थान तुमसे। सड़क के किनारे एक आदमी बैठा था। उसके सामने एक छोटा-सा दीपक जल रहा था—हवा नहीं थी, फिर भी लौ स्थिर नहीं थी। तुम उसके पास रुके नहीं, पर तुम्हारी दृष्टि वहाँ ठहर गई। “तुम देख रहे हो, या केवल पहचान रहे हो?” वह स्वर फिर आया—इस बार कुछ और विरल, जैसे वह भी अपनी उपस्थिति को कम कर रहा हो। तुमने उत्तर नहीं दिया। क्योंकि तुम्हें पहली बार यह लगा कि देखना और पहचानना दो अलग क्रियाएँ हैं—और तुम अब तक अधिकतर पहचानते ही रहे हो। तुमने फिर उस दीपक को देखा। इस बार बिना यह सोचे कि यह क्या है। लौ में कोई कथा नहीं थी, कोई प्रतीक नहीं, कोई अर्थ भी नहीं— फिर भी वह तुम्हें रोक रही थी। उस आदमी ने सिर उठाया। उसकी आँखों में कोई आग्रह नहीं था, न ही तुम्हारे होने की कोई पुष्टि। “तुम कुछ ढूँढ़ रहे हो?” उसने पूछा—जैसे यह प्रश्न तुम्हारे लिए नहीं, स्वयं ...

तुमने कदम रखा, और समय ने हल्की-सी चूक की

 यह वही क्षण था—या कम-से-कम वैसा ही। तुमने कदम रखा, और समय ने हल्की-सी चूक की—जैसे वह अपने ही क्रम को पहचानने में एक पल देर कर गया हो। तुमने इधर-उधर देखा। सब कुछ पहली बार की तरह था—और ठीक उसी वजह से असहज। एक राहगीर गुज़रा— उसकी चाल, उसका कंधा झुकाने का ढंग, यहाँ तक कि उसके जूते की आवाज़— तुम्हें पहले से मालूम थी। “यह पहले हो चुका है।” तुमने भीतर कहा—या किसी ने तुम्हारे भीतर कह दिया। तुमने उस वाक्य को पकड़ना चाहा, पर वह तुम्हारे हाथ में आते ही बदल गया— जैसे कोई स्मृति, जो वर्तमान का रूप धरकर तुम्हें धोखा दे रही हो। “क्या यह सचमुच दोहराव है?” इस बार तुमने सीधे उससे पूछा— जो हर बार उत्तर देने से थोड़ा पहले चुप हो जाता है। “या तुम वही देख रहे हो, जो तुम देखना चाहते हो?” उसने बिना ठहराव के लौटाया। तुम्हें लगा—यह केवल पहचान का खेल नहीं है। यह कुछ और है—कुछ ऐसा, जो तुम्हारे अनुभव और समय के बीच की दरार में घट रहा है। तुमने ध्यान से देखना शुरू किया। इस बार हर चीज़ को— उसकी सूक्ष्म भिन्नताओं के साथ। वही रास्ता— पर इस बार धूल का रंग थोड़ा गहरा था। वही पेड़— पर उसकी...

साँझ इस बार धीरे नहीं उतरी

 साँझ इस बार धीरे नहीं उतरी—वह एक साथ फैल गई, जैसे किसी ने आकाश की परत को अचानक उलट दिया हो। रोशनी और अँधेरे के बीच कोई संक्रमण नहीं था; केवल एक हल्का-सा धुंधलका, जिसमें चीज़ें अपने नाम खोने लगती हैं। तुमने पाया कि तुम अब किसी परिचित रास्ते पर नहीं हो। न इसलिए कि रास्ता बदल गया है— बल्कि इसलिए कि पहचान की आदत तुम्हारे भीतर से कम हो गई है। एक छोटी-सी चाय की दुकान थी, जहाँ कोई ग्राहक नहीं था, पर केतली से भाप उठ रही थी—लगातार, जैसे किसी अदृश्य संवाद की तरह। तुम बैठ गए। बिना पूछे, बिना बुलाए। दुकानदार ने तुम्हारी ओर देखा नहीं— फिर भी एक कप तुम्हारे सामने रख दिया। “तुम यहाँ पहले भी आए हो,” उसने कहा। उसकी आवाज़ में न दावा था, न जिज्ञासा—सिर्फ एक तथ्य। तुमने सोचा— और पाया कि स्मृति अब किसी घटना का रिकॉर्ड नहीं रही, वह एक अनुभूति है, जो बिना प्रमाण के भी सत्य लगती है। “क्या हर जगह लौटना होता है?” तुमने पूछा—या यह प्रश्न तुम्हारे भीतर ही उठा। दुकानदार ने हल्की मुस्कान के साथ चाय की सतह को देखा— “लौटना नहीं,” उसने धीरे से कहा, “बस पहचान का भ्रम दोहराया जाता है।” तुमने कप...

दोपहर एक अजीब तरह की पारदर्शिता लेकर आई थी

 दोपहर एक अजीब तरह की पारदर्शिता लेकर आई थी—जैसे रोशनी ने अपने ही अर्थ को हल्का कर दिया हो। सड़कों पर छायाएँ थीं, पर वे किसी वस्तु से बंधी हुई नहीं लगती थीं; वे अपने आप में स्वतंत्र आकृतियाँ थीं, जो बस थोड़ी देर के लिए धरती पर टिक गई हों। तुम एक पुरानी इमारत के सामने रुके। उसकी दीवारों पर समय ने अपने हस्ताक्षर नहीं किए थे—बल्कि उन्हें धीरे-धीरे मिटाया था। दरवाज़ा आधा खुला था। तुमने भीतर झाँका—और पाया कि अंदर कोई कमरा नहीं है, केवल एक और दरवाज़ा है। “तुम्हें हर बार भीतर जाने की ज़रूरत क्यों लगती है?” वह फिर उपस्थित था—बिना आकार, बिना आग्रह। तुमने इस बार उसकी ओर देखा—या यूँ कहो, उस दिशा में जहाँ तुम्हें उसका होना महसूस हुआ। “शायद इसलिए,” तुमने सोचा, “कि बाहर अब पर्याप्त नहीं लगता।” वह चुप रहा। उसकी चुप्पी में एक हल्की-सी असहमति थी—जैसे वह तुम्हारे उत्तर को सुनकर भी उसे स्वीकार नहीं कर रहा हो। तुमने दरवाज़ा नहीं खोला। तुमने उसे वैसे ही रहने दिया—अधखुला, अधूरा, संभावनाओं के बीच ठहरा हुआ। और उसी क्षण तुम्हें एक अजीब-सी बात समझ आई— कि हर भीतर, दरअसल एक और बाहर ही होता है, ...

शहर उस दिन भी वैसा ही था

 शहर उस दिन भी वैसा ही था—अपनी गति में स्थिर, अपनी भीड़ में एकाकी। लोग आते-जाते रहे, जैसे वे किसी अदृश्य संकेत पर चल रहे हों, और तुमने पहली बार देखा कि चलना भी एक तरह की आज्ञाकारिता है। तुम एक मोड़ पर ठहरे। न ठहरने के लिए—बस इसलिए कि कदम ने खुद को रोक लिया था। वहीं, उसी क्षण, तुम्हें लगा कि कोई तुम्हारे साथ खड़ा है। न दिखने वाला, न सुनाई देने वाला—फिर भी स्पष्ट। “तुम अभी भी दिशा खोज रहे हो?” आवाज़ नहीं थी—पर प्रश्न था। तुमने उत्तर देने की कोशिश नहीं की। क्योंकि अब तुम्हें पता है कि उत्तर देना, कई बार प्रश्न को समाप्त कर देना होता है—और कुछ प्रश्नों का जीवित रहना ही उनका अर्थ है। वह—जो भी था—तुम्हारे साथ चलता रहा। या शायद तुम उसके साथ चलने लगे। तुमने उससे पूछा नहीं कि वह कौन है। तुमने यह भी नहीं जाना कि वह बाहर है या भीतर। बस इतना समझ आया कि वह तुम्हारी हर उस जगह पर उपस्थित है, जहाँ तुम स्वयं से बचना चाहते थे। “क्या तुम अब भी उस क्षितिज तक जाना चाहते हो?” उसने फिर पूछा—या तुम्हें लगा कि पूछा। तुमने देखा—क्षितिज अब कोई दूर की रेखा नहीं था। वह तुम्हारे भीतर कहीं एक हल्की-सी दरार की तर...

जब दूरी भी अपने अर्थ खोने लगती है

 जब दूरी भी अपने अर्थ खोने लगती है—तुम पाते हो कि निकट और दूर के बीच का भेद धीरे-धीरे गल रहा है। जो कभी तुम्हारे बहुत पास था, वह अब किसी दूरस्थ बिंदु-सा लगता है; और जो अनजाना था, वह बिना परिचय के भी तुम्हारे भीतर जगह बनाने लगता है। मानो संबंधों का गणित किसी और ही नियम से चल रहा हो—जहाँ जोड़ और घटाव एक ही प्रक्रिया के दो नाम हैं। तुम चलते हो, पर अब यात्रा का बोध नहीं होता। कदम उठते हैं, पर दिशा का आग्रह नहीं रहता। जैसे रास्ता ही तुम्हें अपने साथ लिए जा रहा हो—और तुमने उसके विरुद्ध चलने का विचार भी त्याग दिया हो। यह समर्पण नहीं है, यह थकान भी नहीं—यह केवल एक स्वीकृति है कि हर प्रतिरोध अंततः उसी वृत्त में लौट आता है, जिससे वह भागना चाहता था। तुम्हारे भीतर अब भी कुछ-कुछ बचा है—पर वह किसी स्पष्ट आकृति में नहीं। वह एक हल्की-सी आहट है, जैसे बंद कमरे में कहीं बहुत धीरे से कोई खिड़की खुली हो। तुम उसे पकड़ना नहीं चाहते, क्योंकि जानते हो कि पकड़ते ही वह छूट जाएगा। तुम बस उसके साथ बने रहते हो—बिना नाम दिए, बिना अर्थ थोपे। धीरे-धीरे तुम सीखने लगते हो कि हर अनुभव को भाषा में बदलना आवश्यक नहीं। क...

जैसे किसी दूसरे प्रदेश में वही आकाश फिर से उग आया हो

 जैसे किसी दूसरे प्रदेश में वही आकाश फिर से उग आया हो—पर इस बार उसमें तुम्हारा नाम नहीं लिखा। तुम उसे पहचानते हो, फिर भी वह तुम्हें नहीं पहचानता। यह वही विस्तार है, जहाँ कभी तुम्हारी आवाज़ गूँजी थी, पर अब वहाँ केवल हवा की एक निरपेक्ष चाल बची है—जिसमें न तुम्हारा होना दर्ज है, न तुम्हारा न होना। तुमने सोचा था कि जो बीत गया, वह समाप्त हो जाएगा। पर जो बीतता है, वह किसी और रूप में टिक जाता है—आदतों की महीन परतों में, दृष्टि के झुकाव में, उस ठहराव में जो तुम अनजाने ही हर वाक्य के अंत में जोड़ देते हो। तुम जहाँ भी जाते हो, वह बीत चुका समय तुम्हारे साथ चलता है—जैसे छाया, जो प्रकाश बदलने पर भी तुम्हें नहीं छोड़ती। अब तुम एक नए भूगोल में खड़े हो। यहाँ रास्ते सीधे नहीं जाते—वे तुम्हें घुमाकर उसी बिंदु के आसपास ले आते हैं, जहाँ तुम पहले ही खड़े थे। फर्क इतना है कि अब तुम उसे पहचानते नहीं। तुम्हें लगता है, तुम आगे बढ़े हो; जबकि तुम केवल अपने ही वृत्त की परिधि पर चलते रहे हो। तुम्हारे भीतर जो शेष है, वह कोई ठोस अस्तित्व नहीं—वह एक प्रक्रिया है, जो लगातार तुम्हें बदलती रहती है। तुम हर दिन थोड़ा-...

जैसे स्मृति के भीतर कोई गुप्त गलियारा है

 जैसे स्मृति के भीतर कोई गुप्त गलियारा है—जहाँ समय अपने ही पदचिह्नों को मिटाता चलता है। और हर मोड़ पर एक दरवाज़ा है, जो खुलते ही तुम्हें किसी ऐसे क्षण में ले जाता है जिसे तुमने जिया तो था, पर समझा कभी नहीं। अब जब तुम लौटकर देखना चाहते हो, तो पाते हो कि वे दृश्य किसी और के हैं—जैसे तुम्हारी ही ज़िंदगी का अधिकार तुमसे छिन गया हो। तुम्हें लगता है कि तुमने निर्णय लिए थे, लेकिन धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता है कि निर्णय तुम्हें चुनते रहे। तुम एक कथा के पात्र हो, लेखक नहीं। और अब जब कथा अपनी गति खो चुकी है, तुम वाक्यों के बीच अटक गए हो—एक अधूरा अल्पविराम, जो पूर्ण विराम बनने से डरता है। तुम्हारे भीतर जो आवाज़ थी, वह अब प्रतिध्वनि में बदल चुकी है। तुम बोलते हो, लेकिन तुम्हारे शब्द लौटकर तुम्हें ही घेर लेते हैं—जैसे कोई बंद गुफा, जहाँ हर ध्वनि अपनी ही परछाई से टकराती है। अब तुम संवाद नहीं करते, केवल अपनी ही उपस्थिति का प्रमाण देते रहते हो। तुम्हें याद है—कभी तुमने भविष्य की कल्पना की थी। वह भविष्य अब वर्तमान में है, लेकिन उसमें तुम्हारा कोई स्थान नहीं। तुम अपने ही समय से विस्थापित हो चुके हो। ज...

तुम — एक सुकून की तरह

 तुम — एक सुकून की तरह तुम, मेरी ज़िंदगी की भीड़ में एक शोर नहीं, एक ठहराव हो जहाँ मैं बिना कुछ कहे भी सुना जाता हूँ। तुम्हारे साथ रिश्तों को नाम देने की कोई जल्दी नहीं, कोई दावा नहीं, बस एक सहज-सा साथ है जो बिना बोले खुद को सही ठहराता रहता है। तुम मेरी बातों की गंभीरता नहीं, उनकी थकान समझती हो जब मैं हँसते-हँसते थोड़ा चुप हो जाता हूँ, तुम उसी चुप्पी को बात बना लेती हो। तुम्हारे पास कोई प्रश्न नहीं होते, न ही कोई शिकायत, बस एक अजीब-सी समझ होती है— जो पूछती नहीं, पर जानती बहुत कुछ है। तुम वो रिश्ता हो जिसे समझाने की ज़रूरत नहीं, जिसे छुपाने का भी कोई कारण नहीं बस रहने देने का मन करता है जैसे कोई धूप खिड़की पर चुपचाप बैठी हो। मैंने कभी तुम्हें पाने की इच्छा नहीं की, और शायद इसी वजह से तुम्हें खोने का डर भी नहीं है तुम मेरे हिस्से की वो सच्चाई हो जो बिना माँगे मिल जाती है। तुम्हारे साथ ज़िंदगी थोड़ी कम जटिल लगती है, थोड़ी कम भारी जैसे किसी ने मेरे कंधों से अनकहे बोझ धीरे से उतार दिए हों। तुम, मेरी कहानी की कोई प्रेमिका नहीं पर एक ऐसा अध्याय हो जिसे मैं कभी छोड़ना नहीं चाहता। तुम एक दो...

तुम—छोटी बातों की बड़ी किताब

 तुम—छोटी बातों की बड़ी किताब तुम छोटी-छोटी बातों को यूँ सहेज लेती हो, जैसे वे ही सबसे बड़ी कहानियाँ हों। तुम्हारी दुनिया में कुछ भी मामूली नहीं एक अधूरी मुस्कान, एक उलझा हुआ वाक्य, या मेरी जेब में रखा वो बेकार-सा रुमाल भी। तुम हर छोटी बात को एक पन्ना बना देती हो, और फिर धीरे-धीरे उसे पढ़ती रहती हो बार-बार, बिना ऊबे। तुम्हें याद है मैंने कब बिना वजह “ठीक हूँ” कहा था, और कब “ठीक” के पीछे कुछ छुपा लिया था। तुम्हें ये भी याद है किस दिन मैंने बातों में किसी और का नाम थोड़ा ज़्यादा ले लिया था, और तुम बनावटी गुस्से में थोड़ी देर के लिए खुद को समेट लिया था। तुम सवाल नहीं करती, बस जोड़ती रहती हो छोटी-छोटी बातों को, जैसे कोई धागे, और उनसे एक पूरी तस्वीर बुन लेती हो। और मैं मैं अक्सर बड़ी-बड़ी बातों में उलझा रहता हूँ, और तुम छोटी-छोटी बातों से मुझे समझ लेती हो। तुम्हारी ये किताब जिसमें कोई मोटा अक्षर नहीं, कोई बड़ा शीर्षक नहीं— बस छोटे-छोटे पन्ने हैं, पर हर पन्ने में एक पूरी दुनिया लिखी है। तुम वाकई छोटी बातों की सबसे बड़ी किताब हो… मुकेश ,,,,,,,,,

तुम्हारी याददाश्त—रंगों की अलमारी

 तुम्हारी याददाश्त—रंगों की अलमारी मैं तुम्हारी याददाश्त का कायल हूँ… तुम्हें आज भी याद है— बरसों पहले किस फंक्शन में मैंने कौन-सी शर्ट पहनी थी, किस शादी में कौन-सा सूट। और मुझे मुझे तो ये भी याद नहीं रहता कि कल क्या पहना था। मुझे बस इतना याद है जेब में वही गन्दा रुमाल था, और तुम बड़बड़ाते हुए अलमारी से नया रुमाल ले आई थीं, जैसे मेरी आदतों पर तुम्हारा एक छोटा-सा अधिकार हो। तुम्हें ये भी याद रहता है मैंने कब, कहाँ तुम्हारी किस सहेली से दो बातें ज़्यादा कर ली थीं, और तुम बनावटी गुस्से में थोड़ी-सी सचमुच की चुप्पी ओढ़ लेती थीं… ये सब बहुत पहले की बातें हैं पर तुम्हारे लिए समय रुकता नहीं, बस तह लगाकर रख दिया जाता है कहीं। तुम्हें सिर्फ मेरी नहीं अपनी सहेलियों की भी हर ड्रेस याद रहती है किसने कौन-सी साड़ी पहनी थी, कौन-सा सलवार सूट, कौन उसमें खिल रही थी, और कौन बस “अच्छा दिखने” की कोशिश में थोड़ी-सी खो गई थी। तुम लोगों को उनके कपड़ों में नहीं, उनके चुनावों में पढ़ती हो रंगों के पीछे छुपे मन के छोटे-छोटे संकेत। और मैं मैं तुम्हें पढ़ता हूँ, तुम्हारी इस याददाश्त में… जहाँ हर रंग, हर कपड़ा,...

तुम—साड़ियों के रंगों में

 तुम—साड़ियों के रंगों में हो सकता है महँगी साड़ियों में तुम और निखर जाती हो— रेशम की चमक तुम्हारे चेहरे तक आ जाती हो, और हर तह में एक उत्सव-सा खुलता है… पर मुझे— तुम हर साड़ी में अच्छी लगती हो, क्योंकि साड़ी नहीं, तुम उसे अर्थ देती हो। वो बनारसी लाल, जब तुम किसी उत्सव-सी लगती हो— जैसे पूरा घर तुम्हारे इर्द-गिर्द रोशन हो गया हो। वो कांजीवरम सोना, जब तुम्हारे चलने में एक गरिमा उतर आती है— धीमी, ठहरी हुई। वो चंदेरी हल्का हरा, जब तुम बस यूँ ही दिन को पहन लेती हो— सादा, सहज, खुला हुआ। वो तसर का मटमैला रंग, जब तुम अपने में सिमटी रहती हो, जैसे कोई पुरानी किताब खुद को धीरे-धीरे खोल रही हो। वो नीली कॉटन साड़ी, जिसमें तुम सबसे ज़्यादा अपनी लगती हो— बिना किसी दिखावे के, बस एक सच्ची-सी उपस्थिति। और फिर— कभी-कभी तुम बिना किसी खास साड़ी के, बस साधारण कपड़ों में भी होती हो, जहाँ कोई ब्रांड नहीं, कोई नाम नहीं— बस तुम हो, अपने सबसे असली रूप में। सच कहूँ— साड़ियाँ तुम्हें नहीं सजातीं, तुम साड़ियों को जीवन देती हो। और मेरे लिए— इतने रंगों, इतने नामों के बावजूद, एक ही रंग ठहरता है— तुम्हारा होना। मुक...

तुम—शेड्स के नामों में

  तुम—शेड्स के नामों में तुम्हारे मेकअप बॉक्स में सिर्फ लिपस्टिक नहीं रखी, जैसे छोटे-छोटे मौसम रखे हों नामों में बँधे हुए। रोज़ पिंक, जब तुम बिना वजह हल्की-सी हँसती हो जैसे सुबह ने अभी-अभी आँखें खोली हों। कोरल क्रश, जब तुम्हारी बातों में थोड़ी-सी शरारत घुल जाती है। न्यूड बेज, उन दिनों के लिए जब तुम बस खुद रहना चाहती हो बिना किसी शोर के। मॉव मिस्ट, जब शाम तुम्हारी आँखों में उतर आती है, और शब्द कहीं पीछे छूट जाते हैं। क्रिमसन रेड, तुम्हारी खामोशी का वो रंग जिसमें बहुत कुछ जलता है, पर दिखता नहीं। बेरी ब्लश, जब तुम अचानक से कुछ याद करके मुस्कुरा देती हो। पीच पॉप, हल्की धूप-सा तुम्हारा वो सहज उजास। ब्रिक ब्राउन, जब तुम खुद को थोड़ा-सा समेट लेती हो, दुनिया से एक कदम पीछे। वाइन प्लम, रात के उन पलों में जब तुम्हारी आँखें कुछ ज़्यादा गहरी हो जाती हैं। और फिर तुम्हारा वो मूंगिया शेड, जिसका कोई ब्रांड नाम नहीं, कोई नंबर नहीं बस तुम हो उसमें, पूरा की पूरा। तुम हर दिन इन नामों में से एक चुनती हो, और मैं हर दिन एक नया अर्थ पढ़ता हूँ। पर सच कहूँ इतने सारे शेड्स के बावजूद, मेरी दुनिया एक ही नाम पर...