ताने बाने पे
रात और दिन के ताने बाने पे कसता हूं तुम्हारी यादों के मजबूत धागे और बुनता हूं यादों की एक उदास चादर जिसपे काढता हूँ तुम्हारी हंसी के बेलबूटे जिसे ओढ़ काट दूँगा दिसंबर जनवरी की सर्द रातें मुकेश इलाहाबादी,,,
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”