एक कमरा जो भीतर बनता रहता है
उम्र के साथ मैंने एक बात समझी है कि हर आदमी अपने भीतर एक घर बनाता रहता है। ईंट और पत्थर का नहीं, यादों और अनुभवों का घर।
उस घर में कुछ कमरे ऐसे होते हैं जहाँ हम रोज़ आते-जाते हैं। वहाँ वर्तमान रहता है—आज की चिंताएँ, कल की योजनाएँ, अधूरे काम, छोटे-बड़े सुख-दुःख।
मगर कुछ कमरे ऐसे भी होते हैं जिनके दरवाज़े हमेशा बंद रहते हैं।
हम उन्हें भूल चुके होते हैं, या भूल जाना चाहते हैं।
फिर अचानक कोई आवाज़, कोई गीत, किसी अजनबी की मुस्कान या किसी शाम की उदास रोशनी उन कमरों में से किसी एक का दरवाज़ा खोल देती है।
और तब हमें पता चलता है कि भीतर कितना कुछ अब भी जीवित है।
मैंने कई बार ऐसा अनुभव किया है।
चलते-चलते किसी सड़क पर कोई पेड़ दिख जाता है और मुझे बरसों पुरानी एक दोपहर याद आ जाती है। किसी पुस्तक में रखा हुआ सूखा पत्ता अचानक किसी ऐसे व्यक्ति का स्मरण करा देता है जिससे मिले हुए आधी ज़िंदगी बीत चुकी हो।
तब लगता है कि समय वास्तव में बीतता नहीं।
वह बस परतों में जमता रहता है।
हम उसके ऊपर नई ज़िंदगी जीते रहते हैं, लेकिन नीचे पुरानी ज़िंदगियाँ साँस लेती रहती हैं।
शायद इसी वजह से आदमी कभी पूरी तरह वर्तमान में नहीं रहता।
उसका एक हिस्सा हमेशा अतीत की किसी खिड़की पर बैठा रहता है।
मैं यह नहीं कहता कि यह अच्छी बात है या बुरी।
यह बस मनुष्य होने की एक शर्त है।
हम अपने साथ सिर्फ़ शरीर नहीं ढोते, हम अपने भीतर अनगिनत मौसम, चेहरे, आवाज़ें और अधूरी बातचीतें लेकर चलते हैं।
और शायद इसी कारण हम अकेले होकर भी पूरी तरह अकेले नहीं होते।
हमारे भीतर हमेशा एक घर आबाद रहता है।
एक ऐसा घर, जिसकी खिड़कियों पर कभी-कभी पुरानी धूप आकर बैठ जाती है।
और तब कुछ देर के लिए लगता है कि जो चला गया था, वह कहीं गया ही नहीं।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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