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Showing posts from December, 2020

ताने बाने पे

  रात और दिन के ताने बाने पे कसता हूं तुम्हारी यादों के मजबूत धागे और बुनता हूं यादों की एक उदास चादर जिसपे काढता हूँ तुम्हारी हंसी के बेलबूटे जिसे ओढ़ काट दूँगा दिसंबर जनवरी की सर्द रातें मुकेश इलाहाबादी,,,

मै कोई सूरज थोड़े ही हूँ

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  मै कोई सूरज थोड़े ही हूँ कि दिन भर की थकन के बाद रात मुझे ओढ़ के सो जाए मुझे तो चमकना होता है हर रोज़ हर रात आकाश के उत्तरी ध्रुव पे और निहारना होता है अपनी धरती को जो लाखों प्रकाशवर्ष की दूरी पे नाच रही होती है अपना सतरंगी आँचल ओढ़े मस्ती से आवारा चाँद के लिए (सुमी से ,,,,,,,,,,,) मुकेश इलाहाबादी ----------- 28 Pankaj Singh, Sandhya Yadav and 26 others 9 Comments Like Comment Share Comm

ये और बात जुबान नहीं रखता आईना

 ये और बात जुबान नहीं रखता आईना  हमेशा सच को सच है दिखाता आईना  ऐसा भी नहीं कि कुछ नहीं बोलता है  सुनोगे तो बहुत कुछ बोलेगा आईना  बेवजह हाथ तुम्हारे ज़ख़्मी हो जाएंगे  मत छू मुझे मै हूँ चटका हुआ आईना  किसी और आईने की जरूरत ही नहीं  अपने दिल को ही बना लिया आईना  मुकेश इलाहाबादी -----------------------

नदी को जानना आसान नहीं

नदी को जानना आसान नहीं  ----------------------- यूँ ही  एक दिन मैंने नदी से पूछा  "तुम कौन हो,,,,? " नदी मुस्कुराई  और तंज़ से बोली  "सुनो कविवर,  नदी को सिर्फ  नदी के किनारे किसी पेड़ सा खड़े हो कर  श्रद्धा से  आचमन भर कर लेने से  या फिर  नदी में पाँव पखार लेने भर से  नदी को न जान पाओगे  यहाँ तक कि  नदी को बिलकुल भी न जान पाओगे  नदी के जिस्म में  मगरमच्छ सा उम्र भर इठलाते रहने भर से  या कि  मुर्दा शब्दों से  कुछ मीठी - मीठी कवितायेँ लिख लेने भर से  नहीं जान पाओगे  तुम नदी को, नदी को जानने के लिए  बर्फ का पहाड़ बन के  बूँद - बूँद पिघलना होगा  नदी में मिलना होगा  या फिर  बादल बन बरसनां होगा  या फिर  समंदर सा भव्य और  गहरा होना होगा  तो ही नदी  खुद - ब खुद  दौड़ती हुई तुम्हारी बाहों में  हरहरा कर समां जाएगी  हमेशा - हमेशा के लिए  और करती रहेगी केलि  हर पूनम की रात्रि  चाँद और सूरज की छाँव में  और शायद तब ही...

फुटकर नोट्स - सुमी के लिए

  फुटकर नोट्स - सुमी के लिए -------------------------------- एक --- मेरे, सारे रंगहीन ख़्वाब तुम्हारी आँखों के प्रिज़्म से गुजरते ही सतरंगी हो गए दो --- तुम्हारी आँखों में पानी और मेरे पास शब्दों की माटी थी जो आपस में गूँथ के नज़्मों की शक्ल में ढलते जा रहे हैं तीन ----- बस एक बार अपने होठो से नहीं आँखों से कह दो 'न " फिर मै लौट जाऊँगा अपने मौन के कोटर में न लौटने के लिए मुकेश इलाहाबादी --

तुम याद आये

  तुम बारिश मे याद आये भीग जाने के लिए पोर- पोर पुलकित होने को सर्वांग तुम सर्द रातों मे याद आये मद्धम - मद्धम जलते अलाव की मीठी मीठी आंच मे तापने की तुम बहतु याद आये पतझड़ में बसंत के इंतज़ार में वर्ष के किस मौसम में याद आया मै पूछता हूँ तुमसे आज मुकेश इलाहाबादी ----

नदी बनाम समुद्र

 नदी बनाम समुद्र  --------------------- सुमी, जानती हो ? समंदर जितना ठहरा हुआ लगता है  उतना हमेशा से न था  पहले-पहल उसके अंदर बहुत हलचल हुआ करती थी  बहुत गरजता था  जब गरजता तो जलजला सा आ जाया  करता था मानो धरती आकाश एक हो जाया करते थे  धरती और समंदर के सभी जीव घबरा जाया करते थे   समंदर को अपनी भव्यता  और गर्जना पे नाज़ था  पर हुआ  यूँ कि  एक दिन उसे  यूँ ही  ख़याल आया कि  दुनिया में उसे छोड़ कोइ भी अकेला नहीं है  धरती के लिए - सूरज है  चाँद के पास - चॉँदनी है  चातक के पास - चकोर है  राग के पास - रागनी है  दिए के पास - रोशनी है  पर मेरे लिए ??? कोई नहीं है, तब,  उसने ये बात देवताओं से कही  देवतोओं ने कहा  ऐसा नहीं है  तुम्हारे लिए 'नदी " है  तुम उसे पुकारो वो तुम तक  दौड़ी चली आयेगी  ये सुन समंदर खुश हुआ  उसने सूरज की किरणों की सतह पे  ख़त  लिखा  बादल को डाकिया बनाया  अपना प्रणय निवेदन कहला भेजा  जिस वक़्त बादल डाकिय...

तुझसे इश्क़ ही तो किया था हमने

  तुझसे इश्क़ ही तो किया था हमने तो क्या ये गुनाह कर दिया हमने फकत चंद मुलाकातों को बचा कर ज़िंदगी सब कुछ भुला दिया हमने बाजुओं पे अपनी कर के भरोसा लकीरें हाथों की मिटा दिया हमने वो चाहता था मुझे ग़मज़दा देखे ज़िंदगी हंस के बिता दिया हमने सिर्फ तेरे नाम का दिया है रौशन रात सारे चराग़ बुझा दिया हमने मुकेश इलाहाबादी -----------

सहरा को भी हरा भरा कर सकता हूं

 सहरा को भी हरा भरा कर सकता हूं मैं बादल हूँ कभी भी बरस सकता हूं अपने सारे असबाब बाँध रखे हैं मैंने सफ़र पे कभी भी निकल सकता हूं ज़रा आहिस्ता से छूना मेरे दिल को कांच का हूँ कभी भी चटक सकता हूं ओस बन के तेरे बदन को चूम लूँगा  सर्द कोहरा हूँ तुझसे लिपट सकता हूँ  अपने नाज़ुक हाथ हटा तू बदन से   पत्थर नहीं बर्फ हूँ पिघल सकता हूँ  मुकेश इलाहाबादी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

अपनी दोनों आँखे बंद कर लेती है

अपनी दोनों आँखे बंद कर लेती है मेरे सीने पे अपना सर रख लेती है बहुत बार तो जब लाड में होती है वो झूठ-मूठ का गुस्सा कर लेती है अमूमन उससे मै दर्द छुपा लेता हूँ पर जाने कैसे वो आँखे पढ़ लेती है कोई सा तो जादू जाने है वो तभी प्यार की झप्पी से दुःख हर लेती है वो ईश्क़ की बातें करना जाने न पर अक्सरहां मुझे बाँहों में भर लेती है मु केश इलाहाबादी -- Co

ये कर आज फैसला तू

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  ये कर आज फैसला तू तू मेरा है या ग़ैर का तू अगर बेवफा नहीं है तो आँख से आँख मिला तू रिश्ता नहीं रखना है तो डायरी से नाम मिटा तू गया वक़्त हूँ न लौटूँगा मत अब मुझको बुला तू मुक्कू गर कोइ गिला है तू बेशक मुझको बता तू मुकेश इलाहाबादी -- 21 Ranjana Shukla, आराधना द्विवेदी and 19 others 9 Comments Like Comment Share Co

या तो दिल से साथ चलना चाहिए

 या तो दिल से साथ चलना चाहिए  या साथ पसंद नहीं कहना चाहिए  मन में मलाल ले कर साथ रहो   बेहतर रास्ता बदल लेना चाहिए  जो दुःख सुख के साथी नहीं उन्हें    अपनी डायरी से हटा देना चाहिए  यादें अगर हर वक़्त दर्द देती है   बेहतर है उन्हें भुला देना चाहिए  कोइ प्यारा दोस्त रूठ गया है तो  उसे हर हाल मना में लेना चाहिए  मुकेश इलाहाबादी --------------

हो जाऊँ अब तुम ही बताओ कैसा

हो जाऊँ अब तुम ही बताओ कैसा  तुम जैसा कहो  मै वैसा हो जाऊँ  मै तो ठहरा बन्दा सीधा सादा सा  क्या करूँ जो तुम जैसा हो जाऊँ  मुक्कू क्या करूँ खुद को बदलूँ या  मै भी खुदगर्ज़ औरों जैसा हो जाऊँ  मुकेश इलाहाबादी --------------

परवरदिगार ने पहले- पहल जब क़ायनात बनाई तो

  सुमी , परवरदिगार ने पहले- पहल जब क़ायनात बनाई तो उसने ज़मी के लिए सूरज और फलक के लिए चाँद बनाया ताकि दोनों जगह रोशनी हो सके चाँद पा के सितारे बहुत खुश थे वे अक्सर ज़मी से कहते तुम्हारे पास रोशनी के लिये तो सूरज है दिन भर जो जलता ही रहता है और वो देखने में तो उजला लगता लगा है पर पास जाओ तो उसका रंग स्याह है ये सुन ज़मी वाले बेइंतहां उदास हो जाते वे सितारों से कुछ न कह पाते एक दिन जब फिर सितारों ने उलाहना दिया सूरज का तो ज़मी वाले परवरदिगार के पास अपनी ये दास्ताँ ले के गए और ,,,, तब खुदा ने ज़मी के लिए भी एक चाँद मुक़र्रर किया और कहा " ऐ ज़मी वालों मै तुम लोगों के लिए जो चाँद दूंगा वो न केवल बेहद खूबसूरत होगा उसके चेहरे पे कोइ दाग़ न होगा उसकी रोशनी कभी कम या ज़्यादा भी न होगी अरु तो और उसमे खुशबू भी होगी " ये सुन ज़मी वाले बेहद खुश हुए और वे खुशी - खुशी ज़मी पे लौट आए जानती हो बाद उसके परवरदिगार ने जो चाँद भेजा वो चाँद तुम हो तुम हो तुम हो तुम हो सुमी और जानती हो सुमी ?? दिन से ही सितारे बेहद उदास रहने लगे उनकी रोशनी भी बेहद कम हो गयी और चाँद का भी " मुँह टेड़ा हो गया" वरना वो...