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Showing posts from November, 2020

ज़रुरत क्या हर वक़्त रोता रहे

     ज़रुरत क्या हर वक़्त रोता रहे ज़िंदगी में ग़म हैं तो होता रहे बीते हुए दिनों का बोझा पटक यूँ बेवजह माज़ी क्यूँ ढोता रहे असली खुशी की फसल उगेगी बस तू भलाई के बीज बोता रहे ऊंचाई तेरे कदम चूमेगी अगर आलस में तू वक़्त न खोता रहे मुकेश इलाहाबादी ----------- Comment

वक़्त के साथ साथ बदल जाओगे पता न था

 साथ वक़्त के साथ बदल जाओगे पता न था  तुम भी औरों की तरह निकलोगे पता न था  कारवाँ में हमारे जिस्म साथ साथ चलेंगे पर  दिलो दिमाग़ से तम दूरी रखोगे पता न था  सोचता था मिलोगे तो ढेर सारी बातें करेंगे  हम ही बोलेंगे तुम यूँ चुप रहोगे पता न था  तुमने नज़्म लिखा रुबाई लिखा हमने पढ़ा  तुम मेरा दर्दे दिल भी न पढोगे पता न था  हमें नाज़ था तुम हमारे हो हमारे ही रहोगे  तुम किसी और के हो जाओगे पता न था   मुकेश इलाहाबादी -------------------------

आँखों में दरिया हंसी तेरी झरना है

 आँखों में दरिया हंसी तेरी झरना है   अब तो इसी आबे हयात में डूबना है  मिल जाए हयात तो भी क्या करना  मुझे तो तेरी गलियों में ही रहना है  ज़रुरत क्या तुझे सजने सँवारने की  तेरी सादगी तेरा सबसे बड़ा गहना है  जो इजाज़त मिल तुझे जाये गैरों से  मुक्कू मुझे भी तुमसे कुछ कहना है  मुकेश इलाहाबादी ------------------

सांझ, नदी सा बह रही है

 सांझ, हौले-हौले  नदी सा बह रही है  तुम्हारी यादो की नाव  जगर- मगर कर रही है फलक पे ठिठका हुआ चाँद है दूर  पपीहा देर से  चाँद के इंतजार मे है  सांझ की नदी ने  रात का स्याह दुशाला ओढ़ लिया है  अब वह इक बर्फ की नदी है  ठिठका हुआ चाँद जो  नदी में उतरना चाहता था  उसने ठहरी हुई नदी की बर्फ देख  अपना इरादा मुल्तवी कर दिया है  चाँद, अब बादलों की ओट में है  सितारे भी  उदास हो के  अपनी अपनी माँद में जा चुके हैं  उधर  इन सब से बेखबर  फाख्ता चिड़िया  अपने चिड़े के डैनो में चोंच घुसा के  आँखे बंद कर ली है  रोशन दान के घोसले में  कबूतरी - कबूतर के साथ गुंटूर - गुं कर के  बगलबीर हो के सो चुकी है  दूर ,,,, भक्त भी निर्गुण गा के समाधि में लीन हो चुका है  और  अब मै भी उदासी और नाउम्मीदी की चादर ओढ़  उतर जाऊँगा  रात की ठहरी हुई बर्फीली नदी में  मुकेश इलाहाबादी ----------------------

कहीं से दरका तो कहीं से उखड़ा हुआ हूँ

 कहीं से दरका तो कहीं से उखड़ा हुआ हूँ  छू कर तो देख हर जगह से टूटा हुआ हूँ  काँच का नहीं पारे का जिस्म था अपना  टूट कर हज़ार हिस्सों में बिखरा हुआ हूँ  इक बार ही तेरे शहर आया तुझसे मिला  बाद उसके तेरी गलियों में भटका हुआ हूँ  कौन सा सिरा पकड़ूँ के अपनी बार करूँ  पतंग के मांझे से बेतरह उलझा हुआ हूँ  ज़माने से बताता हूँ शब इक परी से मिला  तो ज़माना कहता है कि मै बहका हुआ हूँ  मुकेश इलाहाबादी -----------------------

तुझसे जो रिश्ता है उसको क्या नाम दूँ

 तुझसे जो रिश्ता है उसको क्या नाम दूँ सोचता हूं इस फ़साने को क्या अंजाम दूँ बदन को हिस्सा -हिस्सा थकन से चूर है  कहीं छाँह मिले तो जिस्म को आराम दूँ जिंदगी इक पल को फुर्सत नहीं देती कि  तुम्हे भी कोइ सुहानी दोपहर या शाम दूँ  किसी रोज तुम हवाओं संग खुशबू भेजो  और मै ये सोचूँ अब तुम्हे क्या पैगाम दूँ  मुकेश इलाहाबादी --------------------

चाहत तो है मै भी ज़माने की तरह हो जाऊँ

चाहत तो है मै भी ज़माने की तरह हो जाऊँ  थोड़ा सा खुदगर्ज़ थोड़ा सा मगरूर हो जाऊँ  उम्र भर फलक पे आवारा बादलों सा फिरा  बरसूँ और बरस कर मै भी समंदर हो जाऊँ  फुर्सत किसी है जो मेरे दिल की दास्ताँ पढ़े  लोग खूब पढ़ेंगे गर सनसनी खबर हो जाऊँ  जो भी आता हो इक नया ज़ख्म दे जाता है  ज़माना डरेगा मुझसे भी जो खंज़र हो जाऊँ  इश्क़ के नदी में अब कौन उतरता है मुक्कू  सोचता हूँ मै दरिया से अब पत्थर हो जाऊँ  मुकेश इलाहाबादी -----------------------

क्या करता शिकायत कर के

  क्या करता शिकायत कर के किसी से जिंदगी जब नाराज़ हो ख़ुद ही से मेरी प्यास ही मर चुकी थी बहुत पहले बेवजह क्यूँ रखता मैं रिश्ता नदी से तेरा नाम रह रह के सुनाई पड़ता है जब भी अपनी साँसे सुनता हूँ खामोशी से तू लड लेता झगड लेता मैं सह लेता बहुत दर्द होता है सीने मे तेरी बेरुखी से सितारों ने ढूँढ लिए अपने अपने ठिकाने मुक्कू मैंने भी दोस्ती कर ली तीरगी से मुकेश इलाहाबादी,,,,,,,

चिरइया

 चिरइया  ने अपनी चोंच  मेरे कंधे पे रख के  अपनी चमकदार आँखों की  गोल  -गोल  पुतलियों में  नटखट शैतानी लिए मुस्कुरा रही थी  मैंने भी  उसकी आँखों में झांकते हुए  उसकी पीठ पे हाथ फेरने लगा  वो मुझसे और लिपट गयी  मैंने अपने होठों को  गोल - गोल कर के  उसकी चोँच  के नज़दीक  और नज़दीक करता गया  ताकि उसकी चोंच से अपने होठ मिला पाता  पर तभी वो अपनी डैने फड़फड़ाती हुई एक मीठी शरारत मेरे तरफ फेंकती हुई  उड़ गयी किचन में  मेरे लिए एक गरमा गरम चाय बनाने  और मै एक बार फिर  मुस्कुरा के  अपनी गर्दन झुका दी लैपटॉप पे  शब्दों के जंगल में  मुकेश इलाहाबादी -------------- मेरे 

झूठे और हंसी ख्वाबों में खो गया है

 झूठे और हंसी ख्वाबों में खो गया है  यहाँ तो शहर का शहर ही सो गया है  शेर चीता भालू सियार तो जानवर थे  इंसान तो इनसे भी बदतर हो गया है  ईश्क़ की फसल लहलहाती थी जहाँ  इस साल वहाँ कोई कांटे बो गया है  ज़िंदगी में लोग आते हैं चले जाते हैं  मेरा दिल भी इक रास्ता हो गया है  इक बार चले आओ जी बहल जाए  वैसे भी मिले हुए ज़माना हो गया है  मुकेश इलाहाबादी ------------------

हर रोज़ ही किस्तों में मरता हूँ मै

 हर रोज़ ही किस्तों में मरता हूँ मै  काँच सा वज़ूद है टूटा करता हूँ मै  जानता हूँ तू मेरी हरगिज़ नहीं है  फिर भी तुझसे इश्क़ करता हूँ मै  सूरज चाँद सितारे अब भाते नहीं  इक मुद्दत से अँधेरे में रहता हूँ मै  ऊपर ऊपर तो सख्त बर्फ जमी है  अंदर ही अंदर नदी सा बहता हूँ मै मुक्कू गौर से फलक पे देखो तो  हर रोज़ इक तारे सा उगता हूँ मै  मुकेश इलाहाबादी --------------

मन के मानसरोवर मे

मन के मानसरोवर मे यादों की इक झील है जिसमें तुम्हारे नाम का ब्रह्म कंवल खिला है जो कभी मुर्झाता नहीं झील कभी सूखती नहीं (सुमी,, तुम्हीं से) मुकेश इलाहाबादी,,,,,,

सफर में तन्हा भी चल सकता हूँ

  सफर में तन्हा भी चल सकता हूँ बगैर साथी के भी रह सकता हूँ उम्र भर ज़ख्म ही तो खाता रहा कुछ और दर्द भी सह सकता हूँ कोई सुने मुझे तो अच्छा वरना परिंदो से भी बातें कर सकता हूँ गर मुस्कुराने का वायदा कर तू तेरे लिए जोकर भी बन सकता हूँ तू जो बज़्म से न उठ के जाए तो शब् भर यूँ ही नज़्म पढ़ सकता हूँ मुकेश इलाहाबादी -------------

जाड़े की सुबह पांच बजे -----------------------

  हालाकि अभी तितली कलियाँ भौंरे सभी अलसाऐ से लेटे हैं अपने अपने गर्म नर्म बिछौने पे पर उधर सूरज बिना अलसाऐ अपनी सुरमई किरनों से धरती को एक बार फिर अपनी बाहों मे भर लेने को अंगड़ाई ले रहा है चाँद रात भर आवारगी के बाद अपनी माँद में लौटने की तैयारी कर रहा है रात की ठंडी हवाएँ तिरछी हो के चल रही हैं. और ऐसे में नींद ने मुझसे दामन छुड़ा लिया है और,,,और,, तुम याद आ गई हालाकि (वैसे तुम्हे भूला ही कब था ) और मेरी उँगलियाँ सिरहाने रखे मोबाइल की की पैड मचलने लगीं हैं तुम्हे सुप्रभात कहने को तो सुमी - तुम्हरा दिन शुभ हो सूरज अपनी किरणों की सातों रंगो के साथ इंद्रधनुष सा तुम्हारे जीवन के फलक पे चमकता रहे और तुम किसी चिड़िया सी उड़ती रहो बुलबुल सा जाती रहो गिलहरी सा मुहब्बत की डाल पे चुक चूक करती रहो और फिर मै किसी जाड़े की गुनगुनी धूप सा तुम्हारी मुहब्बत का दुशाला ओढ़ चाय पियूँ बॉलकनी पे बैठ मुकेश इलाहाबादी,,, 19 Comments Like Comment Share

बहुत सारे सुखों के बीच

 बहुत सारे सुखों के बीच  तुम्हारा साथ  न होना  (सब से बड़ा दुःख है ) बहुत सारे दुःखों के बीच  तुम्हारी यादें मेरे लिए  (सब से बड़ा सुख है )  मुकेश इलाहाबादी ------