हर रोज़ ही किस्तों में मरता हूँ मै
हर रोज़ ही किस्तों में मरता हूँ मै
काँच सा वज़ूद है टूटा करता हूँ मै
जानता हूँ तू मेरी हरगिज़ नहीं है
फिर भी तुझसे इश्क़ करता हूँ मै
सूरज चाँद सितारे अब भाते नहीं
इक मुद्दत से अँधेरे में रहता हूँ मै
ऊपर ऊपर तो सख्त बर्फ जमी है
अंदर ही अंदर नदी सा बहता हूँ मै
मुक्कू गौर से फलक पे देखो तो
हर रोज़ इक तारे सा उगता हूँ मै
मुकेश इलाहाबादी --------------
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