ताने बाने पे
रात और दिन के ताने बाने पे कसता हूं तुम्हारी यादों के मजबूत धागे और बुनता हूं यादों की एक उदास चादर जिसपे काढता हूँ तुम्हारी हंसी के बेलबूटे जिसे ओढ़ काट दूँगा दिसंबर जनवरी की सर्द रातें मुकेश इलाहाबादी,,,
स्वागत है "एक बोर आदमी" में। यह केवल एक ब्लॉग नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रही उस यात्रा का दस्तावेज़ है जहाँ वह स्वयं से प्रश्न करता है — मैं कौन हूँ? जीवन का अर्थ क्या है? चेतना क्या है? और इस विशाल अस्तित्व में मनुष्य की भूमिका क्या है? इस मंच पर साहित्य, दर्शन, वेदांत, ज्योतिष, मनोविज्ञान और जीवन अनुभवों के माध्यम से उन प्रश्नों को समझने का प्रयास किया गया है जो हर संवेदनशील मनुष्य के भीतर कभी न कभी उठते हैं। — मुकेश इलाहाबादी