भगवद्गीता में उपनिषदों के मन्त्रों का ग्रहण : एक विस्तृत शोधपरक अध्ययन
भगवद्गीता में उपनिषदों के मन्त्रों का ग्रहण : एक विस्तृत शोधपरक अध्ययन
“इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे...”
यह
स्पष्ट करता है कि
गीता को "गीतोपनिषद्" के रूप में
देखा गया है।
आदि
शङ्कराचार्य ने भी गीता
को समस्त उपनिषदों का सार कहा
है। प्रसिद्ध उक्ति—
“सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा
गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता, दुग्धं गीतामृतं महत्॥”
गीता
को उपनिषदों के साररूप अमृत
के रूप में प्रस्तुत
करती है।
वास्तव में भगवद्गीता में
अनेक ऐसे श्लोक हैं
जो या तो सीधे
उपनिषदों से उद्धृत हैं
अथवा उन्हीं के विचारों का
पुनर्प्रस्तुतीकरण हैं। इस शोध-निबन्ध में उन प्रमुख
उपनिषद्-मन्त्रों और गीता-श्लोकों
का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जा रहा
है।
आत्मा
की अविनाशिता
कठोपनिषद्
न
जायते म्रियते वा विपश्चित् नायं कुतश्चिन्न
बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
(कठोपनिषद् 1.2.18)
भगवद्गीता
न
जायते म्रियते वा कदाचित्नायं भूत्वा
भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
(गीता 2.20)
विश्लेषण
यह
गीता में उपनिषद् से
लिया गया लगभग शब्दशः
उद्धरण है। दोनों ग्रन्थों
में आत्मा की अजन्मा, अमर
और अविनाशी सत्ता का प्रतिपादन है।
आत्मा
हन्ता नहीं है
कठोपनिषद्
हन्ता
चेन्मन्यते हन्तुं,हतश्चेन्मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो
नायं हन्ति न हन्यते॥
(कठोपनिषद् 1.2.19)
भगवद्गीता
य
एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो
नायं हन्ति न हन्यते॥
(गीता 2.19)
विश्लेषण
आत्मा
के अकर्तृत्व और अभोक्तृत्व का
यही सिद्धान्त गीता में अर्जुन
के विषाद-निवारण हेतु प्रयुक्त हुआ
है।
आत्मा
का आश्चर्यस्वरूप
कठोपनिषद्
आश्चर्यो
वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा, आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः।
(1.2.7)
भगवद्गीता
आश्चर्यवत्पश्यति
कश्चिदेनम् आश्चर्यवद्वदति
तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव
कश्चित्॥
(2.29)
विश्लेषण
दोनों
ग्रन्थों में आत्मा की
दुर्लभ अनुभूति और उसकी अद्भुतता
का वर्णन है।
इन्द्रिय-मन-बुद्धि की श्रेणी
कठोपनिषद्
इन्द्रियेभ्यः
परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान्परः॥
(1.3.10)
भगवद्गीता
इन्द्रियाणि
पराण्याहुः इन्द्रियेभ्यः
परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिः यो बुद्धेः
परतस्तु सः॥
(3.42)
विश्लेषण
यहाँ
गीता ने कठोपनिषद् की
मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक संरचना
को लगभग यथावत् स्वीकार
किया है।
संसाररूपी
अश्वत्थ वृक्ष
कठोपनिषद्
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख
एषोऽश्वत्थः सनातनः।
(2.3.1)
भगवद्गीता
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं
प्राहुरव्ययम्।
(15.1)
विश्लेषण
गीता
का पन्द्रहवाँ अध्याय सम्पूर्णतः कठोपनिषद् के इस रूपक
का विस्तार है।
परमधाम
का वर्णन
कठोपनिषद्
न
तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
(2.2.15)
मुण्डकोपनिषद्
न
तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्।
(2.2.10)
भगवद्गीता
न
तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
(15.6)
विश्लेषण
ब्रह्म
की स्वप्रकाश सत्ता का यह विचार
उपनिषदों से सीधे गीता
में आया है।
परमात्मा
का सर्वव्यापक स्वरूप
श्वेताश्वतरोपनिषद्
सर्वतः
पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
(3.16)
भगवद्गीता
सर्वतः
पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
(13.13)
विश्लेषण
यह
श्लोक लगभग प्रत्यक्ष उद्धरण
है।
ईश्वर
का अन्तर्यामी स्वरूप
श्वेताश्वतरोपनिषद्
एको
देवः सर्वभूतेषु गूढः।
(6.11)
भगवद्गीता
ईश्वरः
सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन
तिष्ठति।
(18.61)
विश्लेषण
गीता
उपनिषद् के अन्तर्यामी-ब्रह्म
सिद्धान्त को अधिक स्पष्ट
और भक्तिपरक भाषा में प्रस्तुत
करती है।
आत्मोद्धार
का सिद्धान्त
अमृतबिन्दूपनिषद्
मन
एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भगवद्गीता
उद्धरेदात्मनात्मानं
नात्मानमवसादयेत्।
(6.5)
विश्लेषण
दोनों
में मन की भूमिका
को बन्धन और मोक्ष का
मूल कारण बताया गया
है।
ब्रह्म
की सर्वव्यापकता
ईशावास्योपनिषद्
ईशावास्यमिदं
सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
(मन्त्र 1)
भगवद्गीता
मया
ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
(9.4)
विश्लेषण
दोनों
में सम्पूर्ण जगत् को ईश्वर
से आवृत माना गया
है।
समदर्शिता
का सिद्धान्त
ईशावास्योपनिषद्
यस्मिन्सर्वाणि
भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः।
(मन्त्र 6)
भगवद्गीता
सर्वभूतस्थमात्मानं
सर्वभूतानि चात्मनि।
(6.29)
विश्लेषण
यह
अद्वैत-दर्शन का मूल अनुभव
है जिसे गीता ने
योगदृष्टि से व्यक्त किया
है।
आत्मा
का सूक्ष्म स्वरूप
कठोपनिषद्
अणोरणीयान्महतो
महीयान्।
(1.2.20)
भगवद्गीता
कविं
पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
(8.9)
विश्लेषण
गीता
में ध्यानयोग के प्रसंग में
वही उपनिषदिक वर्णन प्रयुक्त हुआ है।
पुरुषोत्तम
सिद्धान्त
श्वेताश्वतरोपनिषद्
वेदाहमेतं
पुरुषं महान्तम्।
(3.8)
भगवद्गीता
उत्तमः
पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
(15.17)
विश्लेषण
गीता
का पुरुषोत्तमवाद श्वेताश्वतरोपनिषद् की पुरुष-विद्या
का विकसित रूप है।
प्रणव
(ॐ) की महिमा
माण्डूक्योपनिषद्
ॐ
इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्।
भगवद्गीता
ओमित्येकाक्षरं
ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
(8.13)
विश्लेषण
माण्डूक्योपनिषद्
की प्रणव-विद्या गीता के ध्यानयोग
में समाहित हो गई है।
समग्र
दार्शनिक निष्कर्ष
भगवद्गीता केवल उपनिषदों से
प्रेरित ग्रन्थ नहीं है, बल्कि
वह उपनिषदों का दार्शनिक पुनर्संयोजन
(Reinterpretation) है।
उपनिषदों में जो तत्त्वज्ञान
मुख्यतः संवादात्मक और रहस्यात्मक रूप
में प्रस्तुत हुआ था, गीता
ने उसे जीवन-संघर्ष,
धर्म, कर्म, भक्ति और योग के
सन्दर्भ में पुनर्स्थापित किया।
उपनिषद् मुख्यतः ज्ञानप्रधान हैं, जबकि गीता
ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय प्रस्तुत करती है। इस
प्रकार गीता न तो
उपनिषदों से भिन्न है
और न ही उनकी
मात्र पुनरावृत्ति; वह उपनिषदिक ब्रह्मविद्या
का व्यावहारिक, नैतिक और आध्यात्मिक विस्तार
है।
भगवद्गीता का अध्ययन यह
स्पष्ट करता है कि
उसके अनेक श्लोक सीधे
कठोपनिषद्, ईशावास्योपनिषद्, मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक्योपनिषद्, श्वेताश्वतरोपनिषद् तथा अमृतबिन्दूपनिषद् से ग्रहण किए
गए हैं अथवा उन्हीं
के तात्त्विक बीजों का विस्तार हैं।
इसलिए गीता को "उपनिषदों
का सार" कहना केवल परम्परागत
श्रद्धा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और पाठालोचनात्मक (Textual-Critical) दृष्टि से भी पूर्णतः
उचित है।
इस प्रकार भगवद्गीता
भारतीय वेदान्त परम्परा में उपनिषदों और
उत्तरवर्ती दर्शन के मध्य एक
सेतु (Bridge Text) के रूप में
प्रतिष्ठित होती है, जो
उपनिषदिक ब्रह्मविद्या को मानव जीवन
के व्यवहारिक क्षेत्र में उतारती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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