खुली खिड़की और हिलता पर्दा
यह एक कमरा है।
या शायद “कमरा” कहना एक आदत है
क्योंकि जो चार दीवारें हैं,
वे अभी भी तय नहीं कर पाई हैं
कि वे भीतर को बचा रही हैं
या बाहर को रोक रही हैं।
खिड़की खुली है
यह तथ्य नहीं,
एक संभावना है।
क्योंकि “खुला” होना
किसी दरवाज़े का गुण कम,
देखने वाले की धारणा अधिक होता है।
पर्दा हिल रहा है।
या यूँ कहिए
हिलना नाम की जो क्रिया है,
वह पर्दे के बहाने
अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है।
हवा?
नहीं, उसे अभी मत बुलाइए।
क्योंकि जैसे ही आप “हवा” कहते हैं,
आप उस अदृश्य को
एक कारण में बाँध देते हैं
और यह गद्य
कारणों से बचना चाहता है।
तो मान लीजिए
पर्दा खुद को हिला रहा है।
या और आगे जाएँ
कोई “खुद” भी नहीं है,
सिर्फ़ एक लहर है
जो कपड़े की सतह पर
आकर ठहरती नहीं।
कमरे में कोई नहीं है।
यह वाक्य भी संदिग्ध है।
क्योंकि “कोई” की अनुपस्थिति
तभी अर्थ रखती है
जब “कोई” की संभावना पहले से मौजूद हो।
यहाँ
न संभावना स्पष्ट है,
न अनुपस्थिति।
बस
एक खुलापन है,
जो खिड़की से कम,
भाषा के भीतर अधिक घट रहा है।
पर्दा फिर हिला।
इस बार
आपने देखा
या देखने का एक विचार
आपके भीतर आया।
दोनों में फर्क है,
और यही फर्क
इस पूरे दृश्य को अस्थिर रखता है।
अगर आप कहें
“मैं देख रहा हूँ,”
तो “मैं” तुरंत भारी हो जाता है,
जैसे इस हल्के दृश्य पर
किसी ने अपना नाम लिख दिया हो।
और अगर आप “मैं” हटा दें
तो क्या बचता है?
एक खिड़की
जो खुली है (या नहीं भी),
एक पर्दा
जो हिल रहा है (या हिलना घट रहा है),
और एक गद्य
जो हर वाक्य के बाद
अपनी ही नींव पर
हल्का-सा संदेह करता है।
शायद यही इस प्रयोग का केंद्र है
कि कोई केंद्र नहीं है।
और अंत में
अगर कोई अंत है
पर्दा हिलना बंद नहीं करता,
बस आप
उसे “पर्दा” कहना
छोड़ देते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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