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Showing posts from May, 2026

कुछ चीज़ें लौटकर नहीं आतीं

  कुछ चीज़ें लौटकर नहीं आतीं एक उम्र के बाद आदमी को यह समझ में आने लगता है कि जीवन में सबसे बड़ी सच्चाई परिवर्तन नहीं, अपूर्ण वापसी है। बहुत-सी चीज़ें लौटती तो हैं, मगर वैसी नहीं लौटतीं जैसी गई थीं। बारिश लौटती है, लेकिन बचपन वाली बारिश नहीं। घर लौटते हैं, लेकिन उनमें रहने वाले लोग बदल चुके होते हैं। पुरानी गलियाँ वहीं रहती हैं, मगर उन्हें देखने वाली आँखें वैसी नहीं रहतीं। और कभी-कभी हम ख़ुद भी लौटते हैं—किसी शहर में, किसी स्मृति में, किसी रिश्ते में—लेकिन वहाँ पहुँचकर पता चलता है कि जिस जगह को हम खोज रहे थे, वह अब केवल हमारे भीतर मौजूद है। मुझे याद है, एक बार वर्षों बाद मैं एक पुराने मोहल्ले से गुज़रा था। सड़क वही थी। पेड़ भी लगभग वही थे। कुछ मकान रंग बदल चुके थे, कुछ गिराकर नए बना दिए गए थे। मैं बहुत देर तक वहाँ खड़ा रहा, जैसे किसी परिचित चेहरे में पुराने आदमी को तलाश रहा हूँ। फिर अचानक समझ में आया कि बदलाव मोहल्ले में नहीं, मुझमें हुआ है। जिसे मैं खोज रहा था, वह दरअसल वह समय था जो वहाँ कभी गुज़रा था। और समय किसी पते पर नहीं रहता। वह सिर्फ़ स्मृति में रहता है। शाय...

उदासी का अपना एक प्रकाश होता है

  उदासी का अपना एक प्रकाश होता है बहुत समय तक मुझे लगता रहा कि उदासी एक अँधेरा है, जिससे जितनी जल्दी हो सके बाहर निकल आना चाहिए। लेकिन अब कभी-कभी लगता है कि उदासी अँधेरा नहीं, एक अलग तरह की रोशनी है। उसमें चीज़ें तेज़ नहीं दिखतीं, मगर गहरी दिखती हैं। ख़ुशी के दिनों में हम जीवन को जीते हैं। उदासी के दिनों में उसे समझते हैं। शायद इसी कारण कुछ स्मृतियाँ हमेशा हल्की उदासी के साथ लौटती हैं। वे हमें दुख देने नहीं आतीं। वे बस यह याद दिलाने आती हैं कि हम कभी किसी चीज़ से सचमुच जुड़े थे। मुझे उन दिनों की याद आती है जब जीवन इतना व्यस्त नहीं था। जब शामें सिर्फ़ शामें हुआ करती थीं। उनका कोई उपयोग नहीं होता था। वे किसी लक्ष्य की ओर नहीं जाती थीं। वे बस आती थीं और धीरे-धीरे घर में फैल जाती थीं। हम खिड़कियों के पास बैठते थे, बिना किसी विशेष कारण के। कभी कोई किताब खुली रहती, कभी कोई बातचीत अधूरी चलती रहती। और कभी-कभी कुछ भी नहीं होता था। आज सोचता हूँ, शायद वही "कुछ नहीं" सबसे मूल्यवान था। अब हर क्षण को भर देने की एक बेचैनी है। हर ख़ामोशी पर कोई आवाज़ रख दी गई है। हर अकेलेपन के लिए ...

जो बातें कभी कही नहीं गईं

  जो बातें कभी कही नहीं गईं अब मुझे उन बातों का अफ़सोस नहीं होता जो मैंने कह दी थीं। अफ़सोस उन बातों का होता है जो कही जा सकती थीं और नहीं कही गईं। उम्र के इस पड़ाव पर आकर आदमी समझने लगता है कि जीवन की सबसे गहरी कहानियाँ शब्दों में नहीं लिखी जातीं। वे उन वाक्यों के बीच रहती हैं जिन्हें हम अधूरा छोड़ देते हैं। उन ख़तों में जो कभी भेजे नहीं गए। उन फ़ोन कॉलों में जो मिलाए तो गए, मगर आख़िरी बटन दबाने की हिम्मत नहीं हुई। मुझे याद नहीं कि मैंने जीवन में कितने लोगों से क्या-क्या कहा। लेकिन मुझे यह अच्छी तरह याद है कि किन लोगों के सामने मैं कुछ कह नहीं पाया। कभी संकोच था, कभी अहंकार। कभी यह भ्रम कि अभी बहुत वक़्त है। और वक़्त से बड़ा छलिया शायद कोई नहीं। वह हमेशा हमें यह यक़ीन दिलाता रहता है कि जो आज नहीं हुआ, वह कल हो जाएगा। मगर जीवन में बहुत-सी चीज़ें कल तक पहुँचते-पहुँचते अपना अर्थ खो देती हैं। एक माफ़ी। एक धन्यवाद। एक स्वीकार। एक प्रेम। इनकी भी अपनी ऋतुएँ होती हैं। समय पर कह दिए जाएँ तो फूल बन जाते हैं। देर हो जाए तो सूखे पत्तों की तरह बिखर जाते हैं। अब कभी-कभी शाम को अकेले बैठा मैं उन...

भगवद्गीता में उपनिषदों के मन्त्रों का ग्रहण : एक विस्तृत शोधपरक अध्ययन

  भगवद्गीता में उपनिषदों के मन्त्रों का ग्रहण : एक विस्तृत शोधपरक अध्ययन   भारतीय दार्शनिक परम्परा में उपनिषद् और भगवद्गीता का सम्बन्ध अत्यन्त घनिष्ठ है। यदि उपनिषदों को वेदान्त का मूल स्रोत माना जाए , तो भगवद्गीता को उस वेदान्त का व्यावहारिक और समन्वयात्मक स्वरूप कहा जा सकता है। स्वयं गीता के प्रत्येक अध्याय के अन्त में आने वाला पुष्पिका - वाक्य — “ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे ...” यह स्पष्ट करता है कि गीता को " गीतोपनिषद् " के रूप में देखा गया है। आदि शङ्कराचार्य ने भी गीता को समस्त उपनिषदों का सार कहा है। प्रसिद्ध उक्ति — “ सर्वोपनिषदो गावो , दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता , दुग्धं गीतामृतं महत्॥ ” गीता को उपनिषदों के साररूप अमृत के रूप में प्रस्तुत करती है। वास्तव में भगवद्गीता में अनेक ऐसे श्लोक हैं जो या तो सीधे उपनिषदों से उद्धृत हैं अथवा उन्हीं के विचारों का पुनर्प्रस्तुतीकरण हैं। इस शोध...

एक कमरा जो भीतर बनता रहता है

  एक कमरा जो भीतर बनता रहता है उम्र के साथ मैंने एक बात समझी है कि हर आदमी अपने भीतर एक घर बनाता रहता है। ईंट और पत्थर का नहीं, यादों और अनुभवों का घर। उस घर में कुछ कमरे ऐसे होते हैं जहाँ हम रोज़ आते-जाते हैं। वहाँ वर्तमान रहता है—आज की चिंताएँ, कल की योजनाएँ, अधूरे काम, छोटे-बड़े सुख-दुःख। मगर कुछ कमरे ऐसे भी होते हैं जिनके दरवाज़े हमेशा बंद रहते हैं। हम उन्हें भूल चुके होते हैं, या भूल जाना चाहते हैं। फिर अचानक कोई आवाज़, कोई गीत, किसी अजनबी की मुस्कान या किसी शाम की उदास रोशनी उन कमरों में से किसी एक का दरवाज़ा खोल देती है। और तब हमें पता चलता है कि भीतर कितना कुछ अब भी जीवित है। मैंने कई बार ऐसा अनुभव किया है। चलते-चलते किसी सड़क पर कोई पेड़ दिख जाता है और मुझे बरसों पुरानी एक दोपहर याद आ जाती है। किसी पुस्तक में रखा हुआ सूखा पत्ता अचानक किसी ऐसे व्यक्ति का स्मरण करा देता है जिससे मिले हुए आधी ज़िंदगी बीत चुकी हो। तब लगता है कि समय वास्तव में बीतता नहीं। वह बस परतों में जमता रहता है। हम उसके ऊपर नई ज़िंदगी जीते रहते हैं, लेकिन नीचे पुरानी ज़िंदगियाँ साँस लेती रहती ह...

जो लोग हमारे भीतर रह जाते हैं

  जो लोग हमारे भीतर रह जाते हैं कभी-कभी जीवन में कुछ लोग ऐसे आते हैं जिनके साथ कोई बड़ी कहानी नहीं बनती। न प्रेम का कोई घोषित अध्याय, न रिश्ते का कोई नाम। वे आते हैं, कुछ समय हमारे आसपास रहते हैं और फिर चले जाते हैं। लेकिन अजीब बात यह है कि उनके जाने के बाद भी उनका जाना पूरा नहीं होता। उनका एक हिस्सा हमारे भीतर कहीं रह जाता है। मैं अक्सर सोचता हूँ कि स्मृतियाँ भी कितनी चयनशील होती हैं। उन्हें बड़ी घटनाओं से उतना लगाव नहीं होता जितना छोटी बातों से। एक शाम की धूप, किसी के हाथों की हरकत, बात करते हुए अचानक छा जाने वाली ख़ामोशी—यही सब तो वर्षों बाद भी याद रह जाता है। शायद इसलिए कि जीवन अपने बड़े अर्थों में नहीं, इन्हीं छोटे क्षणों में हमारे सामने खुलता है। मुकेश ,,,,,,,,,,

कुछ आदतें याद रह जाती हैं

 कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जिन लोगों को याद करते हैं, वे लोग नहीं होते, वे हमारे जीवन के कुछ मौसम होते हैं। एक समय था जब मैं हर बिछड़ने को एक घटना समझता था। अब लगता है, बिछड़ना कोई घटना नहीं, एक धीमी प्रक्रिया है। वह उसी दिन शुरू हो जाती है जिस दिन हम किसी के आदी होने लगते हैं। आदमी दरअसल लोगों का नहीं, उनकी मौजूदगी के ढंग का आदी होता है। किसी का चाय पीते हुए खिड़की की तरफ़ देखना, किसी का बात करते-करते अचानक चुप हो जाना, किसी का हँसते वक़्त आँखें झुका लेना। ये छोटी-छोटी बातें ही तो हैं जो बाद में सबसे ज़्यादा याद आती हैं। मुझे अब नाम याद नहीं रहते। चेहरे भी धीरे-धीरे धुँधले पड़ जाते हैं। मगर कुछ आदतें याद रह जाती हैं, कुछ आवाज़ें, कुछ शामें। और फिर एक दिन आदमी अपनी ही स्मृतियों के बीच बैठा सोचता है कि आख़िर किस चीज़ का शोक मना रहा है। उस व्यक्ति का? या उस समय का, जो उसके साथ चला गया? शायद हम उम्र के एक मुक़ाम पर पहुँचकर लोगों को नहीं खोते, अपने हिस्से की कुछ संभावनाएँ खोते हैं। कुछ रास्ते जो उनके साथ खुल सकते थे। कुछ वाक्य जो कहे जा सकते थे। कुछ चिट्ठियाँ जो लिखी जा स...

उसके जाने के बाद

 उसके जाने के बाद कई दिनों तक मैं यह समझता रहा कि मुझे उसकी कमी महसूस हो रही है। फिर एक दिन अचानक एहसास हुआ कि मैं ग़लत था। मुझे उसकी नहीं, अपने उस रूप की कमी महसूस हो रही थी जो उसकी मौजूदगी में पैदा हुआ था। वह शाम जैसे मेरे भीतर किसी बंद कमरे का दरवाज़ा खोल गई थी। एक ऐसा कमरा जहाँ मैं बरसों से गया नहीं था। वहाँ कुछ अधूरी बातें थीं, कुछ पुराने ख़्वाब, कुछ चेहरे जिनके नाम अब ठीक-ठीक याद नहीं थे। और एक अजीब-सी ख़ामोशी थी, जो उम्र के साथ जमा होती चली जाती है। हम अक्सर समझते हैं कि लोग हमें बदलते हैं। लेकिन सच यह है कि ज़्यादातर लोग सिर्फ़ हमें हमसे मिलवाते हैं। उस शाम भी शायद ऐसा ही हुआ था। वह मेरे सामने बैठा था और मैं, जाने कब से, अपने सामने बैठा हुआ था। उसके जाने के बाद मैंने अपने भीतर एक हल्की-सी हरकत महसूस की। जैसे किसी सूखे कुएँ में बहुत नीचे कहीं पानी ने करवट ली हो। कोई बड़ा परिवर्तन नहीं था। जीवन वैसा ही था—सुबह की चाय, दोपहर की थकान, शाम की वापसी, रात की नींद। मगर इन सबके बीच एक महीन-सी दरार पड़ गई थी, जिससे कभी-कभी रोशनी भीतर चली आती थी। फिर एक दिन मैं बाज़ार में था। ल...

उस शाम का ज़िक्र मैंने किसी से नहीं किया।

 दिन बीतते गए। उस शाम का ज़िक्र मैंने किसी से नहीं किया। आख़िर बताता भी क्या? कि कोई आया था, कुछ देर बैठा रहा था और फिर चला गया था? ऐसी घटनाएँ सुनने में जितनी मामूली लगती हैं, भीतर उतनी ही गहरी जगह घेर लेती हैं। मगर अजीब बात यह थी कि उसके जाने के बाद मैं उसे कम और उस शाम को ज़्यादा याद करने लगा। जैसे किसी किताब का किरदार धुँधला पड़ जाए, लेकिन उसकी छोड़ी हुई रोशनी पन्नों पर बनी रहे। कई दिनों तक जब भी शाम उतरती, मैं अनायास खिड़की की तरफ़ देख लेता। सड़क पर चलते हुए लोगों में, दूर जाती हुई परछाइयों में, कभी-कभी उसकी चाल का कोई आभास मिलता। फिर तुरंत समझ में आ जाता कि यह सिर्फ़ याद की एक शरारत है। यादें अक्सर हमें वही दिखाती हैं जिसकी हमें कमी होती है। धीरे-धीरे मुझे यह भी महसूस हुआ कि उस शाम में जो बात मुझे सबसे ज़्यादा छू गई थी, वह उसका होना नहीं था। वह यह एहसास था कि दो इंसान बिना किसी मक़सद, बिना किसी भूमिका के भी एक-दूसरे के पास बैठ सकते हैं। इस दुनिया में, जहाँ हर मुलाक़ात किसी वजह से होती है, वह शाम किसी वजह के बिना आई थी। शायद इसी वजह से वह मेरे भीतर ठहर गई। फिर एक दिन, बहुत...